Thursday, February 5, 2026

गुड़ है वात पित्त कफ तीनो की दवा

 Jaggery - गुड़ है वात पित्त कफ तीनो की दवा: देसी सुपरफूड - आप सबने ज़िंदगी में गुड़ तो ज़रूर खाया होगा - लेकिन क्या आपने कभी ये सोचा है कि यही साधारण सा दिखने वाला गुड़ आयुर्वेद में एक ताक़तवर दवा माना गया है?


इस पोस्ट में जानेगें गुड़ के बारे में -

कि कैसे सही तरीके से इस्तेमाल करने पर ये

वात की 80+, पित्त की 40+ और कफ की 20+ बीमारियों से बचाव कर सकता है।


गुड़ मीठा है, स्वादिष्ट है और सेहत के लिए भी फायदेमंद।

तो जानते हैं कि आयुर्वेद गुड़ के बारे में क्या कहता है।


गुड़ बनता कैसे है?

गन्ने के रस को लगातार पकाया जाता है।

जैसे-जैसे उसका पानी उड़ता जाता है, एक ठोस हिस्सा बचता है -

उसी को सुखाकर जो बनाया जाता है, वही है हमारा देसी गुड़।


हिमाचल से लेकर केरल तक, भारत के हर कोने में गुड़ मिलता है।

आयुर्वेद में इसे सिर्फ मिठास नहीं, बल्कि

एक टॉनिक और बड़ी औषधि माना गया है।


नया गुड़: बॉडी बनाने वालों के लिए

जब गुड़ नया-नया बनता है

या 6–8 महीने के अंदर इस्तेमाल किया जाता है,

तो उसे नया गुड़ कहा जाता है।


नए गुड़ की खासियत

पचने में भारी (heavy)

शरीर को बढ़ाने वाला

वजन और फैट बढ़ाने में मददगार


किसके लिए सही?

जो बहुत पतले हैं

जो ज़्यादा शारीरिक मेहनत करते हैं

जिनकी पाचन अग्नि तेज है

जो बॉडी या वजन बढ़ाना चाहते हैं


सर्दियों में मिलने वाला ताज़ा गुड़ ऐसे लोगों के लिए perfect choice है।


पुराना गुड़: असली आयुर्वेदिक सोना

अब बात करते हैं पुराने गुड़ की —

जो 6 महीने, 1 साल या उससे भी ज़्यादा पुराना हो।


आयुर्वेद के ग्रंथ अष्टांग हृदय में

वाग्भट ऋषि कहते हैं कि:


पुराना गुड़ हृदय के लिए सबसे बेहतरीन टॉनिक है।


हार्ट से जुड़ी समस्याओं में फायदेमंद

दिल की कमजोरी

डर या घबराहट

अचानक धड़कन तेज होना

लो ब्लड प्रेशर

कम इजेक्शन फ्रैक्शन (heart pumping कम होना)


ऐसे सभी मामलों में पुराना गुड़ बहुत लाभकारी माना गया है।


डायबिटीज में भी गुड़?

हाँ, सुनने में अजीब लगता है लेकिन

आयुर्वेद में प्रमेह और मधुमेह (diabetes) में भी

पुराना गुड़ पथ्य यानी सुरक्षित बताया गया है।


क्यों?


ये पाचन अग्नि को मंद नहीं करता

हल्का होता है

अग्नि को बढ़ाता है

शरीर को पोषण देता है


जिनकी पाचन शक्ति कमजोर है

लेकिन ताकत भी चाहिए -

उनके लिए नया गुड़ नहीं, पुराना गुड़ बेहतर है।


गुड़ और वीर्य-शक्ति

आयुर्वेद में गुड़ को कहा गया है:


वीर्यवर्धक

शुक्रजनक

वातनाशक


यानी जोड़ों का दर्द, कमज़ोरी, ठंड में बढ़ने वाले दर्द,

शरीर का सूखापन, बाल झड़ना, दांतों की कमजोरी —

इन सब में गुड़ एक natural tonic की तरह काम करता है।


सांस, खांसी और जोड़ों के दर्द में गुड़

सर्दियों में अक्सर ये समस्याएं बढ़ जाती हैं:


सूखी खांसी

सांस लेने में दिक्कत

जोड़ों में दर्द

शरीर में dryness


इन सब में गुड़ को आयुर्वेद में

बेहतरीन टॉनिक माना गया है।


Modern Nutrition के हिसाब से

अगर modern science की बात करें,

तो गुड़ में पाया जाता है:


Iron

Calcium

Phosphorus

Carbohydrates


यानी taste के साथ-साथ nutrition भी full-on 


वात, पित्त और कफ में गुड़ कैसे लें?

वात दोष के लिए

गुड़ + सोंठ (सूखी अदरक)


कैसे लें?


गुड़ का छोटा टुकड़ा

उसमें चुटकी भर सोंठ

छोटी गोली बनाकर खाएं


फायदा:


जोड़ों का दर्द

गैस

सांस की दिक्कत

वायु से जुड़े सारे रोग


पित्त दोष के लिए

गुड़ + हरड़ (कम मात्रा में)


जब समस्या हो:


ज्यादा गर्मी लगना

जलन

एसिडिटी

ब्लीडिंग


ध्यान रखें:

दोनों गर्म होते हैं, इसलिए मात्रा कम रखें।


कफ दोष के लिए

गुड़ + अदरक


फायदा:


सर्दी–खांसी

अस्थमा

मोटापा

हाई कोलेस्ट्रॉल

फैटी लिवर

हाइपोथायरॉइड


खाने के बाद

दिन में 2–3 बार ले सकते हैं।


सही गुड़ कैसे चुनें?

थोड़ा काला गुड़ लें

सफेद या पीला गुड़ नहीं


क्यों?

क्योंकि सफेद–पीले गुड़ में

अक्सर chemicals मिले होते हैं।


अगर हो सके तो गुड़ को स्टोर करके रखें।

आयुर्वेद में तो 3 साल पुराने गुड़ तक का वर्णन है।


आखिर में…

गुड़ ज़रूर खाइए -


बॉडी बनानी है - नया गुड़

दिल, पाचन और ताकत चाहिए - पुराना गुड़


क्या आप भी गुड़ खाते हैं?



ध्यान

 ध्यान : होने की यात्रा


ध्यान कोई क्रिया नहीं है।

ध्यान कोई प्रयास नहीं है।

ध्यान वह क्षण है जहाँ करने वाला धीरे-धीरे मौन हो जाता है

और जो बचता है, वही सत्य होता है।


आज की यह विधि

तुम्हें कुछ सिखाने नहीं आई....

यह तुम्हें तुमसे मिलाने आई है।


1. शरीर को धरती को सौंप देना


एक शांत स्थान चुनो।

पीठ के बल आराम से लेट जाओ।


अपने पास एक सिक्का या छोटा पत्थर रखो

और उसे अपने सिर के ऊपर, दोनों भृकुटियों के बीच के क्षेत्र में रख दो।


यह कोई भार नहीं है।

यह एक स्मरण है...

कि तुम्हारी चेतना यहीं ठहरनी है।


हाथों को जाँघों के बगल में

स्वाभाविक रूप से रख दो।

अब शरीर का भार

पूरी तरह धरती को सौंप दो।


आँखें बंद हो जाती हैं

या कहो, बाहर की दुनिया

यहाँ से विदा लेती है।


2. साँस : जीवन को जैसा है वैसा स्वीकारना


अब साँस की ओर ध्यान जाने दो।


साँस आती है।

साँस जाती है।


न उसे गहरा करना है,

न रोकना है,

न सुधारना है।


यही ध्यान का पहला दर्शन है

जो अपने आप घट रहा है

उसे घटने देना।


जैसे-जैसे साँस को छेड़ना छूटता है,

वैसे-वैसे मन

थक कर शांत होने लगता है।


3. विचार : विरोध नहीं, साक्षी भाव


अब विचार आएँगे।

यह स्वाभाविक है।


कोई स्मृति,

कोई आवाज़,

कोई छवि,

या कोई प्रश्न


“मैं ध्यान क्यों कर रहा हूँ?”

“मुझे इससे क्या मिलेगा?”


मुस्कराओ।


विचार शत्रु नहीं हैं।

वे तुम्हें भटकाने नहीं आए

वे बस दिखना चाहते हैं।


उन्हें देखो।

उनके साथ बहो।

उनसे लड़ो मत।


ध्यान संघर्ष नहीं सिखाता,

ध्यान मैत्री सिखाता है।


4. हल्केपन की अनुभूति


कुछ समय बाद

तुम अनुभव करोगे


शरीर हल्का हो रहा है।

जैसे भार की परिभाषा बदल रही हो।


अब सिक्का या पत्थर

भार नहीं लगता।

वह बस मौजूद है

जैसे चिड़िया का पंख

हवा पर टिका हो।


यहाँ ध्यान तुम्हें नहीं देख रहा

यहाँ तुम स्वयं को देख रहे हो।


5. स्पर्श और दृश्य


कभी-कभी

तुम्हारी उँगलियाँ

अपनी जाँघों को हल्का स्पर्श करेंगी।


यह कोई हरकत नहीं,

यह एक मौन संवाद है।


और हर स्पर्श के साथ

कोई दृश्य उभर सकता है।


सिक्का अब

तुम्हारी चेतना का केंद्र है

वह तुम्हें

इधर-उधर बिखरने से रोकता है।


6. खुजली : द्वार की परीक्षा


अचानक

शरीर के किसी हिस्से में

खुजली होगी

अक्सर मुँह या कान के पास।


यह बाधा नहीं है।

यह द्वार है।


यहीं अधिकतर लोग

ध्यान से बाहर चले जाते हैं।


खुजली को हटाने की कोशिश मत करो।

उसे पूरी तरह महसूस करो।


तुम पाओगे

जिसे इंद्रियाँ भटकाना कहती थीं

वही इंद्रियाँ

अब तुम्हें और गहराई में ले जा रही हैं।


7. ऊर्जा का आरोहण


अब एक सूक्ष्म परिवर्तन घटता है।


ऊर्जा

पैरों से उठती है,

शरीर के हर अंग से

ऊपर की ओर बहने लगती है।


साँस लेने से भी

और छोड़ने से भी

यह ऊर्जा बढ़ती जाती है।


और अंततः

सारी ऊर्जा

ठीक वहीं एकत्र होती है

जहाँ सिक्का रखा है।


यह अब केवल शरीर का केंद्र नहीं

यह अस्तित्व का केंद्र है।


इस अनुभूति में

जितनी देर रह सको,

रहो।


8. दृश्य, विस्तार और अंतर्दृष्टि


अब जो दिखाई देता है

वह कल्पना नहीं।


कभी तुम्हारा जीवन,

कभी समाज,

कभी देश,

कभी पूरा ब्रह्मांड।


कभी भविष्य की झलक भी।


यह भविष्यवाणी नहीं

यह संभावना का दर्शन है।


यह तभी घटता है

जब चाहना

धीरे-धीरे गिर जाता है।


9. अंत नहीं, आरंभ


ध्यान कोई अनुभव नहीं

जिसे पकड़ लिया जाए।


ध्यान वह भूमि है

जहाँ पकड़ने वाला

अपने आप गिर जाता है।


इस विधि से

कुछ माँगना मत।


बस लेट जाओ।

साँस को आने दो।

जो है, उसे देखने दो।


बाक़ी...

