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Tuesday, February 3, 2026

मिट्टी, इमारतों, सड़कों और शरीर

 हम जिस दुनिया में जीते हैं, वो केवल मिट्टी, इमारतों, सड़कों और शरीरों से नहीं बनी। उसका एक बड़ा हिस्सा हमारे सोचने के तरीके से जन्म लेता है। जो कुछ हमने देखा, सहा, खोया, पाया, उसी की स्मृतियाँ मिलकर विचार बनती हैं। फिर उन्हीं विचारों से हम भविष्य की कल्पना करते हैं, संबंधों की परिभाषा गढ़ते हैं, और अपने होने का अर्थ तय करते हैं। हमें लगता है कि हम दुनिया को देख रहे हैं, पर अक्सर हम सिर्फ अपनी स्मृतियों की परछाइयों को देख रहे होते हैं।


ये सोच बहुत पुरानी होती है, पर हमें हर दिन नई लगती है। क्योंकि हर सुबह हम उसी मानसिक ढांचे के साथ उठते हैं, जिसे हमने बरसों में तैयार किया है। उसमें सुरक्षा के नाम पर डर जमा होता है, पहचान के नाम पर सीमाएँ बनती हैं, और सही होने की इच्छा के नाम पर दूसरों से दूरी। हम इन सबको स्वाभाविक मान लेते हैं, जैसे ये जीवन का हिस्सा हों, जबकि असल में ये विचारों का विस्तार होते हैं।


धीरे धीरे ये सोच इतनी ठोस लगने लगती है कि हमें लगता है, इसके बाहर कुछ है ही नहीं। जो भी अलग दिखता है, वो खतरा बन जाता है। जो भी हमारे जैसा नहीं सोचता, वो अजनबी हो जाता है। इस तरह हम एक ऐसी दुनिया में रहने लगते हैं, जो बाहर से बड़ी दिखती है, पर भीतर से बहुत संकरी होती है।


विचार से बनी हुई सीमाएँ:


धर्म, राष्ट्र, संस्कृति, परंपरा, विचारधारा, ये सब विचार की ही संतान हैं। शुरू में शायद इनका जन्म किसी समझ या सुविधा से हुआ होगा, पर समय के साथ ये पहचान बन गईं। पहचान, जो कहती है, मैं ये हूँ, और तुम वो हो। इसी एक रेखा से विभाजन पैदा होता है। बिना हथियार उठाए भी हम रोज़ किसी न किसी को अपने से बाहर कर देते हैं।


ये सीमाएँ केवल देशों के नक्शों पर नहीं होतीं, हमारे भीतर भी खिंची होती हैं। हम अपने मन में तय कर लेते हैं कि कौन अपना है, कौन पराया। कौन सही है, कौन गलत। और फिर उसी हिसाब से देखना शुरू कर देते हैं। देखने से पहले ही फैसला तैयार होता है। इस तरह वास्तविकता देखने से पहले ही हम उसे ढाल लेते हैं।


डर इसी ढांचे में पनपता है। डर कि मेरी पहचान टूट न जाए, मेरा समूह कमजोर न हो जाए, मेरी सोच गलत साबित न हो जाए। इस डर को हम तर्क, नैतिकता और परंपरा के कपड़े पहनाते हैं, ताकि वो सभ्य लगे। पर भीतर वो डर ही रहता है, जो किसी भी असहमति को खतरा समझता है।


हम कहते हैं कि दुनिया में हिंसा है, पर शायद हिंसा की जड़ ये विचार हैं, जो अलगाव पैदा करते हैं। जब मैं खुद को केंद्र मानता हूँ, तब हर दूसरा या तो उपयोगी होता है, या बाधा। बीच की जगह बहुत कम बचती है।


मानसिक वास्तविकता का जाल:


समय के साथ हम एक ऐसी दुनिया में रहने लगते हैं, जो बाहर से कम और भीतर से ज्यादा बनी होती है। हमारा दुख, हमारी खुशी, हमारा अपमान, हमारा गर्व, सब विचारों की व्याख्या पर टिका होता है। कोई एक शब्द कह देता है, और हम घंटों परेशान रहते हैं। कोई छोटी सी तारीफ मिल जाती है, और हम खुद को बड़ा मानने लगते हैं।


ये सब एक तरह की मानसिक वास्तविकता है। इसमें घटनाएँ कम, उनकी व्याख्या ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। दो लोग एक ही स्थिति से गुजरते हैं, पर एक टूट जाता है, दूसरा शांत रहता है। फर्क घटना में नहीं, सोच में होता है।


हम इस सोच को अपनी सुरक्षा समझते हैं। लगता है कि अगर हमने सब कुछ समझ लिया, वर्गीकृत कर लिया, नाम दे दिए, तो हम सुरक्षित हैं। पर असल में ये सुरक्षा बहुत नाजुक होती है। एक खबर, एक दुर्घटना, एक अस्वीकृति, और पूरा ढांचा हिल जाता है।


इसलिए हम लगातार खुद को व्यस्त रखते हैं। नई जानकारी, नई बहस, नए लक्ष्य, ताकि भीतर की अस्थिरता को महसूस न करना पड़े। हम भागते रहते हैं, और उसे प्रगति का नाम देते हैं।


देखने का आमंत्रण:


कुछ दृष्टिकोण हमें रुकने को कहते हैं। न मानने को, न विरोध करने को, बस देखने को। ये देखने का अर्थ आंखों से देखना नहीं, बल्कि ये देखना कि हम कैसे सोचते हैं, कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, कैसे डरते हैं, कैसे किसी एक पहचान से चिपक जाते हैं।


जब हम खुद को देखते हैं, बिना सफाई दिए, बिना दोष डाले, तब एक अजीब बात होती है। सोच थोड़ी धीमी पड़ती है। जैसे किसी नदी की धार अचानक शांत हो जाए। उस क्षण हमें पता चलता है कि हम और हमारी सोच अलग नहीं हैं। जो उलझन है, वो बाहर नहीं, भीतर है।


ये देखना कोई तकनीक नहीं है। इसमें कोई अभ्यास नहीं, कोई मंज़िल नहीं। ये बस ईमानदारी है। ये मान लेना कि जो कुछ चल रहा है, वो देखा जा सकता है, बदले बिना भी।


इस देखने में कोई सुधार की योजना नहीं होती। जैसे ही हम सुधार की सोचते हैं, सोच फिर नियंत्रण बन जाती है। पर जब हम सिर्फ देखते हैं, तब नियंत्रण गिरने लगता है।


विचार के पार का मौन:


कभी कभी, बहुत छोटे क्षणों के लिए, सोच रुकती है। शायद किसी गहरी थकान में, या किसी अप्रत्याशित सुंदरता को देखते हुए। उस समय कोई टिप्पणी नहीं चलती, कोई तुलना नहीं होती। बस जो है, वो है।


ये क्षण दुर्लभ नहीं हैं, पर हम उन्हें पकड़ने की कोशिश में खो देते हैं। जैसे ही हम कहते हैं, ये अच्छा है, इसे फिर चाहिए, सोच लौट आती है, और मौन खत्म हो जाता है।


पर ये क्षण एक इशारा हैं कि जीवन केवल सोच से नहीं बना। सोच जीवन का एक औज़ार है, मालिक नहीं। जब औज़ार मालिक बन जाता है, तब समस्या शुरू होती है।


विचार के पार कोई स्वर्ग नहीं, कोई अलौकिक अनुभव नहीं, बल्कि एक सादगी होती है। जिसमें कोई केंद्र नहीं होता, कोई विशेष व्यक्ति नहीं होता, कोई तुलना नहीं होती।


उस सादगी में डर को टिकने की जगह नहीं मिलती, क्योंकि डर भविष्य की कल्पना से बनता है। वहाँ संघर्ष नहीं होता, क्योंकि संघर्ष दो छवियों के टकराव से पैदा होता है।


बिना दीवारों की दुनिया:


अगर सोच की बनाई दीवारें ढीली पड़ें, तो दुनिया वैसी नहीं रहती जैसी हमें सिखाई गई है। तब कोई देश दुश्मन नहीं लगता, कोई धर्म श्रेष्ठ नहीं लगता, कोई विचार अंतिम सत्य नहीं लगता।


इसका अर्थ ये नहीं कि समाज खत्म हो जाएगा, या नियम टूट जाएंगे। इसका अर्थ बस इतना है कि भीतर का विभाजन कम हो जाएगा। और जब भीतर का विभाजन कम होता है, तो बाहर का भी असर बदलने लगता है।


हम अक्सर बड़ी क्रांतियों की बात करते हैं, व्यवस्था बदलने की, सत्ता पलटने की। पर शायद सबसे गहरी क्रांति ये है कि हम अपनी सोच को देखें, बिना उसे सजाए, बिना उसे बचाए।


ये देखना आसान नहीं, क्योंकि इसमें हमारी सारी सुरक्षा हिलती है। हमारी पहचान, हमारी श्रेष्ठता, हमारी शिकायतें, सब सवालों में आ जाती हैं।


पर इसी असहजता में एक नई तरह की शांति छिपी होती है। ऐसी शांति, जो किसी विचार पर टिकी नहीं, किसी उपलब्धि पर निर्भर नहीं, किसी तुलना से बनी नहीं।


और शायद इसी शांति में वो जीवन संभव है, जो स्पष्ट है, जो बोझ से हल्का है, जो किसी विचारधारा का प्रचार नहीं करता, बस खुद होकर जीता है।


जहाँ सोच होती है, पर राज नहीं करती।

जहाँ पहचान होती है, पर दीवार नहीं बनती।

जहाँ जीवन किसी सिद्धांत की परीक्षा नहीं, बल्कि एक खुली साँस की तरह घटता है।

बिखरी हुई ऊर्जा का एक हो जाना

 "ध्यान' बिखरी हुई ऊर्जा का एक हो जाना"


ध्यान किसी विशेष आसन में बैठने का नाम नहीं है,

न ही यह केवल आँखें बंद करने की प्रक्रिया है।


ध्यान का वास्तविक अर्थ है 

हमारी बिखरी हुई ऊर्जाओं को कोमलता से एक दिशा में प्रवाहित करना।


मनुष्य के भीतर अनेक प्रकार की ऊर्जाएँ होती हैं...

इन्द्रियों की ऊर्जा, जो देखती, सुनती और अनुभव करती है


मन की ऊर्जा, जो सोचती, कल्पना करती और चिंतित होती है


शरीर की ऊर्जा, जो कर्म करती और क्रिया में लगी रहती है


सामान्य जीवन में ये तीनों एक साथ नहीं होते।

शरीर यहाँ होता है, मन कहीं और भटक रहा होता है,

इन्द्रियाँ बाहरी दुनिया में उलझी रहती हैं।


यही अवस्था अधूरापन है।

और इसी अधूरेपन से जीवन की अधिकांश समस्याएँ जन्म लेती हैं।


ध्यान = इन्द्रियाँ, मन और शरीर का एक सूत्र में बंध जाना


जब हम ध्यान का अभ्यास करते हैं,

तो हम इन बिखरी ऊर्जाओं को धीरे-धीरे एक साथ लाना सीखते हैं।


इन्द्रियाँ वर्तमान क्षण में टिकने लगती हैं


मन विचारों की भीड़ से बाहर आने लगता है


शरीर स्थिर और सहज हो जाता है


अब ये तीनों अलग-अलग दिशाओं में नहीं बहते,

बल्कि एक ही प्रवाह में चलने लगते हैं।


जैसे दीपक जलाते समय 

अगर हाथ काँप रहा हो,

मन कहीं और उलझा हो,

और आँख ध्यान से न देख रही हो,

तो दीपक बार-बार बुझ जाएगा।


लेकिन जब हाथ, आँख और मन 

तीनों एक साथ उसी क्रिया में उपस्थित हों,

तो दीपक सहजता से जल उठता है।


यही ध्यान है।


"जब ध्यान अधूरा होता है"


अक्सर ऐसा होता है कि व्यक्ति ध्यान तो करता है,

लेकिन उसकी ऊर्जा अभी भी बिखरी रहती है।


शरीर बैठा है


मन भविष्य या अतीत में घूम रहा है


इन्द्रियाँ ध्वनियों और विचारों में फँसी हैं


यह कोई असफलता नहीं है,

यह केवल अभ्यास की अवस्था है।


क्योंकि ध्यान में जब तक हम पूरे नहीं होते,

तब तक ध्यान भी पूरा नहीं होता।


और जब ध्यान अधूरा रहता है,

तो जीवन के काम भी अधूरेपन के साथ होने लगते हैं।


"बिखरी ऊर्जा का प्रभाव जीवन पर"


जब हमारी ऊर्जा एक जगह केंद्रित नहीं होती 


काम में बार-बार रुकावट आती है


निर्णय लेने में असमंजस रहता है


मन में अविश्वास पैदा होता है


हम खुद पर शक करने लगते हैं


ऐसा इसलिए नहीं कि हम कमजोर हैं,

बल्कि इसलिए कि हमारी शक्ति बिखरी हुई है।


जैसे पानी अगर फैल जाए तो

वह ज़मीन को भिगो देता है,

लेकिन अगर वही पानी एक धार में बहने लगे,

तो पत्थर भी काट सकता है।


"ध्यान और दैनिक जीवन"


दैनिक जीवन में हम अधिकांश काम

आधे मन से करते हैं।


खाते समय मोबाइल देखना


चलते समय सोच में डूबे रहना


बात करते समय जवाब पहले से तय कर लेना


ध्यान सिखाता है......जो कर रहे हो, पूरे होकर वही करो।


जब आप चाय पीते समय

उसकी गर्माहट, खुशबू और स्वाद को पूरी तरह महसूस करते हैं,

तो वही साधारण क्रिया भी ध्यान बन जाती है।


यहीं से जीवन में

शांति, संतुलन और सहजता आने लगती है।


"ध्यान और काम (कर्म)"


काम में थकान अक्सर मेहनत से नहीं,

मन के बिखराव से आती है।


मन परिणाम से डरता है


शरीर बोझ महसूस करता है


ध्यान भविष्य में अटका रहता है


ध्यान हमें सिखाता है ....अभी के काम में पूरी तरह उतर जाना।


जैसे किसान बीज बोते समय

फल की चिंता नहीं करता,

वह बस मिट्टी, बीज और अपने हाथों में उपस्थित रहता है।


जब मन, शरीर और इन्द्रियाँ

एक ही काम में जुड़ जाते हैं,

तो काम बोझ नहीं,

साधना बन जाता है।


"ध्यान और संबंध"


संबंधों में दुख का सबसे बड़ा कारण है 

अनुपस्थिति।


सामने वाला बोल रहा होता है


हम सुन नहीं रहे होते


मन पुराने अनुभवों में उलझा होता है


ध्यान सिखाता है ....

