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Monday, February 2, 2026

पिता और प्रेम

 पिता

ग़म की गठरी को उठा खुशियाँ लुटाता है पिता

दर्द सिने में हमेशा ही छिपाता है पिता।।

         ज़िन्दगी के घूँट कड़वे खुद हलाहल पी रहा

      अपने बच्चों को मगर अमृत पिलाता है पिता।।

टूटने देता नही वो ख़्वाब बच्चों के कभी

जोड़ने में हर खुशी खुद टूट जाता है पिता।।

        ज़िन्दगी के इस तलातुम में कभी जो खो गए

         हौसला बन कर के खुद रस्ता दिखाता है पिता।।

भीड़ से दुनियाँ के मेले में बचाने के लिए

अपने काँधे पर बिठा कर के घुमाता है पिता।।

          डर नही रहता ज़माने भर के तूफानों का भी

          नीव होती गर है माँ जो छत ये होता है पिता।।

हो विदा फुलों की डोली में ही घर से लाडली

ज़िन्दगी भर एक सपना ये सजाता है पिता।।

       इस ज़माने के गरल से दूर रखने के लिए

       "संदली" छाँव में अपने ही बिठाता है पिता।।

      


प्रेम क्या है?

प्रेम वो है जहाँ कि सी के साथ रहने के लिए कोई कारण नहीं ढूँढना पड़ता,और दूर होने पर भी वो इंसान दिल के अंदर से निकल नहीं पाता।


प्रेम वो नहीं जो सिर्फ शब्दों में दिखे,

प्रेम वो है जो व्यवहार में महसूस हो

जहाँ हर छोटी बात में अपनेपन की खुशबू हो, हर खामोशी में एक अपनापन हो,हर इंतज़ार में एक मिठास हो।❣️


प्रेम वो है जहाँ

तुम्हें बार-बार खुद को साबित नहीं करना पड़ता, जहाँ तुम्हारा दोष भी समझा जाता है और तुम्हारी चुप्पी भी पढ़ ली जाती है।


प्रेम किसी को पाना नहीं...

उसके लिए अपने भीतर जगह बनाना है।

उसकी कमियों को स्वीकारना है, 

उसकी परेशानियों को अपना लेना है,उसकी हँसी को तुमसे जोड़ देना है...

Friday, January 30, 2026

प्रेम और मोह

 पाठ 1


प्रेम और मोह ...

आखिर क्या है यह प्रेम..

और क्या है यह मोह...? 

कितने लोग इसके बीच का फर्क समझते हैं ??


'प्रेम' और 'मोह' यह दो ऐसे शब्द है 

जिनके बीच जमीन और आसमान का फर्क है ..!


अर्थात - प्रेम वह जिसमें पाने की कोई चाह नहीं होती... और मोह वह जो पाने के लिए विवश कर दे ...

जब व्यक्ति किसी इंसान से या किसी भी वस्तु से प्रेम करता है तो उसे पाने के लिए 

न जाने वह क्या-क्या करता है ..

पर असल में वह व्यक्ति की चाहत बन जाती है ....

और चाहत कब मोह का रूप ले लेती है ..

यह व्यक्ति समझ ही नहीं पाता 

और उस पाने की चाह को ही प्रेम समझ बैठता है.. 

किंतु जब हम किसी से सच में प्रेम करते हैं 

तो हम बस उसको खुश देखना चाहते हैं 

उसकी खुशी में ही स्वयं की खुशी ढूंढ लेते हैं..!


मनुष्य की सबसे प्रिय चीज होती है उसकी " स्वतंत्रता "


जब हम किसी व्यक्ति को जिससे हम कहते हैं 

कि हम बहुत प्रेम करते हैं 

उसको बांधने की कोशिश करते हैं ...

उसको समझते नहीं ..

उसको उसकी जिंदगी अपने हिसाब से 

नहीं जीने देते ..

उससे बहुत सी उम्मीदें करते हैं 


परंतु क्या यह सच में प्रेम है ...?


जिससे आप प्यार करते हो उसको पाना ..

अपना बनाना या खुद से बांध कर रखना 

क्या यह प्रेम है ..? 


नहीं असल में यह मोह है ...

इंसान मोह को प्रेम का नाम दे देता है 

क्योंकि जब आप किसी से सच्चा प्यार करते हैं 

तो उसको आजाद छोड़ देते हैं 

क्योंकि आपको उस पर भरोसा होता है 

कि वह व्यक्ति विशेष चाहे कुछ भी करें परंतु 

वह रहेगा आपका ही होकर हमेशा ...


विश्वास एक ऐसी डोर होती है ..

जो किसी भी रिश्ते के लिए बहुत जरूरी होती है ....

यदि आपको अपने रिश्ते पर भरोसा नहीं होगा तो 

रिश्ता कामयाब नहीं होगा..

अतः यदि प्रेम है तो भरोसा भी करना पड़ेगा 

तभी रिश्ते की डोर मजबूत बनेगी ...!


हम स्वयं क्यों नहीं यह बात आजमा कर देखते .. 

जब वह व्यक्ति जिसे आप प्रेम करते हो 

वह जरूरत से ज्यादा आप को बांधकर रखें 

हमेशा अपनी इच्छाओं का पालन करवाएं 

बजाए आपकी इच्छाओं को महत्व देने के 

और आपसे प्रत्येक क्षण पर सवाल करें 

और उस मोह को प्रेम का नाम दें 

तो कैसा महसूस होता है ..?


बहुत सीधा सा जवाब है 

जाहिर सी बात है हमें पसंद नहीं आता ..क्यों ? 


क्योंकि हमें आजादी की आदत होती है ...

हम सभी को अपनी जिंदगी अपने 

तरह से जीने की आदत होती है 

ठीक उसी प्रकार सामने वाला भी है 

यदि आप उसको सच में प्रेम करते हैं 

तो उसको समझना सीखिए 

उस पर भरोसा करना सीखिए 

जरूरी नहीं आप जिससे प्रेम करो 

उसको अपना बनाओ तभी वह प्रेम है.. 


अतः प्रेम वह है जो निस्वार्थ भाव से किया जाए, 

प्रेम जिससे आप प्यार करो उसकी खुशी ही 

आपके लिए सब कुछ हो वह खुश तो आप खुश...

रिश्ते में मोह होगा तो कभी भी रिश्ता कामयाब नहीं होगा रिश्ता चाहे कोई भी हो 

अगर उसे प्यार के पानी से सिंचा जाएगा 

तभी वह खिलेगा..

मजबूत बनेगा ..

अतः मोह के बंधन में 

बंधा होगा तो टूट जाएगा..!


अतः जिससे आप प्रेम करते हैं, 

उसको स्वतंत्र छोड़ दीजिए 

मोह हट जाएगा तो 

पाठ 2....

प्रेम है मन की मृत्यु...


प्रेम है मन की मृत्यु, 

प्रेम है मन का समाप्त हो 

जाना, 


प्रेम है मन का अपने प्रियतम के मन में विलीन हो जाना...!!!!!


जैसे बिना प्रेम के मन में लहरें उठती हैं, 

कोई हमसे आकर पूछता है कि 

जब मन शांत होता है तो लहरों 

की क्या अवस्था होती है, 

तो हम कहते है


 जब मन प्रेम में अकंठ डुब जाता है 

तो शांत होता है 


वहाँ लहरें होती ही नहीं.....


लहरों की अवस्था का 


सवाल नहीं....


प्रेम बिना मन अशांत होता है तो 


अनगिनत लहरें होती हैं...


असल में लहरें और अशांति 


एक ही चीज के दो नाम हैं...


अशांति नहीं रही तो लहरें भी नहीं रहेंगी, 


रह जायेंगा प्रेम.......


बिना प्रेम मन है अशांति, मन है लहर। 


जब मन प्रेम को समर्पित हो जाता है तो 


लहरें चली जाती है,,


विचार चले जाते है, 


मन भी विलीन हो जाता है और


 रह जाता है प्रेम, रह जाती है आत्मा...!


 मन की जो लहरें हैं वे ही हमें अलग - अलग 


व्यक्ति बना देती हैं....


एक - एक लहर को अगर होश आ जाए


तो वह कहेगी ‘मैं हूं।’ 


और उसे पता भी नहीं होगा कि वह नहीं है, 


वह अशांति है....


यह जो हमें खयाल उठता है 


कि ‘मैं हूं’ यह हमारी एक - एक मन 


की अशांत लहरों का जोड़ है...


 ये लहरें जब प्रेम में


विलीन हो जाएंगी तो 


आप नहीं रहेंगे, मन नहीं रहेगा...


रह जाएगा प्रेम....


रह जाएगा 


एक प्रेम का सागर....


_प्रेम स्वयं ही बढ़ जाएगा ..!


पाठ 3...


_*प्रेम है अनतता*_ 


प्रेम का पहला सबक है: 

प्रेम को मांगो मत, 

सिर्फ दो। 

एक दाता बनो।


प्रेम का अपना आंतरिक आनंद है। 

यह तब होता है जब तुम प्रेम करते हो। 

परिणाम के लिए प्रतीक्षा करने की 

कोई आवश्यकता नहीं है। 

बस प्रेम करना शुरू करो। 

धीरे-धीरे तुम देखोगे कि बहुत ज्यादा प्रेम 

वापस तुम्हारे पास आ रहा है। 

व्यक्ति प्रेम करता है और प्रेम 

करके ही जानता है कि प्रेम क्या है। 

जैसा कि तैराकी तैरने से ही आती है, 

प्रेम प्रेम के द्वारा ही सीखा जाता है।


प्रेम अधिक कठिन है। 

यह किसी और के साथ नाच है। 

दूसरे के लिए भी जानने की 

जरूरत है कि नृत्य क्या है। 

किसी के साथ तालमेल 

बिठाना एक महान कला है। 

दो लोगों के बीच एक सामंजस्य बनाना … 

दो लोगों का मतलब दो अलग दुनियाएं। 

जब दो दुनियाएं करीब आती हैं,

 संघर्ष अनिवार्य है। 

तुम नहीं जानते कि कैसे सामंजस्य बनाना। 

प्रेम समस्वरितता है। और खुशी, स्वास्थ्य, 

समस्वरितता, सब कुछ प्रेम से उपजता है।


प्रेम करना सीखो। समझने की जल्दी मत करो, 

प्रेम करना सीखो। सबसे पहले एक महान 

प्रेमी बन जाओ।


प्रेम एक जुनून नहीं है, प्रेम एक भावना नहीं है। 

प्रेम एक बहुत गहरी समझ है कि कोई और 

किसी तरह तुम्हें पूरा करता है। 

कोई तुमको एक पूरा वर्तुल बनाता है। 

किसी अन्य की उपस्थिति तुम्हारी 

उपस्थिति को बढ़ाती है। 

प्रेम तुम्हें स्वयं होने की स्वतंत्रता देता है, 

यह स्वामित्व नहीं है।


प्रेम अनंतता है। 

यदि वह है, तो यह बढ़ता चला जाता है, 

बढ़ता चला जाता है। प्रेम शुरुआत जानता है, 

लेकिन अंत नहीं जानता......

और जब मेरा भी #प्रिती में मन लग गया तब 

मैं प्रेम की अनतता जान पाया और मेहसूस हुआ

#प्रीति_के_प्रेम_में_जीवन_उत्सव_है.....


Tuesday, January 27, 2026

विवाह उन सबसे कुरूप संस्थाओं में से एक है जिसे मनुष्य ने गढ़ा है।

 विवाह उन सबसे कुरूप संस्थाओं में से एक है जिसे मनुष्य ने गढ़ा है।

लेकिन यह अच्छे इरादों के साथ बनाया गया है, गहरी चिंता और सद्भावना के साथ।

मैं लोगों की नीयत पर शक नहीं करता,

मैं केवल उनकी बुद्धिमत्ता पर शक करता हूँ।


इरादा सही है,

लेकिन बुद्धि बहुत साधारण है।


यदि अच्छे इरादों के साथ थोड़ी समझ भी होती,

तो माता–पिता बच्चे को प्रेम के बारे में बताते—

अपने प्रेम के बारे में,

अपनी बेचैनियों,

अपनी उलझनों,

अपनी असफलताओं,

अपने निराशाओं के बारे में।


वे उसे बताते कि—

“ये सब जीवन का हिस्सा हैं।

और एक दिन तुम भी प्रेम के बवंडर में फँसोगे।

यह स्वाभाविक है।

डरो मत।


लेकिन याद रखना—

जो कवि कहते हैं, वह सच नहीं है।”


प्रेम कोई स्थायी, शाश्वत चीज़ नहीं है।

यह मानक मत अपनाओ कि

जो प्रेम सदा रहता है वही सच्चा है,

और जो क्षणिक है वह झूठा है।


नहीं!

इसके ठीक विपरीत सच है।


सच्चा प्रेम अत्यंत क्षणिक होता है—

लेकिन वह क्षण ऐसा होता है

कि उसके लिए कोई पूरी अनंतता को भी दाँव पर लगा सकता है।

उस एक पल के लिए

पूरी अनंतता खोने को तैयार हो सकता है।


कौन चाहता है कि वह क्षण स्थायी बन जाए?

और स्थायित्व को इतना मूल्य क्यों दिया जाए?


क्योंकि जीवन प्रवाह है, परिवर्तन है।

केवल मृत्यु स्थायी होती है।

मृत्यु में घड़ी रुक जाती है—

वहीं टिक जाती है, आगे नहीं बढ़ती।


लेकिन जीवन में

घड़ी निरंतर चलती रहती है,

हर दिन नए रास्तों की ओर बढ़ती रहती है।


फिर क्यों स्वयं को एक ही प्रेम में बाँध लिया जाए?

क्यों स्वयं को मजबूर किया जाए?


क्योंकि प्रकृति की मंशा ऐसी नहीं है।


जब तुम प्रकृति के विरुद्ध जाते हो,

तो प्रतिरोध पैदा होता है,

दुख आता है,

असंतोष आता है।


तब विवाह–परामर्श और थैरेपी की ज़रूरत पड़ती है…


प्रकृति चाहती है कि तुम प्रेम को

अनेक रूपों में जानो।


क्योंकि जो तुम एक स्त्री से जान सकते हो,

वह किसी दूसरी स्त्री से नहीं जान सकते।

जो अनुभव एक पुरुष से होगा,

वह किसी दूसरे से नहीं होगा।


हर प्रेम अनूठा है।


कोई प्रतिस्पर्धा नहीं है।

कोई झगड़ा नहीं है।

और जितना अधिक तुम प्रेम करते हो,

उतना ही तुम्हारा अस्तित्व समृद्ध होता है।


इसलिए मैं उन सब परेशानियों के पक्ष में हूँ—

पीड़ा, चिंता, बेचैनी, निराशा।


बस एक बात जोड़ना चाहता हूँ—

बुद्धिमान बनो।


ये परेशानियाँ इसलिए नहीं हैं कि प्रेम समाप्त हो गया है,

ये इसलिए हैं कि तुम मूर्ख बने हुए हो।


अगर कुछ छोड़ना ही है,

तो अपनी मूर्खता छोड़ो।


लेकिन लोग प्रेम छोड़ देते हैं

और अपने मूर्ख मन को पकड़े रहते हैं।


बुद्धिमान बनो—

और प्रेम तुम्हें इंद्रधनुष के सभी रंग देगा।


तुम अनेक लोगों के माध्यम से

अनेक तरीकों से पूर्ण हो सकोगे।


क्योंकि एक स्त्री

तुम्हारे अस्तित्व के केवल एक पहलू को छुएगी,

बाकी पहलू भूखे रह जाएँगे।


एक पुरुष

तुम्हारे हृदय के किसी एक हिस्से को छुएगा,

बाकी हिस्से बिना विकास के रह जाएँगे।


अगर तुम चिपक गए,

तो एक हिस्सा राक्षस बन जाएगा

और बाकी सब सिकुड़ जाएँगे।


अगर मुझे दुनिया को सलाह देने की अनुमति हो,

तो मेरी सलाह होगी—


लोगों को जितना संभव हो, उतना प्रेम अनुभव करने में मदद करो।


प्रकृति चाहती है कि तुम प्रेम को

अनेक रूपों में जानो।


और जितना अधिक तुम प्रेम करते हो,

उतना ही तुम्हारा अस्तित्व समृद्ध होता है।


तब विवाह–परामर्श जैसी संस्थाएँ

अपने आप अप्रासंगिक हो जाती हैं।

Monday, January 26, 2026

A Love Story

 ये उन दिनों की बात है,

जब एक लड़का हुआ करता था...

