Tuesday, February 3, 2026

मिट्टी, इमारतों, सड़कों और शरीर

 हम जिस दुनिया में जीते हैं, वो केवल मिट्टी, इमारतों, सड़कों और शरीरों से नहीं बनी। उसका एक बड़ा हिस्सा हमारे सोचने के तरीके से जन्म लेता है। जो कुछ हमने देखा, सहा, खोया, पाया, उसी की स्मृतियाँ मिलकर विचार बनती हैं। फिर उन्हीं विचारों से हम भविष्य की कल्पना करते हैं, संबंधों की परिभाषा गढ़ते हैं, और अपने होने का अर्थ तय करते हैं। हमें लगता है कि हम दुनिया को देख रहे हैं, पर अक्सर हम सिर्फ अपनी स्मृतियों की परछाइयों को देख रहे होते हैं।


ये सोच बहुत पुरानी होती है, पर हमें हर दिन नई लगती है। क्योंकि हर सुबह हम उसी मानसिक ढांचे के साथ उठते हैं, जिसे हमने बरसों में तैयार किया है। उसमें सुरक्षा के नाम पर डर जमा होता है, पहचान के नाम पर सीमाएँ बनती हैं, और सही होने की इच्छा के नाम पर दूसरों से दूरी। हम इन सबको स्वाभाविक मान लेते हैं, जैसे ये जीवन का हिस्सा हों, जबकि असल में ये विचारों का विस्तार होते हैं।


धीरे धीरे ये सोच इतनी ठोस लगने लगती है कि हमें लगता है, इसके बाहर कुछ है ही नहीं। जो भी अलग दिखता है, वो खतरा बन जाता है। जो भी हमारे जैसा नहीं सोचता, वो अजनबी हो जाता है। इस तरह हम एक ऐसी दुनिया में रहने लगते हैं, जो बाहर से बड़ी दिखती है, पर भीतर से बहुत संकरी होती है।


विचार से बनी हुई सीमाएँ:


धर्म, राष्ट्र, संस्कृति, परंपरा, विचारधारा, ये सब विचार की ही संतान हैं। शुरू में शायद इनका जन्म किसी समझ या सुविधा से हुआ होगा, पर समय के साथ ये पहचान बन गईं। पहचान, जो कहती है, मैं ये हूँ, और तुम वो हो। इसी एक रेखा से विभाजन पैदा होता है। बिना हथियार उठाए भी हम रोज़ किसी न किसी को अपने से बाहर कर देते हैं।


ये सीमाएँ केवल देशों के नक्शों पर नहीं होतीं, हमारे भीतर भी खिंची होती हैं। हम अपने मन में तय कर लेते हैं कि कौन अपना है, कौन पराया। कौन सही है, कौन गलत। और फिर उसी हिसाब से देखना शुरू कर देते हैं। देखने से पहले ही फैसला तैयार होता है। इस तरह वास्तविकता देखने से पहले ही हम उसे ढाल लेते हैं।


डर इसी ढांचे में पनपता है। डर कि मेरी पहचान टूट न जाए, मेरा समूह कमजोर न हो जाए, मेरी सोच गलत साबित न हो जाए। इस डर को हम तर्क, नैतिकता और परंपरा के कपड़े पहनाते हैं, ताकि वो सभ्य लगे। पर भीतर वो डर ही रहता है, जो किसी भी असहमति को खतरा समझता है।


हम कहते हैं कि दुनिया में हिंसा है, पर शायद हिंसा की जड़ ये विचार हैं, जो अलगाव पैदा करते हैं। जब मैं खुद को केंद्र मानता हूँ, तब हर दूसरा या तो उपयोगी होता है, या बाधा। बीच की जगह बहुत कम बचती है।


मानसिक वास्तविकता का जाल:


समय के साथ हम एक ऐसी दुनिया में रहने लगते हैं, जो बाहर से कम और भीतर से ज्यादा बनी होती है। हमारा दुख, हमारी खुशी, हमारा अपमान, हमारा गर्व, सब विचारों की व्याख्या पर टिका होता है। कोई एक शब्द कह देता है, और हम घंटों परेशान रहते हैं। कोई छोटी सी तारीफ मिल जाती है, और हम खुद को बड़ा मानने लगते हैं।


ये सब एक तरह की मानसिक वास्तविकता है। इसमें घटनाएँ कम, उनकी व्याख्या ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। दो लोग एक ही स्थिति से गुजरते हैं, पर एक टूट जाता है, दूसरा शांत रहता है। फर्क घटना में नहीं, सोच में होता है।


हम इस सोच को अपनी सुरक्षा समझते हैं। लगता है कि अगर हमने सब कुछ समझ लिया, वर्गीकृत कर लिया, नाम दे दिए, तो हम सुरक्षित हैं। पर असल में ये सुरक्षा बहुत नाजुक होती है। एक खबर, एक दुर्घटना, एक अस्वीकृति, और पूरा ढांचा हिल जाता है।


इसलिए हम लगातार खुद को व्यस्त रखते हैं। नई जानकारी, नई बहस, नए लक्ष्य, ताकि भीतर की अस्थिरता को महसूस न करना पड़े। हम भागते रहते हैं, और उसे प्रगति का नाम देते हैं।


देखने का आमंत्रण:


कुछ दृष्टिकोण हमें रुकने को कहते हैं। न मानने को, न विरोध करने को, बस देखने को। ये देखने का अर्थ आंखों से देखना नहीं, बल्कि ये देखना कि हम कैसे सोचते हैं, कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, कैसे डरते हैं, कैसे किसी एक पहचान से चिपक जाते हैं।


जब हम खुद को देखते हैं, बिना सफाई दिए, बिना दोष डाले, तब एक अजीब बात होती है। सोच थोड़ी धीमी पड़ती है। जैसे किसी नदी की धार अचानक शांत हो जाए। उस क्षण हमें पता चलता है कि हम और हमारी सोच अलग नहीं हैं। जो उलझन है, वो बाहर नहीं, भीतर है।


ये देखना कोई तकनीक नहीं है। इसमें कोई अभ्यास नहीं, कोई मंज़िल नहीं। ये बस ईमानदारी है। ये मान लेना कि जो कुछ चल रहा है, वो देखा जा सकता है, बदले बिना भी।


इस देखने में कोई सुधार की योजना नहीं होती। जैसे ही हम सुधार की सोचते हैं, सोच फिर नियंत्रण बन जाती है। पर जब हम सिर्फ देखते हैं, तब नियंत्रण गिरने लगता है।


विचार के पार का मौन:


कभी कभी, बहुत छोटे क्षणों के लिए, सोच रुकती है। शायद किसी गहरी थकान में, या किसी अप्रत्याशित सुंदरता को देखते हुए। उस समय कोई टिप्पणी नहीं चलती, कोई तुलना नहीं होती। बस जो है, वो है।


ये क्षण दुर्लभ नहीं हैं, पर हम उन्हें पकड़ने की कोशिश में खो देते हैं। जैसे ही हम कहते हैं, ये अच्छा है, इसे फिर चाहिए, सोच लौट आती है, और मौन खत्म हो जाता है।


पर ये क्षण एक इशारा हैं कि जीवन केवल सोच से नहीं बना। सोच जीवन का एक औज़ार है, मालिक नहीं। जब औज़ार मालिक बन जाता है, तब समस्या शुरू होती है।


विचार के पार कोई स्वर्ग नहीं, कोई अलौकिक अनुभव नहीं, बल्कि एक सादगी होती है। जिसमें कोई केंद्र नहीं होता, कोई विशेष व्यक्ति नहीं होता, कोई तुलना नहीं होती।


उस सादगी में डर को टिकने की जगह नहीं मिलती, क्योंकि डर भविष्य की कल्पना से बनता है। वहाँ संघर्ष नहीं होता, क्योंकि संघर्ष दो छवियों के टकराव से पैदा होता है।


बिना दीवारों की दुनिया:


अगर सोच की बनाई दीवारें ढीली पड़ें, तो दुनिया वैसी नहीं रहती जैसी हमें सिखाई गई है। तब कोई देश दुश्मन नहीं लगता, कोई धर्म श्रेष्ठ नहीं लगता, कोई विचार अंतिम सत्य नहीं लगता।


इसका अर्थ ये नहीं कि समाज खत्म हो जाएगा, या नियम टूट जाएंगे। इसका अर्थ बस इतना है कि भीतर का विभाजन कम हो जाएगा। और जब भीतर का विभाजन कम होता है, तो बाहर का भी असर बदलने लगता है।


हम अक्सर बड़ी क्रांतियों की बात करते हैं, व्यवस्था बदलने की, सत्ता पलटने की। पर शायद सबसे गहरी क्रांति ये है कि हम अपनी सोच को देखें, बिना उसे सजाए, बिना उसे बचाए।


ये देखना आसान नहीं, क्योंकि इसमें हमारी सारी सुरक्षा हिलती है। हमारी पहचान, हमारी श्रेष्ठता, हमारी शिकायतें, सब सवालों में आ जाती हैं।


पर इसी असहजता में एक नई तरह की शांति छिपी होती है। ऐसी शांति, जो किसी विचार पर टिकी नहीं, किसी उपलब्धि पर निर्भर नहीं, किसी तुलना से बनी नहीं।


और शायद इसी शांति में वो जीवन संभव है, जो स्पष्ट है, जो बोझ से हल्का है, जो किसी विचारधारा का प्रचार नहीं करता, बस खुद होकर जीता है।


जहाँ सोच होती है, पर राज नहीं करती।

जहाँ पहचान होती है, पर दीवार नहीं बनती।

जहाँ जीवन किसी सिद्धांत की परीक्षा नहीं, बल्कि एक खुली साँस की तरह घटता है।

नार्सिसिस्ट रिश्ते

 नार्सिसिस्ट रिश्ते

आपकी आत्मा को एक झटके में नहीं तोड़ते।

वे आपको धीरे-धीरे पहले आपके सर्कल, और फिर आपसे भी दूर कर देते हैं।


पहले आपकी हँसी बदलती है।

फिर आपकी पसंद।

फिर आपकी चुप्पी बढ़ने लगती है।


और एक दिन ऐसा आता है …

आप आईने में खुद को देखकर पूछती हैं -


“मैं असल में हूँ कौन?”

" मैं ऐसी तो नहीं थी "


यह प्रश्न सामान्य नहीं होता।

यह आपकी आत्मा की वह पुकार होती है

जिसे आपने किसी और को बचाने के लिए

खुद से ही दबा दिया होता है।


मनोविज्ञान इसे कहता है -

Identity Diffusion।


जब कोई स्त्री लंबे समय तक -


अपनी इच्छाओं को दबाती है


“ना” कहना भूल जाती है


हर टकराव से बचती है


हर गलती खुद पर ले लेती है


तो उसकी पहचान धुंधली होने लगती है।


धीरे-धीरे वह भूल जाती है -


“मैं क्या चाहती हूँ?”

और ये केवल जानती है कि -


“उसे क्या चाहिए?”


यहीं से आत्म-विस्मृति शुरू होती है।


सबसे बड़ा प्रश्न : आप निकल क्यों नहीं पातीं?


आप जानती हैं वह गलत है।

फिर भी आपका मन नहीं मानता।


क्यों?


क्योंकि यह रिश्ता

केवल भावनात्मक नहीं होता -

यह एक मानसिक सम्मोहन होता है।


मानव मन की प्रकृति : किसी विशेष चीज की प्राप्ति का आनंद 


कोई ऐसी चीज जो विशेष हो, उसकी प्राप्ति या उसका जीवन मे होना किसी भी मनुष्य को आनंद से भर देता है -


जैसे : -


किसी असाधारण व्यक्ति से प्रेम का मिलना 


विशेष मान्यता का मिलना 


“मैं खास हूँ” का एहसास 


अथवा किसी मूल्यवान वस्तु का स्वामित्व होना 


इनकी प्राप्ति के लिए मनुष्य अथक परिश्रम या कोई भी कीमत देने को, हर दुःख उठाने को तैयार हो जाता है। क्यूँ कि उस से प्राप्त आनंद (540Hz frequency) अतुलनीय होती है 


और एक Narcissist इतनी अच्छी ऐक्टिंग करता है, की वो एक स्त्री को उपरोक्त चारों अह्सास खुद के बारे मे करा देता है।


अब वह Narcissist केवल प्रेमी नही रहा, बल्कि उस स्त्री के लिए एक ऐसा अनमोल चीज हो जाता है जैसे कोई अनमोल "हीरा", जिसे दुनिया पहचान नही सकी और उसने हासिल कर लिया।


एक उदाहरण से उस स्त्री की मानसिक अवस्था को बेहतर समझ सकते हैं -


मान लीजिए किसी को

एक नकली हीरा मिल जाए।


जो देखने में बिल्कुल असली जैसा हो।


दस विशेषज्ञ कहें -

“यह नकली है।”


फिर भी वह व्यक्ति मानेगा नहीं।


क्यों?


क्योंकि उसका मन

पहले ही मान चुका है -


“मेरे पास कुछ बहुत कीमती है।”


"शायद बताने वाला ही मुझे गुमराह करना चाहता है" 


ठीक यही स्थिति

नार्सिसिस्ट रिश्ते में होती है। 


आपके सामने सच होता है -

लोग चेतावनी देते हैं -

संकेत मिलते हैं -

दर्द बढ़ता है -


फिर भी मन कहता है -


“नहीं… वह ऐसा नहीं हो सकता।”

"मेरा मन जानता है "

“वह अंदर से अच्छा है।”

“वह बदलेगा।”

“गलती मेरी है।”


वह मनुष्य एक स्त्री के नज़र में इतना अनमोल होता है कि, हज़ारों दर्द के बावजूद वो उसे खोना नहीं चाहती। बार बार Narcissist द्वारा अपमानित और प्रताड़ित होने के बाद भी उसका आकर्षण खत्म नही होता।


क्या करें?


ऐसी स्थिति से निकलने की पहली शर्त है भ्रम का टूटना।

जब तक भ्रम नहीं टूटता,

Healing शुरू ही नहीं होती।


सवाल खुद से पूछिए,


जिस रिश्ते को पाने में -


आपकी नींद चली गई


आत्म-सम्मान टूट गया


मानसिक शांति खत्म हो गई


आत्मविश्वास मर गया


आप खुद तिल तिल मर रही हैं 


ऐसे में यदि वो हीरा असली भी है, तो उस “हीरे” का आप करेंगी क्या? उसका उपयोग क्या है आपके जीवन मे?


क्या कोई चीज़

आपकी जान से ज्यादा कीमती है?