सुनना, पूरे मन से।


जब आप किसी को

बिना टोके, बिना निर्णय बनाए सुनते हैं,

तो सामने वाला स्वयं को

सम्मानित और स्वीकार किया हुआ महसूस करता है।


यहीं से


करुणा जन्म लेती है


टकराव कम होते हैं


संबंध गहरे होते हैं


"ध्यान और रचनात्मकता"


रचनात्मकता ज़बरदस्ती नहीं आती।

वह तब आती है जब भीतर प्रवाह होता है।


लेखक, कलाकार या संगीतकार —

जब पूरी तरह अपने काम में डूब जाता है,

तो समय का भान भी नहीं रहता।


यह वही अवस्था है

जहाँ ऊर्जा एक दिशा में बह रही होती है।


ध्यान रचनात्मकता पैदा नहीं करता,

ध्यान सिर्फ रास्ता साफ करता है,

ताकि रचना स्वयं जन्म ले सके।


"जब सारी ऊर्जा एक दिशा में बहती है"


ध्यान के माध्यम से

जब इन्द्रियाँ, मन और शरीर

एक ही प्रवाह में बहने लगते हैं,

तो इंसान उस क्षण रचने लगता है।


अब उसे ज़ोर नहीं लगाना पड़ता,

अब वह जान जाता है 

ऊर्जा को किस दिशा में ले जाना है।


और जब इंसान यह जान जाता है,

तो उसका जीवन भी सधा हुआ हो जाता है।


"ध्यान का सार"


ध्यान हमें कुछ नया नहीं देता।

ध्यान हमें पूरा बनाता है।


और जब इंसान पूरा होता है 


उसका काम स्पष्ट होता है


उसके संबंध गहरे होते हैं


उसकी रचना सच्ची होती है


और उसका जीवन सहज रूप से बहने लगता है


यही ध्यान की वास्तविक साधना है 

शरीर नौ चक्र

शरीर नौ चक्र


कुण्डलिनी चक्र एक आध्यात्मिक अवधारणा है जिसमें शरीर की आधार (मूलाधार) में सोई हुई दिव्य ऊर्जा (कुण्डलिनी) को योग और ध्यान के माध्यम से जगाया जाता है, जो फिर रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ सात मुख्य चक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, सहस्रार) से होकर गुजरती है, जिससे गहन आध्यात्मिक अनुभव और चेतना का विस्तार होता है। यह एक शक्तिशाली प्रक्रिया है जिसे अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन में सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि इसके जागृत होने पर शारीरिक और मानसिक बदलाव आते हैं। मनुष्य शरीर में उपलब्ध इन चक्रों पर ध्यान टिकाने से असीम मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्तियाँ आ जाती हैं मानव शरीर में पाँच कर्म इंद्रियाँ, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ व चार सूक्षम इंद्रियाँ भी हैं।


जो इस प्रकार हैं। कर्म इंद्रियाँ - मुंह, हाथ, पैर, गुदा, लिंग । ज्ञानेंद्रियाँ - कान, मुंह, त्वचा, आंख, नाक । सूक्ष्म इंद्रियाँ - मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार । मन का निवास सुषमना नाड़ी में है । यह नाड़ी नाक के दोनों छिद्रों की नाड़ियों इडा तथा पिंगला के बीच की नाड़ी होती है। मन इसी सुषमना नाड़ी में बैठकर मस्तिष्क को आदेश देता है । यही मन इस नाशवान संसार की हर गतिविधि को नियंत्रित करता है।वहीं, कुंडलिनी जागरण में, कुंडलिनी शक्ति होती है, जो कि एक आध्यात्मिक ऊर्जा है और उसे ही जागृत किया जाता है। यह शक्ति मानव शरीर के मूलाधार चक्र में सुप्त अवस्था में मानी जाती है। कुंडलिनी एक ऐसी शक्ति है, जो एक कुंडली मारकर बैठे हुए सर्प की भांति शरीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार में स्थित होती है। निरंतर ध्यान, योग और आत्म-संयम इत्यादि की मदद से जब यह जाग्रत होने लगती है, तो साधक को ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे कोई सर्पिलाकार तरंग घूमती हुई ऊपर की ओर उठ रही है। 


हमारे शरीर में सात चक्रों में से कुंडलिनी का एक छोर मूलाधार चक्र पर स्थित होता है।और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ लिपटा हुआ जब ऊपर की ओर गति करता है, तो उसका उद्देश्य सभी चक्रों को सक्रिय करते हुए सातवें चक्र सहस्रार तक पहुंचना होता है। जिस भी व्यक्ति का कुण्डलिनी जागरण होता है, तो आप कह सकते हैं कि उसके शरीर में एक प्रकार से ऊर्जा का विस्फोट होता है।


कुण्डलिनी जागरण एक खतरनाक लेकिन दिव्य प्रक्रिया है। अगर वह व्यक्ति उस ऊर्जा को संतुलित नहीं कर पाया, तो वह पागल भी हो सकता है या उसकी मृत्यु भी हो सकती है। लेकिन अगर वह इसे संतुलित कर लेता है, तो उसकी तीसरी आँख जागृत हो जाती है, उसकी आध्यात्मिक जागरूकता और अंतर्दृष्टि बढ़ती है और वह सांसारिक भौतिक सुखों के पीछे भागना बंद कर देता है। कुण्डलिनी हमेशा के लिए जागृत नहीं होती बल्कि जब तक व्यक्ति संयम और ध्यान करता है, तब तक इसे नियंत्रित रख पाता है लेकिन अगर जागरण के बीच में अगर वह साधना छोड़ देता है, तो यह सर्प गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है।


तत्त्व विज्ञान को अनुसार ये नौ ऊर्जा बिन्दु ही प्रमुख है इनकी संरचना भी परमाणु जैसी ही होती है और ये क्रिया भी नाभिक की ही भाँति करते है ये नाभिक की ऊर्जा से आविशित होते रहते है।और उसी प्रकार से ऊर्जा उत्सर्जन करते है नौ ऊर्जा बिन्दु को जिनमे केवल एक नाभिक मुख्य होता है, शेष सह नाभिक योग साधना मे नौ निधि कहा जाता है।इन नौ से बने आठ ऊर्जा क्षेत्रों की सिद्धि को अष्ट सिद्धि कहा जाता है तंत्र विधा मे इन्ही को शक्ति को नौ रूपों मे सिद्ध किया जाता है और शून्य को मिलाकर ये ही दसमहाविधाएं है। 


और मनुष्य से शरीर के ऊर्जा चक्र भी वही है जो ब्रह्माण्ड या परमाणु का है।इसलिए तंत्र, योग,आदि साधनाओं मे अपने शरीर के इन्हीं ऊर्जा बिन्दूओ की सिद्धि की जाती है ये सिद्धि क्या है और कैसे प्राप्त की जाती है ।आवश्यक यह है कि इस ऊर्जा संरचना के वैज्ञानिक स्वरूप को समझा जाये।


इस सृष्टि मे जहां कहीं भी ऊर्जा का उत्सर्जन होता है वह इसी प्रकार के नाभिकों से होता है और यह निरन्तर प्रवाहित नही होती है, अपितु इसकी बौछार फव्वारे की तरह होती रहती है वैसे ही जैसे कोई पम्प से फुहार फेकता हो एक विस्फोट को बाद दुसरे विस्फोट से मध्य मे निष्क्रियता रहती है।


इसी तरह ब्रह्माण्ड मे जितनी भी ऊर्जा तरंगें गमन करती है या उत्सर्जित होती है उनमे धड़कन होती है यह धड़कन ही किसी इकाई को जीवित रखती है इस स्वचालित धड़कन का कारण धन और ऋण अर्द्धचन्द्राकार गड्ढे मे पडने वाले मूलतत्त्व का दबाव है।


ऊर्जा परिपथ मे शून्य को नीचे का बिन्दु शून्य को घेरे रहता है इसे शिव कहा जाता है और इस बिन्दु को शैवमार्ग मे शिव कि अर्द्धांगिनी मानाजाता है शिव शून्य परम तत्त्व का ही अंश समझा जाता है नीचे के आठ चक्र बिन्दु को आठ शिवलिंग माना जाता है इन शिवलिगों से ऊर्जा यानि शक्ति की फुहार निकलती है जिनकी प्रकृति भिन्न भिन्न प्रकार की होती है

कलेश और हीलिंग

 कलेश और हीलिंग


1. जब रिश्ता सहज होता है


जब पति-पत्नी के बीच सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तब जीवन में एक स्वाभाविक शांति होती है।

बातें सहज होती हैं, चुप्पी भी बोझ नहीं बनती।

एक-दूसरे की मौजूदगी ही काफी लगती है।


यह स्थिति इसलिए बनती है क्योंकि:


दोनों सुने जाने का अनुभव करते हैं


भावनाएँ दबाई नहीं जातीं


अपेक्षाएँ स्पष्ट या सीमित होती हैं


अहंकार रिश्ते से बड़ा नहीं होता


पर यह स्थिति स्थायी नहीं रहती, क्योंकि मन स्थिर नहीं होता।


2. तनाव की शुरुआत: छोटे कारण, गहरी जड़ें


तनाव अक्सर किसी बड़े झगड़े से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी उपेक्षाओं से शुरू होता है।


बाहरी कारण (जो दिखते हैं):


समय न देना


मोबाइल / काम / परिवार को प्राथमिकता देना


बातों को टालना


शारीरिक या भावनात्मक दूरी


तुलना (माँ, बहन, दोस्त, पूर्व संबंध)


अदृश्य कारण (जो नहीं दिखते):


मान्यता की कमी


 “मेरी अहमियत नहीं रही”


असुरक्षा


“क्या मैं अब पर्याप्त नहीं हूँ?”


अधूरी अपेक्षाएँ

जो कभी कही ही नहीं गईं


बीते घाव

जो पहले कभी भरे ही नहीं


अहं का टकराव

“मैं क्यों झुकूँ?”


यहीं से तनाव अंदर ही अंदर जमने लगता है जैसे ज़मीन के नीचे दबा लावा।


3. जब तनाव हद से बढ़ता है: कलेश की उत्पत्ति


जब दबा हुआ भाव बाहर निकलता है, तो वह संवाद नहीं होता वह विस्फोट होता है।


कलेश के गहरे कारण:


1. भावनात्मक भूख

स्त्री को समझा जाना चाहिए

पुरुष को सम्मान चाहिए

दोनों को प्यार चाहिए

लेकिन मांगने की भाषा नहीं आती


2. पुरानी स्मृतियाँ

वर्तमान झगड़े में अतीत भी शामिल हो जाता है


 “तुम हमेशा…”

“पहले भी ऐसा ही था…”


3. असहायता की भावना

जब लगता है कुछ बदल नहीं रहा

तब गुस्सा आख़िरी हथियार बन जाता है


4. मैं बनाम तुम

रिश्ता “हम” से हटकर “मैं सही, तुम गलत” हो जाता है


4. कलेश के संकेत (बहुत सूक्ष्म लेकिन गहरे)


कलेश सिर्फ चिल्लाने से नहीं दिखता।


सूक्ष्म संकेत:


चुप्पी का भारी हो जाना


सामने होते हुए भी अनुपस्थिति


व्यंग्य, ताने


बातों में कटुता


स्पर्श की कमी


एक-दूसरे की खुशी से दूरी


“जो करना है करो” वाली मानसिकता


जब ये संकेत लगातार हों तो समझिए कलेश भीतर जड़ पकड़ चुका है।


5. उस वक़्त क्या करना चाहिए (सबसे कठिन लेकिन ज़रूरी)


1. प्रतिक्रिया नहीं, ठहराव


झगड़े के बीच तुरंत समाधान नहीं होता

पहले मन को शांत करना ज़रूरी है


2. दोष नहीं, भाव बोलना


“तुम ऐसे हो”..... नहीं 

 “मुझे ऐसा महसूस होता है”.... हाँ 


3. सही समय चुनना


गुस्से में नहीं.....शांति में बात करें


4. जीत नहीं, जुड़ाव चुनें


रिश्ता जीतने से ज़्यादा बचाने की चीज़ है


6. हीलिंग की प्रक्रिया: भीतर से बाहर


हीलिंग का मतलब सिर्फ माफ करना नहीं 

हीलिंग का मतलब है खुद से मिलना।


7. ध्यान गहरी हीलिंग के लिए


ध्यान का उद्देश्य


अपने भीतर के दर्द को देखना


प्रतिक्रिया की जगह साक्षी बनना


मन की गांठों को ढीला करना


ध्यान अभ्यास (गहरा उदाहरण)


स्थान:

शांत जगह, अकेले

रीढ़ सीधी, आँखें बंद


श्वास पर ध्यान:

धीमी सांस लें

छोड़ते समय महसूस करें...बोझ निकल रहा है


अब मन में देखें:

अपने साथी को सामने बैठे देखें

कुछ मत कहें

बस देखें....बिना जजमेंट


अब खुद से पूछें (मन में):


मुझे सबसे ज़्यादा दर्द किस बात ने दिया?


मैं क्या चाहता/चाहती था जो मिला नहीं?


भाव आएँगे.... रोना, गुस्सा, खालीपन

उन्हें रोकें नहीं


फिर मन में कहें:

 “मैं तुम्हें नहीं, अपने दर्द को छोड़ रहा/रही हूँ”


कुछ देर बाद दोनों को प्रकाश में ढकते हुए कल्पना करें

यह प्रकाश स्वीकृति और करुणा का है


धीरे-धीरे आँख खोलें


8. स्त्री-पुरुष की मानसिक परतें 


स्त्री अधिक भावनात्मक सुरक्षा चाहती है


पुरुष अधिक स्वीकार्यता और सम्मान


दोनों अपने-अपने तरीके से प्रेम मांगते हैं


समस्या प्रेम की कमी नहीं भाषा की भिन्नता है


कलेश दुश्मन नहीं है

वह संकेत है कुछ सुना नहीं गया

कुछ समझा नहीं गया


और हीलिंग कोई जादू नहीं

वह रोज़-रोज़ चुना गया सच, धैर्य और आत्म-जागरूकता है।

संत कबीरदास के अनुसार

संत कबीरदास के अनुसार साधना की शुरुआत 


1-कामी क्रोधी लालची , इनते भक्ति ना होय ।

भक्ति करै कोई सूरमा , जादि बरन कुल खोय । 


अर्थ:-

विषय वासना में लिप्त रहने वाले, क्रोधी स्वभाव वाले तथा लालची प्रवृति के प्राणियों से भक्ति नहीं होती । धन संग्रह करना, दान पूण्य न करना ये तत्व भक्ति से दूर ले जाते है । भक्ति वही कर सकता है जो अपने कुल , परिवार जाति तथा अहंकार का त्याग करके पूर्ण श्रद्धा एवम् विश्वास से कोई पुरुषार्थी ही कर सकता है । हर किसी के लिए संभव नहीं है ।


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2-रहना नहिं देस बिराना है।यह संसार कागद की पुडिया, बूँद पडे गलि जाना है।


यह संसार काँटे की बाडी, उलझ पुलझ मरि जाना है॥


यह संसार झाड और झाँखर आग लगे बरि जाना है। 

कहत कबीर सुनो भै साधु , सतगुरू नाम ठिकाना हैं l


3-परारब्ध पहिले बना , पीछे बना शरीर ।

कबीर अचम्भा है यही , मन नहिं बांधे धीर ।


अर्थ:-

कबीर दास जी मानव को सचेत करते हुए कहते है कि प्रारब्ध की रचना पहले हुई उसके बाद शरीर बना । यही आश्चर्य होता है कि यह सब जानकर भी मन का धैर्य नहीं बंधता अर्थात कर्म फल से आशंकित रहता है ।


4-जंत्र मंत्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय ।

सार शब्द जाने बिना, कागा हंस न होय ।।


अर्थ:-

जंत्र मंत्र का आडम्बर सब झूठ है, इसके चक्कर में पडकर अपना जीवन व्यर्थ न गँवाये । गूढ ज्ञान के बिना कौवा कदापि हंस नहीं बन सकता ।अर्थात दुर्गुण से परिपूर्ण आज्ञानी लोग कभी ज्ञानवान नहीं बन सकते ।


5-माला फेरत युग गया, मिटा ना मन का फेर ।

कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ।।


अर्थ:-

हाथ में माला लेकर फेरते हुए युग व्यतीत हो गया फिर भी मन की चंचलता और संसारिक विषय रुपी मोह भंग नहीं हुआ । कबीर दास जी संसारिक प्राणियों को चेतावनी देते हुए कहते है- हे अज्ञानियों हाथ में जो माला लेकर फिरा रहे हो, उसे फेंक कर सर्वप्रथम अपने हृदय की शुध्द करो और एकाग्र चित्त होकार प्रभु का ध्यान करो ।


6-दस द्वारे का पींजरा, तामे पंछी मौन ।

रहे को अचरज भयै, गये अचम्भा कौन ।।


अर्थ:-


1-इस दस द्वारों शरीर में जो प्राण रुपी वायु है जिसके रहने से शरीर चलता फिरता है बातचीत करता है, आहार विहार करता है तथा संसार की सभी सुखों का उपभोग करता है। वह प्राणरूपी वायु शरीर के दस द्वारों में से किसी भी द्वार से निकल सकता है । इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है ।


2-शास्त्रों के अनुसार देह के नौ द्वार मानें गये हैं जो कि मृत्यु के समय शरीर के अन्दर रहनेवाले जीव के निर्गमन के लिए प्राकृतिक रूप से खुले रहते हैं। इनमें से सात द्वार दोनों आँखें, दोनों कान, नाक के दोनों नथुने और मुँह सिर में स्थित रहते हैं जिनसे पुण्यात्मा या सामान्य स्तर की पुण्यात्माओं के जीव निर्गमन करते हैं। मूत्रेन्द्रिय और उपस्थि(मलोत्सर्जन की इन्द्रिय) नीचे के द्वार हैं जिनसे पापियों के जीव निकलते हैं। इनसे भिन्न ब्रह्मरन्ध्र का द्वार है जो प्राकृतिक रूप से बन्द रहता है और योगसाधना (विशेष रूप से प्राणायाम व ध्यान) द्वारा खोला जाता है। यदि जीव इस द्वार से होकर शरीरत्याग करता है तो वह मुक्त हो जाता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इसी द्वार को दसवाँ द्वार कहा गया है।


3-दशम द्वार से निष्क्रमण की दशा में सामान्य निष्क्रमण की दशा की अपेक्षा शरीर के अत्यधिक सूक्ष्म अंश का निर्गमन होता है। सुषुम्णा के अन्दर वज्रनाडी है। वज्रनाडी के अन्दर चित्रनाडी है और चित्रनाडी के अन्दर ब्रह्मनाडी है। ब्रह्मनाडी के निचले सिरे पर मूलाधार चक्र है और ऊपर सबसे अन्त में ब्रह्मरन्ध्र का द्वार है। इसी ब्रह्मनाडी के रास्ते से जाकर जीव ब्रह्मरन्ध्र के द्वार से निकल पाता है। यह कहा जा सकता है कि जब सुषुम्णा तक को आधुनिक यन्त्रों तक से देखा नहीं जा सकता तो ब्रह्मनाडी और उसके अन्दर विचरण करनेवाले जीव की सूक्ष्मता की कल्पना ही की जा सकती है।