जिसकी जेब में इश्क़ की पहली मासूमियत रखी रहती थी,

जिसकी कॉपी में एक नाम लिखा था, एक छोटी सी मुलाक़ात ने

जो दुनिया की किसी तरकीब, किसी रबर से नहीं मिटता

जो अब किताब का उनवान बन चुका है।


बहुत छोटे से शहर में रहता था वो,

जहाँ ख़्वाबों की ऊँचाई अक्सर छतों से टकरा जाया करती है,

पर उसके ख़्वाब...

किसी के इश्क़ की पाकीज़ा छुवन जैसे, उसको ज़मीं से दो फुट ऊपर उठा चुके थे।

कच्ची हवा को भी अपनी बाँहों में भरकर रख लेता था वो,

और जब दुनिया कहती -अब नीचे उतर आ

तो उसकी आँखों में एक नया आसमान उग आता था।

हाँ, हवाएँ तो आज भी साज़िश करती हैं

उसको फ़ना करने की

लेकिन वो किसी की मानने को तैयार ही नहीं,

जैसे उसके अंदर ख़ौफ़ का कोई वजूद ही नहीं।


मगर अफ़सोस...

गुज़रते वक़्त में उसके परों को जब ज़माने ने नहीं,

उसके अपने सबसे अज़ीज़ आसमान ने कतर दिए

इतनी बेरुख़ी से, इतनी ख़ामोशी से,

कि अब रत्ती भर फ़रेब भी उसे जड़ों से हिला देता है।

वो लड़का,

जो अब भी किसी कविता की आख़िरी अधूरी लाइन में

अक्सर मुंतज़िर बैठा हुआ मिल जाता है

वो कोई और नहीं, मैं ही हूँ।

वही हूँ मैं,

और उसी लड़के का चेहरा ओढ़कर दुनिया से मिलने निकलता हूँ

जिसे इश्क़ ने ही उँगली पकड़ कर उड़ना सिखाया था,

और फिर जब मैं बादलों के बीच था,

तो इश्क़ ने ही हाथ छोड़ कर ज़मीन पर ला पटका।


हाँ मेरे ही हाथों से सजाई थी उसने अपनी दरों दीवारें,

वही तन्हा कर गया, जो मेरा निगेहबान था।


अब अक्सर अपना दिन लिखने-पढ़ने में गुज़ारता हूँ...

सोचता हूँ इश्क़ शायद इश्क़ करने वालों के लिए बना ही नहीं है

मुकम्मल इश्क़, ख़्वाहिशों की तलाश में भटकता ही नहीं।


हाँ, तो मैं और मेरे जैसे ही तमाम लिखने वाले

अपने ज़र्फ़ को क़ागज़ के हवाले कर देते हैं, जाने किसकी तलाश में।

एक शायरा ने क्या खूब लिखा है कि...

एक बार फिर से मेरे मन का प्याला खाली कर दिया है मैंने

सुना है...

खाली प्याले में आसमान उतर आता है।

कितनी खूबसूरत लाइन हैं ना?

लेकिन मेरा सवाल है—

उनको कोई ये समझा सकता है? 

कि जब बेवफाई का कड़वा सच प्याले की तलछट में जम गया हो,तो वहाँ 

राहत का नीला आसमान नहीं उतरता,

सिर्फ घुटन का धुंधलका भर जाता है।


गाहे बगाहे शायर/शायरा की क़लम ये भी लिख देती है कि..

ये आलम बदलने की तमाम कोशिशें मेरी नाकाम हो जाती हैं, जब तुम.....

सब होते हुए भी खाली होने का अहसास दिला देते हो।

जिनको पढ़ कर ऐसा लगने लगता है कि मैं ही लिख रहा हूँ..!


लोग कहते हैं, लिखने वाले काफ़ी समझदार लोग हैं...

उन्हें क्या ख़बर,

कि ये समझदारी दरअसल उस बच्चे का जनाज़ा है

जो कभी हर बात पर ज़िद किया करता था।

कि ये समझदारी इक खेल है और खेल भी क्या, सिर्फ़ हँसते रहना,चाहे अंदर का आदमी,साथ हो ही ना। 


ये वो शख़्स हैं,

जो अक्सर हँसते हुए पाये जाते हैं

मगर जिनकी आँखों में झाँको तो

वहाँ एक पुराना, गहरा सन्नाटा बसता है।


ये ​वो शख़्स हैं,

जिन्होंने कभी अपनी शर्तों पर जीना सीखा था,

और आज-कल वो

वक़्त की शर्तों पर सिर्फ़ साँस लेते हैं। 


इन्हीं अहसासों से मैं भी गुज़र रहा हूँ...

आज भी कभी-कभी,

धूल में दबा हुआ मेरा भी दिल

क़ागज़ों के बीच ज़ोर-ज़ोर से धड़कता है,

एक पल के लिए ऐसा भी लगता है कि

शायद आसमान फिर से खुल जाएगा...

मैं फिर से वही बेख़ौफ़ लड़का हो जाऊँगा...

मगर तभी किसी के दिए हुए ज़ख़्मों की टीस उठती है,

और जब ऐसा होता है...

तो मैं चुपचाप कॉपी को बन्द कर,

अपना सिर फिर से उसी यादों की मिट्टी में गाड़ लेता हूँ,

जहाँ मेरे इश्क़ को ज़िंदा दफ़्न किया गया था।


सच है,

जाने वाला तो चला जाता है

उसके मन में .... मलाल कहाँ होता है?

वो तो बस एक अलविदा कह कर रुख़सत हो गया, मुक्त हो गया...

और यहाँ साँस लेने की उम्र क़ैद मुकर्रर हो गई।

उफ्फ!!! 

सज़ा-ए-मौत मिलती तो एक बार मरते,

मग़र इश्क़ ने बख़्शी है हमको ज़िंदगी, 

हर एक लम्हा मरने के लिए।। 

प्रेम वह गहरी भावना है जो सिर्फ एक-दूसरे को देखने तक सीमित नहीं रहती, बल्कि यह एक साझा दृष्टिकोण और उद्देश्य का नाम है. जब दो लोग एक-दूसरे के प्रति आकर्षित होते हैं, तो यह सिर्फ बाहरी रूप या व्यक्तित्व तक सीमित होता है. 

लेकिन असली प्रेम तब होता है जब दो लोग अपने जीवन की दिशा में एक समान दृष्टिकोण रखते हैं. वे केवल एक-दूसरे की आँखों में नहीं, बल्कि अपने जीवन के उद्देश्य और आकांक्षाओं में भी एक-दूसरे के साथी होते हैं.


यह एक ऐसा रिश्ता होता है जहाँ दोनों अपने सपनों और लक्ष्यों को साझा करते हैं, और एक-दूसरे की सफलता में खुश होते हैं. 

जब दो लोग एक ही दिशा में देखते हैं, तो उनका रिश्ता न सिर्फ शारीरिक रूप से जुड़ा होता है, बल्कि मानसिक और भावनात्मक रूप से भी गहरा होता है.

यह साझी यात्रा होती है, जहाँ दोनों के दिल और दिमाग एक जैसा रास्ता चुनते हैं.


प्रेम केवल सुंदर शब्दों और अहसासों तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह एक साझी यात्रा का हिस्सा बनता है. जब दो लोग एक-दूसरे की दिशा को समझते हैं और एक साथ उस दिशा की ओर बढ़ते हैं, तो वह रिश्ता और भी मजबूत होता है. इसमें विश्वास, समझ, और समर्थन होता है, जो रिश्ते को हर मोड़ पर खड़ा रखते हैं.


कभी आपने महसूस किया है कि प्रेम वही होता है, जब दो लोग अपनी यात्रा को एक साथ और समान दिशा में तय करते हैं ?

यह तब होता है जब दोनों अपने सपनों और जीवन के उद्देश्य को एक साथ जीते हैं.

केवल प्रेम नहीं, बल्कि एक साझी यात्रा बन जाती है, जिसमें दोनों एक-दूसरे का सहारा होते हैं.


कितना दुखद होगा उनका जीवन...


                      जो प्रेम और अपनेपन की 

                      चाह लिये भी,

                      परिवार की मान मर्यादा और

                      प्रतिष्ठा के बंधन में बंधे रहे।


                      यह पीड़ा 

                      तब और अधिक हो गई होगी_


                      जब विवाह पश्चात भी

                      प्रेम, स्नेह, सम्मान और अपनापन 

                      उनके हिस्से नहीं आया होगा।।


धोखा अक्सर तब नहीं मिलता

जब कोई रंगे हाथ पकड़ा जाए,

धोखा तब मिलता है

जब फ़ोन चेक करते ही

दिल बैठ जाए।


वो एक स्क्रीन,

कुछ नाम,

कुछ चैट्स…

और अचानक

भरोसा आवाज़ भी नहीं करता,

सीधे मर जाता है।


उस पल सबसे ज़्यादा दर्द

ये नहीं देता

कि उसने क्या किया,

दर्द ये देता है

कि वो इतने पास रहकर भी

इतनी दूर था।


तुम पूछते हो —

“ये क्या है?”

और सामने वाला कहता है —

“कुछ नहीं…”


यहीं सब कुछ टूटता है।


क्योंकि धोखा

हमेशा जिस्म से नहीं होता,

कई बार

झूठ की आदत से होता है।

छुपाने की सहजता से होता है।


फोन चेक करना

गलती हो सकती है,

पर जो मिला

वो गलती नहीं होता।


कुछ बातें

तुम्हें बताए बिना की जाती हैं,

और फिर कहा जाता है —

“तुम्हें भरोसा क्यों नहीं है?”


भरोसा

तलाशी से नहीं टूटता,

भरोसा

पहले ही टूट चुका होता है,

तभी तो तलाशी ली जाती है।


और सच ये है —

जिस रिश्ते में

फोन लॉक हो जाए

और दिल अनलॉक न रहे,

वहाँ साथ रहना

बस एक समझौता होता है,

रिश्ता नहीं।

                      


                                                           

Sunday, January 25, 2026

मुझे जीना आ गया

 मैं जितने साल जी चुका हूँ, उससे अब कम साल मुझे जीना है। यह समझ आने के बाद मुझमें यह परिवर्तन आया है :


१. किसी प्रियजन की विदाई से अब मैं रोना छोड़ चुका हूँ क्योंकि आज नहीं तो कल मेरी बारी है।


२. उसी प्रकार,अगर मेरी विदाई अचानक हो जाती है, तो मेरे बाद लोगों का क्या होगा, यह सोचना भी छोड़ दिया है क्योंकि मेरे जाने के बाद कोई भूखा नहीं रहेगा और मेरी संपत्ति को कोई छोड़ने या दान करने की ज़रूरत नहीं है।


३. सामने वाले व्यक्ति के पैसे, पावर और पोजीशन से अब मैं डरता नहीं हूँ।


४. खुद के लिए सबसे अधिक समय निकालता हूँ। मान लिया है कि दुनिया मेरे कंधों पर टिकी नहीं है। मेरे बिना कुछ रुकने वाला नहीं है।


५. छोटे व्यापारियों और फेरीवालों के साथ मोल-भाव करना बंद कर दिया है। कभी-कभी जानता हूँ कि मैं ठगा जा रहा हूँ, फिर भी हँसते-मुस्कुराते चला जाता हूँ।


६. कबाड़ उठाने वालों को फटी या खाली तेल की डिब्बी वैसे ही दे देता हूँ, पच्चीस-पचास रुपये खर्च करता हूँl जब उनके चेहरे पर लाखों मिलने की खुशी देखता हूँ तो खुश हो जाता हूँ।


७. सड़क पर व्यापार करने वालों से कभी-कभी बेकार की चीज़ भी खरीद लेता हूँ।


८. बुजुर्गों और बच्चों की एक ही बात कितनी बार सुन लेता हूँ। कहने की आदत छोड़ दी है कि उन्होंने यह बात कई बार कही है।


९. गलत व्यक्ति के साथ बहस करने की बजाय मानसिक शांति बनाए रखना पसंद करता हूँ।


१०. लोगों के अच्छे काम या विचारों की खुले दिल से प्रशंसा करता हूँ। ऐसा करने से मिलने वाले आनंद का मजा लेता हूँ।


११. ब्रांडेड कपड़ों, मोबाइल या अन्य किसी ब्रांडेड चीज़ से व्यक्तित्व का मूल्यांकन करना छोड़ दिया है। व्यक्तित्व विचारों से निखरता है, ब्रांडेड चीज़ों से नहीं, यह समझ गया हूँ।


१२. मैं ऐसे लोगों से दूरी बनाए रखता हूँ जो अपनी बुरी आदतों और जड़ मान्यताओं को मुझ पर थोपने की कोशिश करते हैं। अब उन्हें सुधारने की कोशिश नहीं करता क्योंकि कई लोगों ने यह पहले ही कर दिया है।


१३. जब कोई मुझे जीवन की दौड़ में पीछे छोड़ने के लिए चालें खेलता है, तो मैं शांत रहकर उसे रास्ता दे देता हूँ। आखिरकार, ना तो मैं जीवन की प्रतिस्पर्धा में हूँ, ना ही मेरा कोई प्रतिद्वंद्वी है।


१४. मैं वही करता हूँ जिससे मुझे आनंद आता है। लोग क्या सोचेंगे या कहेंगे, इसकी चिंता छोड़ दी है। चार लोगों को खुश रखने के लिए अपना मन मारना छोड़ दिया है।


१५. फाइव स्टार होटल में रहने की बजाय प्रकृति के करीब जाना पसंद करता हूँ। जंक फूड की बजाय बाजरे की रोटी और आलू की सब्जी में संतोष पाता हूँ।


१६. अपने ऊपर हजारों रुपये खर्च करने की बजाय किसी जरूरतमंद के हाथ में पाँच सौ हजार रुपये देने का आनंद लेना सीख गया हूँ। और हर किसी की मदद पहले भी करता था और अब भी करता हूँ।


१७. गलत के सामने सही साबित करने की बजाय मौन रहना पसंद करने लगा हूँ। बोलने की बजाय चुप रहना पसंद करने लगा हूँ। खुद से प्यार करने लगा हूँ।


१८. मैं बस इस दुनिया का यात्री हूँl मैं अपने साथ केवल वह प्रेम, आदर और मानवता ही ले जा सकूंगा जो मैंने बाँटी हैl यह मैंने स्वीकार कर लिया है।


१९. मेरा शरीर मेरे माता-पिता का दिया हुआ हैl आत्मा परम कृपालु प्रकृति का दान है और नाम फॉइबा का दिया हुआ है... जब मेरा अपना कुछ भी नहीं है, तो लाभ-हानि की क्या गणना?