नहीं।


कभी नहीं।


निष्पक्ष दृष्टि रखें : सच्चाई का आईना


अब खुद से ईमानदारी से पूछिए 


अगर किसी रिश्ते में आपके हिस्से में -


केवल तनाव है


केवल डर है


केवल भ्रम है


केवल अकेलापन है


तो शायद वह प्रेम नहीं है।


वह केवल भावनात्मक शोषण है।


और सच्चाई यह है -


नार्सिसिस्ट आपको तब तक ही चाहता है

जब तक आपकी ऊर्जा बची है या कोई और विकल्प नहीं है।


जब आप खाली हो जाती हैं -

वह आपको ऐसे फेंक देता है

जैसे कोई इस्तेमाल किया हुआ काग़ज़। क्यूँ कि एक Narcissist बिना कोई मतलब किसी से सम्बन्ध रखता ही नहीं।

किसी ने उसे छोड़ा नहीं है, पर जो लोग उसे जानते हैं,

उन्हें अच्छे से पता होता है कि, ये इंसान भरोसे के लायक नहीं। आपने केवल एकतरफ़ा कहानियाँ उसके मुँह से सुनी हैं, जिसमें वो victim तथा पूरी दुनियाँ अत्याचारी और मतलबी है। 


कभी एक बार तो सोचें, कि "सारी दुनिया ही गलत कैसे हो सकती है?" कहीं ये इंसान ही तो गलत नहीं? और आपके साथ भी तो वही कर रहा है... कहीं ऐसा तो नही कि आप ही नकली हीरे के मोहपाश में बंधी हैं?


स्मरण रखिए : यदि आप किसी के लिए केवल विकल्प हैं तो उसका अर्थ केवल इतना ही है कि आपकी जरूरत स्थायी नहीं, अस्थायी है।


आप किसी की ज़रूरत पूरी करने की मशीन नहीं हैं।


आप किसी का प्रोजेक्ट नहीं हैं।


आप के जीवन का उद्देश्य किसी को सुधारने की ठेकेदारी नहीं हैं।


आप एक पूर्ण आत्मा हैं।


आपका अस्तित्व

किसी की स्वीकृति पर निर्भर नहीं।


यदि उपरोक्त बात आपको समझ आ जाए तो आप स्वयं की ओर लौटने लगती हैं।

मोह तत्क्षण खत्म हो जाता है ।


Healing का रास्ता कहीं बाहर नहीं, आपके ही भीतर है।


1️⃣ अपनी स्पष्ट आवाज़ वापस लाएँ

2️⃣ “ना” कहना सीखें

3️⃣ अपराधबोध छोड़ें

4️⃣ सीमाएँ बनाएँ

5️⃣ खुद को प्राथमिकता दें


शुरुआत कठिन होगी।

अकेलापन आएगा।

डर लगेगा।


लेकिन याद रखिए -


यह डर

गुलामी से बेहतर है।


याद रखें : 

यह अनुभव

आपको कमज़ोर बनाने नहीं आया।


यह आपको

जगाने आया है।


आप अब वही नहीं रहेंगी

जो चुप रहती थी।


आप अब वह बनेंगी

जो खुद के लिए खड़ी होती है।


और जब आप खुद को चुन लेंगी 


तो पाएँगी नाहक ही आपने एक भ्रम के पीछे अपने जीवन के कीमती क्षणों को व्यर्थ कर दिया।

बिखरी हुई ऊर्जा का एक हो जाना

 "ध्यान' बिखरी हुई ऊर्जा का एक हो जाना"


ध्यान किसी विशेष आसन में बैठने का नाम नहीं है,

न ही यह केवल आँखें बंद करने की प्रक्रिया है।


ध्यान का वास्तविक अर्थ है 

हमारी बिखरी हुई ऊर्जाओं को कोमलता से एक दिशा में प्रवाहित करना।


मनुष्य के भीतर अनेक प्रकार की ऊर्जाएँ होती हैं...

इन्द्रियों की ऊर्जा, जो देखती, सुनती और अनुभव करती है


मन की ऊर्जा, जो सोचती, कल्पना करती और चिंतित होती है


शरीर की ऊर्जा, जो कर्म करती और क्रिया में लगी रहती है


सामान्य जीवन में ये तीनों एक साथ नहीं होते।

शरीर यहाँ होता है, मन कहीं और भटक रहा होता है,

इन्द्रियाँ बाहरी दुनिया में उलझी रहती हैं।


यही अवस्था अधूरापन है।

और इसी अधूरेपन से जीवन की अधिकांश समस्याएँ जन्म लेती हैं।


ध्यान = इन्द्रियाँ, मन और शरीर का एक सूत्र में बंध जाना


जब हम ध्यान का अभ्यास करते हैं,

तो हम इन बिखरी ऊर्जाओं को धीरे-धीरे एक साथ लाना सीखते हैं।


इन्द्रियाँ वर्तमान क्षण में टिकने लगती हैं


मन विचारों की भीड़ से बाहर आने लगता है


शरीर स्थिर और सहज हो जाता है


अब ये तीनों अलग-अलग दिशाओं में नहीं बहते,

बल्कि एक ही प्रवाह में चलने लगते हैं।


जैसे दीपक जलाते समय 

अगर हाथ काँप रहा हो,

मन कहीं और उलझा हो,

और आँख ध्यान से न देख रही हो,

तो दीपक बार-बार बुझ जाएगा।


लेकिन जब हाथ, आँख और मन 

तीनों एक साथ उसी क्रिया में उपस्थित हों,

तो दीपक सहजता से जल उठता है।


यही ध्यान है।


"जब ध्यान अधूरा होता है"


अक्सर ऐसा होता है कि व्यक्ति ध्यान तो करता है,

लेकिन उसकी ऊर्जा अभी भी बिखरी रहती है।


शरीर बैठा है


मन भविष्य या अतीत में घूम रहा है


इन्द्रियाँ ध्वनियों और विचारों में फँसी हैं


यह कोई असफलता नहीं है,

यह केवल अभ्यास की अवस्था है।


क्योंकि ध्यान में जब तक हम पूरे नहीं होते,

तब तक ध्यान भी पूरा नहीं होता।


और जब ध्यान अधूरा रहता है,

तो जीवन के काम भी अधूरेपन के साथ होने लगते हैं।


"बिखरी ऊर्जा का प्रभाव जीवन पर"


जब हमारी ऊर्जा एक जगह केंद्रित नहीं होती 


काम में बार-बार रुकावट आती है


निर्णय लेने में असमंजस रहता है


मन में अविश्वास पैदा होता है


हम खुद पर शक करने लगते हैं


ऐसा इसलिए नहीं कि हम कमजोर हैं,

बल्कि इसलिए कि हमारी शक्ति बिखरी हुई है।


जैसे पानी अगर फैल जाए तो

वह ज़मीन को भिगो देता है,

लेकिन अगर वही पानी एक धार में बहने लगे,

तो पत्थर भी काट सकता है।


"ध्यान और दैनिक जीवन"


दैनिक जीवन में हम अधिकांश काम

आधे मन से करते हैं।


खाते समय मोबाइल देखना


चलते समय सोच में डूबे रहना


बात करते समय जवाब पहले से तय कर लेना


ध्यान सिखाता है......जो कर रहे हो, पूरे होकर वही करो।


जब आप चाय पीते समय

उसकी गर्माहट, खुशबू और स्वाद को पूरी तरह महसूस करते हैं,

तो वही साधारण क्रिया भी ध्यान बन जाती है।


यहीं से जीवन में

शांति, संतुलन और सहजता आने लगती है।


"ध्यान और काम (कर्म)"


काम में थकान अक्सर मेहनत से नहीं,

मन के बिखराव से आती है।


मन परिणाम से डरता है


शरीर बोझ महसूस करता है


ध्यान भविष्य में अटका रहता है


ध्यान हमें सिखाता है ....अभी के काम में पूरी तरह उतर जाना।


जैसे किसान बीज बोते समय

फल की चिंता नहीं करता,

वह बस मिट्टी, बीज और अपने हाथों में उपस्थित रहता है।


जब मन, शरीर और इन्द्रियाँ

एक ही काम में जुड़ जाते हैं,

तो काम बोझ नहीं,

साधना बन जाता है।


"ध्यान और संबंध"


संबंधों में दुख का सबसे बड़ा कारण है 

अनुपस्थिति।


सामने वाला बोल रहा होता है


हम सुन नहीं रहे होते


मन पुराने अनुभवों में उलझा होता है


ध्यान सिखाता है ....

सुनना, पूरे मन से।


जब आप किसी को

बिना टोके, बिना निर्णय बनाए सुनते हैं,

तो सामने वाला स्वयं को

सम्मानित और स्वीकार किया हुआ महसूस करता है।


यहीं से


करुणा जन्म लेती है


टकराव कम होते हैं


संबंध गहरे होते हैं


"ध्यान और रचनात्मकता"


रचनात्मकता ज़बरदस्ती नहीं आती।

वह तब आती है जब भीतर प्रवाह होता है।


लेखक, कलाकार या संगीतकार —

जब पूरी तरह अपने काम में डूब जाता है,

तो समय का भान भी नहीं रहता।


यह वही अवस्था है

जहाँ ऊर्जा एक दिशा में बह रही होती है।


ध्यान रचनात्मकता पैदा नहीं करता,

ध्यान सिर्फ रास्ता साफ करता है,

ताकि रचना स्वयं जन्म ले सके।


"जब सारी ऊर्जा एक दिशा में बहती है"


ध्यान के माध्यम से

जब इन्द्रियाँ, मन और शरीर

एक ही प्रवाह में बहने लगते हैं,

तो इंसान उस क्षण रचने लगता है।


अब उसे ज़ोर नहीं लगाना पड़ता,

अब वह जान जाता है 

ऊर्जा को किस दिशा में ले जाना है।


और जब इंसान यह जान जाता है,

तो उसका जीवन भी सधा हुआ हो जाता है।


"ध्यान का सार"


ध्यान हमें कुछ नया नहीं देता।

ध्यान हमें पूरा बनाता है।


और जब इंसान पूरा होता है 


उसका काम स्पष्ट होता है


उसके संबंध गहरे होते हैं


उसकी रचना सच्ची होती है


और उसका जीवन सहज रूप से बहने लगता है


यही ध्यान की वास्तविक साधना है 

शरीर नौ चक्र

शरीर नौ चक्र


कुण्डलिनी चक्र एक आध्यात्मिक अवधारणा है जिसमें शरीर की आधार (मूलाधार) में सोई हुई दिव्य ऊर्जा (कुण्डलिनी) को योग और ध्यान के माध्यम से जगाया जाता है, जो फिर रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ सात मुख्य चक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, सहस्रार) से होकर गुजरती है, जिससे गहन आध्यात्मिक अनुभव और चेतना का विस्तार होता है। यह एक शक्तिशाली प्रक्रिया है जिसे अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन में सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि इसके जागृत होने पर शारीरिक और मानसिक बदलाव आते हैं। मनुष्य शरीर में उपलब्ध इन चक्रों पर ध्यान टिकाने से असीम मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्तियाँ आ जाती हैं मानव शरीर में पाँच कर्म इंद्रियाँ, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ व चार सूक्षम इंद्रियाँ भी हैं।


जो इस प्रकार हैं। कर्म इंद्रियाँ - मुंह, हाथ, पैर, गुदा, लिंग । ज्ञानेंद्रियाँ - कान, मुंह, त्वचा, आंख, नाक । सूक्ष्म इंद्रियाँ - मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार । मन का निवास सुषमना नाड़ी में है । यह नाड़ी नाक के दोनों छिद्रों की नाड़ियों इडा तथा पिंगला के बीच की नाड़ी होती है। मन इसी सुषमना नाड़ी में बैठकर मस्तिष्क को आदेश देता है । यही मन इस नाशवान संसार की हर गतिविधि को नियंत्रित करता है।वहीं, कुंडलिनी जागरण में, कुंडलिनी शक्ति होती है, जो कि एक आध्यात्मिक ऊर्जा है और उसे ही जागृत किया जाता है। यह शक्ति मानव शरीर के मूलाधार चक्र में सुप्त अवस्था में मानी जाती है। कुंडलिनी एक ऐसी शक्ति है, जो एक कुंडली मारकर बैठे हुए सर्प की भांति शरीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार में स्थित होती है। निरंतर ध्यान, योग और आत्म-संयम इत्यादि की मदद से जब यह जाग्रत होने लगती है, तो साधक को ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे कोई सर्पिलाकार तरंग घूमती हुई ऊपर की ओर उठ रही है। 


हमारे शरीर में सात चक्रों में से कुंडलिनी का एक छोर मूलाधार चक्र पर स्थित होता है।और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ लिपटा हुआ जब ऊपर की ओर गति करता है, तो उसका उद्देश्य सभी चक्रों को सक्रिय करते हुए सातवें चक्र सहस्रार तक पहुंचना होता है। जिस भी व्यक्ति का कुण्डलिनी जागरण होता है, तो आप कह सकते हैं कि उसके शरीर में एक प्रकार से ऊर्जा का विस्फोट होता है।


कुण्डलिनी जागरण एक खतरनाक लेकिन दिव्य प्रक्रिया है। अगर वह व्यक्ति उस ऊर्जा को संतुलित नहीं कर पाया, तो वह पागल भी हो सकता है या उसकी मृत्यु भी हो सकती है। लेकिन अगर वह इसे संतुलित कर लेता है, तो उसकी तीसरी आँख जागृत हो जाती है, उसकी आध्यात्मिक जागरूकता और अंतर्दृष्टि बढ़ती है और वह सांसारिक भौतिक सुखों के पीछे भागना बंद कर देता है। कुण्डलिनी हमेशा के लिए जागृत नहीं होती बल्कि जब तक व्यक्ति संयम और ध्यान करता है, तब तक इसे नियंत्रित रख पाता है लेकिन अगर जागरण के बीच में अगर वह साधना छोड़ देता है, तो यह सर्प गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है।


तत्त्व विज्ञान को अनुसार ये नौ ऊर्जा बिन्दु ही प्रमुख है इनकी संरचना भी परमाणु जैसी ही होती है और ये क्रिया भी नाभिक की ही भाँति करते है ये नाभिक की ऊर्जा से आविशित होते रहते है।और उसी प्रकार से ऊर्जा उत्सर्जन करते है नौ ऊर्जा बिन्दु को जिनमे केवल एक नाभिक मुख्य होता है, शेष सह नाभिक योग साधना मे नौ निधि कहा जाता है।इन नौ से बने आठ ऊर्जा क्षेत्रों की सिद्धि को अष्ट सिद्धि कहा जाता है तंत्र विधा मे इन्ही को शक्ति को नौ रूपों मे सिद्ध किया जाता है और शून्य को मिलाकर ये ही दसमहाविधाएं है। 


और मनुष्य से शरीर के ऊर्जा चक्र भी वही है जो ब्रह्माण्ड या परमाणु का है।इसलिए तंत्र, योग,आदि साधनाओं मे अपने शरीर के इन्हीं ऊर्जा बिन्दूओ की सिद्धि की जाती है ये सिद्धि क्या है और कैसे प्राप्त की जाती है ।आवश्यक यह है कि इस ऊर्जा संरचना के वैज्ञानिक स्वरूप को समझा जाये।


इस सृष्टि मे जहां कहीं भी ऊर्जा का उत्सर्जन होता है वह इसी प्रकार के नाभिकों से होता है और यह निरन्तर प्रवाहित नही होती है, अपितु इसकी बौछार फव्वारे की तरह होती रहती है वैसे ही जैसे कोई पम्प से फुहार फेकता हो एक विस्फोट को बाद दुसरे विस्फोट से मध्य मे निष्क्रियता रहती है।


इसी तरह ब्रह्माण्ड मे जितनी भी ऊर्जा तरंगें गमन करती है या उत्सर्जित होती है उनमे धड़कन होती है यह धड़कन ही किसी इकाई को जीवित रखती है इस स्वचालित धड़कन का कारण धन और ऋण अर्द्धचन्द्राकार गड्ढे मे पडने वाले मूलतत्त्व का दबाव है।


ऊर्जा परिपथ मे शून्य को नीचे का बिन्दु शून्य को घेरे रहता है इसे शिव कहा जाता है और इस बिन्दु को शैवमार्ग मे शिव कि अर्द्धांगिनी मानाजाता है शिव शून्य परम तत्त्व का ही अंश समझा जाता है नीचे के आठ चक्र बिन्दु को आठ शिवलिंग माना जाता है इन शिवलिगों से ऊर्जा यानि शक्ति की फुहार निकलती है जिनकी प्रकृति भिन्न भिन्न प्रकार की होती है

बीमारी की शुरुआत कहाँ से होती है?

