Sunday, April 26, 2026

स्त्री देह से परे पुरुष नहीं सोच पाया

 स्त्री देह से परे पुरुष नहीं सोच पाया।

कविता को धैर्य पूर्वक पढ़ सकने का समय दे सकें तो पढ़े। कविता विस्तारित है किंतु , स्त्री मन की परत खोलती जान पड़ेगी।

तुम जानते हो पुरूष ..!

वर्षों बाद भी जब तुमने बात की तो कहा

तुम मुझसे घृणा नहीं कर सकती हो

मैं कहती रही मुझे तुमसे घृणा है 

तुमने मुझसे विश्वासघात किया

प्रेम मुझसे और 

विवाह किसी और से किया।


तुम हंसकर कहते

एक बार मुझसे एकांत में मिलो  ,

तुम्हारी सारी घृणा दूर हो जाएगी.

सुनो पुरूष ..!

मैं इस बात पर तुमसे 

और अधिक घृणा करने लगी

यह तुम्हारा अपराध ही नहीं

अपितु भूल भी थी


तुम्हारे उस एकांत में पुनः मिलने के 

आमंत्रण का अर्थ 

मैं भली-भांति जानती थी,

मैं समझ पा रही थी कि ,

तुमने प्रेमिका बनाकर 

मेरे साथ तो कपट किया ही ,

अब किसी को अर्धांगिनी बनाकर 

तुम उसे भी छल का विष 

दे देने को आतुर थे


और हाँ एक क्षण रुको ..!

तुम्हारे उस एकांत में मिलने के आमंत्रण

के साथ तुम्हारे स्वर का वो दंभ 

वो अभिमान भी मुझे स्मरण है

जो तुम्हारे अनकहे शब्दों में समाहित था

तुम्हारी मंशा ,

एकांत में पुनः 

मेरे भीतर की स्त्री को संतुष्ट करके 

कदाचित मुझ पर ,

वही पूर्व सा अधिकार 

पा लेने की थी ।


तुम्हारे उस आत्मविश्वास

और उसमें छुपे तुम्हारे

पुरुष प्रयास को मैं ,

पहचान गयी थी

और सच मानो 

मेरे मन में तुम्हारे प्रति घृणा

पहले से कहीं अधिक बढ़ गयी थी

वह तुम्हारी एक और असिद्धि थी


तुम्हारे जाने के बाद 

कुछ और पुरूष मिले मुझे

कुछ एक 

जाने किस-किस तरह से

प्रभावित करते रहे मुझे

किंतु सभी ने मुझे निराश किया 

कि , मैं उनमें भी 

एक पुरूष के अतिरिक्त कुछ और 

खोज न सकी


वे मुझे अपने पुरूषत्व के किस्से 

सहजता ओढ़कर सुनाते

वे शिष्ट बनकर 

नितांत सहज संकेतों में कह डालते कि

विवाह के बाद

कैसे उनकी पत्नी उनसे आनंदित रहती थी

वे संकेतों में बताते कि कैसे वे 

अपनी नव विवाहिता पत्नी को 

अलग-अलग तरह से 

पुरूष सुख देकर धन्य करते थे

कैसे उनकी पत्नी उनके जैसे 

पुरूष को पाकर

रति में रूचि लेने लगी थी


मैं मौन होकर उनको सुनती

मैं उन्हें डपट कर चुप करा सकती थी

पर मैं पुरूष के , पुरुष मन का

अंतिम पड़ाव देख लेना चाहती थी

अपनी स्त्री के साथ बिताए

व्यक्तिगत अनुभवों को साझा करता पुरुष मुझे ,

दूसरी स्त्री को आकर्षित करता और 

लालच देता दिखाई पड़ा

स्वयं के पुरुषत्व पर इतराता ,

उसके किस्से साझा करता पुरुष 

निस्संदेह मुझे कातर 

विकल्पहीन दिखाई दिया


मैं अचंभित थी कि ..पुरूष ,

देह से ऊपर उठकर 

स्त्री को देख क्यूँ न सका

स्त्री का भोग बन जाने को

आतुर पुरूष मुझे , 

धरती पर पड़े कीट की भांति 

छटपटाता दिख पड़ा


तो सुनो पुरूष..!

तुमने जब -जब स्त्री को

पुरुष बनकर 

प्रभावित करना चाहा

तब-तब तुम स्त्री को मात्र 

आनंद दे सकने वाले 

यंत्र की तरह स्मरण रहे

तुमने तब-तब

सखा होने के अवसरों को खोया


तुमने स्त्री की स्मृतियों में

पुरुष बनकर ठहरने का प्रयास किया

इस संसार में

यही तुम्हारी 

सबसे बड़ी चूक थी...


तुम जानते हो पुरूष ..!

तुम्हारे जाने के बाद 

मुझे सबसे अधिक दुःख 

इस बात का सताता रहा कि

तुम किसी और के साथ सो रहे होगे

हाँ ,

मैं स्त्री आदर्शवादिता का ढोंग किये बिना 

तुमसे इस सत्य को स्वीकारती हूँ कि

मैंने सबसे अधिक तुम्हें रात्रि में स्मरण किया

या तुम मेरी स्मृतियों में अधिकतर

रोमांचित करने वाले 

उन क्षणों के साथ आये

जो नितांत एकांत में हमने

स्त्री पुरूष की तरह साथ बिताए थे ....

और जानते हो तुम ....

......यही तुम्हारी सबसे बड़ी पराजय थी


यौन नैतिकता

 यौन नैतिकता (Sexual Ethics) के बारे में आपके क्या विचार हैं?

@Sanjeev Mishra 

मेरे विचार अब तक प्रचलित सभी यौन नैतिकताओं के विरुद्ध हैं। वे सभी दमनकारी रही हैं; उन्होंने सेक्स की निंदा की है और मनुष्य के मन में विभाजन पैदा कर दिया है। मनुष्य की सारी मानसिक विकृतियाँ और एक तरह की “द्विभाजित चेतना” (schizophrenia) इन्हीं गलत यौन नैतिकताओं में जड़ें रखती हैं।


मैं सेक्स को एक प्राकृतिक घटना मानता हूँ। इसमें न कुछ अपवित्र है, न कुछ पवित्र—यह जीवन-ऊर्जा है, अत्यंत महत्वपूर्ण ऊर्जा। यदि तुम इसे रूपांतरित (sublimate) नहीं कर पाते, तो यही तुम्हें नष्ट भी कर सकती है—और इसने मानवता को बहुत हद तक नष्ट किया है।


मनुष्य इसी ऊर्जा से जन्म लेता है; सब कुछ इसी से उत्पन्न होता है। स्वाभाविक है कि इससे ऊँची कोई ऊर्जा नहीं है, लेकिन जैविक प्रजनन (reproduction) ही इसका एकमात्र कार्य नहीं है। यही ऊर्जा सृजन के अनेक आयाम ले सकती है। यही ऊर्जा, ध्यान के साथ मिलकर, चेतना की उच्चतम अवस्था—जिसे मैं ज्ञान (enlightenment) कहता हूँ—तक पहुँचा सकती है।


मेरी यौन नैतिकता कोई कानून नहीं है—यह प्रेम है।


दो व्यक्ति केवल तभी यौन संबंध में हो सकते हैं जब प्रेम अनुमति दे। जहाँ प्रेम नहीं है और केवल कानून (बंधन) रह जाता है, वह सीधी-सीधी वेश्यावृत्ति है—और मैं उसके खिलाफ हूँ।


यह अजीब है कि सभी धर्म दुनिया में वेश्यावृत्ति के कारण हैं, लेकिन कोई यह कहने को तैयार नहीं कि वेश्यावृत्ति इसलिए है क्योंकि तुमने प्रेम की जगह कानून को रख दिया है।


कानून प्रेम नहीं है। विवाह तभी तक सार्थक है जब तक उसमें प्रेम है। जैसे ही प्रेम समाप्त हो जाता है, विवाह भी अमान्य हो जाता है। इसका अर्थ है कि लाखों लोग बिना प्रेम के, अनैतिक और अप्राकृतिक जीवन जी रहे हैं—क्योंकि धर्मों ने विवाह को एक स्थायी बंधन बना दिया है।


जीवन निरंतर बदलता रहता है; कुछ भी स्थायी नहीं है। प्रेम भी स्थायी नहीं है। केवल प्लास्टिक के फूल स्थायी होते हैं—असल फूल नहीं। अगर तुम स्थायित्व के प्रति बहुत आसक्त हो जाओगे, तो अंततः तुम्हारे पास प्लास्टिक के फूल ही रह जाएँगे। इसी तरह लोग “प्लास्टिक विवाह” और “प्लास्टिक संबंधों” में जी रहे हैं—झूठे, पाखंडी—जो किसी को आनंद नहीं देते।


पूरी दुनिया में एक व्यापक वेश्यावृत्ति फैली हुई है। सामान्यतः जब तुम किसी वेश्या के पास जाते हो, तो तुम उसे एक रात के लिए खरीदते हो—कम से कम यह स्पष्ट होता है। लेकिन जब तुम किसी स्त्री से विवाह करते हो और वादा करते हो कि हमेशा प्रेम करोगे—यहाँ तक कि मृत्यु के बाद भी—और हनीमून खत्म होने से पहले ही प्रेम समाप्त हो जाता है, तब तुम छल में जी रहे होते हो। तब तुम एक इंसान को वस्तु की तरह इस्तेमाल कर रहे हो—एक यौन वस्तु की तरह। मैं इसकी निंदा करता हूँ।


मेरे अनुसार प्रेम ही एकमात्र कानून होना चाहिए—निर्णय का आधार।


और यौन ऊर्जा केवल प्रजनन तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। यह स्पष्ट है कि पशु पूरे वर्ष यौन सक्रिय नहीं होते; उनके कुछ निश्चित मौसम होते हैं। लेकिन मनुष्य पूरे वर्ष यौन हो सकता है—इसका कोई उद्देश्य अवश्य है। अस्तित्व कभी भी बिना कारण कुछ नहीं करता।


मेरा समझ यह है कि प्रजनन तो कुछ हफ्तों में भी हो सकता था, जैसे पशुओं में होता है। लेकिन मनुष्य को इतनी अधिक यौन ऊर्जा दी गई है—यह संकेत है कि अस्तित्व चाहता है कि तुम इस ऊर्जा को उच्च चेतना में रूपांतरित करो—और यह संभव है।


जैसे यह ऊर्जा बच्चों को जन्म दे सकती है, वैसे ही यह तुम्हें भी नया जन्म दे सकती है—एक नई दृष्टि, नया आनंद, नया प्रकाश और एक बिल्कुल नया अस्तित्व। इसके लिए आवश्यक है कि इस ऊर्जा को ध्यान के साथ जोड़ा जाए—और यही मेरा पूरा कार्य रहा है।


यही मेरी यौन नैतिकता है:

सेक्स ऊर्जा + ध्यान।


इन्हें जोड़ना सबसे आसान है, क्योंकि प्रेम के क्षण में, चरमोत्कर्ष (orgasm) पर, विचार रुक जाते हैं, समय ठहर जाता है, अहंकार मिट जाता है। तुम दूसरे में विलीन हो जाते हो। यही ध्यान की विशेषताएँ हैं—न अहंकार, न समय, न विचार—केवल शुद्ध जागरूकता।


