"मूसावादा" मनुष्य जीवन के बर्बादी का मौन विष...
मुसावादा वेरमणी सिक्खापदं समादियामि।
मुसा = असत्य, मिथ्या, झूठ,धोखा।
वादा = वचन, बोलना,कथन।
वेरमणी = पूर्णतः विरत रहना।
सिक्खापदं = शिक्षापद का (नियम।)
समादियामि = मैं धारण करता/करती हूँ।/ मै ग्रहण करता हूँ / ग्रहण करती हूँ |
अर्थात,
"मैं असत्य, झूठ, छल, धोखे तथा भ्रम उत्पन्न करने वाली वाणी से पूर्णतः विरत रहने का शिक्षापद ग्रहण करता/ग्रहण करती हूँ।"
🍁भगवान बुद्ध ने पंचशील में सबसे पहले प्राणियों की रक्षा की शिक्षा दी है | और उसके बाद मनुष्य के सामाजिक जीवन की रक्षा के लिए सत्यवचन का उपदेश दिया। यह कोई संयोग नहीं है। मनुष्य का जीवन केवल शरीर से नहीं चलता; वह विश्वास, सत्य, नैतिकता और पारस्परिक भरोसे पर टिका होता है। यदि सत्य समाप्त हो जाए, तो परिवार केवल एक मकान रह जाता है, समाज केवल भीड़ बन जाती है, और मनुष्य केवल स्वार्थ का बंदी बन जाता है।
🍁भगवान बुद्ध के धम्म में "मूसावादा" का अर्थ केवल झूठ बोलना इतना हीं नहीं है। बल्कि, यह ऐसा मानसिक विकार है जो मनुष्य को सत्य से दूर ले जाकर भ्रम, छल, कपट, दिखावा, झूठी छवि, विश्वासघात और नैतिक पतन की ओर धकेल देता है।
यही कारण है कि मूसावादा को केवल वाणी का दोष नहीं, बल्कि चित्त की अशुद्धि माना गया है।
🍁 "मूसावादा " एक ऐसा विष है जो दिखाई नहीं देता, पर सब कुछ नष्ट कर देता है | :-
🪻 यदि किसी पात्र में थोड़ा-सा विष मिला दिया जाए, तो पूरा पात्र विषाक्त हो जाता है। उसी प्रकार जीवन में प्रवेश किया हुआ झूठ धीरे-धीरे पूरे व्यक्तित्व को दूषित कर देता है।
🪻विष शरीर को एक बार मारता है; मूसावादा मनुष्य को प्रतिदिन मारता है।
🪻शरीर का विष चिकित्सक निकाल सकता है,
🪻 किन्तु असत्य का विष वर्षों तक व्यक्ति के मन मे, परिवार और समाज में फैलता रहता है।
🌿 झूठ बोलने वाला व्यक्ति एक असत्य को छिपाने के लिए दूसरा झूठ बोलता है, फिर तीसरा, फिर चौथा। देखते ही देखते उसका पूरा जीवन सत्य पर नहीं, बल्कि झूठ के सहारों पर टिक जाता है। वह बाहर से सफल दिखाई दे सकता है, पर भीतर से भय, अपराधबोध और असुरक्षा का कैदी बन जाता है।
🌺 " मूसावादा" मनुष्य के अन्तःकरण को कैसे नष्ट करता है..?,:-
भगवान बुद्ध की धम्म के अनुसार प्रत्येक कर्म पहले चित्त में जन्म लेता है। जब मनुष्य जानबूझकर असत्य बोलता है, तब वह अपने ही चित्त को सिखाता है कि सत्य से अधिक महत्वपूर्ण स्वार्थ है। यही अभ्यास धीरे-धीरे उसकी चेतना को बदल देता है।
🌺 झूठ बोलने का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह है कि मनुष्य स्वयं से भी सत्य बोलना छोड़ देता है। वह अपनी गलतियों को उचित ठहराने लगता है। यही आत्म-छल आगे चलकर उसके व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है।
जो व्यक्ति अपने ही मन के साथ ईमानदार नहीं रह सकता, वह संसार के प्रति भी ईमानदार नहीं रह सकता।
🌺 विश्वास का टूटना ये सबसे बड़ी मनुष्य जीवन की बर्बादी है :-
🪻दुनिया का सबसे मूल्यवान धन सोना, चाँदी या संपत्ति नहीं है; सबसे बड़ी संपत्ति मनुष्य का एकदूसरे के प्रति विश्वास होता है।
🪻विश्वास वर्षों की सत्यनिष्ठा से बनता है, परन्तु एक असत्य उसे पलभर में तोड़ सकता है।
🪻जिस घर में विश्वास मर जाता है, वहाँ प्रेम भी अधिक समय तक जीवित नहीं रहता।
🪻जिस संस्था में विश्वास समाप्त हो जाए, वहाँ अनुशासन नहीं टिकता।
🪻जिस समाज में विश्वास समाप्त हो जाए, वहाँ न्याय नहीं टिकता।
🪻जिस राष्ट्र में सत्य का सम्मान न रहे, वहाँ भ्रष्टाचार सामान्य बन जाता है।
इसलिए, भगवान बुद्ध की धम्म में सत्य केवल व्यक्तिगत सद्गुण नहीं, बल्कि सामाजिक व्यवस्था की आधारशिला है।
🌺 " मूसावादा " परिवार पर सबसे गहरा घाव करता है:-
🪻परिवार ईंट और सीमेंट से नहीं बनता; वह विश्वास, करुणा और सत्य से बनता है।
