Thursday, February 12, 2026

स्त्री और पुरुष

 "स्त्री और पुरुष: गुणों से नहीं, परतों से समझना"


आज का सबसे बड़ा भ्रम यही है कि हम स्त्री और पुरुष को उनके गुणों से परिभाषित करना चाहते हैं।

यदि स्त्री साहसी है तो क्या वह "पुरुषवत" हो गई?

यदि पुरुष कोमल है तो क्या वह "स्त्रीवत" हो गया?


यहीं से उलझन शुरू होती है।


1. जैविक स्तर: शरीर का सत्य


सबसे पहले, स्त्री और पुरुष का एक स्पष्ट जैविक आयाम है

शारीरिक संरचना, प्रजनन तंत्र, हार्मोनल संरचना, जैविक प्रक्रियाएँ।


यह भिन्नता वास्तविक है और इसे नकारा नहीं जा सकता।

परंतु जैविक भिन्नता = व्यक्तित्व का निर्धारण

यह समीकरण अधूरा है।


साहस, नेतृत्व, तर्क, संवेदनशीलता ये गुण हार्मोन से प्रभावित हो सकते हैं, पर केवल उन्हीं से निर्धारित नहीं होते।


2. गुण लिंग के नहीं, चेतना के हैं


साहस 


दृढ़ता 


करुणा 


सहानुभूति 


तर्कशीलता 


पोषणशीलता 


ये सभी गुण मानव-गुण हैं, लिंग-गुण नहीं।


एक स्त्री साहसी हो सकती है.....क्योंकि वह मनुष्य है।

एक पुरुष संवेदनशील हो सकता है....क्योंकि वह मनुष्य है।


यह कहना कि "साहस पुरुष का गुण है" सामाजिक निर्माण है, जैविक सत्य नहीं।


3. ऊर्जा बनाम पहचान


भारतीय और पूर्वी दर्शन में स्त्री और पुरुष को केवल शरीर नहीं, बल्कि ऊर्जा के प्रतीक के रूप में भी देखा गया है।


पुरुष ऊर्जा = दिशा, विस्तार, बाह्य अभिव्यक्ति


स्त्री ऊर्जा = ग्रहणशीलता, सृजन, अंतर्मुखी गहराई


परंतु ध्यान दें....

हर व्यक्ति में दोनों ऊर्जा मौजूद हैं।


स्त्री होना = स्त्री ऊर्जा की अधिकता

पुरुष होना = पुरुष ऊर्जा की अधिकता


परंतु पूर्णता तब है जब दोनों संतुलित हों।


अर्धनारीश्वर का प्रतीक यही बताता है....

पूर्ण मनुष्य वह है जिसमें दोनों तत्व समरस हों।


4.पहचान का भ्रम


आज का युग दो अतियों में फँस गया है:


1. पारंपरिक सोच:

"स्त्री कोमल होनी चाहिए, पुरुष कठोर।"


2. प्रतिक्रियात्मक सोच:

"कोई भेद है ही नहीं।"


सत्य इन दोनों के बीच है।


भेद है पर भेद गुणों का नहीं, संरचना और अनुभव का है।

समानता है पर समानता व्यक्तित्व की संभावनाओं में है।


5. तो फिर स्त्री और पुरुष कैसे तय होंगे?


जैविक स्तर पर....शरीर से।


सामाजिक स्तर पर.....भूमिका और संदर्भ से।


मनोवैज्ञानिक स्तर पर.... व्यक्तित्व के अद्वितीय मिश्रण से।


अस्तित्व के स्तर पर.... केवल "मनुष्य" से।


अर्थात....

स्त्री होना = स्त्री होना

पुरुष होना = पुरुष होना


पर साहसी, करुणामय, बुद्धिमान, दृढ़ होना ये मानव होना है।


6. संतुलन का सूत्र


यदि हम संतुलन बनाना चाहें तो हमें यह स्वीकार करना होगा:


स्त्री साहसी हो सकती है, और यह उसकी स्त्रैणता के विरुद्ध नहीं।


पुरुष संवेदनशील हो सकता है, और यह उसकी पुरुषत्व के विरुद्ध नहीं।


कठोरता और कोमलता का संतुलन ही परिपक्वता है।


पहचान जैविक हो सकती है, पर व्यक्तित्व स्वतंत्र होता है।


शायद असली प्रश्न यह नहीं कि "स्त्री और पुरुष कैसे तय होंगे?"


असली प्रश्न यह है:

क्या हम मनुष्य को गुणों के बंधन से मुक्त कर सकते हैं?


जब स्त्री साहसी होती है, तो वह पुरुष नहीं बनती वह एक सशक्त स्त्री होती है।

जब पुरुष रोता है, तो वह स्त्री नहीं बनता वह एक संवेदनशील पुरुष होता है।


संतुलन का अर्थ भेद मिटाना नहीं, बल्कि भेद को सम्मान देते हुए संभावनाओं को मुक्त करना है।

अपनी किचन को बनाए औषधालय

 अपनी किचन को बनाए औषधालय #किसी  भी बीमारी में #ये मसाले करते हैं दवाई का काम #ऐसे करें सेवन 


1) हल्दी — रात को गर्म दूध में ½ चम्मच मिलाकर पिएं।


2) जीरा — 1 चम्मच जीरा रात भर भिगोकर सुबह पानी पिएं।


3) धनिया — 1 चम्मच धनिया पानी में उबालकर ठंडा करके पिएं।


4) सौंफ — भोजन के बाद ½–1 चम्मच चबाएं।


5) अजवाइन — चुटकी भर अजवाइन गुनगुने पानी के साथ लें।


6) अदरक — अदरक की चाय बनाकर पिएं या रस 1 चम्मच लें।


7) लहसुन — सुबह खाली पेट 1 कली गुनगुने पानी के साथ।


8) दालचीनी — ½ चम्मच पाउडर गुनगुने पानी/चाय में।


9) लौंग — दांत दर्द में 1 लौंग धीरे-धीरे चूसें।


10) काली मिर्च — शहद के साथ चुटकी भर लें।


11) हींग — गुनगुने पानी में चुटकी भर घोलकर पिएं।


12) मेथी दाना — रात में भिगोकर सुबह पानी सहित खाएं।


13) तेजपत्ता — 1–2 पत्ते पानी में उबालकर पिएं।


14) इलायची — भोजन के बाद 1 इलायची चबाएं।


15) जायफल — बहुत कम मात्रा (चुटकी) गर्म दूध में।


16) सरसों के बीज — सब्जी/तड़के में नियमित प्रयोग।


17) करी पत्ता — सुबह 8–10 पत्ते चबाएं।


18) पुदीना — पुदीने की चटनी या पुदीना पानी।


19) चक्र फूल (स्टार ऐनिस) — चाय में 1 टुकड़ा डालें।


20) कसूरी मेथी — सब्जी/सलाद में मिलाकर खाएं।


यदि आपको लगता है कि आप अकेले है

 यदि आपको लगता है कि आप अकेले हैं…


यदि कभी आपको ऐसा महसूस हो कि आप अकेले हैं, तो संभव है कि आप भीड़ से आगे चल रहे हों।

जो व्यक्ति भीड़ से अलग सोचता है, वह कुछ समय के लिए अकेला दिखाई देता है।


अकेलापन हमेशा कमजोरी का संकेत नहीं होता 

कभी-कभी वह इस बात का प्रमाण होता है कि आप अपने विजन पर केंद्रित हैं।


हाँ, यह भी संभव है कि आप थक गए हों।

क्योंकि जो व्यक्ति बदलाव के लिए जीता है, वह सामान्य जीवन से अधिक मानसिक और भावनात्मक श्रम करता है।


पर फर्क यहाँ है:


थका हुआ व्यक्ति रुकना चाहता है।


विजन वाला व्यक्ति रुककर भी दिशा नहीं छोड़ता।


"ऊर्जा सबमें समान है, अंतर जागरूकता का है"


प्रकृति ने ऊर्जा किसी एक को अधिक और किसी को कम नहीं दी।

हर मनुष्य के भीतर अपार संभावना है।


फिर भी इतिहास में कुछ ही नाम क्यों दर्ज होते हैं?


क्योंकि:

अधिकांश लोग परिस्थितियों से संचालित होते हैं।


कुछ लोग अपने विचारों और उद्देश्य से संचालित होते हैं।


जो व्यक्ति दुनिया की समझ से चलता है, वह भीड़ का हिस्सा बन जाता है।

जो व्यक्ति अपनी समझ विकसित करता है वह दिशा बन जाता है।


इतिहास रचना क्या है?