ध्यान जानता है।


उम्र कम क्यों होती है

 उम्र कम क्यों होती है...

महाभारत में एक प्रसंग आता है जब राजा धृतराष्ट्र महात्मा विदुर से मनुष्य की आयु कम होने का कारण पूछते हैं। तब विदुर मनुष्य की आयु कम करने वाले 6 दोषों के बारे में धृतराष्ट्र को बताते हैं। महाभारत के अनुसार यमराज ने ही श्राप के कारण मनुष्य बनकर विदुर के रूप में जन्म लिया था। महात्मा विदुर ने धृतराष्ट्र को मनुष्यों की उम्र कम होने को जो 6 दोष बताए थे, वह इस प्रकार हैं।


धृतराष्ट्र महात्मा विदुर से पूछते हैं:-👉 जब सभी वेदों में पुरुष को 100 वर्ष की आयु वाला बताया गया है, तो वह किस कारण से अपनी पूर्ण आयु नहीं जी पाता।


विदुर जी कहते हैं:-👉 अत्यंत अभिमान, अधिक बोलना, त्याग का अभाव, क्रोध, स्वार्थ, मित्रद्रोह- ये 6 तीखी तलवारें मनुष्य की आयु को कम करती हैं। ये ही मनुष्यों का वध करती हैं।


अभिमान यानी घमंड

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ऊंचे पद वाले, अपनी प्रशंसा सुनने वाले, स्वयं को बलवान समझने वाले तथा स्वयं को बुद्धिमान, त्यागी, महात्मा मानने वाले लोग अभिमान का शिकार हो जाते हैं। जिस व्यक्ति में यह दोष आ जाता है वह दूसरे लोगों को अपने से निचले स्तर का मानने लगता है और अवसर आने पर उनका अपमान करने से भी नहीं चूकता। घमंड करने वाले के कई शत्रु भी हो जाते हैं। अंत में घमंड ही उस व्यक्ति की मृत्यु का कारण बनता है।


अधिक बोलने वाला

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जो व्यक्ति अधिक बोलता है तथा व्यर्थ की बातें करता है, वह सत्य का पूरी तरह से पालन नहीं करता और ऐसी बातें भी कर बैठता है, जिनका परिणाम बुरा होता है। ऐसा व्यक्ति बुद्धिमानों को प्रिय नहीं होता तथा दूसरों पर उसकी बातों का प्रभाव भी नहीं पड़ सकता। इसलिए अधिक शब्दों का प्रयोग न करके वाणी को संयमित रखना चाहिए, क्योंकि असंयमित वाणी से भी आयु कम होती है।


क्रोध यानी गुस्सा

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मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु क्रोध है। क्रोधी होने पर मनुष्य उस समय किए गए अपने कर्मों के परिणाम को भूल जाता है, जिससे उसका पतन होता है। श्रीमद्भागवत के अनुसार शरीर अंत से पूर्व जिसने क्रोध को पूरी तरह से जीत लिया, वह मनुष्य इस लोक में योगी और सुखी है। क्रोध को नरक का द्वार भी कहा गया है, जिसका अर्थ है क्रोधी मनुष्य को नरक में जाने के लिए अन्य मार्ग की आवश्यकता ही नहीं पड़ती, क्रोध अकेला ही उसे नरक में ले जाता है। क्रोध के दुष्परिणामों से भी आयु कम होती है।


त्याग का अभाव

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त्याग का अभाव होने के कारण ही रावण, दुर्योधन आदि का पतन हुआ। सांसारिक सुख मनुष्य की आयु को काटते हैं और उनका त्याग आयु में वृद्धि करता है। मनुष्य को इस बात का सदैव ध्यान रखना चाहिए कि हम इस संसार से कुछ लेने नहीं बल्कि दूसरों को सुख देने के लिए आए हैं। जिन लोगों के मन में त्याग की भावना नहीं होती, उनकी मृत्यु शीघ्र ही हो जाती है।


स्वार्थ यानी लालच

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स्वार्थ यानी लालच ही अधर्म का मूल कारण है। दुनिया में होने वाले अनेक युद्धों का कारण स्वार्थ (भूमि, धन या स्त्री) ही है। स्वार्थी मनुष्य अपना काम साधने के लिए बड़े से बड़ा पाप करने में भी शर्म का अनुभव नहीं करते। वर्तमान परिदृश्य में देखा जाए तो स्वार्थ के कारण ही आज पूरी दुनिया में पाप कर्म बढ़ रहे हैं और चारो ओर अशांति छाई हुई है। जिसके मन में स्वार्थ होता है, उसकी आयु कम हो जाती है।


मित्रद्रोही

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मित्रद्रोही यानी अपने मित्र को धोखा देने वाले पुरुष को शास्त्रों में अधम कहा गया है। मनुष्य जीवन में मित्रों का बहुत महत्व है। मित्रता से एक नई शक्ति का निर्माण होता है, जिससे शत्रुओं को भी भय होता है। पतन की ओर जाते हुए कई पुरुषों का उत्थान मित्रों ने किया है। मित्रद्रोही मनुष्य का जीवन नरक के समान होता है। मित्रद्रोही नामक दोष से बचने के लिए त्याग और दूसरों का हित करना परम आवश्यक है।


महात्मा विदुरजी ने आयु को काटने वाले जो 6 दोष बतलाए हैं, वे सभी प्राय: एक-दूसरे पर ही निर्भर है। इसलिए इन दोषों से बचना चाहिए।

तेल मालिश safe और फायदेमंद है

 Ayurvedic oil massage - तेल मालिश खुद से कैसे करे - तेल मालिश (अभ्यंग) करने से पहले ये ज़रूर जान लें - तेल मालिश आयुर्वेद में बहुत powerful tool है, लेकिन हर हाल में, हर किसी के लिए नहीं।


सबसे पहली बात-

आइए पहले ये समझ लें कि कब तेल मालिश नहीं करनी चाहिए।


इन कंडीशन्स में अभ्यंग अवॉइड करें

अगर आप इनमें से किसी हालत में हैं, तो तेल मालिश मत कीजिए:


लूज़ मोशन / डायरिया चल रहा हो

बुखार आया हुआ हो

अभी-अभी खाना खाया हो

पहले का खाना ठीक से हज़म न हुआ हो

बहुत ज़्यादा आलस, heaviness या सुस्ती महसूस हो


कफ से जुड़ी दिक्कतें:


बहुत ज़्यादा पसीना

लगातार बलगम

महिलाओं में पीरियड्स के दौरान


इन हालात में तेल शरीर को फायदा नहीं,

बल्कि imbalance और बढ़ा सकता है।


इनके अलावा ज़्यादातर कंडीशन्स में तेल मालिश safe और फायदेमंद है।


खुद से तेल मालिश कैसे करें? (Self Abhyanga)

तेल मालिश करने के लिए किसी expert की ज़रूरत नहीं।

आप खुद भी कर सकते हैं—बस तरीका सही होना चाहिए।


आप इस्तेमाल कर सकते हैं:


उंगलियाँ (gentle massage के लिए)

हाथ के joints (deep pressure के लिए)

wrist

forearm (हाथ का मोटा हिस्सा)


Pressure आप अपने comfort के हिसाब से रखें।

ज़्यादा रगड़ना ज़रूरी नहीं।


आयुर्वेद के अनुसार शरीर के 4 हिस्से

आयुर्वेद में पूरे शरीर को 4 main parts में divide किया गया है:


दोनों हाथ

दोनों पैर

Middle body (chेस्ट + पेट + कमर)

गर्दन के ऊपर का हिस्सा (neck, face, head)


टाइम कैसे बाँटें?

हाथ – 1 मिनट

पैर – 1 मिनट

Middle body – 2 मिनट

सिर / गर्दन – 1 मिनट


Total: सिर्फ 5 मिनट!