 Chronic illness - एक बीमारी कितने साल तक पीछा कर सकती है? अक्सर जब किसी से पूछा जाए कि एक बीमारी इंसान को कितने समय तक परेशान कर सकती है, तो जवाब आता है-दो महीने, छह महीने, एक साल या ज़्यादा से ज़्यादा पाँच साल।


लेकिन हकीकत यह है कि अगर बीमारी की जड़ पर काम न हो, तो वही समस्या 15–20 साल या उससे भी ज़्यादा समय तक इंसान की ज़िंदगी को जकड़े रख सकती है।


बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो सालों तक अलग-अलग इलाज कराते रहते हैं, रिपोर्ट्स करवाते रहते हैं, दवाइयाँ बदलते रहते हैं—लेकिन असली राहत नहीं मिलती।


बीमारी की शुरुआत कहाँ से होती है?

अधिकांश लंबे समय तक चलने वाली समस्याएँ अचानक नहीं आतीं।

इनकी शुरुआत धीरे-धीरे होती है और अक्सर पाचन तंत्र (Digestive system) से शुरू होती है।


आमतौर पर क्रम कुछ ऐसा होता है:


पहले कब्ज (Constipation)

फिर धीरे-धीरे एलर्जी, सर्दी-जुकाम, राइनाइटिस

उसके बाद भूख कम लगना

फिर कभी लूज़ मोशन, कभी अनियमित मल

आगे चलकर पेट में जलन, सीने में जलन, गैस

साथ में नाक-गले से कफ, तालू में खुजली, छींक

और समय के साथ यूरिन, मोशन, सीने तक जलन का एहसास

यानी समस्या पेट से शुरू होकर पूरे शरीर में फैल जाती है।


क्यों नॉर्मल रिपोर्ट के बावजूद तकलीफ बनी रहती है?

कई लोग बड़े-बड़े अस्पतालों में जाते हैं,

एंडोस्कोपी, कोलोनोस्कोपी, CT स्कैन, अल्ट्रासाउंड—सब कराते हैं।


रिपोर्ट्स आती हैं:


“सब नॉर्मल है”

लेकिन तकलीफ नॉर्मल नहीं होती।


ऐसा इसलिए क्योंकि:


जाँच में संरचना (Structure) दिखती है

लेकिन कार्यप्रणाली (Function) का असंतुलन नहीं दिखता


आयुर्वेद इसी फंक्शनल गड़बड़ी को पकड़ता है।


आयुर्वेद के अनुसार असली गड़बड़ी क्या होती है?

आयुर्वेद के नजरिए से देखें तो ऐसे लंबे समय तक चलने वाले मामलों में आमतौर पर:


अपान वायु बिगड़ चुकी होती है

कफ शरीर में जमा होता जाता है

अग्नि (Digestive fire) कमजोर हो जाती है

शरीर अंदर से सूखा होता है, बाहर से कफ भरा लगता है


इसी वजह से:


एलर्जी बार-बार होती है

कफ साफ नहीं होता

जलन बनी रहती है

वजन नहीं बढ़ता

दवाइयों का असर टिकता नहीं


सिर्फ दवा क्यों काफी नहीं होती?

जब बीमारी 10–15–20 साल पुरानी हो, तो सिर्फ गोली या काढ़ा काफी नहीं होता।

ऐसे मामलों में आयुर्वेद कहता है:


“पहले शरीर से जमा हुआ दोष निकालो, फिर पोषण दो।”


अगर कफ शरीर में भरा पड़ा है और उसे निकाले बिना सिर्फ टॉनिक या दवा दी जाए, तो फायदा नहीं होता।


शोधन चिकित्सा का रोल

लंबे समय से चली आ रही समस्याओं में शोधन (Detoxification) बहुत अहम हो जाता है।


शोधन का मतलब:


शरीर में जमा दोष को बाहर निकालना

अग्नि को फिर से जगाना

चैनल्स को साफ करना


इसमें प्रमुख तौर पर:


वमन – जब कफ प्रधान समस्या हो

बस्ती – जब वात ज्यादा बिगड़ा हो


डर की बात यह नहीं है कि शोधन होगा या नहीं,

असल सवाल यह है कि:


क्या सही तरीके से, सही व्यक्ति में, सही तैयारी के साथ किया जा रहा है या नहीं?


दुबले-पतले लोग और शोधन का डर

एक आम डर यह भी होता है कि:


“मैं दुबला हूँ, कमजोर हूँ, मेरा शोधन कैसे होगा?”


आयुर्वेद साफ कहता है:


अगर अग्नि तैयार की जाए

अगर बल धीरे-धीरे बढ़ाया जाए

और सही क्रम अपनाया जाए

तो दुबले से दुबले व्यक्ति का भी शोधन सुरक्षित रूप से हो सकता है।


बीमार व्यक्ति का शोधन मौसम से बंधा नहीं होता,

ऋतु अनुसार शोधन स्वस्थ व्यक्ति के लिए होता है।


शोधन के बाद क्या बदलाव आते हैं?

जब सही तरीके से कफ बाहर निकलता है और वात को संतुलित किया जाता है, तो लोग अक्सर बताते हैं:


शरीर हल्का लगने लगता है

जलन में तेजी से कमी

भूख वापस आने लगती है

नाक-गले का कफ साफ

एलर्जी के अटैक कम

एसी, ठंड, मौसम से डर कम

एनर्जी लेवल बेहतर


यहीं से असली रिकवरी की जर्नी शुरू होती है।


बस्ती का लॉन्ग-टर्म रोल

जहाँ बीमारी की जड़ वात में हो, वहाँ बस्ती सबसे असरदार इलाज माना गया है।


नियमित बस्ती से:


अपान वायु सुधरती है

मल-मूत्र की जलन कम होती है

गैस और ब्लोटिंग कंट्रोल में आती है

एलर्जी की फ्रीक्वेंसी घटती है


इसीलिए कई मामलों में बस्ती को लंबे समय तक अपनाने की सलाह दी जाती है।


घर पर क्या करें? 

यह बातें उन लोगों के लिए हैं जिन्हें

गले में जलन/दर्द, एसिड रिफ्लक्स, कफ, एलर्जी, भारीपन या सालों पुरानी पाचन की दिक्कत रहती है।


यह इलाज का विकल्प नहीं, बल्कि इलाज को काम करने लायक बनाने की ज़मीन है।


1. सुबह की शुरुआत कैसे करें

उठते ही

गुनगुना पानी 1–2 गिलास

रात का जमा कफ ढीला करता है

अपान वायु को मूवमेंट देता है


अगर जलन ज्यादा रहती है:

गुनगुने पानी में

½ चम्मच सौंफ या धनिया पानी (रात में भिगोया हुआ)


2. अग्नि सुधार – सबसे ज़रूरी काम

अगर पाचन ठीक नहीं होगा, तो:


एसिड बनेगा

कफ ऊपर जाएगा

गला बार-बार खराब होगा


खाने से पहले (दिन में 1–2 बार)

अदरक का छोटा टुकड़ा + 1 चुटकी सेंधा नमक


बहुत जलन हो - अदरक न लें

या

जीरा + धनिया + सौंफ (बराबर मात्रा)

उबालकर गुनगुना पानी पिएँ


यह अग्नि को शांत तरीके से सुधारता है, भड़काता नहीं।


3. गले की जलन / दर्द के लिए

 दिन में 2 बार

मुलेठी (Yashtimadhu) ½ चम्मच पाउडर

गुनगुने पानी या शहद के साथ

डायबिटीज़ हो तो शहद न लें


 मुलेठी:


पित्त को शांत करती है

गले की परत को heal करती है

एसिड की जलन कम करती है


गरारे

गुनगुना पानी + चुटकी हल्दी + चुटकी सेंधा नमक

रात को खासतौर पर फायदेमंद


4. कफ और एसिड साथ में हो तो

यह कॉम्बिनेशन बहुत आम है।


सुबह या शाम

त्रिफला चूर्ण ½ चम्मच

गुनगुने पानी के साथ (रात में बेहतर)


इससे:


मल साफ होता है

कफ नीचे की ओर मूव होता है

एसिड ऊपर नहीं चढ़ता


5. खाने का तरीका 

क्या करें

खाना गर्म, ताज़ा और सिंपल

दिन में 2–3 बार ही ठीक से खाएँ

बहुत देर तक भूखे न रहें


क्या कम करें

खट्टा, बहुत तीखा, तला हुआ

रात में दही, छाछ

बिस्कुट, नमकीन, बेकरी

चाय-कॉफी (खासकर खाली पेट)


क्या बेहतर रहता है

मूंग दाल

लौकी, तोरी, गाजर, टिंडा

चावल कम मात्रा में

रोटी सीमित

घी 1–2 चम्मच (डरें नहीं)


6. खाने के बाद क्या न करें

खाने के तुरंत बाद लेटना नहीं

पानी बहुत ज़्यादा नहीं

मोबाइल पर झुककर बैठना नहीं


खाने के बाद

5–10 मिनट टहलना

यह छोटी आदत एसिड रिफ्लक्स आधा कर देती है।


7. साँस और मन का रोल 

पित्त और एसिड सिर्फ पेट की नहीं,

नर्वस सिस्टम की भी समस्या है।


रोज़ 10 मिनट

अनुलोम-विलोम

भ्रामरी (गुनगुनाहट वाली)


इससे:


एसिड का ओवरफ्लो कम

गले की जकड़न ढीली

नींद बेहतर


8. सबसे बड़ी गलती जो लोग करते हैं

“दवा खा ली, अब सब चल जाएगा”

“कभी ठीक, कभी खराब—चलता है”


लेकिन याद रखें:


जो बीमारी सालों में बनी है,

वो कुछ हफ्तों में नहीं जाएगी।


घर की ये आदतें:


दवा का असर बढ़ाती हैं

शोधन के लिए शरीर तैयार करती हैं

और relapse से बचाती हैं


आख़िरी बात (बहुत ज़रूरी)

अगर:


जलन रोज़ है

वजन गिर रहा है

रात में नींद टूटती है

दवाइयों से भी आराम नहीं


तो सिर्फ घरेलू उपायों पर न रुकें।

किसी अनुभवी आयुर्वेदिक वैद्य से सही मूल्यांकन ज़रूरी है।


लेकिन

घर पर ये सब करना शुरू कर देंगे,

तो आधी लड़ाई वहीं जीत लेंगे।


आयुर्वेद से डर या भरोसा?

बहुत लोगों को डराया जाता है:


“आयुर्वेद से किडनी खराब हो जाएगी”

“लीवर खराब हो जाएगा”

“आप बहुत कमजोर हैं”


लेकिन सच्चाई यह है:


गलत हाथों में कोई भी चिकित्सा नुकसान कर सकती है,

और सही हाथों में आयुर्वेद शरीर को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखता है।


आख़िरी बात

जो समस्याएँ सालों से चली आ रही हैं,

उनका समाधान भी धैर्य, अनुशासन और सही दिशा से ही आता है।


आयुर्वेद कोई जादू नहीं,

लेकिन अगर सही समझ के साथ अपनाया जाए,

तो वह शरीर को दोबारा बैलेंस में लाने की ताकत ज़रूर रखता है।


बीमारी ठीक होने में समय लगे-यह स्वीकार्य है,

लेकिन ठीक हो सकती है, यह भरोसा सबसे ज़रूरी है।

कलेश और हीलिंग

 कलेश और हीलिंग


1. जब रिश्ता सहज होता है


जब पति-पत्नी के बीच सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तब जीवन में एक स्वाभाविक शांति होती है।

बातें सहज होती हैं, चुप्पी भी बोझ नहीं बनती।

एक-दूसरे की मौजूदगी ही काफी लगती है।


यह स्थिति इसलिए बनती है क्योंकि:


दोनों सुने जाने का अनुभव करते हैं


भावनाएँ दबाई नहीं जातीं


अपेक्षाएँ स्पष्ट या सीमित होती हैं


अहंकार रिश्ते से बड़ा नहीं होता


पर यह स्थिति स्थायी नहीं रहती, क्योंकि मन स्थिर नहीं होता।


2. तनाव की शुरुआत: छोटे कारण, गहरी जड़ें


तनाव अक्सर किसी बड़े झगड़े से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी उपेक्षाओं से शुरू होता है।


बाहरी कारण (जो दिखते हैं):


समय न देना


मोबाइल / काम / परिवार को प्राथमिकता देना


बातों को टालना


शारीरिक या भावनात्मक दूरी


तुलना (माँ, बहन, दोस्त, पूर्व संबंध)


अदृश्य कारण (जो नहीं दिखते):


मान्यता की कमी


 “मेरी अहमियत नहीं रही”


असुरक्षा


“क्या मैं अब पर्याप्त नहीं हूँ?”