इतिहास रचना का अर्थ केवल बड़ा आविष्कार करना या प्रसिद्ध होना नहीं है।

इतिहास रचना का अर्थ है....प्रभाव छोड़ना।


एक शिक्षक जो किसी एक बच्चे का जीवन बदल दे.....वह इतिहास रचता है।


एक किसान जो अपनी पीढ़ी को नई सोच दे वह इतिहास रचता है।


एक लेखक जो एक मन को जागृत कर दे वह इतिहास रचता है।


एक साधारण कर्मचारी जो अपने कार्य में ईमानदारी और उत्कृष्टता की मिसाल बने वह भी इतिहास रचता है।


गाँव का भी इतिहास होता है।

शहर का भी इतिहास होता है।

परिवार का भी इतिहास होता है।


आप उस इतिहास का अध्याय बन सकते हैं 

यदि आप सजग होकर जीवन जीते हैं।


"विजन: केवल सपना नहीं, जीवन की दिशा"


सपना वह है जो आप सोते समय देखते हैं।

विजन वह है जो आपको सोने नहीं देता।


विजन वह स्पष्टता है जिसमें आपको पता होता है:....

मैं क्या कर रहा हूँ


क्यों कर रहा हूँ


और किसके लिए कर रहा हूँ


जब व्यक्ति विजन पर जीता है, तो उसका हर कार्य अर्थपूर्ण हो जाता है।

तब वह केवल जीवित नहीं रहता वह उद्देश्यपूर्ण जीवन जीता है।


"ध्यान: सफलता का आंतरिक विज्ञान"


विजन बिना ध्यान के टिक नहीं सकता।


ध्यान का अर्थ केवल आँखें बंद करके बैठना नहीं है।

ध्यान का वास्तविक अर्थ है....

जिस कार्य में हों, उसमें पूर्णतः उपस्थित होना।


यदि आप लिख रहे हैं....तो पूरी चेतना से लिखें।

यदि आप काम कर रहे हैं....तो उसी क्षण में रहें।

यदि आप किसी से बात कर रहे हैं... तो मन भटकने न दें।


ध्यान का अभ्यास क्यों आवश्यक है?


क्योंकि:


जो आप बार-बार करते हैं, वही आपके अवचेतन मन में बैठता है।


अवचेतन मन ही आपके भविष्य के निर्णयों को संचालित करता है।


वर्तमान की आदतें ही भविष्य का स्वरूप बनाती हैं।

L


इसलिए: आप आज जैसा सोचते हैं वैसा ही कल बनते हैं।


इन्द्रियाँ और मन: शत्रु नहीं, साधन हैं


अधिकतर लोग अपनी इन्द्रियों और मन को नियंत्रित करने की कोशिश करते हैं।

पर नियंत्रण से पहले मित्रता आवश्यक है।


यदि आपका मन भटकता है तो उसे दोष न दें।

उसे दिशा दें।


यदि आपकी इन्द्रियाँ आकर्षित होती हैं 

तो उन्हें उद्देश्य की ओर मोड़ें।


जिस दिन मन आपका मित्र बन गया,

उस दिन आपकी ऊर्जा बिखरेगी नहीं केंद्रित होगी।


सकारात्मक वर्तमान .....सशक्त भविष्य


यदि वर्तमान में आपके पास लक्ष्य नहीं है,

तो भविष्य संयोग पर निर्भर रहेगा।


पर यदि वर्तमान में:


स्पष्ट लक्ष्य है


सकारात्मक सोच है


निरंतर अभ्यास है


तो भविष्य निर्माणाधीन है और निर्माण आपके हाथ में है।


"हर क्षेत्र में इतिहास संभव है"


आप ऑफिस में हैं?

वहाँ उत्कृष्टता की परिभाषा बदल दीजिए।


आप व्यवसाय में हैं?

ईमानदारी को संस्कृति बना दीजिए।


आप लेखक हैं?

विचारों से चेतना जगाइए।


आप घर संभालते हैं?

संस्कारों की विरासत बना दीजिए।


इतिहास पद से नहीं बनता 

दृष्टिकोण से बनता है।


अपनी क्षमता को पहचानिए।

उसे व्यर्थ मत जाने दीजिए।


आपको दुनिया बदलने की आवश्यकता नहीं —

बस जहाँ हैं, वहाँ परिवर्तन का बीज बो दीजिए।


यदि एक भी व्यक्ति आपसे प्रभावित होकर बेहतर बनता है,

तो समझिए आपने इतिहास की दिशा में एक कदम रख दिया है।


और याद रखिए....

अकेलापन कभी-कभी इस बात का संकेत होता है

कि आप भीड़ से अलग नहीं,

भीड़ से आगे चल रहे हैं।

यूरिन में झाग आ

 Ayurvedic Kidney Support - यूरिन में झाग आना: कब नॉर्मल, कब सीरियस? इस पोस्ट में बात कर रहे हैं जो बहुत लोगों को परेशान करता है — यूरिन में झाग आना।


कभी-कभी टॉयलेट में देखते हैं कि पेशाब में झाग बन रहा है और तुरंत दिमाग में डर आ जाता है -

“क्या किडनी खराब हो रही है?”

“क्या प्रोटीन लीक हो रहा है?”


तो इस पूरे मामले को साइंटिफिक तरीके से समझते हैं।


झाग बनता क्यों है? (Science Behind Foam)

झाग बनना एक सर्फेक्टेंट प्रॉपर्टी (Surfactant Property) की वजह से होता है।


जैसे साबुन या डिटर्जेंट में झाग बनता है, वैसे ही कुछ केमिकल्स और प्रोटीन में भी यह गुण होता है कि वे झाग बना सकते हैं।


यूरिन के अंदर क्या-क्या होता है?


यूरिया

क्रिएटिनिन

इलेक्ट्रोलाइट्स

यूरिक एसिड

अमोनिया

और शरीर के कई वेस्ट प्रोडक्ट


इनमें से कुछ में भी हल्की सर्फेक्टेंट प्रॉपर्टी हो सकती है। इसलिए हर झाग = प्रोटीन लीक नहीं।


झाग आने के सामान्य कारण (जो बीमारी नहीं हैं)

1. डिहाइड्रेशन (पानी कम पीना)

अगर आपने पानी कम पिया है तो यूरिन कंसंट्रेटेड हो जाता है।

जब वह बाहर आता है तो ज्यादा गाढ़ा होने की वजह से झाग दिख सकता है।


2. तेज धार से पेशाब आना

अगर ब्लैडर फुल हो गया और फिर तेज प्रेशर से यूरिन निकला —

तो उसकी स्पीड और प्रेशर की वजह से भी झाग बन सकता है।


यह बिल्कुल वैसा है जैसे पानी ऊंचाई से गिरता है तो बबल बनते हैं।


3. ज्यादा देर तक रोककर रखना

बच्चे या महिलाएं कई बार पेशाब रोककर रखती हैं।

जब एकदम से निकलता है तो प्रेशर ज्यादा होता है - झाग बन सकता है।


4. यूरिन इन्फेक्शन

कुछ बैक्टीरिया भी झाग बना सकते हैं।

UTI में कभी-कभी झाग दिख सकता है।


5. दवाइयों का असर

कुछ दवाइयों में भी ऐसे तत्व होते हैं जो झाग बना सकते हैं।


कब शक करें कि यह प्रोटीन यूरिया हो सकता है?

अब असली सवाल — कैसे पहचानें कि झाग नॉर्मल है या प्रोटीन लीक की वजह से?


लगातार हर बार झाग आ रहा है

अगर हर पेशाब में झाग दिख रहा है — तब ध्यान देने की जरूरत है।


 झाग का रंग कैसा है?

नॉर्मल झाग - ट्रांसपेरेंट, हल्का, फ्लश करते ही गायब

प्रोटीन वाला झाग - सफेद, घना, देर तक टिकने वाला


साथ में ये लक्षण भी हों:

पैरों या चेहरे पर सूजन

पेशाब कम होना

हाई ब्लड प्रेशर

डायबिटीज

कमजोरी


 जांच कैसे करें?

1. 24 घंटे का यूरिन प्रोटीन टेस्ट

नॉर्मल: 150 mg से कम

लेकिन यह टेस्ट करना थोड़ा मुश्किल होता है — पूरे 24 घंटे कलेक्शन करना पड़ता है।


2. Spot Urine Protein/Creatinine Ratio

आजकल यह ज्यादा आसान तरीका है।

एक सैंपल से अंदाजा लग जाता है कि 24 घंटे में कितना प्रोटीन निकल रहा है।


अगर रिपोर्ट नॉर्मल है - चिंता खत्म।

अगर बढ़ा हुआ है - नेफ्रोलॉजिस्ट से मिलें।


अगर प्रोटीन निकल रहा है तो क्या करें?

सबसे पहले समझिए -

प्रोटीन यूरिया खुद में बीमारी नहीं, बल्कि बीमारी का संकेत है।


अक्सर कारण होते हैं:


डायबिटीज

हाई ब्लड प्रेशर

किडनी की बीमारी

प्रोटीन यूरिया कंट्रोल कैसे करें?

1. शुगर कंट्रोल रखें

HbA1c 7% से नीचे रखें।

फास्टिंग और पोस्ट मील शुगर कंट्रोल करें।


2. ब्लड प्रेशर कंट्रोल रखें

110–135 (सिस्टोलिक)

डायस्टोलिक 90 से कम


3. नमक कम करें

ज्यादा नमक प्रोटीन लीकेज बढ़ा सकता है।

3–5 ग्राम से ज्यादा नमक न लें।


4. वजन कंट्रोल

मोटापा किडनी पर प्रेशर डालता है।


5. हेल्दी लाइफस्टाइल

रोज 30–45 मिनट वॉक


स्मोकिंग बंद

अल्कोहल बंद

पर्याप्त पानी (अगर किडनी फेल्योर नहीं है तो 6–8 गिलास)

कब तुरंत डॉक्टर के पास जाएं?