जहाँ यौन चरमोत्कर्ष समाप्त होता है, वहीं ध्यान प्रारंभ हो सकता है। दोनों बहुत निकट हैं—उन्हें जोड़ना सरल है।


मेरा मानना है कि लोगों ने ध्यान की खोज यौन अनुभव के माध्यम से ही की होगी, क्योंकि उसमें ये तीनों गुण प्रकट होते हैं। जब उन्होंने देखा कि विचार रुक जाते हैं, समय रुक जाता है और अहंकार मिट जाता है—तो बुद्धिमान लोगों ने प्रयास किया होगा कि बिना यौन क्रिया के भी इस अवस्था को पाया जा सकता है या नहीं। और तब से लाखों लोग इसमें सफल हुए हैं।


मानवता का सारा दुःख इस बात से है कि उसकी यौन नैतिकता गलत है—वह दमन सिखाती है। जितना तुम दमन करोगे, उतना ही ध्यान से दूर जाओगे; और उतना ही पागलपन के करीब।


अब मनोविश्लेषण (psychoanalysis)—जिसके जनक Sigmund Freud हैं—ने भी यह सिद्ध कर दिया है कि दबी हुई काम-ऊर्जा ही मनुष्य के दुःख, विकृतियों और मानसिक रोगों का मूल कारण है। लेकिन धर्म अभी भी वही पुरानी बातें दोहराए जा रहे हैं।


फ़्रायड को मानव इतिहास में एक महत्वपूर्ण मील का पत्थर माना जाना चाहिए, लेकिन उनका कार्य अधूरा है—उन्होंने केवल दमन के विरुद्ध संघर्ष किया, जो नकारात्मक है।


मेरी यौन नैतिकता उस कार्य को पूरा करती है। दमन को छोड़ना होगा। अपनी ऊर्जा के प्रति गहरी स्वीकृति, मैत्री और प्रेमपूर्ण निकटता विकसित करनी होगी—ताकि वही ऊर्जा अपने रहस्य प्रकट कर सके।


और जब यह ऊर्जा ध्यान के साथ जुड़ती है, तब चरमोत्कर्ष (orgasm) दिव्यता के मंदिर का द्वार बन जाता है।


मेरे लिए, यदि सेक्स इस संसार की सृजनात्मक शक्ति है, तो वह सृजन के मूल स्रोत के सबसे निकट होगी—चाहे तुम उसे कोई भी नाम दो।


लोगों को यह कला सिखाई जानी चाहिए कि यौन ऊर्जा को आध्यात्मिक जागरण में कैसे रूपांतरित किया जाए।...

वीर्य के दोष दूर करें

 वीर्य के दोष दूर करें


परिचय :

          वीर्य ही शरीर की सप्त धातुओं का राजा माना जाता है और ये सप्त धातुयें भोजन से प्राप्त होती हैं। इसमे सातवी धातु ही पुरुष में वीर्य बनती है। 100 बूंद खून से एक बूंद वीर्य बनता है। एक महीने में लगभग 1 लीटर खून बनता है जिससे 25 ग्राम वीर्य बनता है और गर्भाधान के लिए 60 से 70 करोड़ जीवित शुक्राणुओं का होना जरूरी होता है। इसलिए संभोग हफ्ते में एक बार ही करना चाहिए क्योंकि एक बार के संभोग के दौरान 10 ग्राम वीर्य निकल जाता है। वीर्य में जीवित शुक्राणुओं की कमी से महिलाओं को गर्भवती भी बनाया नहीं जा सकता। वीर्य परीक्षण में वीर्य गर्भाधान के लिए 7.8 पी.एच से 8.2 पी. एच ही सही माना गया है। वीर्य में दो प्रकार के शुक्राणु होते हैं एक्स और वाई। एक्स शुक्राणुओं से पुत्री पैदा होती है और वाई शुक्राणुओं से पुत्र पैदा होता है। एक शुक्राणु की लम्बाई लगभग 1/500 इंच होती है।


          कभी-कभी वीर्य पतला होने के कारण गर्भ नहीं ठहरा पाता ऐसा तब होता है जब कोई ज्यादा मैथुन करके वीर्य को नष्ट कर देता है या अन्य दूसरी किसी बीमारी से ग्रस्त होकर जैसे:- प्रमेह, सुजाक, मूत्रघात, मूत्रकृच्छ और स्वप्नदोष आदि।


चिकित्सा :


1. ब्राह्मी : ब्राह्मी, शंखपुष्पी, खरैटी, ब्रह्मदण्डी और कालीमिर्च को पीसकर खाने से वीर्य शुद्ध होता है।


2. बबूल :


बबूल की कच्ची फली को सुखाकर मिश्री में मिलाकर खाने से वीर्य की कमी व रोग दूर होते हैं। 

10 ग्राम बबूल की कोंपलों को 10 ग्राम मिश्री के साथ पीसकर पानी के साथ लेने से वीर्य-रोगों में लाभ होता है। हरी कोंपले न हों तो 30 ग्राम सूखी कोंपलों का सेवन कर सकते हैं। 

बबूल की फलियों को छाया में सुखा लें और बराबर की मात्रा मे मिश्री मिलाकर पीसकर रख लें। एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम नियमित रूप से जल के साथ सेवन से करने से वीर्य गाढ़ा होगा और सभी विकार दूर हो जाएंगे। 

बबूल की गोंद को घी में तलकर उसका पाक बनाकर खाने से पुरुषों का वीर्य बढ़ता है और प्रसूत काल स्त्रियों को खिलाने से उनकी शक्ति भी बढ़ती है। 

बबूल का पंचांग (जड़, तना, पत्ती, फल और फूल) लेकर पीस लें, और आधी मात्रा में मिश्री मिलाकर एक चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम नियमित सेवन करने से कुछ ही समय में लाभ मिलता है। 

बबूल की कच्ची फलियों के रस में 1 मीटर लंबे और 1 मीटर चौडे़ कपड़े को भिगोकर सुखा लेते हैं। एक बार सूख जाने पर उसे पुन: भिगोकर सुखाते है। इसी प्रकार इस प्रक्रिया को 14 बार करते हैं। इसके बाद उस कपड़े को 14 भागों में बांट लेते है, और प्रतिदिन एक टुकड़े को 250 मिलीलीटर दूध में उबालकर पीने से धातु की पुष्टि हो जाती है। 


3. शतावर :


शतावर रस या आंवला रस अथवा गोखरू काढ़ा शहद में मिलाकर पीने से वीर्य शुद्ध होता है। 

शतावर, सफेद मूसली, असगन्ध, कौंच के बीज, गोखरू और आंवला ये सभी बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें तीन-तीन ग्राम चूर्ण सुबह-शाम खाने से धातु (वीर्य) में वृद्धि होती है। 


4. गूलर :


गूलर का दूध बताशे में रख कर खाने से वीर्य शुद्ध होता है। 

पके गूलर का चूर्ण शहद या सेंधा नमक के साथ खाने से भी वीर्य शुद्ध होता है। 


5. धनिया : धनिया, पोस्त के बीज के साथ मिश्री मिलाकर खाना लाभदायक होता है।


6. छोटी दुधी : छोटी दुधी का चूर्ण मिश्री मिलाकर दूध के साथ खायें इससे वीर्य शुद्ध होता जाता है।


7. तालमखाना : तालमखाना मे मिश्री मिलाकर खाने से वीर्य शुद्ध यानी साफ हो जाता है।


8. चोबचीनी : चोबचीनी, सोठ, मोचरस, दोनों मूसली, काली मिर्च, वायविडंग और सौंफ सबको बराबर भाग में लेकर चूर्ण बनायें। बाद में 10 ग्राम की मात्रा में रोज खाकर ऊपर से मिश्री मिला दूध पी लें इससे वीर्य साफ होता है।


9. सांठी : सांठी की जड़ और काली मिर्च को पीसकर घी के साथ मिलाकर खाने से वीर्य शुद्ध होता है।


10. जायफल :


जायफल, जावित्री, माजूफल मस्तगी, नागकेसर, अकरकरा, मोचरस, वनशलोचन, अजवायन, छोटी इलायची दाना 10-10 ग्राम कूट कर छान लें। कीकर की गोंद में चने बराबर गोलियां बना छाया में सूखा लें। 1-1 गोली सुबह-शाम दूध या पानी से लें। 

जायफल 1 ग्राम रूमीमस्तगी, लौंग, छोटी इलायची दाना 2-2 ग्राम पीसकर शहद में मिलाकर चने के बराबर गोलियां बनाकर छाया में सुखा लें, संभोग (सहवास) से 2 घंटे पहले एक गोली गर्म दूध से लें। 

11. राल : राल को बारीक पीसकर 1-1 ग्राम सुबह-शाम पानी से वीर्य के रोग में सेवन करें।


12. दालचीनी :


दालचीनी 20 ग्राम पीसकर इसमें खांड़ 20 ग्राम मिलाकर 2-2 ग्राम की मात्रा मे सुबह-शाम दूध के साथ सेवन करें। 

दालचीनी और काले तिल 5-5 ग्राम पीस लें उसके बाद शहद में मिलाकर चने के बराबर गोलियां बना लें और छाया में सुखा दें। संभोग से 2 घंटे पहले एक गोली गर्म दूध से लें। 

3 ग्राम दालचीनी का चूर्ण रात में सोते समय गरम दूध के साथ खाने से वीर्य की वृद्धि होती है। 

दालचीनी को बहुत ही बारीक पीस लेते हैं। इसे 4-4 ग्राम सुबह व शाम को सोते समय दूध से फांके। इससे दूध पच जाता है और वीर्य की वृद्धि होती है। 


13. वंशलोचन : वीर्य दोष दूर करने के लिए वनंशलोचन 30 ग्राम और छोटी इलायची 3 ग्राम पीसकर 1-1 ग्राम सुबह-शाम घी व खांड़ में मिलाकर लें।


14. इमली :


300 ग्राम इमली के बीज को 500 मिलीलीटर पानी में 3 दिन तक भिगोयें। फिर इसका छिलका उतार कर छायां में सुखाकर अच्छी तरह पीसकर 10-10 ग्राम की मात्रा मे सुबह-शाम कम गर्म दूध से लें। 

इमली के बीजों के छोटे-छोटे टुकड़े कर रातभर पानी मे भिगा कर खाने से वीर्य पुष्ट होता है। 


15. लाजवन्ती : लाजवन्ती को संभोग के समय मुंह में रखने से वीर्य स्तंभन हो जाता है।


16. कीकर :


कीकर की गोंद 100 ग्राम भून लें इसे कूट कर असगंध पिसी 50 ग्राम मिलाकर रख दें। 5-5 ग्राम सुबह-शाम कम गर्म दूध से लें। 

कीकर के पत्ते छाया में सूखे 50 ग्राम कूट छानकर इसमें 100 ग्राम खांड़ मिलाकर 10-10 ग्राम सुबह-शाम दूध से लें। 


