प्रेम
प्रेम अलग है, जीवन अलग है, समाज अलग है।
प्रेम इन सब बातो से परे है, प्रेम समाज से परे होकर जीता है और वो उसका अपना ही समाज होता है। प्रेम की असफलता के कई कारण हो सकते है पर प्रेम के होने का सिर्फ और सिर्फ एक ही कारण हो सकता है और वो प्रेम ही है।
प्रेम हमेशा ही अधूरा होता है।
जिसे हम पूर्णता समझते है, वो कभी भी प्रेम नहीं हो सकता। प्रेम का कैनवास इतना बड़ा होता है कि एक ज़िन्दगी उसमे समाई नहीं जा सकती है।
जब आप प्रेम में होते है तो आपको पता चलता है कि आप एक ज़िन्दगी भी जी रहे है.....और ज़िन्दगी ; परत दर परत ज़िन्दगी के रहस्य खोलती है, जिसे आप सिर्फ प्रेम ही समझते है और प्रेम में ही जीते है.... और ऐसा जादू सिर्फ और सिर्फ प्रेम में ही होता है...!
असली प्रेम तो प्रेम में होना ही होता है, प्रेम में पड़ना, प्रेम में गिरना, प्रेम करना इत्यादि सिर्फ उपरी सतह के प्रेम होते है।
असली प्रेम तो बस प्रेम में होना, प्रेम ही हो जाना होता है।
प्रेम बस प्रेम ही ! और कुछ नहीं !
एक अच्छा साथी आपको कभी इस बात को लेकर उलझन में नहीं डालेगा कि आपकी जगह उसके जीवन में क्या है।वह आपसे समय, कोशिश या भरोसे के लिए कभी नहीं तरसाएगा।
एक अच्छा साथी तब भी आपको सही तरीके से संभालेगा जब वह थका हुआ हो।जब वह पूरी तरह समझ न पाए फिर भी वह परवाह करना चुनेगा।
वह आपको सुनेगा, बिना यह महसूस कराए कि आप ज़रूरत से ज़्यादा भावुक हैं।वह आपकी भावनाओं को नकारेगा नहीं, उनका सम्मान करेगा।
वह सार्वजनिक जगहों पर भी और निजी पलों में भी आपकी भावनाओं का हिफ़ाज़त करेगा। एक अच्छा साथी आपकी सहनशक्ति को परखने के लिए सीमाएँ नहीं लांघता।वह खेल नहीं खेलता, अचानक ग़ायब नहीं होता और आपको कभी भी बदले जा सकने जैसा महसूस नहीं कराता।
वह बेचैनी नहीं..सुकून लाता है। वह गोपनीयता से ज़्यादा ईमानदारी चुनता है। बहानों से ज़्यादा कोशिश।
खोखले वादों से ज़्यादा निरंतरता। अगर आपको पहले ग़लत तरीके से प्यार मिला है,तो सही प्यार थोड़ा अनजाना लग सकता है लेकिन वह कभी बोझिल नहीं लगता।
प्यार को जीने की जंग नहीं होनी चाहिए और अगर यह पढ़ते हुए आप कम में समझौता कर रहे हैं,तो यह याद रखिए बुनियादी सम्मान आपको कमाना नहीं पड़तासही इंसान आपको अच्छा व्यवहार देगा, इसलिए नहीं कि आपने माँगा, बल्कि इसलिए कि वह चाहता है।
प्रेम को अक्सर एक समझौते की तरह देखा जाता है। दो लोगों के बीच तय की गई सीमाएँ, अपेक्षाएँ, वादे, और सुरक्षा की भाषा। ये सब सामाजिक ढाँचे के भीतर उपयोगी हो सकते हैं, पर इनसे प्रेम की गहराई नहीं खुलती। जब प्रेम को केवल रिश्ता मान लिया जाता है, तब वो धीरे धीरे लेन-देन बन जाता है। मैं तुम्हें ये देता हूँ, तुम मुझे वो दो। इस गणित में भावना बची रह सकती है, पर मौन खो जाता है।