अगर:


प्रोटीन 1 ग्राम से ज्यादा


सूजन बढ़ रही है

किडनी फंक्शन टेस्ट खराब

शुगर या बीपी अनकंट्रोल

तो तुरंत किडनी स्पेशलिस्ट से मिलें।


सबसे जरूरी बात

हर झाग प्रोटीन नहीं होता

डिहाइड्रेशन और प्रेशर से भी झाग बन सकता है


लगातार सफेद झाग + सूजन - जांच कराएं

बॉर्डरलाइन प्रोटीन - लाइफस्टाइल से कंट्रोल हो सकता है

ज्यादा प्रोटीन यूरिया - डॉक्टर की देखरेख जरूरी


घबराना नहीं है, समझदारी से जांच करानी है।


आयुर्वेद की नज़र से: यूरिन में झाग क्यों आता है?

अब तक हमने मॉडर्न साइंस के हिसाब से समझा कि यूरिन में झाग कई कारणों से बन सकता है।

लेकिन आयुर्वेद इस पूरे विषय को थोड़ा अलग एंगल से देखता है।


आयुर्वेद में यूरिन को “मूत्र” कहा गया है और यह शरीर के तीन मुख्य मल (मल, मूत्र, स्वेद) में से एक है। मूत्र का काम है शरीर से अतिरिक्त जल, कचरा पदार्थ (विष), और दोषों का निकास।


अगर मूत्र में बार-बार झाग दिख रहा है, तो आयुर्वेद इसे सिर्फ “प्रोटीन लीक” तक सीमित नहीं मानता, बल्कि इसे दोष असंतुलन और धातु कमजोरी का संकेत मानता है।


कफ दोष और झाग

आयुर्वेद के अनुसार झाग का संबंध अक्सर कफ दोष से जोड़ा जाता है।


कफ में स्वाभाविक रूप से चिकनापन (स्निग्धता) और भारीपन होता है।

जब शरीर में कफ बढ़ जाता है, तो मूत्र में भी हल्की चिकनाहट और फेन (झाग) दिख सकता है।


अगर झाग के साथ ये लक्षण हों:


शरीर में भारीपन

सूजन

आलस

वजन बढ़ना

बार-बार सर्दी

तो यह कफ वृद्धि की तरफ इशारा हो सकता है।


पित्त दोष और मूत्र की तीव्रता

अगर झाग के साथ:


जलन

पीला या गहरा रंग

तेज गंध

बार-बार प्यास

हो रही है, तो आयुर्वेद इसे पित्त वृद्धि से जोड़ता है।


पित्त बढ़ने पर शरीर में गर्मी और अम्लता बढ़ती है, जिससे मूत्र अधिक concentrated हो सकता है और उसमें फेन दिख सकता है।


3. वात दोष और धातु क्षीणता

अगर लंबे समय तक झाग बना रहता है, शरीर में कमजोरी है, वजन घट रहा है, या सूखापन है, तो आयुर्वेद इसे वात वृद्धि और धातु क्षीणता से जोड़ता है।


आयुर्वेद कहता है कि जब मेद धातु या अन्य धातुएँ कमजोर होती हैं, तो उनका पोषण ठीक से नहीं होता और मूत्र में असामान्य तत्व दिख सकते हैं।


4. प्रमेह का कॉन्सेप्ट

आयुर्वेद में एक बड़ी बीमारी बताई गई है — “प्रमेह”।

यह केवल डायबिटीज नहीं है, बल्कि मूत्र संबंधी 20 प्रकार की समस्याओं का समूह है।


प्रमेह में:


मूत्र अधिक मात्रा में

बार-बार

चिपचिपा या झागदार

मीठी गंध वाला

हो सकता है।


कफज प्रमेह में विशेष रूप से मूत्र में फेन (झाग) का वर्णन मिलता है।


इसलिए अगर किसी को शुगर, मोटापा, या मेटाबॉलिक समस्या है और झाग भी है, तो आयुर्वेद इसे गंभीरता से लेने की सलाह देता है।


आयुर्वेद क्या सलाह देता है?

अगर झाग कभी-कभार दिख रहा है और बाकी सब नॉर्मल है, तो घबराने की जरूरत नहीं।


लेकिन अगर बार-बार दिख रहा है, तो ये कदम मदद कर सकते हैं:


1. अग्नि सुधारें (पाचन मजबूत करें)

कमजोर पाचन से “आम” बनता है।

आम शरीर में जाकर चैनल्स (स्रोतस) को ब्लॉक करता है।


सुबह गुनगुना पानी

हल्दी + जीरा पानी

भारी, तला-भुना कम करें


2. कफ कंट्रोल करें

मीठा और मैदा कम

डेयरी सीमित

नियमित व्यायाम

शहद की थोड़ी मात्रा


 3. पित्त शांत करें

आंवला

नारियल पानी

धनिया पानी

ज्यादा मसालेदार खाना कम


 4. मूत्रवह स्रोतस की सफाई

आयुर्वेद में किडनी और यूरिन सिस्टम को “मूत्रवह स्रोतस” कहा गया है।


इसे संतुलित रखने के लिए पारंपरिक जड़ी-बूटियां:


1. पुनर्नवा (Punarnava)

काम: सूजन कम करना, किडनी सपोर्ट, मूत्र बढ़ाना (mild diuretic)


पाउडर (चूर्ण)

3–5 ग्राम


दिन में 1–2 बार

गुनगुने पानी के साथ


काढ़ा

20–30 ml


दिन में 1–2 बार

खाली पेट या खाने से पहले


टेबलेट/कैप्सूल (स्टैंडर्ड एक्सट्रैक्ट)

250–500 mg


दिन में 1–2 बार

2. गोक्षुरा (Gokshura)

काम: मूत्र मार्ग सपोर्ट, सूजन में मदद, किडनी टोनिक


चूर्ण

3–6 ग्राम


दिन में 1–2 बार

गुनगुने पानी या दूध के साथ


काढ़ा

20–40 ml


दिन में 2 बार


कैप्सूल

250–500 mg


दिन में 1–2 बार

3. वरुण (Varun)

काम: मूत्र तंत्र की सफाई, स्टोन सपोर्ट, मूत्र प्रवाह सुधार


 चूर्ण

3–5 ग्राम

दिन में 1–2 बार


काढ़ा

20–30 ml


दिन में 2 बार


कैप्सूल

250–500 mg

दिन में 1–2 बार

4. गिलोय (Giloy)

काम: दोष संतुलन, इम्यून सपोर्ट, पित्त-कफ कंट्रोल


चूर्ण

3–5 ग्राम


दिन में 1–2 बार

गिलोय रस

10–20 ml


दिन में 1–2 बार

खाली पेट बेहतर


कैप्सूल

300–500 mg

दिन में 1–2 बार


कितने समय तक लें?

हल्की समस्या: 4–6 हफ्ते

क्रॉनिक समस्या: वैद्य की निगरानी में


सावधानियां

लो BP वालों में पुनर्नवा सावधानी से

प्रेग्नेंसी में बिना सलाह न लें

अगर पहले से डायबिटीज/किडनी मेडिसिन चल रही है तो डॉक्टर से पूछें

ज्यादा मात्रा में लेने से इलेक्ट्रोलाइट असंतुलन हो सकता है


एक सिंपल कॉम्बिनेशन (जनरल सपोर्ट के लिए)

सुबह:

गिलोय रस 15 ml + गुनगुना पानी


शाम:

पुनर्नवा या गोक्षुरा 3 ग्राम


(लेकिन यह भी पर्सनल कंडीशन के हिसाब से बदलेगा)


(इनका उपयोग वैद्य की सलाह से ही करें)


कब तुरंत डॉक्टर दिखाएं?