२०. अपनी सभी प्रकार की कठिनाइयाँ या दुख लोगों को कहना छोड़ दिया है, क्योंकि मुझे समझ आ गया है कि जो समझता है उसे कहना नहीं पड़ता और जिसे कहना पड़ता है वह समझता ही नहीं।


२१. अब अपने आनंद में ही मस्त रहता हूँ क्योंकि मेरे किसी भी सुख या दुख के लिए केवल मैं ही जिम्मेदार हूँl यह मुझे समझ आ गया है।


२२. हर पल को जीना सीख गया हूँ क्योंकि अब समझ आ गया है कि जीवन बहुत ही अमूल्य हैl यहाँ कुछ भी स्थायी नहीं हैl कुछ भी कभी भी हो सकता है, ये दिन भी बीत जाएँगे।


२३. आंतरिक आनंद के लिए मानव सेवा, जीव दया और प्रकृति की सेवा में डूब गया हूँl मुझे समझ आया है कि अनंत का मार्ग इन्हीं से मिलता है।


२४. प्रकृति और देवी-देवताओं की गोद में रहने लगा हूँl मुझे समझ आया है कि अंत में उन्हीं की गोद में समा जाना है।


देर से ही सही, लेकिन समझ आ गया हैl शायद मुझे जीना आ गया


जब कोई सफ़र सच में अकेले करना हो।।।

और आपको पता भी हो कि इस सफ़र में लोग तो कई है,,,

मगर फिर भी आप अकेले हो।।।

ऐसे में हम कितनी सावधानी बरतते हैं।।।

है ना,,

हमें सब लोगों से हिदायतें मिलती रहतीं हैं।।।

मिनटों मिनटों में कोई ना कोई हाल पुछता रहता है।।।

हम चाहे हर बार कहे, सब ठीक है, मैं ठीक हूं ।।।

पर फिर भी वो डरते हैं।।।

कितनी अजीब बात है।।।

हम अगर किसी साधन के साथ कोई सफ़र करते हैं।।।

तो लोगो को हमारी फिक्र सताती है।।।

सुविधाएं इस सफ़र में कई होती है।।।

फिर हमारी जरूरतों कि चिंता उन्हें बेवजह हो जाती है।।।

अच्छा भी लगता है... हमारे लिए लोगों कि फिक्र देखकर।।।

पर, 

जब हम जीवन का सफ़र अकेले कर रहे होते हैं।।।

तब,,, तब ऐसा कुछ क्यूं नहीं होता।।।

क्या किसी को पता नहीं या फिर किसी को इस बात का डर नहीं।।।

कि हमारे साथ कुछ बूरा हो गया तो ।।।

या फिर,,, शायद इस बात से बेफिक्र हो गए सभी।।।

हम तो सबकुछ संभाल लेंगे।।।

हम अपना ख्याल अच्छी तरह रखेंगे।।।

चाहे कोई सुविधा ना हो मगर हम फिर भी ख़ुद को हमेशा सुरक्षित रखेंगे।।।

है ना,,, ऐसा ही है ना।।।

सब ऐसा ही मानते हैं ना कि हमें हर हाल में हालातों से लड़ना आता है।।।

क्यूंकि हमने वो सीख लिया है।।।

अकेले चलना, गिरना, संभलना।।।

क्यूं हो फिक्र किसी को हमारी।।।

ये रास्ता भी तो आखिर हमने ही चुना है।।।

हां,,, यही सच है।।।

हमने ख़ुद को मजबूत बनाया है।।।

क्योंकि हमने जीवन में कई बार अपनों से भरोसे के ठोकरें खाये है।।।

अब तो,,, आनंद उठाते हैं हम इस जीवन के सफर का।।।

कोई बेगाना मिले तो कुछ भावनाओं कि अदला बदली हो जाती है।।।

कभी ना मिले तो बस कुछ ऐसे शब्दों को पन्नों में लिखते हुए सुविधा जनक सफर और सुविधा रहित जिन्दगी भी खुबसूरती के साथ अकेले ही बड़े सुकून से कट जाती है।।।

तो चलिए आप भी मेरे शब्दों के सफ़र का लाभ उठाते हुए।।।

मेरे साथ जीवन का एक ख़ुबसूरत सफ़र तय किजिए।।।

फिर मिलेंगे,,,कहीं किसी रोज़।।।

एक और नए सफ़र पर मगर हां,,,

उम्मीद रहेगी कि तब हम अकेले नहीं होंगे।।।

ख़ैर अकेले तो हम आज भी नहीं।।।

बस हम यहां और आप ना जाने कहां।।।

पर हम साथ तो है क्योंकि आपकी यादें साथ है।।।।

तो बहुत ख़्याल रखते हुए हम अपना

तन्हाई और अकेलेपन का सफ़र जारी रखते हैं।।। 

Saturday, January 24, 2026

मनुष्य के जीवन में कुछ रिश्ते

कुछ रिश्ते बनते हैं, लेकिन अपने आप अलग हो जाते हैं" इस बीच क्या होता है?


मनुष्य के जीवन में कुछ रिश्ते ऐसे आते हैं

जिनका कोई नाम तय नहीं होता,

कोई परिभाषा नहीं होती,

और कोई वादा भी नहीं।


वे बस होते हैं।

जैसे साँस बिना कोशिश के।


लेकिन समय के साथ वही रिश्ते

चुपचाप ढलने लगते हैं,

जैसे शाम ढलती है 

बिना किसी शोर के।


1. हर रिश्ता एक क्षण की ज़रूरत से जन्म लेता है


हर रिश्ता किसी अधूरेपन से जन्म लेता है।


कभी हमें सुने जाने की ज़रूरत होती है,

कभी समझे जाने की,

कभी बस किसी के होने भर की।


वह दूसरा व्यक्ति

उस क्षण हमारी ज़रूरत बन जाता है।

और हम उसे “रिश्ता” कह देते हैं।


लेकिन जैसे ही ज़रूरत बदलती है,

रिश्ते की दिशा भी बदलने लगती है।


2. समय हमें नहीं बदलता, वह हमें उजागर करता है


शुरुआत में हम अपने सबसे सुंदर रूप में होते हैं।

कमज़ोरियाँ छिपी रहती हैं,

डर मुस्कान के पीछे छुपे रहते हैं।


समय बीतने के साथ

नक़ाब उतरते हैं।


और तब पता चलता है 

कि जिसे हम समझ रहे थे,

वह और है।

और जो हम खुद को समझते थे,

वह भी कुछ और है।


यह टकराव रिश्ते को नहीं तोड़ता,

यह बस सच्चाई को सामने लाता है।


3. भावनाएँ शब्दों से पहले थकती हैं


एक समय होता है

जब बात न भी हो,

तो जुड़ाव बना रहता है।


और फिर एक समय आता है

जब बात होती है,

लेकिन जुड़ाव नहीं।


यह वह बिंदु है

जहाँ दिल थक जाता है,

मुँह नहीं।


हम जवाब देते हैं,

लेकिन महसूस नहीं करते।


4. अपेक्षाएँ प्रेम का मौन शत्रु हैं


प्रेम तब तक शुद्ध रहता है

जब तक वह स्वतंत्र होता है।


लेकिन जैसे ही हम

दूसरे से अपनी कमी पूरी करवाना चाहते हैं,

वह रिश्ता बोझ बनने लगता है।


सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि

हम अपेक्षाएँ रखते हैं

लेकिन उन्हें स्वीकार नहीं करते।


और जब वे पूरी नहीं होतीं,

तो हम भीतर ही भीतर

टूटते चले जाते हैं।


5. अहंकार दरअसल डर का दूसरा नाम है


“अगर वह चाहता, तो पूछता।”

“मैं ही क्यों झुकूँ?”


ये वाक्य अहंकार नहीं,

असुरक्षा से जन्म लेते हैं।


डर कि अगर मैंने कोशिश की

और वह नहीं लौटा,

तो मेरा महत्व कम हो जाएगा।


इस डर में

रिश्ते दम तोड़ देते हैं।


6. अलगाव एक घटना नहीं, एक प्रक्रिया है


कोई रिश्ता अचानक नहीं टूटता।

वह रोज़ थोड़ा-थोड़ा मरता है।


एक दिन देर से जवाब,

दूसरे दिन बिना वजह की चुप्पी,

तीसरे दिन बिना बात के थकान।


और फिर एक दिन

हम महसूस करते हैं 

अब कोशिश करने की इच्छा भी नहीं बची।


7. सबसे गहरी पीड़ा ...कोई दोषी नहीं होता


इन रिश्तों का दुख इसलिए गहरा होता है

क्योंकि यहाँ कोई खलनायक नहीं होता।


बस दो इंसान होते हैं

जो एक-दूसरे के जीवन में

जितनी देर के लिए आए थे,

उतनी देर रह पाए।


यह स्वीकार करना

सबसे कठिन होता है

कि हर साथ हमेशा का नहीं होता।


जीवन में हर रिश्ता

मंज़िल नहीं होता।


कुछ रिश्ते

हमें तैयार करने आते हैं 

अगले रिश्तों के लिए,

अगली समझ के लिए,

और कभी-कभी

अकेले चलने की क्षमता के लिए।


और जब वे चले जाते हैं,

तो खालीपन छोड़ते हैं,

लेकिन साथ में

एक शांत परिपक्वता भी।


अलग हो जाना

हमेशा हार नहीं होती।

कभी-कभी

यह इस बात का प्रमाण होता है

कि दोनों ने ईमानदारी से

वह निभाया

जो जितना संभव था।


कुछ रिश्ते

हमेशा दिल में रहते हैं,

ज़िंदगी में नहीं।

और शायद

यही उनका सबसे सुंदर रूप होता है।


Friday, January 23, 2026

स्त्री और पुरुष कामुकता

 स्त्री कामुकता: शरीर, मन और चेतना का समन्वय

स्त्री कामुकता (Stri Kamukta) को लंबे समय तक या तो चुप्पी में दबाया गया, या केवल जैविक क्रिया तक सीमित कर दिया गया। वास्तव में स्त्री कामुकता एक बहुस्तरीय अनुभव है—जिसमें शरीर, मन, भावनाएँ, हार्मोन, स्मृतियाँ, सामाजिक संस्कार और आत्मसम्मान—all मिलकर काम करते हैं। यह केवल यौन इच्छा नहीं, बल्कि सुरक्षा, जुड़ाव, स्वीकार और स्वायत्तता का अनुभव भी है।

1. जैविक आधार: हार्मोनल लय और शरीर

स्त्री शरीर में कामुकता हार्मोनल चक्रों से गहराई से जुड़ी होती है। एस्ट्रोजन, प्रोजेस्टेरोन, ऑक्सीटोसिन और डोपामिन—ये हार्मोन स्त्री की इच्छा, संवेदनशीलता और भावनात्मक जुड़ाव को प्रभावित करते हैं। मासिक चक्र के विभिन्न चरणों में कामुकता का अनुभव बदलता है—कभी अधिक संवेदनशील, कभी अंतर्मुखी, कभी तीव्र और कभी शांत।

महत्वपूर्ण यह है कि स्त्री की कामुकता रैखिक नहीं, बल्कि चक्रीय होती है। इसे समझे बिना अपेक्षाएँ बनाना स्त्री के लिए दबाव और अपराधबोध पैदा कर सकता है।

2. मनोवैज्ञानिक संरचना: सुरक्षा और भरोसा

स्त्री कामुकता का केंद्रीय तत्व भावनात्मक सुरक्षा है। जहाँ भरोसा, सम्मान और समझ होती है, वहीं स्त्री का मन खुलता है। भय, दबाव या उपेक्षा के वातावरण में स्त्री शरीर अक्सर “रक्षा” में चला जाता है—जहाँ इच्छा स्वाभाविक रूप से कम हो जाती है।

कई स्त्रियाँ अपने जीवन में ऐसे अनुभवों से गुज़रती हैं जहाँ उनकी सीमाओं का उल्लंघन हुआ हो। ऐसे अनुभव स्मृति बनकर शरीर में दर्ज रहते हैं और कामुकता को प्रभावित करते हैं। इसलिए स्त्री कामुकता को समझने के लिए ट्रॉमा-इनफॉर्म्ड दृष्टि आवश्यक है।

3. सामाजिक संस्कार और लज्जा

समाज ने सदियों से स्त्री कामुकता को लज्जा, निषेध और नियंत्रण के दायरे में रखा है। “अच्छी स्त्री” की परिभाषा में चुप्पी, त्याग और इच्छाओं का दमन शामिल रहा है। परिणामस्वरूप, कई स्त्रियाँ अपनी इच्छा को पहचानने, व्यक्त करने या स्वीकार करने में कठिनाई महसूस करती हैं।

यह दमन कभी-कभी विपरीत रूप में भी प्रकट होता है—जहाँ स्त्री स्वयं को केवल आकर्षण या स्वीकृति के माध्यम से मूल्यवान समझने लगती है। दोनों ही स्थितियाँ संतुलन से दूर हैं।

4. भावनात्मक जुड़ाव और स्त्री इच्छा

स्त्री कामुकता अक्सर भावनात्मक जुड़ाव के साथ खिलती है। यह जुड़ाव संवाद, संवेदनशीलता और सम्मान से बनता है। जब स्त्री को सुना और देखा जाता है, तब उसका शरीर भी प्रतिक्रिया देता है।

यह एक मिथक है कि स्त्री में इच्छा नहीं होती; सच यह है कि इच्छा का प्रकट होना परिस्थितियों पर निर्भर करता है। दबाव, थकान, घरेलू बोझ, मानसिक तनाव—ये सभी इच्छा को प्रभावित कर सकते हैं।

5. अति-दमन और अति-उत्तेजना: दोनों असंतुलन

स्त्री कामुकता में दो चरम स्थितियाँ देखी जाती हैं—अति-दमन और अति-उत्तेजना।

अति-दमन में स्त्री अपनी इच्छा को “गलत” मानकर दबा देती है, जिससे उदासी, चिड़चिड़ापन और आत्म-विमुखता बढ़ सकती है।

अति-उत्तेजना में स्त्री स्वयं को केवल दूसरों की अपेक्षाओं के अनुसार ढालती है, जिससे पहचान और आत्मसम्मान कमजोर पड़ता है।

स्वस्थ कामुकता इन दोनों के बीच का संतुलन है—जहाँ इच्छा स्वीकृत भी हो और सचेत भी।

6. सहमति, सीमाएँ और आत्म-स्वायत्तता

स्त्री कामुकता का मूल आधार सहमति है—न केवल दूसरों के साथ, बल्कि स्वयं के साथ भी। “मैं क्या चाहती हूँ?” यह प्रश्न आत्म-स्वायत्तता का संकेत है।

सीमाएँ बनाना कामुकता का विरोध नहीं, बल्कि उसका संरक्षण है। जब स्त्री अपनी सीमाएँ स्पष्ट करती है, तब वह अधिक सुरक्षित और मुक्त महसूस करती है।