अधूरी अपेक्षाएँ

जो कभी कही ही नहीं गईं


बीते घाव

जो पहले कभी भरे ही नहीं


अहं का टकराव

“मैं क्यों झुकूँ?”


यहीं से तनाव अंदर ही अंदर जमने लगता है जैसे ज़मीन के नीचे दबा लावा।


3. जब तनाव हद से बढ़ता है: कलेश की उत्पत्ति


जब दबा हुआ भाव बाहर निकलता है, तो वह संवाद नहीं होता वह विस्फोट होता है।


कलेश के गहरे कारण:


1. भावनात्मक भूख

स्त्री को समझा जाना चाहिए

पुरुष को सम्मान चाहिए

दोनों को प्यार चाहिए

लेकिन मांगने की भाषा नहीं आती


2. पुरानी स्मृतियाँ

वर्तमान झगड़े में अतीत भी शामिल हो जाता है


 “तुम हमेशा…”

“पहले भी ऐसा ही था…”


3. असहायता की भावना

जब लगता है कुछ बदल नहीं रहा

तब गुस्सा आख़िरी हथियार बन जाता है


4. मैं बनाम तुम

रिश्ता “हम” से हटकर “मैं सही, तुम गलत” हो जाता है


4. कलेश के संकेत (बहुत सूक्ष्म लेकिन गहरे)


कलेश सिर्फ चिल्लाने से नहीं दिखता।


सूक्ष्म संकेत:


चुप्पी का भारी हो जाना


सामने होते हुए भी अनुपस्थिति


व्यंग्य, ताने


बातों में कटुता


स्पर्श की कमी


एक-दूसरे की खुशी से दूरी


“जो करना है करो” वाली मानसिकता


जब ये संकेत लगातार हों तो समझिए कलेश भीतर जड़ पकड़ चुका है।


5. उस वक़्त क्या करना चाहिए (सबसे कठिन लेकिन ज़रूरी)


1. प्रतिक्रिया नहीं, ठहराव


झगड़े के बीच तुरंत समाधान नहीं होता

पहले मन को शांत करना ज़रूरी है


2. दोष नहीं, भाव बोलना


“तुम ऐसे हो”..... नहीं 

 “मुझे ऐसा महसूस होता है”.... हाँ 


3. सही समय चुनना


गुस्से में नहीं.....शांति में बात करें


4. जीत नहीं, जुड़ाव चुनें


रिश्ता जीतने से ज़्यादा बचाने की चीज़ है


6. हीलिंग की प्रक्रिया: भीतर से बाहर


हीलिंग का मतलब सिर्फ माफ करना नहीं 

हीलिंग का मतलब है खुद से मिलना।


7. ध्यान गहरी हीलिंग के लिए


ध्यान का उद्देश्य


अपने भीतर के दर्द को देखना


प्रतिक्रिया की जगह साक्षी बनना


मन की गांठों को ढीला करना


ध्यान अभ्यास (गहरा उदाहरण)


स्थान:

शांत जगह, अकेले

रीढ़ सीधी, आँखें बंद


श्वास पर ध्यान:

धीमी सांस लें

छोड़ते समय महसूस करें...बोझ निकल रहा है


अब मन में देखें:

अपने साथी को सामने बैठे देखें

कुछ मत कहें

बस देखें....बिना जजमेंट


अब खुद से पूछें (मन में):


मुझे सबसे ज़्यादा दर्द किस बात ने दिया?


मैं क्या चाहता/चाहती था जो मिला नहीं?


भाव आएँगे.... रोना, गुस्सा, खालीपन

उन्हें रोकें नहीं


फिर मन में कहें:

 “मैं तुम्हें नहीं, अपने दर्द को छोड़ रहा/रही हूँ”


कुछ देर बाद दोनों को प्रकाश में ढकते हुए कल्पना करें

यह प्रकाश स्वीकृति और करुणा का है


धीरे-धीरे आँख खोलें


8. स्त्री-पुरुष की मानसिक परतें 


स्त्री अधिक भावनात्मक सुरक्षा चाहती है


पुरुष अधिक स्वीकार्यता और सम्मान


दोनों अपने-अपने तरीके से प्रेम मांगते हैं


समस्या प्रेम की कमी नहीं भाषा की भिन्नता है


कलेश दुश्मन नहीं है

वह संकेत है कुछ सुना नहीं गया

कुछ समझा नहीं गया


और हीलिंग कोई जादू नहीं

वह रोज़-रोज़ चुना गया सच, धैर्य और आत्म-जागरूकता है।

संत कबीरदास के अनुसार

संत कबीरदास के अनुसार साधना की शुरुआत 


1-कामी क्रोधी लालची , इनते भक्ति ना होय ।

भक्ति करै कोई सूरमा , जादि बरन कुल खोय । 


अर्थ:-

विषय वासना में लिप्त रहने वाले, क्रोधी स्वभाव वाले तथा लालची प्रवृति के प्राणियों से भक्ति नहीं होती । धन संग्रह करना, दान पूण्य न करना ये तत्व भक्ति से दूर ले जाते है । भक्ति वही कर सकता है जो अपने कुल , परिवार जाति तथा अहंकार का त्याग करके पूर्ण श्रद्धा एवम् विश्वास से कोई पुरुषार्थी ही कर सकता है । हर किसी के लिए संभव नहीं है ।


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2-रहना नहिं देस बिराना है।यह संसार कागद की पुडिया, बूँद पडे गलि जाना है।


यह संसार काँटे की बाडी, उलझ पुलझ मरि जाना है॥


यह संसार झाड और झाँखर आग लगे बरि जाना है। 

कहत कबीर सुनो भै साधु , सतगुरू नाम ठिकाना हैं l


3-परारब्ध पहिले बना , पीछे बना शरीर ।

कबीर अचम्भा है यही , मन नहिं बांधे धीर ।


अर्थ:-

कबीर दास जी मानव को सचेत करते हुए कहते है कि प्रारब्ध की रचना पहले हुई उसके बाद शरीर बना । यही आश्चर्य होता है कि यह सब जानकर भी मन का धैर्य नहीं बंधता अर्थात कर्म फल से आशंकित रहता है ।


4-जंत्र मंत्र सब झूठ है, मति भरमो जग कोय ।

सार शब्द जाने बिना, कागा हंस न होय ।।


अर्थ:-

जंत्र मंत्र का आडम्बर सब झूठ है, इसके चक्कर में पडकर अपना जीवन व्यर्थ न गँवाये । गूढ ज्ञान के बिना कौवा कदापि हंस नहीं बन सकता ।अर्थात दुर्गुण से परिपूर्ण आज्ञानी लोग कभी ज्ञानवान नहीं बन सकते ।


5-माला फेरत युग गया, मिटा ना मन का फेर ।

कर का मनका डारि दे, मन का मनका फेर ।।


अर्थ:-

हाथ में माला लेकर फेरते हुए युग व्यतीत हो गया फिर भी मन की चंचलता और संसारिक विषय रुपी मोह भंग नहीं हुआ । कबीर दास जी संसारिक प्राणियों को चेतावनी देते हुए कहते है- हे अज्ञानियों हाथ में जो माला लेकर फिरा रहे हो, उसे फेंक कर सर्वप्रथम अपने हृदय की शुध्द करो और एकाग्र चित्त होकार प्रभु का ध्यान करो ।


6-दस द्वारे का पींजरा, तामे पंछी मौन ।

रहे को अचरज भयै, गये अचम्भा कौन ।।


अर्थ:-


1-इस दस द्वारों शरीर में जो प्राण रुपी वायु है जिसके रहने से शरीर चलता फिरता है बातचीत करता है, आहार विहार करता है तथा संसार की सभी सुखों का उपभोग करता है। वह प्राणरूपी वायु शरीर के दस द्वारों में से किसी भी द्वार से निकल सकता है । इसमें कोई आश्चर्य की बात नहीं है ।


2-शास्त्रों के अनुसार देह के नौ द्वार मानें गये हैं जो कि मृत्यु के समय शरीर के अन्दर रहनेवाले जीव के निर्गमन के लिए प्राकृतिक रूप से खुले रहते हैं। इनमें से सात द्वार दोनों आँखें, दोनों कान, नाक के दोनों नथुने और मुँह सिर में स्थित रहते हैं जिनसे पुण्यात्मा या सामान्य स्तर की पुण्यात्माओं के जीव निर्गमन करते हैं। मूत्रेन्द्रिय और उपस्थि(मलोत्सर्जन की इन्द्रिय) नीचे के द्वार हैं जिनसे पापियों के जीव निकलते हैं। इनसे भिन्न ब्रह्मरन्ध्र का द्वार है जो प्राकृतिक रूप से बन्द रहता है और योगसाधना (विशेष रूप से प्राणायाम व ध्यान) द्वारा खोला जाता है। यदि जीव इस द्वार से होकर शरीरत्याग करता है तो वह मुक्त हो जाता है और उसका पुनर्जन्म नहीं होता। इसी द्वार को दसवाँ द्वार कहा गया है।


3-दशम द्वार से निष्क्रमण की दशा में सामान्य निष्क्रमण की दशा की अपेक्षा शरीर के अत्यधिक सूक्ष्म अंश का निर्गमन होता है। सुषुम्णा के अन्दर वज्रनाडी है। वज्रनाडी के अन्दर चित्रनाडी है और चित्रनाडी के अन्दर ब्रह्मनाडी है। ब्रह्मनाडी के निचले सिरे पर मूलाधार चक्र है और ऊपर सबसे अन्त में ब्रह्मरन्ध्र का द्वार है। इसी ब्रह्मनाडी के रास्ते से जाकर जीव ब्रह्मरन्ध्र के द्वार से निकल पाता है। यह कहा जा सकता है कि जब सुषुम्णा तक को आधुनिक यन्त्रों तक से देखा नहीं जा सकता तो ब्रह्मनाडी और उसके अन्दर विचरण करनेवाले जीव की सूक्ष्मता की कल्पना ही की जा सकती है।


7-पांचतत्व का पूतरा, मानुष धरिया नाम ।

दिन चार के कारने , फिर फिर रोके ठाम ।।


अर्थ:-

पृथ्वी, जल, वायु, अग्नी और आकाश तत्व से मिलकर बने ढाँचे को ‘मनुष्य’ नाम रख दिया । चार दिन के क्षणिक सुख विलास में लिप्त होकर जीव ने अपने मोक्ष का द्वार बन्द कर लिया ।


8-भाला तो कर में फिरै, जीभ फिरै मुख मांहि ।

मनवा तो चहु दिश फिरै, यह तो सुमिर न नांहि ।।


अर्थ:-

हाथ में माला फिर रही है और मुंह के बीच में जीभ फिर रही है तथा चंचल मन स्वच्छन्द रूप से चारों दिशाओ में घूम रहा है। फिर यह सुमिरन कहॅा हुआ ।यह तो सुमिरन करने का दिखावा है ।जब तक मन शान्त और एकाग्र नहीं होता तब तक सुमिरन संभव नहीं है ।


9-जिन ढूँढ़ा तिन पाइयाँ, गहिरे पानी पैठ।

जो बौरा डूबन डरा, रहा किनारे बैठ ॥


अर्थ:-


जो गहरे पानी में डूब कर खोजेगा उसे ही मोती मिलेगा। जो डूबने से डर

जायेगा ;वह किनारे बैठा रह जायेगा। आत्म ज्ञान प्राप्ति के लिये गहन साधना करनी पड़ती है।


10-ऐसी बानी बोलिये, मन का आपा खोय ।

औरन को सीतल करै, आपहु सीतल होय ॥


अर्थ:-


हमें ऐसी मधुर वाणी बोलनी चाहिए, जिससे दूसरों को शीतलता का अनुभव हो और साथ ही हमारा मन भी प्रसन्न हो उठे।मधुर वाणी औषधि के सामान होती है, जबकि कटु वाणी तीर के समान कानों से प्रवेश होकर संपूर्ण शरीर को पीड़ा देती है। मधुर वाणी से समाज में एक – दूसरे के प्रति प्रेम की भावना का संचार होता है। जबकि कटु वचनों से सामाजिक प्राणी एक – दूसरे के विरोधी बन जाते है। 


 11-दुर्बल को न सताइये, जाकी मोटी हाय ।

बिना जीव की स्वाँस से, लोह भसम ह्वै जाय ॥


अर्थ:-


दुर्बल को कभी नहीं सताओ अन्यथा उसकी ‘हाय’ तुम्हें लग जायेगी । मरे हुए चमडे की धौकनी से लोहा भी भस्म ही जाता है । अर्थात- दुर्बल को कभी शक्तिहीन मत समझो ।


12-पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय,


ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय। 


अर्थ;-


बड़ी बड़ी पुस्तकें पढ़ कर संसार में कितने ही लोग मृत्यु के द्वार पहुँच गए, पर सभी विद्वान न हो सके। कबीर मानते हैं कि यदि कोई प्रेम या प्यार के केवल ढाई अक्षर ही अच्छी तरह पढ़ ले, अर्थात प्यार का वास्तविक रूप पहचान ले तो वही सच्चा ज्ञानी होगा।


13-आबत गारी ऐक है, उलटत होय अनेक

कहै कबीर नहि उलटिये वाही ऐक का ऐक।


अर्थ:-


कोई एक गाली देता है तो उलटकर उसे भी गाली देने पर वह अनेक हो

जाता है।यदि उलट कर पुनः गाली नहीं दिया जाये तो वह एक का एक ही रह जाता है।


14-जो तोको कांटा बुबये ताको बो तू फूल

तोहि फूल को फूल है, वाको है तिरसूल।


अर्थ:-


जो तुम्हारे लिये काॅंटा बोये तुम उसके लिये फूल बोओ। तुम्हारा फूल तुम्हें फूल के रुप में मिल जायेगा ।परंतु उसका काॅंटा उसे तीन गुणा

अधिक काॅंटा के रुप में मिलेगा। अच्छे कर्म का फल अच्छा और बुरे का तीन गुणा बुरा फल मिलता है।


15-तीन ताप में ताप है , ताका अनंत उपाय ।

ताप आतम महाबली , संत बिना नहिं जाय ।।

दैहिक , दैविक और भौतिक... ये तीन ताप संसार में माने गये हैं । इन तापों से बचने के लिए लोग अनेकों उपाय करते है ।तीनों ताप में दुख है पर उनके उपाय हैं। परंतु आत्मा के ताप-अथार्त ज्ञान की प्राप्ति ,प्रभु से बिना साक्षात्कार संत की संगति के संभव नहीं है।