7-पांचतत्व का पूतरा, मानुष धरिया नाम ।

दिन चार के कारने , फिर फिर रोके ठाम ।।


अर्थ:-

पृथ्वी, जल, वायु, अग्नी और आकाश तत्व से मिलकर बने ढाँचे को ‘मनुष्य’ नाम रख दिया । चार दिन के क्षणिक सुख विलास में लिप्त होकर जीव ने अपने मोक्ष का द्वार बन्द कर लिया ।


8-भाला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख मांहि ।

मनवा तो चहु दिश फिरै, यह तो सुमिर न नांहि ।।


अर्थ:-

हाथ में माला फिर रही है और मुंह के बीच में जीभ फिर रही है तथा चंचल मन स्वच्छन्द रूप से चारों दिशाओ में घूम रहा है। फिर यह सुमिरन कहॅा हुआ ।यह तो सुमिरन करने का दिखावा है ।जब तक मन शान्त और एकाग्र नहीं होता तब तक सुमिरन संभव नहीं है ।


9-जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ।

जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ ॥


अर्थ:-


जो गहरे पानी में डूब कर खोजेगा उसे ही मोती मिलेगा। जो डूबने से डर

जायेगा ;वह किनारे बैठा रह जायेगा। आत्म ज्ञान प्राप्ति के लिये गहन साधना करनी पड़ती है।


10-ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय ।

औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय ॥


अर्थ:-


हमें ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए, जिससे दूसरों को शीतलता का अनुभव हो और साथ ही हमारा मन भी प्रसन्न हो उठे।मधुर वाणी औषधि के सामान होती है, जबकि कटु वाणी तीर के समान कानों से प्रवेश होकर संपूर्ण शरीर को पीड़ा देती है। मधुर वाणी से समाज में एक – दूसरे के प्रति प्रेम की भावना का संचार होता है। जबकि कटु वचनों से सामाजिक प्राणी एक – दूसरे के विरोधी बन जाते है। 


 11-दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय ।

बिना जीव की स्वाँस से, लोह भसम ह्वै जाय ॥


अर्थ:-


दुर्बल को कभी नहीं सताओ अन्यथा उसकी ‘हाय’ तुम्हें लग जायेगी । मरे हुए चमडे की धौकनी से लोहा भी भस्म ही जाता है । अर्थात- दुर्बल को कभी शक्तिहीन मत समझो ।


12-पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,


ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। 


अर्थ;-


बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।


13-आबत गारी ऐक है, उलटत होय अनेक

कहै कबीर नहि उलटिये वाही ऐक का ऐक।


अर्थ:-


कोई एक गाली देता है तो उलटकर उसे भी गाली देने पर वह अनेक हो

जाता है।यदि उलट कर पुनः गाली नहीं दिया जाये तो वह एक का एक ही रह जाता है।


14-जो तोको कांटा बुबये ताको बो तू फूल

तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।


अर्थ:-


जो तुम्हारे लिये काॅंटा बोये तुम उसके लिये फूल बोओ। तुम्हारा फूल तुम्हें फूल के रुप में मिल जायेगा ।परंतु उसका काॅंटा उसे तीन गुणा

अधिक काॅंटा के रुप में मिलेगा। अच्छे कर्म का फल अच्छा और बुरे का तीन गुणा बुरा फल मिलता है।


15-तीन ताप में ताप है , ताका अनंत उपाय ।

ताप आतम महाबली , संत बिना नहिं जाय ।।

दैहिक , दैविक और भौतिक... ये तीन ताप संसार में माने गये हैं । इन तापों से बचने के लिए लोग अनेकों उपाय करते है ।तीनों ताप में दुख है पर उनके उपाय हैं। परंतु आत्मा के ताप-अथार्त ज्ञान की प्राप्ति ,प्रभु से बिना साक्षात्कार संत की संगति के संभव नहीं है।


16-कस्तूरी कुंडल बसे , मृग ढूंढे बन माहिं ।


ऐसे घट घट राम है, दुनिया देखे नाहिं ।। 


अर्थ:-


अति सुगन्धित कस्तूरी मृग के नाभि में होती है , जब घास चरने के लिए मृग अपनी सिर नीचे करता है तो कस्तूरी के सुगन्ध उसे मिलती है और उसे ढूंढने के लिए वह जंगल में इधर उधर दौड़ता फिरता है ।जबकि कस्तूरी तो उसकी नाभि में है जिसका ज्ञान उसे नहीं है ।उसी प्रकार अविनाशी भगवान तुम्हारे अपने ह्रदय में ;इस संसार के कण कण में विद्यमान है; किन्तु सांसरिक प्राणी उन्हें देख नहीं पाते ।


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संत कबीरदास के अनुसार साधना की गहराई;-


1-धीरे-धीरे रे मना, धीरज से सब होय ।

माली सींचै सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय ॥


अर्थ;-


अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा, आज पेड़ लागाओगे तो कल फल नहीं आयेगा। इसी तरह धीरज जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है।


2-अष्ट सिद्धि नव निद्धि लौं , सबही मोह की खान ।

त्याग मोह की वासना , कहैं कबीर सुजान ।।


अर्थ;-

कबीर दास जी कहते हैं कि संसार की अष्ट सिद्धियां और नौं निधिया माया मोह का भंडार है, इस मोह रूपी वासना का त्याग करना ही उत्तम है क्योंकि ये कल्याण साधन के मार्ग की बाधा है ।


3-नैनन की कारी कोठरी, पुतली पलँग बिछाय ।


पलकों की चिक डारिकै, पिय को लिया रिझाय ॥


अर्थ;-


अपने प्रभु के लिए नेत्रों की कोठरी बनाकर पुतली रुपी पलंग बिछा दिया और पलकों की चिक दालकर अपने स्वामी को प्रसन्न कर लिया अर्थात् नयनों में प्रभु को बसाकर अपनी भक्ति अर्पित कर दी ।


 4-जपा मरे अजपा मरे ,अनहद हू मर जाये।

सुरत समानी शब्द में ,ताहि काल नही खाए।


अर्थ;-


1-कबीर कहते है कि ब्रह्मरन्ध्र पर नीचे के 5 कमलो के 5 जप मंत्र निष्प्रभावी हो जाते है, और अजपा जाप( ,जिसे साँसो की माला पे जपा जाता है, उसे अजपा जाप कहते है ) ब्रह्म एवम् परब्रह्म के लोक पार करते ही निष्प्रभावी हो जाते है| इसके बाद महासुन्न में अनहद धुन भी बंद हो जाती है, इस महासुन्न को सारनाम(सारशब्द) से पार करते है| यहाँ से आगे मकर तार की डोरी प्रारंभ होती है जिसे सारशब्द से पार करके सतलोक मे प्रवेश करते है| यहाँ काल से पूर्णतया मुक्ति मिल जाती है|


2-सुमिरण करते करते हम उसमे इतने लीन हो जायेंगे। फिर अचानक से अहसास होगा की

सुमिरण का तो पता नही। अजपा जाप शुरू हो गया।यानी अब बिना कोशिश के सुमिरण अपने आप चलने लगा।। दिन रात हमेशा अपने आप हो रहा है।फिर हम जपने वाले

नही रह जाते। फिर हम सुनने वाले बन जाते है।

3-फिर कुछ और गहराई में जाते है तो सुमिरण 'धुन' यानी साउंड में बदल जाता है। अब न हम जाप कर रहे है ,न जाप सुन रहे है। वो पीछे रह गया।अब तो सिर्फ ध्वनि होती है..

'झनकार धुन[' ;जिसको अनहद नाद कहते है।धीरे धीरे गहराई में जब उतरते है तो सब तरह

की ध्वनिसिर्फ एक साउंड में बदल जाती है।इस स्टेज पर जाप भी मर गया यानी सुमिरण पीछे रह गया।अजपा यानी तरह तरह की ध्वनियां भी गयी।। अब वो अवस्था आई; जहां सच्चा शब्द यानी कुल मालिक सामने प्रकट हुआ।और मेरी सूरत उस शब्द रूपी मालिक में समा गयी। 


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5-छिनहिं चढै छिन उतरै , सों तो प्रेम न होय ।

अघट प्रेमपिंजर बसै , प्रेम कहावै सोय ।।


अर्थ;

वह प्रेम जो क्षण भर में चढ़ जाता है और दुसरे क्षण उतर जाता है वह कदापि सच्चा प्रेम नहीं हो सकता क्योंकि सच्चे प्रेम का रंग तो इतना पक्का होता है कि एक बार चढ़ गया तो उतरता ही नहीं अर्थात प्रेम वह है जिसमें तन मन रम जाये ।


6-लाली मेरे लाल की, जित देखों तित लाल ।

लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल ॥


अर्थ;-


1-''मुझे हर जगह ईश्वरीय ज्योति दिखती है-अंदर, बाहर, हर जगह।लगातार ऐसी दैवी ज्योति देखते देखते, मैं भी ईश्वरीय हो गई हूँ |प्रभु का रंग कुछ ऐसा था कि चारो ओर ज्ञान स्वरूप लाली छाई हुई थी। मैंने सोचा मैं भी जाकर देखता हूँ और उनके समक्ष जाते ही वही रंग मेरा भी हो गया''। 2-जब तक मैं का भाव है, तभी तक तू भी है। मैं और तू एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।जब तक शिष्य हैं तभी तक गुरु भी हैं।वह प्रकाश तुम्हारा नहीं है; वह प्रकाश परमात्मा का है। जहां मैं नहीं, जहां तू नहीं, वहां जो शेष रह जाता है; उस शून्य का, उस सन्नाटे का-उसी का नाम परमात्मा है।


3-जैसे ही तुम शांत हो गए, इतनी भी अस्मिता न रही इतना भी अहंकार न रहा कि मैं हूं, मैं शिष्य हूं, मैं धार्मिक हूं, कि संन्यासी हूं, कि सत्य का खोजी हूं,अन्वेषी हूं-ऐसा कोई भाव ही न रहा; एक निर्भावदशा हो गई- तब अपूर्व प्रकाश का अनुभव होगा।  


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7-" जल में कुम्‍भ, कुम्‍भ में जल है, बाहर भीतर पानी

फूटा कुम्‍भ जल जलहीं समाना, यह तथ कह्यौ गयानी ।"


अर्थ :-


1-जिस प्रकार सागर में मिट्टी का घड़ा डुबोने पर उसके अन्दर - बाहर पानी ही पानी होता है , मगर फिर भी उस घट ( कुम्भ ) के अन्दर का जल बाहर के जल से अलग ही रहता है , इस पृथकता का कारण उस घट का रूप तथा आकार होते हैं, लेकिन जैसे ही वह घड़ा टूटता है , पानी पानी में मिल जाता है , सभी अंतर लुप्त हो जाते हैं I


2-ठीक उसी प्रकार यह विश्व ( ब्रह्माण्ड ) सागर समान है, चहुँ ओर चेतनता रूपी जल ही जल है, तथा हम जीव भी छोटे - छोटे मिट्टी के घड़ों समान हैं ( कुम्भ हैं ), जो पानी से भरे हैं , चेतना - युक्त हैं तथा हमारे शरीर रूपी कुम्भ को विश्व रूपी सागर से अलग करने वाले कारण हमारे रूप - रंग - आकार - प्रकार ही हैं I इस शरीर रूपी घड़े के फूटते ही अन्दर - बाहर का अंतर मिट जाएगा, पानी पानी में मिल जाएगाI जड़ता के मिटते ही चेतनता चारों ओर निर्बाध व्याप्त हो होगी; सारी विभिन्नताओं को पीछे छोड़ आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाएगी I


3-जब पानी भरने जाएं तो घडा जल में रहता है और भरने पर जल घड़े के अन्दर आ जाता हैI इस तरह देखें तो बाहर और भीतर पानी ही रहता है अथार्त पानी की ही सत्ता हैIजब घडा फूट जाए तो उसका जल जल में ही मिल जाता है ...अलगाव नहीं रहताI आत्मा-परमात्मा दो नहीं एक हैंI आत्मा परमात्मा में और परमात्मा आत्मा में विराजमान हैI अंतत: परमात्मा की ही सत्ता है I जब देह विलीन होती है तो वह परमात्मा का ही अंश हो जाती है ..उसी में समा जाती है ..एकाकार हो जाती हैI 


8-जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं ।

प्रेम गली अति साँकरी, ता मैं दो न समाहिं ॥


अर्थ;-


जब तक मन में अहंकार था तब तक ईश्वर का साक्षात्कार न हुआ, जब अहंकार (अहम) समाप्त हुआ तभी प्रभु मिले | जब ईश्वर का साक्षात्कार हुआ, तब अहंकार स्वत: ही नष्ट हो गया | ईश्वर की सत्ता का बोध तभी हुआ | प्रेम में द्वैत भाव नहीं हो सकता, प्रेम की संकरी (पतली) गली में केवल एक ही समा सकता है - अहम् या परम ! परम की प्राप्ति के लिए अहम् का विसर्जन आवश्यक है |


9-चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।


जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह।।


अर्थ;-


संत रहीम जी कहते है कि जिन्हें कुछ नहीं चाहिए वह राजाओं के राजा हैं। क्योंकि उन्हें न तो किसी चीज की चाह है, न ही चिन्ता और मन तो बिल्कुल बेपरवाह है। सरल शब्दों में समझाना चाहते है,कि ऐसा मनुष्य जिन्हें कुछ नहीं चाहिए वह अपने आप में ही राजा है|

Monday, February 2, 2026

गोत्र प्रवर वेद शाखा सूत्र देवता

 गोत्र प्रवर वेद शाखा सूत्र देवता 

हमारी महान् वैदिक परम्परा रही है कि हम सब अपने-अपने गोत्रों को याद रखते हैं । इसके लिए हमारे मनीषियों, ऋषियों ने कितनी अच्छी परम्परा शुरु की थी कि विभिन्न संस्कारों का प्रारम्भ संकल्प-पाठ से कराते थे, जिसके अन्तर्गत अपने पिता, प्रपिता, पितामह, प्रपितामह के साथ-साथ गोत्र, प्रवर, आदि का परिचय भी दिया जाता था । इसमें जन्मभूमि, भारतवर्ष का भी उल्लेख होता था। इसमें सृष्टि के एक-एक पल का गणन होता था और संवत् को भी याद रखा जाता था । यह परम्परा आज भी प्रचलित है, कुछ न्यूनताओं के साथ। गोत्र और प्रवर की आवश्यकता विवाह के समय भी होती है । इसलिए इसे जानना आवश्यक है । इसके अन्तर्गत हम इन पाँच विषयों पर चर्चा करेंगे : ---


1) गोत्र


2) प्रवर


3) वेद


4) शाखा


5) सूत्र


6) देवता


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(1) गोत्र : ----


गोत्र का अर्थ है, कि वह कौन से ऋषिकुल का है। या उसका जन्म किस ऋषिकुल में हुआ है। किसी व्यक्ति की वंश परंपरा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता है। हम सभी जानते हैं कि हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान हैं । इस प्रकार से जो जिस गोत्र ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया। 


#इन_गोत्रों_के_मूल_ऋषि :– 

अंगिरा, भृगु, अत्रि, कश्यप, वशिष्ठ, अगस्त्य, तथा कुशिक थे, और इनके वंश अंगिरस, भार्गव,आत्रेय, काश्यप, वशिष्ठ अगस्त्य, तथा कौशिक हुए। [ इन गोत्रों के अनुसार इकाई को "गण" नाम दिया गया, यह माना गया कि एक गण का व्यक्ति अपने गण में विवाह न कर अन्य गण में करेगा। इस तरह इन सप्त ऋषियों के पश्चात् उनकी संतानों के विद्वान ऋषियों के नामों से अन्य गोत्रों का नामकरण हुआ।


गोत्र शब्द का एक अर्थ गो जो पृथ्वी का पर्याय भी है । 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी है। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करने वाले ऋषि से ही है। गो शब्द इंद्रियों का वाचक भी है, ऋषि मुनि अपनी इंद्रियों को वश में कर अन्य प्रजा जनो का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्र कारक कहलाए। ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे, वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परंपरा पड़ गई। 


(2) प्रवर : ----


प्रवर का शाब्दिक अर्थ है--श्रेष्ठ । गोत्र और प्रवर का घनिष्ठ सम्बन्ध है । एक ही गोत्र में अनेक ऋषि हुए । वे ऋषि भी अपनी विद्वत्ता और श्रेष्ठता के कारण प्रसिद्ध हो गए । जिस गोत्र में जो व्यक्ति प्रसिद्ध हो जाता है, उस गोत्र की पहचान उसी व्यक्ति के नाम से प्रचलित हो जाती है । 