7. आध्यात्मिक दृष्टि: कामुकता एक ऊर्जा

कई आध्यात्मिक परंपराओं में स्त्री कामुकता को सृजनात्मक ऊर्जा माना गया है। यह ऊर्जा केवल शारीरिक नहीं, बल्कि रचनात्मकता, करुणा और जीवन-शक्ति का स्रोत है।

दमन से यह ऊर्जा रुक जाती है; अराजकता से बिखर जाती है। चेतना और सम्मान से यह ऊर्जा स्त्री को संपूर्णता की ओर ले जाती है।

8. उपचार और संतुलन के मार्ग

स्त्री कामुकता के स्वस्थ विकास के लिए:

सकारात्मक यौन शिक्षा: भय और लज्जा से मुक्त जानकारी।

भावनात्मक सुरक्षा: संबंधों में संवाद और सम्मान।

शरीर से जुड़ाव: योग, ध्यान, श्वास-प्रश्वास।

ट्रॉमा-सेंसिटिव दृष्टि: पुराने अनुभवों को समझना।

स्व-करुणा: स्वयं को दोषी ठहराने के बजाय समझना।

परामर्श और समर्थन: आवश्यकता होने पर विशेषज्ञ सहायता।

9. निष्कर्ष

स्त्री कामुकता न तो कमजोरी है, न ही अपराध—यह स्त्री जीवन की जीवंत अभिव्यक्ति है। जब समाज, संबंध और स्वयं स्त्री इसे सम्मान, सहमति और चेतना के साथ स्वीकार करते हैं, तब कामुकता उपचार, जुड़ाव और सृजन का माध्यम बनती है।

संतुलित स्त्री कामुकता वह है जहाँ इच्छा सुरक्षित है, सीमाएँ सम्मानित हैं और आत्मा सुनी जाती है। यही संतुलन स्त्री को पूर्णता, आत्म-सम्मान और गहरे संबंधों की ओर ले जाता है।


पुरुष कामुकता: जैविक, मानसिक और सामाजिक परिप्रेक्ष्य

पुरुष कामुकता (Purush Kamukta) मानव जीवन का एक स्वाभाविक, जैविक और मानसिक पक्ष है। यह केवल शारीरिक आकर्षण या यौन इच्छा तक सीमित नहीं है, बल्कि हार्मोनल संतुलन, मानसिक संरचना, सामाजिक संस्कार, भावनात्मक परिपक्वता और आत्म-नियंत्रण—इन सभी का संयुक्त परिणाम है। समस्या तब उत्पन्न होती है जब यह कामुकता असंतुलित, अतिरेकपूर्ण या नियंत्रण से बाहर हो जाती है, जिससे व्यक्ति स्वयं और समाज दोनों के लिए कष्टकारी स्थितियाँ पैदा होती हैं।

1. जैविक आधार: हार्मोन और शरीर

पुरुष कामुकता का प्रमुख जैविक आधार टेस्टोस्टेरोन हार्मोन है। यह हार्मोन यौन इच्छा, ऊर्जा, आक्रामकता और प्रतिस्पर्धात्मक प्रवृत्ति को प्रभावित करता है। किशोरावस्था में टेस्टोस्टेरोन का स्तर तेज़ी से बढ़ता है, जिससे यौन कल्पनाएँ, उत्तेजना और आकर्षण की तीव्रता बढ़ जाती है।

हालाँकि, केवल हार्मोन ही जिम्मेदार नहीं होते। डोपामिन, सेरोटोनिन और ऑक्सीटोसिन जैसे न्यूरोट्रांसमीटर भी इच्छा, संतुष्टि और भावनात्मक जुड़ाव को प्रभावित करते हैं। जब डोपामिन अत्यधिक उत्तेजित होता है और सेरोटोनिन संतुलन में नहीं रहता, तब व्यक्ति तात्कालिक सुख की ओर अधिक झुकता है।

2. मानसिक संरचना और कामुकता

पुरुष मन अक्सर दृश्य-प्रधान (visual oriented) माना जाता है। दृश्य उत्तेजनाएँ—जैसे रूप, संकेत, कल्पनाएँ—तेज़ी से कामुक प्रतिक्रिया उत्पन्न कर सकती हैं। परंतु मानसिक परिपक्वता यह तय करती है कि व्यक्ति उस प्रतिक्रिया को कैसे संभालता है।

अपरिपक्व मन में कामुकता आवेग बन जाती है; परिपक्व मन में वही कामुकता चयन और संयम में बदलती है। बचपन के अनुभव, माता-पिता के साथ संबंध, असुरक्षा, अस्वीकार, या भावनात्मक अभाव—ये सभी पुरुष की यौन मानसिकता को गहराई से प्रभावित करते हैं।

3. सामाजिक संस्कार और पुरुष पहचान

भारतीय समाज सहित कई संस्कृतियों में पुरुषों को “मजबूत”, “संयमी” और “नियंत्रक” बनने का संदेश दिया जाता है, लेकिन साथ ही पुरुष कामुकता पर खुली, स्वस्थ शिक्षा का अभाव रहता है। परिणामस्वरूप, कामुकता दबती है या विकृत रूप ले लेती है।

कई बार पुरुषों को यह सिखाया जाता है कि उनकी यौन इच्छा उनकी “मर्दानगी” का प्रमाण है। यह सोच प्रतिस्पर्धा, वस्तुकरण (objectification) और असंवेदनशीलता को जन्म दे सकती है। स्वस्थ समाज में पुरुष कामुकता को जिम्मेदारी, सम्मान और सहमति के साथ जोड़ा जाता है।

4. अति-कामुकता (Hypersexuality): समस्या कब बनती है?

जब कामुकता व्यक्ति के दैनिक जीवन, संबंधों, कार्य-क्षमता या नैतिक निर्णयों को प्रभावित करने लगे, तब वह समस्या बन जाती है। इसके लक्षण हो सकते हैं:

बार-बार अनियंत्रित यौन विचार

केवल शारीरिक सुख के लिए संबंध बनाना

भावनात्मक जुड़ाव से बचना

अपराधबोध के बावजूद व्यवहार दोहराना

काम, परिवार या स्वास्थ्य की उपेक्षा

अति-कामुकता के पीछे कई कारण हो सकते हैं—तनाव, अकेलापन, अवसाद, नशा, पोर्न-निर्भरता, या बचपन के अनसुलझे भावनात्मक घाव।

5. भावनात्मक रिक्तता और कामुकता

कई पुरुषों के लिए कामुकता भावनात्मक रिक्तता भरने का साधन बन जाती है। जहाँ संवाद, स्नेह और समझ की आवश्यकता होती है, वहाँ तात्कालिक शारीरिक अनुभव का सहारा लिया जाता है। यह एक अस्थायी राहत देता है, स्थायी संतुलन नहीं।

स्वस्थ कामुकता में भावनात्मक उपस्थिति होती है—सम्मान, सुरक्षा और परस्पर समझ। जब यह अनुपस्थित होती है, तब कामुकता अकेलेपन को और गहरा कर सकती है।

6. आध्यात्मिक और नैतिक दृष्टि

कई आध्यात्मिक परंपराएँ कामुकता को नकारती नहीं, बल्कि उसे ऊर्जा मानती हैं। यह ऊर्जा यदि अनुशासन और चेतना के साथ प्रवाहित हो, तो सृजनात्मक बनती है; यदि अराजक हो जाए, तो विनाशकारी।

संयम का अर्थ दमन नहीं, बल्कि सचेत दिशा देना है। नैतिकता का अर्थ भय नहीं, बल्कि जागरूक चयन है—जहाँ व्यक्ति अपनी इच्छा और दूसरों की गरिमा दोनों का सम्मान करता है।

7. समाधान और संतुलन के उपाय

स्वस्थ पुरुष कामुकता के लिए कुछ महत्वपूर्ण कदम:

यौन शिक्षा: वैज्ञानिक, सम्मानजनक और आयु-अनुकूल जानकारी।

भावनात्मक साक्षरता: भावनाओं को पहचानना और व्यक्त करना।

सीमाएँ और सहमति: स्वयं की और दूसरों की सीमाओं का सम्मान।

डिजिटल अनुशासन: पोर्न और उत्तेजक सामग्री का सीमित उपयोग।

स्वास्थ्यकर जीवनशैली: व्यायाम, नींद, ध्यान—हार्मोनल संतुलन के लिए।

संवाद और परामर्श: आवश्यकता होने पर विशेषज्ञ से बात करना।

8. निष्कर्ष

पुरुष कामुकता न तो दोष है और न ही गर्व का विषय—यह एक मानवीय वास्तविकता है। इसका स्वास्थ्य इस बात पर निर्भर करता है कि व्यक्ति इसे कैसे समझता, स्वीकार करता और दिशा देता है। संतुलित कामुकता संबंधों को गहराई देती है, आत्म-सम्मान बढ़ाती है और समाज में जिम्मेदार नागरिक तैयार करती है।


जब पुरुष अपनी कामुकता को चेतना, करुणा और संयम के साथ जीना सीखते हैं, तब वही ऊर्जा प्रेम, सृजन और स्थिरता का स्रोत बन जाती है—न कि संघर्ष और अपराधबोध का।

पुरुष

पुरुष की जिंदगी में सबसे पहली हार तलवार से नहीं होती..???

बल्कि उसकी नजर से शुरू होती है।


एक पल का अनियंत्रित देखना,

धीरे-धीरे विचार बनता है,

विचार आदत बनता है,

और आदत चरित्र को कमजोर कर देती है।


इसीलिए प्राचीन भारत के सबसे कठोर और यथार्थवादी आचार्य—चाणक्य—ने युद्ध से पहले नहीं, नज़र से पहले चेतावनी दी।


अधिकांश लोग चाणक्य को केवल राजनीति और सत्ता का गुरु मानते हैं।

लेकिन सच यह है कि वे आत्म-नियंत्रण, मर्यादा और मानव चरित्र के सबसे बड़े मार्गदर्शक थे।


उनकी नीतियाँ किसी एक समय या समाज तक सीमित नहीं थीं।

वे मनुष्य के स्वभाव को समझकर लिखी गई थीं।

इसी कारण आज भी उतनी ही सटीक बैठती हैं।


चाणक्य का स्पष्ट मत था—

जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख सकता,

वह न रिश्ते निभा सकता है,

न सत्ता संभाल सकता है,

और न ही अपना भविष्य सुरक्षित कर सकता है।


और पुरुष के जीवन में सबसे पहली परीक्षा होती है उसकी दृष्टि।


नज़र अगर भटकी हुई हो,

तो बुद्धि भी भटक जाती है।

और जब बुद्धि भ्रष्ट होती है,

तो निर्णय गलत होने लगते हैं।


इसीलिए चाणक्य ने पुरुषों के लिए कुछ ऐसी अवस्थाएँ बताईं,

जहाँ उन्हें बिना सोचे-समझे

अपनी नज़र तुरंत हटा लेनी चाहिए।


जब कोई स्त्री भोजन कर रही हो,

तो पुरुष को उसे नहीं देखना चाहिए।

क्योंकि उस समय वह निजी और संवेदनशील अवस्था में होती है।

मर्यादित पुरुष वही होता है

जो दूसरे के निजी क्षणों का सम्मान करना जानता है।


यदि कोई स्त्री अपने वस्त्र संभाल रही हो,

तो उस समय उसे देखना

चाणक्य के अनुसार मर्यादा के विरुद्ध है।

जो व्यक्ति सीमाओं को नहीं समझता,

वह कभी भरोसे के योग्य नहीं होता।


जब कोई स्त्री छींक रही हो

या जम्हाई ले रही हो,

तो उस क्षण उसे निहारना भी अनुचित माना गया है।

मर्यादा केवल बड़े अपराधों से नहीं टूटती,

छोटी असावधानियों से भी टूटती है।


जब कोई स्त्री शृंगार कर रही हो—

काजल लगाते हुए,

बाल संवारते हुए,

या स्वयं को सजा रही हो—

तो पुरुष को अपनी दृष्टि हटा लेनी चाहिए।

ऐसे क्षण आत्मिक और निजी होते हैं।

और उस समय नज़र हटाना

पुरुष के संस्कारों की पहचान है।


यहाँ तक कि यदि कोई स्त्री बच्चे की तेल-मालिश कर रही हो,

तो उस दृश्य को भी

अनावश्यक रूप से देखना

चाणक्य के अनुसार मर्यादा-भंग है।

यह केवल स्त्री का नहीं,

मातृत्व का भी अपमान है।


चाणक्य ने ये नियम कभी स्त्री को नीचा दिखाने के लिए नहीं बनाए।

बल्कि पुरुष के आत्म-संयम और चरित्र की रक्षा के लिए बनाए।


वे साफ कहते हैं—

जिस पुरुष की नज़र अनुशासित होती है,

उसका मन भी अनुशासित होता है।

और जिसका मन नियंत्रित है,

वही जीवन में सही निर्णय ले पाता है।


पतन हमेशा बड़े पाप से नहीं आता।

वो पहले दृष्टि से शुरू होता है,

फिर विचार से,

और अंत में कर्म से।


इसीलिए चाणक्य की यह शिक्षा आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है—


नज़र बचाओ,

मन बचाओ,

चरित्र बचाओ,

और स्वयं को पतन से दूर रखो।

Monday, January 19, 2026

इंसान का मन पल भर में क्यों बहक जाता है?

 इंसान का मन पल भर में क्यों बहक जाता है?