16-कस्तूरी कुंडल बसे , मृग ढूंढे बन माहिं ।


ऐसे घट घट राम है, दुनिया देखे नाहिं ।। 


अर्थ:-


अति सुगन्धित कस्तूरी मृग के नाभि में होती है , जब घास चरने के लिए मृग अपनी सिर नीचे करता है तो कस्तूरी के सुगन्ध उसे मिलती है और उसे ढूंढने के लिए वह जंगल में इधर उधर दौड़ता फिरता है ।जबकि कस्तूरी तो उसकी नाभि में है जिसका ज्ञान उसे नहीं है ।उसी प्रकार अविनाशी भगवान तुम्हारे अपने ह्रदय में ;इस संसार के कण कण में विद्यमान है; किन्तु सांसरिक प्राणी उन्हें देख नहीं पाते ।


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संत कबीरदास के अनुसार साधना की गहराई;-


1-धीरे-धीरे रे मना, धीरज से सब होय ।

माली सींचै सौ घड़ा, ऋतु आये फल होय ॥


अर्थ;-


अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु आने पर ही लगेगा, आज पेड़ लागाओगे तो कल फल नहीं आयेगा। इसी तरह धीरज जीवन में बहुत महत्वपूर्ण है। मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है।


2-अष्ट सिद्धि नव निद्धि लौं , सबही मोह की खान ।

त्याग मोह की वासना , कहैं कबीर सुजान ।।


अर्थ;-

कबीर दास जी कहते हैं कि संसार की अष्ट सिद्धियां और नौं निधिया माया मोह का भंडार है, इस मोह रूपी वासना का त्याग करना ही उत्तम है क्योंकि ये कल्याण साधन के मार्ग की बाधा है ।


3-नैनन की कारी कोठरी, पुतली पलँग बिछाय ।


पलकों की चिक डारिकै, पिय को लिया रिझाय ॥


अर्थ;-


अपने प्रभु के लिए नेत्रों की कोठरी बनाकर पुतली रुपी पलंग बिछा दिया और पलकों की चिक दालकर अपने स्वामी को प्रसन्न कर लिया अर्थात् नयनों में प्रभु को बसाकर अपनी भक्ति अर्पित कर दी ।


 4-जपा मरे अजपा मरे ,अनहद हू मर जाये।

सुरत समानी शब्द में ,ताहि काल नही खाए।


अर्थ;-


1-कबीर कहते है कि ब्रह्मरन्ध्र पर नीचे के 5 कमलो के 5 जप मंत्र निष्प्रभावी हो जाते है, और अजपा जाप( ,जिसे साँसो की माला पे जपा जाता है, उसे अजपा जाप कहते है ) ब्रह्म एवम् परब्रह्म के लोक पार करते ही निष्प्रभावी हो जाते है| इसके बाद महासुन्न में अनहद धुन भी बंद हो जाती है, इस महासुन्न को सारनाम(सारशब्द) से पार करते है| यहाँ से आगे मकर तार की डोरी प्रारंभ होती है जिसे सारशब्द से पार करके सतलोक मे प्रवेश करते है| यहाँ काल से पूर्णतया मुक्ति मिल जाती है|


2-सुमिरण करते करते हम उसमे इतने लीन हो जायेंगे। फिर अचानक से अहसास होगा की

सुमिरण का तो पता नही। अजपा जाप शुरू हो गया।यानी अब बिना कोशिश के सुमिरण अपने आप चलने लगा।। दिन रात हमेशा अपने आप हो रहा है।फिर हम जपने वाले

नही रह जाते। फिर हम सुनने वाले बन जाते है।

3-फिर कुछ और गहराई में जाते है तो सुमिरण 'धुन' यानी साउंड में बदल जाता है। अब न हम जाप कर रहे है ,न जाप सुन रहे है। वो पीछे रह गया।अब तो सिर्फ ध्वनि होती है..

'झनकार धुन[' ;जिसको अनहद नाद कहते है।धीरे धीरे गहराई में जब उतरते है तो सब तरह

की ध्वनिसिर्फ एक साउंड में बदल जाती है।इस स्टेज पर जाप भी मर गया यानी सुमिरण पीछे रह गया।अजपा यानी तरह तरह की ध्वनियां भी गयी।। अब वो अवस्था आई; जहां सच्चा शब्द यानी कुल मालिक सामने प्रकट हुआ।और मेरी सूरत उस शब्द रूपी मालिक में समा गयी। 


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5-छिनहिं चढै छिन उतरै , सों तो प्रेम न होय ।

अघट प्रेमपिंजर बसै , प्रेम कहावै सोय ।।


अर्थ;

वह प्रेम जो क्षण भर में चढ़ जाता है और दुसरे क्षण उतर जाता है वह कदापि सच्चा प्रेम नहीं हो सकता क्योंकि सच्चे प्रेम का रंग तो इतना पक्का होता है कि एक बार चढ़ गया तो उतरता ही नहीं अर्थात प्रेम वह है जिसमें तन मन रम जाये ।


6-लाली मेरे लाल की, जित देखों तित लाल ।

लाली देखन मैं गई, मैं भी हो गई लाल ॥


अर्थ;-


1-''मुझे हर जगह ईश्वरीय ज्योति दिखती है-अंदर, बाहर, हर जगह।लगातार ऐसी दैवी ज्योति देखते देखते, मैं भी ईश्वरीय हो गई हूँ |प्रभु का रंग कुछ ऐसा था कि चारो ओर ज्ञान स्वरूप लाली छाई हुई थी। मैंने सोचा मैं भी जाकर देखता हूँ और उनके समक्ष जाते ही वही रंग मेरा भी हो गया''। 2-जब तक मैं का भाव है, तभी तक तू भी है। मैं और तू एक ही सिक्के के दो पहलू हैं।जब तक शिष्य हैं तभी तक गुरु भी हैं।वह प्रकाश तुम्हारा नहीं है; वह प्रकाश परमात्मा का है। जहां मैं नहीं, जहां तू नहीं, वहां जो शेष रह जाता है; उस शून्य का, उस सन्नाटे का-उसी का नाम परमात्मा है।


3-जैसे ही तुम शांत हो गए, इतनी भी अस्मिता न रही इतना भी अहंकार न रहा कि मैं हूं, मैं शिष्य हूं, मैं धार्मिक हूं, कि संन्यासी हूं, कि सत्य का खोजी हूं,अन्वेषी हूं-ऐसा कोई भाव ही न रहा; एक निर्भावदशा हो गई- तब अपूर्व प्रकाश का अनुभव होगा।  


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7-" जल में कुम्‍भ, कुम्‍भ में जल है, बाहर भीतर पानी

फूटा कुम्‍भ जल जलहीं समाना, यह तथ कह्यौ गयानी ।"


अर्थ :-


1-जिस प्रकार सागर में मिट्टी का घड़ा डुबोने पर उसके अन्दर - बाहर पानी ही पानी होता है , मगर फिर भी उस घट ( कुम्भ ) के अन्दर का जल बाहर के जल से अलग ही रहता है , इस पृथकता का कारण उस घट का रूप तथा आकार होते हैं, लेकिन जैसे ही वह घड़ा टूटता है , पानी पानी में मिल जाता है , सभी अंतर लुप्त हो जाते हैं I


2-ठीक उसी प्रकार यह विश्व ( ब्रह्माण्ड ) सागर समान है, चहुँ ओर चेतनता रूपी जल ही जल है, तथा हम जीव भी छोटे - छोटे मिट्टी के घड़ों समान हैं ( कुम्भ हैं ), जो पानी से भरे हैं , चेतना - युक्त हैं तथा हमारे शरीर रूपी कुम्भ को विश्व रूपी सागर से अलग करने वाले कारण हमारे रूप - रंग - आकार - प्रकार ही हैं I इस शरीर रूपी घड़े के फूटते ही अन्दर - बाहर का अंतर मिट जाएगा, पानी पानी में मिल जाएगाI जड़ता के मिटते ही चेतनता चारों ओर निर्बाध व्याप्त हो होगी; सारी विभिन्नताओं को पीछे छोड़ आत्मा परमात्मा में विलीन हो जाएगी I


3-जब पानी भरने जाएं तो घडा जल में रहता है और भरने पर जल घड़े के अन्दर आ जाता हैI इस तरह देखें तो बाहर और भीतर पानी ही रहता है अथार्त पानी की ही सत्ता हैIजब घडा फूट जाए तो उसका जल जल में ही मिल जाता है ...अलगाव नहीं रहताI आत्मा-परमात्मा दो नहीं एक हैंI आत्मा परमात्मा में और परमात्मा आत्मा में विराजमान हैI अंतत: परमात्मा की ही सत्ता है I जब देह विलीन होती है तो वह परमात्मा का ही अंश हो जाती है ..उसी में समा जाती है ..एकाकार हो जाती हैI 


8-जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं ।

प्रेम गली अति साँकरी, ता मैं दो न समाहिं ॥


अर्थ;-


जब तक मन में अहंकार था तब तक ईश्वर का साक्षात्कार न हुआ, जब अहंकार (अहम) समाप्त हुआ तभी प्रभु मिले | जब ईश्वर का साक्षात्कार हुआ, तब अहंकार स्वत: ही नष्ट हो गया | ईश्वर की सत्ता का बोध तभी हुआ | प्रेम में द्वैत भाव नहीं हो सकता, प्रेम की संकरी (पतली) गली में केवल एक ही समा सकता है - अहम् या परम ! परम की प्राप्ति के लिए अहम् का विसर्जन आवश्यक है |


9-चाह गई चिंता मिटी, मनुआ बेपरवाह।


जिनको कछु नहि चाहिये, वे साहन के साह।।


अर्थ;-


संत रहीम जी कहते है कि जिन्हें कुछ नहीं चाहिए वह राजाओं के राजा हैं। क्योंकि उन्हें न तो किसी चीज की चाह है, न ही चिन्ता और मन तो बिल्कुल बेपरवाह है। सरल शब्दों में समझाना चाहते है,कि ऐसा मनुष्य जिन्हें कुछ नहीं चाहिए वह अपने आप में ही राजा है|

वात-पित्त वाले लोग कौन-सी दाल खाएं

 Foods for Vata Pitta - वात-पित्त वाले लोग कौन-सी दाल खाएं? क्या दाल सच में आपको सूट नहीं करती? या फिर गड़बड़ है आपकी बॉडी टाइप में? क्या आपको दाल खाना अच्छा लगता है, लेकिन हर बार खाने के बाद पेट फूलकर गुब्बारे जैसा हो जाता है? 


या फिर सीने में इतनी तेज़ जलन होती है कि अगली बार दाल देखने का मन ही नहीं करता?

अगर हां, तो ज़रा रुकिए। प्रॉब्लम दाल में नहीं, आपकी प्रकृति (Body Type) में छुपी हो सकती है।


खासतौर पर अगर आपकी प्रकृति वात–पित्त की है - मतलब गैस भी जल्दी बनती है और शरीर में गर्मी भी तुरंत बढ़ जाती है - तो हो सकता है आप रोज़ ऐसी दालें खा रहे हों जो आपके पेट के अंदर “महाभारत” करा रही हों।


हम इस Post में बात करेंगे -

कौन सी दालें आपके लिए अमृत हैं और कौन सी दालें बन जाती हैं धीमा ज़हर।


वात–पित्त प्रकृति आखिर होती क्या है?

आयुर्वेद के अनुसार, वात–पित्त का मतलब है हवा + आग का कॉम्बिनेशन।


वात की वजह से शरीर में सूखापन, गैस, ब्लोटिंग होती है

पित्त की वजह से जलन, एसिडिटी, गर्मी और चिड़चिड़ापन


अब दिक्कत ये है कि ज़्यादातर दालें होती हैं रूक्ष (सूखी)।

सूखी चीज़ें वात को बढ़ाती हैं।

और अगर वही दाल गर्म तासीर की हुई, तो पित्त भी भड़क जाता है।


यानी गलत दाल = गैस + जलन = पेट का सत्यानाश 


दालों का सुपरहीरो: मूंग दाल 

पित्त वाले की लाइफसेवर है — मूंग दाल।

आयुर्वेद इसे यूं ही दालों का राजा नहीं कहता।

क्योंकि:


ये पचने में बहुत हल्की है

इसकी तासीर ठंडी होती है (शीतवीर्य)

ये वात और पित्त — दोनों को शांत रखती है


अगर आपका पेट अक्सर खराब रहता है, गैस बनती है या एसिडिटी रहती है —

तो पीली मूंग दाल आपके लिए किसी मेडिसिन से कम नहीं।


ये दालें बन सकती हैं आपकी मुसीबत

अब बात उन दालों की जो वात–पित्त वालों के लिए भारी पड़ सकती हैं।


1. कुलथी दाल (Horse Gram)

इसे किडनी स्टोन के लिए फायदेमंद माना जाता है, लेकिन

वात–पित्त वालों के लिए ये बहुत ज़्यादा गर्म है।


ये शरीर में इतनी गर्मी बढ़ा सकती है कि:


स्किन पर रैशेज़ आ जाएं

या नाक से खून आने लगे


2. चना और छोले

ये दालें होती हैं हद से ज़्यादा रूखी।


वात वालों के लिए गैस का परमाणु बम 

पचने में इतनी भारी कि आपकी पाचन अग्नि सुस्त पड़ जाए


3. राजमा

राजमा का स्वभाव होता है विदाही —

यानि पचते वक्त ये अंदर जलन पैदा करता है।


वात और पित्त — दोनों के लिए

राजमा से दूरी बनाना ही समझदारी है।


उड़द दाल: दोस्त या दुश्मन?

उड़द दाल को लेकर लोग कंफ्यूज़ रहते हैं।

असल में:


ये चिकनी होती है, इसलिए वात को शांत करती है

लेकिन इसकी तासीर गर्म होती है, जो पित्त को भड़का देती है


इसलिए नियम साफ है -

उड़द दाल सिर्फ सर्दियों में, वो भी लिमिट में।


अरहर (तुअर) दाल का सच

अरहर दाल पित्त के लिए ठीक मानी जाती है,

लेकिन एक प्रॉब्लम है - ये गैस बहुत बनाती है।


तो क्या इसे छोड़ दें?

