सुबह का एक शांत क्षण, जब दुनिया अभी पूरी तरह जागी नहीं होती, भीतर कुछ हलचल पैदा करता है। हवा चलती है, पर उसमें कोई आग्रह नहीं होता, जैसे वो सिर्फ बहना जानती हो। उसी तरह भीतर भी कुछ है, जो बिना किसी दिशा के चलता रहता है, बिना किसी मंज़िल के। आंखें खुली होती हैं, पर देखने की आदत पुरानी होती है, जो हर चीज को नाम और अर्थ में बांध देती है। उस आदत के कारण जो सामने है, वो वैसा नहीं दिखता जैसा वो है। देखने और समझने के बीच एक परदा होता है, जो विचारों से बना होता है। और यही परदा सच्चाई को धुंधला कर देता है।
भीतर एक निरंतर संवाद चलता रहता है, जो कभी रुकता नहीं। विचार आते हैं, जाते हैं, फिर वापस लौटते हैं, जैसे एक चक्र जो खुद को दोहराता रहता है। इस चक्र में कोई नया नहीं होता, सिर्फ वही पुराना चलता रहता है, जो पहले से जाना हुआ है। इसी दोहराव में जीवन एक बोझ जैसा लगने लगता है, क्योंकि उसमें ताजगी नहीं होती। जब तक ये चक्र चलता रहता है, तब तक देखने की क्षमता सीमित रहती है। क्योंकि देखने से पहले ही मन तय कर लेता है कि क्या सही है और क्या गलत। और इसी निर्णय में सच्चाई खो जाती है।
अगर कोई क्षण भर के लिए इस पूरे खेल को देखे, बिना उसमें उलझे, तो कुछ अलग दिखाई देता है। ये अलग कोई नई चीज नहीं, बल्कि वही है जो हमेशा से था, पर अनदेखा रह गया। उस देखने में कोई प्रयास नहीं होता, कोई इच्छा नहीं होती। बस एक सीधा संपर्क होता है, जहां विचार बीच में नहीं आते। और उसी संपर्क में एक नई समझ जन्म लेती है, जो किसी किताब से नहीं आती, बल्कि अपने ही अनुभव से आती है।
बाहरी सहारे की सीमा:
अक्सर ये मान लिया जाता है कि सच्चाई कहीं बाहर है, जिसे किसी और के माध्यम से पाया जा सकता है। कोई शिक्षक, कोई प्रणाली, कोई मार्ग, ये सब मदद कर सकते हैं, ऐसा विश्वास गहराई से बैठा होता है। मगर इस विश्वास में एक निर्भरता छिपी होती है, जो भीतर की स्वतंत्रता को रोक देती है। जब तक कोई दूसरे पर निर्भर है, तब तक उसका देखना उसका अपना नहीं होता। वो borrowed होता है, उधार लिया हुआ, और उधार में कभी भी सच्चाई पूरी नहीं मिलती।
जो भी बाहर से मिलता है, वो सिर्फ एक संकेत हो सकता है, एक दिशा दिखा सकता है। मगर चलना हमेशा खुद को ही पड़ता है। अगर कोई उस संकेत को ही सत्य मान ले, तो वो वहीं रुक जाता है। और रुकना ही सबसे बड़ा भ्रम है, क्योंकि जीवन कभी रुकता नहीं। हर क्षण नया है, और उसे पुराने तरीके से नहीं समझा जा सकता। इसलिए जो समझ बाहर से आती है, वो सीमित होती है।
जब ये स्पष्ट हो जाता है कि कोई भी बाहरी सहारा अंतिम नहीं है, तब एक नई यात्रा शुरू होती है। ये यात्रा अकेली होती है, पर उसमें कोई अकेलापन नहीं होता। क्योंकि इस यात्रा में देखने वाला और देखा जाने वाला एक ही हो जाते हैं। और जब ये एकता महसूस होती है, तब बाहरी सहारे अपने आप छूटने लगते हैं।
भय और इच्छा का खेल:
भीतर की सबसे गहरी चालें भय और इच्छा के रूप में सामने आती हैं। ये दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं, जो हमेशा साथ चलते हैं। जहां इच्छा है, वहां उसे खोने का डर भी होता है। और जहां डर है, वहां उससे बचने की इच्छा भी होती है। इस पूरे खेल में मन हमेशा उलझा रहता है, कभी इधर भागता है, कभी उधर। और इस भागने में थकान जमा होती जाती है।