चाहे आप आयुर्वेद फॉलो करें या मॉडर्न मेडिसिन, अगर:


लगातार झाग

पैरों/चेहरे में सूजन

शुगर या बीपी

कमजोरी

यूरिन में झाग के साथ सफेदपन

तो जांच जरूर कराएं।


आयुर्वेद भी कहता है,

“रोग प्रारंभ में ही पकड़ लिया जाए तो उपचार सरल होता है।”


Bottom Line 

हर झाग प्रोटीन लीकेज नहीं होता।

लेकिन बार-बार झाग शरीर के अंदर असंतुलन का संकेत हो सकता है।


आयुर्वेद इसे दोष, अग्नि और धातु संतुलन से जोड़कर देखता है।

अगर लाइफस्टाइल ठीक कर लें, पाचन सुधार लें और दोष संतुलित रखें — तो ज्यादातर मामलों में स्थिति नियंत्रित हो सकती है।


संतुलन ही स्वास्थ्य है - यही आयुर्वेद का मूल मंत्र है।



विकास की रफ्तार और ठहर गए रिश्ते

 विकास की रफ्तार और ठहर गए रिश्ते


इंसान का स्वभाव है आगे बढ़ना। वह जो आज है, कल वैसा नहीं रहता। समय के साथ-साथ उसके हाथों से बनी हर चीज बदलती चली जाती है। कभी जो मोबाइल केवल काले-सफेद अक्षरों तक सीमित था, आज वह रंगों, आवाज़ों और स्पर्श से भरी एक पूरी दुनिया बन चुका है। यह बदलाव अचानक नहीं आया, बल्कि छोटे-छोटे प्रयासों, गलतियों और सीखने की प्रक्रिया से गुज़रकर आया है।


यही क्रम इंसान के जीवन के लगभग हर हिस्से में दिखाई देता है। पहनावा बदला, खान-पान बदला, देखने और सोचने का नज़रिया बदला। संघर्ष करने के तरीके बदले, लक्ष्य पाने के रास्ते बदले। खेल बदले, ध्यान के तरीके बदले, जीवन को जीने की गति बदली। इंसान ने अपने बाहर की दुनिया को लगातार बेहतर किया, अधिक सुविधाजनक बनाया, अधिक तेज़ और अधिक चमकदार बनाया।


लेकिन इस निरंतर प्रगति के बीच एक चीज़ है जो समय के साथ कदम नहीं मिला पाई...रिश्ते।


आज भी रिश्तों को संभालने का तरीका वही पुराना है। बातें सामने बैठकर कहने के बजाय पीठ पीछे कही जाती हैं। जो कहना चाहिए, वह दबा लिया जाता है और जो नहीं कहना चाहिए, वही फैलाया जाता है। आमने-सामने बैठकर बात करने से लोग कतराते हैं, क्योंकि वहाँ एक अदृश्य रुकावट खड़ी रहती है मर्यादा का बोझ।


मर्यादा अपने आप में बुरी नहीं है। वह समाज को संतुलन देती है। लेकिन जब वही मर्यादा संवाद को रोकने लगे, तब वह दीवार बन जाती है। लोग सोचते हैं, “अगर मैंने सच कह दिया तो सामने वाला क्या सोचेगा?”, “मेरी छवि खराब न हो जाए”, “रिश्ता टूट न जाए।” इन्हीं सवालों के बीच सच्ची बात दम तोड़ देती है।


इस डर की सबसे खास बात यह है कि यह दिखाई नहीं देता, लेकिन हर बातचीत में मौजूद रहता है। चेहरे पर मुस्कान होती है, शब्दों में शिष्टता होती है, लेकिन भीतर असंतोष जमा होता रहता है। समय के साथ यही असंतोष दूरी बन जाता है। रिश्ते टूटते नहीं, बस चुपचाप ठंडे पड़ जाते हैं।


तकनीक ने इंसान को जोड़ने के लिए हज़ारों साधन दिए, लेकिन दिल से दिल जोड़ने की कला पीछे छूट गई। संदेश भेजना आसान हो गया, पर मन की बात कहना कठिन। स्क्रीन के पीछे बैठकर लोग बहुत कुछ कह लेते हैं, लेकिन सामने बैठकर एक वाक्य बोलने में हिचकिचाते हैं।


शायद वजह यह है कि रिश्तों को भी हमने वस्तुओं की तरह संभालना चाहा। जैसे मशीन खराब हो तो उसे बिना देखे-समझे ठीक करने की कोशिश करते हैं, वैसे ही रिश्तों में भी ऊपर-ऊपर से मरम्मत कर दी जाती है। असली कारण तक जाने का साहस कम ही लोग कर पाते हैं।


रिश्तों का विकास किसी नए नियम या तकनीक से नहीं होगा। उसके लिए सिर्फ़ एक चीज़ चाहिए सामने बैठकर ईमानदारी से सुनने और कहने की हिम्मत। बिना दोष लगाए, बिना जीत-हार सोचे। यह आसान नहीं है, लेकिन यही वह रास्ता है जो रिश्तों को समय के साथ आगे बढ़ा सकता है।


इंसान ने हर क्षेत्र में यह साबित किया है कि वह बदल सकता है। अगर उसने यह मान लिया कि रिश्ते भी विकास चाहते हैं, तो शायद आने वाला समय ऐसा होगा जहाँ लोग पीठ पीछे नहीं, आमने-सामने बात करेंगे। जहाँ मर्यादा दीवार नहीं, पुल बनेगी। और जहाँ डर की जगह समझ और अपनापन होगा।


विकास की यह यात्रा तब पूरी होगी, जब इंसान बाहर की दुनिया के साथ-साथ अपने रिश्तों को भी समय के अनुसार आगे बढ़ाना सीख लेगा।


राय का व्यापार और चुपचाप जलता जीवन

 राय का व्यापार और चुपचाप जलता जीवन


कुछ लोग होते हैं जो आपकी आग नहीं बुझाते,

वे बस उसमें हवा डालते हैं 

और जब लपटें उठती हैं, तो कहते हैं,

“मैं तो बस सुन रहा था…”


1. हम दूसरों की बातें करते-करते खुद को भूल जाते हैं


आज की सबसे आम त्रासदी यह है कि

इंसान के पास बातें बहुत हैं, पर आत्म-संवाद नहीं।


हम बात करते हैं....


फलाने की पत्नी कैसी है


उसका बेटा विदेश चला गया


उसका व्यापार बढ़ रहा है


वह पढ़ाई में तेज है


वह हमसे आगे निकल गया


वह खुश है या उसके घर में झगड़े हैं


विराट को वो शॉट नहीं खेलना चाहिए था


नेता के बयान, फिल्म की कहानी, समाज, धर्म, राजनीति…


लेकिन इन सबके बीच “आप” कहीं खो जाते हैं।


आप अपने डर की बात नहीं करते

आप अपनी असुरक्षा की बात नहीं करते

आप अपनी अधूरी इच्छाओं पर चुप रहते हैं

आप खुद को समय नहीं देते


क्योंकि दूसरों की चर्चा आसान है,

खुद से सामना कठिन।


2. राय पूछने वाले हर व्यक्ति का इरादा साफ नहीं होता


अब यहीं से कहानी खतरनाक मोड़ लेती है।


कुछ लोग आपके पास आते हैं और कहते हैं—


“आपकी क्या राय है?”

“आप क्या सोचते हैं?”

“आप तो समझदार हो, सच बताओ…”


आप सहज होकर अपनी बात रख देते हैं,

क्योंकि सामने वाला आप जैसा ही लगता है।


लेकिन सच यह है कि वह आपसे राय नहीं, हथियार ले रहा होता है।


3. राय को हथियार कैसे बनाया जाता है...


उदाहरण 1: ऑफिस का खेल


आपने कहा....

“मुझे लगता है बॉस का फैसला गलत था।”


सामने वाला वही बात

थोड़ा मसाला लगाकर ऊपर पहुंचा देता है

“सर, फलाना आपके खिलाफ बोल रहा था…”


नुकसान किसका?

आपका।

फायदा किसका?

उसका, जो खुद को “वफादार” दिखा रहा है।


उदाहरण 2: पारिवारिक जहर


आपने किसी रिश्तेदार से कहा...

“भाभी का व्यवहार ठीक नहीं लगता।”


वही बात घूमकर पहुंचती है...


“आपकी ननद आपको बदनाम कर रही है।”


अब रिश्ते टूटते हैं,

आप सोचते हैं... मैंने तो किसी का बुरा नहीं चाहा…


उदाहरण 3: राजनीतिक / धार्मिक राय


आपने किसी मुद्दे पर संतुलित राय दी।

सामने वाला उसे काट-छांट कर पेश करता है...


“देखो, ये तो हमारे खिलाफ है।”


अब आप किसी खेमे के दुश्मन बना दिए जाते हैं

बिना लड़े, बिना बोले।


4. ऐसे लोग असल में कौन होते हैं?


ये लोग...


सीधे नुकसान नहीं करते


सामने से हमला नहीं करते


दोस्त, शुभचिंतक, हमदर्द बनते हैं


उनकी रचनात्मकता नकारात्मक होती है

वे खुद कुछ बनाते नहीं,

दूसरों की राय से सीढ़ी बनाते हैं।


उनका काम होता है...


सुनना


इकट्ठा करना


तोड़-मरोड़ करना


सही जगह इस्तेमाल करना


और फिर चुपचाप निकल जाना।


5. इन्हें पहचानना इतना मुश्किल क्यों है?


क्योंकि....


वे आपके जैसे दिखते हैं


आपके साथ बैठते हैं


आपकी हाँ में हाँ मिलाते हैं


आपकी सहमति लेते हैं


वे आपको यह महसूस कराते हैं कि...


“मैं तुम्हारे साथ हूँ…

बस तुम गलत सोच रहे हो।”


यहीं सबसे समझदार लोग धोखा खा जाते हैं,

क्योंकि वे साफ दिल को सबमें खोजते हैं।


6. ऐसे लोगों को पहचानने के संकेत


ध्यान दीजिए....