नहीं।

बस सही तरीके से पकाना सीख लें।


कुकिंग सीक्रेट्स: दाल को बनाएं पेट-फ्रेंडली

अगर दाल सही तरीके से पकाई जाए, तो उसके साइड इफेक्ट काफी हद तक कम हो जाते हैं।


1. भिगोना ज़रूरी है

दाल को कम से कम 30 मिनट से 2 घंटे तक भिगोकर रखें।

इससे गैस बनाने वाले तत्व कम हो जाते हैं।


2. घी डालना मत भूलिए

वात–पित्त वालों के लिए घी किसी अमृत से कम नहीं।


पित्त की गर्मी को शांत करता है

वात के रूखेपन को खत्म करता है


3. सही मसालों का तड़का

तड़के में इस्तेमाल करें:


सौंफ — पेट की गर्मी शांत करती है

धनिया — पित्त को कंट्रोल करता है

जीरा — पाचन सुधारता है


फाइनल टेकअवे 

मूंग दाल और लाल मसूर को अपना बेस्ट फ्रेंड बनाइए

चना, छोले और राजमा से दूरी रखिए

दाल में घी और सौंफ का तड़का ज़रूर लगाइए


अगर आपको ये जानकारी काम की लगी हो, 

तो post को लाइक करें 

कमेंट में बताएं आपकी पसंदीदा दाल कौन सी है

और इसे उन दोस्तों के साथ ज़रूर शेयर करें

जो हर समय एसिडिटी की शिकायत करते रहते हैं 



श्वास रोग

 Ayurveda for Lungs - श्वास रोग में “एक दवा सब पर भारी” क्यों? इस Post में हम एक ऐसी आयुर्वेदिक औषधि की बात कर रहे हैं, जिसके बारे में आचार्य वाग्भट ने बहुत स्ट्रॉन्ग स्टेटमेंट दिया है। 


"श्वास और कास यानी पूरी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट की बीमारियों में बाकी सारी दवाइयाँ एक तरफ, और ये एक औषधि एक तरफ।"


अगर आपको सांस फूलने की समस्या है, सूखी या बलगम वाली खांसी रहती है, गले में खराश, बार-बार कफ जमा होना, ब्रोंकाइटिस, पुराना टीबी, निमोनिया के बाद कमजोर फेफड़े, या स्मोकिंग की वजह से सांस की दिक्कत—तो ये Post आपके लिए बहुत ज़रूरी है।


इस post का मकसद सिर्फ नुस्खा बताना नहीं है, बल्कि यह समझाना है कि यह औषधि क्यों और कैसे काम करती है, ताकि आयुर्वेद का लॉजिक आपको क्लियर हो सके।


शास्त्रीय संदर्भ: वाग्भट ऋषि क्या कहते हैं?

आचार्य वाग्भट ने अष्टांग हृदय, चिकित्सा स्थान, अध्याय 3 के श्लोक 172 में कहा है—


“सर्वेषु श्वासकासेषु केवलं विभीतकी”


अर्थात श्वास और कास की सभी बीमारियों में केवल विभीतकी (बहेड़ा) ही पर्याप्त है।

इतना बड़ा क्लेम आयुर्वेद में बहुत कम दवाओं के लिए मिलता है।


यह औषधि कौन-सी है?

जिस औषधि की बात हो रही है, वह है विभीतकी, जिसे आम भाषा में बहेड़ा कहते हैं।

यह त्रिफला का एक महत्वपूर्ण घटक है, लेकिन श्वास-कास रोगों में इसका रोल अलग और बहुत पावरफुल माना गया है।


किन समस्याओं में बहेड़ा उपयोगी है?

अगर आपको इनमें से कोई भी समस्या है, तो विभीतकी उपयोगी मानी जाती है:


सांस फूलना

सूखी खांसी या कफ वाली खांसी

गले में बार-बार खराश या भारीपन

ब्रोंकाइटिस

स्मोकिंग के बाद सांस की दिक्कत

पुराने टीबी या निमोनिया के बाद कमजोर लंग्स

रात में कफ जम जाना, सुबह गला पूरी तरह भरा हुआ लगना

नाक से ज्यादा पानी गिरना, साइनस की समस्या


बहेड़ा कैसे लें? (प्रयोग विधि)

1. गुड़ के साथ गोली बनाकर

बहेड़ा पाउडर एक चुटकी

पुराना देसी गुड़ थोड़ा सा

दोनों मिलाकर चना दाने जितनी छोटी गोली बना लें

दिन में 4–5 बार, खाने के बाद चूसने की तरह लें


इसे एक बार में निगलना नहीं है, धीरे-धीरे मुंह में घुलने देना है।

क्योंकि श्वास रोग में आयुर्वेद बार-बार अल्प मात्रा में औषधि लेने को कहता है।


2. पाउडर + गर्म पानी

आधा चम्मच बहेड़ा पाउडर

हल्के गुनगुने पानी के साथ

खासकर रात में सोने से पहले


यह तरीका उन लोगों के लिए खास है जिनका गला रात में बंद हो जाता है और सुबह भारी कफ निकलता है।


अब आयुर्वेदिक लॉजिक समझिए 

श्वास रोग की जड़ कहाँ है?

आयुर्वेद के अनुसार श्वास रोग सीधे फेफड़ों से शुरू नहीं होता।

सबसे पहले गड़बड़ी होती है:


आमाशय (पेट) में

अग्नि (डाइजेस्टिव फायर) कमजोर होती है

रस धातु ठीक से नहीं बनती

रस धातु का मल = कफ, जो ज़्यादा बनने लगता है

यही कफ ऊपर जाकर छाती और लंग्स में जमा हो जाता है

यानी अगर पेट ठीक नहीं, तो सांस भी ठीक नहीं।


बहेड़ा किन गुणों की वजह से काम करता है?

आयुर्वेदिक गुण (Guna)

लघु – हल्का, कफ को तोड़ने वाला

रूक्ष – अतिरिक्त चिकनाई हटाता है

उष्ण – गर्म प्रकृति, वात-कफ शमन


विपाक

मधुर विपाक – यानी पाचन के बाद शरीर को संतुलन देता है


दोषों पर प्रभाव

वात को अनुलोमन करता है

कफ को विशेष रूप से कम करता है

पित्त को संतुलित रखता है


धातुओं पर प्रभाव: क्यों फेफड़ों के लिए खास है?

विभीतकी का प्रभाव इन धातुओं पर बताया गया है:


रस धातु

रक्त धातु

मांस धातु

मेद धातु


आयुर्वेद कहता है कि फेफड़ों (फुफ्फुस) की उत्पत्ति रक्त धातु से होती है।

जब रक्त धातु शुद्ध और मजबूत होती है, तो लंग्स भी मजबूत होते हैं।


बहेड़ा:


पाचन सुधारता है

रस और रक्त धातु को शुद्ध करता है

कफ का एक्सेस प्रोडक्शन रोकता है

सीधे नाक से लेकर लंग्स तक काम करता है


किन मरीजों में असर सबसे ज्यादा दिखता है?

जिनके सीने में भारी कफ भरा रहता है


जिनको पीला या सफेद गाढ़ा बलगम निकलता है

जिनकी खांसी लंबे समय से ठीक नहीं हो रही

जिनको रात में सांस लेने में ज्यादा दिक्कत होती है

ऐसे मामलों में बहेड़ा को आयुर्वेद “मोर देन हाफ ट्रीटमेंट” मानता है।


Conclusion: क्यों इसे श्वास रोग की स्पेशल दवा कहा गया?

यह पाचन की जड़ से इलाज करती है


कफ को सिर्फ दबाती नहीं, बनने से रोकती है

लंग्स, गला, नाक—पूरी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट पर काम करती है

शास्त्रों में इसका स्पष्ट और स्ट्रॉन्ग उल्लेख है


इसीलिए आचार्य वाग्भट ने कहा—

श्वास रोग में अगर एक औषधि चुननी हो, तो विभीतकी पर्याप्त है।


अगर यह जानकारी आपको उपयोगी लगी, तो कमेंट में ज़रूर बताइए।


सिर्फ डायबिटीज़ वालों के लिए

 Ayurvedic Diet for Diabetes - डायबिटीज़ में सही खान-पान क्यों सबसे ज़रूरी है? इस पोस्ट में हम बात करेंगे कि डायबिटीज़ के मरीज़ों को अपना खान-पान कैसा रखना चाहिए और उनके लिए सबसे बेहतर डाइट प्लान क्या हो सकता है।


 लेकिन यह बात यहीं तक सीमित नहीं है। सच यह है कि जो डाइट प्लान हम जानेगें, वह सिर्फ डायबिटीज़ वालों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए फायदेमंद है जो भविष्य में कभी भी डायबिटीज़ नहीं चाहता।


यह डाइट उन लोगों के लिए भी उतनी ही ज़रूरी है जिनकी शुगर बॉर्डरलाइन रहती है, जिन्हें एसिडिटी की दवाइयाँ चल रही हैं या जिनमें डायबिटीज़ से जुड़ी जटिलताएँ जैसे डायबिटिक न्यूरोपैथी या रेटिनोपैथी शुरू हो चुकी हैं। कुल मिलाकर, अगर शरीर में किसी भी तरह की मेटाबॉलिक गड़बड़ी है, तो यह डाइट प्लान सबसे सुरक्षित और संतुलित विकल्प है।


इस पोस्ट में हम आसान टिप्स जानेगें। ये कोई सख्त नियम नहीं हैं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आसानी से अपनाई जा सकने वाली बातें हैं। 


1.आयुर्वेद की भोजन विधि: सिर्फ क्या नहीं, कैसे भी ज़रूरी है

आयुर्वेद में केवल यह नहीं बताया गया कि क्या खाना चाहिए, बल्कि यह भी बताया गया है कि खाना कैसे बनाना है और कैसे खाना है। भोजन बनाते समय मन शांत और प्रसन्न होना चाहिए। खाना घर का बना, सात्विक, ताज़ा और पचने में हल्का होना चाहिए।


खाना तभी खाना चाहिए जब सही मायने में भूख लगी हो। खाते समय टीवी, मोबाइल या बातचीत से दूरी बनाकर, शांत मन से, हर निवाले को अच्छे से चबाकर खाना चाहिए। यह पूरी प्रक्रिया शरीर और मन दोनों पर गहरा असर डालती है।


2. निदान परिवर्जन: बीमारी की जड़ पर काम करना

डायबिटीज़ के इलाज में आयुर्वेद का दूसरा बड़ा सिद्धांत है निदान परिवर्जन, यानी जिन कारणों से बीमारी हुई है, उन्हें हटाना। आचार्य चरक ने प्रमेह के कई कारण बताए हैं, जिनमें मधुमेह भी शामिल है।


अगर खान-पान की बात करें, तो बार-बार दही खाना, खासकर रात में दही लेना, बहुत ज़्यादा तरल आहार लेना, बार-बार पानी पीते रहना, अत्यधिक नॉनवेज खाना, नया चावल या नया अनाज ज़्यादा खाना, रोज़ाना मीठा या गुड़ से बने पदार्थों का अधिक सेवन करना – ये सभी कफ और मेद को बढ़ाने वाले कारण हैं, जो डायबिटीज़ को जन्म देते हैं।


आचार्य सुश्रुत ने भी ठंडी चीज़ों का अत्यधिक सेवन, बार-बार बासी भोजन, बहुत तला-भुना और ज़्यादा चिकनाई वाला खाना डायबिटीज़ को बढ़ाने वाला बताया है। इसलिए इन आदतों से दूरी बनाना बेहद ज़रूरी है।


3. सिर्फ कड़वा खाना सही नहीं: रसों का संतुलन समझिए

अक्सर जैसे ही किसी का शुगर लेवल बढ़ता है, उसे हर कोई सलाह देने लगता है कि अब कड़वा ज़्यादा खाओ, मीठा पूरी तरह बंद कर दो। लेकिन आयुर्वेद इस सोच से थोड़ा अलग है।


आयुर्वेद के अनुसार हमारा आहार षड्-रसात्मक होना चाहिए, यानी उसमें छह स्वाद होने चाहिए –

मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और कषाय (कसैला)।


मतलब यह नहीं कि मीठा पूरी तरह बंद कर दिया जाए, बल्कि यह ज़रूरी है कि किसी भी एक रस का अत्यधिक सेवन न हो।


a. मधुर रस: सही मात्रा में ज़रूरी क्यों है?

मधुर रस यानी मीठा स्वाद आयुर्वेद के अनुसार जन्म से ही शरीर के अनुकूल होता है। माँ का दूध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह सप्त धातुओं – रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र – को पोषण देता है।


मीठा रस त्वचा, बालों, इंद्रियों और ओज को बढ़ाता है और दीर्घायु में सहायक होता है। लेकिन जब यही मधुर रस ज़रूरत से ज़्यादा लिया जाए, तो कफ और चर्बी बढ़ाकर डायबिटीज़ की समस्या पैदा करता है।


b. डायबिटीज़ में सुरक्षित मधुर विकल्प क्या हैं?

आयुर्वेद ने ऐसे कई मधुर विकल्प बताए हैं जो संतुलन बनाए रखते हैं। जैसे देसी गाय का घी, जिसे दिन में 2 से 3 छोटे चम्मच तक लिया जा सकता है। यह मीठे स्वाद का होता है और शरीर के लिए पोषक है।


स्वर्णसिद्ध जल यानी सोने के टुकड़े के साथ उबला पानी भी बताया गया है। इसके अलावा शुद्ध शहद, जो कफ को कम करता है, सीमित मात्रा में लिया जा सकता है।


मौसमी फल, शतावरी, बला, अतिबला, विदारीकंद जैसी औषधियाँ भी मधुर रस में आती हैं और सही मात्रा में फायदेमंद हैं। वहीं आर्टिफिशियल स्वीटनर और शुगर-फ्री टैबलेट से बचना बेहतर है।


c. तिक्त रस: कड़वे स्वाद का सही इस्तेमाल

तिक्त रस यानी कड़वा स्वाद शरीर की सफाई में मदद करता है। यह बुखार, जलन, कीड़े, कफ और अतिरिक्त चर्बी को कम करता है, इसलिए डायबिटीज़ में उपयोगी माना जाता है।


करेले की सब्ज़ी, आम के पत्ते, मेथी-सौंफ की सब्ज़ी, मूंग दाल के साथ बनी हल्की सब्ज़ियाँ, धनिया-जीरा जैसे मसाले इस श्रेणी में आते हैं। ध्यान बस इतना रखना है कि जिन लोगों को एसिडिटी या सीने में जलन रहती है, वे मेथी का सेवन सीमित रखें।


d. कड़वे रस की सही मात्रा क्यों ज़रूरी है?