17. राई : राई, लौंग 5-5 ग्राम दालचीनी 10 ग्राम पीसकर 1-1 ग्राम सुबह-शाम दूध से लें।


18. सिम्बल : सिम्बल की जड़ 100 ग्राम कूटछान कर इसमें खांड़ 100 ग्राम मिलाकर 10-10 ग्राम सुबह-शाम गर्म दूध के साथ प्रयोग करने से वीर्य दोष दूर होते हैं।


19. असगंध नागोरी :


असगंध नागोरी, विधारा, सतावरी 50-50 ग्राम कूट छानकर रखें और 150 ग्राम खांड मिलाकर रखें। 10-10 ग्राम दूध से सुबह-शाम लें। 

नागौरी असगंध, गोखरू, शतावर तथा मिश्री मिलाकर खायें। 


20. वंशलोचन : 60 ग्राम वंशलोचन को पीसकर रखें। इसमें 40 ग्राम खांड़ मिलाकर रख लें। 5-5 ग्राम को सुबह-शाम दूध के साथ लेने से लाभ होता है।


21. फिटकरी : 30 ग्राम भुनी फिटकरी को 60 ग्राम खांड़ में मिलाकर रखें। 3-3 ग्राम सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करें।


22. कमलगट्ठा : कमल गट्ठा या बीज पीसकर शहद में मिलाकर नाभि पर लेप करने से वीर्य स्तम्भन हो जायेगा।


23. सफेद कनेर : सफेद कनेर की जड़ 2 अंगुल की कमर में बांधने से वीर्य स्तम्भन हो जाता है।


24. सौंठ : सौंठ, बूटी हजारदाना, नकछिकनी 50-50 ग्राम कूट छान कर 5-5 ग्राम सुबह-शाम कम गर्म दूध से लें। सौंठ, सतावर, गोरखमुण्डी 10-10 ग्राम पीसकर शहद मिला कर चने कें बराबर गोलियां बनाकर छायां में सुखा लें। सुबह और शाम भोजन के बाद 1-1 गोली दूध या पानी के साथ लें। वीर्य दोष में लाभ मिलेगा।


25. असगंध :


असगंध, विधारा 25-25 ग्राम कूट छान कर इसमें 50 ग्राम खांड को मिलाकर 10 ग्राम की मात्रा मे सोने से पहले गुनगुने दूध के साथ सेवन करने से बल वीर्य बढ़ता है। 

असगंध 300 ग्राम कूट छान कर 20 ग्राम को दूध 250 मिलीलीटर में गिराकर उबालें गाढ़ा होने पर खांड़ मिला कर पी लें। 


26. बहमन : बहमल लाल 50 ग्राम पीसकर 5 ग्राम को सुबह कम गर्म दूध के साथ सेवन करने से संभोग शक्ति बढ़ती है।


27. मुनक्का : 250 मिलीलीटर दूध में 10 मुनक्का उबालें फिर दूध में एक चम्मच घी व खांड़ मिला कर सुबह पीये।


28. कालीमिर्च : कालीमिर्च के साथ गोंदी के पत्ते मिलाकर घोटकर शर्बत की तरह 21 दिन तक पीने से वीर्य पुष्ट होता है।


29. गंगेरन : गंगेरन की जड़ की छाल के चूर्ण में उसी मात्रा में मिश्री मिलाकर 10 ग्राम की मात्रा दूध के साथ 7 दिनों तक खायें वीर्य पुष्ट होता है।


30. बदुफली : बदुफली के पौधे को थोडे पानी के साथ पीसकर कपड़े में छानकर रस को निकाल लें। 100 मिलीलीटर रस में 10 ग्राम शक्कर और आधे से एक ग्राम पीपल का चूर्ण मिलाकर 7 दिनों तक सुबह-शाम पीने से वीर्य बढ़ता है।

आज के समाज की संचाई


*1. अनपढ़ होते तो इतना तगड़ा जाल नहीं बुन पाते।*  

*वेद, पुराण, स्मृति, हदीस, कुरान, बाइबल —*  

*हजारों पन्ने, एक-एक शब्द नाप-तौल कर लिखा गया।*  

*मकसद साफ था:*  


 राजा को भगवान का दर्जा दो — ताकि विद्रोह न हो*  

*"राजा विष्णु का अंश है" — लिख दिया।*  

*अब राजा के खिलाफ बोलना = ईश्वर के खिलाफ बोलना।*  


* गरीबी को किस्मत बना दो — ताकि सवाल न उठे*  

*"पिछले जन्म का पाप", "अल्लाह की मर्जी", "कर्म का फल"*  

*लिख दिया। अब भूखा मजदूर मालिक से नहीं, अपने भाग्य से लड़ेगा।*  


*. औरत-शूद्र को पैर की जूती बना दो — ताकि सस्ता मजदूर मिले*  

*"ढोल गंवार शूद्र पशु नारी" — लिख दिया।*  

*"औरत की गवाही आधी" — लिख दिया।*  

*आधी आबादी + 85% आबादी को गुलाम बना दिया, कलम से।*  


*ये गंवार का काम नहीं है 

*ये दुनिया के सबसे बड़े साजिशकर्ता का काम है।*


*भोले-भाले लोगों को बेवकूफ कैसे बनाया?*


*1. डर बेचा:*  

*नर्क की आग, 84 लाख योनि, कब्र का अजाब।*  

*बच्चा पैदा होते ही डरा दो — पूरी जिंदगी गुलाम रहेगा।*


*2. लालच बेचा:*  

*स्वर्ग की अप्सरा, जन्नत की हूरें, अगला जन्म राजा का।*  

*"दुख सह लो, ऊपर मजा है।"*  

*मजदूर 12 घंटा खटता है — स्वर्ग के ठेके पर।*


*3. चमत्कार बेचा:*  

*पत्थर तैराना, मुर्दा जिलाना, चाँद तोड़ना।*  

*तर्क खत्म, भक्ति शुरू।*  

*जो चमत्कार मानेगा वो मशीन क्यों पूछेगा — "मुनाफा कहां जा रहा?"*


*4. बिचौलिया बैठा दिया:*  

*भगवान और इंसान के बीच — पंडित, पादरी, मौलवी।*  

*डायरेक्ट बात नहीं होगी।*  

*हर मन्नत का कमीशन, हर पाप का रेट कार्ड।*  

*ये दुनिया का सबसे पुराना दलाली का धंधा है।*


*नतीजा — "सदा-सदा के लिए थमने की व्यवस्था"*


*2000 साल पहले लिखी किताब,*  

*2026 में भी वही चला रही है।*  


*संविधान बदल जाता है, सरकार बदल जाती है,*  

*पर "जाति" नहीं बदलती, "नर्क का डर" नहीं बदलता।*  


*क्यों?*  

*क्योंकि कानून तोड़ो तो जेल।*  

*धर्म तोड़ो तो "समाज-से-बाहर + मरने-के-बाद-भी-सजा।"*  

*इससे तगड़ा लॉकअप कोई नहीं।*  


*पूंजीपति को यही चाहिए था।*  

*धर्मशास्त्र ने उसे दिया — "बिना खर्च का पुलिसवाला।"*  

*जो मजदूर के दिमाग में बैठा है।*  

*नाम है — "पाप-पुण्य।"*


*तो अब क्या करें ?*


*1. लिखने वाले को गाली देने से कुछ नहीं होगा।*  

*वो मर गए। पर उनकी व्यवस्था जिंदा है।*  

*उसे तोड़ना है।*


*2. भोले-भाले को बेवकूफ कहना बंद करो।*  

*वो मजबूर है। 5000 साल का डर 1 दिन में नहीं जाएगा।*  

*उसे तर्क दो, मिसाल दो, रोटी दो।*  

*जब पेट भरेगा, दिमाग खुलेगा।*


*3. नया शास्त्र लिखो — मेहनत का शास्त्र*  

*पहला मंत्र: "जो पैदा करेगा, वो खाएगा।"*  

*दूसरा मंत्र: "ऊंच-नीच मनुष्य का बनाया, प्रकृति का नहीं।"*  

*तीसरा मंत्र: "चमत्कार नहीं, विज्ञान। डर नहीं, सवाल।"*  


*जब हर मजदूर ये शास्त्र पढ़ लेगा —*  

*पुराना शास्त्र रद्दी हो जाएगा।*  


*चीन ने यही किया।*  

*माओ ने कहा — "कन्फ्यूशियस उखाड़ फेंको।"*  

*4 पुराने — पुराना विचार, पुरानी संस्कृति, पुराने रीति, पुराने रिवाज।*  

*तोड़ दिया। आगे बढ़ गए।*  


*हम कब तोड़ेंगे?*  

*जब तक हम "गंवार-धूर्त" बोलकर खुद को तसल्ली देंगे,*  

*तब तक उनकी लिखी व्यवस्था हमको थामे रखेगी।*  


*गाली नहीं, हथौड़ा चाहिए।*  

*किताब नहीं, कर्म चाहिए।*  


बाबासाहेब अंबेडकर

हां और ना

 हां और ना


 डेल कारनेगी कहता है कि अगर किसी को प्रभावित करना हो, किसी को बदलना हो, किसी का विचार रूपांतरित करना हो, तो ऐसी बात मत कहना जिसको वह पहले ही मौके पर ना  कह दे। क्योंकि अगर उसने पहले ही ना कह दी, तो उसका न का भाव मजबूत हो गया। अब दूसरी बात जों हो सकता था, पहले कही जाती, तो वह ही भी कह देता अब उस बात पर भी वह ना कहेगा। इसलिए पहले दो चार ऐसी बात करना उससे जिसमें वह हां कहे, फिर वह बात उठाना जिसमें साधारणत: उसने ना कही होती। चार हां कहने के बाद न कहने का भाव कमजोर हो जाता है। और जिस आदमी की हमने चार बात में हां भर दी, वृत्ति होती है उसकी पांचवीं बात में भी हां भर देने की। और जिस आदमी की हमने चार बात में ना कह दी, पांचवी बात में भी ना  कहने का भाव प्रगाढ़ हो जाता है।


डेल कारनेगी ने एक संस्मरण लिखा है, कि एक गांव में वह गया। जिस मित्र के घर ठहरा था, वह इंश्योरेंस का एजेंट था। और उस मित्र ने कहा कि तुम बड़ी किताबें लिखते हो कैसे जीतो मित्रता, कैसे प्रभावित करो। इस गाव में एक बुढ़िया है, अगर तुम उसका इंश्योरेंस करवा दो, तो हम समझें, नहीं तो सब बातचीत है।


डेल कारनेगी ने बुढ़िया का पता लगाया। बड़ा मुश्किल काम था, क्योंकि उसके दफ्तर में ही घुसना मुश्किल था। जैसे ही पता चलता कि इंश्योरेंस एजेंट, लोग उसे वहीं से बाहर कर देते। बुढ़िया अस्सी साल की विधवा थी, करोड़पति थी, बहुत कुछ उसके पास था, लेकिन इंश्योरेंस के बिलकुल खिलाफ थी। जहां घुसना ही मुश्किल था, उसको प्रभावित करने का मामला अलग था।