अगर टाइम ज़्यादा है तो

20–25 मिनट तक भी कर सकते हैं।


मालिश का सबसे ज़रूरी नियम (Golden Rule)

तेल मालिश में 2 बातें सबसे ज़्यादा important हैं 


Joint पर गोल (Circular) movement

जहाँ-जहाँ joint है, वहाँ हमेशा गोल-गोल मालिश करें।


जैसे:


कंधा

कोहनी

कलाई

घुटना

टखना


Clockwise और anti-clockwise-

दोनों ठीक हैं।


जहाँ joint नहीं, वहाँ Heart की तरफ movement

जहाँ joint नहीं है (लंबे हिस्से):


वहाँ मालिश हमेशा heart की दिशा में करें।


जैसे:


हाथ

पैर

जांघ

पिंडली


नीचे की तरफ ज़ोर से मालिश करने से

blood circulation disturb हो सकता है।


तेल कैसे चुनें? (Nature के हिसाब से)

तेल हमेशा अपनी प्रकृति (Dosha) देखकर चुनिए।


वात प्रकृति (ठंडी लगती है, दुबले लोग)

बहुत ठंड लगती है


वजन कम

joint pain

dryness


Best oil:

तिल का तेल (Sesame oil)


पित्त प्रकृति (गर्मी ज़्यादा)

हाथ-पैर जलते हैं

धूप बर्दाश्त नहीं

acidity, irritation


Best options:

नारियल तेल

देसी घी


कफ प्रकृति (बलगम, heaviness)

आमतौर पर कफ में oil avoid किया जाता है,

लेकिन कुछ cases में एक तेल बहुत काम करता है 


सरसों का तेल (Mustard oil)


sinus

बार-बार कफ

ठंड ज़्यादा लगना


हल्का गुनगुना करके इस्तेमाल करें।


तेल का temperature कैसा हो?

Body temperature के आसपास


बहुत गरम नहीं

बहुत ठंडा नहीं

गुनगुना तेल ज़्यादा deep absorb होता है।


अब शुरू करते हैं मालिश (Step-by-step)

पैर से शुरुआत करें

पैर वात का main क्षेत्र है,

इसलिए यहाँ से शुरुआत करना बेहतर रहता है।


तलवे की मालिश

हथेली से हल्के stroke

उंगलियों से pressure points

joints पर गोल मालिश


पिंडली (Calf muscles)

हमेशा ऊपर की दिशा में

कब्ज़, gas वालों के लिए बहुत फायदेमंद

मालिश करते वक्त gas pass होना normal है


Calf muscles को आयुर्वेद में

“second heart” भी कहा गया है।


घुटने और जांघ

घुटना = joint - गोल मालिश


घुटने के पीछे का हिस्सा खास ध्यान से

जांघ पर ऊपर की तरफ long strokes

Varicose veins / ज्यादा खड़े रहने वाले

teachers

salesmen

housewives

45+ age


इनके लिए पैरों की मालिश daily blessing है।


नाभि और पेट

नाभि = समान वायु का केंद्र

छोटी उंगली से नाभि में तेल

पेट पर गोल मालिश

ऊपर–नीचे की direction colon के flow के हिसाब से

digestion, gas, IBS जैसी दिक्कतों में बहुत मदद।


कमर और पीठ

कमर = वात का strong zone


circular + upward strokes

जितना हाथ पहुँचे, उतना करें

अगर कोई मदद कर दे-तो और अच्छा।


5. छाती (Chest area)

कफ का main स्थान।


जिनको:


asthma

bronchitis

dry cough

सांस की दिक्कत


तिल या सरसों के तेल में

2 चुटकी सेंधा नमक मिलाकर

हल्का गरम करके मालिश करें।


पीठ + छाती + sides

तीनों जगह मालिश से कफ loosen होता है।


6. हाथ और कंधे

joints पर गोल

बाकी हिस्सों में heart की तरफ

frozen shoulder वालों को

बगल (armpit area) के पास ज़्यादा ध्यान देना चाहिए


7. गर्दन, चेहरा और सिर

Neck & Cervical

trapezius muscle दबाएँ

stress release होता है

cervical pain में राहत


कान की मालिश

overall health boost

balance और nervous system के लिए बहुत ज़रूरी


Face & Head

oily skin / pimples वाले avoid कर सकते हैं


बाकी लोग gentle oil use कर सकते हैं


अगर टाइम कम है तो

सिर्फ 3 जगह भी काफी हैं:

कान

तलवे

सिर


कितनी देर मालिश करें?

5 मिनट - minimum effective

20–25 मिनट - best


किसी एक हिस्से को deep nourish करना हो

1 मिनट same जगह


मालिश के बाद क्या करें?

उबटन (अगर available)

या normal soap/shampoo

गुनगुने पानी से स्नान


आख़िरी और सबसे ज़रूरी बात 

Abhyanga सिर्फ body care नहीं है-

ये self-love है।


“स्नेह” का मतलब:


तेल भी

और प्रेम भी


जितनी शांति से,

जितने प्यार से आप ये करेंगे,

उतना ही शरीर आपको healthy रखेगा।


अभ्यंग के फायदे 

immunity strong

नींद बेहतर

stress कम

joint & muscle strength

वात रोग control

aging slow

hair & skin health



स्वस्थ लीवर

 #ये देशी,आयुर्वेदिक उपचार बचाएंगे,हर तरह के लीवर की बीमारी से,पहचाने लीवर की बीमारी और करें घर बैठे उपचार...


🌿 1) स्वस्थ लीवर — इसे स्वस्थ रखने के उपाय

रोज गुनगुना पानी + नींबू सुबह


आंवला (रस/चूर्ण) 1 चम्मच


हल्का भोजन, कम तेल-तलावन


रोज 30 मिनट पैदल चलना


🌿 2) फैटी लीवर (Fatty Liver) — देशी उपचार

गिलोय + तुलसी का काढ़ा (सुबह)


मेथी दाना रात भर भिगोकर सुबह खाना


लहसुन की 1 कली खाली पेट


चीनी, मैदा, जंक फूड बंद


रोज योग: भुजंगासन, धनुरासन, कपालभाति


🌿 3) हेपेटाइटिस (सूजा हुआ लीवर) — देशी उपचार

पपीते के पत्तों का रस 1 चम्मच (दिन में 1 बार)


मूली का रस ½ कप


हल्दी वाला गर्म पानी


आराम करें, मसालेदार भोजन न लें


🌿 4) लीवर सिरोसिस — देशी सहायक उपाय

भृंगराज रस 1 चम्मच


गिलोय + भृंगराज + कुटकी का काढ़ा


नमक बहुत कम करें


शराब पूरी तरह बंद


🌿 5) सूजा हुआ लीवर — देशी उपचार

जीरा + धनिया + सौंफ का पानी


नारियल पानी रोज


हल्का उबला भोजन (दलिया, खिचड़ी)


तली-भुनी चीज़ें बंद


🌿 6) अल्कोहलिक लीवर रोग — देशी उपचार

शराब पूरी तरह बंद (सबसे ज़रूरी)


आंवला + भृंगराज नियमित


नींबू पानी + शहद सुबह


हरी सब्ज़ियाँ अधिक लें


🌿 7) लीवर कैंसर — देशी सहायक देखभाल (सिर्फ सपोर्ट)

👉 यहाँ घरेलू उपाय इलाज नहीं, सिर्फ शरीर को सहारा देते हैं — डॉक्टर का इलाज अनिवार्य है।


हल्दी + काली मिर्च वाला दूध (गोल्डन मिल्क)


आंवला रस


एलोवेरा जूस (शुद्ध)


पौष्टिक, हल्का और ताज़ा भोजन


"हर इंसान एक अलग दुनिया है"

 "हर इंसान एक अलग दुनिया है"


ज़रा अपने आस-पास देखिए।

मोबाइल, कुर्सी, पंखा, किताब, सड़क, बिजली ये सब कभी किसी के मन में सिर्फ़ एक विचार थे। किसी इंसान ने सोचा, प्रयोग किया, असफल हुआ, फिर सीखा और धीरे-धीरे वही चीज़ दुनिया के लिए ज़रूरत बन गई।

इससे एक बात साफ़ होती है हर इंसान में कुछ नया करने की क्षमता है। हर व्यक्ति अपने भीतर एक पूरा ब्रह्माण्ड लेकर चलता है, जिसमें उसके विचार, अनुभव, भावनाएँ और ऊर्जा होती हैं।


लेकिन सवाल यह है कि सब लोग कुछ नया क्यों नहीं कर पाते?

क्योंकि हर इंसान की दुनिया अलग है। किसी की दुनिया डर से बनी है, किसी की ज़िम्मेदारियों से, किसी की संघर्षों से, तो किसी की सपनों से। बाहर से सब एक जैसे दिखते हैं, लेकिन अंदर से हर कोई अलग कहानी है।


पसंद, सोच और अनुभव का फर्क


कोई किताबों में खो जाना पसंद करता है,

तो कोई लोगों से बातें करके सीखता है।


किसी को शांति अच्छी लगती है,

तो किसी को शोर में सुकून मिलता है।


कोई अपने दुख भीतर ही रख लेता है,

तो कोई उन्हें शब्दों में बाँट देता है।


यह फर्क गलत या सही नहीं है यह सिर्फ़ अलग होना है।


हमारा बचपन, हमारा परिवार, हमारी परिस्थितियाँ ये सब मिलकर हमारी पसंद बनाते हैं। इसलिए यह स्वाभाविक है कि दो लोगों की पसंद, सोच और संवेदनाएँ एक जैसी नहीं होंगी।


रिश्तों में सबसे बड़ी भूल


यहीं से रिश्तों में टकराव शुरू होता है।

अक्सर हम यह भूल जाते हैं कि सामने वाला भी एक पूरी दुनिया है, और हम अपनी दुनिया उसे समझाए बिना उस पर थोपने लगते हैं।


“तुम ऐसा क्यों सोचते हो?”


“तुम्हें मेरी तरह महसूस क्यों नहीं होता?”


“मैं जो कह रहा हूँ वही सही है।”


हम यह नहीं देखते कि जो हमें सही लग रहा है, वह हमारी दुनिया का सच है, पूरी दुनिया का नहीं।


मान लीजिए एक पेड़ है और एक नदी।


पेड़ चाहता है कि नदी उसके पास रुके, ताकि उसकी जड़ें हमेशा भीगी रहें।

नदी चाहती है कि वह बहे, क्योंकि उसका स्वभाव ही बहना है।


अब अगर पेड़ नदी से कहे...

“अगर तुम मुझसे प्यार करती हो तो रुक जाओ,”

तो क्या नदी गलत है अगर वह बहती रहे?


और अगर नदी कहे..

“अगर तुम समझदार हो तो मुझे जाने दो,”

तो क्या पेड़ गलत है अगर उसे डर लगे?