इसके साथ ही आप गिलोय की बेल के पत्तों का काढ़ा बना सकते हैं. लेकिन यहाँ मात्रा का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है। इन काढ़ों की सही मात्रा लगभग 20 से 30 मिली ही होती है।


आजकल बहुत से लोग सुबह-सुबह एक पूरा गिलास करेले का जूस पी लेते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह तरीका सही नहीं है। इतनी ज़्यादा मात्रा में लिया गया कड़वा रस न केवल पचने में भारी होता है, बल्कि शरीर को इसकी ज़रूरत भी नहीं होती। ऊपर से, डायबिटीज़ के कारणों में आयुर्वेद ने द्रव आहार यानी ज़्यादा लिक्विड डाइट को भी जिम्मेदार माना है।


इस तरह अगर बहुत ज़्यादा मात्रा में कड़वे जूस लिए जाएँ, तो फायदा सीमित होता है और नुकसान की संभावना बढ़ जाती है।


e. ज्यादा कड़वा लेने से नुकसान भी हो सकता है

एक और अहम बात यह है कि अगर लंबे समय तक बहुत ज़्यादा कड़वा या कसैला रस लिया जाए, तो इससे वात दोष बढ़ सकता है और धातु क्षय भी हो सकता है। आचार्य वाग्भट्ट ने इस बारे में साफ चेतावनी दी है।


आयुर्वेद में शरीर की बनावट के आधार पर लोगों को मोटे तौर पर दो समूहों में बाँटा गया है।

पहला समूह वे लोग जिनका वजन ज़्यादा है, शरीर में चर्बी अधिक है या जिनमें कफ दोष की प्रधानता के कारण डायबिटीज़ हुई है। ऐसे लोगों को कड़वा रस लेने से आमतौर पर फायदा होता है।


लेकिन दूसरा समूह वे लोग हैं जिनका शरीर पहले से ही दुबला है, जिनमें वात दोष अधिक है। अगर ऐसे लोग बहुत ज़्यादा कड़वा या कसैला रस लेने लगते हैं, तो उनमें भूख न लगना, जोड़ों में दर्द, अत्यधिक थकान और कमजोरी जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। इसलिए हर रस का सेवन शरीर की प्रकृति देखकर करना चाहिए।


4. डायबिटीज़ की सरल लेकिन असरदार आयुर्वेदिक औषधि

आयुर्वेद में डायबिटीज़ के लिए एक बेहद आसान और असरदार योग बताया गया है, जिसे निशा आमलक योग या हरिद्रा आमलक योग कहा जाता है। यहाँ निशा या हरिद्रा का मतलब है हल्दी और आमलक का मतलब है आंवला।


अगर आपको ताज़ा आंवला मिल जाता है, तो एक आंवला कद्दूकस करके उसमें दो से तीन चुटकी हल्दी मिलाएँ और इसे सुबह खाली पेट लें।

अगर आंवले का रस निकालना चाहें, तो 15 से 20 मिली आंवले के रस में थोड़ी सी हल्दी मिलाकर सुबह सेवन किया जा सकता है।


अगर कच्ची हल्दी उपलब्ध हो, तो उसे भी हल्का सा कद्दूकस करके आंवले के साथ लिया जा सकता है।

और अगर आंवला या ताज़ी हल्दी न मिले, तो आंवला चूर्ण के साथ थोड़ी सी हल्दी मिलाकर सेवन किया जा सकता है।


यह योग इसलिए खास है क्योंकि आंवला एक श्रेष्ठ रसायन है और हल्दी हमारे रोज़ के भोजन में भी रहती है। जब ये दोनों साथ आते हैं, तो डायबिटीज़ में बहुत अच्छा असर दिखाते हैं।


5. क्या रसोई के मसाले भी दवा बन सकते हैं?

अब सवाल आता है कि क्या हमारे किचन में मौजूद मसाले और अचार डायबिटीज़ में मदद कर सकते हैं? जवाब है – हाँ, अगर सही तरीके से इस्तेमाल किए जाएँ।


आजकल जो रेडीमेड अचार बाज़ार से आते हैं, उनमें प्रिज़र्वेटिव, फूड कलर और घटिया तेल मिला होता है। यही वजह है कि बहुत से लोगों को अचार खाने से एसिडिटी, सिरदर्द या जलन होने लगती है।


लेकिन घर का बना अचार, जैसे आंवले का अचार, हल्दी का अचार या करेले का अचार, डायबिटीज़ में औषधि की तरह काम करता है। इनमें इस्तेमाल होने वाले मसाले जैसे हल्दी, जीरा, सरसों और थोड़ा सा तेल खुद औषधीय गुण रखते हैं।


बस ध्यान इतना रखना है कि अचार को सब्ज़ी की तरह नहीं खाना है। इसकी मात्रा हमेशा सीमित रखें।


6. विरुद्ध आहार: गलत फूड कॉम्बिनेशन से बचें

आयुर्वेद में कुछ ऐसे फूड कॉम्बिनेशन बताए गए हैं जो साथ में लेने पर शरीर को नुकसान पहुँचाते हैं। इन्हें विरुद्ध आहार कहा जाता है।


जैसे रात में दही खाना, दही को गर्म करना, या बहुत ज़्यादा मात्रा में अकेले दही खाना शरीर के लिए ठीक नहीं है।

इसी तरह शहद और गर्म पानी का कॉम्बिनेशन भी आयुर्वेद के अनुसार विरुद्ध आहार माना गया है। भले ही शहद और गर्म पानी अलग-अलग अच्छे हों, लेकिन साथ में लेने पर यह शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है।


खट्टे फलों को दूध के साथ लेना, जैसे मिल्कशेक बनाकर पीना, अलग-अलग फलों को एक साथ मिलाकर खाना या उन पर कस्टर्ड डालकर खाना भी सही नहीं है।


7. ज़्यादा पानी और लिक्विड डाइट भी नुकसानदेह

आजकल “स्टे हाइड्रेटेड” के नाम पर लोग ज़रूरत से ज़्यादा पानी और जूस पीने लगे हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह भी डायबिटीज़ का एक बड़ा कारण है।


जब बिना प्यास के बार-बार पानी पिया जाता है, तो यह कफ दोष को बढ़ाता है और आम (अपचित पदार्थ) उत्पन्न करता है। इससे शरीर में चिपचिपापन और गीलापन बढ़ता है, जो आगे चलकर डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी और यूरिन से जुड़ी समस्याओं को जन्म देता है।


इसलिए पानी हमेशा प्यास के अनुसार और मौसम व शरीर की प्रकृति को ध्यान में रखकर ही पीना चाहिए।


8. बार-बार खाना सही है या गलत?

डायबिटीज़ में अक्सर सलाह दी जाती है कि थोड़ा-थोड़ा और बार-बार खाना चाहिए। लेकिन आयुर्वेद इसे “अध्यशन” कहता है।


अगर पिछला भोजन पूरी तरह पचा नहीं है और फिर भी आप दोबारा खाना खा लेते हैं, तो यह आम को बढ़ाता है और कफ दोष को बढ़ाता है। इससे शरीर में चिपचिपापन बढ़ता है और बीमारी गहराती है।


हर व्यक्ति की अग्नि अलग होती है। पित्त प्रकृति वालों की अग्नि तेज़ होती है, उन्हें जल्दी भूख लगती है। कफ प्रकृति वालों की अग्नि मंद होती है, उन्हें देर से भूख लगती है। वात प्रकृति वालों की भूख अनियमित होती है।


इसलिए खाना हमेशा अपनी पाचन शक्ति और भूख के अनुसार ही खाना चाहिए। एक ही नियम सभी पर लागू नहीं होता।


Conclusion: संतुलन ही सबसे बड़ा इलाज है

इस post में हमने डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए बेस्ट आयुर्वेदिक डाइट प्लान को आसान लेकिन प्रभावी टिप्स के रूप में समझा। यह डाइट प्लान कोई ज़बरदस्ती नहीं करता, बल्कि शरीर को संतुलन की ओर लौटने का मौका देता है। अगर आप इसे समझदारी से अपनाते हैं, तो न सिर्फ शुगर कंट्रोल में रहती है, बल्कि भविष्य की कई बीमारियों से भी बचाव होता है।


दर्द और थकान होती है

 Muscular Fatigue - क्या आपको भी बिना वजह ऐसा दर्द और थकान होती है? क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि अचानक शरीर में इतना ज़्यादा दर्द होने लगे कि आप किसी से कह बैठें—


“यार, आज तो शरीर टूट गया है… ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने डंडे से मारा हो या ज़ोर-ज़ोर से मुक्के मारे हों।”


कभी ऐसा भी हुआ कि दर्द के साथ इतनी ज़्यादा थकान हो जाए कि कुछ करने का मन ही न करे?

और सबसे अजीब बात ये कि ना कोई चोट लगी, ना गिरना हुआ, ना एक्सीडेंट-फिर भी दर्द ऐसा कि मानो किसी ने आकर पीट दिया हो।


ऐसे में मन में सबसे पहला सवाल यही आता है-

“आख़िर ये दर्द आया कहां से?”


इस Post में हम इसी सवाल का जवाब आयुर्वेद के नज़रिए से समझने वाले हैं।

साथ ही ये भी जानेंगे कि


ये दर्द क्यों होता है

शरीर के अंदर क्या गड़बड़ चल रही होती है

और आयुर्वेद में इसका इलाज क्या बताया गया है

साथ ही घर पर आप क्या-क्या कर सकते हैं


आयुर्वेद में दर्द को कैसे देखा जाता है?

आयुर्वेद में किसी भी बीमारी या दर्द को समझने का बेस बहुत साफ़ है-

वात, पित्त और कफ।


दुनिया की कोई भी बीमारी हो, किसी भी तरह का दर्द हो-

आयुर्वेद उसे इन्हीं तीन दोषों के आधार पर समझता और ट्रीट करता है।


अब हर तरह का दर्द, चाहे वो सिर का हो, दांत का हो, कमर का हो, घुटनों का हो, मसल्स का हो, जॉइंट्स का हो या फिर नर्व्स से जुड़ा दर्द-

आयुर्वेद के अनुसार उसका मूल कारण हमेशा वात होता है।


यह बात बिल्कुल क्लियर है।


जब दर्द ऐसा लगे जैसे डंडे या मुक्कों से मारा गया हो

वात अलग-अलग तरह से शरीर में दर्द पैदा करता है।

लेकिन एक खास तरह का दर्द ऐसा होता है जिसमें-


पूरे शरीर में टूटन महसूस होती है

मांसपेशियों में बहुत ज़्यादा दर्द होता है

ऐसा लगता है जैसे किसी ने ज़ोर-ज़ोर से मारा हो

और साथ में असहनीय थकान रहती है

मानो शरीर में जान ही नहीं बची हो।


आयुर्वेद कहता है, ऐसा दर्द तब होता है जब

वात बढ़कर शरीर की दो खास धातुओं में जाकर बैठ जाता है।


कौन-सी दो धातुएं ज़िम्मेदार हैं?

इन दो धातुओं के नाम हैं-


मांस धातु

मेद धातु


आयुर्वेद में कुल 7 धातुएं बताई गई हैं-

रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र।


सरल भाषा में समझें तो-


मांस धातु को हम मसल्स से जोड़ सकते हैं

मेद धातु को फैट टिश्यू से


जब बढ़ा हुआ वात इन दोनों धातुओं में प्रवेश करता है,

तब दर्द ऐसा लगता है जैसे डंडे या मुक्कों से मारा गया हो,

और शरीर में ज़बरदस्त थकान छा जाती है।


आयुर्वेद का श्लोक क्या कहता है?

आचार्य चरक ने इसे बहुत ही साफ़ शब्दों में बताया है।


चरक संहिता, चिकित्सा स्थान, अध्याय 28 में कहा गया है-


“दण्ड-मुष्टि हतं तथा सरुक् श्रम अत्यर्थम्

मांस-मेदो गते अनिले”


अर्थात-

जब वात मांस और मेद धातु में चला जाता है,

तो व्यक्ति को ऐसा दर्द और थकान होती है

जैसे उसे डंडे या मुक्कों से मारा गया हो।


आखिर वात बढ़ता क्यों है?

अब सवाल उठता है-

इतना वात बढ़ा कैसे?


इसके पीछे कई लाइफस्टाइल कारण होते हैं, जैसे-


ज़रूरत से ज़्यादा शारीरिक मेहनत

बहुत भारी वजन उठाना

ओवर-एक्सरसाइज़ या वेट ट्रेनिंग

लगातार ट्रैवल करना

रात में देर तक जागना

नींद पूरी न होना

लगातार मानसिक तनाव

ठंडी हवा, AC या पंखे में ज़्यादा देर बैठना

रूखा-सूखा खाना

लंबे उपवास

भूख लगने पर खाना टालना

पेशाब या मोशन को रोककर रखना

ये सभी आदतें शरीर में वात को तेज़ी से बढ़ाती हैं।


आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट क्या है?

आचार्य चरक ने सिर्फ कारण ही नहीं, इलाज भी बताया है।


1. विरेचन (Panchkarma)

सबसे पहले बताया गया है-

विरेचन।


विरेचन का मतलब है शरीर की गहरी सफाई।


इसमें-


कुछ दिनों तक घी का सेवन कराया जाता है

फिर पूरे शरीर की मालिश

और उसके बाद विशेष तरीके से लूज़ मोशन्स के ज़रिए शुद्धि


ये प्रक्रिया हमेशा अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर की देखरेख में ही होनी चाहिए।


2. बस्ति चिकित्सा

विरेचन के बाद

बस्ति यानी मेडिकेटेड एनीमा।


यह वात को कंट्रोल करने की सबसे प्रभावी थैरेपी मानी जाती है,

खासकर जब वात मांस और मेद धातु में बैठ गया हो।


घर पर क्या कर सकते हैं?

अब सबसे ज़रूरी सवाल-

घर पर हम क्या करें?


1. रोज़ाना अभ्यंग (तेल मालिश)

अभ्यंग यानी तेल से मालिश।

यह वात को शांत करने का सबसे आसान और असरदार तरीका है।


आयुर्वेद कहता है-

जो व्यक्ति रोज़ अभ्यंग करता है—


उसे जल्दी बुढ़ापा नहीं आता

थकान कम होती है


और वात के रोग नहीं होते


2. कौन-सा तेल?

सबसे बेस्ट-

तिल का तेल, खासकर ठंड के मौसम में।

अगर काले तिल का तेल मिल जाए तो और भी अच्छा।


नहाने से पहले पूरे शरीर की मालिश करें।


खाने में क्या शामिल करें?