डेल कारनेगी ने लिखा है कि सब पता लगा कर, पांच बजे सुबह मैं उसके बगीचे की दीवाल के बाहर के पास घूमने लगा जाकर। बुढिया छह बजे उठती थी। वह अपने बगीचे में आई, मुझे अपनी दीवाल के पास फूलों को देखते हुए खड़े होकर उसने पूछा कि फूलों के प्रेमी हो? तो मैंने उससे कहा कि फूलों का प्रेमी हूं जानकार भी हूं; बहुत गुलाब देखे सारी जमीन पर, लेकिन जो तुम्हारी बगिया में गुलाब हैं, इनका कोई मुकाबला नहीं है। बुढ़िया ने कहा, भीतर आओ दरवाजे से। बुढ़िया साथ ले गई बगीचे में, एक एक फूल बताने लगी! मुर्गियां बताईं, कबूतर बताए, पशु पक्षी पाल रखे थे, वे सब बताए.। और डेल कारनेगी ने यस मूड पैदा कर लिया।


रोज सुबह का यह नियम हो गया। दरवाजे पर बुढ़िया उसके स्वागत के लिए तैयार रहती। दूसरे दिन बुढ़िया ने चाय भी पिलाई, नाश्ता भी करवाया। तीसरे दिन बगीचे में घूमते हुए उस बुढ़िया ने पूछा कि तुम काफी होशियार और कुशल और जानकार आदमी मालूम पड़ते हो, इंश्योरेंस के बाबत तुम्हारा क्या खयाल है? इंश्योरेंस के लोग मेरे पीछे पड़े रहते हैं, यह योग्य है करवाना कि नहीं? तब डेल कारनेगी ने उससे इंश्योरेंस की बात शुरू की। लेकिन अभी भी कहा नहीं कि मैं इंश्योरेंस का एजेंट हूं क्योंकि उससे ना  का भाव पैदा हो सकता है। जिंदगी भर जिसने इंश्योरेंस के एजेंट को इनकार किया हो, उससे ना का भाव पैदा हो सकता है। लेकिन सातवें दिन इंश्योरेंस डेल कारनेगी ने कर लिया। जिससे हा का संबंध बन जाए, उस पर आस्था बननी शुरू होती है। जिस पर आस्था बन जाए, भरोसा बन जाए, उसको ना कहना मुश्किल होता चला जाता है। अंगुली पकड़ कर ही पूरा का पूरा हाथ पकड़ा जा सकता है।


तो श्रुति अज्ञानी से ऐसी भाषा में बोलती है कि उसे हां  का भाव पैदा हो जाए। तो ही आगे की यात्रा है। अगर सीधे कहा जाए. न कोई संसार है, न कोई देह है, न तुम हो। अज्ञानी कहेगा, तो बस अब काफी हो गया, इसमें कुछ भी भरोसे योग्य नहीं मालूम होता।


इसलिए श्रुति कहती है अज्ञानी से कि देह आदि सत्य है, तुम्हारा संसार बिलकुल सत्य है। अज्ञानी की रीढ़ सीधी हो जाती है, वह आश्वस्त होकर बैठ जाता है कि यह आदमी खतरनाक नहीं है, और हम एकदम गलत नहीं हैं। क्योंकि किसी को भी यह लगना बहुत दुखद होता है कि हम बिलकुल गलत हैं। थोडे तो हम भी सही हैं! थोड़ा जो सही है, उसी के आधार पर आगे यात्रा हो सकती है।


मानव शरीर-एक नयी दृस्टि

 मानव शरीर--एक नयी दृस्टि


      एक_साधारण_मनुष्यात्मा_अध्यात्मिक_मार्ग पर धीरे-धीरे चलती हुई उन्नति की चरम सीमा पर पहुँचती है परिणामस्वरूप उसे उपलब्ध होती है-

विशुद्ध दिव्य अवस्था। योग की दृष्टि से यह परम सौभाग्य है और ऐसा सौभाग्य विरले ही किसी मनुष्यात्मा को प्राप्त होता है। इस परम आध्यात्मिक प्राप्ति के मूल में है--ज्ञान और कर्म। यह प्राप्ति संभव है मानव शरीर में। मानव योनि को छोड़कर सभी योनियाँ यहां तक कि देवयोनि भी भोगयोनियां हैं। लेकिन एकमात्र मानव योनि ही एक ऐसी योनि है जो भोगयोनि के साथ-साथ कर्मयोनि भी है। मनुष्य ज्ञान भी प्राप्त करता है और कर्म भी करता है। लेकिन उपलब्ध ज्ञान के अनुसार कर्म नहीं करता। ज्ञान कुछ और है और कर्म कुछ और। यही आध्यात्मिक मार्ग में सबसे बड़ी बाधा है। ज्ञान के अनुसार कर्म और आचरण करने वाला सच्चा मनुष्य है।

       इसके मूल में 'प्रज्ञा' है क्योंकि प्रज्ञा का सीधा सम्बन्ध आत्मा से है। आत्मा ज्ञान-विज्ञान का भण्डार है। प्रज्ञा द्वारा ही वह बाहर निकलता है। कहा जाता है--"प्रज्ञावान लभते ज्ञानम्।" प्रज्ञावान को ही ज्ञान प्राप्त होता है। प्रज्ञा ही ज्ञान को कर्म में और कर्म को ज्ञान में नियोजित करती है। यह कार्य अति कठिन है--एक घाट पर बाघ और बकरी को एक साथ पानी पिलाने के समान है। 

      हमें अपनी प्रज्ञा के बारे में कुछ पता नहीं है। उसका बोध हमें तभी हो सकता है जब हम अपने आपको, अपने सम्पूर्ण व्यक्तित्व को चारों ओर से समेंट कर अपने आप से पूछें कि 'हम कौन हैं' ? यह प्रश्न यदि हम बार-बार दोहराते रहें तो एक-न-एक दिन हमारे भीतर  प्रज्ञा का बोध जागृत हो जायेगा और इसके जागृत होते ही ज्ञान और कर्म के परस्पर नियोजित होने की कला भी उपलब्ध हो जायेगी।

      प्रज्ञा मनुष्य के आलावा और किसी प्राणी के पास नहीं है। इस कारण मनुष्य शरीर अति मूल्यवान है। जरा सोचिये--परब्रह्म परमात्मा भी मनुष्य शरीर प्राप्त करने के लिए अवसर की प्रतीक्षा करता है। आश्चर्य की बात है कि इतना मूल्यवान, इतना दुर्लभ होते हुए भी मानव शरीर को समझने में मानवता ने बराबर भूल की है।

      केवल शरीर ही ऐसी चीज़ है जो मनुष्य के अत्यंत समीप है और सबसे प्रमाणिक मित्र भी। उससे मनुष्य शत्रुता क्यों रखता है ?

     भारतीय भाषाओँ में शरीर के लिए जो भी शब्द हैं, वे सब उसकी क्षुद्रता और नश्वरता के प्रतीक हैं। 

1-शरीर---शरीर का अर्थ है जो निरन्तर क्षीण हो रहा है (शीर्यते इति शरीरः)।


2-देह-- देह का अर्थ है जिसका दहन किया जाता है।


3-तनु(तन) -- जो आकार में छोटी हो।


4-काया-- काया वह है जिसे काल दबोच लेता है।


5-घट (घड़ा)--घड़ा तो फूटने के लिए ही बना है।

      समस्त आध्यात्मिक ग्रन्थ और महात्मा बार-बार मनुष्य को सतर्क करते रहे हैं कि देह मिट्टी की बनी है और एक दिन मिटटी में ही मिल जायेगी, उस पर ध्यान मत देना। हमारा तो कहना है कि मिट्टी में जब मिलेगी तब मिलेगी, लेकिन जब तक उसमें जी रहे हैं तब तक क्या उसकी उपेक्षा करें ?

     इस प्राणवान अद्भुत यंत्र की महिमा का वर्णन करने वाला कोई शास्त्र इस संसार में नहीं है--एक 'तंत्र' को छोड़ कर। क्या इसका कारण यह हो सकता है कि जिस समय ये शास्त्र निर्मित हुए, उस समय मनुष्य अपने शरीर के प्रति अत्यंत आसक्त रहा हो। उसका जीवन शरीर-ही-शरीर रहा हो। भोग में लिप्त मनुष्य की ऑंखें इन्द्रियों के ऊपर उठती ही न हों और उसे सावधान करने के लिए ज्ञानियों ने शरीर की निन्दा की हो। फिर ईसाईयत का विस्तार हुआ और नैतिकता की ऐसी पकड़ हुई मानव के सभी अंगों को उसने ग्रसित कर लिया। नैतिकता नैसर्गिक वस्तु नहीं है।(नैतिकता की नकाब के पीछे घोर अनैतिकता मौजूद है। अनैतिकता को ढकने के लिए ही नैतकता का चोंगा पहना गया है।) नैसर्गिक के बिलकुल विरुद्ध है यह। शरीर ही सबसे नैसर्गिक चीज़ है जो मनुष्य के अत्यन्त निकट है इसीलिए उसी का दमन सबसे अधिक हुआ है।

      शरीर को मानने वाला एक वर्ग अवश्य है जो गलत कारणों से शरीर को देता है महत्व। एक सूत्र भारत में बहुत प्रचलित है--"शरीरमाद्यम् खलु धर्म साधनम्।" धर्म को साधने का सबसे पहला साधन शरीर है।

      लेकिन इसके मर्म को बिना समझे उन लोगों ने इसे अपना लिया जो केवल शरीर को ही महत्व देते हैं। जो शरीर को व्यायाम के द्वारा केवल बलिष्ठ बनाने के चक्कर में ही पड़े रहते हैं। ध्यान और योग के प्रचलित रूप भी इसके पीछे पड़े रहते हैं। प्रचलित प्राणायाम भी शरीर की केवल बलिष्ठता की ओर ही ले जाते हैं, देह के रहस्य जानने के लिए नहीं, इसमें निहित असीम ऊर्जा के रहस्य को जानने के लिए नहीं। वे शरीर को मन का गुलाम बना कर अति प्रसन्न होते हैं। उनके लिए योग का अर्थ है--इन्द्रियों का दमन कर शरीर को अपने वश में करना।

      एकमात्र तंत्र ही ऐसा शास्त्र है जो शरीर को अन्तर्विज्ञान की दृष्टि से देखता है। उसने शरीर को बहुत सम्मान दिया है। शरीर की निसर्गदत्त प्रज्ञा, अद्भुत कार्य-प्रणाली,उसकेे भीतर के रहस्यों की पर्त--इन सबकी ओर तंत्रशास्त्र ने बार-बार हमारा ध्यान आकृष्ट किया है।

प्रेम की ओर ले जाने वाले हार्मोन

 प्रेम की ओर ले जाने वाले हार्मोन: जैव-रासायनिक, मनोवैज्ञानिक एवं दार्शनिक समन्वय”


✓•१. प्रस्तावना:

मानव जीवन में “प्रेम” केवल भावनात्मक अनुभव नहीं, बल्कि एक जटिल न्यूरो-एंडोक्राइन (Neuro-Endocrine) प्रक्रिया है, जिसमें मस्तिष्क, हार्मोन, न्यूरोट्रांसमीटर तथा सामाजिक-व्यवहारिक तत्त्व एक साथ कार्य करते हैं। संलग्न चित्र में चार प्रमुख रासायनिक कारकों—ऑक्सीटोसिन, डोपामिन, सेरोटोनिन, तथा टेस्टोस्टेरोन-एस्ट्रोजन—को “प्रेम के हार्मोन” के रूप में दर्शाया गया है।


यह शोधप्रबंध इन सभी हार्मोनों की वैज्ञानिक संरचना, कार्य-प्रणाली, व्यवहारिक प्रभाव, तथा भारतीय दार्शनिक दृष्टिकोण के साथ उनका समन्वय प्रस्तुत करता है।


✓•२. प्रेम का जैव-रासायनिक आधार

प्रेम को आधुनिक विज्ञान तीन चरणों में विभाजित करता है:


•१. आकर्षण (Attraction)

•२. आसक्ति (Attachment)

•३. बंधन (Bonding)


•इन तीनों अवस्थाओं में भिन्न-भिन्न हार्मोन प्रमुख भूमिका निभाते हैं।


✓•३. ऑक्सीटोसिन (Oxytocin): “लव हार्मोन”


✓•३.१ परिचय:

ऑक्सीटोसिन एक पेप्टाइड हार्मोन है, जो हाइपोथैलेमस में निर्मित होकर पिट्यूटरी ग्रंथि से स्रावित होता है।


✓•३.२ कार्य-प्रणाली:

स्पर्श (Touch), आलिंगन (Hug), और निकटता से इसका स्तर बढ़ता है।

यह “Trust Hormone” भी कहलाता है।


✓•३.३ न्यूरोलॉजिकल प्रभाव:

ऑक्सीटोसिन मस्तिष्क के Amygdala को शांत करता है, जिससे भय और संदेह कम होते हैं।


✓•३.४ सामाजिक प्रभाव:

रिश्तों में विश्वास, अपनापन, और सुरक्षा उत्पन्न करता है।

माता-शिशु संबंध में अत्यंत महत्वपूर्ण।


✓•३.५ शास्त्रीय समन्वय:

भारतीय दर्शन में यह “स्नेह रस” का जैविक आधार माना जा सकता है।

“स्नेहात् बन्धनं जायते” — यह सूत्र ऑक्सीटोसिन की कार्यप्रणाली से मेल खाता है।


✓•४. डोपामिन (Dopamine): “खुशी का हार्मोन”


✓•४.१ परिचय:

डोपामिन एक न्यूरोट्रांसमीटर है, जो मस्तिष्क के Reward Circuit में सक्रिय रहता है।


✓•४.२ कार्य-प्रणाली:

किसी प्रिय व्यक्ति के संपर्क से “Reward Signal” उत्पन्न करता है।

“Motivation” और “Desire” को बढ़ाता है।


✓•४.३ व्यवहारिक प्रभाव:

व्यक्ति बार-बार उसी अनुभव को दोहराना चाहता है।

प्रेम के प्रारंभिक चरण में “Obsessive Thinking” उत्पन्न करता है।


✓•४.४ वैज्ञानिक विश्लेषण:

डोपामिन का संबंध Ventral Tegmental Area (VTA) और Nucleus Accumbens से है।


✓•४.५ दार्शनिक दृष्टि:

यह “रति” और “काम” के तत्त्व से जुड़ा है।

कामदेव की अवधारणा को डोपामिन के न्यूरो-रासायनिक प्रभाव से जोड़ा जा सकता है।


✓•५. सेरोटोनिन (Serotonin): “मूड नियंत्रक”


✓•५.१ परिचय:

सेरोटोनिन एक प्रमुख न्यूरोट्रांसमीटर है, जो मानसिक संतुलन बनाए रखता है।


✓•५.२ कार्य-प्रणाली:

मूड, नींद, और भूख को नियंत्रित करता है।

प्रेम के प्रारंभिक चरण में इसका स्तर कम हो सकता है।


✓•५.३ प्रभाव:


•कम स्तर → बार-बार उसी व्यक्ति के बारे में सोचना


•यह अवस्था Obsessive-Compulsive Disorder (OCD) जैसी होती है।


✓•५.४ वैज्ञानिक दृष्टि:

सेरोटोनिन का स्तर कम होने पर “Intrusive Thoughts” बढ़ते हैं।


✓•५.५ भारतीय समन्वय:

यह “चित्त वृत्ति” से संबंधित है।

पतंजलि योगसूत्र:

“योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः” — सेरोटोनिन संतुलन इसी नियंत्रण का जैविक आधार है।


✓•६. टेस्टोस्टेरोन एवं एस्ट्रोजन: “आकर्षण हार्मोन”


✓•६.१ परिचय:


•टेस्टोस्टेरोन → मुख्यतः पुरुषों में


•एस्ट्रोजन → मुख्यतः महिलाओं में


✓•६.२ कार्य:

•शारीरिक आकर्षण और यौन इच्छा को बढ़ाना

•रोमांटिक व्यवहार को प्रेरित करना


✓•६.३ जैविक प्रभाव:

Secondary Sexual Characteristics को प्रभावित करते हैं

आकर्षण की दिशा निर्धारित करते हैं


✓•६.४ मनोवैज्ञानिक प्रभाव:

•Desire और Passion को उत्पन्न करते हैं


✓•६.५ तांत्रिक दृष्टिकोण:

•भारतीय तंत्र में यह “शिव-शक्ति ऊर्जा” का प्रतिनिधित्व करता है।


•टेस्टोस्टेरोन → शिव तत्त्व


•एस्ट्रोजन → शक्ति तत्त्व


✓•७. हार्मोनल समन्वय (Integrated Model):

प्रेम केवल एक हार्मोन का परिणाम नहीं है, बल्कि यह एक Complex Neurochemical Symphony है:


चरण प्रमुख हार्मोन

आकर्षण टेस्टोस्टेरोन, एस्ट्रोजन

उत्साह डोपामिन

आसक्ति सेरोटोनिन (कम स्तर)

बंधन ऑक्सीटोसिन


✓•८. गणितीय एवं ऊर्जा मॉडल

यदि हम प्रेम को एक समीकरण के रूप में व्यक्त करें:


•प्रेम (Love) = f (Oxytocin + Dopamine + Serotonin + Hormonal Balance)


|यह एक Non-linear Dynamic System है, जहाँ प्रत्येक हार्मोन का योगदान समय के साथ बदलता है।


✓•९. आधुनिक अनुसंधान

नवीनतम न्यूरोसाइंस शोध के अनुसार:


•fMRI स्कैन से यह सिद्ध हुआ है कि प्रेम में वही क्षेत्र सक्रिय होते हैं जो नशे (Addiction) में होते हैं।


•ऑक्सीटोसिन स्प्रे से सामाजिक विश्वास बढ़ता है।


•डोपामिन असंतुलन से “Love Addiction” उत्पन्न हो सकता है।


✓•१०. वैदिक एवं दार्शनिक समन्वय

भारतीय ग्रंथों में प्रेम को चार स्तरों पर समझा गया है:


•१. काम (Physical Desire) → टेस्टोस्टेरोन/एस्ट्रोजन

•२. रति (Pleasure) → डोपामिन

•३. प्रेम (Emotional Bond) → ऑक्सीटोसिन

•४. भक्ति (Spiritual Love) → सेरोटोनिन संतुलन


✓•११. आलोचनात्मक विश्लेषण

•यह हार्मोनों की जटिलता को पूर्णतः नहीं दर्शाता।

•वास्तविकता में ये हार्मोन एक-दूसरे के साथ इंटरैक्ट करते हैं।

•सामाजिक, सांस्कृतिक, और मनोवैज्ञानिक कारक भी उतने ही महत्वपूर्ण हैं।


✓•१२. निष्कर्ष:

•प्रेम एक बहुआयामी प्रक्रिया है, जिसमें:

•जैव-रसायन (Biochemistry)

•तंत्रिका-विज्ञान (Neuroscience)

•मनोविज्ञान (Psychology)

•दर्शन (Philosophy)

सभी का समन्वय होता है।


•ऑक्सीटोसिन संबंधों को स्थिर करता है, डोपामिन उत्साह उत्पन्न करता है, सेरोटोनिन संतुलन बनाए रखता है, और टेस्टोस्टेरोन-एस्ट्रोजन आकर्षण को जन्म देते हैं।


•अतः प्रेम केवल हृदय का विषय नहीं, बल्कि मस्तिष्क, हार्मोन और चेतना का समेकित विज्ञान है।


✓•१३. उपसंहार:

यदि वैज्ञानिक भाषा में कहा जाए तो प्रेम एक “Neurochemical Orchestra” है, और यदि दार्शनिक भाषा में कहा जाए तो यह “आत्मा और प्रकृति का संयोग” है।


इस प्रकार संलग्न चित्र एक आधार प्रदान करता है, परंतु उसका विस्तृत विश्लेषण हमें यह समझाता है कि प्रेम न केवल अनुभव है, बल्कि एक सुसंगठित जैव-ऊर्जात्मक तंत्र भी है।


Some Full form of Medical Test

 1. OT → Operation Theatre

2. OPD → Out Patient Department

3. ICU → Intensive Care Unit

4. ECG → Electro Cardio Gram

5. CT Scan → Computed Tomography Scan

6. BP → Blood Pressure

7. BMI → Body Mass Index

8. CBC → Complete Blood Count

9. LFT → Liver Function Test

10. KFT → Kidney Function Test

11. RBS → Random Blood Sugar

12. HR → Heart Rate

13. Hb → Hemoglobin

14. WBC → White Blood Cells

15. RBC → Red Blood Cells

16. PLT → Platelet Count

17. ESR → Erythrocyte Sedimentation Rate

18. CRP → C-Reactive Protein

19. TSH → Thyroid Stimulating Hormone

20. Lipid Profile → Cholesterol Test

21. HbA1c → Average Blood Sugar (3 Months)

22. SGPT → Liver Enzyme Test

23. SGOT → Liver Enzyme Test

24. Creatinine → Kidney Function Indicator

25. Urea → Kidney Function Test

26. Sodium → Electrolyte Level

27. Potassium → Electrolyte Level

28. Calcium → Bone Health Indicator

29. Vitamin D → Vitamin Level Test

30. Vitamin B12 → Nerve Health Vitamin

Scientific Impact Over Human Life

 रात के 11:11 बज रहे हैं…

कमरे में हल्की रोशनी है।

आपके फोन की स्क्रीन अचानक चमक उठती है -


आप देखते हैं...