भय सिर्फ किसी घटना का नहीं होता, बल्कि उस घटना के बारे में बने विचार का होता है। मन भविष्य की कल्पना करता है, और उसी कल्पना से डर पैदा होता है। इसी तरह इच्छा भी किसी वास्तविक चीज की नहीं, बल्कि उसकी कल्पना की होती है। इस पूरे खेल में जो असली है, वो छूट जाता है, क्योंकि ध्यान हमेशा कल्पना में रहता है। और जब ध्यान वास्तविकता से हटता है, तब संघर्ष शुरू होता है।
अगर इन दोनों को बिना किसी निर्णय के देखा जाए, तो उनका स्वरूप बदलने लगता है। देखने में कोई विरोध नहीं होता, कोई दबाव नहीं होता। बस एक जागरूकता होती है, जो हर चीज को उजागर करती है। और जब भय और इच्छा पूरी तरह देखे जाते हैं, तब उनका असर कम होने लगता है। क्योंकि जो देखा जाता है, वो छुप नहीं सकता।
समय का मनोवैज्ञानिक जाल:
समय सिर्फ घड़ी का नहीं होता, बल्कि मन का भी होता है। मन अपने अनुभवों को जमा करता है, और उनसे एक पहचान बनाता है। ये पहचान अतीत पर आधारित होती है, और उसी के आधार पर भविष्य की कल्पना करती है। इस पूरे ढांचे में वर्तमान खो जाता है, क्योंकि ध्यान या तो पीछे होता है या आगे। और जब वर्तमान खोता है, तब जीवन भी अधूरा हो जाता है।
मनोवैज्ञानिक समय ही दुख का कारण बनता है, क्योंकि इसमें तुलना और उम्मीद छिपी होती है। कोई जैसा था, वैसा नहीं रहना चाहता, और जो बनना चाहता है, वो अभी नहीं है। इस अंतर में एक संघर्ष पैदा होता है, जो लगातार चलता रहता है। और इसी संघर्ष में शांति कहीं खो जाती है। मन हमेशा कुछ बनने की कोशिश में रहता है, और इसी कोशिश में थकता रहता है।
अगर इस पूरे ढांचे को देखा जाए, तो एक सच्चाई सामने आती है। जो अभी है, वही वास्तविक है। बाकी सब मन की रचना है, जो जरूरी नहीं कि सच हो। जब मन इस बात को समझता है, तब वो वर्तमान में ठहरता है। और उसी ठहराव में एक नई ऊर्जा जन्म लेती है, जो किसी प्रयास से नहीं आती।
व्यक्ति और समाज का संबंध:
जो भीतर चलता है, वही बाहर भी दिखाई देता है। अगर भीतर डर है, तो समाज में भी डर फैलेगा। अगर भीतर संघर्ष है, तो बाहर भी संघर्ष होगा। ये अलग अलग चीजें नहीं हैं, बल्कि एक ही प्रक्रिया के हिस्से हैं। इसलिए ये कहना कि समाज अलग है और व्यक्ति अलग, ये एक भ्रम है। दोनों एक दूसरे को बनाते हैं, और एक दूसरे से प्रभावित होते हैं।
जब कोई अपने भीतर स्पष्टता लाता है, तो उसका असर सिर्फ उसी तक सीमित नहीं रहता। वो उसके संबंधों में दिखाई देता है, उसके व्यवहार में दिखाई देता है। और वही व्यवहार समाज का हिस्सा बनता है। इस तरह एक व्यक्ति का परिवर्तन, पूरे वातावरण को छू सकता है। ये कोई आदर्श नहीं, बल्कि एक वास्तविकता है, जो हर दिन घटती है।
अगर कोई बदलाव चाहता है, तो उसे बाहर से नहीं, भीतर से शुरू करना होगा। क्योंकि बाहर की हर चीज भीतर की ही अभिव्यक्ति है। और जब भीतर स्पष्टता होती है, तब बाहर भी एक अलग तरह की व्यवस्था दिखाई देती है। ये व्यवस्था किसी नियम से नहीं, बल्कि समझ से आती है।
संबंधों में स्वयं का दर्पण:
हर संबंध एक दर्पण की तरह होता है, जिसमें खुद का चेहरा दिखाई देता है। मगर अक्सर ध्यान दूसरे पर होता है, इसलिए खुद को देखना छूट जाता है। कोई कुछ कहता है, और तुरंत प्रतिक्रिया आती है। उस प्रतिक्रिया में खुद का चेहरा छिपा होता है, मगर उसे देखा नहीं जाता। अगर उस क्षण में ठहरकर देखा जाए, तो बहुत कुछ स्पष्ट हो सकता है।