असल में दोनों गलत नहीं हैं, बस दोनों की प्रकृति अलग है।


समझ, स्वीकार और सम्मान


रिश्ते तब खूबसूरत बनते हैं जब हम यह मान लेते हैं कि

“तुम मेरी तरह नहीं हो, और यह ठीक है।”


जब हम सामने वाले को बदलने की बजाय उसे समझने की कोशिश करते हैं।

जब हम अपनी बात कहें, लेकिन उसे थोपें नहीं।

जब हम यह जान लें कि पसंद न मिलना अस्वीकार होना नहीं होता।


हर इंसान अपने आप में एक ब्रह्माण्ड है।

अगर हम यह मान लें कि

"मेरी दुनिया अलग है¡

और सामने वाले की दुनिया भी अलग है

तो टकराव कम होंगे, संवाद बढ़ेगा और रिश्तों में गहराई आएगी।

दुनिया बदलने वाले अविष्कार सिर्फ़ मशीनों से नहीं होते,

कभी-कभी किसी को समझ लेना भी एक बहुत बड़ा बदलाव होता है।

दाद खाज खुजली

 Urticaria - दाद खाज खुजली - शरीर पर अचानक खुजली, लाल चकत्ते और जलन – आखिर होता क्यों है? बहुत लोगों के साथ ऐसा होता है कि अचानक शरीर पर तेज़ खुजली शुरू हो जाती है। खुजली के थोड़ी देर बाद वहां लाल-लाल उभरे हुए चकत्ते निकल आते हैं। 


कई बार इतना दर्द और जलन होती है कि ऐसा लगता है जैसे किसी ने चींटी या मधुमक्खी काट ली हो। कुछ मामलों में तो पूरा एरिया सूज जाता है और वहां मोटा-सा उभार बन जाता है।


ऐसी हालत में हम क्या करते हैं?

कोई घरेलू नुस्खा, कोई आयुर्वेदिक चूर्ण, कोई सिरप, कभी हरिद्राखंड, कभी महामंजिष्ठादि—लेकिन कई बार फायदा होता ही नहीं।


तो सवाल ये है


ये चकत्ते आखिर क्यों उठते हैं?

हर बार दवा लेने के बाद भी आराम क्यों नहीं मिलता?

क्या सबका कारण एक ही होता है?

और सबसे ज़रूरी—सही इलाज क्या है और सही डाइट क्या होनी चाहिए?


 हम इसी को आयुर्वेद के नज़रिये से साफ-साफ समझेंगे।


मौसम बदलते ही खुजली क्यों शुरू हो जाती है?

कई लोगों को खासकर


ठंड शुरू होते ही

बारिश के मौसम में

या फिर ठंडी हवा, पंखा, AC लगते ही


शरीर पर खुजली और लाल चकत्ते निकलने लगते हैं।

कई बार ऐसा भी होता है कि कोई खास मौसम नहीं—बस ठंडी चीज़ का contact हुआ और reaction शुरू।


डर्मेटोलॉजी की भाषा में इसे आमतौर पर Urticaria कहा जाता है।

आम बोलचाल में लोग इसे एलर्जी या चकत्ते कहते हैं।


यह समस्या दो तरह की होती है👇


Acute (तीव्र) – 6 हफ्ते से कम

Chronic (पुरानी) – 6 हफ्ते से ज्यादा


Acute में अक्सर किसी चीज़ से एलर्जी होती है—जैसे दूध, ठंडी चीज़ें, चॉकलेट वगैरह।

Chronic में कई बार अंदरूनी बीमारी, यहां तक कि गंभीर रोग भी कारण बन सकते हैं।


आयुर्वेद में ये एक नहीं, तीन अलग बीमारियाँ हैं

यहीं सबसे बड़ा confusion होता है।

Modern science इसे एक disease मानती है, लेकिन आयुर्वेद में इसे तीन अलग-अलग बीमारियों में बांटा गया है, जिनके लक्षण मिलते-जुलते हैं लेकिन कारण और इलाज अलग है।


वो तीन बीमारियाँ हैं

शीतपित्त

उदर्द

कोठ


तीनों में लाल चकत्ते, खुजली, जलन दिखती है—इसीलिए मरीज और कई बार डॉक्टर भी कंफ्यूज़ हो जाते हैं।


शीतपित्त – जब ठंडी हवा दुश्मन बन जाए

कब होता है?


ठंडी हवा लगते ही

नहाकर तुरंत पंखे के नीचे बैठने से

AC या ठंडी चीज़ों के contact से


Western Science क्या कहती है?

इसे Hunting Reaction कहते हैं।

ठंडी लगते ही blood vessels सिकुड़ती हैं, फिर अचानक फैलती हैं, फिर दोबारा सिकुड़ती हैं।

कुछ लोगों में इसी process से allergic reaction शुरू हो जाता है।


आयुर्वेदिक कारण

ठंडी हवा से वात दोष बिगड़ता है, पित्त दब जाता है और body में reaction शुरू हो जाता है।

इसलिए इसे कहा जाता है शीत + पित्त = शीतपित्त।


शीतपित्त में क्या करें? (घरेलू उपाय)


अदरक + गुड़ का पानी

1 गिलास पानी

1 चम्मच गुड़

कूटा हुआ अदरक

उबालकर आधा करें और 5-5 मिनट में 2-2 चम्मच पीएं।


सरसों के तेल से मालिश


सरसों का तेल + चुटकी सेंधा नमक

हल्का गरम करके शरीर पर लगाएं

ठंड को काटने में जबरदस्त काम करता है।


त्रिकटु चूर्ण


आधा चम्मच दूध में उबालकर

या

1-2 चुटकी शहद के साथ


लहसुन और हल्दी

दोनों गर्म तासीर के हैं और skin reactions में मदद करते हैं।


ध्यान रखें:

शीतपित्त में पित्त को ठंडा नहीं करना, बल्कि वात को संतुलित करना ज़रूरी है।


उदर्द – मौसम बदलते ही शुरू होने वाली परेशानी

कब होता है?

जनवरी से मार्च

ठंड खत्म होकर गर्मी शुरू होने पर

खासकर वसंत ऋतु में


खास पहचान

मीठा खाते ही खुजली बढ़ना

लाल बड़े-बड़े चकत्ते

जलन, कभी-कभी बुखार

यहां कफ दोष ज्यादा बिगड़ा होता है।


उदर्द में क्या करें?

अजवाइन + गुड़ का काढ़ा

2 गिलास पानी

1 चम्मच अजवाइन

गुड़ का टुकड़ा

उबालकर आधा करें, 5-5 मिनट में पीएं।


गिलोय

काढ़ा 20–30 ml सुबह खाली पेट

या

पाउडर 3–4 ग्राम गर्म पानी के साथ

सरसों के तेल से मालिश

डाइट में तीखापन बढ़ाएं


काली मिर्च + गुड़ की छोटी गोलियां

मीठा, खट्टा, नमक और दूध से परहेज


कोठ – बारिश और एसिडिटी से जुड़ी बीमारी

कब होता है?

बरसात के मौसम में


ज्यादा खट्टा, फर्मेंटेड खाना

बार-बार एसिडिटी वालों में

यहां पित्त और कफ दोनों बिगड़े होते हैं।


कोठ में क्या करें?

कड़वी चीजें ज्यादा लें


गिलोय

आंवला + सोंठ

लोकल application में घी

घी + काली मिर्च पाउडर

(गरम तेल नहीं)

एसिडिटी कंट्रोल करें


एक ही लक्षण, लेकिन इलाज अलग-अलग

यही सबसे जरूरी बात है

तीनों में दिखने वाले symptoms लगभग same हैं,

लेकिन


शीतपित्त में ठंड से बचाव

उदर्द में कफ कम करना

कोठ में पित्त-एसिडिटी कंट्रोल


जरूरी है।


गलत दवा = कोई फायदा नहीं।


पंचकर्म कब ज़रूरी होता है?

अगर बार-बार हो रहा है, दवाओं से आराम नहीं मिल रहा, तो


शीतपित्त – विरेचन

उदर्द – वमन

कोठ – रक्तमोक्षण (ब्लड डोनेशन जैसी प्रक्रिया)


ये सब अनुभवी आयुर्वेद डॉक्टर की निगरानी में ही कराएं।


आख़िरी बात

जिसे हम आम भाषा में “एलर्जी” या “Urticaria” कहते हैं,

आयुर्वेद में वो तीन अलग-अलग बीमारियाँ हो सकती हैं।


सही पहचान + सही इलाज = पूरा आराम।


#क्या बताती है,शरीर में होने वाली खुजली,किस अंग के बीमार होने का क्या लक्षण...


🔴 1) त्वचा (Skin) — सबसे आम कारण

संकेत देता है: त्वचा रोग / एलर्जी


लाल चकत्ते, दाने, सूखापन


फंगल इन्फेक्शन, स्केबीज, एक्जिमा

संभावना अधिक जब खुजली केवल त्वचा पर हो।


🟡 2) लीवर (Liver) — गंभीर संकेत हो सकता है

संकेत देता है: लीवर की कमजोरी या पित्त (Bile) की समस्या


खासकर रात में ज्यादा खुजली


आंखें/त्वचा पीली (पीलिया)


गहरे रंग का पेशाब

👉 ऐसी खुजली में दाने नहीं होते, बस जलन/खुजली रहती है।


🔵 3) किडनी (Kidney) — यूरिया बढ़ने का संकेत

संकेत देता है: किडनी की समस्या


पूरे शरीर में सूखापन + खुजली


थकान, पैरों में सूजन


पेशाब में बदलाव


🟣 4) थायरॉइड (Thyroid) — हार्मोन असंतुलन

संकेत देता है: थायरॉइड की गड़बड़ी


त्वचा रूखी, खुरदरी


बाल झड़ना, वजन में बदलाव


ज्यादा पसीना या ठंड लगना


🟢 5) रक्त (Blood) — खून से जुड़ी बीमारियाँ

संकेत देता है: आयरन की कमी / एलर्जी


बिना दाने के खुजली


कमजोरी, चक्कर आना


⚠️ कब डॉक्टर को दिखाएँ?