एक नाम… 

वही, जिसके बारे में आप कुछ सेकंड पहले सोच रहे थे।


आप ठहर जाते हैं।


मन के भीतर एक धीमी सी आवाज़ उठती है -

“ये सिर्फ इत्तेफाक नहीं हो सकता…”


और यहीं से कहानी शुरू होती है।


✔️ जब जीवन “संकेतों” की भाषा बोलने लगता है…


कभी आपने महसूस किया है -


आप किसी सवाल में उलझे होते हैं…

और अचानक -


सड़क किनारे एक होर्डिंग जवाब दे देता है


रेडियो पर बजता गाना वही कहता है, जो आप सुनना चाहते थे


एक अजनबी, बिना जाने, वही बात कह देता है जो आपके अंदर चल रही थी


आप ठहर जाते हैं…

और सम्भवतः कई बार आपको ऐसा महसूस होता है -


“शायद कुछ है… जो मुझे देख रहा है, गाइड कर रहा है…”


✔️ सिंक्रोनिटी: बाहर का खेल या भीतर का दर्पण?


 प्रसिद्ध वैज्ञानिक Carl Jung ने इसे “Synchronicity” कहा -

Meaningful Coincidence।


लेकिन उन्होंने यह नहीं कहा कि

“ब्रह्मांड आपके लिए घटनाएँ arrange कर रहा है”


उन्होंने सिर्फ इतना कहा -


“जब भीतर और बाहर एक ही लय में आ जाते हैं… तो घटनाएँ अर्थपूर्ण लगने लगती हैं”


✨️ एक दृश्य सोचिए…


आप एक भीड़भाड़ वाली सड़क पर खड़े हैं।


हजारों आवाज़ें हैं…

हजारों चेहरे…

हजारों शब्द…


लेकिन तभी -

कोई एक शब्द आपके भीतर गहरे तक उतर जाता है।


क्यों?

क्या पूरी दुनिया आपके लिए रुकी थी?

या आपका ध्यान पहली बार जागा था?


👉 विज्ञान का कैमरा : Reality नहीं, Focus बदलता है


ऐसा समझें कि आपका दिमाग एक कैमरा है -

और उसका lens है आपका “attention”


जब भी अंदर कोई सवाल गूंज रहा होता है -

तो दिमाग उसी से जुड़े clues को पकड़ने लगता है।


👉 यही कारण है कि:


कोई नई कार लेने का सोचो… तो वही कार आपको हर जगह दिखने लगती है


किसी व्यक्ति को याद करो… तो उसका कॉल आ जाता है


Reality वही रहती है…

बस आपका focus zoom हो जाता है।


👉 पर कहानी यहीं खत्म नहीं होती…


क्योंकि जब आप “शून्य” के करीब आते हैं…

जब आप “अकर्ता भाव” में उतरते हैं…


तो जीवन मे एक shift होता है -


👉 आप react करना छोड़ देते हैं

👉 आप observe करना शुरू कर देते हैं


और अचानक -


जीवन अस्तव्यस्त नहीं लगता…

एक pattern जैसा लगने लगता है।


👉 जुंग और पॉली थ्योरी 


नोबेल पुरस्कार विजेता भौतिक विज्ञानी वोल्फगैंग पॉली और जुंग का मानना था कि मन और पदार्थ (Mind and Matter) अलग नहीं हैं। जब आपका अवचेतन मन किसी चीज़ पर गहराई से केंद्रित होता है, तो वह बाहरी परमाणु संरचना (Atomic Structure) को प्रभावित करने लगता है।


“जैसे मन और पदार्थ के बीच कोई अदृश्य पुल है…”


यह कोई सिद्ध विज्ञान नहीं था…

पर एक गहरा संकेत जरूर था -


कि जो हम “अंदर” महसूस करते हैं,

वह पूरी तरह “बाहर” से अलग नहीं है।


✔️ लेकिन मुझे लगता है कि …


हम जिसे “संकेत” कहते हैं…

अक्सर वह हमारा ही “projection” होता है।


आप 100 लोगों के बारे में सोचते हैं -

फिर किसी एक का कॉल आ जाता है… और वही याद रह जाता है।


आप दिन में 50 बार घड़ी देखते हैं -

एक बार 11:11 दिखता है… और वही “special” बन जाता है।


हमारा दिमाग patterns बनाता है…

और फिर उन्हीं patterns में meaning ढूंढता है।


👉 तो क्या सब illusion है?


नहीं।


यह illusion नहीं है…

यह interpretation है।


और यही इसकी खूबसूरती है।


👉 असल बदलाव कब और कैसे होता है?


जब आप “शून्य” में होते हैं -


● मन शांत होता है


● ध्यान बिखरा नहीं होता


● भीतर कोई शोर नहीं होता


तब आप पहली बार life को “clear signal” में देखते हैं।


👉 इसलिए ऐसा लगता है कि -

“ब्रह्मांड मेरे साथ है”


पर असल में -


आप खुद के साथ आ जाते हैं।


👉 एक और दृश्य…


कल्पना कीजिए -


आप एक तालाब के किनारे खड़े हैं।


आपने पानी में पत्थर फेंका ...

तालाब की मिट्टी और लहरों ने पानी को गन्दा कर दिया।


फिर थोड़ी देर में...


पहले जो पानी गंदला था…

कुछ भी साफ नहीं दिखता था…


वो धीरे-धीरे -

फिर से शांत हो गया…


और अब -

पानी में आसमान भी दिख रहा है…

तारे भी… और आपका चेहरा भी…

क्या आसमान नीचे आया है?


नहीं।


केवल पानी साफ हुआ है।


✅️ आज का refined अभ्यास 


आज आपको जासूस बनना है … 


1. जब भी कोई “संयोग” दिखे - थोड़ा रुकिए


2. खुद से पूछिए :


✔️ “मैं अभी क्या सोच रहा था?”

✔️ “क्या यह मेरे internal pattern का reflection है?”


3. फिर decide कीजिए :


यह “बाहरी संकेत” है

या... 

आपके “भीतर का projection”


✅️ ध्यान रखें 


हो सकता है कि ब्रह्मांड आपको रास्ता नहीं दिखा रहा…


शायद आप स्वयं पहली बार जागृत होकर देख पा रहे हैं।


और फर्क बहुत बड़ा है।


क्योंकि -

अगर यह “संकेत” बाहर से आ रहे हैं, तो आप निर्भर हैं…

लेकिन अगर यह “पैटर्न” भीतर से उठ रहे हैं,

तो आप जाग रहे हैं।


और जागना…

हमेशा चमत्कार से ज्यादा शक्तिशाली होता है।



मिडिल क्लास महिलाओं की भूमिका

 "मिडिल क्लास महिलाओं की भूमिका: दिखने वाली आज़ादी और अदृश्य सीमाएं"


हमारे देश में जब भी बदलाव, विकास या सामाजिक जागरूकता की बात होती है, तो अक्सर मिडिल क्लास पुरुषों की भूमिका साफ़ तौर पर दिखाई देती है। वे आंदोलनों में दिखते हैं, बहस करते हैं, सिस्टम को चुनौती देते हैं और अपने विचार खुलकर रखते हैं। लेकिन अगर हम उसी नजर से मिडिल क्लास महिलाओं को देखें, तो उनकी भूमिका उतनी स्पष्ट या प्रभावशाली नहीं दिखती। ऐसा क्यों है?


असल में, यह कमी महिलाओं की क्षमता या इच्छा में नहीं है, बल्कि उस “अदृश्य ताकत” में है जो उन्हें सीमाओं में बांधकर रखती है।


अदृश्य ताकत क्या है?


यह कोई एक व्यक्ति या संस्था नहीं है। यह समाज की सोच, परंपराएं, परिवार की उम्मीदें, और “लोग क्या कहेंगे” जैसे विचारों का मिश्रण है। यह ताकत दिखाई नहीं देती, लेकिन इसका असर हर जगह होता है घर में, दफ्तर में, रिश्तों में और यहां तक कि महिलाओं के अपने विचारों में भी।


"जगह तो मिलती है, लेकिन पूरी आज़ादी नहीं"


आज की मिडिल क्लास महिलाएं पढ़-लिख रही हैं, नौकरी कर रही हैं, अपने पैरों पर खड़ी हो रही हैं। वे सिस्टम में अपनी जगह बना रही हैं, लेकिन यह जगह पूरी तरह से उनकी अपनी नहीं होती।


उन्हें आगे बढ़ने की छूट तो मिलती है, लेकिन उतनी ही जितनी समाज का संतुलन बना रहे। यानी, वे काम कर सकती हैं, पर “बहुत ज्यादा” आगे न बढ़ें। वे बोल सकती हैं, पर “सीमा में” रहकर। वे लिख सकती हैं, पर ऐसे विषयों पर नहीं जो सीधे उस व्यवस्था को चुनौती दें।


"अभिव्यक्ति की सीमाएं"


कई महिलाएं कविता लिखती हैं, लेख लिखती हैं, अपनी भावनाएं व्यक्त करती हैं। लेकिन अक्सर यह अभिव्यक्ति व्यक्तिगत अनुभवों तक सीमित रहती है। जब बात उस अदृश्य ताकत यानी पितृसत्ता, सामाजिक दबाव और दोहरे मापदंड पर सीधा प्रहार करने की आती है, तो वहां एक डर, एक झिझक सामने आ जाती है।


यह झिझक केवल व्यक्तिगत नहीं होती, बल्कि समाज द्वारा बनाई गई होती है।


“मर्यादा” का अदृश्य घेरा


महिलाओं को बचपन से “मर्यादा” सिखाई जाती है। यह मर्यादा क्या है, इसकी कोई स्पष्ट परिभाषा नहीं होती, लेकिन इसकी सीमा हर जगह मौजूद होती है।


कैसे बोलना है


क्या पहनना है


किस विषय पर बात करनी है


कितना विरोध करना है


इन सब पर एक अनकहा नियम लागू रहता है। यह नियम दिखाई नहीं देता, लेकिन हर समय महसूस होता है।


"विरोध की कीमत"


कुछ महिलाएं इन सीमाओं को तोड़ने की कोशिश करती हैं। वे खुलकर बोलती हैं, सवाल उठाती हैं, व्यवस्था को चुनौती देती हैं। लेकिन अक्सर उनके साथ क्या होता है?


उन्हें “अलग” कर दिया जाता है।

उनकी बातों को गंभीरता से नहीं लिया जाता।

और सबसे आम तरीका उनके चरित्र पर सवाल उठाना।


यह एक ऐसा हथियार है, जिससे किसी भी महिला की आवाज़ को आसानी से दबाया जा सकता है।


नतीजा क्या है?


इस पूरे माहौल का असर यह होता है कि बहुत सी महिलाएं अपनी पूरी क्षमता के बावजूद पीछे रह जाती हैं। वे जानती हैं कि क्या गलत है, क्या बदलना चाहिए, लेकिन खुलकर बोलने की कीमत बहुत बड़ी होती है।


इसलिए वे समझौता कर लेती हैं, सीमाओं के अंदर रहकर ही आगे बढ़ने की कोशिश करती हैं।



अनुभव की विधि

 "अनुभव की वह विधि "


एक युवक था। नाम उसका महत्वपूर्ण नहीं, क्योंकि उसकी कहानी किसी एक व्यक्ति की नहीं, हम सबकी है।


वह खोज में था सत्य की, शांति की, किसी अंतिम उत्तर की।


वह आश्रम से आश्रम भटकता रहा।

कहीं उसे श्वास पर ध्यान सिखाया गया “सांस को देखो, वही द्वार है।”

कहीं उसे मंत्र मिला “इस ध्वनि में डूब जाओ।”

कहीं कहा गया “सब शून्य है, बस शून्यता को पहचानो।”


हर बार शुरुआत में उसे लगता “बस, यही है!”