🪻जब पति-पत्नी एक-दूसरे से असत्य बोलते हैं, तब प्रेम का स्थान संदेह ले लेता है।
🪻जब माता-पिता बच्चों से झूठ बोलते हैं, तब बच्चे भी सत्य का मूल्य खो देते हैं।
🪻जब बच्चे माता-पिता से झूठ बोलते हैं, तब घर का नैतिक वातावरण टूट जाता है।
🪻धीरे-धीरे एक ही छत के नीचे रहने वाले लोग भावनात्मक रूप से एक-दूसरे से दूर हो जाते हैं।
🪻 बातचीत रहती है, लेकिन भरोसा नहीं रहता |
🪻साथ रहता है, लेकिन अपनापन नहीं रहता |
अर्थात, परिवार का विघटन प्रायः किसी बड़ी घटना से नहीं, बल्कि छोटे-छोटे असत्यों के संचय से होता है।
🍁" मूसावादा" रिश्तों का मौन हत्यारा :-
🪻तलवार का घाव भर सकता है, किन्तु विश्वासघात का घाव बहुत कठिनाई से भरता है। ओर कभी कभी तो भरता भी नहीं है |
🪻मित्रता, विवाह, गुरु-शिष्य संबंध, सामाजिक सहयोग—इन सबका आधार सत्य है।
🪻झूठ से उत्पन्न हुवा संदेह व्यक्ति को भीतर ही भीतर खाता रहता है।
🪻जब विश्वास टूट जाता है, तब शब्दों से अधिक मौन बोलने लगता है।
🪻लोग सामने मुस्कुराते हैं, पर हृदय में दूरी बना लेते हैं।
यही कारण है कि भगवान बुद्ध ने सत्य को मैत्री की रक्षा करने वाला धर्म कहा।
🍁 समाज में " मूसावादा " का विष:-
जब असत्य केवल व्यक्ति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि समाज का स्वभाव बन जाता है, तब उसका प्रभाव भयावह होता है।
🪻 झूठे प्रचार से समाज विभाजित होता है।
🪻झूठी गवाही से निर्दोष दंडित होते हैं।
🪻भ्रामक जानकारी से हिंसा और घृणा फैलती है।
🪻धोखाधड़ी से आर्थिक विश्वास समाप्त होता है|
🪻राजनीति, व्यापार, शिक्षा, धर्म और न्याय यदि इनमें सत्य का अभाव हो जाए, तो बाहरी व्यवस्था बची रह सकती है, किन्तु नैतिक व्यक्ति का मन उसके जीते -जी मर जाता है।
इस प्रकार "मूसावादा "केवल व्यक्तिगत दोष हीं नहीं, बल्कि सभ्यता के पतन का कारण भी बन जाता है।
🍁. " मुसावादा "आध्यात्मिक जीवन में सबसे बड़ी बाधाओं में से एक है| :-
🌿भगवान बुद्ध के धम्म का लक्ष्य है यथाभूत ज्ञान-दर्शन, अर्थात् वस्तुओं को जैसी हैं, वैसा हीं देखना..!
🪻जो व्यक्ति व्यवहार में सत्य का सम्मान नहीं करता, उसके लिए ध्यान में भी वास्तविकता का सामना करना कठिन हो जाता है।
🪻असत्य बोलनेवाले व्यक्ति का मन स्वयं भ्रम रचता है; और जो मन भ्रम रचता है, वह सत्य का प्रत्यक्ष दर्शन कैसे करेगा?
इसलिए सम्यक वाचा केवल सामाजिक अनुशासन नहीं, बल्कि ध्यान, समाधि और प्रज्ञा की भी आधारभूमि है।
🍁 भगवान बुद्ध की वाणी से मूसावादा " का समाधान :-
भगवान बुद्ध ने केवल "झूठ मत बोलो" इतना हीं नहीं कहा। बल्कि, उन्होंने ऐसी वाणी का मार्ग बताया जो चार गुणों से युक्त हो --
1)व्यक्ति की वाणी सत्य होनी चाहिए
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2)व्यक्ति की वाणी हितकारी होनी चाहिए |
3)व्यक्ति की वाणी समयानुकूल होनी चाहिए |
4) यक्ति की वाणी मैत्री और करुणा से प्रेरित होनी चाहिए |
🪻सत्य यदि कठोर भी हो, तो उसे क्रोध से नहीं, करुणा से कहना चाहिए।
🪻और यदि कोई बात सत्य हो लेकिन, अनावश्यक रूप से पीड़ा पहुँचाने वाली हो, तो उसे कहने का उचित समय और उचित तरीका चुनना भी धम्म का ही भाग है।
🍁मूसावादा मनुष्य का सबसे बड़ा शत्रु इसलिए है कि, वह व्यक्ति को पहले बाहर से नहीं, बल्कि, भीतर से नष्ट करता है।
🌿 यह पहले यक्ति के चित्त को दूषित करता है| फिर यक्ति के वाणी को, फिर उसके के चरित्र को, फिर इसके बाद व्यक्ति के परिवार को दूषित करता है,
ओर अंतिम ये पुरे समाज को भी दूषित करता है |
🌿सत्य केवल बोलने की वस्तु नहीं, बल्कि जीने की साधना है। सत्य से विश्वास जन्म लेता है; विश्वास से मैत्री; मैत्री से सहयोग; सहयोग से शांति; और शांति से धम्म का विकास होता है।
🌿इसलिए जो मनुष्य मूसावादा का त्याग करता है तो, वह अपने जीवन में विश्वास, सम्मान, निर्भयता, और आत्मगौरव को स्थापित करता है।