अगर खुजली:


2–3 हफ्ते से ज्यादा रहे


रात में बहुत बढ़ जाए


पीलिया, सूजन, वजन घटने के साथ हो


🔵 6) आँत (Intestine / Gut) — पाचन की गड़बड़ी

संकेत देता है: पेट/आँत की समस्या


गैस, कब्ज, एसिडिटी


खाने के बाद खुजली बढ़ना


बार-बार एलर्जी जैसा रिएक्शन

👉 खराब पाचन से शरीर में टॉक्सिन बढ़ते हैं → खुजली होती है।


🟠 7) पैंक्रियास (Pancreas) — शुगर/पित्त से जुड़ा संकेत

संकेत देता है: शुगर असंतुलन या पित्त समस्या


बार-बार खुजली, खासकर जननांग/कमर के आसपास


ज्यादा प्यास, बार-बार पेशाब


मीठा खाने की तीव्र इच्छा


🟣 8) नर्वस सिस्टम (Nerves) — नसों की कमजोरी

संकेत देता है: नर्व प्रॉब्लम


बिना दाने के चुभन जैसी खुजली


जलन, झनझनाहट, सुन्नपन


खास जगह पर बार-बार खुजली


गिलोय का इस्तेमाल

गिलोय का इस्तेमाल बुखार, डायबिटीज, पीलिया, गठिया, एसिडिटी, अपच और पेशाब संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए किया जाता है. गिलोय एक ऐसी होती है जो वात, पित्त, कफ तीनों के रोगियों को फायदा पहुंचाती है. शरीर से विषैले और हानिकारक पदार्थ को निकालने में भी गिलोय मदद करता है।

अगर आप गिलोय के पत्तों को जूस के रूप में अपने आहार में शामिल करना चाहते हैं, तो आपको बस इतना करना है कि पौधे को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें और थोड़े से पानी के साथ पेस्ट बना लें। पेस्ट बन जाने के बाद, इसे हल्दी के साथ एक कड़ाही में डालें और तब तक उबालें जब तक कि यह गाढ़ा जूस न बन जाए। आप इसे हर सुबह पी सकते हैं।


🙏#गिलोय एक ही ऐसी बेल है, जिसे आप सौ मर्ज की एक दवा कह सकते हैं। इसलिए इसे संस्कृत में अमृता नाम दिया गया है। 


कहते हैं कि देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत निकला और इस अमृत की बूंदें जहां-जहां छलकीं, वहां-वहां गिलोय की उत्पत्ति हुई।


#इसका वानस्पिक नाम( Botanical name) टीनोस्पोरा कॉर्डीफोलिया (tinospora cordifolia है। इसके पत्ते पान के पत्ते जैसे दिखाई देते हैं और जिस पौधे पर यह चढ़ जाती है, उसे मरने नहीं देती। इसके बहुत सारे लाभ आयुर्वेद में बताए गए हैं, जो न केवल आपको सेहतमंद रखते हैं, बल्कि आपकी सुंदरता को भी निखारते हैं। 


#आइए_जानते_हैं_गिलोय_के_फायदे…....


#गिलोय बढ़ाती है रोग प्रतिरोधक क्षमता


गिलोय एक ऐसी बेल है, जो व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर उसे बीमारियों से दूर रखती है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो शरीर में से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने का काम करते हैं। यह खून को साफ करती है, बैक्टीरिया से लड़ती है। लिवर और किडनी की अच्छी देखभाल भी गिलोय के बहुत सारे कामों में से एक है। ये दोनों ही अंग खून को साफ करने का काम करते हैं।


#ठीक करती है बुखार


अगर किसी को बार-बार बुखार आता है तो उसे गिलोय का सेवन करना चाहिए। गिलोय हर तरह के बुखार से लडऩे में मदद करती है। इसलिए डेंगू के मरीजों को भी गिलोय के सेवन की सलाह दी जाती है। डेंगू के अलावा मलेरिया, स्वाइन फ्लू में आने वाले बुखार से भी गिलोय छुटकारा दिलाती है।


#गिलोय के फायदे – डायबिटीज के रोगियों के लिए


गिलोय एक हाइपोग्लाइसेमिक एजेंट है यानी यह खून में शर्करा की मात्रा को कम करती है। इसलिए इसके सेवन से खून में शर्करा की मात्रा कम हो जाती है, जिसका फायदा टाइप टू डायबिटीज के मरीजों को होता है।


#पाचन शक्ति बढ़ाती है


यह बेल पाचन तंत्र के सारे कामों को भली-भांति संचालित करती है और भोजन के पचने की प्रक्रिया में मदद कती है। इससे व्यक्ति कब्ज और पेट की दूसरी गड़बडिय़ों से बचा रहता है।


#कम करती है स्ट्रेस


गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में तनाव या स्ट्रेस एक बड़ी समस्या बन चुका है। गिलोय एडप्टोजन की तरह काम करती है और मानसिक तनाव और चिंता (एंजायटी) के स्तर को कम करती है। इसकी मदद से न केवल याददाश्त बेहतर होती है बल्कि मस्तिष्क की कार्यप्रणाली भी दुरूस्त रहती है और एकाग्रता बढ़ती है।


#बढ़ाती है आंखों की रोशनी


गिलोय को पलकों के ऊपर लगाने पर आंखों की रोशनी बढ़ती है। इसके लिए आपको गिलोय पाउडर को पानी में गर्म करना होगा। जब पानी अच्छी तरह से ठंडा हो जाए तो इसे पलकों के ऊपर लगाएं।


#अस्थमा में भी फायदेमंद


मौसम के परिवर्तन पर खासकर सर्दियों में अस्थमा को मरीजों को काफी परेशानी होती है। ऐसे में अस्थमा के मरीजों को नियमित रूप से गिलोय की मोटी डंडी चबानी चाहिए या उसका जूस पीना चाहिए। इससे उन्हें काफी आराम मिलेगा।


#गठिया में मिलेगा आराम


गठिया यानी आर्थराइटिस में न केवल जोड़ों में दर्द होता है, बल्कि चलने-फिरने में भी परेशानी होती है। गिलोय में एंटी आर्थराइटिक गुण होते हैं, जिसकी वजह से यह जोड़ों के दर्द सहित इसके कई लक्षणों में फायदा पहुंचाती है।


#अगर हो गया हो एनीमिया, तो करिए गिलोय का सेवन


भारतीय महिलाएं अक्सर एनीमिया यानी खून की कमी से पीडि़त रहती हैं। इससे उन्हें हर वक्त थकान और कमजोरी महसूस होती है। गिलोय के सेवन से शरीर में लाल रक्त कणिकाओं की संख्या बढ़ जाती है और एनीमिया से छुटकारा मिलता है।


#बाहर निकलेगा कान का मैल


कान का जिद्दी मैल बाहर नहीं आ रहा है तो थोड़ी सी गिलोय को पानी में पीस कर उबाल लें। ठंडा करके छान के कुछ बूंदें कान में डालें। एक-दो दिन में सारा मैल अपने आप बाहर जाएगा।


#कम होगी पेट की चर्बी


गिलोय शरीर के उपापचय (मेटाबॉलिजम) को ठीक करती है, सूजन कम करती है और पाचन शक्ति बढ़ाती है। ऐसा होने से पेट के आस-पास चर्बी जमा नहीं हो पाती और आपका वजन कम होता है।


#खूबसूरती बढ़ाती है गिलोय


गिलोय न केवल सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है, बल्कि यह त्वचा और बालों पर भी चमत्कारी रूप से असर करती है….


#जवां रखती है गिलोय


गिलोय में एंटी एजिंग गुण होते हैं, जिसकी मदद से चेहरे से काले धब्बे, मुंहासे, बारीक लकीरें और झुर्रियां दूर की जा सकती हैं। इसके सेवन से आप ऐसी निखरी और दमकती त्वचा पा सकते हैं, जिसकी कामना हर किसी को होती है। अगर आप इसे त्वचा पर लगाते हैं तो घाव बहुत जल्दी भरते हैं। त्वचा पर लगाने के लिए गिलोय की पत्तियों को पीस कर पेस्ट बनाएं। अब एक बरतन में थोड़ा सा नीम या अरंडी का तेल उबालें। गर्म तेल में पत्तियों का पेस्ट मिलाएं। ठंडा करके घाव पर लगाएं। इस पेस्ट को लगाने से त्वचा में कसावट भी आती है।


#बालों की समस्या भी होगी दूर


अगर आप बालों में ड्रेंडफ, बाल झडऩे या सिर की त्वचा की अन्य समस्याओं से जूझ रहे हैं तो गिलोय के सेवन से आपकी ये समस्याएं भी दूर हो जाएंगी।


#गिलोय का प्रयोग ऐसे करें :--


अब आपने गिलोय के फायदे जान लिए हैं, तो यह भी जानिए कि गिलोय को इस्तेमाल कैसे करना है…


#गिलोय जूस


गिलोय की डंडियों को छील लें और इसमें पानी मिलाकर मिक्सी में अच्छी तरह पीस लें। छान कर सुबह-सुबह खाली पेट पीएं। अलग-अलग ब्रांड का गिलोय जूस भी बाजार में उपलब्ध है।


#काढ़ा


चार इंच लंबी गिलोय की डंडी को छोटा-छोटा काट लें। इन्हें कूट कर एक कप पानी में उबाल लें। पानी आधा होने पर इसे छान कर पीएं। अधिक फायदे के लिए आप इसमें लौंग, अदरक, तुलसी भी डाल सकते हैं।


#पाउडर


यूं तो गिलोय पाउडर बाजार में उपलब्ध है। आप इसे घर पर भी बना सकते हैं। इसके लिए गिलोय की डंडियों को धूप में अच्छी तरह से सुखा लें। सूख जाने पर मिक्सी में पीस कर पाउडर बनाकर रख लें।