एक सामान्य उदाहरण देखिए :-


श्रीराम सूर्यवंश में हुए । इस वंश के प्रथम व्यक्ति सूर्य थे । आगे चलकर इसी वंश में रघु राजा प्रसिद्ध हो गए । तो आगे चलकर इनके नाम से ही रघुवंश या राघव वंश प्रचलित हो गया । इसी प्रकार इक्ष्वाकु भी प्रसिद्ध राजा हुए, तो उनके नाम से भी इस वंश का नाम इक्ष्वाकु वंश पड गया ।


इसी प्रकार ब्राह्मणों के ऋषि वंश में उदाहरण के साथ मिलान करें । जैसेः---वशिष्ठ ऋषि का वंश । वशिष्ठ के नाम से वशिष्ठ गोत्र चल पडा । अब इसी वंश में वाशिष्ठ, आत्रेय और जातुकर्ण्य ऋषि भी हुए , जो अति प्रसिद्धि को प्राप्त कर गए । अब इस वंश के तीन व्यक्ति अर्थात् तीन मार्ग हुए । इन तीनों के नाम से भी वंश का नाम पड गया । ये यद्यपि पृथक् हो गए, किन्तु इन तीनों का मूल पुरुष वशिष्ठ तो एक ही व्यक्ति है, अतः ये तीनों एक ही वंश के हैं, इसलिए ये तीनों आपस विवाह सम्बन्ध नहीं रख सकते । 


ये तीनों इस वंश श्रेष्ठ कहलाए, इसलिए ये प्रवर हैं । इस प्रकार एक गोत्र में तीन या पाँच प्रवर हो सकते हैं । भरद्वाज गोत्र में पाँच प्रवर हैं, अर्थात् इस गोत्र में पाँच ऋषि बहुत प्रसिद्धि को प्राप्त हो गए, इसलिए इनके नाम से भी गोत्र चल पडा, ये गोत्र ही प्रवर हैं । मूल गोत्र भरद्वाज है और इसके प्रवर ऋषि हुए---आंगिरस्, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, शौङ्ग, शैशिर ।


ये प्रवर तीसरी पीढी की सन्तान हो सकते हैं, या पाँचवी पीढी की । अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्---अष्टाध्यायी--4.1.162 सूत्रार्थ यह है कि पौत्र से लेकर जो सन्तान है, उसकी भी गोत्र संज्ञा होती है । अर्थात् पौत्र की तथा उससे आगे की सन्तानों की गोत्र संज्ञा होती है । इस सूत्र से गोत्र अर्थात् प्रवर की व्यवस्था है । इस व्यवस्था से या तो आप कह सकते हैं कि गोत्र और प्रवर एक ही है या फिर यह कह सकते हैं कि थोडा-सा अन्तर है । दोनों एक ही मूल पुरुष से जुड़े हुए हैं ।


प्रवर में यह व्यवस्था है कि प्रथम प्रवर गोत्र के ऋषि का होता है, दूसरा प्रवर ऋषि के पुत्र का होता है, तीसरा प्रवर गोत्र के ऋषि पौत्र का होता है । (यह व्यवस्था आधुनिक है । प्राचीन व्यवस्था पाणिनि के सूत्र से ज्ञात होता है, जो ऊपर दिया हुआ है ।) इस प्रकार प्रवर से उस गोत्र प्रवर्तक ऋषि की तीसरी पीढी और पाँचवी पीढी तक का पता लगता है । हम आपको एक बार और बता देना चाहते हैं कि एक समान गोत्र और प्रवर में विवाह निषिद्ध है । 


#कुछ_गोत्र_प्रवर : --


🔸(1) अगस्त्य---इसमें तीन प्रवर हैं---आगसस्त्य, माहेन्द्र, मायोभुव ।


🔹(2) उपमन्यु---वाशिष्ठ, ऐन्द्रप्रमद, आभरद्वसव्य ।


🔸(3) कण्व---आंगिरस्, घौर, काण्व ।


🔹(4) कश्यप---कश्यप, असित, दैवल ।


🔸(5) कात्यायन---वैश्वामित्र, कात्य, कील ।


🔹(6) कुण्डिन---वाशिष्ठ, मैत्रावरुण, कौण्डिन्य ।


🔸(7) कुशिक---वैश्वामित्र, देवरात, औदल ।


🔹(8) कृष्णात्रेय---आत्रेय, आर्चनानस, श्यावाश्व ।


🔸(9) कौशिक---वैश्वामित्र, आश्मरथ्य, वाघुल ।


🔹(10) गर्ग---आंगिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, गार्ग्य, शैन्य ।


🔸(11) गौतम---आंगिरस्, औचथ्य, गौतम ।


🔹(12) घृतकौशिक---वैश्वामित्र, कापातरस, घृत ।


🔸(13) चान्द्रायण---आंगिरस, गौरुवीत, सांकृत्य ।


🔹(14) पराशर---वाशिष्ठ, शाक्त्य, पाराशर्य ।


🔸(15) भरद्वाजः---आंगिरस्, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, शौङ्ग, शैशिर ।


🔹(16) भार्गव---भार्गव, च्यावन, आप्नवान्, और्व, जामदग्न्य ।


🔸(17) मौनस---मौनस, भार्ग्व, वीतहव्य ।


🔹(18) वत्स---भार्गव, च्यावन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य ।


#कुछ_प्रसिद्ध_गोत्रों_के_प्रवर_आदि_नीचे_लिखे_हैं :


🔸(1) कश्यप,


🔹(2) काश्यप के काश्यप, असित, देवल अथवा काश्यप, आवत्सार, नैधु्रव तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के ब्राह्मण ये हैं - जैथरिया, किनवार, बरुवार, दन्सवार, मनेरिया, कुढ़नियाँ, नोनहुलिया, तटिहा, कोलहा, करेमुवा, भदैनी चौधरी, त्रिफला पांडे, परहापै, सहस्रामै, दीक्षित, जुझौतिया, बवनडीहा, मौवार, दघिअरे, मररें, सिरियार, धौलानी, डुमरैत, भूपाली आदि।


🔸(3) पराशर के वसिष्ठ, शक्‍ति, पराशर तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के ब्राह्मण एकसरिया, सहदौलिया, सुरगणे हस्तगामे आदि है।


🔹(4) वसिष्ठ के वसिष्ठ, शक्‍ति, पराशर अथवा वसिष्ठ, भरद्वसु, इंद्र प्रमद ये तीन प्रवर हैं। ये ब्राह्मण कस्तुवार, डरवलिया, मार्जनी मिश्र आदि हैं। कोई वसिष्ठ, अत्रि, संस्कृति प्रवर मानते हैं।


🔸(5) शांडिल्य के शांडिल्य, असित, देवल तीन प्रवर हैं। दिघवैत, कुसुमी-तिवारी, नैनजोरा, रमैयापांडे, कोदरिए, अनरिए, कोराँचे, चिकसौरिया, करमहे, ब्रह्मपुरिए, पहितीपुर पांडे, बटाने, सिहोगिया आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔹(6) भरद्वाज,


🔸(7) भारद्वाज के आंगिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज अथवा आंगिरस, गार्ग्य, शैन्य तीन प्रवर हैं। दुमटिकार, जठरवार, हीरापुरी पांडे, बेलौंचे, अमवरिया, चकवार, सोनपखरिया, मचैयांपांडे, मनछिया आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(8) गर्ग


🔸(9) गार्ग्य के आंगिरस, गार्ग्य, शैन्य तीन अथवा धृत, कौशिक मांडव्य, अथर्व, वैशंपायन पाँच प्रवर हैं। मामखोर के शुक्ल, बसमैत, नगवाशुक्ल, गर्ग आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(10) सावर्ण्य के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य पाँच, या सावर्ण्य, पुलस्त्य, पुलह तीन प्रवर हैं। पनचोभे, सवर्णियाँ, टिकरा पांडे, अरापै बेमुवार आदि इस गोत्र के हैं।


🔸(11) वत्स के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य पाँच, या भार्गव, च्यवन, आप्नवान तीन प्रवर हैं। दोनवार, गानामिश्र, सोनभदरिया, बगौछिया, जलैवार, शमसेरिया, हथौरिया, गगटिकैत आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(12) गौतम के आंगिरस बार्हिस्पत्य, भारद्वाज या अंगिरा, वसिष्ठ, गार्हपत्य, तीन, या अंगिरा, उतथ्य, गौतम, उशिज, कक्षीवान पाँच प्रवर हैं। पिपरामिश्र, गौतमिया, करमाई, सुरौरे, बड़रमियाँ दात्यायन, वात्स्यायन आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔸(13) भार्गव के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, तीन या भार्गव, च्यवन आप्नवन, और्व, जायदग्न्य, पाँच प्रवर हैं, भृगुवंश, असरिया, कोठहा आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(14) सांकृति के सांकृति, सांख्यायन, किल, या शक्‍ति, गौरुवीत, संस्कृति या आंगिरस, गौरुवीत, संस्कृति तीन प्रवर हैं। सकरवार, मलैयांपांडे फतूहाबादी मिश्र आदि इन गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔸(15) कौशिक के कौशिक, अत्रि, जमदग्नि, या विश्‍वामित्रा, अघमर्षण, कौशिक तीन प्रवर हैं। कुसौझिया, टेकार के पांडे, नेकतीवार आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔹(16) कात्यायन के कात्यायन, विश्‍वामित्र, किल या कात्यायन, विष्णु, अंगिरा तीन प्रवर हैं। वदर्का मिश्र, लमगोड़िया तिवारी, श्रीकांतपुर के पांडे आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔸(17) विष्णुवृद्ध के अंगिरा, त्रासदस्यु, पुरुकुत्स तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के कुथवैत आदि ब्राह्मण हैं! 


🔹(18) आत्रेय।


🔸(19) कृष्णात्रेय के आत्रेय, आर्चनानस, श्यावाश्‍व तीन प्रवर हैं। मैरियापांडे, पूले, इनरवार इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔹(20) कौंडिन्य के आस्तीक, कौशिक, कौंडिन्य या मैत्रावरुण वासिष्ठ, कौंडिन्य तीन प्रवर हैं। इनका अथर्ववेद भी है। अथर्व विजलपुरिया आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔸(21) मौनस के मौनस, भार्गव, वीतहव्य (वेधास) तीन प्रवर हैं।


🔹(22) कपिल के अंगिरा, भारद्वाज, कपिल तीन प्रवर हैं।

इस गोत्र के ब्राह्मण जसरायन आदि हैं।


🔸(23) तांडय गोत्र के तांडय, अंगिरा, मौद्गलय तीन प्रवर हैं।


🔹(24) लौगाक्षि के लौगाक्षि, बृहस्पति, गौतम तीन प्रवर हैं।


🔸(25) मौद्गल्य के मौद्गल्य, अंगिरा, बृहस्पति तीन प्रवर हैं।


🔹(26) कण्व के आंगिरस, आजमीढ़, काण्व, या आंगिरस, घौर, काण्व तीन प्रवर हैं।


🔸(27) धनंजय के विश्‍वामित्र, मधुच्छन्दस, धनंजय तीन प्रवर हैं।


🔹(28) उपमन्यु के वसिष्ठ, इंद्रप्रमद, अभरद्वसु तीन प्रवर हैं।


🔸(29) कौत्स के आंगिरस, मान्धाता, कौत्स तीन प्रवर हैं।


🔹(30) अगस्त्य के अगस्त्य, दाढर्यच्युत, इधमवाह तीन प्रवर हैं। अथवा केवल अगस्त्यही।


इसके सिवाय और गोत्रों के प्रवर प्रवरदर्पण आदि से अथवा ब्राह्मणों की वंशावलियों से जाने जा सकते हैं।ब्राम्हण का एकादश परिचय 1 गोत्र .गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है । किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया ।


विश्‍वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतम:।

अत्रिवर्सष्ठि: कश्यपइत्येतेसप्तर्षय:॥ 

सप्तानामृषी-णामगस्त्याष्टमानां 

यदपत्यं तदोत्रामित्युच्यते॥


विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। 


इस तरह आठ ऋषियों की वंश-परम्परा में जितने ऋषि (वेदमन्त्र द्रष्टा) आ गए वे सभी गोत्र कहलाते हैं। और आजकल ब्राह्मणों में जितने गोत्र मिलते हैं वह उन्हीं के अन्तर्गत है।


 सिर्फ भृगु, अंगिरा के वंशवाले ही उनके सिवाय और हैं जिन ऋषियों के नाम से भी गोत्र व्यवहार होता है। 


इस प्रकार कुल दस ऋषि मूल में है। इस प्रकार देखा जाता है कि इन दसों के वंशज ऋषि लाखों हो गए होंगे और उतने ही गोत्र भी होने चाहिए।


गोत्र शब्द एक अर्थ में गो अर्थात् पृथ्वी का पर्याय भी है ओर 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी हे। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करें वाले ऋषि से ही है। 


गो शब्द इन्द्रियों का वाचक भी है, ऋषि- मुनि अपनी इन्द्रियों को वश में कर अन्य प्रजाजनों का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्रकारक कहलाए। 


ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे , वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परम्परा आव.....

1 गोत्र .....


गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है । किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। 


हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया ।


*विश्‍वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतम:।*

*अत्रिवर्सष्ठि: कश्यपइत्येतेसप्तर्षय:॥*

*सप्तानामृषी-णामगस्त्याष्टमानां* 

*यदपत्यं तदोत्रामित्युच्यते॥*


विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। 


इस तरह आठ ऋषियों की वंश-परम्परा में जितने ऋषि (वेदमन्त्र द्रष्टा) आ गए वे सभी गोत्र कहलाते हैं। और आजकल ब्राह्मणों में जितने गोत्र मिलते हैं वह उन्हीं के अन्तर्गत है।


 सिर्फ भृगु, अंगिरा के वंशवाले ही उनके सिवाय और हैं जिन ऋषियों के नाम से भी गोत्र व्यवहार होता है। 


इस प्रकार कुल दस ऋषि मूल में है। इस प्रकार देखा जाता है कि इन दसों के वंशज ऋषि लाखों हो गए होंगे और उतने ही गोत्र भी होने चाहिए।


गोत्र शब्द एक अर्थ में गो अर्थात् पृथ्वी का पर्याय भी है ओर 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी हे। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करें वाले ऋषि से ही है। 


गो शब्द इन्द्रियों का वाचक भी है, ऋषि- मुनि अपनी इन्द्रियों को वश में कर अन्य प्रजाजनों का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्रकारक कहलाए। 


ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे , वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परम्परा आविर्भसरयूपारीण सभी ब्राहमणों के मुख्य गाँव और गोत्र : 


गर्ग (शुक्ल- वंश)


गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|


(१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं|


उपगर्ग (शुक्ल-वंश) 


उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|


बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार


यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|


गौतम (मिश्र-वंश)


गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|


(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी


इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|


उप गौतम (मिश्र-वंश)


उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|


(१) कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े (६) कपीसा


इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति मानी जाति है|


वत्स गोत्र ( मिश्र- वंश)


वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|


(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (*गोत्र, प्रवर, वेद, शाखा, सूत्र, देवता*


हमारी महान् वैदिक परम्परा रही है कि हम सब अपने-अपने गोत्रों को याद रखते हैं । इसके लिए हमारे मनीषियों, ऋषियों ने कितनी अच्छी परम्परा शुरु की थी कि विभिन्न संस्कारों का प्रारम्भ संकल्प-पाठ से कराते थे, जिसके अन्तर्गत अपने पिता, प्रपिता, पितामह, प्रपितामह के साथ-साथ गोत्र, प्रवर, आदि का परिचय भी दिया जाता था । इसमें जन्मभूमि, भारतवर्ष का भी उल्लेख होता था। इसमें सृष्टि के एक-एक पल का गणन होता था और संवत् को भी याद रखा जाता था । यह परम्परा आज भी प्रचलित है, कुछ न्यूनताओं के साथ। गोत्र और प्रवर की आवश्यकता विवाह के समय भी होती है । इसलिए इसे जानना आवश्यक है । इसके अन्तर्गत हम इन पाँच विषयों पर चर्चा करेंगे : ---


1) गोत्र


2) प्रवर


3) वेद


4) शाखा


5) सूत्र


6) देवता


=============================================


(1) गोत्र : ----


गोत्र का अर्थ है, कि वह कौन से ऋषिकुल का है। या उसका जन्म किस ऋषिकुल में हुआ है। किसी व्यक्ति की वंश परंपरा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता है। हम सभी जानते हैं कि हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान हैं । इस प्रकार से जो जिस गोत्र ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया। 


इन गोत्रों के मूल ऋषि – अंगिरा, भृगु, अत्रि, कश्यप, वशिष्ठ, अगस्त्य, तथा कुशिक थे, और इनके वंश अंगिरस, भार्गव,आत्रेय, काश्यप, वशिष्ठ अगस्त्य, तथा कौशिक हुए। [ इन गोत्रों के अनुसार इकाई को "गण" नाम दिया गया, यह माना गया कि एक गण का व्यक्ति अपने गण में विवाह न कर अन्य गण में करेगा। इस तरह इन सप्त ऋषियों के पश्चात् उनकी संतानों के विद्वान ऋषियों के नामों से अन्य गोत्रों का नामकरण हुआ।