पर कुछ ही दिनों में वही विधि बोझ बन जाती।

मन उसे पकड़ लेता… और खेल बना देता।


धीरे-धीरे उसकी थकान बढ़ने लगी।


एक दिन वह नदी किनारे रहने वाले एक वृद्ध साधक के पास पहुँचा।


वह कोई प्रसिद्ध गुरु नहीं थे।

न उनके शिष्य थे, न कोई आश्रम।

बस एक झोपड़ी, एक नदी… और एक गहरी शांति।


युवक ने उनके सामने बैठते ही कहा


“मैं थक गया हूँ।

हर विधि कुछ समय बाद बेकार हो जाती है।

क्या कोई ऐसी विधि है… जो सच में नई हो?”


वृद्ध ने उसे देखा।


उनकी आँखों में करुणा थी, पर कोई उत्साह नहीं जैसे वे कुछ साबित नहीं करना चाहते।


उन्होंने धीमे से कहा....


“विधि कभी नई नहीं होती…

दृष्टि नई होती है।”


युवक को यह उत्तर अधूरा लगा।

उसे कुछ ‘खास’ चाहिए था।


पहला दिन: अलग-अलग या एक?


वृद्ध उसे नदी के पास ले गए।


“बैठो,” उन्होंने कहा,

“सांस को महसूस करो…

नदी की ध्वनि सुनो…

और भीतर जो उठे, उसे भी देखो।”


युवक चौंका...

“यह तो उलझन है! ध्यान तो एकाग्रता है, और ये तीन-तीन चीज़ें!”


पर उसने कोशिश की।


कुछ देर बाद उसके भीतर एक सूक्ष्म बदलाव होने लगा...


उसे लगा, सांस अलग नहीं है…

नदी की आवाज़ अलग नहीं है…

भीतर के विचार भी अलग नहीं हैं…


सब एक ही प्रवाह में हो रहा है।


जैसे जीवन टुकड़ों में नहीं, एक ही धारा में बह रहा हो।


वृद्ध ने बाद में समझाया...


“देखो, तुम हमेशा चीज़ों को अलग-अलग पकड़ते हो...

‘यह मैं हूँ’, ‘यह बाहर है’, ‘यह विचार है’।


पर क्या वास्तव में ऐसा है?


जैसे नदी में लहर, धारा और पानी अलग नहीं होते वैसे ही अनुभव के ये हिस्से भी अलग नहीं हैं।


तुम्हारा मन उन्हें बाँटता है…

वास्तविकता नहीं।”


युवक कुछ कह नहीं पाया।

समझ कम आई… पर कुछ भीतर खिसक गया था।


"दूसरा दिन: चुनाव का रहस्य"


अगले दिन वृद्ध ने कहा...


“आज ध्यान मत करना।

बस एक काम करना

जब भी तुम कुछ चुनने जाओ… रुक जाना।”


“बस इतना?” युवक ने पूछा।


“हाँ, बस इतना,” वृद्ध मुस्कुराए।


दिनभर युवक ने यह किया।


चलते समय “किधर जाऊँ?”… और वह रुक गया।

बोलने से पहले “क्या कहूँ?”… और वह रुक गया।


हर बार उसने देखा...


चुनाव से पहले भीतर एक हलचल उठती है।


थोड़ी-सी चाह “यह अच्छा है।”

थोड़ा-सा डर “वह गलत न हो जाए।”

थोड़ी-सी जल्दी “जल्दी फैसला लो।”


पहली बार उसे दिखा....


निर्णय बाहर नहीं होता।

वह भीतर बनता है… एक सूक्ष्म कम्पन की तरह।


शाम को उसने यह बात वृद्ध को बताई।


वृद्ध ने एक उदाहरण दिया....


“मान लो तुम बाजार में खड़े हो।

दो रास्ते हैं।


तुम सोचते हो ‘मैंने रास्ता चुना।’

पर सच क्या है?


पहले भीतर एक झुकाव उठा...

किसी अनुभव, किसी स्मृति, किसी डर से।


फिर तुमने उसे ‘अपना निर्णय’ नाम दे दिया।


अगर तुम उस झुकाव को देख लो

तो निर्णय अपने आप शांत हो सकता है।


क्योंकि तब वह अनजाना नहीं रहता।”


युवक पहली बार अपने ही मन को बाहर से देख रहा था।


तीसरा दिन: देखने वाला कौन?


तीसरे दिन वृद्ध ने कहा


“अब अंतिम बात।


आँखें खुली रखकर बैठो।

जो दिखे, उसे नाम मत देना।

और बीच-बीच में पूछना

‘यह किसे हो रहा है?’”


युवक बैठ गया।


पेड़ दिखे पर उसने ‘पेड़’ नहीं कहा।

आकाश दिखा पर उसने ‘आकाश’ नहीं कहा।


विचार आए

पर इस बार उसने उन्हें पकड़ा नहीं।


फिर उसने भीतर पूछा


“यह किसे हो रहा है?”


कुछ क्षण… कुछ भी नहीं।


फिर अचानक


जैसे कोई परत खिसक गई।


उसे लगा


जो देख रहा था… वह पीछे हट गया।

और सिर्फ देखना बचा।


न कोई केंद्र…

न कोई ‘मैं’ जो अनुभव कर रहा हो…


बस अनुभव।


वह वृद्ध के पास गया पर इस बार उसने कुछ नहीं कहा।


वृद्ध ने खुद ही कहा


“समझ गए?


जैसे आँख सब कुछ देखती है

पर खुद को नहीं देखती…


वैसे ही ‘मैं’ का भाव भी है।

वह हर अनुभव में होता है…

पर जब तुम उसे खोजते हो वह गायब हो जाता है।


विधियाँ इसलिए काम नहीं करतीं

क्योंकि तुम उन्हें ‘करते’ हो।


जहाँ ‘करने वाला’ है,

वहीं पुरानापन है।


जहाँ सिर्फ देखना रह जाए…

वहीं नयापन है।”


कुछ दिनों बाद युवक वहाँ से चला गया।


किसी ने उससे पूछा


“तुम्हें कौन-सी विधि मिली?”


वह हल्का-सा मुस्कुराया


“पहले मैं विधि करता था…

अब मैं अनुभव को होने देता हूँ।”


जब तक तुम कुछ करने में लगे हो,

तब तक तुम पुराने पैटर्न दोहरा रहे हो।


जिस क्षण तुम देखने लगते हो

बिना नाम दिए, बिना पकड़े…उसी क्षण जीवन पहली बार नया हो जाता है।

मृत्यु का भय

 मृत्यु 'भय का नाम' नहीं 

“मरना तो प्रत्येक देह का निश्चित है; इस सत्य से कोई भी बच नहीं सकता। परंतु जो साधक आत्मज्ञान को प्राप्त कर लेता है, उसके लिए यह तथ्य भय या चिंता का कारण नहीं रह जाता। क्योंकि वह जान लेता है कि जो नष्ट होता है, वह केवल शरीर है—न कि उसका वास्तविक स्वरूप।

अतः जीवन में ऐसा अमर भाव धारण करो कि ‘मैं नित्य हूँ, शाश्वत हूँ, काल से परे हूँ।’ यह भाव साधक को निर्भय बनाता है, उसे मृत्यु के भय से मुक्त करता है और उसे आत्मा की दिव्यता का अनुभव कराता है।

किन्तु सावधान! जब यह दिव्य अनुभूति प्रकट हो जाए कि ‘मैं सदा रहने वाला हूँ’, तब भी उसमें अहंकार का लेशमात्र प्रवेश न होने पाए। क्योंकि जैसे ही यह भाव ‘मैं महान हूँ’, ‘मैं अमर हूँ’ के अभिमान में परिवर्तित होता है, उसी क्षण साधना का पतन आरंभ हो जाता है।

अतः अमरत्व का अनुभव विनम्रता के साथ ही शोभा देता है। जहाँ अहंकार समाप्त होता है, वहीं आत्मा का सत्य प्रकाश स्थिर होता है।”


“मैं करता हूँ” भाव जब, चित्त भीतर बसि जाय।

तब तक जीव बंधन रहे, सत्य न प्रकट होय।।

अर्थ: जब तक “मैं कर्ता हूँ” का भाव है, तब तक बंधन बना रहता है।

अहं न केवल गर्व है, देह-बुद्धि अभिमान।

यही कर्तृत्व मूल है, यही जगत की तान।।

अर्थ: अहंकार केवल घमंड नहीं, बल्कि देह-बुद्धि से जुड़ाव है।

प्रकृति करै सब क्रिया, गुण गुणहि अनुरूप।

मूढ़ कहै “मैं कर्ता”, भूलि गया निज रूप।।

अर्थ: सब कार्य प्रकृति करती है, पर अज्ञानवश मनुष्य स्वयं को कर्ता मानता है।

जब देखे साक्षी भाव से, उठत विचार अपार।

तब ढीला हो अहंभाव, मिटे कर्ता का भार।।

अर्थ: साक्षीभाव से देखने पर अहंकार ढीला पड़ने लगता है।

अकर्ताभाव स्थित हुए, शांति प्रकट मन माहिं।

फल-बंधन सब छूटते, चिंता रहे न काहिं।।

अर्थ: अकर्ताभाव से कर्मफल का बंधन समाप्त हो जाता है।

अहंकार हटि जाय जब, ब्रह्म प्रकाशे आप।

ज्यों घट हटते मेघ से, दीखे रवि प्रतिताप।।

अर्थ: अहंकार हटते ही आत्मा का प्रकाश प्रकट हो जाता है।

(साक्षीभाव)

दृश्य सकल यह जगत है, बदलत क्षण-क्षण रूप।

द्रष्टा साक्षी अचल है, नित निरंतर अनूप।।

अर्थ: संसार बदलने वाला है, पर साक्षी आत्मा स्थिर है।

“मैं दुखी, मैं सुखी” कहै, मन का खेल अनंत।

आत्मा सदा अछूत है, साक्षी रहे संत।।

अर्थ: सुख-दुःख मन के हैं, आत्मा उनसे परे है।

जो देखे बस देखता, न करे संग विचार।

साक्षीभाव विकसित हो, कटे मोह जंजाल।।

अर्थ: केवल देखने का अभ्यास साक्षीभाव उत्पन्न करता है।

१०

करता सब व्यवहार वह, भीतर रहे उदास।

जग में रहकर मुक्त है, यही साक्षी निवास।।

अर्थ: साक्षीभाव से व्यक्ति संसार में रहते हुए भी मुक्त रहता है।

११

बंध-मोक्ष सब मन गढ़े, आत्मा सदा स्वतंत्र।

साक्षीभाव स्थित जन को, न बंधन न तंत्र।।

अर्थ: आत्मा सदा मुक्त है, बंधन-मोक्ष मन की कल्पना है।

१२

साक्षी में जो लीन है, वही परम विश्राम।

तरि जाता भवसागर, पाकर निज ही धाम।।

अर्थ: साक्षीभाव ही मुक्ति का मार्ग है।

(वैराग्य का रहस्य)

