पुरुष की जिंदगी में सबसे पहली हार तलवार से नहीं होती..???
बल्कि उसकी नजर से शुरू होती है।
एक पल का अनियंत्रित देखना,
धीरे-धीरे विचार बनता है,
विचार आदत बनता है,
और आदत चरित्र को कमजोर कर देती है।
इसीलिए प्राचीन भारत के सबसे कठोर और यथार्थवादी आचार्य—चाणक्य—ने युद्ध से पहले नहीं, नज़र से पहले चेतावनी दी।
अधिकांश लोग चाणक्य को केवल राजनीति और सत्ता का गुरु मानते हैं।
लेकिन सच यह है कि वे आत्म-नियंत्रण, मर्यादा और मानव चरित्र के सबसे बड़े मार्गदर्शक थे।
उनकी नीतियाँ किसी एक समय या समाज तक सीमित नहीं थीं।
वे मनुष्य के स्वभाव को समझकर लिखी गई थीं।
इसी कारण आज भी उतनी ही सटीक बैठती हैं।
चाणक्य का स्पष्ट मत था—
जो व्यक्ति अपनी इंद्रियों पर नियंत्रण नहीं रख सकता,
वह न रिश्ते निभा सकता है,
न सत्ता संभाल सकता है,
और न ही अपना भविष्य सुरक्षित कर सकता है।
और पुरुष के जीवन में सबसे पहली परीक्षा होती है उसकी दृष्टि।
नज़र अगर भटकी हुई हो,
तो बुद्धि भी भटक जाती है।
और जब बुद्धि भ्रष्ट होती है,
तो निर्णय गलत होने लगते हैं।
इसीलिए चाणक्य ने पुरुषों के लिए कुछ ऐसी अवस्थाएँ बताईं,
जहाँ उन्हें बिना सोचे-समझे
अपनी नज़र तुरंत हटा लेनी चाहिए।
जब कोई स्त्री भोजन कर रही हो,
तो पुरुष को उसे नहीं देखना चाहिए।
क्योंकि उस समय वह निजी और संवेदनशील अवस्था में होती है।
मर्यादित पुरुष वही होता है
जो दूसरे के निजी क्षणों का सम्मान करना जानता है।
यदि कोई स्त्री अपने वस्त्र संभाल रही हो,
तो उस समय उसे देखना
चाणक्य के अनुसार मर्यादा के विरुद्ध है।
जो व्यक्ति सीमाओं को नहीं समझता,
वह कभी भरोसे के योग्य नहीं होता।
जब कोई स्त्री छींक रही हो
या जम्हाई ले रही हो,
तो उस क्षण उसे निहारना भी अनुचित माना गया है।
मर्यादा केवल बड़े अपराधों से नहीं टूटती,
छोटी असावधानियों से भी टूटती है।
जब कोई स्त्री शृंगार कर रही हो—
काजल लगाते हुए,
बाल संवारते हुए,
या स्वयं को सजा रही हो—
तो पुरुष को अपनी दृष्टि हटा लेनी चाहिए।
ऐसे क्षण आत्मिक और निजी होते हैं।
और उस समय नज़र हटाना
पुरुष के संस्कारों की पहचान है।
यहाँ तक कि यदि कोई स्त्री बच्चे की तेल-मालिश कर रही हो,
तो उस दृश्य को भी
अनावश्यक रूप से देखना
चाणक्य के अनुसार मर्यादा-भंग है।
यह केवल स्त्री का नहीं,
मातृत्व का भी अपमान है।
चाणक्य ने ये नियम कभी स्त्री को नीचा दिखाने के लिए नहीं बनाए।
बल्कि पुरुष के आत्म-संयम और चरित्र की रक्षा के लिए बनाए।
वे साफ कहते हैं—
जिस पुरुष की नज़र अनुशासित होती है,
उसका मन भी अनुशासित होता है।
और जिसका मन नियंत्रित है,
वही जीवन में सही निर्णय ले पाता है।
पतन हमेशा बड़े पाप से नहीं आता।
वो पहले दृष्टि से शुरू होता है,
फिर विचार से,
और अंत में कर्म से।
इसीलिए चाणक्य की यह शिक्षा आज भी उतनी ही महत्वपूर्ण है—
नज़र बचाओ,
मन बचाओ,
चरित्र बचाओ,
और स्वयं को पतन से दूर रखो।
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