गोत्र शब्द का एक अर्थ गब्राह्मण वंशावली (गोत्र प्रवर परिचय)


सरयूपारीण ब्राह्मण या सरवरिया ब्राह्मण या सरयूपारी ब्राह्मण सरयू नदी के पूर्वी तरफ बसे हुए ब्राह्मणों को कहा जाता है। यह कान्यकुब्ज ब्राह्मणो कि शाखा है। श्रीराम ने लंका विजय के बाद कान्यकुब्ज ब्राह्मणों से यज्ञ करवाकर उन्हे सरयु पार स्थापित किया था। सरयु नदी को सरवार भी कहते थे। ईसी से ये ब्राह्मण सरयुपारी ब्राह्मण कहलाते हैं। सरयुपारी ब्राह्मण पूर्वी उत्तरप्रदेश, उत्तरी मध्यप्रदेश, बिहार छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में भी होते हैं। मुख्य सरवार क्षेत्र पश्चिम मे उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या शहर से लेकर पुर्व मे बिहार के छपरा तक तथा उत्तर मे सौनौली से लेकर दक्षिण मे मध्यप्रदेश के रींवा शहर तक है। काशी, प्रयाग, रीवा, बस्ती, गोरखपुर, अयोध्या, छपरा इत्यादि नगर सरवार भूखण्ड में हैं।


एक अन्य मत के अनुसार श्री राम ने कान्यकुब्जो को सरयु पार नहीं बसाया था बल्कि रावण जो की ब्राह्मण थे उनकी हत्या करने पर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए जब श्री राम ने भोजन ओर दान के लिए ब्राह्मणों को आमंत्रित किया तो जो ब्राह्मण स्नान करने के बहाने से सरयू नदी पार करके उस पार चले गए ओर भोजन तथा दान समंग्री ग्रहण नहीं की वे ब्राह्मण सरयुपारीन ब्राह्मण कहे गए।


#सरयूपारीण_ब्राहमणों_के_मुख्य_गाँव : 


गर्ग (शुक्ल- वंश)


गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|


(१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं।


उपगर्ग (शुक्ल-वंश):


उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|

(१)बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार

यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं।


गौतम (मिश्र-वंश):


गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|

(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी

इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं।


उप गौतम (मिश्र-वंश):


उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|

(१) कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े (६) कपीसा

इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति मानी जाति है।


वत्स गोत्र (मिश्र- वंश):


वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|

(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा

बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है।


कौशिक गोत्र (मिश्र-वंश):


तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है।

(१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी


वशिष्ठ गोत्र (मिश्र-वंश):


इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है।

(१) बट्टूपुर मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी


शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी वंश) 


शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बाह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं।


(१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच (७) बलूआ (८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है।

इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है। 


उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश):


इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं।

(१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा

भार्गव गोत्र (तिवारी या त्रिपाठी वंश):

भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें चार गांवों का उल्लेख मिलता है|

(१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक (३) चेतियाँ (४) मदनपुर।


भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश):


भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र बाये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है|

(१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार


कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दुसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गादी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें। सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है।


सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश)


सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं| 


(१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी) 


सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश)


सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बाते जाते हैं|


(१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ


कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश)


इन तीन गांवों से बताये जाते हैं।


(१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ (३) ढडमढीयाँ 


ओझा वंश 


इन तीन गांवों से बताये जाते हैं।


(१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां 


चौबे -चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र)


इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है।


(१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां 


एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है।


ब्राह्मणों की वंशावली


भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों का इतिहास है की प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से दोनों कुरुक्षेत्र वासनी

सरस्वती नदी के तट पर गये और कण् व चतुर्वेदमय सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें 

वरदान दिया। वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका क्रमानुसार नाम था 👇👇


उपाध्याय,

दीक्षित,

पाठक,

शुक्ला,

मिश्रा,

अग्निहोत्री,

दुबे,

तिवारी,

पाण्डेय,

और

चतुर्वेदी।


इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला शारदा देवी ने अपनी कन्याए प्रदान की।

वे क्रमशः


उपाध्यायी,

दीक्षिता,

पाठकी,

शुक्लिका,

मिश्राणी,

अग्निहोत्रिधी,

द्विवेदिनी,

तिवेदिनी

पाण्ड्यायनी,

और

चतुर्वेदिनी कहलायीं।


फिर उन कन्याआं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम -


कष्यप,

भरद्वाज,

विश्वामित्र,

गौतम,

जमदग्रि,

वसिष्ठ,

वत्स,

गौतम,

पराशर,

गर्ग,

अत्रि,

भृगडत्र,

अंगिरा,

श्रंगी,

कात्याय,

और

याज्ञवल्क्य।


इन नामो से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।

मुख्य 10 प्रकार ब्राम्हणों ये हैं-


🔸(1) तैलंगा,

🔸(2) महार्राष्ट्रा,

🔸(3) गुर्जर,

🔸(4) द्रविड,

🔸(5) कर्णटिका,

यह पांच "द्रविण" कहे जाते हैं, ये विन्ध्यांचल के दक्षिण में पाय जाते हैं। तथा विंध्यांचल के उत्तर मं पाये जाने वाले या वास करने वाले ब्राम्हण


🔹(1) सारस्वत,

🔹(2) कान्यकुब्ज,

🔹(3) गौड़,

🔹(4) मैथिल,

🔹(5) उत्कलये,

उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं। वैसे ब्राम्हण अनेक हैं जिनका वर्णन आगे लिखा है।

ऐसी संख्या मुख्य 115 की है। शाखा भेद अनेक हैं । इनके अलावा संकर जाति ब्राम्हण अनेक है।

यहां मिली जुली उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हणों की नामावली 115 की दे रहा हूं। जो एक से दो और 2 से 5 और 5 से 10 और 10 से 84 भेद हुए हैं,

फिर उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हण की संख्या शाखा भेद से 230 के लगभग है। तथा और भी शाखा भेद हुए हैं, जो लगभग 300 के करीब ब्राम्हण भेदों की संख्या का लेखा पाया गया है। उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणां के भेद इस प्रकार है 81 ब्राम्हाणां की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या, मुख्य है -


(1) गौड़ ब्राम्हण,

(2)गुजरगौड़ ब्राम्हण (मारवाड,मालवा)

(3) श्री गौड़ ब्राम्हण,

(4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण,

(5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण,

(6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण,

(7) शोरथ गौड ब्राम्हण,

(8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण,

(9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण,

(10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण,

(11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण(षोभर),

(12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण,

(13) वाल्मीकि ब्राम्हण,

(14) रायकवाल ब्राम्हण,

(15) गोमित्र ब्राम्हण,

(16) दायमा ब्राम्हण,

(17) सारस्वत ब्राम्हण,

(18) मैथल ब्राम्हण,

(19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण,

(20) उत्कल ब्राम्हण,

(21) सरवरिया ब्राम्हण,

(22) पराशर ब्राम्हण,

(23) सनोडिया या सनाड्य,

(24)मित्र गौड़ ब्राम्हण,

(25) कपिल ब्राम्हण,

(26) तलाजिये ब्राम्हण,

(27) खेटुवे ब्राम्हण,

(28) नारदी ब्राम्हण,

(29) चन्द्रसर ब्राम्हण,

(30)वलादरे ब्राम्हण,

(31) गयावाल ब्राम्हण,

(32) ओडये ब्राम्हण,

(33) आभीर ब्राम्हण,

(34) पल्लीवास ब्राम्हण,

(35) लेटवास ब्राम्हण,

(36) सोमपुरा ब्राम्हण,

(37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण,

(38) नदोर्या ब्राम्हण,

(39) भारती ब्राम्हण,

(40) पुश्करर्णी ब्राम्हण,

(41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण,

(42) भार्गव ब्राम्हण,

(43) नार्मदीय ब्राम्हण,

(44) नन्दवाण ब्राम्हण,

(45) मैत्रयणी ब्राम्हण,

(46) अभिल्ल ब्राम्हण,

(47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण,

(48) टोलक ब्राम्हण,

(49) श्रीमाली ब्राम्हण,

(50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण,

(51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण 

(52) तांगड़ ब्राम्हण,

(53) सिंध ब्राम्हण,

(54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण,

(55) इग्यर्शण ब्राम्हण,

(56) धनोजा म्होड ब्राम्हण,

(57) गौभुज ब्राम्हण,

(58) अट्टालजर ब्राम्हण,

(59) मधुकर ब्राम्हण,

(60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण,

(61) खड़ायते ब्राम्हण,

(62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण,

(63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण,

(64) लाढवनिये ब्राम्हण,

(65) झारोला ब्राम्हण,

(66) अंतरदेवी ब्राम्हण,

(67) गालव ब्राम्हण,

(68) गिरनारे ब्राम्हण


#ब्राह्मण_गौत्र_और_गौत्र_कारक_115_ऋषि 🚩


(1). अत्रि, (2). भृगु, (3). आंगिरस, (4). मुद्गल, (5). पातंजलि, (6). कौशिक,(7). मरीच, (8). च्यवन, (9). पुलह, (10). आष्टिषेण, (11). उत्पत्ति शाखा, (12). गौतम गोत्र,(13). वशिष्ठ और संतान (13.1). पर वशिष्ठ, (13.2). अपर वशिष्ठ, (13.3). उत्तर वशिष्ठ, (13.4). पूर्व वशिष्ठ, (13.5). दिवा वशिष्ठ, (14). वात्स्यायन,(15). बुधायन, (16). माध्यन्दिनी, (17). अज, (18). वामदेव, (19). शांकृत्य, (20). आप्लवान, (21). सौकालीन, (22). सोपायन, (23). गर्ग, (24). सोपर्णि, (25). शाखा, (26). मैत्रेय, (27). पराशर, (28). अंगिरा, (29). क्रतु, (30. अधमर्षण, (31). बुधायन, (32). आष्टायन कौशिक, (33). अग्निवेष भारद्वाज, (34). कौण्डिन्य, (34). मित्रवरुण,(36). कपिल, (37). शक्ति, (38). पौलस्त्य, (39). दक्ष, (40). सांख्यायन कौशिक, (41). जमदग्नि, (42). कृष्णात्रेय, (43). भार्गव, (44). हारीत, (45). धनञ्जय, (46). पाराशर, (47). आत्रेय, (48). पुलस्त्य, (49). भारद्वाज, (50). कुत्स, (51). शांडिल्य, (52). भरद्वाज, (53). कौत्स, (54). कर्दम, (55). पाणिनि गोत्र, (56). वत्स, (57). विश्वामित्र, (58). अगस्त्य, (59). कुश, (60). जमदग्नि कौशिक, (61). कुशिक, (62). देवराज गोत्र, (63). धृत कौशिक गोत्र, (64). किंडव गोत्र, (65). कर्ण, (66). जातुकर्ण, (67). काश्यप, (68). गोभिल, (69). कश्यप, (70). सुनक, (71). शाखाएं, (72). कल्पिष, (73). मनु, (74). माण्डब्य, (75). अम्बरीष, (76). उपलभ्य, (77). व्याघ्रपाद, (78). जावाल, (79). धौम्य, (80). यागवल्क्य, (81). और्व, (82). दृढ़, (83). उद्वाह, (84). रोहित, (85). सुपर्ण, (86). गालिब, (87). वशिष्ठ, (88). मार्कण्डेय, (89). अनावृक, (90). आपस्तम्ब, (91). उत्पत्ति शाखा, (92). यास्क, (93). वीतहब्य, (94). वासुकि, (95). दालभ्य, (96). आयास्य, (97). लौंगाक्षि, (98). चित्र, (99). विष्णु, (100). शौनक, (101).पंचशाखा, (102).सावर्णि, (103).कात्यायन, (104).कंचन, (105).अलम्पायन, (106).अव्यय, (107).विल्च, (108). शांकल्य, (109). उद्दालक, (110). जैमिनी, (111). उपमन्यु, (112). उतथ्य, (113). आसुरि, (114). अनूप और (110). आश्वलायन।


कुल संख्या 108 ही हैं, लेकिन इनकी छोटी-छोटी 7 शाखा और हुई हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर इनकी पूरी सँख्या 115 है।


💥 #ब्राह्मण_कुल_परम्परा_के_11_कारक 🚩


🔸(1) गोत्र 👉 व्यक्ति की वंश-परम्परा जहाँ और से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। इन गोत्रों के मूल ऋषि :– विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप। इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भरद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। 


🔸(2) प्रवर 👉 अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हैं। अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए, वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें। इसका अर्थ है कि कुल परम्परा में गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे।


(🔸3) वेद 👉 वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने लाभ किया है। इनको सुनकर कंठस्थ किया जाता है। इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता गया, इससे उनके पूर्व पुरूष जिस वेद ज्ञाता थे, तदनुसार वेदाभ्‍यासी कहलाते हैं। प्रत्येक का अपना एक विशिष्ट वेद होता है, जिसे वह अध्ययन-अध्यापन करता है। इस परम्परा के अन्तर्गत जातक, चतुर्वेदी, त्रिवेदी, द्विवेदी आदि कहलाते हैं। 


🔸(4) उपवेद 👉 प्रत्येक वेद से सम्बद्ध विशिष्ट उपवेद का भी ज्ञान होना चाहिये। 


🔸(5) शाखा 👉 वेदों के विस्तार के साथ ऋषियों ने प्रत्येक एक गोत्र के लिए एक वेद के अध्ययन की परंपरा डाली है। कालान्तर में जब एक व्यक्ति उसके गोत्र के लिए निर्धारित वेद पढने में असमर्थ हो जाता था, तो ऋषियों ने वैदिक परम्परा को जीवित रखने के लिए शाखाओं का निर्माण किया। इस प्रकार से प्रत्येक गोत्र के लिए अपने वेद की उस शाखा का पूर्ण अध्ययन करना आवश्यक कर दिया। इस प्रकार से उन्‍होंने जिसका अध्‍ययन किया, वह उस वेद की शाखा के नाम से पहचाना गया।


🔸6) सूत्र 👉 प्रत्येक वेद के अपने 2 प्रकार के सूत्र हैं। श्रौत सूत्र और ग्राह्य सूत्र यथा शुक्ल यजुर्वेद का कात्यायन श्रौत सूत्र और पारस्कर ग्राह्य सूत्र है।


🔸(7) छन्द 👉 उक्तानुसार ही प्रत्येक ब्राह्मण को अपने परम्परा सम्मत छन्द का भी ज्ञान होना चाहिए।


🔸(8) शिखा 👉 अपनी कुल परम्परा के अनुरूप शिखा-चुटिया को दक्षिणावर्त अथवा वामावार्त्त रूप से बाँधने की परम्परा शिखा कहलाती है।


🔸(9) पाद 👉 अपने-अपने गोत्रानुसार लोग अपना पाद प्रक्षालन करते हैं। ये भी अपनी एक पहचान बनाने के लिए ही, बनाया गया एक नियम है। अपने-अपने गोत्र के अनुसार ब्राह्मण लोग पहले अपना बायाँ पैर धोते, तो किसी गोत्र के लोग पहले अपना दायाँ पैर धोते, इसे ही पाद कहते हैं।


🔸(10) देवता 👉 प्रत्येक वेद या शाखा का पठन, पाठन करने वाले किसी विशेष देव की आराधना करते हैं, वही उनका कुल देवता यथा भगवान् विष्णु, भगवान् शिव, माँ दुर्गा, भगवान् सूर्य इत्यादि देवों में से कोई एक आराध्‍य देव हैं। 


🔸(11) द्वार 👉 यज्ञ मण्डप में अध्वर्यु (यज्ञकर्त्ता) जिस दिशा अथवा द्वार से प्रवेश करता है अथवा जिस दिशा में बैठता है, वही उस गोत्र वालों की द्वार या दिशा कही जाती है।


सभी ब्राह्मण बंधुओ को मेरा नमस्कार बहुत दुर्लभ जानकारी है जरूर पढ़े। और समाज में सेयर करे हम क्या है इस तरह ब्राह्मणों की उत्पत्ति और इतिहास के साथ इनका विस्तार अलग अलग राज्यो में हुआ और ये उस राज्य के ब्राह्मण कहलाये।

ब्राह्मण बिना धरती की कल्पना ही नहीं की जा सकती इसलिए ब्राह्मण होने पर गर्व करो और अपने कर्म और धर्म का पालन कर सनातन संस्कृति की रक्षा करें।


गोत्र क्या है..? जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?

आज से लगभग ढाई वर्ष पूर्व किसी Facebook User ने हमसे प्रश्न किया था की यदि माता-पिता में से पिता विधर्मी (अलग धर्म से) हो तो संतानों का गोत्र क्या होगा ?


