पुरुष प्रेम में “आसान रास्ता” क्यों ढूँढता है?
वह फोन देखता है।
संदेश छोटा है, पर भारी
“हमें बात करनी है।”
उसके सीने में हल्की सी जकड़न होती है।
वह सोचता है
मैंने क्या गलत किया?
अब क्या कमी रह गई?
मैं और कितना दूँ?
वह जवाब टाल देता है।
बात नहीं, भावना से बचता है।
यहीं से “आसान रास्ता” शुरू होता है।
1. भावनाओं से दूरी रखना उसे सिखाया गया है
अधिकांश समाजों में पुरुष बचपन से सुनते आए हैं:
“लड़के रोते नहीं”
“भावुक होना कमज़ोरी है”
“खुद को संभालो”
धीरे-धीरे वे सीख लेते हैं कि
भावना = खतरा
नतीजा यह होता है कि:
वे अपनी भावनाओं को पहचानना नहीं सीखते
उन्हें शब्द देना तो और भी मुश्किल हो जाता है
जब रिश्ते में कोई असहज भावना आती है
अपेक्षा, शिकायत, असंतोष
तो उसे सुलझाने की बजाय उससे बचना ज़्यादा सुरक्षित लगता है।
उदाहरण:
महिला कहती है
“मुझे तुम्हारा समय चाहिए, बात करनी है।”
पुरुष के भीतर अनकहा अनुवाद होता है
मैं नाकाम हो रहा हूँ।
मैं पर्याप्त नहीं हूँ।
और वह सुनने की बजाय बचाव की मुद्रा में चला जाता है।
2. पुरुषों की भावनात्मक भाषा सीमित होती है
महिलाएँ अक्सर रिश्तों में:
बात करके
साझा करके
भावनात्मक जुड़ाव से
समस्याएँ सुलझाती हैं।
जबकि पुरुषों को सिखाया जाता है:
समस्या = हल
भावना = बाधा
इसलिए जब रिश्ता “हल” नहीं,
“समझे जाने” की मांग करता है,
तो पुरुष असहज हो जाता है।
उदाहरण:
महिला कहती है
“तुम मेरी बात नहीं समझते।”
वह समाधान नहीं चाह रही,
वह उपस्थिति चाह रही है।
पुरुष सोचता है
तो मैं करूँ क्या?
कोई स्पष्ट निर्देश क्यों नहीं है?
और जब उत्तर नहीं मिलता,
वह पीछे हट जाता है।
3. कम्फर्ट ज़ोन टूटते ही पलायन
मानव मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से दर्द से बचता है।
पुरुषों में यह अक्सर ऐसे दिखता है:
रिश्ता आसान है "सब ठीक"
रिश्ता मेहनत माँगता है " दूरी"
क्योंकि उन्होंने कभी सीखा ही नहीं कि:
रिश्तों में कठिन समय
स्थायी नहीं होता।
उदाहरण:
शुरुआत में सब अच्छा है
तारीफ, आकर्षण, खुशी।
फिर अपेक्षाएँ आती हैं
“मुझे प्राथमिकता चाहिए”
“तुम बदल गए हो”
पुरुष सोचता है
शायद यह रिश्ता ही गलत है
जबकि सच्चाई यह होती है कि
रिश्ता अगले स्तर पर जा रहा होता है।
4. असफल होने का डर
पुरुषों की पहचान अक्सर इनसे जुड़ जाती है:
सफल होना
मजबूत रहना
नियंत्रण में रहना
जब रिश्ते में संघर्ष आता है,
तो वह इसे भावनात्मक चुनौती नहीं,
व्यक्तिगत असफलता मान लेते हैं।
और असफलता का सामना करने से बेहतर उन्हें लगता है:
दूरी बना लो
भावनाओं से कट जाओ
रिश्ता छोड़ दो
क्योंकि सामना करना
उन्हें कमज़ोर महसूस कराता है।
5. प्रेम को प्रयास नहीं, परिणाम समझ लेना
कई पुरुष मान लेते हैं:
अगर प्यार है, तो सब अपने आप ठीक रहेगा
जबकि सच यह है:
प्रेम एक कर्म है,
सिर्फ़ भावना नहीं।
रिश्ते निभाने के लिए:
सुनना पड़ता है
बदलना पड़ता है
अहं छोड़ना पड़ता हैं
और ये चीज़ें
उन्हें कभी सिखाई ही नहीं गईं।
6. लेकिन यह “सभी पुरुष” नहीं हैं
यह कहना ज़रूरी है कुछ पुरुष:
गहराई से जुड़ते हैं
टिकते हैं
भावनात्मक रूप से परिपक्व होते हैं
अंतर यह नहीं कि वे डरते नहीं,
अंतर यह है कि उन्होंने:
अपने डर को पहचाना
भागने की बजाय सामना करना सीखा
समस्या पुरुष नहीं, परवरिश है
पुरुष प्रेम से नहीं भागता।
वह उस एहसास से भागता है कि
“मुझे और बेहतर होना पड़ेगा।”
और उसे कभी यह नहीं सिखाया गया कि
बेहतर होना अपमान नहीं,
विकास है।
समाधान कहाँ है?
पुरुषों को भावनात्मक शिक्षा देना
यह सिखाना कि “मुझे समझ नहीं आ रहा” भी ईमानदारी है
रिश्तों को संघर्ष-मुक्त नहीं, संघर्ष-सक्षम बनाना
प्रेम को आसान नहीं, सार्थक मानना
क्योंकि
आसान रास्ता अकेला छोड़ देता है,
और कठिन रास्ता
साथ चलना सिखाता है।
राहुल कुमार झा ✒️✒️
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