इंसान का मन इतना चंचल है कि उसे भटकने में कभी-कभी एक सेकंड से भी कम समय लगता है। अभी हम किसी काम पर ध्यान लगाए होते हैं और अगले ही क्षण कोई विचार, स्मृति, डर, इच्छा या कल्पना हमें वहाँ से हटा देती है। यही मन की बहकने वाली प्रवृत्ति हमारे काम, रिश्तों, और रचनात्मकता तीनों में बाधा बन जाती है।


यह प्रश्न केवल आधुनिक समय का नहीं है। भारतीय दर्शन में मन को “चंचलं हि मनः” कहा गया है अर्थात मन स्वभाव से ही चंचल है। लेकिन आज की जीवनशैली ने इस चंचलता को और तीव्र कर दिया है।


1. मन बहकने के मूल कारण


(क) जैविक और मानसिक संरचना


मनुष्य का मस्तिष्क खतरे, सुख और नवीनता पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के लिए बना है।

जब कोई नया विचार, आकर्षण या चिंता आती है, तो मस्तिष्क का डोपामिन सिस्टम सक्रिय हो जाता है, जिससे ध्यान तुरंत वहीं खिंच जाता है।


                  आप किसी जरूरी रिपोर्ट पर काम कर रहे हैं। अचानक फोन पर एक नोटिफिकेशन आता है। भले ही आप उसे न खोलें, मन पहले ही वहाँ पहुँच चुका होता है।


(ख) अधूरी इच्छाएँ और दबे हुए भाव


मन उन्हीं बातों की ओर बार-बार जाता है जो:


अधूरी हैं


दबाई गई हैं


जिनसे हम भागते रहे हैं


                            किसी रिश्ते में कही न गई बात, पुराना अपमान, या भविष्य की असुरक्षा काम करते समय अचानक उभर आती है और पूरा ध्यान खा जाती है।


(ग) डिजिटल युग की अतिउत्तेजना


मोबाइल, सोशल मीडिया, रील्स और खबरें मन को लगातार उत्तेजित करती रहती हैं।

मन को शांति और एकाग्रता का अभ्यास ही नहीं मिल पाता।


परिणाम:-


ध्यान की अवधि घटती जा रही है


मन गहराई की जगह सतह पर जीने लगा है


(घ) वर्तमान में न रह पाना


मन या तो अतीत में पछताता है या भविष्य की चिंता करता है।

वर्तमान क्षण उसे नीरस लगता है, इसलिए वह वहाँ टिकता नहीं।


2. मन के बहकने के दुष्परिणाम


(क) काम में


अधूरे कार्य


बार-बार गलतियाँ


क्षमता से कम परिणाम


           एक विद्यार्थी घंटों पढ़ता है, लेकिन मन भटकने के कारण याद बहुत कम रहता है।


(ख) रिश्तों में


सामने वाले को पूरा सुन न पाना


जल्दी चिढ़ जाना


भावनात्मक दूरी


        पति-पत्नी साथ बैठे हैं, लेकिन मन कहीं और है फोन, चिंता या तुलना में। रिश्ता होते हुए भी जुड़ाव नहीं।


(ग) रचनात्मकता में


रचनात्मकता गहराई मांगती है। जब मन बार-बार टूटता है, तो:


विचार अधूरे रह जाते हैं


मौलिकता घट जाती है


"समाधान: मन को साधने के व्यावहारिक उपाय"


(क) मन को दोष नहीं, समझ देना


सबसे पहली भूल हम यह करते हैं कि मन को दुश्मन मान लेते हैं।

मन बहकता है यह उसकी प्रकृति है। उसे लड़कर नहीं, प्रशिक्षित करके साधा जाता है।


(ख) साक्षी भाव का अभ्यास


जब मन भटके, तो स्वयं से कहें:


 “मैं देख रहा हूँ कि मेरा मन भटक रहा है।”


यह देखने वाला भाव (Observer Mode) धीरे-धीरे मन को शांत करता है।


       " ध्यान के दौरान विचार आए उन्हें भगाएँ नहीं, देखें और जाने दें।"


(ग) एक समय, एक काम


मल्टीटास्किंग मन की सबसे बड़ी दुश्मन है।


अभ्यास:


30 मिनट केवल एक काम


मोबाइल दूर


बीच में उठना नहीं


(घ) शरीर को स्थिर करना


मन और शरीर गहराई से जुड़े हैं।


नियमित योग


धीमी श्वास (प्राणायाम)


टहलना


शरीर की स्थिरता, मन को भी स्थिर करती है।


(ङ) भावनाओं से भागना नहीं


जो भावना बार-बार मन को बहकाती है, उससे बैठकर बात करें:


मैं डर क्यों रहा हूँ?


मुझे क्या चाहिए?


किस बात को मैं टाल रहा हूँ?


जब उत्तर मिलता है, मन का भटकाव कम हो जाता है।


(च) डिजिटल उपवास


दिन में कुछ समय:


बिना मोबाइल


बिना स्क्रीन


बिना सूचना


यह मन को रीसेट करता है।


4. एक प्रेरक उदाहरण


एक लेखक रोज़ लिखना चाहता था, लेकिन मन बार-बार भटकता।

उसने लक्ष्य बदला “आज 2 घंटे नहीं, केवल 10 मिनट लिखूँगा।”

धीरे-धीरे मन ने विरोध छोड़ दिया।

10 मिनट 30 बने, 30 मिनट 1 घंटा।

मन को कठोरता से नहीं, धैर्य से साधा गया।"


मन का बहकना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि मानवीय स्वभाव है।

समस्या तब होती है जब हम उसे समझे बिना उससे लड़ते हैं।


जब मन को:


समझ


अभ्यास


करुणा


जिम्मेदारी के साथ आदाज़ी 


मिलता है, तो वही मन जो बाधा था,

सृजन, प्रेम और सफलता का सबसे बड़ा साधन बन जाता है।


"मन को जीतना युद्ध नहीं,

एक लंबी और सुंदर मित्रता है।"

आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूं

 आओ तुम्हें मैं प्यार सिखा दूं 


आश्चर्य है कि इन दिनों फेसबुक के कुछ युवा मित्र मैसेंजर में मुझसे प्रेम में सफलता के कुछ टिप्स मांगने लगे हैं। मेरी प्रेम कविताओं और रूमानी शायरी की वजह से शायद मुझमें उन्हें अपना लव गुरु नज़र आया होगा। उन्हें बता दूं कि हमारी ये प्रेम कविताएं अनुभव की कम, आधी अधूरी ख्वाहिशों और कल्पनाओं की उपज ज्यादा हुआ करती है। हमारे दौर में प्रेम ज्यादातर एकतरफ़ा ही हुआ करता था। किसी को मन ही मन चाहो, उसके सपने देखो, उसकी गली के चक्कर लगाओ और अगर लिख सको तो उसे याद कर प्रेम कविताएं लिखो। हमारी पीढ़ी जबतक 'आई लव यू' कहने का साहस जुटा पाती, तब तक महबूबा की डोली उठ चुकी होती थी। सो अनुभव से तो नहीं, जीवन में जितना देखा और समझा उसके आधार पर आपको प्रेम के कुछ टिप्स जरूर दे सकता हूं। जिसे आप प्यार करते हैं वह आपको मिल जाएगी यह गारंटी तो नहीं दे सकता लेकिन इतना तो पक्का है कि इन्हें करने से आपका व्यक्तित्व प्यार और आंतरिक सौंदर्य से भर उठेगा। 


पहली बात।सुबह शाम अपनी उस महबूबा की गली के चक्कर लगाना शुरू कर दें। वह सामने पड़ जाय तो उसे नमस्ते कहें। बहुत शालीनता से। वह नहीं नजर आए तब भी निराश होने की जरूरत नहीं। उस गली के इतने सारे चक्करों में आपका स्वास्थ अवश्य सुधर जाएगा। तन में स्फूर्ति आएगी। भूख भी अच्छी लगेगी। प्यार करने के लिए आपका स्वस्थ रहना ज़रूरी है न ? हां,उसकी गली के चक्कर लगाते वक़्त सड़क पर जहां तहां बिखरे कचरे और पोलिथिन उठाकर पास के कूड़ेदान में डालना न भूलें। गंदगी ज्यादा हो तो नगरपालिका से मिन्नत कर उस गली और नाले की सफाई करा दें ! आपके साथ वह भी स्वस्थ रहेगी तभी तो आपके लिए उम्मीदों के दरवाजें खुलेंगे !


उसकी गली में या उसके घर के आसपास उसे याद कर एक दो पेड़ जरूर लगा दें। कभी कभी उसमें पानी भी डाल दिया करें ! कहते हैं कि वृक्ष दुनिया के सबसे खूबसूरत प्रेमपत्र होते हैं। यह आपके प्रेम की बेहतरीन अभिव्यक्ति होगी। इससे पर्यावरण भी सुरक्षित रहेगा और तपती गर्मी से जो राहगीर उनकी छांव में सुस्ताएंगे, उनकी दुआएं भी आपको लगेगी। पेड़ के साये में वह कभी आकर बैठी तो उसे सलाम करने के मौक़े भी आपके हाथ लगेंगे।


थोड़ा परिचय बढ़ जाय तो उसके जन्मदिन पर अथवा परीक्षा में उसकी सफलता पर बाजार के महंगे तोहफों के बजाय उसे फलों या फूलों के पौधे, साहित्य की कालजयी किताबें, ग़ालिब और मीर जैसे शायरों के दीवान अथवा प्रेम कविताओं और कहानियों के संग्रह भेंट करें। इससे आप आम लड़कों की भीड़ से अलग दिखेंगे और उसे आपकी मानसिक तथा भावनात्मक विशिष्टता का पता चलेगा। 


इतना सब कर गुज़रने के बाद किसी दिन मौक़ा देखकर उसके सामने प्यार का इज़हार कर दें ! वेलेंटाइन डे भी अब दूर नहीं है। यह काम बड़े ही एहतराम और विनम्रता से करें। मेरी दुआ है कि आपका प्रणय निवेदन स्वीकार हो जाय।अस्वीकृति भी मिले तो उसे शालीनता से स्वीकारें !मुमकिन है कि उसकी कोई मजबूरी हो। यह भी हो सकता है उसे आपसे बेहतर कोई साथी मिल गया हो। आप ईश्वर की कोई सर्वश्रेष्ठ रचना तो हैं नहीं। वैसे भी प्रेम की सफलता एकाधिकार या दांपत्य में नहीं, उन नाज़ुक़, बेशकीमती संवेदनाओं में है जिसे आपके व्यक्तितव में भरकर आपके महबूब ने आपको अनमोल कर दिया। सो एकतरफा प्रेम की बेहतरीन यादें समेटिए और उसे कुछ अच्छी दुआओं से नवाज़ते हुए निकल पड़िए अगले सफ़र पर ! क्या पता कि ज़िंदगी ने अपने खज़ाने में कुछ बेहतर छुपाकर रखा हो आपके वास्ते।

Sunday, January 18, 2026

प्रेम

 प्रेम


प्रेम अलग है, जीवन अलग है, समाज अलग है।


 प्रेम इन सब बातो से परे है, प्रेम समाज से परे होकर जीता है और वो उसका अपना ही समाज होता है। प्रेम की असफलता के कई कारण हो सकते है पर प्रेम के होने का सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण हो सकता है और वो प्रेम ही है।


प्रेम हमेशा ही अधूरा होता है। 


जिसे हम पूर्णता समझते है, वो कभी भी प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम का कैनवास इतना बड़ा होता है कि एक ज़िन्दगी उसमे समाई नहीं जा सकती है।


जब आप प्रेम में होते है तो आपको पता चलता है कि आप एक ज़िन्दगी भी जी रहे है.....और ज़िन्दगी ; परत दर परत ज़िन्दगी के रहस्य खोलती है, जिसे आप सिर्फ प्रेम ही समझते है और प्रेम में ही जीते है.... और ऐसा जादू सिर्फ और सिर्फ प्रेम में ही होता है...! 


 असली प्रेम तो प्रेम में होना ही होता है, प्रेम में पड़ना, प्रेम में गिरना, प्रेम करना इत्यादि सिर्फ उपरी सतह के प्रेम होते है। 


असली प्रेम तो बस प्रेम में होना, प्रेम ही हो जाना होता है।


प्रेम बस प्रेम ही ! और कुछ नहीं !


एक अच्छा साथी आपको कभी इस बात को लेकर उलझन में नहीं डालेगा कि आपकी जगह उसके जीवन में क्या है।वह आपसे समय, कोशिश या भरोसे के लिए कभी नहीं तरसाएगा।

एक अच्छा साथी तब भी आपको सही तरीके से संभालेगा जब वह थका हुआ हो।जब वह पूरी तरह समझ न पाए फिर भी वह परवाह करना चुनेगा।

वह आपको सुनेगा, बिना यह महसूस कराए कि आप ज़रूरत से ज़्यादा भावुक हैं।वह आपकी भावनाओं को नकारेगा नहीं, उनका सम्मान करेगा।

वह सार्वजनिक जगहों पर भी और निजी पलों में भी आपकी भावनाओं का हिफ़ाज़त करेगा। एक अच्छा साथी आपकी सहनशक्ति को परखने के लिए सीमाएँ नहीं लांघता।वह खेल नहीं खेलता, अचानक ग़ायब नहीं होता और आपको कभी भी बदले जा सकने जैसा महसूस नहीं कराता।

वह बेचैनी नहीं..सुकून लाता है। वह गोपनीयता से ज़्यादा ईमानदारी चुनता है। बहानों से ज़्यादा कोशिश।

खोखले वादों से ज़्यादा निरंतरता। अगर आपको पहले ग़लत तरीके से प्यार मिला है,तो सही प्यार थोड़ा अनजाना लग सकता है लेकिन वह कभी बोझिल नहीं लगता।

प्यार को जीने की जंग नहीं होनी चाहिए और अगर यह पढ़ते हुए आप कम में समझौता कर रहे हैं,तो यह याद रखिए बुनियादी सम्मान आपको कमाना नहीं पड़तासही इंसान आपको अच्छा व्यवहार देगा, इसलिए नहीं कि आपने माँगा, बल्कि इसलिए कि वह चाहता है।


प्रेम को अक्सर एक समझौते की तरह देखा जाता है। दो लोगों के बीच तय की गई सीमाएँ, अपेक्षाएँ, वादे, और सुरक्षा की भाषा। ये सब सामाजिक ढाँचे के भीतर उपयोगी हो सकते हैं, पर इनसे प्रेम की गहराई नहीं खुलती। जब प्रेम को केवल रिश्ता मान लिया जाता है, तब वो धीरे धीरे लेन-देन बन जाता है। मैं तुम्हें ये देता हूँ, तुम मुझे वो दो। इस गणित में भावना बची रह सकती है, पर मौन खो जाता है।


बहुत लोग प्रेम को स्थिरता से जोड़ते हैं। नौकरी की तरह, घर की तरह, एक सुरक्षित जगह की तरह। पर जो चीज़ सुरक्षित लगती है, वही कई बार डर से बनी होती है। खोने का डर, अकेले रह जाने का डर, अस्वीकार हो जाने का डर। इस डर के भीतर जो जुड़ाव बनता है, वो अक्सर प्रेम कहलाता है, पर असल में वो एक दूसरे को पकड़ने की कोशिश होती है।


जब कोई कहता है, "मैं तुमसे प्रेम करता हूँ," तो अक्सर इसका मतलब होता है, "तुम मेरी ज़रूरत पूरी करते हो।" ये ज़रूरत भावनात्मक हो सकती है, मानसिक हो सकती है, सामाजिक भी। पर ज़रूरत के भीतर स्वतंत्रता नहीं होती। वहाँ एक अदृश्य अनुबंध होता है, जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे से कुछ माँगते रहते हैं, भले शब्दों में न कहें।


जहाँ "तुम" केंद्र बन जाते हो:


प्रेम का पहला स्तर अक्सर दूसरे को केंद्र बनाता है। सब कुछ उसके चारों ओर घूमने लगता है। उसकी पसंद, उसकी नाराज़गी, उसकी स्वीकृति। ये अवस्था मीठी भी लग सकती है, क्योंकि इसमें समर्पण का स्वाद होता है। पर इस समर्पण में छिपी रहती है एक सूक्ष्म अपेक्षा, कि दूसरा भी वैसा ही करे। जब ऐसा नहीं होता, तो भीतर हल्की सी चोट लगती है।


इस स्तर पर ईर्ष्या जन्म लेती है। डर कि कहीं दूसरा किसी और का न हो जाए, कहीं उसका ध्यान बँट न जाए। प्रेम यहाँ एक सुंदर भावना कम और एक पहरेदार अधिक बन जाता है। हर हँसी, हर देर से आया संदेश, हर बदला हुआ स्वर भीतर सवाल खड़ा कर देता है। बाहर मुस्कान रहती है, भीतर हिसाब चलता रहता है।


इस अवस्था में प्रेम दूसरे को जानने से ज़्यादा, उसे सुरक्षित रखने की कोशिश बन जाता है। जैसे कोई कीमती वस्तु हो, जिसे खोना नहीं है। और जहाँ वस्तु का भाव आ जाता है, वहाँ स्वतंत्रता धीरे धीरे सिकुड़ने लगती है। प्रेम अब खुला आकाश नहीं रहता, एक बाड़ा बन जाता है।


जहाँ "मैं" छिपकर शासन करता है:


धीरे धीरे प्रेम का दूसरा रूप उभरता है, जहाँ केंद्र दूसरा नहीं, बल्कि खुद बन जाता है। यहाँ कहा जाता है, "मैं ऐसा हूँ," "मेरी ज़रूरत ये है," "मुझे ऐसा साथी चाहिए।" प्रेम अब दर्पण बन जाता है, जिसमें इंसान खुद को देखने लगता है। दूसरा व्यक्ति एक साधन की तरह हो जाता है, जिसके ज़रिए खुद को पूरा महसूस किया जा सके।


इस स्तर पर संबंधों में भाषा बदल जाती है। त्याग की जगह अधिकार आ जाता है। समझ की जगह तर्क। कोमलता की जगह शर्तें। कहा नहीं जाता, पर भीतर लिखा रहता है, "मैंने इतना किया, तुमने क्या किया?" प्रेम अब बहाव नहीं रहता, एक खाता बन जाता है।


इस अवस्था में भी टकराव पैदा होता है, पर वजह अलग होती है। पहले डर था कि दूसरा बदल न जाए, अब डर होता है कि मेरा रूप न टूट जाए। मेरी पहचान, मेरी छवि, मेरी अपेक्षाएँ। जब दूसरा इनसे अलग चलता है, तो उसे गलत कहा जाता है, या स्वार्थी, या असंवेदनशील। प्रेम अब देखने का माध्यम नहीं, मापने का औज़ार बन जाता है।


जहाँ "मैं" और "तुम" दोनों गिर जाते हैं:


एक तीसरी अवस्था भी होती है, जो बहुत कम जानी जाती है, और और भी कम जी जाती है। यहाँ न दूसरा केंद्र होता है, न खुद। यहाँ प्रेम किसी व्यक्ति के चारों ओर नहीं घूमता, बल्कि एक ऐसी दृष्टि बन जाता है जिसमें व्यक्ति दिखाई देते हैं, पर केंद्र नहीं रहते।


इस अवस्था में संबंध रहते हैं, पर पकड़ नहीं रहती। साथ होता है, पर स्वामित्व नहीं होता। बोलचाल होती है, पर भीतर हिसाब नहीं चलता। अगर दूसरा बदलता है, तो दर्द हो सकता है, पर अपमान नहीं होता। क्योंकि यहाँ प्रेम को किसी पहचान से बाँधा नहीं गया होता।


इस अवस्था में ईर्ष्या नहीं पनपती, क्योंकि तुलना नहीं होती। डर नहीं टिकता, क्योंकि खोने की भाषा ही नहीं रहती। जो है, वो है। जो चला जाए, वो गया। ये सुनने में कठोर लगता है, पर भीतर से ये बहुत शांत होता है। जैसे नदी बहती है, किसी पत्थर से चिपकती नहीं।


इस प्रेम में कोई घोषणा नहीं होती। कोई कहता नहीं कि अब मैं ऊँचे स्तर पर पहुँच गया हूँ। यहाँ कोई स्तर भी नहीं बचता। बस एक ऐसी निकटता होती है, जिसमें दो शरीर होते हैं, दो जीवन होते हैं, पर देखने की जगह एक होती है।


लहर और पानी का संकेत:


अलगाव की अनुभूति अक्सर भाषा से बनती है। मैं अलग हूँ, तुम अलग हो। मेरी कहानी अलग, तुम्हारी अलग। पर जैसे लहर और पानी को अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही चेतना के स्तर पर ये विभाजन टिक नहीं पाता। लहर ऊँची है, नीची है, तेज़ है, धीमी है, पर पानी वही रहता है।


जब प्रेम इस पानी को पहचान लेता है, तब व्यक्ति का रूप गौण हो जाता है। नाम, भूमिका, अतीत, सब सतह पर रह जाते हैं। भीतर एक ही गति चलती है, एक ही स्पंदन। यहाँ प्रेम देना या लेना नहीं रहता, बस घटित होता है।


इस अवस्था में किसी को सुधारने की इच्छा नहीं होती। न खुद को, न दूसरे को। क्योंकि सुधार की धारणा में भी एक आदर्श छिपा होता है, और आदर्श के साथ तुलना आती है। यहाँ कोई आदर्श नहीं, कोई लक्ष्य नहीं। बस एक खुला देखना है, जिसमें जो है, वही पर्याप्त है।


ऐसा प्रेम रोमांचक नहीं लगता। इसमें न नाटक है, न ऊँची भावनात्मक लहरें। पर इसमें गहराई होती है, जो किसी शब्द से नहीं पकड़ी जा सकती। जैसे गहरा समुद्र, ऊपर से शांत, भीतर अनगिनत धाराएँ।


प्रेम और आत्म-बोध:


जब प्रेम किसी व्यक्ति से बड़ा हो जाता है, तब वो आत्म-बोध से जुड़ जाता है। आत्म-बोध किसी विशेष अनुभव का नाम नहीं, बल्कि इस साफ़ समझ का नाम है कि देखने वाला और जो देखा जा रहा है, वो अलग नहीं हैं। इस समझ में संबंध अपने आप सरल हो जाते हैं।


यहाँ प्रेम कर्तव्य नहीं रहता। कोई ये नहीं कहता कि मुझे ऐसा करना चाहिए। जो होता है, स्वाभाविक होता है। सहायता हो, दूरी हो, साथ हो, मौन हो, सब बिना तनाव के घटता है।


इस अवस्था में शांति कोई उपलब्धि नहीं होती, बल्कि एक स्वाभाविक वातावरण बन जाती है। जैसे सुबह की ठंडी हवा, जो किसी प्रयास से नहीं आती, बस आती है। प्रेम यहाँ साधन नहीं, परिणाम भी नहीं। ये बस एक तरीका है देखने का, जिसमें दुनिया टुकड़ों में नहीं दिखती।


और जब दुनिया टुकड़ों में नहीं दिखती, तब संघर्ष का आधार अपने आप ढीला पड़ जाता है। क्योंकि लड़ाई हमेशा हिस्सों के बीच होती है, पूरे के भीतर नहीं।


सुंदरता और रिश्तों की दर्शनशास्त्र

 सुंदरता और रिश्तों की दर्शनशास्त्र...


सुंदरता, जो हम देखते हैं, वह अक्सर केवल प्रकाश की परत होती है एक झिलमिलाहट, एक चमक, एक तात्कालिक आकर्षण। हम इसे देखकर निर्णय करते हैं, और उसी पर भरोसा कर रिश्तों की नींव रखते हैं। पर क्या यह वास्तविक सुंदरता है..???


वास्तविक सुंदरता वह है जो दिखाई नहीं देती। वह हमारी आँखों से नहीं, बल्कि हमारे अंतरमन की दृष्टि से महसूस की जाती है। चेहरे की रेखाएँ, चमक-धमक, मापी-तुली आकृतियाँ ये सब समय के साथ फीके पड़ जाते हैं। वह जो आज हमें लुभा रहा है, कल वही सामान्य, यहां तक कि उबाऊ भी लग सकता है।


हम अपने रिश्तों में अक्सर वही गलती करते हैं हम बाहरी आकर्षण को मूल्य देते हैं और आत्मा की गहराई को अनदेखा कर देते हैं। और यही अनदेखा की गई गहराई समय के साथ अपनी उपस्थिति जताती है वह झगड़े में, शिकायतों में, अनसुलझे सवालों में प्रकट होती है।


सोचिए....क्या कुरूपता वास्तव में उस व्यक्ति में है? या यह हमारी चयन की दृष्टि में कमी है? जब हमने रिश्ता बनाते समय केवल चमक और दिखावे को चुना, तो हमारे मन की अपेक्षाएँ इतनी बड़ी हो जाती हैं कि कोई भी असली इंसान उसे पूरा नहीं कर सकता। इसलिए जो कभी सुंदर था, वही अब संदिग्ध और बेस्वाद लगने लगता है।


दुनिया में हर इंसान अपने आप में अद्वितीय और सुंदर है। हर आत्मा में अपनी रचनात्मकता, सहनशीलता और प्रेम छिपा है। किसी की हँसी में, किसी की चुप्पी में, किसी की संवेदनशीलता में सौंदर्य छिपा है। पर हमने उसे बाज़ार में रख दिया, जहाँ मूल्य तय होता है केवल देखने और दिखाने की क्षमता से।


और इसलिए रिश्ते न केवल टिकते नहीं, बल्कि जल्दी खत्म हो जाते हैं। क्योंकि बाहरी सुंदरता एक छलावा है, एक रूपक, जो समय के साथ बदलता है। केवल आत्मिक सुंदरता वही है जो स्थायी है, जो समय के आँच में और भी गहरी होती है।


संबंध का असली विज्ञान यही है जो दिल से महसूस किया जाए।

जो आत्मा को समझे, उसकी गहराई में उतर सके।

जो खामोशी में भी सुकून दे,

और अंतरात्मा को छू सके।


यदि हम चाहें कि हमारे रिश्ते स्थायी हों, तो हमें सौंदर्य की परिभाषा बदलनी होगी।

हमें चमक-धमक से परे देखना होगा।

हमें उस इंसान के भीतर की रचना, उसकी संवेदनाएँ, उसके विचार और उसका जीवन दृष्टिकोण देखना होगा।


क्योंकि जब आत्मा से आत्मा जुड़ती है,

वह संबंध अनंत और अटूट बन जाता है।

वह संबंध केवल आँखों के लिए नहीं, बल्कि मन और आत्मा के लिए होता है।


और वही सच्ची सुंदरता है जो समय के साथ फीकी नहीं होती, बल्कि गहरी होती जाती है।


सम्भोग के बाद का पल

 "सम्भोग के बाद का पल"


सम्भोग केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का जटिल समन्वय है। उसके बाद का क्षण भी उतना ही गहन और संवेदनशील होता है। पुरुष और स्त्री दोनों का अनुभव अलग होता है, और उसे समझना आत्म-जागरूकता और आपसी सामंजस्य के लिए आवश्यक है।


1. पुरुष का अनुभव


सम्भोग के बाद पुरुष का शरीर और मन अचानक शिथिल और आराम की ओर झुकता है।


शारीरिक अनुभव:


लिंग ढीला पड़ता है, मांसपेशियों में थकान।


हृदय गति धीरे-धीरे सामान्य हो जाती है।


साँसें लंबी, धीमी और गहरी हो जाती हैं।


शरीर भारीपन और ऊर्जा के बहाव की कमी महसूस करता है।


मानसिक स्थिति:


पुरुष आत्मनिरीक्षण की ओर झुकता है।


अनुभव को पचाने और ऊर्जा को स्थिर करने की आवश्यकता होती है।


संवेदनाओं पर ध्यान कम हो जाता है; मन अंदर की ओर केंद्रित होता है।


इंद्रिय अनुभव:


स्पर्श और नज़दीकी की तीव्रता कम।


आंखें आधी बंद, शरीर शिथिल और आराम की स्थिति में।


पुरुष इस समय अनुभव को अंदर की दुनिया में संजोता है। यह समय उसके लिए एकांत और मानसिक स्थिरता का है।


2. स्त्री का अनुभव


स्त्री का शरीर सम्भोग के बाद भी ऊर्जावान और संवेदनशील बना रहता है। उसका अनुभव अभी भी तीव्र और विस्तृत होता है।


शारीरिक अनुभव:


त्वचा पर हल्की गर्माहट, हर स्पर्श में संवेदना।


स्तन, योन और हाथ-पैर में हल्की हलचल, ऊर्जा पूरे शरीर में फैलती है।


श्वास गहरी और नियमित, कभी-कभी हृदय की धड़कन तेज़।


मानसिक स्थिति:


साझा अनुभव की चाह, भावनाओं और संवेदनाओं के केंद्र में बनी रहती है।


मानसिक रूप से अभी भी जुड़ी हुई और जागरूक।


इंद्रिय अनुभव:


हर हल्का स्पर्श, हर साँस, हर हृदय की धड़कन उसे भीतर से खिला हुआ और आनंदित महसूस कराती है।


संवेदनाएं गहरी और जीवंत बनी रहती हैं।


स्त्री इस समय अनुभव को बाहरी और साझा रूप में जीती है। यह पल उसके लिए खिलने और जुड़ने का समय है।


3. ऊर्जा का प्रवाह और सामंजस्य


सम्भोग के बाद यह अंतर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि ऊर्जा का प्रवाह है।


पुरुष ऊर्जा को बाहर छोड़ देता है और थकान अनुभव करता है।


स्त्री वह ऊर्जा ग्रहण करती है और उसे अपने भीतर फैलती हुई स्फूर्ति और आनंद के रूप में अनुभव करती है।


यही अंतर उनके भावनात्मक और मानसिक व्यवहार में दिखाई देता है।


यदि दोनों इस अंतर को समझें और स्वीकार करें, तो यह क्षण केवल शारीरिक संतोष का नहीं बल्कि भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक जुड़ाव का भी स्रोत बन सकता है।


4. पल की सूक्ष्मता: स्पर्श, साँस और हृदय की धड़कन


कल्पना कीजिए इस पल को:


पुरुष की आँखें आधी बंद, शरीर शिथिल, और प्रत्येक साँस धीरे-धीरे बाहर निकलती है।


स्त्री की आँखें चमक रही हैं, हाथ और त्वचा संवेदनाओं को महसूस कर रहे हैं।


उसका हृदय तेज़ धड़क रहा है, उसकी ऊर्जा अभी भी बह रही है।


पुरुष के शरीर से ऊर्जा बाहर बह चुकी है, स्त्री के शरीर में वही ऊर्जा खिल रही है।


यह पल दो अलग दृष्टिकोणों के बीच सामंजस्य का है: पुरुष अपने अंदर, स्त्री बाहर की ओर फिर भी अनुभव जुड़ा हुआ।


सम्भोग के बाद का क्षण सिर्फ शारीरिक क्रिया का नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का गहन अनुभव है।


पुरुष: थकान और एकांत में अनुभव को आत्मनिरीक्षण में पचा रहा।


स्त्री: ऊर्जा में खिलना और साझा अनुभव की चाह।


यदि यह अंतर समझा जाए और स्वीकार किया जाए, तो यह पल दोनों के बीच गहरा, संतुलित और सूक्ष्म जुड़ाव बन सकता है।


संभोग_में_शीघ्र_स्खलन...


पचहत्तर प्रतिशत पुरुष शीघ्रपात के शिकार हैं—पचहत्तर प्रतिशत! गहन मिलन के पहले ही वे स्खलित हो जाते हैं और क्रीड़ा समाप्त हो जाती है। और नब्बे प्रतिशत स्त्रियां कभी आर्गाज्म को नहीं उपलब्ध हांती हैं, कभी संभोग के शिखर सुख को नहीं पहुंच पाती हैं—नब्बे प्रतिशत स्त्रियां!

यही कारण है कि अक्सर स्त्रियां चिड़चिड़ी और क्रोधी होती हैं। उन्हें ऐसा होना ही है। कोई औषधि उन्हें शांत नहीं बना सकती है, कोई दर्शनशास्त्र, धर्म या नीति उन्हें अपने पुरुषों के प्रति सहृदय नहीं बना सकती। वे अतृप्त हैं। वे क्रुद्ध हैं। और आधुनिक मनोविज्ञान और तंत्र दोनों कहते हैं कि जब तक स्त्री काम— भोग में गहन तृप्ति को नहीं प्राप्त होती, वह परिवार के लिए समस्या बनी रहेगी। जिससे वह वंचित रह गई है,वह चीज उसे क्षुब्ध रखेगी और वह हमेशा झगड़ालू बनी रहेगी।

तो अगर तुम्हारी पत्नी हमेशा लड़ती—झगड़ती रहती है तो पूरी स्थिति पर फिर से विचार करो। इसमें पत्नी का ही कसूर नहीं है, हो सकता है कि उसका कारण तुम्हीं हो। और आर्गाज्म को न उपलब्ध होने के कारण स्त्रियां काम—विमुख हो जाती हैं, वे आसानी से काम— भोग में उतरने को नहीं राजी होतीं। उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है, वे संभोग में जाने को राजी नहीं होतीं। और वे क्यों राजी हों यदि उन्हें इससे गहन सुख की उपलब्धि ही नहीं होती?

