"सम्भोग के बाद का पल"
सम्भोग केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का जटिल समन्वय है। उसके बाद का क्षण भी उतना ही गहन और संवेदनशील होता है। पुरुष और स्त्री दोनों का अनुभव अलग होता है, और उसे समझना आत्म-जागरूकता और आपसी सामंजस्य के लिए आवश्यक है।
1. पुरुष का अनुभव
सम्भोग के बाद पुरुष का शरीर और मन अचानक शिथिल और आराम की ओर झुकता है।
शारीरिक अनुभव:
लिंग ढीला पड़ता है, मांसपेशियों में थकान।
हृदय गति धीरे-धीरे सामान्य हो जाती है।
साँसें लंबी, धीमी और गहरी हो जाती हैं।
शरीर भारीपन और ऊर्जा के बहाव की कमी महसूस करता है।
मानसिक स्थिति:
पुरुष आत्मनिरीक्षण की ओर झुकता है।
अनुभव को पचाने और ऊर्जा को स्थिर करने की आवश्यकता होती है।
संवेदनाओं पर ध्यान कम हो जाता है; मन अंदर की ओर केंद्रित होता है।
इंद्रिय अनुभव:
स्पर्श और नज़दीकी की तीव्रता कम।
आंखें आधी बंद, शरीर शिथिल और आराम की स्थिति में।
पुरुष इस समय अनुभव को अंदर की दुनिया में संजोता है। यह समय उसके लिए एकांत और मानसिक स्थिरता का है।
2. स्त्री का अनुभव
स्त्री का शरीर सम्भोग के बाद भी ऊर्जावान और संवेदनशील बना रहता है। उसका अनुभव अभी भी तीव्र और विस्तृत होता है।
शारीरिक अनुभव:
त्वचा पर हल्की गर्माहट, हर स्पर्श में संवेदना।
स्तन, योन और हाथ-पैर में हल्की हलचल, ऊर्जा पूरे शरीर में फैलती है।
श्वास गहरी और नियमित, कभी-कभी हृदय की धड़कन तेज़।
मानसिक स्थिति:
साझा अनुभव की चाह, भावनाओं और संवेदनाओं के केंद्र में बनी रहती है।
मानसिक रूप से अभी भी जुड़ी हुई और जागरूक।
इंद्रिय अनुभव:
हर हल्का स्पर्श, हर साँस, हर हृदय की धड़कन उसे भीतर से खिला हुआ और आनंदित महसूस कराती है।
संवेदनाएं गहरी और जीवंत बनी रहती हैं।
स्त्री इस समय अनुभव को बाहरी और साझा रूप में जीती है। यह पल उसके लिए खिलने और जुड़ने का समय है।
3. ऊर्जा का प्रवाह और सामंजस्य
सम्भोग के बाद यह अंतर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि ऊर्जा का प्रवाह है।
पुरुष ऊर्जा को बाहर छोड़ देता है और थकान अनुभव करता है।
स्त्री वह ऊर्जा ग्रहण करती है और उसे अपने भीतर फैलती हुई स्फूर्ति और आनंद के रूप में अनुभव करती है।
यही अंतर उनके भावनात्मक और मानसिक व्यवहार में दिखाई देता है।
यदि दोनों इस अंतर को समझें और स्वीकार करें, तो यह क्षण केवल शारीरिक संतोष का नहीं बल्कि भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक जुड़ाव का भी स्रोत बन सकता है।
4. पल की सूक्ष्मता: स्पर्श, साँस और हृदय की धड़कन
कल्पना कीजिए इस पल को:
पुरुष की आँखें आधी बंद, शरीर शिथिल, और प्रत्येक साँस धीरे-धीरे बाहर निकलती है।
स्त्री की आँखें चमक रही हैं, हाथ और त्वचा संवेदनाओं को महसूस कर रहे हैं।
उसका हृदय तेज़ धड़क रहा है, उसकी ऊर्जा अभी भी बह रही है।
पुरुष के शरीर से ऊर्जा बाहर बह चुकी है, स्त्री के शरीर में वही ऊर्जा खिल रही है।
यह पल दो अलग दृष्टिकोणों के बीच सामंजस्य का है: पुरुष अपने अंदर, स्त्री बाहर की ओर फिर भी अनुभव जुड़ा हुआ।
सम्भोग के बाद का क्षण सिर्फ शारीरिक क्रिया का नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का गहन अनुभव है।
पुरुष: थकान और एकांत में अनुभव को आत्मनिरीक्षण में पचा रहा।
स्त्री: ऊर्जा में खिलना और साझा अनुभव की चाह।
यदि यह अंतर समझा जाए और स्वीकार किया जाए, तो यह पल दोनों के बीच गहरा, संतुलित और सूक्ष्म जुड़ाव बन सकता है।
संभोग_में_शीघ्र_स्खलन...
