Sunday, January 18, 2026

तुम्हें कैसे पता चलता है कि कोई तुम्हें प्रेम करता है।

तुम्हें कैसे पता चलता है कि कोई तुम्हें प्रेम करता है।

तुम एक स्त्री या एक पुरुष के प्रेम में पड़ते हो, क्या तुम सही-सही बता सकते हो कि इस स्त्री ने तुम्हें क्यों आकर्षित किया? निश्चय ही तुम उसकी आत्मा नहीं देख सकते, तुमने अभी तक अपनी आत्मा को ही नहीं देखा है। तुम उसका मनोविज्ञान भी नहीं देख सकते क्योंकि किसी का मन पढ़ना आसान काम नहीं है। तो तुमने इस स्त्री में क्या देखा? तुम्हारे शरीर विज्ञान में, तुम्हारे हार्मोन में कुछ ऐसा है जो इस स्त्री के शरीर विज्ञान की ओर, उसके हार्मोन की ओर, उसकी केमिस्ट्री की ओर आकर्षित हुआ है। यह प्रेम प्रसंग नहीं है, यह रासायनिक प्रसंग है।


जरा सोचो, जिस स्त्री के प्रेम में तुम हो वह यदि डाक्टर के पास जाकर अपना सैक्स बदलवा ले और मूछें और दाढ़ी ऊगाने लगे तो क्या तब भी तुम इससे प्रेम करोगे? कुछ भी नहीं बदला, सिर्फ केमिस्ट्री, सिर्फ हार्मोन। फिर तुम्हारा प्रेम कहां गया?


सिर्फ एक प्रतिशत लोग थोड़ी गहरी समझ रखते हैं। कवि, चित्रकार, संगीतकार, नर्तक या गायक के पास एक संवेदनशीलता होती है जो शरीर के पार देख सकती है। वे मन की, हृदय की सुंदरताओं को महसूस कर सकते हैं क्योंकि वे खुद उस तल पर जीते हैं।


इसे एक बुनियादी नियम की तरह याद रखो: तुम जहां भी रहते हो उसके पार नहीं देख सकते। यदि तुम अपने शरीर में जीते हो, स्वयं को सिर्फ शरीर मानते हो तो तुम सिर्फ किसी के शरीर की ओर आकर्षित होओगे। यह प्रेम का शारीरिक तल है। लेकिन संगीतज्ञ , चित्रकार, कवि एक अलग तल पर जीता है। वह सोचता नहीं, वह महसूस करता है। और चूंकि वह हृदय में जीता है वह दूसरे व्यक्ति का हृदय महसूस कर सकता है। सामान्यतया इसे ही प्रेम कहते हैं। यह विरल है। मैं कह रहा हूं शायद केवल एक प्रतिशत, कभी-कभार।

पहली बात, संभोग को इस तरह मत लो जैसे कि कहीं और पहुंचना है,,,,इसे साधन की भांति मत लो,,,,,यह अपने में ही साध्य है,,,,इसका कोई लक्ष्य नहीं यह कोई माध्यम नहीं.... 


दूसरी बात भविष्य की मत सोचो,,,, वर्तमान में स्थित रहो। अगर तुम काम-कृत्य के आरंभिक भोग में वर्तमान में नहीं हो सकते तो तुम कभी भी वर्तमान में नहीं टिक सकते,,,,क्योंकि इस कृत्य की प्रकृति ही ऐसी है कि तुम वर्तमान में फेंक दिए जाते हो,,,, वर्तमान में स्थित रहो। दो शरीरों दो आत्माओं के मिलन का सुख भोगो और एक दूसरे में लीन हो जाओ, एक दूसरे में पिघल जाओ। भूल जाओ कि तुम्हें कहीं पहुंचना है। उस क्षण में स्थित रहो कहीं जाना नहीं है पिघल जाओ। प्रेम की उष्मा पिघला कर एक दूसरे में विलीन हो जाने की परिस्थिति बनाओ। 


इसी कारण अगर प्रेम नहीं है तो संभोग शीघ्रता में किया गया एक कृत्य है। तुम दूसरे का उपयोग कर रहे हो दूसरा साधन मात्र है। और दूसरा तुम्हारा उपयोग कर रहा है। तुम दोनों एक दूसरे का शोषण कर रहे हो एक दूसरे में विलीन नहीं हो रहे। प्रेम में तुम एक दूसरे में खो जाते हो। प्रारंभ में यह एक दूसरे में खो जाना एक नई दृष्टि देगा...


प्रेम पूर्ण नहीं होता और उसे कभी पूर्ण होना भी नहीं था। उसमें कमियाँ होती हैं,गलतफ़हमियाँ होती हैं,

कुछ शांत ठहराव होते हैं और ऐसे पल भी

जो धैर्य की परीक्षा लेते हैं।

लेकिन तुम्हारे साथ यह प्रेम सच्चा लगता है।

सुरक्षित लगता है। वास्तविक लगता है।

सच्चा प्रेम हर चीज़ सही करने का नाम नहीं है।

यह उस वक़्त भी एक-दूसरे को चुनने का नाम है

जब हालात आसान न हों।

यह थामे रखने में है,ज़्यादा सुनने में है,

बार-बार माफ़ करने में है और ठहरे रहने में है

इसलिए नहीं कि सब कुछ परफेक्ट है,

बल्कि इसलिए कि यह रिश्ता क़ीमती है।

तुम्हारे साथ प्रेम स्वाभाविक लगता है।

न दिखावटी,न ज़बरदस्ती का।

बस दो दिल जो सीख रहे हैं,

बढ़ रहे हैं और सबसे सच्चे रूप में

एक-दूसरे से प्रेम कर रहे हैं। 





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