बहुत लोग प्रेम को स्थिरता से जोड़ते हैं। नौकरी की तरह, घर की तरह, एक सुरक्षित जगह की तरह। पर जो चीज़ सुरक्षित लगती है, वही कई बार डर से बनी होती है। खोने का डर, अकेले रह जाने का डर, अस्वीकार हो जाने का डर। इस डर के भीतर जो जुड़ाव बनता है, वो अक्सर प्रेम कहलाता है, पर असल में वो एक दूसरे को पकड़ने की कोशिश होती है।
जब कोई कहता है, "मैं तुमसे प्रेम करता हूँ," तो अक्सर इसका मतलब होता है, "तुम मेरी ज़रूरत पूरी करते हो।" ये ज़रूरत भावनात्मक हो सकती है, मानसिक हो सकती है, सामाजिक भी। पर ज़रूरत के भीतर स्वतंत्रता नहीं होती। वहाँ एक अदृश्य अनुबंध होता है, जिसमें दोनों पक्ष एक दूसरे से कुछ माँगते रहते हैं, भले शब्दों में न कहें।
जहाँ "तुम" केंद्र बन जाते हो:
प्रेम का पहला स्तर अक्सर दूसरे को केंद्र बनाता है। सब कुछ उसके चारों ओर घूमने लगता है। उसकी पसंद, उसकी नाराज़गी, उसकी स्वीकृति। ये अवस्था मीठी भी लग सकती है, क्योंकि इसमें समर्पण का स्वाद होता है। पर इस समर्पण में छिपी रहती है एक सूक्ष्म अपेक्षा, कि दूसरा भी वैसा ही करे। जब ऐसा नहीं होता, तो भीतर हल्की सी चोट लगती है।
इस स्तर पर ईर्ष्या जन्म लेती है। डर कि कहीं दूसरा किसी और का न हो जाए, कहीं उसका ध्यान बँट न जाए। प्रेम यहाँ एक सुंदर भावना कम और एक पहरेदार अधिक बन जाता है। हर हँसी, हर देर से आया संदेश, हर बदला हुआ स्वर भीतर सवाल खड़ा कर देता है। बाहर मुस्कान रहती है, भीतर हिसाब चलता रहता है।
इस अवस्था में प्रेम दूसरे को जानने से ज़्यादा, उसे सुरक्षित रखने की कोशिश बन जाता है। जैसे कोई कीमती वस्तु हो, जिसे खोना नहीं है। और जहाँ वस्तु का भाव आ जाता है, वहाँ स्वतंत्रता धीरे धीरे सिकुड़ने लगती है। प्रेम अब खुला आकाश नहीं रहता, एक बाड़ा बन जाता है।
जहाँ "मैं" छिपकर शासन करता है:
धीरे धीरे प्रेम का दूसरा रूप उभरता है, जहाँ केंद्र दूसरा नहीं, बल्कि खुद बन जाता है। यहाँ कहा जाता है, "मैं ऐसा हूँ," "मेरी ज़रूरत ये है," "मुझे ऐसा साथी चाहिए।" प्रेम अब दर्पण बन जाता है, जिसमें इंसान खुद को देखने लगता है। दूसरा व्यक्ति एक साधन की तरह हो जाता है, जिसके ज़रिए खुद को पूरा महसूस किया जा सके।
इस स्तर पर संबंधों में भाषा बदल जाती है। त्याग की जगह अधिकार आ जाता है। समझ की जगह तर्क। कोमलता की जगह शर्तें। कहा नहीं जाता, पर भीतर लिखा रहता है, "मैंने इतना किया, तुमने क्या किया?" प्रेम अब बहाव नहीं रहता, एक खाता बन जाता है।
इस अवस्था में भी टकराव पैदा होता है, पर वजह अलग होती है। पहले डर था कि दूसरा बदल न जाए, अब डर होता है कि मेरा रूप न टूट जाए। मेरी पहचान, मेरी छवि, मेरी अपेक्षाएँ। जब दूसरा इनसे अलग चलता है, तो उसे गलत कहा जाता है, या स्वार्थी, या असंवेदनशील। प्रेम अब देखने का माध्यम नहीं, मापने का औज़ार बन जाता है।
जहाँ "मैं" और "तुम" दोनों गिर जाते हैं:
एक तीसरी अवस्था भी होती है, जो बहुत कम जानी जाती है, और और भी कम जी जाती है। यहाँ न दूसरा केंद्र होता है, न खुद। यहाँ प्रेम किसी व्यक्ति के चारों ओर नहीं घूमता, बल्कि एक ऐसी दृष्टि बन जाता है जिसमें व्यक्ति दिखाई देते हैं, पर केंद्र नहीं रहते।