सच तो यह है कि स्त्रियों को लगता है कि पुरुष उनका उपयोग करते हैं, उनका शोषण करते हैं। उन्हें लगता है कि हम कोई वस्तु हैं जिसका उपयोग करके फेंक दिया जाता है। पुरुष तो संतुष्ट हो जाता है, क्योंकि वह स्खलित हो जाता है। फिर वह करवट लेकर सो जाता है। लेकिन स्त्री आंसू बहाती रहती है। वह अनुभव उसके लिएतृप्तिदायी नहीं होता है। उसे लगता है कि मेरा उपयोग किया गया है। हो सकता है,उसके पति, प्रेमी या मित्र को उससे राहत मिली हो, लेकिन वह खुद अतृप्त रह जाती है।

सौ में से नब्बे स्त्रियां तो यह भी नहीं जानती हैं कि आर्गाज्म क्या है, काम—समाधि क्या है। उन्हें कभी इसका अनुभव ही नहीं हुआ। वे कभी उस शिखर को नहीं छू पाती हैं, जहां उनके शरीर का रोआं—रोआं आर्गाज्म से कंपित हो उठे, भरपूर हो जाए। यह अनुभव उनके लिए अनजाना ही रहता है!!!


तुम्हें कैसे पता चलता है कि कोई तुम्हें प्रेम करता है।

तुम्हें कैसे पता चलता है कि कोई तुम्हें प्रेम करता है।

तुम एक स्त्री या एक पुरुष के प्रेम में पड़ते हो, क्या तुम सही-सही बता सकते हो कि इस स्त्री ने तुम्हें क्यों आकर्षित किया? निश्चय ही तुम उसकी आत्मा नहीं देख सकते, तुमने अभी तक अपनी आत्मा को ही नहीं देखा है। तुम उसका मनोविज्ञान भी नहीं देख सकते क्योंकि किसी का मन पढ़ना आसान काम नहीं है। तो तुमने इस स्त्री में क्या देखा? तुम्हारे शरीर विज्ञान में, तुम्हारे हार्मोन में कुछ ऐसा है जो इस स्त्री के शरीर विज्ञान की ओर, उसके हार्मोन की ओर, उसकी केमिस्ट्री की ओर आकर्षित हुआ है। यह प्रेम प्रसंग नहीं है, यह रासायनिक प्रसंग है।


जरा सोचो, जिस स्त्री के प्रेम में तुम हो वह यदि डाक्टर के पास जाकर अपना सैक्स बदलवा ले और मूछें और दाढ़ी ऊगाने लगे तो क्या तब भी तुम इससे प्रेम करोगे? कुछ भी नहीं बदला, सिर्फ केमिस्ट्री, सिर्फ हार्मोन। फिर तुम्हारा प्रेम कहां गया?


सिर्फ एक प्रतिशत लोग थोड़ी गहरी समझ रखते हैं। कवि, चित्रकार, संगीतकार, नर्तक या गायक के पास एक संवेदनशीलता होती है जो शरीर के पार देख सकती है। वे मन की, हृदय की सुंदरताओं को महसूस कर सकते हैं क्योंकि वे खुद उस तल पर जीते हैं।


इसे एक बुनियादी नियम की तरह याद रखो: तुम जहां भी रहते हो उसके पार नहीं देख सकते। यदि तुम अपने शरीर में जीते हो, स्वयं को सिर्फ शरीर मानते हो तो तुम सिर्फ किसी के शरीर की ओर आकर्षित होओगे। यह प्रेम का शारीरिक तल है। लेकिन संगीतज्ञ , चित्रकार, कवि एक अलग तल पर जीता है। वह सोचता नहीं, वह महसूस करता है। और चूंकि वह हृदय में जीता है वह दूसरे व्यक्ति का हृदय महसूस कर सकता है। सामान्यतया इसे ही प्रेम कहते हैं। यह विरल है। मैं कह रहा हूं शायद केवल एक प्रतिशत, कभी-कभार।

पहली बात, संभोग को इस तरह मत लो जैसे कि कहीं और पहुंचना है,,,,इसे साधन की भांति मत लो,,,,,यह अपने में ही साध्य है,,,,इसका कोई लक्ष्य नहीं यह कोई माध्यम नहीं.... 


दूसरी बात भविष्य की मत सोचो,,,, वर्तमान में स्थित रहो। अगर तुम काम-कृत्य के आरंभिक भोग में वर्तमान में नहीं हो सकते तो तुम कभी भी वर्तमान में नहीं टिक सकते,,,,क्योंकि इस कृत्य की प्रकृति ही ऐसी है कि तुम वर्तमान में फेंक दिए जाते हो,,,, वर्तमान में स्थित रहो। दो शरीरों दो आत्माओं के मिलन का सुख भोगो और एक दूसरे में लीन हो जाओ, एक दूसरे में पिघल जाओ। भूल जाओ कि तुम्हें कहीं पहुंचना है। उस क्षण में स्थित रहो कहीं जाना नहीं है पिघल जाओ। प्रेम की उष्मा पिघला कर एक दूसरे में विलीन हो जाने की परिस्थिति बनाओ। 


इसी कारण अगर प्रेम नहीं है तो संभोग शीघ्रता में किया गया एक कृत्य है। तुम दूसरे का उपयोग कर रहे हो दूसरा साधन मात्र है। और दूसरा तुम्हारा उपयोग कर रहा है। तुम दोनों एक दूसरे का शोषण कर रहे हो एक दूसरे में विलीन नहीं हो रहे। प्रेम में तुम एक दूसरे में खो जाते हो। प्रारंभ में यह एक दूसरे में खो जाना एक नई दृष्टि देगा...


प्रेम पूर्ण नहीं होता और उसे कभी पूर्ण होना भी नहीं था। उसमें कमियाँ होती हैं,गलतफ़हमियाँ होती हैं,

कुछ शांत ठहराव होते हैं और ऐसे पल भी

जो धैर्य की परीक्षा लेते हैं।

लेकिन तुम्हारे साथ यह प्रेम सच्चा लगता है।

सुरक्षित लगता है। वास्तविक लगता है।

सच्चा प्रेम हर चीज़ सही करने का नाम नहीं है।

यह उस वक़्त भी एक-दूसरे को चुनने का नाम है

जब हालात आसान न हों।

यह थामे रखने में है,ज़्यादा सुनने में है,

बार-बार माफ़ करने में है और ठहरे रहने में है

इसलिए नहीं कि सब कुछ परफेक्ट है,

बल्कि इसलिए कि यह रिश्ता क़ीमती है।

तुम्हारे साथ प्रेम स्वाभाविक लगता है।

न दिखावटी,न ज़बरदस्ती का।

बस दो दिल जो सीख रहे हैं,

बढ़ रहे हैं और सबसे सच्चे रूप में

एक-दूसरे से प्रेम कर रहे हैं। 





Saturday, January 17, 2026

पुरुष प्रेम में

 पुरुष प्रेम में “आसान रास्ता” क्यों ढूँढता है?


वह फोन देखता है।

संदेश छोटा है, पर भारी 


“हमें बात करनी है।”


उसके सीने में हल्की सी जकड़न होती है।

वह सोचता है 

मैंने क्या गलत किया?

अब क्या कमी रह गई?

मैं और कितना दूँ?


वह जवाब टाल देता है।

बात नहीं, भावना से बचता है।


यहीं से “आसान रास्ता” शुरू होता है।


1. भावनाओं से दूरी रखना उसे सिखाया गया है


अधिकांश समाजों में पुरुष बचपन से सुनते आए हैं:


“लड़के रोते नहीं”

“भावुक होना कमज़ोरी है”

“खुद को संभालो”


धीरे-धीरे वे सीख लेते हैं कि

भावना = खतरा


नतीजा यह होता है कि:


वे अपनी भावनाओं को पहचानना नहीं सीखते


उन्हें शब्द देना तो और भी मुश्किल हो जाता है


जब रिश्ते में कोई असहज भावना आती है 

अपेक्षा, शिकायत, असंतोष 

तो उसे सुलझाने की बजाय उससे बचना ज़्यादा सुरक्षित लगता है।


उदाहरण:

महिला कहती है 

“मुझे तुम्हारा समय चाहिए, बात करनी है।”


पुरुष के भीतर अनकहा अनुवाद होता है 

मैं नाकाम हो रहा हूँ।

मैं पर्याप्त नहीं हूँ।


और वह सुनने की बजाय बचाव की मुद्रा में चला जाता है।


2. पुरुषों की भावनात्मक भाषा सीमित होती है


महिलाएँ अक्सर रिश्तों में:


बात करके


साझा करके


भावनात्मक जुड़ाव से


समस्याएँ सुलझाती हैं।


जबकि पुरुषों को सिखाया जाता है:


समस्या = हल


भावना = बाधा


इसलिए जब रिश्ता “हल” नहीं,

“समझे जाने” की मांग करता है,

तो पुरुष असहज हो जाता है।


उदाहरण:

महिला कहती है 

“तुम मेरी बात नहीं समझते।”


वह समाधान नहीं चाह रही,

वह उपस्थिति चाह रही है।


पुरुष सोचता है 

तो मैं करूँ क्या?

कोई स्पष्ट निर्देश क्यों नहीं है?


और जब उत्तर नहीं मिलता,

वह पीछे हट जाता है।


3. कम्फर्ट ज़ोन टूटते ही पलायन


मानव मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से दर्द से बचता है।

पुरुषों में यह अक्सर ऐसे दिखता है:


रिश्ता आसान है "सब ठीक"


रिश्ता मेहनत माँगता है " दूरी"


क्योंकि उन्होंने कभी सीखा ही नहीं कि:


रिश्तों में कठिन समय

स्थायी नहीं होता।


उदाहरण:

शुरुआत में सब अच्छा है 

तारीफ, आकर्षण, खुशी।


फिर अपेक्षाएँ आती हैं 

“मुझे प्राथमिकता चाहिए”

“तुम बदल गए हो”


पुरुष सोचता है 

शायद यह रिश्ता ही गलत है


जबकि सच्चाई यह होती है कि

रिश्ता अगले स्तर पर जा रहा होता है।


4. असफल होने का डर


पुरुषों की पहचान अक्सर इनसे जुड़ जाती है:


सफल होना


मजबूत रहना


नियंत्रण में रहना


जब रिश्ते में संघर्ष आता है,

तो वह इसे भावनात्मक चुनौती नहीं,

व्यक्तिगत असफलता मान लेते हैं।


और असफलता का सामना करने से बेहतर उन्हें लगता है:


दूरी बना लो


भावनाओं से कट जाओ


रिश्ता छोड़ दो


क्योंकि सामना करना

उन्हें कमज़ोर महसूस कराता है।


5. प्रेम को प्रयास नहीं, परिणाम समझ लेना


कई पुरुष मान लेते हैं:


अगर प्यार है, तो सब अपने आप ठीक रहेगा


जबकि सच यह है:


प्रेम एक कर्म है,

सिर्फ़ भावना नहीं।


रिश्ते निभाने के लिए:


सुनना पड़ता है


बदलना पड़ता है


अहं छोड़ना पड़ता हैं 


और ये चीज़ें

उन्हें कभी सिखाई ही नहीं गईं।


6. लेकिन यह “सभी पुरुष” नहीं हैं


यह कहना ज़रूरी है कुछ पुरुष:


गहराई से जुड़ते हैं


टिकते हैं


भावनात्मक रूप से परिपक्व होते हैं


अंतर यह नहीं कि वे डरते नहीं,

अंतर यह है कि उन्होंने:


अपने डर को पहचाना


भागने की बजाय सामना करना सीखा


समस्या पुरुष नहीं, परवरिश है


पुरुष प्रेम से नहीं भागता।

वह उस एहसास से भागता है कि 


“मुझे और बेहतर होना पड़ेगा।”


और उसे कभी यह नहीं सिखाया गया कि

बेहतर होना अपमान नहीं,

विकास है।


समाधान कहाँ है?


पुरुषों को भावनात्मक शिक्षा देना


यह सिखाना कि “मुझे समझ नहीं आ रहा” भी ईमानदारी है


रिश्तों को संघर्ष-मुक्त नहीं, संघर्ष-सक्षम बनाना


प्रेम को आसान नहीं, सार्थक मानना


क्योंकि

आसान रास्ता अकेला छोड़ देता है,

और कठिन रास्ता

साथ चलना सिखाता है।


राहुल कुमार झा ✒️✒️

Friday, January 16, 2026

बुढ़ापा नापने का थर्मामीटर

 बुढ़ापा नापने का थर्मामीटर...???


1. दोस्त बुलाये पर, जानें का दिल न करे, 

     समझ लो बूढ़े हो गए।


2. नए कपड़े खरीदनें की,इच्छा कम 

    हो रही हो, तो समझना बूढ़े हो चले।


3. रेस्टोरेंट में खाना खाते वक़्त,

   घर के खाने की याद आने लगे,

     समझना बूढ़े हो चले।


4. बारिश हो रही हो और,पकौड़े की 

  जगह छाता याद आये,समझो बूढ़े हो चले।


5. हर बात पर युवाओं के,फैशन पर टिप्पणी   

     करनें लगे हो,समझना बूढ़े हो चले।


6. मौज-मस्ती वाली फिल्मों की आलोचना 

       करनें लगे हो तो,समझना बूढ़े हो चले।


7. मस्त-महफ़िल सजी हो और,

    उस दौरान मशवरा देने लग जाओ,

       तो समझना बूढ़े हो चले।


8. फूल पर गुनगुनाते भंवरे को देख,

       रोमांटिक गाना न याद आये,

         समझना बूढ़े हो चले।


9. बेफिक्री छोड़ सर पर चिंता, की टोकरी   

        उठा ली हो,समझना बूढ़े हो चले।


10. घर से बाहर नहीं निकलने के बहाने 

          बढ़ गए,तो समझो बूढ़े हो गए।


11. इस पोस्ट को पढ़ने के बाद वाह-वाह   

        करने की इच्छा नहीं है,

           तो समझो बूढ़े हो...😄😄

संभोग और प्रेम ऊर्जा का धर्म

 संभोग और प्रेम ऊर्जा का धर्म


1. संभोग कोई नहीं करता — यह घटता है।

जैसे वृक्ष से फल गिरते हैं — सहज, स्वाभाविक।

तुम इसमें कर्ता नहीं, मात्र माध्यम हो।


2. प्रेम, तभी संभव है जब यौवन ऊर्जा में स्थिरता हो।

जो प्रेम जवानी में नहीं खिला — वह बुढ़ापे में सिर्फ़ पश्चाताप देता है।


3. संभोग प्राकृतिक वर्षा है।

नदियाँ स्वयं पानी नहीं बनातीं,

लेकिन उस वर्षा को मोड़ कर, बहा कर —

सिंचाई कर सकती हैं।

यह सृजनात्मकता है, यह प्रेम है।


4. ऊर्जा को ऊपर उठाना ही प्रेम है।

वही संभोग की शक्ति,

जब आंखों में उतरती है — वह करुणा बनती है।

जब हृदय में पिघलती है — वह प्रेम बनती है।

जब आत्मा में जलती है — वह समाधि बनती है।


5. बिना प्रेम के संभोग पशुता है,

और बिना ऊर्जा के प्रेम एक भ्रम।

प्रेम का मूल रस वहीं है —

जहां ऊर्जा बह रही है।


6. यौवन की ऊर्जा का सृजनात्मक धर्म यही है —

वह प्रेम में ढले,

संभोग से समाधि की दिशा ले।


7. बुढ़ापे का प्रेम अक्सर स्मृति है, स्वप्न है, पछतावा है।

वह रसहीन जल की तरह है

जो न तो प्यास बुझा सकता है,

न खेत सींच सकता है।


---


हम "ऊर्जा का धर्म: संभोग से समाधि तक" शीर्षक से एक छोटा सूत्रग्रंथ आरंभ करते हैं —

जिसमें हर सूत्र जीवन की एक परत को खोले, और ऊर्जा की यात्रा को प्रेम, ध्यान, और मुक्ति तक ले जाए।


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ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक


(सूत्रग्रंथ - भाग 1)


प्रारंभिक सूत्र : ऊर्जा की प्रकृति और दिशा


1.