1. जो व्यक्ति बार-बार आपकी राय दूसरों पर चाहता है

लेकिन खुद की बात नहीं करता


2. जो आपकी कही बात को बार-बार दोहराने को कहे

“वो बात फिर से बताओ…”


3. जो कहे ‘ये बात किसी को मत बताना’

लेकिन खुद कई लोगों की बातें आपको बताता है


4. जो हमेशा विवादित विषय छेड़ता है

धर्म, राजनीति, रिश्ते


5. जिसके पास समाधान नहीं, सिर्फ चर्चाएँ हैं


7. बचाव कैसे करें?


हर सवाल का जवाब देना ज़रूरी नहीं


हर राय साझा करना बुद्धिमानी नहीं


चुप्पी भी एक सुरक्षा कवच है


अपनी बात केवल उन्हीं से करें

जिनका नुकसान आपके नुकसान से जुड़ा हो


याद रखिए....


जो सच में आपका होगा,

वह आपकी बात को हथियार नहीं बनाएगा।


दुनिया में आग लगाने वाले कम नहीं,

पर सबसे खतरनाक वे होते हैं

जो माचिस आपकी जेब से निकालते हैं

और कहते हैं...

“मैं तो बस रोशनी कर रहा था।”


इसलिए

खुद पर समय दीजिए

खुद से बात कीजिए

और हर मुस्कुराते चेहरे को

अपना समझने की जल्दबाज़ी मत कीजिए।

क्योंकि

कुछ लोग आपकी राय जानकर

आपका ही जीवन जला देते हैं।



ये पत्ते नहीं जादुई पत्ते हैं

 ये पत्ते नहीं जादुई पत्ते हैं इन पत्तों का सेवन बचाएगा आपको अनेक बीमारी से जाने सेवन का तरीका


अर्जुन के पत्ते — हृदय की कमजोरी


आँवला के पत्ते — पाचन समस्या


सहजन (मोरिंगा) के पत्ते — रक्त की कमी (एनीमिया)


नीलगिरी (यूकेलिप्टस) के पत्ते — सांस की समस्या


पुदीना के पत्ते — गैस/अपच


घृतकुमारी (एलोवेरा) के पत्ते — पेट में जलन (एसिडिटी)


ताड़ के पत्ते — जोड़ों का दर्द


लेमन ग्रास के पत्ते — तनाव/अनिद्रा


दालचीनी के पत्ते — सर्दी-जुकाम


कनेर के पत्ते — गठिया (बाहरी लेप)


जामुन के पत्ते — मधुमेह


शीशम (सिरस) के पत्ते — त्वचा की खुजली


करी पत्ता (मीठा नीम) — पाचन कमजोरी


हरसिंगार (पारिजात) के पत्ते — बुखार/जोड़ों का दर्द


अंजीर के पत्ते — कब्ज


खस (वेटिवर) के पत्ते — शरीर की अधिक गर्मी


चंदन के पत्ते — त्वचा एलर्जी


बबूल (अकासिया) के पत्ते — मसूड़ों की समस्या


सर्पगंधा के पत्ते — उच्च रक्तचाप में सहायक


गूलर के पत्ते — घाव भरने में सहायक


सेवन विधि (एक–एक पत्ता)

अर्जुन के पत्ते — सूखा चूर्ण 1 चम्मच हल्के गुनगुने पानी के साथ सुबह लें।


आँवला के पत्ते — 5–7 पत्ते उबालकर काढ़ा बनाकर पिएं।


सहजन (मोरिंगा) के पत्ते — सब्ज़ी/सूप बनाकर सप्ताह में 2–3 बार खाएं।


नीलगिरी के पत्ते — 4–5 पत्ते उबालकर भाप लें (पीना नहीं है)।


पुदीना के पत्ते — चटनी बनाकर या पानी में भिगोकर पिएं।


घृतकुमारी (एलोवेरा) — अंदर का गूदा 1–2 चम्मच सुबह खाली पेट।


ताड़ के पत्ते — गर्म पानी में उबालकर सेंक/भाप लें (बाहरी उपयोग)।


लेमन ग्रास — 1 कप हर्बल चाय बनाकर शाम को पिएं।


दालचीनी के पत्ते — 2–3 पत्ते उबालकर हल्का काढ़ा पिएं।


कनेर के पत्ते — पीसकर केवल बाहरी लेप लगाएं (खाना नहीं है)।


जामुन के पत्ते — सूखा चूर्ण ½ चम्मच पानी के साथ सुबह।


शीशम (सिरस) के पत्ते — उबले पानी से त्वचा धोएं/लेप लगाएं।


करी पत्ता (मीठा नीम) — रोज़ 8–10 पत्ते चबाएं या सब्ज़ी में डालें।


हरसिंगार (पारिजात) — 5–6 पत्ते उबालकर काढ़ा पिएं।


अंजीर के पत्ते — 2–3 पत्ते उबालकर पानी पिएं (रात में)।


खस (वेटिवर) — जड़/पत्तों का ठंडा अर्क बनाकर पिएं।


चंदन के पत्ते — पीसकर ठंडा लेप त्वचा पर लगाएं।


बबूल (अकासिया) — पत्तों का काढ़ा बनाकर कुल्ला करें।


सर्पगंधा के पत्ते — डॉक्टर की सलाह से बहुत कम मात्रा में काढ़ा।


गूलर के पत्ते — पीसकर घाव पर लेप लगाएं।


पित्त प्रकृति: समस्याएँ और उन्हें कंट्रोल

 Pitta Prakriti - पित्त प्रकृति: समस्याएँ और उन्हें कंट्रोल करने का आयुर्वेदिक तरीका - इस पोस्ट में जानेंगे - पित्त प्रकृति वालों को आमतौर पर कौन-कौन सी समस्याएँ होती हैं


और किन आदतों, खानपान और लाइफस्टाइल से वे इन समस्याओं को कंट्रोल कर सकते हैं


पित्त का मतलब क्या है?

आयुर्वेद में पित्त का सीधा संबंध अग्नि (Fire) से है।

जैसे आग का नेचर गर्म, तेज़ और फैलने वाला होता है, वैसे ही पित्त प्रकृति वाले लोग भी-


गर्म नेचर के

तेज़ सोच वाले

जल्दी रिएक्ट करने वाले

और हाई एनर्जी वाले होते हैं

इसी वजह से इन्हें गर्मी से जुड़ी बीमारियाँ ज्यादा होती हैं।


पित्त प्रकृति में दिखने वाली आम शारीरिक समस्याएँ

पित्त का सबसे प्रमुख गुण है उष्ण (गर्मी)।

इसी गर्मी के कारण पित्त वालों में ये समस्याएँ जल्दी दिखती हैं:


कम उम्र में बाल सफेद होना

जवानी में ही बाल झड़ना

चेहरे पर जल्दी झुर्रियाँ

शरीर पर ज्यादा तिल या मोल्स

हाथ-पैरों में जलन और दाह

पसीना बहुत ज्यादा आना


इसके अलावा अंदरूनी तौर पर भी पित्त से जुड़ी समस्याएँ होती हैं, जैसे-


हेपेटाइटिस

नेफ्रोटिक डिसऑर्डर

मेनिन्जाइटिस

शरीर में बार-बार सूजन या इंफ्लेमेशन


इसलिए पित्त वालों को ऐसी चीज़ें अपनानी चाहिए जो ठंडी हों, शांत करने वाली हों और पित्त को दबा कर रखें।


पित्त को शांत रखने का सबसे बड़ा हथियार: घी

आयुर्वेदाचार्य वाग्भट साफ कहते हैं-

पित्त शमन के लिए घी से बढ़कर कोई औषधि नहीं।


घी-


पित्त को शांत करता है

जलन और दाह को कम करता है

दिमाग और शरीर दोनों को ठंडक देता है


पित्त वालों को घी का प्रयोग:


खाने में

नाक में (नस्य के रूप में)

पैरों के तलवों में मालिश

इन सभी तरीकों से करना चाहिए।


खासकर देसी गाय का घी पित्त वालों के लिए अमृत के समान है।


पित्त प्रकृति वालों के लिए घी का सही उपयोग


1. खाने में घी

कैसे: 1–2 चम्मच शुद्ध देसी गाय का घी

कब: सुबह खाली पेट या खाने के साथ

फायदा: शरीर की गर्मी, जलन और एसिडिटी शांत करता है


2. नाक में घी (नस्य)

कैसे: हल्का गुनगुना घी, 2–2 बूंद

कब: सुबह खाली पेट

फायदा: दिमाग की गर्मी, गुस्सा और सिर की जलन कम करता है


3. पैरों के तलवों में मालिश

कैसे: रात को सोने से पहले घी से हल्की मालिश

कितना: ½–1 चम्मच

फायदा: नींद बेहतर, शरीर और दिमाग दोनों को ठंडक


पित्त कंट्रोल का सबसे आसान फॉर्मूला: घी अंदर भी, बाहर भी।


पित्त का दूसरा गुण: तीक्ष्णता (Sharpness)

पित्त वाले लोग नेचर से-


तेज़

प्राउड

एग्रेसिव

और जल्दी झगड़े के लिए तैयार

होते हैं।


इसी तीक्ष्ण गुण की वजह से पित्त से जुड़ी ये समस्याएँ होती हैं:


नाक से खून आना

मल या मूत्र में खून

महिलाओं में ज्यादा ब्लीडिंग

प्लेटलेट्स का गिरना

रक्तपित्त जैसी बीमारियाँ

यह सब पित्त की अत्यधिक तीक्ष्णता का संकेत है।


तीक्ष्ण पित्त को कैसे कंट्रोल करें?

