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Wednesday, February 4, 2026

वात दोष से होने वाली सामान्य परेशानियां

 Flaxseed Oil - Flaxseed oil - वात की बीमारियों का आयुर्वेदिक समाधान – अलसी का तेल - हम बात करेंगे वात दोष और उससे जुड़ी हर बीमारी के लिए एक सबसे प्रभावशाली तेल के बारे में। 


आयुर्वेद में जब भी किसी बीमारी का इलाज किया जाता है, उसका बेस होता है दोष – वात, पित्त और कफ। लेकिन इन तीनों में सबसे ताकतवर और नियंत्रक कौन है? इसका जवाब है वात।


वात इतना महत्वपूर्ण है कि मन, बुद्धि, इंद्रियां, हार्मोन्स और शरीर की हर छोटी-सी एक्टिविटी – जैसे अंगुली हिलना, पलक झपकना – सब वात नियंत्रित करता है।


वात दोष से होने वाली सामान्य परेशानियां


जोड़ों का दर्द (ऑस्टियोआर्थराइटिस, रुमेटॉइड आर्थराइटिस)

मसल्स सूखना, घुटनों का ग्रीस खत्म होना

पेट में गैस, कब्ज, मल कड़क होना

पीरियड्स के दौरान दर्द और सूखापन

ड्राई स्किन, ड्राई हेयर, डैंड्रफ

वजाइनल ड्राइनेस और संबंध के दौरान दर्द

कान में घंटी बजने जैसा साउंड, सिर दर्द, हेडेक


वात दोष से जुड़ी ये सारी परेशानियां शरीर में सूखापन और हल्का होने के कारण होती हैं।


आयुर्वेद में अलसी – अतिसी / Flax Seeds

नाम और पहचान:


हिंदी: अलसी

मराठी: जवस

अंग्रेजी: Flax Seeds

गुजरात: मुखवास के रूप में उपयोग


विशेषताएँ:


गुरु (भारी)

स्निग्ध (चिकना)

उष्ण प्रकृति


काम करने का तरीका:


वात जो हल्का, ठंडा और सूखा होता है, उसे भारी, चिकना और गर्म प्रकृति वाला अलसी तेल संतुलित करता है।

पेट, स्किन, हेयर और जोड़ों में सूखापन और दर्द को कम करता है।

मल को नरम करता है और कब्ज को दूर करता है।


अलसी के तेल के लाभ

1. पेट और मल संबंधी परेशानियां

कब्ज, कड़क मल, पेट में गैस


इस्तेमाल: 2 चम्मच अलसी का तेल + आधा चम्मच नींबू, गर्म करके खाने से राहत


2. त्वचा और मसल्स

ड्राई स्किन, एसी पंखे में बैठने से सूखापन, मसल्स कमजोरी


मालिश में इस्तेमाल करने से सूखापन और दर्द कम होता है


3. महिलाओं के लिए

पीरियड्स से पहले दर्द और क्रैंप

वजाइनल ड्राइनेस, संबंध के दौरान दर्द


उपयोग: बस्ती (एनिमा) या पिचू – कॉटन को तेल में भिगोकर 5–15 मिनट लगाने से राहत


4. पुरुषों के लिए

अत्यधिक हस्त मैथुन के कारण पेन या सूखापन

वृषण (टेस्टिस) और वेरिकोसाइल जैसी तकलीफें


5. जोड़ों और हड्डियों के लिए

घुटनों और एड़ियों का दर्द, सूखापन


मालिश करने से जोड़ और मसल्स मजबूत होते हैं


6. बाल और स्किन

ड्राई डैंड्रफ, सूखे बाल

एसी पंखे या ठंडी हवा से सिर दर्द


7. कैंसर में भी उपयोग

बुडविग प्रोटोकॉल के अनुसार, अलसी तेल और मक्खन रोगी को दिया जाता है

वात दोष के कारण अनियंत्रित सेल ग्रोथ को नियंत्रित करने में मदद


अलसी का तेल किसके लिए सही नहीं

पहले से कफ और पित्त अधिक होने वालों को एलसी तेल नहीं लेना चाहिए


जैसे एसिडिटी, ज्यादा पसीना, गर्मी, मुंह में छाले

आंखों की समस्या होने पर भी सीधा सेवन ना करें


सेफ्टी टिप:


मक्खन (देसी गाय का) के साथ लेने से एलसी तेल सुरक्षित बनता है

वात प्रकृति वाले लोग इसे रोज़ाना 1 चम्मच मक्खन के साथ ले सकते हैं


उपयोग का तरीका

ओरल सेवन:

1–2 चम्मच अलसी तेल + आधा चम्मच नींबू या मक्खन, खाने से पहले


मालिश:

जोड़ों, एड़ियों, मसल्स और ड्राई स्किन पर


पिचू / बस्ती:

वजाइनल ड्राइनेस, कब्ज और पेन के लिए

कॉटन को तेल में भिगोकर 5–15 मिनट प्रभावित जगह पर रखें


भुने बीज:


कब्ज या लूज मोशन रोकने के लिए

बालों और स्किन की मजबूती के लिए


Conclusion

वात से जुड़ी हर परेशानी – पेट, जोड़ों, स्किन, बाल, पीरियड्स, पुरुष या महिला की तकलीफ – में अलसी का तेल एक भारी, स्निग्ध और गर्म प्रकृति वाली आयुर्वेदिक दवा है।


रोज़ाना सेवन और सही तरीके से इस्तेमाल करने से वात दोष नियंत्रित होता है

शरीर में सूखापन, दर्द और कब्ज कम होते हैं

हड्डियों, मसल्स, बाल, स्किन और पेट की समस्याओं में सुधार आता है


टिप: हमेशा अपने दोष के अनुसार मात्रा और तरीका चुनें – पित्त और कफ ज्यादा होने पर सावधानी बरतें।


Tuesday, February 3, 2026

बीमारी की शुरुआत कहाँ से होती है?

 Chronic illness - एक बीमारी कितने साल तक पीछा कर सकती है? अक्सर जब किसी से पूछा जाए कि एक बीमारी इंसान को कितने समय तक परेशान कर सकती है, तो जवाब आता है-दो महीने, छह महीने, एक साल या ज़्यादा से ज़्यादा पाँच साल।


लेकिन हकीकत यह है कि अगर बीमारी की जड़ पर काम न हो, तो वही समस्या 15–20 साल या उससे भी ज़्यादा समय तक इंसान की ज़िंदगी को जकड़े रख सकती है।


बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो सालों तक अलग-अलग इलाज कराते रहते हैं, रिपोर्ट्स करवाते रहते हैं, दवाइयाँ बदलते रहते हैं—लेकिन असली राहत नहीं मिलती।


बीमारी की शुरुआत कहाँ से होती है?

अधिकांश लंबे समय तक चलने वाली समस्याएँ अचानक नहीं आतीं।

इनकी शुरुआत धीरे-धीरे होती है और अक्सर पाचन तंत्र (Digestive system) से शुरू होती है।


आमतौर पर क्रम कुछ ऐसा होता है:


पहले कब्ज (Constipation)

फिर धीरे-धीरे एलर्जी, सर्दी-जुकाम, राइनाइटिस

उसके बाद भूख कम लगना

फिर कभी लूज़ मोशन, कभी अनियमित मल

आगे चलकर पेट में जलन, सीने में जलन, गैस

साथ में नाक-गले से कफ, तालू में खुजली, छींक

और समय के साथ यूरिन, मोशन, सीने तक जलन का एहसास

यानी समस्या पेट से शुरू होकर पूरे शरीर में फैल जाती है।


क्यों नॉर्मल रिपोर्ट के बावजूद तकलीफ बनी रहती है?