इस प्रश्न ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और मैंने इसका विस्तृत व्याख्यात्मक उत्तर दिया था । वो तो अब मुझसे संपर्क में हैं नहीं किन्तु उसका प्रश्न वर्तमान परिप्रेक्ष्य में परम् प्रासंगिक हैं ।


मुझे घोर आश्चर्य तब होता हैं जब सनातन धर्मानुयायियों को इतने गम्भीर तकनीकी प्रश्न पर निरुत्तर पाता हूँ । 

गोत्र मानवमात्र का होता हैं ; चाहे उसकी मान्यता गोत्रों में हो या चाहे न हो , चाहे वो सनातन धर्मानुयायी हो या न हो । आज इस लेख के माध्यम से मैं “गोत्र” इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न करेंगे! 


#सुविधा एवम् सरलता की दृष्टि से पोस्ट को मैंने दो भागों में बांटा है :-


🔸1) गोत्र होते क्या हैं ?

🔸2) जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ? 


🔘1. गोत्र क्या हैं ?

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गोत्र मोटे तौर पर उन लोगों के समूह को कहते हैं जिनका वंश एक मूल पुरुष पूर्वज से अटूट क्रम में जुड़ा है । गोत्र जिसका अर्थ वंश भी है , यह एक ऋषि के माध्यम से शुरू होता है और हमें हमारे पूर्वजों की याद दिलाता है और हमें हमारे कर्तव्यों के बारे में बताता है । व्याकरण के प्रयोजनों के लिये पाणिनि में गोत्र की परिभाषा है 'अपात्यम पौत्रप्रभ्रति गोत्रम्' (४.१.१६२), अर्थात 'गोत्र शब्द का अर्थ है बेटे के बेटे के साथ शुरू होने वाली (एक ऋषि की) संतान् । गोत्र, कुल या वंश की संज्ञा है जो उसके किसी मूल पुरुष के अनुसार होती है ।


महाभारत के शान्तिपर्व (296-17, 18) में वर्णन है कि मूल चार गोत्र थे ; अंगिरा , कश्यप , वशिष्ठ और भृगु । बाद में आठ हो गए जब जमदन्गि, अत्रि, विश्वामित्र तथा अगस्त्य के नाम जुड़ गए । एक अन्य मान्यता है कि प्रारंभ में सात गोत्र थे कालांतर में दूसरे ऋषियों के सानिध्य के कारण अन्य गोत्र अस्तित्व में आये ।


#मेरे_विचार :- एक मान्यता के अनुसार सात पीढ़ी बाद सगापन खत्म हो जाता है अर्थात सात पीढ़ी बाद गोत्र का मान बदल जाता है और आठवी पीढ़ी के पुरुष के नाम से नया गोत्र आरम्भ होता है (हम इस मान्यता के प्रबल समर्थक हैं) । हम गोत्र को Scientific व्यवस्था मानते हैं एवम् जीवन के (और जीवन के बाद भी) प्रत्येक क्षेत्र में “गोत्रों” का व्यापक महत्त्व स्वीकार करते हैं ।


व्यावहारिक रूप में "गोत्र" से आशय पहचान से है , जो ब्राह्मणों के लिए उनके ऋषिकुल से होती है ।


🔘2. जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?

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प्रत्येक मानव का गोत्र होता हैं , गोत्र एक Scientific व्यवस्था हैं । हिन्दू , मुस्लिम , ईसाई , अधर्मी , विधर्मी इन सबके गोत्र होते हैं – चाहे माने या न माने । कल्पना कीजिए एक बच्चा जिसे अपने माता-पिता के विषय में कुछ नहीं मालूम , उसका क्या होगा ?

उसे “कश्यप गोत्रीय” अर्थात “कश्यप गोत्र” का माना जाएगा ।

इसकी शास्त्रोक्त व्यवस्था देखिए :-


“गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते।

यस्मादाह श्रुतिस्सर्वाः प्रजाः कश्यपसंभवाः।।“ (हेमाद्रि चन्द्रिका)


जिसका गोत्र अज्ञात हो उसे “कश्यप गोत्रीय" (कश्यप गोत्र का) माना जाएगा और यह एक शास्त्र सम्मत व्यवस्था है अर्थात् पूर्णतः निर्दोष व्यवस्था है।

सनातन संस्कृति विज्ञान 

जीवन व्यर्थ क्यों

किसी ने कहा _जीवन व्यर्थ क्यों मालूम होता है.....?

🌹

मैंने कहा _ जीवन तो कोरा कागज है; 

जो लिखोगे वही पढ़ोगे...। 

गालियां लिख सकते हो, गीत लिख सकते हो...। 

और गालियां भी उसी वर्णमाला से बनती हैं 

जिससे गीत बनते हैं; 

वर्णमाला तो निरपेक्ष है, निष्पक्ष है...। 

जिस कागज पर लिखते हो

 वह भी निरपेक्ष, निष्पक्ष....। 

जिस कलम से लिखते हो,

 वह भी निरपेक्ष, वह भी निष्पक्ष...। 

सब दांव तुम्हारे हाथ में है....। 

तुमने इस ढंग से जीया होगा, 

इसलिए व्यर्थ मालूम होता है....। 

तुम्हारे जीने में भूल है...। 

और जीवन को गाली मत देना.......।

🌹

यह बड़े मजे की बात है...! लोग कहते हैं, 

जीवन व्यर्थ है....।

यह नहीं कहते कि हमारे जीने का ढंग व्यर्थ है...! 

और तुम्हारे तथाकथित मित्र_मैत्रीण,

 रिश्तेदार भी तुमको यही समझाते हैं--

जीवन व्यर्थ है.....।

🌹

मैं तुमसे कुछ और कहना चाहता हूं.....। 

मैं कहना चाहता हूं: 

जीवन न तो सार्थक है, 

न व्यर्थ; 

जीवन तो निष्पक्ष है; 

जीवन तो कोरा आकाश है...। 

उठाओ तूलिका, भरो रंग....। 

चाहो तो इंद्रधनुष बनाओ और 

चाहो तो कीचड़ मचा दो...। 

कुशलता चाहिए.....।

विश्वास चाहिए...!

नजरिया चाहिए..!

 अगर जीवन व्यर्थ है तो 

उसका अर्थ यह है कि तुमने जीवन को 

जीने की कला नहीं सीखाई; 

उसका अर्थ है कि तुम यह मान कर चले थे कि 

जीवन है तो इसमें सबकुछ रेडीमेड मिलेगा.....।

🌹

जीवन कोई रेडीमेड कपड़े नहीं है, 

कोई रेमंड की दुकान नहीं है, कि गए

 और तैयार कपड़े मिल गए....। 

जिंदगी से कपड़े बनाने पड़ते हैं...। 

फिर जो बनाओगे वही पहनना पड़ेगा, 

वही ओढ़ना पड़ेगा.....। 

और कोई दूसरा तुम्हारी जिंदगी में 

कुछ भी नहीं कर सकता....। 

कोई दूसरा तुम्हारे कपड़े नहीं बना सकता....। 

जिंदगी के मामले में तो 

अपने कपड़े खुद ही बनाने होते हैं....।

🌹

जीवन व्यर्थ है, ऐसा मत कहो...।

 ऐसा कहो कि

 मेरे जीने के ढंग में क्या कहीं कोई भूल थी....? 

क्या कहीं कोई भूल मेरे हाथों हों रही है कि 

मेरा जीवन व्यर्थ हुआ जा रहा है.....?

🌹

तुम्हारा जीवन तो व्यर्थ नहीं....। 

मेरा जीवन भी तो व्यर्थ नहीं.....। 

तो जीवन कैसे व्यर्थ होगा......?

 कैसा अर्थ खिला....! कैसे फूल...! 

कैसी सुवास उड़ी....! कैसे गीत जगे.....! 

कैसी मृदंग बजी.....! 

लेकिन कुछ लोग हैं कि

 जिनके जीवन में सिर्फ दुर्गंध है.....। 

और सोचनेवाली बात है कि 

तुम ऐसे लोगों की संगत में रहकर

 जीवन में दुर्गंध बढ़ा रहे हो...

वही सुगंध बन सकती है--

जरा सी कला से, जीने की कला से....!

🌹

मैं प्रेम को जीने की कला कहता हूं....। 

प्रेम कोई पूजा-पाठ नहीं है.....।

प्रेम का मंदिर और मस्जिद से कुछ लेना-देना नहीं है....।

प्रेम तो है जीवन की कला.....।

 जीवन को ऐसे जीया जा सकता है--

ऐसे कलात्मक ढंग से, ऐसे प्रसादपूर्ण ढंग से--कि 

तुम्हारे जीवन में हजार पंखुरियों वाला कमल खिले...!,

 कि तुम्हारे जीवन में समाधि लगे....! 

कि तुम्हारे जीवन में भी ऐसे गीत उठें

जैसे कोयल के.....!

कि तुम्हारे भीतर भी हृदय में

 ऐसी-ऐसी भाव-भंगिमाएं जगें,

 जो भाव-भंगिमाएं प्रकट हो जाएं तो 

उपनिषद बनते हैं.....!

जो भाव-भंगिमाएं अगर प्रकट हो जाएं 

तो मीरा का नृत्य पैदा होता है...!

चैतन्य के भजन बनते हैं......!

🌹

इसी पृथ्वी पर, इसी देह में, 

ऐसी ही हड्डी-मांस-मज्जा के लोग 

ऐसा-ऐसा सार्थक जीवन जी गए--

जो आज भी दुसरे के जीवन को

प्रेरणा दे रहे हैं....!


और तुम कहते हो____ 

जीवन व्यर्थ क्यों मालूम होता है.......?

🌹

अभाव

 अभाव : मनुष्य के भीतर का खाली कोना"


हर इंसान के भीतर एक कोना होता है 

जो भरा नहीं होता,

जो अधूरा होता है,

जो चुपचाप भीतर बैठा रहता है।


किसी के भीतर धन का अभाव है,

किसी के भीतर रिश्तों का,

किसी के भीतर पहचान का,

किसी के भीतर प्रेम का,

और किसी के भीतर शांति का।


यह अभाव बाहर से दिखाई नहीं देता,

पर यही वो चीज़ है

जो इंसान को रातों की नींद से उठाता है,

दिन भर दौड़ाता है,

और कभी-कभी तोड़ भी देता है।


गरीब अमीर बनना चाहता है,

अमीर चैन ढूँढता है।

युवा नौकरी चाहता है,

नौकरी वाला अर्थ ढूँढता है।

पति चाहता है कि पत्नी उसे सुने,

पत्नी चाहती है कि पति उसे समझे।


हर चाहत की जड़ में एक ही चीज़ है.... अभाव।


अभाव की जड़ कहाँ से शुरू होती है?


अभाव बाहर से नहीं आता,

अभाव पैदा होता है तुलना से।


बचपन में:


“देखो फ़लना का बेटा”


“तुम उससे कम क्यों हो?”


“तुम्हें ऐसा होना चाहिए”


यहीं पहली दरार पड़ती है।


फिर समाज:


पैसा = सफलता


शादी = पूर्णता


पद = सम्मान


मन धीरे-धीरे सीख लेता है कि


 “मैं जैसा हूँ, वैसा पर्याप्त नहीं हूँ।”


यहीं से अभाव जन्म लेता है।


असल में अभाव किसी चीज़ की कमी नहीं,

बल्कि अपने होने को नकारने की आदत है।


अभाव कैसे जीवन को नियंत्रित करता है?


अभाव इंसान को मजबूर करता है।


वही नौकरी करता है जो पसंद नहीं


वही रिश्ता निभाता है जिसमें घुटन है


वही जीवन जीता है जिसमें आत्मा शामिल नहीं


क्योंकि भीतर एक आवाज़ कहती रहती है...


“कुछ कमी है… कुछ कमी है…”


इसी कमी को भरने के लिए इंसान:


धर्म बदलता है


गुरु बदलता है


देश बदलता है


पद्धतियाँ बदलता है


और हर जगह जल्दी समाधान चाहता है।


अगर समाधान नहीं मिला,

तो वह उस सिस्टम को दोष देता है।


लेकिन कोई नहीं पूछता....

“क्या समस्या बाहर है, या भीतर?”


अभाव क्यों कभी पूरी तरह भरता नहीं?


क्योंकि हम गलत जगह भरने की कोशिश करते हैं।


हम सोचते हैं:


पैसा आएगा तो चैन मिलेगा


रिश्ता मिलेगा तो शांति मिलेगी


पहचान मिलेगी तो सुकून मिलेगा


लेकिन जब वो सब मिल जाता है,

तो नया अभाव पैदा हो जाता है।


क्योंकि

अभाव चीज़ों से नहीं, चेतना से जुड़ा है।


अब ध्यान विधि....बिल्कुल अलग, बिल्कुल नई


यह ध्यान कोई नियम नहीं है।

कोई मंत्र नहीं।

कोई मुद्रा नहीं।

कोई गुरु नहीं।


यह अपने शरीर से दोस्ती करने की विधि है।


चरण 1: हाथों को महसूस करना


शांत बैठिए या लेटिए।

अपनी दोनों हथेलियों को

धीरे-धीरे आपस में रगड़िए।


अब रुक जाइए।


ध्यान दीजिए...


गर्माहट


झुनझुनी


कंपन


कुछ भी बदलने की कोशिश मत कीजिए।

बस महसूस कीजिए।


यहीं से मन वर्तमान में आता है।


चरण 2: अपने बालों को सहलाना


अब अपने ही हाथों से

अपने बालों को बहुत धीरे-धीरे सहलाइए।


जैसे कोई माँ

अपने बच्चे को सुला रही हो।


यह क्रिया शरीर को संदेश देती है...


“तू सुरक्षित है।”


अभाव का सबसे बड़ा कारण है....

असुरक्षा।


यह चरण उसी को पिघलाता है।


चरण 3: छाती और पेट पर हाथ


एक हाथ छाती पर,

एक हाथ पेट पर।


सांस को बदलना नहीं है।

बस देखना है।


हर सांस के साथ

अपने भीतर की खाली जगह को महसूस करें।


उससे भागिए मत।

उसे भरने की कोशिश मत कीजिए।


बस कहिए....


“हाँ, तुम यहाँ हो… और ठीक हो।”


चरण 4: अभाव से मित्रता


अब अपने भीतर पूछिए:


“तुम क्या चाहते हो?”


“तुम कब से यहाँ हो?”


“तुम मुझे क्या सिखाना चाहते हो?”


कोई उत्तर आए या न आए 

दोनों सही हैं।


क्योंकि यहाँ लक्ष्य उत्तर नहीं,

स्वीकृति है।


"इस ध्यान का सार"


जब आप अपने अभाव को

दुश्मन नहीं,

गुरु मान लेते हैं...


तो वह आपको दौड़ाना बंद कर देता है।


अभाव तब भी रहेगा,

लेकिन वह ज़हर नहीं बनेगा।


और मज़े की बात जब अभाव स्वीकार हो जाता है,

तो आधा भर जाता है।


धनवान शांति खोजता है

क्योंकि उसके भीतर भी

एक कोना खाली है।


जिस दिन इंसान

अपने उस खाली कोने के साथ

बैठना सीख लेता है 


उस दिन

उसे कहीं जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।


मेरी शांति या खुशी

 “मेरी शांति या खुशी देखी ही नहीं जाती कि ये मेरे बिना खुश कैसे है”


1. इस वाक्य के पीछे छुपा हुआ सच


जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि “ये मेरे बिना खुश कैसे है”, तो असल में वह यह नहीं कह रहा होता कि सामने वाला खुश है।

वह यह कह रहा होता है कि....


मैंने जिस रिश्ते में सब कुछ दिया, वहाँ मेरी क़द्र क्यों नहीं हुई?


अगर मैं दुखी हूँ, तो दूसरा चैन से कैसे जी सकता है?


क्या मेरी अहमियत इतनी कम थी कि मेरे बिना भी जीवन चल गया?


यह भाव प्रेम का नहीं, अधिकारबोध और असुरक्षा का संकेत है।


2. पति–पत्नी के रिश्ते में यह भावना कैसे जन्म लेती है?


उदाहरण 1: पत्नी की नज़र से


एक पत्नी जिसने


घर छोड़ा


करियर रोका


ससुराल और पति को प्राथमिकता दी


जब वह देखती है कि पति


दोस्तों के साथ हँस रहा है


सोशल मीडिया पर मुस्कुरा रहा है


उसके दर्द के बिना भी “सामान्य” दिख रहा है


तो उसके मन में यह सवाल उठता है:

“मेरे टूटने से इसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा?”


यहीं से जलन नहीं, अपमान की पीड़ा जन्म लेती है।


उदाहरण 2: पति की नज़र से


एक पति जिसने


जिम्मेदारियों में खुद को घिस दिया


भावनाएँ दबा लीं


पत्नी के लिए अपने शौक छोड़े


जब वह देखता है कि पत्नी.....


मायके में या दोस्तों के बीच खुश है


हँस रही है, सज रही है


उसके बिना भी ज़िंदगी जी रही है


तो भीतर एक टीस उठती है:

“क्या मैं इतना गैरज़रूरी था?”