यहाँ सबसे बड़ा रोल निभाता है आंवला।


आंवला-


नेचर में ठंडा

पाँच रसों से युक्त

पित्त शमन में श्रेष्ठ


आंवले का सेवन आप इन रूपों में कर सकते हैं:


आंवला अचार

आंवला चटनी

आंवला मुरब्बा

आंवला कैंडी

या आंवला पाउडर (खाली पेट)


पित्त वालों के लिए आंवला


कैसे इस्तेमाल करें

सुबह खाली पेट:


1 ताज़ा आंवला या

1 चम्मच आंवला पाउडर + गुनगुना पानी


खाने के साथ:

आंवले की चटनी / मुरब्बा (कम मात्रा)


पित्त कंट्रोल का सबसे सस्ता और असरदार उपाय: रोज़ का आंवला।


जो लोग मानसिक रूप से बहुत हाइपर रहते हैं, जल्दी गुस्सा करते हैं, उनके लिए आंवला बेहद ज़रूरी है।


पित्त वालों की बड़ी परेशानी: ज्यादा पसीना और बदबू

गर्मी के कारण पित्त वालों में-


पसीना ज्यादा आता है

और उस पसीने से दुर्गंध भी ज्यादा होती है


आयुर्वेद इसे विश्रम गुण से जोड़ता है -

गर्मी में चीज़ें जल्दी खराब होती हैं,

वैसे ही पित्त वाले शरीर में भी सड़न जल्दी होती है।


पसीना और गर्मी कंट्रोल करने के उपाय

चंदन का लेप

ठंडी उबटन

शरीर पर शीतल लेप


इसके अलावा-


त्रिफला

बेलपत्र (5–6 पत्ते चबा कर)

ये पित्त की गर्मी और पसीने को कम करने में मदद करते हैं।


पित्त की गर्मी और ज्यादा पसीने के लिए सही मात्रा 


 त्रिफला

मात्रा: 1/2 से 1 चम्मच


कैसे: गुनगुने पानी के साथ

कब: रात को सोने से पहले

फायदा: पित्त शमन, शरीर की गर्मी और बदबूदार पसीना कम


 बेलपत्र

मात्रा: 5–6 ताज़े पत्ते

कैसे: अच्छे से धोकर चबा-चबा कर

कब: सुबह खाली पेट या खाने के बीच

फायदा: पित्त की हीट, पसीना और जलन कंट्रोल


नियमित, सही मात्रा = पित्त शांत, शरीर ठंडा।


पित्त के अन्य गुण और सही आहार

पित्त के अन्य गुण हैं:


लघु (हल्का)

सर (फैलने वाला)

द्रव (तरल)


इसीलिए पित्त वालों को-

थोड़ा भारी और पौष्टिक भोजन करना चाहिए।


पित्त वालों की अग्नि तेज़ होती है,

इसलिए वे भारी चीज़ें भी आसानी से पचा लेते हैं।


 पित्त वालों के लिए सही “भारी” आहार

भारी मतलब जंक या तला-भुना नहीं, बल्कि पोषण देने वाला भोजन 


दूध, घी, मक्खन (देसी)

चावल, गेहूं, दलिया

खीर, दलिया, दूध वाली चीजें

मूंग दाल, मसूर (कम मसाले में)

मीठे फल – केला, अंगूर, अनार

उबली या घी में बनी सब्ज़ियां


पित्त के लिए सबसे अच्छे रस

1. मधुर रस (मीठा)

शरीर और दिमाग दोनों को शांत करता है

पित्त को बैलेंस करता है


2. तिक्त रस (कड़वा)

पसीना

बदबू

हीट

को कंट्रोल करता है


उदाहरण:


करेला

नीम

परवल


3. कषाय रस (कसैला)

आंवला इसका सबसे अच्छा उदाहरण है


पित्त वालों को किन चीज़ों से दूर रहना चाहिए

पित्त वालों के लिए सबसे खतरनाक चीज़ें:


नमक – बहुत ज्यादा पित्त बढ़ाता है

खट्टा – पित्त को भड़काता है

अत्यधिक तीखा – रेड हॉट चिली, मसाले


इनका सेवन जितना कम करेंगे, उतना फायदा होगा।


ठंडी और सुगंधित चीज़ों का महत्व

आयुर्वेद कहता है—

सुगंध पृथ्वी तत्व से जुड़ी होती है

और पृथ्वी तत्व पित्त को शांत करता है।


इसलिए:


फूलों की खुशबू

चंदन

कपूर

नेचुरल सुगंध


इनका प्रयोग पित्त वालों के लिए बहुत लाभदायक है।


चांदी पहनना, ठंडी माला या ठंडी धातु भी पित्त को शांत करती है।


पित्त वालों की सबसे सस्ती दवा: चंद्रमा की रोशनी

पित्त वालों के लिए—


सूर्य की तेज़ रोशनी नहीं

बल्कि चंद्रमा की ठंडी रोशनी फायदेमंद है


रात में चांदनी में बैठना, चंद्र दर्शन करना-

दिमाग और शरीर दोनों को ठंडक देता है।


पित्त और मन: शांत रहने के तरीके

मधुर संगीत

बांसुरी

वायलिन

शांत धुनें


डीजे, नाइट पार्टी, तेज़ म्यूज़िक

पित्त को और बढ़ाता है।


ध्यान, योग, शीतली–शीतकारी प्राणायाम

पित्त वालों के लिए वरदान है।


वाग्भट ऋषि के अनुसार 3 अनिवार्य चीज़ें

अगर सब कुछ करना मुश्किल लगे,

तो ये तीन चीज़ें ज़रूर अपनाइए:


घी – कोई विकल्प नहीं

दूध – देसी गाय का

विरेचन – साल में एक बार आयुर्वेदिक तरीके से


विरेचन और रक्तमोक्षण-

पित्त कंट्रोल की सर्वश्रेष्ठ चिकित्सा है।


Conclusion

अगर आप पित्त प्रकृति के हैं,

तो आपकी एनर्जी बहुत स्ट्रॉन्ग है।


ज़रूरत है उसे शांत, संतुलित और सही दिशा में लगाने की।


सही खानपान, ठंडी आदतें, घी, आंवला, ध्यान

आपको लंबे समय तक स्वस्थ रख सकते हैं।

सबसे जीवित अवस्था

 सबसे जीवित अवस्था


मन के अँधेरे कमरे में

सबसे पहले एक चित्र उभरता है

अधूरा, धुंधला,

पर उसमें धड़कन होती है।


वह चित्र शब्द नहीं माँगता,

न माप, न तौल,

बस एक चुप सी ज़िद

“मैं बनना चाहता हूँ।”


फिर सोच की उँगलियाँ

उस चित्र की रेखाएँ टटोलती हैं,

पुरानी यादों के टुकड़े जोड़ती हैं,

पहले से जानी हुई राहों से

नई पगडंडियाँ बनाती हैं।


कुछ भी शून्य से नहीं आता,

हर नई समझ

पुराने अनुभवों की पीठ पर खड़ी होती है,

जैसे बीज मिट्टी से लड़ता नहीं,

उसी में रास्ता खोजता है।


और डर

वह ठंडी छाया है

जो मन की खिड़कियाँ बंद कर देती है।

जहाँ डर बैठता है

वहाँ प्रश्न दम घुटने लगते हैं।


लेकिन जैसे ही

“क्यों” ने “डर” का हाथ छोड़ा,

भीतर के दरवाज़े खुलने लगे।

समझने की कोशिश ने

मन को तेज़ कर दिया,

हल्का कर दिया।


जब कल्पना उड़ती है,

सीखना साथ चलता है,

और भय रास्ते से हट जाता है

तब मन

अपने सबसे सच्चे रूप में काम करता है।


न सबसे तेज़,

न सबसे ऊँचा

बस सबसे जीवित।

हर इंसान की दुनिया अलग है

 आज के समय में ध्यान को लेकर सबसे बड़ी गलतफहमी यही है कि उसके लिए अलग से समय चाहिए, एक शांत कमरा चाहिए, बंद आँखें चाहिए, और जीवन से थोड़ी दूरी चाहिए। जबकि सच यह है कि आज का मनुष्य दूरी नहीं, समावेश चाहता है। उसके पास बैठने का समय नहीं है, पर जीने का समय है। और जहाँ जीवन है, वहीं ध्यान भी हो सकता है।


आज कोई रातभर काम करता है, कोई अचानक मीटिंग में फँस जाता है, कोई यात्रा में है, कोई जिम्मेदारियों के बोझ तले दबा है। ऐसे में अगर हम कहें कि “सुबह पाँच बजे बैठो, तभी शांति मिलेगी”, तो यह बात ज़्यादातर लोगों के लिए बोझ बन जाती है। ध्यान बोझ नहीं है। ध्यान तो राहत है।