१३

वैराग्य न त्यागे जगत, न घर-वन का भेद।

आसक्ति का क्षय जहाँ, वहीं सच्चा वेद।।

अर्थ: वैराग्य वस्तु त्याग नहीं, आसक्ति का त्याग है।

१४

बाह्य त्याग करि क्या भया, मन में रहे विकार।

सच्चा वैरागी वही, जिसका शुद्ध विचार।।

अर्थ: केवल बाहरी त्याग से वैराग्य नहीं आता।

१५

भोग सभी क्षणभंगुर हैं, जानत विवेकवान।

अपने आप छूटते फिर, न करे कोई त्राण।।

अर्थ: विवेक से भोग स्वतः छूट जाते हैं।

१६

ज्यों बालक खेलन तजे, पाकर बोध महान।

त्यों साधक जग छोड़ता, पा आत्मा ज्ञान।।

अर्थ: ज्ञान आने पर वैराग्य सहज हो जाता है।

१७

दृष्टि बदलते ही लगे, जगत नया स्वरूप।

जहाँ मोह था बंधन, वहाँ दिखे ब्रह्म रूप।।

अर्थ: दृष्टिकोण बदलते ही संसार का अनुभव बदल जाता है।

१८

त्याग नहीं यह ज्ञान है, यह अंतर की बात।

वैराग्य वही श्रेष्ठ है, जहाँ न रहे आसक्त।।

अर्थ: वैराग्य भीतर की अवस्था है।

(पूर्णता का अनुभव)

१९

पूर्ण वही यह जगत है, पूर्ण स्वयं ही आप।

पूर्ण से ही पूर्णता, प्रकटे बिना प्रयास।।

अर्थ: सब कुछ पहले से ही पूर्ण है।

२०

बाहर खोजे जगत में, दौड़े जन अज्ञान।

पूर्णता भीतर बसि, जानत नहीं इंसान।।

अर्थ: मनुष्य बाहर पूर्णता खोजता है, जबकि वह भीतर है।

२१

न कुछ पाना शेष है, न कुछ खोना काज।

जो है सो ही पूर्ण है, यही आत्मा राज।।

अर्थ: पूर्णता में न पाने की इच्छा रहती है, न खोने का भय।

२२

जब यह बोध हृदय धरे, मिटे सकल संदेह।

शांति, आनंद, मुक्तता, प्रकटे अपने नेह।।

अर्थ: पूर्णता का अनुभव शांति देता है।

२३

यही मोक्ष की सत्यता, न काल न स्थान।

वर्तमान में जो मिले, वही ब्रह्म पहचान।।

अर्थ: मोक्ष वर्तमान का अनुभव है।

२४

अहं लय, साक्षी स्थित, वैराग्य दृष्टि सुधार।

पूर्णत्व अनुभव करै, वही भव पार अपार।।

अर्थ: अहंकार त्याग, साक्षीभाव, वैराग्य और पूर्णता का अद्भुत अद्वैत मय भाव —ये ही मुक्ति का मार्ग हैं। 


आत्मा की स्थिरता क्या है

 धूप से तपती हुई एक पगडंडी दूर तक जाती थी, जैसे किसी अनजानी जगह की ओर बुला रही हो। उस रास्ते पर चलते हुए कदमों की आवाज भी जैसे खुद में खो जाती थी। हवा में कोई ठंडक नहीं थी, फिर भी भीतर कहीं एक शांति की तलाश थी। उसी रास्ते पर एक व्यक्ति चल रहा था, थका हुआ नहीं, मगर किसी अनकहे सवाल से भरा हुआ। उसके पास सब कुछ था जो आम तौर पर लोग चाहते हैं, फिर भी कुछ ऐसा था जो अधूरा लग रहा था। ये अधूरापन बाहर की कमी नहीं था, बल्कि भीतर की एक खिंचाव थी।


चलते चलते वो एक पुराने पेड़ के नीचे रुका, जहां छाया तो थी, मगर उससे ज्यादा एक ठहराव था। उसने पहली बार खुद से पूछा, मैं आखिर ढूंढ क्या रहा हूँ। ये सवाल अचानक नहीं आया था, बल्कि कई सालों से भीतर जमा था। हर उपलब्धि के बाद, हर खुशी के बाद, वही सवाल वापस लौट आता था। और हर बार उसे टाल दिया जाता था, किसी नए काम में, किसी नई उम्मीद में। मगर इस बार वो टालना संभव नहीं था, क्योंकि सवाल बहुत करीब आ चुका था।


उसने आंखें बंद कीं और अपने भीतर झांकने की कोशिश की। विचार आए, गए, कुछ यादें उभरीं, कुछ डर भी सामने आए। मगर उस सब के पीछे एक देखने वाला था, जो शांत था। वो पहली बार उस देखने वाले को महसूस कर रहा था। कोई हलचल नहीं, कोई चाह नहीं, बस एक सीधी उपस्थिति। उसी क्षण उसे लगा कि शायद खोज बाहर नहीं, इसी भीतर की जगह में है।


शरीर और जानने वाला:


कुछ समय बाद वो पास के गांव में पहुंचा, जहां एक शांत स्थान पर लोग अक्सर बैठते थे। वहां एक वृद्ध बैठा था, जो किसी से कुछ कह नहीं रहा था, मगर उसकी उपस्थिति में एक स्थिरता थी। उस व्यक्ति ने उसके पास बैठकर वही सवाल पूछा, मैं क्या खोज रहा हूँ। वृद्ध ने उसकी ओर देखा, और बिना किसी जटिल बात के पूछा, जो खोज रहा है, पहले उसे देख।


ये सुनकर वो चुप हो गया। उसने अपने शरीर को देखा, हाथ, पैर, सांस, धड़कन। सब कुछ स्पष्ट था, मगर वो समझ रहा था कि ये सब देखा जा रहा है। अगर ये देखा जा रहा है, तो देखने वाला अलग होना चाहिए। उसने इस बात को पहली बार इतने सीधे तरीके से महसूस किया।


वृद्ध ने कहा, जो बदलता है, वो तुम नहीं हो सकते। शरीर बदलता है, विचार बदलते हैं, भावनाएं बदलती हैं। मगर जो इन सब को देख रहा है, वो बदलता नहीं। उसी को पहचानना है, क्योंकि वही असली है। ये बात सुनकर उसके भीतर कुछ हिला, जैसे कोई पुरानी धारणा टूट रही हो।


आत्मा की स्थिरता:


वो कई दिनों तक वहीं बैठता रहा, बिना किसी विशेष अभ्यास के। बस देखता रहा, अपने भीतर और बाहर। उसे महसूस हुआ कि सब कुछ बदल रहा है, हर क्षण नया है। मगर एक चीज है जो हमेशा एक जैसी है, जो हर अनुभव के साथ रहती है।


एक दिन उसने देखा कि दुख भी आता है और चला जाता है, खुशी भी आती है और चली जाती है। अगर वो दोनों बदलते हैं, तो वो उनका असली स्वरूप नहीं हो सकते। फिर जो उनके पीछे है, वही स्थायी है। उसी में एक गहराई थी, जो किसी भावना से नहीं हिलती थी।


उसने समझना शुरू किया कि वो शरीर नहीं है, क्योंकि शरीर को वो देख सकता है। वो विचार नहीं है, क्योंकि विचार आते जाते हैं। वो भावनाएं भी नहीं है, क्योंकि वो टिकती नहीं। तो फिर वो क्या है। यही प्रश्न अब उत्तर बनने लगा था।


सर्वव्यापकता का अनुभव:


एक दिन वो नदी के किनारे बैठा था, जहां पानी लगातार बह रहा था। उसने देखा कि पानी अलग अलग जगहों पर अलग दिखता है, कहीं शांत, कहीं तेज, कहीं गहरा। मगर पानी अपनी प्रकृति में एक ही है। उसी तरह हर व्यक्ति अलग दिखता है, मगर भीतर की चेतना एक ही है।


इस समझ में एक गहरा परिवर्तन था। अब दूसरों को देखकर अलगाव महसूस नहीं होता था। हर चेहरा उसी चेतना का रूप लगने लगा। इसमें कोई प्रयास नहीं था, बस एक सीधी समझ थी।


उसे महसूस हुआ कि वो अकेला नहीं है, क्योंकि जो उसके भीतर है, वही सबके भीतर है। इस एकता में कोई दूरी नहीं थी, कोई तुलना नहीं थी। और इसी में एक शांति थी, जो पहले कभी महसूस नहीं हुई थी।


अहंकार का बोझ:


जैसे जैसे ये समझ गहरी होती गई, वैसे वैसे एक और चीज स्पष्ट होने लगी। वो “मैं” जो हर बात में बीच में आता था, वो अब हल्का लगने लगा। पहले हर चीज में “मैं” जुड़ता था, अब वो पकड़ कम होने लगी।


वो देख रहा था कि ये “मैं” सिर्फ विचारों का एक जोड़ है। जब विचार शांत होते हैं, तो “मैं” भी गायब हो जाता है। और जब “मैं” नहीं होता, तो कोई बोझ नहीं होता।


इसमें कोई कोशिश नहीं थी, क्योंकि अब वो “मैं” को हटाने की कोशिश नहीं कर रहा था। वो सिर्फ उसे देख रहा था। और देखने में ही उसकी पकड़ ढीली पड़ रही थी।


समर्पण की गहराई:


अब उसके भीतर एक नई स्थिति थी, जहां कोई नियंत्रण नहीं था। पहले हर चीज को संभालने की कोशिश होती थी, अब वो अपने आप घट रही थी। इस अवस्था में एक गहरा विश्वास था, जो किसी विचार पर आधारित नहीं था।


समर्पण का अर्थ अब समझ में आ रहा था। ये किसी बाहरी शक्ति के आगे झुकना नहीं था, बल्कि उस “मैं” को छोड़ देना था, जो सब कुछ नियंत्रित करना चाहता था। और जब वो छूटता है, तब एक सहजता आती है।


उस सहजता में कोई डर नहीं होता, क्योंकि अब कुछ बचाने को नहीं होता। जीवन जैसा है, वैसा ही स्वीकार होता है। और उसी स्वीकार में एक गहरी शांति होती है।


जहां सब कुछ एक हो जाता है:


अब उसके लिए जीवन कोई अलग अलग हिस्सों में बंटा नहीं था। हर अनुभव उसी एक चेतना का हिस्सा था। कोई अलगाव नहीं था, कोई दूरी नहीं थी।


वो जहां भी देखता, वही उपस्थिति महसूस होती। पेड़, पानी, लोग, सब उसी में समाए हुए थे। और वो खुद भी उसी का हिस्सा था, बिना किसी अलग पहचान के।


उसके लिए अब कोई यात्रा नहीं बची थी, क्योंकि जो खोजा जा रहा था, वो हमेशा से यहीं था। बस पहचानने की बात थी, जो अब पूरी हो चुकी थी।