3. असल समस्या: खुशी नहीं, तुलना है


यहाँ समस्या यह नहीं कि दूसरा खुश है।

समस्या यह है कि....

“मैं दुखी हूँ, तो तुम कैसे खुश हो सकते हो?”


यह सोच रिश्ते को प्रेम से हटाकर हिसाब–किताब में बदल देती है।


पति–पत्नी का रिश्ता जब प्रेम से हटकर

अहं + अधिकार + अपेक्षा बन जाता है,

तब एक की खुशी दूसरे के लिए ज़हर बन जाती है।


4. क्या वाकई दूसरा खुश होता है?


बहुत बार जो खुशी दिखाई देती है, वह..


समाज को दिखाने की मजबूरी


खुद को साबित करने की कोशिश


दर्द से भागने का तरीका


होती है।


पति मुस्कुरा रहा है, इसका मतलब यह नहीं कि उसे खालीपन नहीं।

पत्नी हँस रही है, इसका मतलब यह नहीं कि वह टूटी नहीं।


पर क्योंकि हम अपने दर्द में डूबे होते हैं,

हमें सिर्फ सामने वाले की “मुस्कान” दिखती है,

उसके पीछे का संघर्ष नहीं।


5. यह भावना रिश्ते को कहाँ ले जाती है?


जब हम यह सोचते रहते हैं कि....


“इसे मेरी खुशी नहीं देखी जाती”


“इसे मेरे बिना खुश नहीं होना चाहिए”


तो धीरे–धीरे.....


प्रेम.... नियंत्रण बन जाता है


चाह.... ज़िद बन जाती है


रिश्ता... युद्ध बन जाता है


और अंत में दोनों हार जाते हैं।


6. इसका उपचार क्या है? 


प्रश्न 1: क्या दूसरे की खुशी से मेरा दर्द कम हो सकता है?


उत्तर:

नहीं।

आपका दर्द सिर्फ आपकी स्वीकृति और आत्मसम्मान से कम होगा।


प्रश्न 2: क्या मुझे यह साबित करना चाहिए कि मैं भी खुश हूँ?


उत्तर:

नाटक से नहीं,

वास्तविक आत्म-निर्माण से।


प्रश्न 3: क्या रिश्ते में त्याग व्यर्थ चला गया?


उत्तर:

नहीं।

त्याग व्यर्थ नहीं होता,

पर अगर उसका मूल्यांकन सामने वाले से अपेक्षित है,

तो वह त्याग नहीं, सौदा बन जाता है।


7. असली शांति कहाँ है?


असली शांति वहाँ है जहाँ आप यह स्वीकार कर लें कि...

 “दूसरे की खुशी या दुख मेरे मूल्य को तय नहीं करता।”


जिस दिन पति यह समझ लेता है कि पत्नी के बिना भी उसका अस्तित्व है,

और पत्नी यह समझ लेती है कि पति की बेरुख़ी उसके मूल्य को कम नहीं करती,


उसी दिन दोनों मुक्त होते हैं।


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जो सच में खुश होता है, उसे यह देखने की ज़रूरत नहीं होती कि

दूसरा मेरे बिना खुश है या नहीं।


और जो भीतर से टूटा होता है, उसे दूसरे की हँसी भी चुभती है।

मानव अनुभव

मानव अनुभव को अक्सर टुकड़ों में बाँटकर समझा जाता है देह को अलग, मन को अलग और चेतना को अलग मान लिया जाता है। जबकि जीवन स्वयं कभी खंडित नहीं होता। आकर्षण, अंतरंगता और ध्यान एक ही ऊर्जा की भिन्न अवस्थाएँ हैं। अंतर केवल देखने के तरीके का है।


जिस क्षण एक व्यक्ति दूसरे की ओर खिंचता है, उसी क्षण एक सूक्ष्म संवाद आरंभ हो जाता है। यह संवाद शब्दों का नहीं होता, बल्कि कंपन और अनुभूति का होता है। अधिकतर लोग इसे केवल शारीरिक प्रतिक्रिया मानकर छोड़ देते हैं, पर वास्तव में यह स्वयं से बाहर निकलकर स्वयं को ही और व्यापक रूप में अनुभव करने की प्रक्रिया है।


यदि अंतरंगता बिना जागरूकता के घटे, तो वह क्षण भर की तृप्ति बनकर समाप्त हो जाती है। पर जब वही अनुभव पूर्ण उपस्थिति में घटित होता है, तब वह साधना का रूप ले लेता है। उस समय मन न अतीत में भटकता है, न भविष्य की कल्पना करता है। वह पूरी तरह अभी में ठहरा होता है। यही ठहराव भीतर की शांति का द्वार खोलता है।


ध्यान को प्रायः एकांत और निष्क्रियता से जोड़ दिया जाता है, जबकि वास्तविकता में वह एक आंतरिक अवस्था है जहाँ व्यक्ति जो कर रहा है, उसमें पूरी तरह उपस्थित होता है। यदि यही उपस्थिति अंतरंग क्षणों में उतर आए, तो वहाँ अव्यवस्था नहीं रहती। चाहत तब अंधी नहीं होती, वह सजग हो जाती है।


ऐसी अवस्था में “मैं” और “दूसरा” की सीमाएँ ढीली पड़ने लगती हैं। अहं का केंद्र कमजोर होता है, और व्यक्ति स्वयं को किसी बड़े प्रवाह में विलीन होता हुआ महसूस करता है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव होता है जहाँ अलगाव पिघलने लगता है।


यह अनुभव बताता है कि शरीर कोई बाधा नहीं, बल्कि प्रवेश-द्वार है। ऊर्जा यदि केवल सतह पर ही खर्च न होकर भीतर की ओर प्रवाहित होने लगे, तो वही ऊर्जा स्पष्टता, संतुलन और करुणा में बदल जाती है। तब आकर्षण विचलन नहीं बनता, बल्कि जागरण का माध्यम बन जाता है।


समस्या तब जन्म लेती है जब भय के कारण इस ऊर्जा को दबाने की कोशिश की जाती है। दबाव से समझ पैदा नहीं होती, केवल उलझन बढ़ती है। जागरूकता दमन नहीं सिखाती, वह रूपांतरण सिखाती है। वही शक्ति जो व्यक्ति को गिरा सकती है, वही उसे ऊपर भी उठा सकती है यदि उसे देखा और समझा जाए।


जीवन का मर्म त्याग में नहीं, बल्कि होश में छिपा है। जब आकर्षण चेतना से जुड़ता है और अंतरंगता मौन में उतरती है, तब संबंध बोझ नहीं रहते। वे भीतर की यात्रा के चरण बन जाते हैं।


"यहीं अनुभव विचार में नहीं रुकता वह स्वयं सत्य बन जाता है।"


Saturday, January 31, 2026

सम्भोग: दमन, ऊर्जा और मनुष्य होने का सत्य

 सम्भोग: दमन, ऊर्जा और मनुष्य होने का सत्य


मनुष्य का इतिहास अजीब है।

वह जिस प्रक्रिया से जन्म लेता है,

उसी प्रक्रिया पर बोलते हुए संकोच करता है।

जिस ऊर्जा से जीवन बहता है,

उसी ऊर्जा से वह डरता है।


सम्भोग....

जिसे हमने वर्जना बना दिया,

असल में जीवन की मूल धड़कन है।


1. परम्परा के पीछे छिपा भय


अक्सर कहा जाता है...

“हमारी संस्कृति में यह सब नहीं बोला जाता।”


पर यह संस्कृति नहीं,

डर की परम्परा है।


डर इस बात का कि


कहीं नियंत्रण न टूट जाए


कहीं इच्छाएँ सवाल न पूछने लगें


कहीं मनुष्य अपने भीतर झाँक न ले


सम्भोग पर चुप्पी इसलिए नहीं थोपी गई

कि वह अशुद्ध है,

बल्कि इसलिए कि वह अत्यधिक जीवंत है।


और जो अत्यधिक जीवंत होता है,

वह सत्ता, समाज और ढाँचे को असहज करता है।


2. दमन: ऊर्जा का सबसे खतरनाक रूप


ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती

वह केवल रूप बदलती है।


जब सम्भोग की ऊर्जा को


समझ नहीं मिलती


संवाद नहीं मिलता


स्वीकृति नहीं मिलती


तो वह....


कुंठा बनती है


अपराधबोध बनती है


और अंततः विस्फोट बन जाती है।


यह कोई नैतिक सिद्धांत नहीं,

यह प्रकृति का नियम है।


जैसे....

नदी को बहने दो, तो वह जीवन देती है।

उसे बाँध दो, तो वह बाढ़ बन जाती है।


हमारे समाज ने

नदी नहीं बहने दी,

फिर बाढ़ से डरने लगे।


3. सम्भोग: केवल शरीर नहीं, चेतना की घटना


सम्भोग को केवल शारीरिक क्रिया मानना

उसके साथ सबसे बड़ा अन्याय है।


सम्भोग वह क्षण है

जहाँ मनुष्य


अपने “मैं” को ढीला करता है


नियंत्रण छोड़ता है


और क्षणभर को ही सही,

स्वयं से बाहर निकलता है


दार्शनिक इसे

लघु-मृत्यु कहते हैं....

जहाँ अहंकार टूटता है

और शून्य झलकता है।


इसीलिए सम्भोग

डर पैदा करता है।

क्योंकि जो व्यक्ति

अपने अहं से मुक्त होना सीख ले,

उसे बाँधना कठिन हो जाता है।


4. चरित्र का भ्रम और मौन की हिंसा


हमने चरित्र को

दमन से जोड़ दिया है।


जो जितना चुप,

उतना “अच्छा”।


पर सच्चा चरित्र

चुप्पी से नहीं,

जागरूकता से बनता है।


जो अपनी इच्छा को


देख सकता है


समझ सकता है


और दिशा दे सकता है


वही चरित्रवान है।


पर जो इच्छा से भागता है,

वही अंततः

उसका शिकार बनता है।


सम्भोग पर मौन

सबसे हिंसक शिक्षा है

क्योंकि जो समझाया नहीं जाता,

वह अंधेरे में सीख लिया जाता है।


5. आंतरिक ब्रह्माण्ड और सृजन


हर मनुष्य के भीतर

एक ब्रह्माण्ड है

इच्छाओं का, कल्पनाओं का, ऊर्जा का।


वही ऊर्जा

जीवन को जन्म देती है

और वही ऊर्जा

जीवन को अर्थ देती है


जब इस ऊर्जा को


प्रेम


संवेदनशीलता


और समझ मिलती है


तो वही

कला बनती है,

करुणा बनती है,

सृजन बनती है।


और जब वही ऊर्जा

डर और अपराधबोध में पलती है,

तो वह

हिंसा और विनाश बन जाती है।


6. स्वीकृति


सम्भोग को

न देवता बनाना है,

न दानव।


उसे बस

मानव अनुभव की तरह स्वीकारना है।


संवाद से,

शिक्षा से,

और चेतना से।


क्योंकि

सम्भोग समस्या नहीं,

समस्या है उसका इनकार।


सम्भोग जीवन के विरुद्ध नहीं,

जीवन का प्रमाण है।


उसे दबाने से

पवित्रता नहीं आती,

केवल विस्फोट टलता है।


और जो विस्फोट

समय पर नहीं होता,

वह अधिक तबाही लाता है।


जो ऊर्जा समझ के साथ बहती है

वह संसार रचती है

और जो ऊर्जा डर में दबती है

वह संसार जला देती है।


यह लेख सम्भोग का पक्ष नहीं लेता

यह मनुष्य के पक्ष में खड़ा होता है।


हमारे जीवन में संबंध महत्वपूर्ण हैं

 जब संबंध थकान और दर्द लाए खुद को बचाने का मार्ग


हमारे जीवन में संबंध महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे केवल साथ रहने तक सीमित नहीं होते वे हमारी भावनाओं, समझ और सम्मान की गहराई से जुड़े होते हैं। लेकिन कभी-कभी हम अपने प्रयासों और प्रेम के बावजूद दूसरों से वही समझ और समर्थन नहीं पाते जिसकी हमें आवश्यकता है। ऐसे समय में यह केवल संबंध की समस्या नहीं होती, बल्कि हमारी मानसिक और भावनात्मक ऊर्जा पर भारी बोझ बन जाती है।


1. शब्दों का खेल और भीतर की चुप्पी


कई बार हम बातें करते हैं, लेकिन लगता है कि सामने वाला केवल अपनी ही बात पर अड़ा है। इस स्थिति में संवाद होने का भ्रम उत्पन्न होता है बाहर से सब ठीक लगता है, पर भीतर मन खाली और थका हुआ महसूस करता है।


उदाहरण:

सोचिए आप अपने मित्र को अपने मन की बात समझाने की कोशिश कर रहे हैं। आप धीरे-धीरे अपनी भावनाओं को साझा करते हैं, पर वह बार-बार अपनी ही राय कहता है और आपकी बात पर ध्यान नहीं देता। बाहर से बातचीत चल रही है, लेकिन आप भीतर खाली और असहाय महसूस करते हैं।


उपचारात्मक कदम:

अपने अनुभवों को लिखें, अपनी भावनाओं को किसी भरोसेमंद व्यक्ति से साझा करें, या ध्यान की साधना करें। यह आपको भीतर से सुनने और समझने में मदद करेगा।


2. जब प्रयासों का महत्व न माने जाए


“ये तो कुछ भी नहीं” जैसे शब्द हमें चोट पहुंचाते हैं और हमारी भावनाओं को नकारते हैं। बार-बार ऐसा अनुभव होने पर आत्म-संदेह और कमज़ोरी का भाव जन्म ले सकता है।


उदाहरण:

आपने अपनी माँ के लिए उनके पसंद का उपहार चुना और उन्हें खुश करने के लिए समय निकाला, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया होती है: “ये तो कुछ भी नहीं।” बार-बार ऐसा होने पर आप सोचने लगते हैं: “शायद मैं ही पर्याप्त नहीं हूँ।”


उपचारात्मक कदम:

याद रखें कि आपके प्रयासों की मूल्यवानता आपके भीतर है, न कि दूसरों की स्वीकृति में। खुद को सहानुभूति देना और अपनी उपलब्धियों को स्वीकार करना मानसिक स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है।


3. सम्मान और सीमाओं की रक्षा


अगर कोई व्यक्ति आपकी सीमाओं, भावनाओं और जिम्मेदारियों का सम्मान नहीं करता, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं यह आपको अस्थिर महसूस करवा सकती है।


उदाहरण:

आपने अपने साथी से अनुरोध किया कि वह समय पर घर लौटें ताकि परिवार के साथ समय बिताया जा सके, लेकिन वह बार-बार अनदेखा करता है और अपनी मर्जी चलता है। इससे आप लगातार थकान और असहाय महसूस करते हैं।


उपचारात्मक कदम:

स्पष्ट सीमाएँ तय करें। यह “स्वार्थ” नहीं, बल्कि खुद की सुरक्षा है। सीमाओं को सुरक्षित रखने से आप मानसिक रूप से मजबूत बनते हैं।


4. शक्ति के खेल से बचाव


कुछ लोग अपने अहंकार के कारण धमकी, ब्लैकमेल या दोषारोपण का सहारा लेते हैं। यह शक्ति के खेल हमारे आत्मसम्मान को चुनौती दे सकते हैं।


उदाहरण:

आपने अपने वरिष्ठ या शिक्षक से मदद मांगी, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया होती है कि “तुम ही गलती कर रहे हो, तुम्हें सीखना चाहिए।” इसके बाद वह आपको दोषी ठहराते हुए दूसरों के सामने नीचा दिखाते हैं।


उपचारात्मक कदम:

अपनी मानसिक शक्ति बढ़ाएँ। खुद से कहें कि आप किसी की भावना या नियंत्रण के अधीन नहीं हैं। कभी-कभी दूरी बनाना ही सबसे बड़ी सुरक्षा और उपचार है।


5. भीतर का स्वास्थ्य, बाहर के नकली चेहरे से अधिक महत्वपूर्ण


आपके शरीर का स्वास्थ्य बाहरी रूप से सामान्य लग सकता है, लेकिन लगातार तनाव और अस्वीकार के कारण मन धीरे-धीरे थक जाता है। यह नींद, ध्यान और निर्णय क्षमता को प्रभावित कर सकता है।


उदाहरण:

एक कर्मचारी लगातार आलोचना और अवहेलना झेलता है। बाहर से वह सामान्य दिखता है, लेकिन रात को नींद नहीं आती, निर्णय लेने में कठिनाई होती है, और आत्मविश्वास कम होता है।


उपचारात्मक कदम:

ध्यान, योग, गहरी साँस की तकनीक, रचनात्मक गतिविधियाँ और आत्म-सहानुभूति को नियमित जीवन में शामिल करें। यह मानसिक थकान को कम करने में मदद करता है।


6. संबंध नहीं, आपकी चेतना की सुरक्षा


जब कोई लगातार समझने से इंकार करता है, तो यह केवल रिश्ता नहीं, बल्कि आपकी आंतरिक शांति पर भी हमला है। ऐसे समय में अपने भीतर दो हिस्से हो सकते हैं—एक जो संबंध बचाने की कोशिश करता है, और एक जो खुद को बचाने की चाह रखता है।


उदाहरण:

आपके जीवनसाथी लगातार आपकी भावनाओं को अनदेखा करते हैं और केवल अपनी जरूरतें देखते हैं। आप भीतर से टूटते जा रहे हैं, पर बाहर से घर सामान्य चलता दिखता है। इस समय खुद को बचाने के लिए दूरी बनाना या संबंध के पैटर्न बदलना ही मानसिक सुरक्षा है।


उपचारात्मक कदम:

खुद को बचाने की दिशा में कदम उठाना स्वार्थ नहीं है। अपने स्वास्थ्य और आत्म-सम्मान की रक्षा करना प्राथमिकता है।


"खुद को चुनना उपचार है"


हर संबंध में समझौता होता है, लेकिन जब संवाद, सम्मान और मानसिक सुरक्षा खतरे में हो, तो खुद को चुनना ही सबसे बड़ा कदम है। यह केवल दूरी बनाने का सवाल नहीं यह अपने अस्तित्व और मानसिक शांति को सुरक्षित रखने का मार्ग है।


जो लगातार आपकी समझ और भावनाओं को नकारता है, वह आपका परिवर्तन नहीं चाहता, बल्कि आपके अस्तित्व को कमतर दिखाना चाहता है। ऐसे में खुद को बचाना सच्ची शक्ति है।


Friday, January 30, 2026

मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है?

 मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है?


हिंदू धर्म में यह मान्यता है कि मानव शरीर में विभिन्न देवताओं का वास होता है। इस विचार को कई ग्रंथों और धार्मिक शिक्षाओं में बताया गया है। प्रमुख देवताओं में शामिल हैं:

हाथों में इंद्रदेव का वास होता है.

चरणों में विष्णु का वास होता है.

जिह्वा में सरस्वती का वास होता है.

उपस्थ (मेढ़ू) में प्रजापति का वास होता है.

गुदा में मित्र और मृत्यु देवता का वास होता है.

बुद्धि इंद्रिय में ब्रह्मा का वास होता है.

अहंकार में रुद्र का वास होता है.

मन में चंद्रमा का वास होता है.

शास्त्रों के मुताबिक, देवताओं के अंदर 16 तरह की कलाएं होती हैं, जिन्हें कोई भी 


भगवान शिव - मानव के मस्तिष्क में।

भगवान विष्णु - हृदय में।

भगवान ब्रह्मा - ज्ञानेंद्रियों में जैसे आंखों, कानों आदि।

गणेश - मन में।

सूर्य देव - शरीर के विभिन्न अंगों में।

इनके अलावा, अन्य देवताओं और शक्तियों का भी मानव शरीर में स्थान होता है, जिन्हें विभिन्न जगहों पर, जैसे चक्रों और ऊर्जा केंद्रों में, माना जाता है। यह धारणा व्यक्ति की आत्मा और शरीर के बीच के संबंध को दर्शाती है और अध्यात्मिक विकास की प्रक्रिया में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।


मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है और उनके कार्य क्या हैं,,,,,

ईश्वर ने अपनी माया से चौरासी लाख योनियों की रचना की लेकिन जब उन्हें संतोष न हुआ तो उन्होंने मनुष्य शरीर की रचना की।


मनुष्य शरीर की रचना करके ईश्वर बहुत ही प्रसन्न हुए क्योंकि मनुष्य ऐसी बुद्धि से युक्त है जिससे वह ईश्वर के साथ साक्षात्कार कर सकता है।


हमारे ज्ञानवान पाठक जानते हैं कि मानव शरीर एक देवालय है। ईश्वर ने पंचभूतों (आकाश ,वायु ,अग्नि भूमि और जल ) से मानव शरीर का निर्माण कर उसमें भूख-प्यास भर दी।


आकाश की सूक्ष्म शरीर से, भूमि की हड्डियों, flesh से और अग्नि की body heat के साथ तुलना की गयी है।


देवताओं ने ईश्वर से कहा कि हमारे रहने योग्य कोई स्थान बताएं जिसमें रह कर हम अपने भोज्य-पदार्थ का भक्षण कर सकें। देवताओं के आग्रह पर जल से गौ और अश्व बाहर आए पर देवताओं ने यह कह कर उन्हें ठुकरा दिया कि यह हमारे रहने के योग्य नहीं हैं।


जब मानव शरीर प्रकट हुआ तब सभी देवता प्रसन्न हो गए।


तब ईश्वर ने कहा—अपने रहने योग्य स्थानों में तुम प्रवेश करो ।


तब सूर्य नेत्रों में ज्योति (प्रकाश) बन कर, वायु छाती और नासिका-छिद्रों में प्राण बन कर,


अग्नि मुख में वाणी और उदर में जठराग्नि बन कर,


दिशाएं श्रोत्रेन्द्रिय (सुनना ) बन कर कानों में,


औषधियां और वनस्पति लोम (रोम) बन कर त्वचा में,


चन्द्रमा मन होकर हृदय में, मृत्यु (मलद्वार) होकर नाभि में और जल देवता वीर्य होकर पुरुषेन्द्रिय में प्रविष्ट हो गए।


तैंतीस देवता अंश रूप में आकर मानव शरीर में निवास करते हैं ।


उपनिषद् का निम्नलिखित कथानक मानव शरीर के देवालय होने की पुष्टि करता है :

हमारा शरीर भगवान का मंदिर है। यही वह मंदिर है, जिसके बाहर के सब दरवाजे बंद हो जाने पर जब भक्ति का भीतरी पट खुलता है, तब यहां ईश्वर ज्योति रूप में प्रकट होते हैं और मनुष्य को भगवान के दर्शन होते हैं।


आइये देखें मानव शरीर में कौन कौन से देवताओं का वास है और उनके कार्य क्या हैं :

संसार में जितने देवता हैं, उतने ही देवता मानव शरीर में “अप्रकट” रूप से स्थित हैं, किन्तु दस इन्द्रियों (पांच ज्ञानेन्द्रिय और पांच कर्मेन्द्रियां) के और चार अंतकरण (भीतरी इन्द्रियां—बुद्धि, अहंकार, मन और चित्त) के अधिष्ठाता देवता प्रकट रूप में हैं। इस सभी इन्द्रियों का टोटल किया जाये तो 14 बनता है।


आइए इन देवताओं के बारे में संक्षेप में जानकारी प्राप्त करें ,इतनी संक्षेप में कि साधारण मनुष्य को भी समझ आ जाये। सभी कठिन शब्दों को सरल करने का प्रयास तो किया है लेकिन जिनका सरलीकरण नहीं किया गया है वह केवल इस लिए कि सरलीकरण के बाद और अधिक कठिनता देखी गयी थी।


1. नेत्रेन्द्रिय (चक्षुरिन्द्रिय) के देवता—भगवान सूर्य नेत्रों में निवास करते हैं और उनके अधिष्ठाता देवता हैं; इसीलिए नेत्रों के द्वारा किसी के रूप का दर्शन सम्भव हो पाता है । नेत्र विकार में चाक्षुषोपनिषद्, सूर्योपनिषद् की साधना और सूर्य की उपासना से लाभ होता है ।


2. घ्राणेन्द्रिय (नासिका) के देवता—नासिका के अधिष्ठाता देवता अश्विनीकुमार हैं । इनसे गन्ध का ज्ञान होता है ।


3. श्रोत्रेन्द्रिय (कान) के देवता—श्रोत-कान के अधिष्ठाता देवता दिक् देवता (दिशाएं) हैं । इनसे शब्द सुनाई पड़ता है ।


4. जिह्वा के देवता—जिह्वा में वरुण देवता का निवास है, इससे रस का ज्ञान होता है ।


5. त्वगिन्द्रिय (त्वचा) के देवता—त्वगिन्द्रिय के अधिष्ठाता वायु देवता हैं । इससे जीव स्पर्श का अनुभव करता है ।


6. हस्तेन्द्रिय (हाथों) के देवता—मनुष्य के अधिकांश कर्म हाथों से ही संपन्न होते हैं । हाथों में इन्द्रदेव का निवास है ।


7. चरणों के देवता—चरणों के देवता उपेन्द्र (वामन, श्रीविष्णु) हैं । चरणों में विष्णु का निवास है ।


8. वाणी के देवता—जिह्वा में दो इन्द्रियां हैं, एक रसना जिससे स्वाद का ज्ञान होता है और दूसरी वाणी जिससे सब शब्दों का उच्चारण होता है । वाणी में सरस्वती का निवास है और वे ही उसकी अधिष्ठाता देवता हैं ।


9. उपस्थ (मेढ़ू) के देवता—इस गुह्येन्द्रिय के देवता प्रजापति हैं । इससे प्रजा की सृष्टि (संतानोत्पत्ति) होती है ।


10. गुदा के देवता—इस इन्द्रिय में मित्र, मृत्यु देवता का निवास है । यह मल निस्तारण कर शरीर को शुद्ध करती है ।


11. बुद्धि इन्द्रिय के देवता—बुद्धि इन्द्रिय के देवता ब्रह्मा हैं । गायत्री मंत्र में सद्बुद्धि की कामना की गई है इसीलिए यह ‘ब्रह्म-गायत्री’ कहलाती है । जैसे-जैसे बुद्धि निर्मल होती जाती है, वैसे-वैसे सूक्ष्म ज्ञान होने लगता है, जो परमात्मा का साक्षात्कार भी करा सकता है ।


12. अहंकार के देवता—अहं के अधिष्ठाता देवता रुद्र हैं । अहं से ‘मैं’ का बोध होता है ।


13. 13. मन के देवता—मन के अधिष्ठाता देवता चन्द्रमा हैं । मन ही मनुष्य में संकल्प-विकल्प को जन्म देता है । मन का निग्रह परमात्मा की प्राप्ति करा देता है और मन के हारने पर मनुष्य निराशा के गर्त में डूब जाता है ।


14. चित्त के देवता—प्रकृति-शक्ति, चिच्छत्ति ही चित्त के देवता हैं । चित्त ही चैतन्य या चेतना है । शरीर में जो कुछ भी स्पन्दन (चलन, चेतना) होती है, सब उसी चित्त के द्वारा होती है ।


भगवान ने ब्रह्माण्ड बनाया और समस्त देवता आकर इसमें स्थित हो गए, किन्तु तब भी ब्रह्माण्ड में चेतना नहीं आई और वह विराट् मनुष्य उठा नहीं। जब चित्त के अधिष्ठाता देवता ने चित्त में प्रवेश किया तो विराट् पुरुष उसी समय उठ कर खड़ा हो गया। इस प्रकार भगवान संसार में सभी क्रियाओं का संचालन करने वाले देवताओं के साथ इस शरीर में विराजमान हैं


अब मनुष्य का कर्तव्य है कि वह भगवान द्वारा बनाए गए इस देवालय को कैसे साफ-सुथरा रखे ? इसके लिए निम्न कार्य किए जाने चाहिए:


1. नकारात्मक विचारों और मनोविकारों-काम,क्रोध,लोभ,मोह,ईर्ष्या,अहंकार से दूर रहे ।


2. योग साधना, व्यायाम व सूर्य नमस्कार करके अधिक-से-अधिक पसीना बहाकर शरीर की आंतरिक गंदगी दूर करें ।


3. अनुलोम-विलोम व सूक्ष्म क्रियाएं करके ज्यादा-से ज्यादा शुद्ध हवा का सेवन करे ।


4. शुद्ध सात्विक भोजन सही समय पर व सही मात्रा में करके पेट को साफ रखें ।


नीचे दिए गए विवरण को पढ़ते समय आप सोच रहे होंगें कि ऊपर दी गयी जानकारी रिपीट हो रही है। हाँ कुछ तथ्य रिपीट अवश्य हो रहे हैं लेकिन इनका अध्ययन करना लाभदायक ही होगा।


हम जानते हैं कि मनुष्य का शरीर एक देवालय है। इस देवालय के आठ चक्र और नौ द्वार हैं। अर्थववेद में कहा गया है-


“अष्टचक्रा नवद्वारा देवानां पूरयोध्या,तस्यां हिरण्ययः कोशः स्वर्गो ज्योतिषावृतः”


जिसका अर्थ है कि आठ चक्र और नौ द्वारों वाली अयोध्या देवों की पुरी है, उसमें प्रकाश वाला कोष है जो आनन्द और प्रकाश से युक्त है अर्थात आठ चक्रों और नौ द्वारों से युक्त यह देवों की अयोध्या नामक नगरी है।


विज्ञान के अनुसार मनुष्य का जन्म माता-पिता के संयोग से संभव हो पाता है।


लेकिन क्या केवल संयोग से ही मनुष्य की रचना हो जाती हैं, बिलकुल नहीं ! इसके लिए देवी-देवताओं का सहयोग भी होता है। 33 कोटी के देवी-देवता जैसे कि सूर्य, पृथ्वी, वायु, जल, आकाश, चन्द्र आदि हमारे जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक है।


हमारी माता के गर्भ में ये देव अपने एक-एक अंश से बच्चा पैदा करने और उसका पालन पोषण करने में सहयोग करते हैं।


ज़रा कल्पना करें कि अगर वायुदेव माँ के गर्भ में न पहुंच पाए तो क्या गर्भ में जीवन संभव हो सकता है। यही बात जल की है,यही बात अग्नि आदि देवों के बारे में भी लागू होती है। इन सभी देवों को एक-एक करके समझने के लिए तो विज्ञान और अध्यात्म की बैकग्राउंड होनी चाहिए ,अग्निदेव का अर्थ यह कदापि न लिया जाए कि माँ के गर्भ में कोई स्टोव या भट्टी स्थापित है और वह बच्चे के लिए खाना पका रही है। बेसिक साइंस का ज्ञान बताता है कि भोजन का पचना (digestion),उससे रक्त का बनना, एनर्जी का पैदा होना एक प्रकार का combustion/ burning/ignition process है।


अथर्ववेद के 5वें कांड में लिखा है:

सूर्य मेरी आँखें हैं, वायु मेरे प्राण हैं,अन्तरिक्ष मेरी आत्मा है और पृथ्वी मेरा शरीर है। इस तरह दिव्यलोक का सूर्य, अंतरिक्ष लोक की वायु और पृथ्वी लोक के पदार्थ क्रमशः मेरी आँखें और प्राण स्थूल शरीर में आकर रह रहे है और हाथ जो तीनों लोकों के सूक्ष्म अंश हैं, हमारे शरीर में अवतरित हुए हैं। इसीलिए ज्ञानी मनुष्य मानव शरीर को ब्रह्म मानता है क्योंकि सभी देवता इसमें वैसे ही रहते हैं जैसे गोशाला में गायें रहती हैं।


माँ के गर्भ में 33 देवता अपने-अपने सूक्ष्म अंशों से रहते हैं परन्तु यह गर्भ तभी स्थिर (ठोस) होने लगता है जब परमात्मा अपने अंश से गर्भ में जीवात्मा को अवतरित करते हैं | उस समय सभी देवता गर्भ में उस परमात्मा की स्तुति करते हैं और उसकी रक्षा व् वृद्धि करते है | सभी देवता प्रार्थना करते हैं कि- हे जीव !


आप अपने साथ अन्य जीवों का भी कल्याण करना,परन्तु जन्म के समय के कठिन कष्ट के कारण मनुष्य इन बातों को भूल जाता है |


वेद का मंत्र हमें यह स्मरण दिलाता है मैं अमर अथवा अदम्य शक्ति से युक्त हूँ। हमारा शरीर ऐसा दिव्य और मनोहारी मनुष्य शरीर होता है। तभी तो उपनिषदों में ऋषियों का अमर संदेश गूंजता है: अहं ब्रह्मास्मि तत्वमसि |


इसी तरह सभी जीवों की उत्पत्ति होती है। अतः देवता यह घोषणा करते हैं कि सृष्टि का हर प्राणी परमात्मा का ही अंश है इसलिए हम सभी को इसी भगवानमय दृष्टि से एक दूसरे को देखना चाहिए। इस वाक्य को पढ़कर आज के मानव पर घृणा तो आती है कि हमारे वेद, पुराण, उपनिषद ,देवता क्या शिक्षा देते हैं, कैसे इतने परिश्रम से सृष्टि की स्थापना करते हैं,लेकिन मानव


महामानव और देवमानव बनने के बजाय दैत्यमानव बनने में को


ई कसर नहीं छोड़ता। शायद उस मानव को यह नहीं मालूम की सृष्टि के नियम, विधाता की अदालत में एक-एक प्राणी के एक-एक कर्म का लेखा लिखा जा रहा है। कर्म अपने कर्ता को ढूंढ ही निकालता है, सज़ा या इनाम मिल कर ही रहते हैं। कर्म की थ्योरी इतनी strong है कि इससे तो देवता क्या भगवान तक भी बच नहीं पाए।