#गिलोय वटी


बाजार में गिलोय की गोलियां यानी टेबलेट्स भी आती हैं। अगर आपके घर पर या आस-पास ताजा गिलोय उपलब्ध नहीं है तो आप इनका सेवन करें।


साथ में अलग-अलग बीमारियों में आएगी काम


अरंडी यानी कैस्टर के तेल के साथ गिलोय मिलाकर लगाने से गाउट(जोड़ों का गठिया) की समस्या में आराम मिलता है।इसे अदरक के साथ मिला कर लेने से रूमेटाइड आर्थराइटिस की समस्या से लड़ा जा सकता है।खांड के साथ इसे लेने से त्वचा और लिवर संबंधी बीमारियां दूर होती हैं।आर्थराइटिस से आराम के लिए इसे घी के साथ इस्तेमाल करें।कब्ज होने पर गिलोय में गुड़ मिलाकर खाएं।


#साइड इफेक्ट्स का रखें ध्यान


वैसे तो गिलोय को नियमित रूप से इस्तेमाल करने के कोई गंभीर दुष्परिणाम अभी तक सामने नहीं आए हैं लेकिन चूंकि यह खून में शर्करा की मात्रा कम करती है। इसलिए इस बात पर नजर रखें कि ब्लड शुगर जरूरत से ज्यादा कम न हो जाए। 



पेट में गैस बनती है और कब्ज की समस्या

 Isabgol for Vata - क्या वात प्रकृति वाले इसबगोल ले सकते हैं? वात प्रकृति, कब्ज और इसबगोल को लेकर सबसे बड़ा कन्फ्यूजन - अगर आपकी प्रकृति वात की है, यानी शरीर में रूखापन रहता है, जोड़ों में कड़क-कड़क की आवाज़ आती है, 


पेट में गैस बनती है और कब्ज की समस्या बार-बार परेशान करती है, तो आपके मन में एक सवाल ज़रूर आता होगा।


कब्ज होने पर क्या इसबगोल लेना सही है?


लोगों का सबसे बड़ा डर यही होता है कि इसबगोल की तासीर ठंडी मानी जाती है। तो क्या यह वात को और बढ़ा देगा?

क्या इससे पेट और ज़्यादा फूल जाएगा?

और सबसे आम सवाल, क्या इसकी आदत पड़ जाती है?


इस Post में हम आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों और आधुनिक साइंस की रिसर्च के आधार पर इन सभी सवालों का जवाब जानेगें। साथ ही इसबगोल लेने का वह सही और सुरक्षित तरीका भी जानेगें, जो खासतौर पर वात प्रकृति वालों के लिए अमृत जैसा काम करता है।


क्या वात प्रकृति वाले इसबगोल ले सकते हैं?

सीधा और साफ़ जवाब है — हां, बिल्कुल ले सकते हैं।

इतना ही नहीं, सही तरीके से लिया जाए तो यह वात रोगियों के लिए सबसे बेहतरीन औषधियों में से एक है।


आयुर्वेद के अनुसार इसबगोल का स्वाद मधुर यानी मीठा होता है और पाचन के बाद भी इसका प्रभाव मधुर ही रहता है।

और आप जानते हैं, मीठा स्वाद वात को शांत करता है।


वात का मुख्य गुण है रूखापन। जब आंतें सूख जाती हैं, तो मल सख़्त हो जाता है और कब्ज होती है।

इसबगोल में दो बहुत महत्वपूर्ण गुण होते हैं।

पहला स्निग्ध, यानी चिकनाई देने वाला।

दूसरा पिच्छिल, यानी लिसलिसापन पैदा करने वाला।


ये दोनों गुण आंतों में नमी लाते हैं, जो वात के रूखेपन को खत्म करने में सबसे ज़्यादा मदद करते हैं।


ठंडी तासीर से वात बढ़ेगा या नहीं?

अब आते हैं उस डर पर, जो ज़्यादातर लोगों को रोक देता है।


यह सच है कि इसबगोल का वीर्य शीत यानी ठंडा होता है।

अगर आप इसे ठंडे पानी के साथ लेंगे, तो यह वात को बढ़ा सकता है और पेट में मरोड़, गैस या असहजता पैदा कर सकता है।


लेकिन आयुर्वेद का एक बहुत बड़ा सिद्धांत है — संस्कार और अनुपान।

मतलब, आप किसी चीज़ को किसके साथ लेते हैं, यह उसके प्रभाव को पूरी तरह बदल सकता है।


वात की कब्ज में असली समस्या ठंडक नहीं, बल्कि रूखापन होता है।

इसबगोल की चिकनाई उस रूखेपन को खत्म कर देती है।

और जो ठंडी तासीर है, उसे हम गर्म दूध और घी के साथ पूरी तरह बैलेंस कर देते हैं।


आगे हम इसका सही तरीका विस्तार से समझेंगे।


क्या इसबगोल की आदत पड़ जाती है?

यह सवाल भी बहुत ज़रूरी है।


सच यह है कि केमिकल रूप से इसबगोल की लत नहीं लगती।

बाज़ार में मिलने वाले कई कब्ज के चूर्ण जैसे सनायुक्त चूर्ण या तेज़ दवाइयां आंतों की नसों को इरिटेट करती हैं।

इससे आंतें धीरे-धीरे कमजोर हो जाती हैं।


इसबगोल ऐसा नहीं करता।

यह केवल फाइबर का एक बल्क बनाता है, जिससे मल को बाहर निकलने में आसानी होती है।


लेकिन वात प्रकृति वालों के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है।

रिसर्च बताती है कि अगर इसबगोल को रोज़ाना कई महीनों तक लिया जाए, तो यह भोजन से कैल्शियम और आयरन को सोख सकता है।


वात प्रकृति वालों की हड्डियां पहले से ही नाज़ुक होती हैं।

इसलिए इसे आदत न बनाएं।

जब ज़रूरत हो तभी लें और बीच-बीच में ब्रेक ज़रूर दें।


वात प्रकृति के लिए इसबगोल लेने का गोल्डन तरीका

अब ध्यान से नोट कीजिए।

यह तरीका वात वालों के लिए Golden rule  है।


वात की कब्ज में इसबगोल को कभी भी सूखे या ठंडे पानी से नहीं लेना चाहिए।


एक गिलास गर्म दूध लें।

गाय का दूध सबसे अच्छा माना जाता है।

इसमें एक चम्मच देसी घी मिलाएं।

घी वात का सबसे बड़ा दुश्मन है।


अब इसमें एक चम्मच इसबगोल डालें और तुरंत पी लें।


अगर आपको दूध नहीं पचता, तो आप तेज़ गर्म पानी में घी मिलाकर, फिर उसमें इसबगोल डालकर भी ले सकते हैं।

घी डालना बहुत ज़रूरी है क्योंकि यह आंतों को स्नेहन देता है, यानी अंदर से लुब्रिकेशन करता है।


कब इसबगोल बिल्कुल नहीं लेना चाहिए?

कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं, जहां चाहे कब्ज कितनी भी हो, इसबगोल नहीं लेना चाहिए।


अगर आपकी जीभ पर मोटी सफेद परत जमी हो,

मल बहुत चिपचिपा और बदबूदार हो,

तो आयुर्वेद में इसे आम यानी टॉक्सिन्स कहा जाता है।


इसबगोल गुरु यानी भारी होता है।

ऐसी स्थिति में यह पचेगा नहीं और समस्या और बढ़ा देगा।


पहले पाचन को ठीक करें।

सोंठ का पानी या जीरा पानी लें।

जब आम साफ हो जाए, तभी इसबगोल शुरू करें।


Conclusion

वात प्रकृति वाले लोग इसबगोल ले सकते हैं और लेना उनके लिए फायदेमंद भी हो सकता है।

बस सही तरीके से लेना ज़रूरी है।


हमेशा गर्म दूध या गर्म पानी और घी के साथ लें, ताकि इसकी ठंडी तासीर बैलेंस हो जाए।

इसकी केमिकल लत नहीं लगती, लेकिन लंबे समय तक लगातार लेने से बचें।

इसे रात में सोते समय लें, भोजन के साथ नहीं।



I hated alcohol

 I hated alcohol.

Not because I was an addict.

Not because I blacked out every night.

Not because my life was “out of control.”

I hated alcohol because every time I drank, my body betrayed me.

At 31, I still enjoyed it.

At 33, I had reasons.

By 38, I had rituals down to a science.

I told myself I was a “social drinker.”

That wine helps me relax.

That real adults unwind like this.

That everyone needs something after a long day.

That was bullshit.

The truth?

Alcohol scared me.

I didn’t hate drinking.

I hated what came after.

The moment my body shifted into low power mode:

Brain fog.

Tight chest.

Flat emotions.

That dull, heavy feeling like life was happening behind glass.

Nothing kills momentum faster than numbness.

My first burnout didn’t look dramatic.

No rock bottom. No lost job.

Just slower mornings.

Then missed workouts.

Then cancelled plans.

Then silence inside my head.

I blamed stress.

Then work.

Then age.

So when I “cut back,” I was sure this time would be different.

Only weekends.

Only wine.

Only socially.

The first month? Fine.

The second? Still manageable.

Then it happened again.

Not hangovers.

Something worse.

I woke up tired even after sleep.

Motivation disappeared by noon.

I’d drink just to feel something again.

I started delaying real life.

“I’ll start Monday.”

“After this project.”

“Just one more week.”

I wasn’t relaxing.

I was avoiding myself.

Here’s what no one tells you:

When alcohol messes with your nervous system, clarity doesn’t disappear first.

Agency does.

My body felt… muted.

No drive. No edge.

No hunger for progress.

Just flat.

I tried fixing it the hard way.

More discipline.

More caffeine.

More productivity hacks.

Nothing touched the core issue.

Meanwhile, my habits were quietly wrecking me:

– Drinking “to switch off”

– Scrolling for hours after

– Shallow sleep

– Constant low-grade anxiety

– Zero recovery

My body wasn’t broken.

It was dysregulated.

Alcohol doesn’t announce itself as a problem.

It erodes you.

You stop initiating change.

You stop trusting your energy.