इस अवस्था में संबंध रहते हैं, पर पकड़ नहीं रहती। साथ होता है, पर स्वामित्व नहीं होता। बोलचाल होती है, पर भीतर हिसाब नहीं चलता। अगर दूसरा बदलता है, तो दर्द हो सकता है, पर अपमान नहीं होता। क्योंकि यहाँ प्रेम को किसी पहचान से बाँधा नहीं गया होता।
इस अवस्था में ईर्ष्या नहीं पनपती, क्योंकि तुलना नहीं होती। डर नहीं टिकता, क्योंकि खोने की भाषा ही नहीं रहती। जो है, वो है। जो चला जाए, वो गया। ये सुनने में कठोर लगता है, पर भीतर से ये बहुत शांत होता है। जैसे नदी बहती है, किसी पत्थर से चिपकती नहीं।
इस प्रेम में कोई घोषणा नहीं होती। कोई कहता नहीं कि अब मैं ऊँचे स्तर पर पहुँच गया हूँ। यहाँ कोई स्तर भी नहीं बचता। बस एक ऐसी निकटता होती है, जिसमें दो शरीर होते हैं, दो जीवन होते हैं, पर देखने की जगह एक होती है।
लहर और पानी का संकेत:
अलगाव की अनुभूति अक्सर भाषा से बनती है। मैं अलग हूँ, तुम अलग हो। मेरी कहानी अलग, तुम्हारी अलग। पर जैसे लहर और पानी को अलग नहीं किया जा सकता, वैसे ही चेतना के स्तर पर ये विभाजन टिक नहीं पाता। लहर ऊँची है, नीची है, तेज़ है, धीमी है, पर पानी वही रहता है।
जब प्रेम इस पानी को पहचान लेता है, तब व्यक्ति का रूप गौण हो जाता है। नाम, भूमिका, अतीत, सब सतह पर रह जाते हैं। भीतर एक ही गति चलती है, एक ही स्पंदन। यहाँ प्रेम देना या लेना नहीं रहता, बस घटित होता है।
इस अवस्था में किसी को सुधारने की इच्छा नहीं होती। न खुद को, न दूसरे को। क्योंकि सुधार की धारणा में भी एक आदर्श छिपा होता है, और आदर्श के साथ तुलना आती है। यहाँ कोई आदर्श नहीं, कोई लक्ष्य नहीं। बस एक खुला देखना है, जिसमें जो है, वही पर्याप्त है।
ऐसा प्रेम रोमांचक नहीं लगता। इसमें न नाटक है, न ऊँची भावनात्मक लहरें। पर इसमें गहराई होती है, जो किसी शब्द से नहीं पकड़ी जा सकती। जैसे गहरा समुद्र, ऊपर से शांत, भीतर अनगिनत धाराएँ।
प्रेम और आत्म-बोध:
जब प्रेम किसी व्यक्ति से बड़ा हो जाता है, तब वो आत्म-बोध से जुड़ जाता है। आत्म-बोध किसी विशेष अनुभव का नाम नहीं, बल्कि इस साफ़ समझ का नाम है कि देखने वाला और जो देखा जा रहा है, वो अलग नहीं हैं। इस समझ में संबंध अपने आप सरल हो जाते हैं।
यहाँ प्रेम कर्तव्य नहीं रहता। कोई ये नहीं कहता कि मुझे ऐसा करना चाहिए। जो होता है, स्वाभाविक होता है। सहायता हो, दूरी हो, साथ हो, मौन हो, सब बिना तनाव के घटता है।
इस अवस्था में शांति कोई उपलब्धि नहीं होती, बल्कि एक स्वाभाविक वातावरण बन जाती है। जैसे सुबह की ठंडी हवा, जो किसी प्रयास से नहीं आती, बस आती है। प्रेम यहाँ साधन नहीं, परिणाम भी नहीं। ये बस एक तरीका है देखने का, जिसमें दुनिया टुकड़ों में नहीं दिखती।
और जब दुनिया टुकड़ों में नहीं दिखती, तब संघर्ष का आधार अपने आप ढीला पड़ जाता है। क्योंकि लड़ाई हमेशा हिस्सों के बीच होती है, पूरे के भीतर नहीं।
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