पचहत्तर प्रतिशत पुरुष शीघ्रपात के शिकार हैं—पचहत्तर प्रतिशत! गहन मिलन के पहले ही वे स्खलित हो जाते हैं और क्रीड़ा समाप्त हो जाती है। और नब्बे प्रतिशत स्त्रियां कभी आर्गाज्म को नहीं उपलब्ध हांती हैं, कभी संभोग के शिखर सुख को नहीं पहुंच पाती हैं—नब्बे प्रतिशत स्त्रियां!
यही कारण है कि अक्सर स्त्रियां चिड़चिड़ी और क्रोधी होती हैं। उन्हें ऐसा होना ही है। कोई औषधि उन्हें शांत नहीं बना सकती है, कोई दर्शनशास्त्र, धर्म या नीति उन्हें अपने पुरुषों के प्रति सहृदय नहीं बना सकती। वे अतृप्त हैं। वे क्रुद्ध हैं। और आधुनिक मनोविज्ञान और तंत्र दोनों कहते हैं कि जब तक स्त्री काम— भोग में गहन तृप्ति को नहीं प्राप्त होती, वह परिवार के लिए समस्या बनी रहेगी। जिससे वह वंचित रह गई है,वह चीज उसे क्षुब्ध रखेगी और वह हमेशा झगड़ालू बनी रहेगी।
तो अगर तुम्हारी पत्नी हमेशा लड़ती—झगड़ती रहती है तो पूरी स्थिति पर फिर से विचार करो। इसमें पत्नी का ही कसूर नहीं है, हो सकता है कि उसका कारण तुम्हीं हो। और आर्गाज्म को न उपलब्ध होने के कारण स्त्रियां काम—विमुख हो जाती हैं, वे आसानी से काम— भोग में उतरने को नहीं राजी होतीं। उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है, वे संभोग में जाने को राजी नहीं होतीं। और वे क्यों राजी हों यदि उन्हें इससे गहन सुख की उपलब्धि ही नहीं होती?
सच तो यह है कि स्त्रियों को लगता है कि पुरुष उनका उपयोग करते हैं, उनका शोषण करते हैं। उन्हें लगता है कि हम कोई वस्तु हैं जिसका उपयोग करके फेंक दिया जाता है। पुरुष तो संतुष्ट हो जाता है, क्योंकि वह स्खलित हो जाता है। फिर वह करवट लेकर सो जाता है। लेकिन स्त्री आंसू बहाती रहती है। वह अनुभव उसके लिएतृप्तिदायी नहीं होता है। उसे लगता है कि मेरा उपयोग किया गया है। हो सकता है,उसके पति, प्रेमी या मित्र को उससे राहत मिली हो, लेकिन वह खुद अतृप्त रह जाती है।
सौ में से नब्बे स्त्रियां तो यह भी नहीं जानती हैं कि आर्गाज्म क्या है, काम—समाधि क्या है। उन्हें कभी इसका अनुभव ही नहीं हुआ। वे कभी उस शिखर को नहीं छू पाती हैं, जहां उनके शरीर का रोआं—रोआं आर्गाज्म से कंपित हो उठे, भरपूर हो जाए। यह अनुभव उनके लिए अनजाना ही रहता है!!!
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