हर इंसान की दुनिया अलग है। किसी का मन संगीत में घुल जाता है, किसी का पेड़ों को देखकर ठहरता है, कोई चलते-चलते भीतर उतर जाता है, कोई गाड़ी चलाते हुए, कोई अपने बच्चों को नहलाते समय, कोई रसोई में, कोई काम करते हुए, कोई प्रेम में, कोई मिलन के क्षणों में। रास्ते अलग हैं, अनुभव अलग हैं, लक्ष्य भी अलग हैं। इसलिए ध्यान का कोई एक आकार नहीं हो सकता।


अक्सर ऐसा भी होता है कि कुछ लोगों को एक ही विधि से शांति मिल जाती है। इसका कारण यह नहीं कि वही तरीका सबसे सही है, बल्कि इसलिए कि उन्होंने मन में पहले ही मान लिया होता है कि यही उन्हें शांति देगा। मन जहाँ भरोसा कर लेता है, वहाँ दरवाज़ा अपने आप खुल जाता है।


असल बात विधि की नहीं, उपस्थिति की है।


जब आप जो कर रहे हैं, उसमें पूरी तरह होते हैं तो वही ध्यान है।

जब आपकी इंद्रियाँ, आपका शरीर और आपका मन एक ही क्षण में हों तो वही ध्यान है।


देखिए, जब कोई खतरा सामने होता है, तब मन कहीं भटकता नहीं।

जब आपका बच्चा कुछ नया बना रहा होता है, तब आपकी पूरी चेतना उसी पर टिक जाती है।

उन क्षणों में कोई अभ्यास नहीं होता, फिर भी आप पूरी तरह जाग्रत होते हैं।


यही बात रोज़मर्रा के कामों में भी हो सकती है।


आप खाना बना रहे हैं तो मसालों की खुशबू को महसूस कीजिए, उबलते पानी की आवाज़ सुनिए, सब्ज़ी के रंग देखिए, चम्मच की हलचल को जानिए। उस समय सिर में बीते या आने वाले विचार चल रहे हों, तो उन्हें जाने दीजिए। काम मत छोड़िए। देखिएगा थोड़ी देर बाद ध्यान फिर लौट आता है। कभी ध्यान गायब, कभी विचार गायब यह खेल चलता रहता है। इसमें घबराने की कोई बात नहीं।


आप किसी रिश्ते में हैं तो सामने वाले की बात को सचमुच सुनिए। सिर्फ जवाब देने के लिए नहीं, समझने के लिए। अपने शब्दों को बोलते समय भी सजग रहिए कि वे कहाँ से आ रहे हैं। उस क्षण में मौजूद रहना ही सबसे बड़ी निकटता है।


आप दफ़्तर में हैं तो सिर्फ काम न करें, काम को देखें। आप क्या बना रहे हैं, किस दिशा में जा रहे हैं, आपका योगदान किस जगह जुड़ रहा है इस पर ठहरकर नजर डालिए। वहाँ भी गहराई संभव है।


आप चल रहे हैं तो कदमों की गति को जानिए।

आप गाड़ी चला रहे हैं तो सड़क, मोड़, आकाश, अपनी साँस सबको एक साथ महसूस कीजिए।

आप प्रेम में हैं तो उस क्षण को जल्दी खत्म करने की बजाय उसमें उतरिए।


ध्यान का मतलब जीवन से भागना नहीं है।

ध्यान का मतलब जीवन में पूरी तरह उतर जाना है।


हम अक्सर सोचते हैं कि ध्यान करने से जीवन बेहतर होगा।

पर सच यह है कि जीवन को बेहतर ढंग से जीना ही ध्यान है।


शुरुआत में यह टिकता नहीं। कुछ सेकंड में मन भाग जाता है। यह स्वाभाविक है। उसे जाने दीजिए। बस इतना ध्यान रखिए कि आप अपना काम न छोड़ें। धीरे-धीरे आप देखेंगे कि मन भागकर लौट आता है जैसे बच्चा खेलकर माँ की गोद में वापस आ जाता है।


आख़िरकार बात इतनी ही है 

आप जो कर रहे हैं, उसी में हो जाना।

आप जो सोच रहे हैं, उसे देखते रहना।

बिना खींचे, बिना रोके।


ध्यान कोई अलग चीज़ नहीं है जिसे जीवन में जोड़ना पड़े।

ध्यान वही है जो तब प्रकट होता है, जब जीवन से कुछ भी छूटा नहीं होता।


और शायद इसी कारण, जब यह समझ उतरती है, तो इंसान को कहीं जाने की जल्दी नहीं रहती

क्योंकि वह जहाँ है, वहीं पूरा है। 

Wednesday, February 11, 2026

किस बीमारी में कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाना है

किस बीमारी में कौनसा ड्राई फ्रूट्स खाना है लाभकारी,किस तरह करे सेवन 


बादाम — याददाश्त कमजोर


काजू — कमजोरी/थकान


किशमिश — खून की कमी (एनीमिया)


अखरोट — दिमागी कमजोरी


पिस्ता — हाई कोलेस्ट्रॉल


खजूर — शरीर में खून की कमी


अंजीर (सूखा) — कब्ज


मुनक्का — खांसी


खुबानी (सूखी) — त्वचा रूखापन


काली किशमिश — जोड़ों का दर्द


चिलगोजा — दिल की कमजोरी


मखाना — हाई ब्लड प्रेशर


नारियल (सूखा/खोपरा) — पाचन कमजोरी


कद्दू के बीज — प्रोस्टेट समस्या


तरबूज के बीज — मूत्र जलन


सूरजमुखी के बीज — थकान/कम ऊर्जा


तिल (सफेद) — हड्डियों की कमजोरी


अलसी के बीज — कब्ज/गैस


खसखस — नींद की समस्या


ब्राजील नट — थायराइड समस्या


 कैसे करें सेवन (सरल तरीका) दिया गया है 👇


बादाम — रात में 6–8 भिगोकर सुबह छीलकर खाएं।


काजू — 4–5 काजू सुबह या दोपहर में दूध/पानी के साथ।


किशमिश — 10–12 किशमिश रात में भिगोकर सुबह खाएं।


अखरोट — 2–3 अखरोट सुबह खाली पेट।


पिस्ता — 8–10 पिस्ता दोपहर में स्नैक की तरह।


खजूर — 2 खजूर सुबह दूध के साथ।


अंजीर (सूखा) — 1–2 अंजीर रात में भिगोकर सुबह।


मुनक्का — 8–10 मुनक्का रात में भिगोकर सुबह।


सूखी खुबानी — 2–3 खुबानी भिगोकर सुबह।


काली किशमिश — 10–12 रात में भिगोकर सुबह।


चिलगोजा — 1 मुट्ठी सुबह या शाम।


मखाना — भूनकर 1 कटोरी शाम को।


सूखा नारियल (खोपरा) — 1–2 टुकड़े सुबह।


कद्दू के बीज — 1 छोटी मुट्ठी सुबह।


तरबूज के बीज — भूनकर 1 छोटी मुट्ठी।


सूरजमुखी के बीज — सलाद में मिलाकर या भूनकर।


सफेद तिल — 1 चम्मच भुने तिल सुबह गुनगुने पानी के साथ।


अलसी के बीज — 1 चम्मच भिगोकर/पीसकर सुबह।


खसखस — दूध में उबालकर रात में।


ब्राजील नट — 1 नट प्रतिदिन (ज्यादा नहीं)।


खुद से न लड़े… खुद को दोस्त बनाए

 खुद से न लड़े… खुद को दोस्त बनाए


अक्सर इंसान की ज़िंदगी लड़ाई में ही गुजर जाती है।

कभी जीत की चाह में, कभी हार के डर में।

लड़ाई में हमेशा दो ही परिणाम होते हैं हार या जीत।

और हैरानी की बात यह है कि जीतने वाला भी शांत नहीं होता,

और हारने वाला टूट जाता है।


लड़ाई के बाद किसी को थोड़ा फायदा मिलता है,

तो किसी को गहरा नुकसान।

लेकिन सुकून, संतुलन और स्पष्टता

ये शायद ही किसी के हिस्से आती हैं।


आज इंसान की प्रवृत्ति को धीरे-धीरे

लड़ाकू स्वभाव में बदला जा रहा है।

दुनिया को कुछ ताकतवर लोग इस तरह डिज़ाइन कर रहे हैं

कि हर चीज़ युद्ध जैसी दिखने लगी है।


पढ़ाई अब सीखने की प्रक्रिया नहीं रही,

वह प्रतियोगिता बन गई है।

रिश्ते अपनापन नहीं रहे,

वे तुलना और शर्तों में बदल गए हैं।

पहचान आत्मबोध नहीं,

ब्रांड और स्टेटस बन गई है।


घर, ज़मीन, सामान

सब कुछ पाने की दौड़ बन गया है।

रोज़गार और व्यापार रचना नहीं,

प्रतिस्पर्धा की जंग बन चुके हैं।

यहाँ तक कि पहनावा, खान-पान

और दिखावा भी मुकाबले में बदल गया है।


धीरे-धीरे इंसान इस दुनिया को

रणक्षेत्र समझने लगता है।

क्योंकि उसका दिमाग़ उसी तरह ढाला जा रहा है।


जैसा माहौल होता है,

वैसा ही दिमाग़ बनता है।

अगर चारों ओर संघर्ष है,

तो भीतर भी संघर्ष पैदा होगा।

अगर चारों ओर तुलना है,

तो आत्म-संदेह जन्म लेगा।


तो फिर इंसान करे क्या?