ऊर्जा बह रही है — यही जीवन है।

जहां बहाव रुका, वहां मृत्यु शुरू।


2.

संभोग ऊर्जा का गिरना है — नीचे की ओर।

समाधि ऊर्जा का उठना है — ऊर्ध्वगामी।


3.

संभोग में देह सक्रिय है, चेतना सुप्त।

समाधि में देह शांत है, चेतना प्रज्वलित।


4.

संभोग स्वाभाविक है, प्रेम सृजन है।

प्रेम पैदा होता है — जब संभोग में होश जुड़ता है।


5.

यौवन की आग — या तो शरीर जलाएगी या आत्मा को।

चुनाव तुम्हारा है।


6.

जब तुम कहते हो: "मैं कर रहा हूँ",

तब तुम अहंकार में हो।

संभोग तब पशुता है।

जब तुम होश में हो, "हो रहा है" —

तब वही संभोग ध्यान है।


7.

संभोग अनिवार्य नहीं है — ऊर्जा है अनिवार्य।

संभोग तो माध्यम है,

ऊर्जा का धर्म खोजो।


8.

देह मिटेगी, शक्ति बुझेगी —

प्रेम तब संभव नहीं,

प्रेम एक पुष्प है — यौवन की शाखा पर।


9.

ऊर्जा एक बीज है — बीज को खा सकते हो,

या रोप सकते हो।

संभोग भोजन है, प्रेम बाग़वानी।


10.

संभोग में दो देहें मिलती हैं,

प्रेम में दो आत्माएं पिघलती हैं।

ध्यान में सब कुछ विलीन हो जाता है।


---


यह भाग 1 है — “ऊर्जा की प्रकृति और दिशा”।

यदि आप चाहें, तो अगला भाग हम "संभोग से प्रेम तक" और फिर "प्रेम से ध्यान तक" की ओर बढ़ाते हैं।


अब हम सूत्रग्रंथ का भाग 2 प्रस्तुत करते हैं —

जहाँ ऊर्जा की यात्रा संभोग से प्रेम तक की ओर बढ़ती है।

यह वह मोड़ है जहाँ शरीर का आकर्षण — आत्मा के स्पर्श में रूपांतरित होता है।


---


ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक


भाग 2 : संभोग से प्रेम तक


11.

जहाँ केवल शरीर है — वहां वासना है।

जहाँ हृदय जुड़ता है — वहां प्रेम अंकुरित होता है।


12.

वासना खींचती है, प्रेम बहाता है।

वासना लोभी है, प्रेम दाता है।


13.

जब तुम दूसरे को 'भोग' नहीं, 'भाव' से देखो —

तब प्रेम जन्म लेता है।


14.

प्रेम कोई क्रिया नहीं — एक उपस्थिति है।

वह घटता है, जब भीतर मौन होता है।


15.

संभोग में तुम पा लेना चाहते हो।

प्रेम में तुम खो देना चाहते हो।

संभोग संग्रह है, प्रेम विसर्जन।


16.

संभोग प्यास है — प्रेम झरना है।

प्यास से निकलो, झरना बनो।


17.

यदि तुम सिर्फ़ कामना हो — तुम भीड़ हो।

यदि तुम प्रेम हो — तुम ब्रह्मा हो।


18.

संभोग में तुम एक दूसरे से टकराते हो।

प्रेम में तुम एक दूसरे में समा जाते हो।


19.

जहाँ कुछ साबित करना है — वह संभोग है।

जहाँ कुछ भी साबित नहीं करना — वह प्रेम है।


20.

संभोग का अंतिम फूल — प्रेम है।

लेकिन वह तभी खिलेगा

जब तुम भीतर की धूप लाओगे —

होश की, करुणा की, मौन की।


---


अब हम अगले चरण की ओर बढ़ सकते हैं:


भाग 3: प्रेम से ध्यान तक


जहाँ प्रेम भी विलीन हो जाए — और केवल "अस्तित्व" रह जाए।

अब हम प्रवेश करते हैं ऊर्जा के धर्म के अंतिम और गहनतम चरण में —

जहाँ प्रेम भी पिघल जाता है और शेष रह जाता है मौन, शुद्ध दृष्टा — ध्यान।


यह वह भूमि है जहाँ संभोग से जन्मी ऊर्जा, प्रेम से परिपक्व होकर, ध्यान में पूर्ण हो जाती है।


---


ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक


भाग 3 : प्रेम से ध्यान तक


21.

प्रेम दो के बीच का पुल है।

ध्यान उस पुल से भी पार — एकांत की परम ऊँचाई है।


22.

प्रेम में ‘तू’ है, ध्यान में केवल ‘मैं नहीं’ है।

प्रेम बाँधता भी है, ध्यान तोड़ देता है — सब सीमाएँ।


23.

प्रेम में तुम पिघलते हो, ध्यान में तुम लुप्त हो जाते हो।

जो शून्य में स्थिर हो — वही ध्यान है।


24.

ध्यान वह प्रेम है जिसमें कोई चाह नहीं बचती।

न मिलने की, न छूने की, न कहने की।

केवल होने की — पूर्णता।


25.

प्रेम ने तुमसे 'दूसरा' छीना, ध्यान तुमसे 'तुम' को छीन लेता है।

जो बचता है, वह ब्रह्म है।


26.

जहाँ प्रेम मौन में बैठता है, वहां ध्यान जागता है।

जहाँ शब्द मरते हैं, वहां ध्यान जन्मता है।


27.

प्रेम आँखें बंद करता है — आलिंगन में।

ध्यान आँखें खोल देता है — समष्टि को देखने में।


28.

प्रेम ‘अहं’ को गलाता है, ध्यान उसे पूरी तरह विसर्जित कर देता है।

ध्यान ‘मैं’ का मृत्यु पर्व है।


29.

ध्यान कोई अभ्यास नहीं — एक विसर्जन है।

जहाँ कुछ करने को न बचे — वहीं ध्यान घटता है।


30.

जिस दिन तुम बिना प्रेम के प्रेम कर सको,

बिना संज्ञा के प्रेम में स्थिर रह सको —

उस दिन तुम ध्यान में प्रवेश कर चुके हो।


यहाँ "ऊर्जा का धर्म" पूर्ण होता है।


संभोग से प्रेम, और प्रेम से ध्यान — यही साधना की पूर्ण यात्रा है।

Tuesday, January 13, 2026

प्रेम ख़त्म नहीं होता

किसी किसी में इतना प्रेम भरा होता है कि ख़त्म ही नहीं होता। ज़िंदगी ख़त्म हो जाती है, पर प्रेम नहीं।


कोई उनके प्रेम को देखे या न देखे, कोई उन्हें प्रेम करे या न करे, कोई उनके प्रेम को स्वीकारे या न स्वीकारे, कोई उनके प्रेम को याद रखे या न रखे, उन्हें फ़र्क़ ही नहीं पड़ता।


उनका प्रेम ख़त्म ही नहीं होता। शायद प्रेम होता ही ऐसा है, कभी ख़त्म न होने वाला।


इसीलिए जब कोई कहता है कि इनका या उनका प्रेम ख़त्म हो गया, मैं सोचता हूँ, प्रेम ख़त्म कैसे हुआ?


हो ही कैसे सकता है?


जो अमर है, अविनाशी है, अनंत है; जो संभावनाओं और संवेदनाओं को जन्म देता है;


जो कण-कण की चेतना का हिस्सा है; जो कंकर को केसर कर देता है; जो इंसान को ईश्वर और ईश्वर को इंसान बना देता है, वो किसी एक के स्वीकार न किए जाने से कैसे ख़त्म हो सकता है? प्रेम कभी ख़त्म नहीं होता। हाँ, रिश्ते ख़त्म होते हैं, नाम ख़त्म होते हैं, क्योंकि रिश्ते और नाम ज़रूरत और स्वार्थ की नींव पर बने होते हैं, जो आज हैं और कल नहीं।


पर प्रेम, वो स्वतंत्र है। और जो स्वतंत्र है, वो ख़त्म नहीं होता।


वो रहता है, हमेशा, समय के अंत तक, और अंत के बाद भी।


उन लोगों में जो प्रेम में हैं, थे, या रहेंगे।


क्योंकि उन लोगों में प्रेम, ख़त्म नहीं होता...!!!

Sunday, January 11, 2026

रिश्ते चलते हैं भरोसे से

जब भरोसे की डोर धीरे-धीरे कटने लगती है


रिश्ते सिर्फ साथ रहने से नहीं चलते,

रिश्ते चलते हैं भरोसे से।


पति-पत्नी के रिश्ते में यह भरोसा सबसे कीमती होता है,

क्योंकि यहाँ इंसान अपना वह चेहरा दिखाता है

जो वह दुनिया से छुपाता है।


पुरुष की दुनिया बाहर से मजबूत दिखती है


लेकिन भीतर से वह भी उतना ही संवेदनशील होता है।


एक पुरुष दिन भर बाहर की दुनिया में लड़ता है

काम का दबाव, जिम्मेदारियों का बोझ,

कभी असफलता का डर,

कभी भविष्य की चिंता।


वह सब किसी को नहीं बताता।

क्योंकि उसे सिखाया गया है

“मर्द रोते नहीं”,

“कमज़ोरी मत दिखाओ।”


लेकिन जब वह घर लौटता है,

तो वह मर्द नहीं रहना चाहता

वह सिर्फ एक इंसान बनना चाहता है।


और उस इंसान को सबसे सुरक्षित जगह लगती है

अपनी पत्नी के पास।


वह सोचता है

“यह वही इंसान है जो मुझे जज नहीं करेगा,

जो मेरी बात को बाहर नहीं ले जाएगा,

जो मेरी कमजोरी को मेरी ताकत समझेगा।”


इसलिए वह अपनी असफलताएँ, डर, गुस्सा,

यहाँ तक कि अपने अधूरे सपने भी

सबसे पहले अपनी पत्नी से साझा करता है।


लेकिन स्त्री की भी अपनी दुनिया होती है


स्त्री अक्सर यह नहीं समझ पाती

कि जो बात उसके लिए साधारण बातचीत है,

वही बात पुरुष के लिए उसकी आत्मा का रहस्य हो सकती है।


वह कभी-कभी सोचती है

“मैंने तो यूँ ही मम्मी से कह दिया।”

“बस सहेली से शेयर किया था।”

“थोड़ा मज़ाक ही तो था।”


उसका इरादा बुरा नहीं होता।

वह दर्द देना नहीं चाहती।


लेकिन समस्या इरादे की नहीं,

असर की होती है।


जब पुरुष को पता चलता है

कि उसकी कही हुई बात

अब किसी और की जुबान पर है

तो उसके भीतर कुछ टूट जाता है।


वह सोचता है

“अगर मेरी सबसे निजी बात भी सुरक्षित नहीं,

तो मैं फिर किस पर भरोसा करूँ?”


यहीं से रिश्ते में चुप्पी जन्म लेती है


वह लड़ता नहीं।

शिकायत भी नहीं करता।


वह बस चुप हो जाता है।


अब वह कहता है

“कुछ खास नहीं।”

“सब ठीक है।”

“थक गया हूँ।”


लेकिन सच यह होता है

उसने अपने दिल का दरवाज़ा

धीरे से बंद कर लिया होता है।


स्त्री को लगता है

“वह बदल गया है।”

“अब पहले जैसा नहीं रहा।”


और पुरुष सोचता है

“अब बोलने का कोई मतलब नहीं।”


यहीं से रिश्ता

प्यार से उतरकर

सिर्फ जिम्मेदारी बन जाता है।


इस कहानी में कोई एक दोषी नहीं होता


यह लेख किसी स्त्री को दोषी ठहराने के लिए नहीं है,

और न ही पुरुष को पीड़ित साबित करने के लिए।


यह सिर्फ याद दिलाने के लिए है कि


भरोसा काँच की तरह होता है

एक बार टूट जाए, तो जुड़ तो जाता है

लेकिन दरार रह ही जाती है।


हर बात साझा करने की नहीं होती

कुछ बातें सिर्फ संभाल कर रखने के लिए होती हैं।


पति हो या पत्नी दोनों पहले इंसान हैं।


एक छोटा सा आत्म-मंथन


स्त्री खुद से पूछे

क्या मेरे पति आज भी मुझसे दिल की बात कहते हैं?

या मैंने अनजाने में उनकी चुप्पी की वजह बन गई?


पुरुष खुद से पूछे

क्या मैं अपनी पीड़ा को शब्दों में कह पा रहा हूँ?

या मैं सिर्फ सहता जा रहा हूँ?


क्योंकि रिश्ता तभी बचता है

जब बोलने वाले को सुरक्षा मिले

और सुनने वाला उसे संभाल सके।

हाँ मुझे पसन्द है

हाँ मुझे पसन्द है...


उसकी आँखें, उसकी बातें,,

उसे देखना जाते जाते..

हाँ..मुझे पसन्द है।


उसे रुठाना, उसे मनाना,,

सारी बातें, उसे बताना,,

रोज सपनों में उसे गले लगाना..

हाँ..मुझे पसन्द है।


उसकी सादगी, उसकी शरारत,,

उसके पास, आने की वो आहट,,

उसकी पूरी हर एक ईबादत..

हाँ,,मुझे पसन्द है।


उसका यूँ किस्से सुनाना,,

बात बात पर खुशी से झूम जाना,,

अपना छोड़, सबका ख़्याल कर जाना,,

हर ग़म को अपनी मुस्कान के पीछे छिपा जाना,,

औऱ, पूछने पर एक नया बहाना..

हाँ,,मुझे पसन्द है।


उसका यूँ सजना सँवरना,,

आंखों में काजल का रखना,,

रोज़ नए कपड़े बदलना,,

बारी बारी सबसे लड़ना..

हाँ,,मुझे पसन्द है।


उसका मुझसे यूँ दूर जाना,,

पास आने पर सहज सिमट जाना,,

सारा गुस्सा मुझे दिखाना,,

औऱ हर बार मेरा हार जाना..

हाँ,,मुझे पसन्द है।।