Tuesday, January 13, 2026

प्रेम ख़त्म नहीं होता

किसी किसी में इतना प्रेम भरा होता है कि ख़त्म ही नहीं होता। ज़िंदगी ख़त्म हो जाती है, पर प्रेम नहीं।


कोई उनके प्रेम को देखे या न देखे, कोई उन्हें प्रेम करे या न करे, कोई उनके प्रेम को स्वीकारे या न स्वीकारे, कोई उनके प्रेम को याद रखे या न रखे, उन्हें फ़र्क़ ही नहीं पड़ता।


उनका प्रेम ख़त्म ही नहीं होता। शायद प्रेम होता ही ऐसा है, कभी ख़त्म न होने वाला।


इसीलिए जब कोई कहता है कि इनका या उनका प्रेम ख़त्म हो गया, मैं सोचता हूँ, प्रेम ख़त्म कैसे हुआ?


हो ही कैसे सकता है?


जो अमर है, अविनाशी है, अनंत है; जो संभावनाओं और संवेदनाओं को जन्म देता है;


जो कण-कण की चेतना का हिस्सा है; जो कंकर को केसर कर देता है; जो इंसान को ईश्वर और ईश्वर को इंसान बना देता है, वो किसी एक के स्वीकार न किए जाने से कैसे ख़त्म हो सकता है? प्रेम कभी ख़त्म नहीं होता। हाँ, रिश्ते ख़त्म होते हैं, नाम ख़त्म होते हैं, क्योंकि रिश्ते और नाम ज़रूरत और स्वार्थ की नींव पर बने होते हैं, जो आज हैं और कल नहीं।


पर प्रेम, वो स्वतंत्र है। और जो स्वतंत्र है, वो ख़त्म नहीं होता।


वो रहता है, हमेशा, समय के अंत तक, और अंत के बाद भी।


उन लोगों में जो प्रेम में हैं, थे, या रहेंगे।


क्योंकि उन लोगों में प्रेम, ख़त्म नहीं होता...!!!

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