लहसुन

लहसुन वात को कम करता है और मांस-मेद धातु पर काम करता है।


3–5 लहसुन की कलियां

तिल के तेल में हल्का सेंककर

खाने के साथ लें


दही

अच्छी तरह जमा हुआ दही—


उष्ण

स्निग्ध

वातशामक


हफ्ते में 2–3 बार ज़रूर लें, पर दिन में रात में नहीं।


उड़द का वड़ा

उड़द वात पर बेहतरीन काम करता है।

घर पर बना मेंदू वड़ा इस दर्द में मददगार हो सकता है।


लाइफस्टाइल में ज़रूरी बदलाव


पूरी नींद लें

ओवर-एक्सरसाइज़ से बचें

थकान होने पर रुकें

बेवजह खुद को ज़्यादा न झोंकें

ठंड और ड्राफ्ट से बचाव करें


दूध वाला उपाय

अगर दूध सूट करता है, तो-


1 ग्राम पिप्पली पाउडर

दूध + पानी में उबालकर

पी सकते हैं


यह वात और दर्द दोनों में मदद करता है।


अंत में

अगर दर्द ऐसा है जैसे किसी ने डंडे या मुक्कों से मारा हो

और साथ में गहरी थकान भी है-

तो इसे हल्के में न लें।

यह मांस और मेद धातु में बढ़े वात का संकेत हो सकता है।


डायबिटीज़ को कंट्रोल में

 Reverse Diabetes - डायबिटीज़ को कंट्रोल में रखने के लिए हमें क्या खाना चाहिए? डायबिटीज़ को नियंत्रण में रखने के लिए हमें यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हमें किस तरह का खाना खाना चाहिए, ताकि वजन कंट्रोल में रहे, इंसुलिन की ज़रूरत न पड़े और डायबिटीज़ की जटिलताओं से बचा जा सके।


इसके लिए सबसे पहले आपको यह जान लेना चाहिए कि आपका खाना अनप्रोसेस्ड और घर का बना हुआ होना चाहिए।


किसी की बात मत सुनिए, किसी के कहने में मत आइए। बस एक नियम अपनाइए — घर का बना खाना खाइए।


सबसे पहले: प्रोसेस्ड फूड पूरी तरह छोड़िए

सबसे पहला और सबसे ज़रूरी नियम है कि आपको प्रोसेस्ड फूड पूरी तरह से बंद करना होगा।

जैसे:


Bread

बिस्कुट

नमकीन

पैकेट वाले जूस

कॉर्नफ्लेक्स

आइसक्रीम

कोल्ड ड्रिंक्स

चॉकलेट

सेवई

मैगी

पास्ता


हम सबको सुबह Bread खाने और चाय के साथ बिस्कुट खाने की आदत पड़ गई है। लेकिन ये सारे प्रोसेस्ड फूड लिवर को फैटी बना देते हैं।


जब लिवर फैटी हो जाता है, तो वहां इंसुलिन काम नहीं करता। नतीजा यह होता है कि ब्लड शुगर बढ़ने लगती है।


प्रोसेस्ड फूड के नुकसान

ये प्रोसेस्ड फूड:


फैटी लिवर बनाते हैं

इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाते हैं

LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं

हार्ट डिज़ीज़ का खतरा बढ़ाते हैं

भविष्य में कैंसर का risk बढ़ाते हैं

याददाश्त कम करते हैं

अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं

हमारे पूर्वज ऐसे खाने नहीं खाते थे। इसलिए उन्हें फैटी लिवर नहीं होता था।


चीनी: नुकसानदायक है

चीनी मत खाइए।

चीनी नुकसानदायक है।


हमें याद है कि जब हम छोटे थे, तो पूरे परिवार के लिए चीनी का कोटा होता था। पूरे परिवार को महीने में सिर्फ 2 किलो चीनी मिलती थी।

पांच लोग, और सिर्फ 2 किलो चीनी।


पेप्सी भी दो महीने में एक बार मिलती थी। 3 भाई बहन मिलकर एक ही बोतल बांट लेते थे।

पार्टी में भी बस बिस्कुट, रोटी और कभी-कभी नाश्ता होता था।


आज हालात उल्टे हैं। आज लगभग हर किसी को फैटी लिवर है।

आपका पेट जितना बड़ा होगा, आपका लिवर उतना ही मोटा होगा।


दूसरा नियम: अनाज कम करें

अगर आप ज़्यादा शारीरिक मेहनत नहीं करते, तो आपको ज़्यादा अनाज खाने की ज़रूरत नहीं है।

मजदूर और किसान इसलिए रोटी-चावल खा पाते हैं क्योंकि वे दिन भर मेहनत करते हैं।


हम लोग कुर्सी पर बैठने वाले लोग हैं। हम दिन में कितना व्यायाम करते हैं?

ज़्यादा से ज़्यादा एक घंटा।


अनाज क्या होते हैं?


रोटी

चावल

मक्का

ओट्स

बाजरा

ज्वार

रागी

जौ


इन सबमें कार्बोहाइड्रेट और ग्लूकोज़ होता है।

खाने के बाद अगर आप बैठे रहते हैं, तो शुगर बढ़ेगी ही।


पेट भरने का सही तरीका (बिना ज्यादा अनाज)

सिर्फ रोटी और चावल से पेट भरना ज़रूरी नहीं है।

ऐसे खाने को शामिल करें जिनमें अनाज न हो।


सभी लोगों के लिए एक आसान फार्मूला:


आधा किलो गेहूं का आटा

आधा किलो चने का आटा

आधा किलो सोयाबीन का आटा


इन्हें मिलाकर इस्तेमाल करें।


घी और मक्खन से मत डरिए

हर डायबिटीज़ के मरीज़ को रोज़ कम से कम 4 चम्मच घी या मक्खन खाना चाहिए।


इसके फायदे:


अच्छा कोलेस्ट्रॉल (HDL) 30% बढ़ता है

हार्ट के लिए बहुत अच्छा है

हार्ट अटैक का खतरा कम करता है


नट्स और प्रोटीन भरपूर खाइए

आप खुलकर खा सकते हैं:


बादाम

अखरोट

पिस्ता

काजू

मूंगफली


जब भी भूख लगे, एक मुट्ठी नट्स खा लीजिए। इससे शुगर नहीं बढ़ती।


इसके अलावा:


पनीर

सोयाबीन

सोयाबीन की दाल


जितना चाहें उतना खा सकते हैं।


एक संतुलित थाली कैसी हो?

1 रोटी (घी लगी हुई)

50 ग्राम पनीर

1 कटोरी दही

भरपूर सब्ज़ी

सलाद

हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ


इससे पेट अच्छी तरह भरता है।


खाने की फ्रीक्वेंसी और चाय-कॉफी

दिन में 2 बार खाने की कोशिश करें।

चाय 3 कप तक या कॉफी 2 कप तक पी सकते हैं।


चाय और कॉफी में मौजूद कैटेचिन:


एंटीऑक्सिडेंट है

हार्ट अटैक का रिस्क 11% तक कम करता है


दिन भर में आधा किलो फुल क्रीम दूध ले सकते हैं।

बस उसमें चीनी न डालें।


फल, बीज और मिठाई

रोज़ 1 फल खाएं (150–200 ग्राम से ज्यादा नहीं)


बहुत मीठे फल कम मात्रा में लें

आम के मौसम में आधा आम रोज़ खा सकते हैं


अच्छे बीज:


अलसी

चिया

कद्दू के बीज


आइसक्रीम, चॉकलेट कभी-कभी पार्टी में खा सकते हैं।

एक स्कूप लें, बांटकर खाएं।


वजन घटाइए, डायबिटीज़ उलट जाएगी

अगर आपका वजन 85 किलो है और आप वजन घटा लेते हैं, तो डायबिटीज़ रिवर्स हो सकती है।


कम कार्बोहाइड्रेट

ज़्यादा सलाद

नियमित व्यायाम


टीवी देखते समय भी डंबल उठाइए।

कार में बैठे हों तो बीच-बीच में चलिए।


फैटी लिवर का सच

फैटी लिवर घी, मक्खन या तेल से नहीं, बल्कि कार्बोहाइड्रेट से बनता है।


कार्बोहाइड्रेट के स्रोत:


रोटी

चावल

चीनी

गुड़

दूध

दही

फल


घी, मक्खन, सरसों का तेल, नारियल तेल, तिल का तेल — ये लिवर को नुकसान नहीं पहुंचाते।


आख़िरी बात

अगर आप वजन नहीं बढ़ाते, अनाज कम खाते हैं और एक्टिव रहते हैं, तो:


शुगर कंट्रोल में रहेगी

दवाइयों की ज़रूरत कम होगी

सेहत बेहतर रहेगी


समझदारी से खाइए, संतुलन बनाइए और एक्टिव रहिए।

 

HbA1c सात से नीचे क्यों नहीं आ रहा?

 HbA1c - HbA1c सात से नीचे क्यों नहीं आ रहा? डायबिटीज़ कंट्रोल को सही तरह समझना ज़रूरी है - डायबिटीज़ से जूझ रहे ज़्यादातर लोग एक ही सवाल बार-बार पूछते हैं- “हमारी शुगर तो कभी-कभी ठीक रहती है, फिर HbA1c सात से नीचे क्यों नहीं आ रहा?”


WHO की गाइडलाइन्स के मुताबिक अगर HbA1c 7 से कम है, तो उसे अच्छा कंट्रोल माना जाता है।

अगर 6 से नीचे आ जाए, तो उसे और बेहतर कंट्रोल कहा जाता है।

यानी हर डायबिटीज़ वाले व्यक्ति का टारगेट यही होना चाहिए कि HbA1c सात से नीचे आए।


लेकिन इसके लिए सिर्फ़ दवा खाना या कभी-कभार शुगर चेक करना काफ़ी नहीं होता।


HbA1c आखिर होता क्या है?

HbA1c को आसान भाषा में समझें तो यह

पिछले 2–3 महीनों की औसत ब्लड शुगर की रिपोर्ट होती है।


जब भी ब्लड में शुगर बढ़ती है, तो उसका एक हिस्सा हमारे खून में मौजूद हीमोग्लोबिन से चिपक जाता है।

इसी चिपकी हुई शुगर को कहा जाता है Glycosylated Hemoglobin, यानी HbA1c।


अगर खाली पेट शुगर ज़्यादातर समय 100 से कम

और खाने के बाद 140 से कम रहती है

तो HbA1c लगभग 6 के आसपास आ सकता है।


सिर्फ़ एक टाइम शुगर ठीक होना काफ़ी नहीं

यह सबसे बड़ी गलतफहमी है कि

“सुबह की शुगर ठीक है, तो कंट्रोल अच्छा है।”


HbA1c कम करने के लिए ज़रूरी है कि:


खाली पेट

नाश्ते के बाद

लंच से पहले और बाद

डिनर के आसपास


हर समय शुगर एक लिमिट में रहे।


टारगेट ये होना चाहिए:


खाली पेट: 100 से कम

खाने से पहले: 120 से कम


यह आसान नहीं है, लेकिन नामुमकिन भी नहीं।


HbA1c कम करना है तो Monitoring बदलनी पड़ेगी

अधिकतर लोग क्या करते हैं?

महीने में एक बार या दो महीने में एक बार शुगर चेक करवा लेते हैं।


लेकिन अगर HbA1c सात से नीचे लाना है,

तो कम से कम रोज़ एक बार शुगर चेक करना पड़ेगा।


हर दिन एक ही समय नहीं—


कभी खाली पेट

कभी नाश्ते के बाद

कभी लंच से पहले या बाद

कभी डिनर के आसपास


ताकि ये समझ आए कि

शुगर किस टाइम सबसे ज़्यादा बिगड़ रही है।


जब तक यह पता नहीं चलेगा, सुधार कैसे होगा?


इसी वजह से सिर्फ़ भारत में ही नहीं,

बल्कि अमेरिका और यूके जैसे देशों में भी

क़रीब 50% डायबिटीज़ मरीजों का HbA1c 8 से ऊपर रहता है।

कारण वही—डेली मॉनिटरिंग और लाइफस्टाइल कंट्रोल की कमी।


डाइट, एक्सरसाइज़ और दवा—तीनों का बैलेंस ज़रूरी

HbA1c कंट्रोल करने के लिए

सिर्फ़ दवा या सिर्फ़ डाइट से काम नहीं चलता।

तीनों का तालमेल ज़रूरी है।


1. कार्बोहाइड्रेट का सही हिसाब

डेली कैलोरी में:


कार्बोहाइड्रेट 50% से ज़्यादा नहीं होने चाहिए


हम इंडियन लोग ज़्यादातर:


रोटी

चावल

बाजरा

ओट्स

आलू

मटर

इनसे बहुत ज़्यादा कार्ब्स ले लेते हैं।


एक ग्राम कार्बोहाइड्रेट = 4 कैलोरी


अगर किसी की रोज़ की ज़रूरत 1600 कैलोरी है,

तो उसमें से अधिकतम:


200 ग्राम कार्बोहाइड्रेट ही लेने चाहिए।


कार्ब्स को पूरे दिन में सही तरह बाँटना

कार्ब्स एक साथ नहीं, पूरे दिन में फैलाकर लें:


नाश्ता: 20–25%

लंच: 25–30%

डिनर: 25–30%

बीच के स्नैक्स: बाकी


नाश्ता कैसा हो?

1 रोटी

थोड़ा स्प्राउट

दही

1–2 अंडे


इससे प्रोटीन और फाइबर बढ़ता है और शुगर धीरे बढ़ती है।


लंच में:

2 रोटी

बिना आलू की सब्ज़ी

दाल

दही या सलाद

चाहें तो थोड़ा चिकन या अंडा


डिनर हल्का रखें:

1 रोटी

सब्ज़ी

थोड़ा प्रोटीन

सलाद


स्नैक्स में:

10-15 बादाम

भुने चने

एक कप दूध

हल्की चाय (बिना शुगर)


छोटे हिस्सों में खाने से

शुगर धीरे बढ़ती है और कंट्रोल में रहती है।


एक्सरसाइज़ और रूटीन का रोल

डाइट के साथ-साथ:


रोज़ 30–40 मिनट तेज़ चलना

या कोई भी रेगुलर फिज़िकल एक्टिविटी


बहुत ज़रूरी है।


दवाइयाँ:


समय पर लें

और शुगर का रिकॉर्ड रखें


अगर शुगर बार-बार लिमिट से बाहर जा रही है,

तो पहले:


डाइट सुधारें

एक्सरसाइज़ बढ़ाएँ


और ज़रूरत पड़े तो डॉक्टर से सलाह लें।


HbA1c सात से नीचे लाना संभव है

अगर आप चाहते हैं कि HbA1c सच में सात से नीचे आए,

तो उसके लिए:


मेहनत

अनुशासन

और consistency


तीनों चाहिए।


यह कोई एक दिन का काम नहीं है,

लेकिन सही तरीके से किया जाए

तो कंट्रोल बिल्कुल मुमकिन है।


डायबिटीज़ को हराना नहीं,

समझदारी से मैनेज करना सीखना पड़ता है