You stop believing tomorrow will feel different.

The turning point wasn’t a hangover.

It was waking up one morning and realizing:

I hadn’t felt clear in years.

Not once.

That’s when it hit me:

This wasn’t about willpower.

This was neurological.

Alcohol affects:

– dopamine

– cortisol

– sleep cycles

– emotional regulation

– motivation

Week 2:

Mornings felt lighter.

Week 4:

Focus came back — not forced, not hyped.

Natural.

Week 6:

Evenings stopped feeling like something to survive.

Week 8:

I didn’t think about drinking at all.

I just… lived.

That’s when I realized something uncomfortable:

I never hated alcohol.

I hated who I became with it.

If this story makes you uneasy — good.

It means your body is trying to tell you something.

Alcohol doesn’t ruin your life overnight.

It makes you quiet.

And quiet kills momentum faster than failure.

Don’t wait until numbness becomes your personality.

Fix the system — not the habit.

Your clarity isn’t gone.

It’s suppressed.

And it’s reversible.

Take the 3-minute quiz.

See what alcohol is actually doing to your brain and body.

नारी चुंबकीय शक्ति

नारी जितना पुरुष के संसर्ग में आती है वह उतनी ही चुंबकीय शक्ति का क्षरण करती जाती है।🌹 


चुंबकीय शक्ति ही आद्याशक्ति है जिसे अंतर्निहित करके काम शक्ति को आत्मशक्ति में परिवर्तित किया जाता है। यह शक्ति दो केंद्रों में विलीन होती है। प्रथमत: मूलाधार चक्र में, जहां से यह ऊर्जा जननेंद्रिय के मार्ग से नीचे प्रवाहित होकर प्रकृति में विलीन हो जाती है और यदि यही ऊर्जा भौंहों के मध्य स्‍थि‍त आज्ञा चक्र से जब ऊपर को प्रवाहित होती है तो सहस्रार स्‍थि‍त ब्रह्म से एकीकृत हो जाती है।


इसलिए कुंआरी कन्या का प्रयोग तंत्र साधना में उसकी शक्ति की सहायता से दैहिक सुख प्राप्त करने हेतु नहीं, ‍अपितु उसे भैरवी रूप में प्रतिष्ठित करके ब्रह्म से सायुज्य प्राप्त करने हेतु किया जाता है।


यह संपूर्ण संसार द्वंद्वात्मक है, मिथुनजन्य है एवं इसके समस्त पदार्थ स्त्री तथा पुरुष में विभाजित हैं। इन दोनों के बीच आकर्षण शक्ति ही संसार के अस्तित्व का मूलाधार है जिसे आदि शंकराचार्यजी ने सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में व्यक्त किया है।


शिव:शक्तया युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभवितुं।

न चेदेवं देवो न खलु कुशल: स्पन्दितुमपि। 


यह आकर्षण ही कामशक्ति है जिसे तंत्र में आदिशक्ति कहा गया है। यह परंपरागत पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। तंत्र शास्त्र के अनुसार नारी इसी आदिशक्ति का साकार प्रतिरूप है। षटचक्र भेदन व तंत्र साधना में स्त्री की उपस्थिति अनिवार्य है, क्योंकि साधना स्थूल शरीर द्वारा न होकर सूक्ष्म शरीर द्वारा ही संभव है।


तंत्र साधना का यौनक्रिया सामान्य यौनक्रिया नही है, इस यौनक्रिया में प्रेम का संबंध होता है,जो सूक्ष्म शरीर द्वारा ही संभव है। सामान्य यौनक्रिया बस वासना से प्रेरित होता है जो सिर्फ स्थूल शरीर का अनुभव है। तंत्र साधना में यौनक्रिया द्वारा भैरव अपने हृदय की ऊर्जा को अपने भैरवी के हृदय में उतरता हैं और दो आत्माओं के बीच ऊर्जा का एक बंध बन जाता है


तंत्र साधना में यौनक्रिया के लिए, आपको मानसिक, शारीरिक और वाचिक रूप से पवित्र होना पड़ेगा, आपके हृदय में प्रेम, श्रद्धा और समर्पण होना चाहिए, वासना नही, क्योंकि तंत्र साधना में यौनक्रिया बहुत ही उच्च कोटि के साधक साधिकाओं के लिए है जिसका उद्देश्य सिर्फ और अपने इष्ट से सायुज्य प्राप्त करना होता है।


ज्यादातर साधना इस प्रकार की हैं कि वो बस व्यक्तिगत ही हैं, मतलब सिर्फ एक व्यक्ति ही आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है और उसके लिए भी उसे सन्यास की जरूरत होगी


लेकिन तंत्र एकमात्र ऐसी साधना है जिसमे पति पत्नी साथ में आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं, तंत्र साधना गृहस्थ और सन्यासी दोनों के लिए अलग अलग मार्ग से है, लेकिन इस साधना के लिए पति पत्नी के बीच गहरा और निस्वार्थ प्रेम आवश्यक है और दोनों का ही ईश्वर के लिए श्रद्धा, विश्वास और समर्पण भी आवश्यक है


हमारे शरीर में X तथा Y दो क्रोमोसोम पाए जाते हैं, अर्थात हमारे अंदर स्त्री और पुरुष दोनों के गुण मौजूद हैं। हमारे सूक्ष्म शरीर भी स्त्री तत्व और पुरुष तत्व दो तत्व से मिलकर बना है, स्त्री तत्व को शक्ति और पुरुष तत्व को शिव कहा गया है। मोक्ष के लिए जरूरी है कि हमारे दोनों तत्व व्यवस्थित हो जाए और ऊर्जा के प्रबाह के लिए मार्ग खुल जाए जिसे हम कुंडलिनी जागरण भी कहते हैं


तंत्र साधना में पुरुष और स्त्री की आबश्यकता का एक और कारण यह है कि स्त्री में पुरुष तत्व का जागरण करने के लिए पुरुष अपनी पुरुषत्व की ऊर्जा स्त्री में यौनक्रिया के माध्यम से प्रबाहित करता है जिससे जो पुरुष तत्व स्त्री में सुप्त था उसका जागरण हो जाये। स्त्री भी इसी प्रकार पुरूष का स्त्री तत्व जगाने में मदद करती है जो अर्धनारीश्वर का स्वरूप है।


प्रेम के बहुत सारे स्तर होते हैं, प्रेम का स्तर जितना सूक्ष्म होता जाएगा, प्रेम उतना ही पवित्र और आध्यात्मिक उन्नति उतनी ही प्रबल होती जाएगी क्योंकि ईश्वर प्रेमस्वरूप ही हैं। जो मनुष्य केवल शारिरिक प्रेम करता है, उसे बस कुछ छणों के लिए आनंद की प्राप्ति होती है, जिस मानव का प्रेम थोड़ा सूक्ष्म होकर मानसिक हो गया है वो थोड़ा अधिक आनंद का अनुभव करेगा पर जिस मानव ने अपनी स्वयं की चेतना में उतरकर अध्यत्मिक प्रेम का विकास कर लिया उसके आनंद का वर्णन संभव ही नही है


शारीरिक और मानसिक प्रेम में वासना की प्रधानता रहती है परंतु आध्यात्मिक प्रेम में बस प्रेम ही रहता है, वासना का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है, फिर तो जो आनंद हृदय में महसूस होता है वो इस संसार के सब सुखों से हज़ारों गुना ज्यादा है


तंत्र एक बेहद पवित्र मार्ग है, प्रेम से भरा हुआ मार्ग और यह मार्ग स्वयं शिव ने दिया है जिनसे पवित्र इस संसार में कुछ भी नही है

आजकल लोग इतने आक्रामक क्यों हो गए हैं

आजकल लोग इतने आक्रामक क्यों हो गए हैं और इससे कैसे बाहर आएँ?


आजकल जब हम बाहर निकलते हैं, तो छोटी-सी बात पर झगड़े, सड़क पर गुस्से वाले लोग, और घरों में अपनों के बीच लड़ाई की खबरें अक्सर सुनने को मिलती हैं। कभी-कभी ये हिंसा इतनी बड़ी हो जाती है कि हत्या, बलात्कार या घरेलू हिंसा जैसी घटनाएं सामने आती हैं। यह अचानक नहीं होता। यह हमारे रोज़मर्रा के जीवन की आदतों, सोच और भावनाओं का नतीजा है।


क्यों बढ़ रही है आक्रामकता?


1. जल्दी सब कुछ पाने की चाह


आज के समय में लोग हर चीज़ तुरंत चाहते हैं पैसा, सफलता, पहचान। लेकिन जीवन हमेशा हमारी इच्छानुसार नहीं चलता।

उदाहरण: एक बच्चा मोबाइल गेम जीतना चाहता है। हर बार हारने पर वह गुस्सा करता है। वैसे ही बड़े लोग भी छोटी असफलताओं पर जल्दी चिड़चिड़ा हो जाते हैं।


2. पैसा और ताकत की होड़


पैसा और पावर को सफलता का पैमाना मान लिया गया है। इससे तुलना और जलन बढ़ती है।

उदाहरण: अगर किसी पड़ोसी ने नया घर बना लिया, तो जलन या ईर्ष्या के कारण आप छोटा महसूस कर सकते हैं। यही भावना कभी-कभी गुस्से में बदल जाती है।


3. नशा और गलत आदतें


शराब, तंबाकू, मोबाइल या वीडियो गेम जैसी आदतें सोचने-समझने की शक्ति को कमजोर करती हैं।

उदाहरण: शराब पीकर घर आए व्यक्ति को छोटी-सी बात पर भी गुस्सा आ सकता है।


4. रिश्तों में दूरी और प्रेम की कमी


आज लोग परिवार और दोस्तों के साथ समय कम बिताते हैं। मोबाइल ने पास जरूर रखा है, लेकिन असली बातचीत कम हो गई है।

उदाहरण: बच्चे अपने माता-पिता से बातें कम करते हैं और मोबाइल पर खेलते रहते हैं। इससे घर में दूरी और चिड़चिड़ापन बढ़ता है।