संबंध सिर्फ दो लोगों के बीच नहीं होते, बल्कि दो मानसिक स्थितियों के बीच होते हैं। हर व्यक्ति अपने अनुभव, अपनी धारणाएं, और अपनी अपेक्षाएं लेकर आता है। और इन्हीं के बीच टकराव होता है। अगर इन सब को समझा जाए, तो संबंध बदल सकते हैं। क्योंकि तब कोई दूसरे को बदलने की कोशिश नहीं करता, बल्कि खुद को देखता है।
जब खुद को देखने की आदत बनती है, तब संबंधों में एक नई गहराई आती है। वहां कोई आरोप नहीं होता, कोई बचाव नहीं होता। बस एक समझ होती है, जो हर चीज को स्वीकार करती है। और इसी स्वीकार में प्रेम जन्म लेता है, जो किसी शर्त पर आधारित नहीं होता।
स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ:
स्वतंत्रता का मतलब सिर्फ बाहर की बाधाओं से मुक्त होना नहीं है। असली स्वतंत्रता भीतर की उन दीवारों से मुक्त होना है, जो विचारों ने खड़ी की हैं। ये दीवारें इतनी सूक्ष्म होती हैं कि उनका होना महसूस भी नहीं होता। मगर वही सबसे बड़ी कैद होती हैं, क्योंकि वो देखने की क्षमता को सीमित कर देती हैं।
जब मन इन दीवारों को पहचानता है, तब एक अलग तरह की हलचल होती है। ये हलचल किसी विद्रोह की नहीं, बल्कि समझ की होती है। समझ में कोई संघर्ष नहीं होता, क्योंकि उसमें कोई विरोध नहीं होता। और इसी समझ में दीवारें अपने आप गिरने लगती हैं। ये गिरना किसी प्रयास से नहीं, बल्कि देखने से होता है।
इस स्वतंत्रता में कोई दिशा नहीं होती, कोई लक्ष्य नहीं होता। ये बस एक खुलापन होता है, जहां हर चीज को वैसे ही देखा जाता है, जैसे वो है। और इसी देखने में एक गहरी शांति होती है, जो किसी कारण से नहीं आती। यही शांति जीवन को एक नई दिशा देती है, बिना किसी योजना के।
हम इस संसार में किसलिये आये हैं और हम क्या करने लगे !!
मैं कौन हूँ ?
मेरा कौन ??
मेरा उद्देश्य क्या है ??
क्या पैसा कमाना , खाना , Sex करना , बच्चा पैदा करना और फिर मर जाना ?????
तरह तरह के प्रपंच बवाल हम स्वयं उत्पन्न करते हैं , जबरदस्ती प्रपंचों को ले लेकर परेशान होकर रोते हैं , चिल्लाते हैं और दूसरों को कोसते हैं ।
रात यूँ कहने लगा, मुझसे गगन का चाँद
आदमी भी क्या अनोखा जीव होता है
उलझनें अपनी बनाता और आप फँसता है
और फिर बेचैन हो जगता न सोता है।
Expectation is the root evil cause of all the pangs , mother cause of all frustration.
एक अकाट्य सिद्धांत है :- जिस व्यक्ति , वस्तु या स्थिति की अनुकूलता से आपको जितने परसेंट सुख मिलता है , उसकी प्रतिकूलता से आपको उतने ही percent दुःख मिलता है , न 1% ज्यादा न ही 1% कम ।
जितना अधिक प्यार या विश्वास तो समझ जाईये उतना ही अधिक उससे आपको दुःख मिलने वाला है ।
एक प्रेमी को प्रेमिका से जितना अधिक सुख , उसके वियोग में या उसके विश्वासघाती होने पर उतना ही दुख ।
इसलिए समदर्शी और सबके प्रति समभाव रखने का आदेश शास्त्रों ने दिया है ।
लेकिन हम लोग स्वयं ही दुःख और सुख मोल लेते हैं ।
इसीलिए भगवान की माया हमारी हितैषिणी है जो हमें चप्पल मार मार कर हमारा अनुराग जड़ विषयक तत्वों से हटाती है और वैराग्य और ज्ञान करवाती है।
लेकिन हम फिर कुछ समय के लिए उस विष्ठा में लेटने की ज़िद करने लगते हैं ।
इसलिए स्व को जानो और उसी पर चिंतन कर अनुशीलन कर सुख दुख से परे हो जाओ ।