क्या सब छोड़ दे?

क्या जंगल चला जाए?

नहीं।


समाधान भागने में नहीं है,

समाधान है भीतर की दिशा बदलने में।


इंसान जाने-अनजाने उसी भीड़ का हिस्सा बन जाता है।

लड़ता है, दौड़ता है,

खुद को साबित करने में लगा रहता है।

पूरी ज़िंदगी किसी न किसी से आगे निकलने की कोशिश में निकल जाती है।


और फिर सवाल उठता है

“आपने बिना लड़े क्या हासिल किया है?”


लेकिन असली सवाल यह होना चाहिए

जो आपने हासिल किया,

क्या वह सच में लड़ाई थी?

या आप पहले से ही उसके काबिल थे?


लड़ाई और प्रयास का अंतर


लड़ाई वहाँ होती है जहाँ


डर प्रेरणा बन जाए


तुलना ईंधन बन जाए


अहंकार दिशा तय करे


प्रयास वहाँ होता है जहाँ


स्पष्टता हो


धैर्य हो


खुद से ईमानदारी हो


लड़ाई थका देती है।

प्रयास निखार देता है।


जो इंसान हर समय लड़ रहा है,

वह असल में दूसरों से नहीं,

अपने भीतर के डर से लड़ रहा होता है।


सिस्टम आपको लड़ाकू क्यों बनाना चाहता है?


क्योंकि शांत इंसान को नियंत्रित करना मुश्किल होता है।

जागरूक इंसान को डराना मुश्किल होता है।

और जो खुद से संतुष्ट है,

वह आसानी से खरीदा नहीं जा सकता।


इसलिए पहले...

कमी का एहसास पैदा किया जाता है।

फिर डर।

फिर प्रतियोगिता।

और अंत में

“तुम काफी नहीं हो” का भाव।


और इंसान दौड़ता रहता है

बिना यह पूछे कि

दौड़ किस दिशा में है?


भीड़ से अलग रास्ता


जो इस भीड़ का हिस्सा नहीं बनता,

वही अलग पथ पर चलता है।


वह रास्ता आसान नहीं होता।

वहाँ ताली नहीं मिलती।

वहाँ तुरंत पहचान नहीं मिलती।


लेकिन वहीं

गहराई मिलती है।

स्पष्टता मिलती है।

और असली आत्मसम्मान जन्म लेता है।


अलग रास्ता चुनने वाला इंसान

धीरे चलता है,

लेकिन भटकता नहीं।


सफल वही नहीं जो सबसे आगे है।

सफल वह है

जो रात को चैन से सो सके।

जिसे खुद से नज़र चुरानी न पड़े।

जिसकी ऊर्जा टूटी न हो।


अगर आपने बहुत कुछ पाया,

लेकिन खुद को खो दिया

तो वह सौदा बहुत महँगा था।


जीवन युद्ध नहीं, साधना है


जीवन कोई युद्ध नहीं है

जहाँ सबको हराना हो।

यह कोई प्रतियोगी परीक्षा नहीं है।


जीवन एक साधना है

सीखने की,

समझने की,

और परिपक्व होने की।


यहाँ कोई दुश्मन नहीं,

सिर्फ अलग-अलग यात्राएँ हैं।


जिस दिन इंसान यह समझ लेता है


 “मुझे किसी से आगे नहीं निकलना,

मुझे बस खुद के करीब पहुँचना है।”


उसी दिन लड़ाई खत्म हो जाती है।


और जब लड़ाई खत्म होती है,

तब जीवन शुरू होता है।


Monday, February 9, 2026

अपडेट का दौर और बदलता अपराध

 अपडेट का दौर और बदलता अपराध


आज का युग अपडेट का युग है। समय के साथ हर चीज़ बदल रही है विज्ञान, तकनीक, सोच और स्वयं मनुष्य भी। जो व्यक्ति, समाज या व्यवस्था इस बदलाव को स्वीकार नहीं करती, वह धीरे-धीरे पीछे छूट जाती है। यह नियम जितना विकास पर लागू होता है, उतना ही दुर्भाग्यपूर्ण रूप से अपराध पर भी लागू हो रहा है।


जहाँ एक ओर तकनीक ने जीवन को आसान बनाया है, वहीं दूसरी ओर उसी तकनीक का दुरुपयोग कर अपराधियों ने अपराध के नए-नए रास्ते खोज लिए हैं। अपराध अब केवल गलियों या अँधेरी रातों तक सीमित नहीं रहा, वह मोबाइल स्क्रीन, कॉल, लिंक और ऐप्स के ज़रिए हमारे घरों में प्रवेश कर चुका है।


"डिजिटल युग का अपडेटेड अपराध"


आज का अपराधी हथियारों से ज़्यादा डेटा और तकनीक पर भरोसा करता है।

ऑनलाइन अपराधों के तरीके लगातार विकसित हो रहे हैं...


कभी दंपति या परिवार को ऑनलाइन वीडियो कॉल के ज़रिए बंधक बनाकर करोड़ों की वसूली की जाती है।


कभी कुछ सेकंड की फर्जी वीडियो क्लिप दिखाकर लोगों को डराया और लूटा जाता है।


फर्जी कॉल कर OTP हासिल किया जाता है और पल भर में बैंक अकाउंट खाली हो जाता है।


ऑनलाइन गेम और ऐप्स के नाम पर लोगों को “आसान कमाई” का सपना दिखाकर सीधा पैसा निकाल लिया जाता है।


एक अनजान-सा लिंक क्लिक करते ही मेहनत की कमाई उड़ जाती है।


इन अपराधों की सबसे खतरनाक बात यह है कि इनमें शारीरिक हिंसा नहीं दिखती, इसलिए लोग इन्हें गंभीरता से नहीं लेते जब तक वे स्वयं इसका शिकार न बन जाएँ।


"शारीरिक अपराध और उनका बदला हुआ स्वरूप"


डिजिटल अपराधों के साथ-साथ शारीरिक अपराध भी कम नहीं हुए हैं, बल्कि उनके तरीके और ज़्यादा चतुर और छिपे हुए हो गए हैं।

आज कई अपराध ऐसे हैं जो खुले में नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे होते हैं।


कुछ अपराधों के शिकार लोग सब कुछ जानते हुए भी चुप रहते हैं...


कभी सामाजिक बदनामी के डर से


कभी परिवार टूटने की आशंका से


तो कभी आर्थिक या भावनात्मक मजबूरी के कारण


कभी डर के कारण 


"घरेलू अपराध: जो दिखता नहीं, पर सबसे गहरा है"


घरेलू अपराध समाज का वह अंधेरा सच है जिसका कोई ठोस आँकड़ा मौजूद नहीं है।

खासतौर पर महिलाएँ इसका सबसे बड़ा शिकार होती हैं।


अक्सर ऐसा होता है कि....


पीड़िता सब सहती रहती है, पर बोल नहीं पाती


परिवार जानकर भी “घर की बात है” कहकर दबा देता है


समाज इज़्ज़त और बदनामी के तराज़ू में सच को तौल देता है


अगर घरेलू अपराधों का वास्तविक डेटा सामने आ जाए, तो शायद यह भ्रम टूट जाए कि यह केवल अशिक्षित या कमजोर वर्ग की समस्या है। हकीकत यह है कि अच्छे-अच्छे, पढ़े-लिखे और प्रतिष्ठित लोग भी इसके शिकार होते हैं।


"समस्या की जड़ और समाधान की ज़रूरत"


अपराध का अपडेट होना इस बात का संकेत है कि....


हमारी जागरूकता अभी भी पीछे है


कानून और सामाजिक सोच में तालमेल की कमी है


पीड़ित को आज भी अपराधी से ज़्यादा सवालों का सामना करना पड़ता है


समाधान केवल कानून से नहीं आएगा, बल्कि


डिजिटल जागरूकता


खुली बातचीत


पीड़ित को दोषी ठहराने की मानसिकता का अंत


और समय के साथ सोच को अपडेट करने से ही आएगा


बदलाव प्रकृति का नियम है। अगर हम बदलाव के साथ खुद को अपडेट नहीं करेंगे, तो अपराध हमसे एक कदम आगे ही रहेगा।

ज़रूरत इस बात की है कि हम तकनीक का इस्तेमाल केवल सुविधा के लिए नहीं, बल्कि सावधानी और समझदारी के साथ करें, और उन अपराधों को भी पहचानें जो शोर नहीं मचाते, लेकिन अंदर ही अंदर इंसान को तोड़ देते हैं।


क्योंकि अपराध का सबसे खतरनाक रूप वही होता है,

जो दिखता नहीं, पर रोज़ घटता है।