5. संवेदनशीलता की कमी


अखबार और सोशल मीडिया पर हर समय हिंसक और डरावनी खबरें आती रहती हैं। धीरे-धीरे मन कठोर हो जाता है।

उदाहरण: पहले किसी सड़क दुर्घटना को देखकर लोग दुखी होते थे, अब बस गुजर जाते हैं।


6. राजनीतिक और बाहरी प्रभाव


आज सोशल मीडिया और विज्ञापन लोगों की सोच और भावनाओं पर गहरा असर डालते हैं। राजनीति, प्रचार और सेक्सुअल सामग्री भी गुस्से या गलत अपेक्षाओं को बढ़ाती है।

उदाहरण:


कोई फेसबुक या व्हाट्सएप पोस्ट पढ़कर बहुत गुस्सा हो जाता है, और परिवार या पड़ोसियों के साथ लड़ाई कर देता है।


टीवी या ऑनलाइन विज्ञापन में दिखाए गए लग्ज़री जीवन को देखकर लोग अपनी स्थिति पर असंतोष महसूस करते हैं।


सेक्सुअल कंटेंट के कारण कुछ लोग अपने रिश्तों और अपेक्षाओं को असली जीवन से जोड़कर तनाव या जलन महसूस करते हैं।


इन बाहरी प्रभावों के कारण, कई बार इंसान अपने भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाता और छोटी बातों पर भी आक्रामक हो जाता है।


कैसे पहचानें कि गुस्सा बढ़ रहा है


छोटी-सी बात पर बार-बार चिड़चिड़ा होना


अपने ही लोगों से दूरी बनाना


हर असहमति को व्यक्तिगत हमला समझना


दूसरों के दुख से उदासीन होना


बाहरी खबरों, पोस्ट या विज्ञापनों पर तुरंत प्रतिक्रिया देना


उदाहरण: अगर आप सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट देखकर तुरंत गुस्सा कर रहे हैं, या परिवार में किसी की छोटी गलती पर चिल्ला रहे हैं, तो यह चेतावनी है।


इस चक्र से बाहर कैसे आएँ


1. रुकना और सोचना


गुस्से में कोई भी फैसला तुरंत न लें। गहरी साँस लें और 1–2 मिनट सोचें।


2. बात करना


अपने मन की उलझन किसी भरोसेमंद व्यक्ति से साझा करें। इससे मन हल्का होता है।


3. रिश्तों में समय देना


बिना मोबाइल के साथ बैठें, बात करें, खेलें और खाना मिलकर खाएं।


4. जिम्मेदारी स्वीकार करना


दुनिया जैसी भी है, अपने व्यवहार का चुनाव हम खुद करते हैं।


5. संवेदनशील बने रहना


किसी की मदद करना, किसी के दुख को समझना, किताब पढ़ना, संगीत सुनना या प्रकृति के साथ समय बिताना ये सब मन को नरम और शांत बनाते हैं।


उदाहरण: सड़क पर किसी बुजुर्ग को भारी सामान उठाते हुए देखना और मदद करना। सिर्फ बुजुर्ग को राहत नहीं मिलेगी, आपका मन भी शांत होगा।


6. बाहरी प्रभावों पर नियंत्रण


सोशल मीडिया, विज्ञापन और प्रचार को बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया न दें। खुद से पूछें: "क्या यह मेरे लिए सही है? क्या मैं इससे परेशान हो रहा हूँ?"

उदाहरण: कोई राजनीतिक पोस्ट देखकर गुस्सा आए, तो तुरंत टिप्पणी न करें, पहले 5 मिनट सोचना और शांत होना।


गुस्सा और हिंसा अचानक पैदा नहीं होते। यह हमारे जीवन की तेजी, अधैर्य, नशा, रिश्तों की दूरी, संवेदनशीलता की कमी और बाहरी प्रभावों का परिणाम है।


यदि हम....


रुकना सीखें


सुनें और समझें


छोटे-छोटे रिश्तों में प्यार और समय दें


अपने व्यवहार की जिम्मेदारी लें


और बाहरी प्रभावों को सोच-समझकर स्वीकार करें तो न केवल हमारा जीवन शांत होगा, बल्कि समाज भी धीरे-धीरे कम आक्रामक बनेगा।

स्त्री-पुरुष समानता

 "स्त्री-पुरुष समानता: शब्दों से आगे की वास्तविकता"


महिलाओं के विषय में लिखते समय मैं किसी प्रकार की राय थोपने या किसी व्यक्ति के चरित्र पर निर्णय देने का दावा नहीं करता। मेरा मानना है कि किसी भी समाज में स्त्री और पुरुष दोनों ही पहले इंसान हैं, और इंसान होने के नाते उनके अधिकार समान होने चाहिए। यह समानता केवल संविधान, भाषणों या नारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि जीवन की वास्तविक परिस्थितियों में दिखाई देनी चाहिए।


समान अधिकार का अर्थ क्या केवल कानून है?


आज हम “समान अधिकार” शब्द का उपयोग बहुत सहजता से करते हैं, लेकिन अक्सर यह शब्द व्यवहार में खोखला साबित होता है। वास्तविक समानता का अर्थ है 50-50 भागीदारी न केवल अधिकारों में, बल्कि अवसरों और स्वतंत्रताओं में भी।


यदि कोई लड़का अकेले घर से बाहर यात्रा कर सकता है, तो वही स्वतंत्रता लड़की को भी मिलनी चाहिए।

यदि किसी परियोजना, शोध या निर्णय-प्रक्रिया में लड़कों की भागीदारी स्वाभाविक मानी जाती है, तो लड़कियों की भागीदारी को भी उतना ही सामान्य और आवश्यक समझा जाना चाहिए।

रोज़गार, शिक्षा, राजनीति, व्यापार हर क्षेत्र में समान अवसर केवल काग़ज़ पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर दिखने चाहिए।


समानता के नाम पर महिलाओं का “उपयोग”


दुर्भाग्य से, हमारे देश ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में महिलाओं को समान अधिकार देने के नाम पर अक्सर अपने हितों के अनुसार उपयोग किया जाता है। जब सुविधाजनक हो, तब “महिला सशक्तिकरण” की बात होती है, और जब सत्ता, पूँजी या नीति-निर्माण की बात आती है, तब महिलाएँ पीछे रह जाती हैं।


हॉलीवुड की 2023 में आई फ़िल्म Barbie इसी सच्चाई की ओर इशारा करती है कि कैसे पुरुष-प्रधान संरचनाएँ अपने साम्राज्य और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए महिलाओं की छवि, श्रम और भावनाओं का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन वास्तविक शक्ति अपने पास ही रखती हैं। यह केवल फ़िल्म की कहानी नहीं, बल्कि समाज का आईना है।


नीति-निर्माण में महिलाओं की अनुपस्थिति


आज सबसे बड़ा और ज़रूरी सवाल यह है कि

राजनीतिक और व्यावसायिक नीति-निर्माण में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी कितनी है?


जहाँ कानून बनाए जाते हैं, योजनाएँ तय होती हैं, बजट और प्राथमिकताएँ निर्धारित होती हैं वहाँ महिलाओं की उपस्थिति प्रतिशत में भी बहुत कम है। जब निर्णय लेने की मेज़ पर महिलाएँ होंगी ही नहीं, तो क्या उनके अनुभवों, ज़रूरतों और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर न्यायपूर्ण फैसले लिए जा सकते हैं?


महिला के जीवन की वास्तविक चुनौतियाँ सुरक्षा, स्वास्थ्य, कार्यस्थल पर सम्मान, मातृत्व और करियर का संतुलन इन सबको वही बेहतर समझ सकती है जो इन्हें जीती है।


"विकसित देश की असली परिभाषा"


किसी देश का विकास केवल उसकी अर्थव्यवस्था, तकनीक या सैन्य शक्ति से नहीं आँका जा सकता।

जिस देश में महिलाओं को जितना सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकार मिलते हैं वही देश वास्तव में विकसित है।


"एक विकसित समाज वह होता है जहाँ....


स्त्री को बोझ नहीं, सहयोगी माना जाता है


उसकी स्वतंत्रता पर शक नहीं, विश्वास किया जाता है


और उसे “महिला” होने से पहले “इंसान” समझा जाता है


विकसित देश वही है जो इंसान को इंसान मानता है लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि गरिमा के आधार पर।


स्त्री-पुरुष समानता कोई दया नहीं, कोई एहसान नहीं, बल्कि एक मौलिक आवश्यकता है। जब तक यह समानता व्यवहार, सोच और सत्ता-संरचनाओं में नहीं उतरेगी, तब तक समाज अधूरा रहेगा।


सच्ची समानता वही है जहाँ अधिकार माँगने नहीं पड़ें, बल्कि स्वाभाविक रूप से मिलें क्योंकि वे इंसान होने के नाते पहले से ही मिलने चाहिए।


ज़िंदगी किसी के लिए एक-सी कभी नहीं रहती, क्योंकि समय हर व्यक्ति को अलग-अलग कसौटियों पर परखता है। कोई आज शिखर पर होता है तो कल साधारण राहों पर, और कोई संघर्षों के अँधेरों से निकलकर उजाले की ओर बढ़ता है। हर इंसान की तक़दीर अलग होती है, इसलिए तुलना और घमंड दोनों ही निरर्थक हैं। जो आज हमारे पास है, वह स्थायी नहीं, बस एक पड़ाव है, जिसे समय जब चाहे बदल सकता है।


इंसान चाहे कितने ही रूप बदल ले....वेश, हैसियत या सोच के,

पर शीशा हर बार उसे उसकी सच्चाई से रू-बरू करा देता है। बाहरी पहचान बदल सकती है, पर भीतर की छवि वही रहती है, वही चेहरा जो आत्मा की गहराइयों में बसता है। जब यह सत्य समझ में आ जाता है, तब घमंड पिघल जाता है और मन में विनम्रता जन्म लेती है, क्योंकि अंततः इंसान वही होता है, जो वह स्वयं से छुपा नहीं सकता।