कई लोग बड़े-बड़े अस्पतालों में जाते हैं,

एंडोस्कोपी, कोलोनोस्कोपी, CT स्कैन, अल्ट्रासाउंड—सब कराते हैं।


रिपोर्ट्स आती हैं:


“सब नॉर्मल है”

लेकिन तकलीफ नॉर्मल नहीं होती।


ऐसा इसलिए क्योंकि:


जाँच में संरचना (Structure) दिखती है

लेकिन कार्यप्रणाली (Function) का असंतुलन नहीं दिखता


आयुर्वेद इसी फंक्शनल गड़बड़ी को पकड़ता है।


आयुर्वेद के अनुसार असली गड़बड़ी क्या होती है?

आयुर्वेद के नजरिए से देखें तो ऐसे लंबे समय तक चलने वाले मामलों में आमतौर पर:


अपान वायु बिगड़ चुकी होती है

कफ शरीर में जमा होता जाता है

अग्नि (Digestive fire) कमजोर हो जाती है

शरीर अंदर से सूखा होता है, बाहर से कफ भरा लगता है


इसी वजह से:


एलर्जी बार-बार होती है

कफ साफ नहीं होता

जलन बनी रहती है

वजन नहीं बढ़ता

दवाइयों का असर टिकता नहीं


सिर्फ दवा क्यों काफी नहीं होती?

जब बीमारी 10–15–20 साल पुरानी हो, तो सिर्फ गोली या काढ़ा काफी नहीं होता।

ऐसे मामलों में आयुर्वेद कहता है:


“पहले शरीर से जमा हुआ दोष निकालो, फिर पोषण दो।”


अगर कफ शरीर में भरा पड़ा है और उसे निकाले बिना सिर्फ टॉनिक या दवा दी जाए, तो फायदा नहीं होता।


शोधन चिकित्सा का रोल

लंबे समय से चली आ रही समस्याओं में शोधन (Detoxification) बहुत अहम हो जाता है।


शोधन का मतलब:


शरीर में जमा दोष को बाहर निकालना

अग्नि को फिर से जगाना

चैनल्स को साफ करना


इसमें प्रमुख तौर पर:


वमन – जब कफ प्रधान समस्या हो

बस्ती – जब वात ज्यादा बिगड़ा हो


डर की बात यह नहीं है कि शोधन होगा या नहीं,

असल सवाल यह है कि:


क्या सही तरीके से, सही व्यक्ति में, सही तैयारी के साथ किया जा रहा है या नहीं?


दुबले-पतले लोग और शोधन का डर

एक आम डर यह भी होता है कि:


“मैं दुबला हूँ, कमजोर हूँ, मेरा शोधन कैसे होगा?”


आयुर्वेद साफ कहता है:


अगर अग्नि तैयार की जाए

अगर बल धीरे-धीरे बढ़ाया जाए

और सही क्रम अपनाया जाए

तो दुबले से दुबले व्यक्ति का भी शोधन सुरक्षित रूप से हो सकता है।


बीमार व्यक्ति का शोधन मौसम से बंधा नहीं होता,

ऋतु अनुसार शोधन स्वस्थ व्यक्ति के लिए होता है।


शोधन के बाद क्या बदलाव आते हैं?

जब सही तरीके से कफ बाहर निकलता है और वात को संतुलित किया जाता है, तो लोग अक्सर बताते हैं:


शरीर हल्का लगने लगता है

जलन में तेजी से कमी

भूख वापस आने लगती है

नाक-गले का कफ साफ

एलर्जी के अटैक कम

एसी, ठंड, मौसम से डर कम

एनर्जी लेवल बेहतर


यहीं से असली रिकवरी की जर्नी शुरू होती है।


बस्ती का लॉन्ग-टर्म रोल

जहाँ बीमारी की जड़ वात में हो, वहाँ बस्ती सबसे असरदार इलाज माना गया है।


नियमित बस्ती से:


अपान वायु सुधरती है

मल-मूत्र की जलन कम होती है

गैस और ब्लोटिंग कंट्रोल में आती है

एलर्जी की फ्रीक्वेंसी घटती है


इसीलिए कई मामलों में बस्ती को लंबे समय तक अपनाने की सलाह दी जाती है।


घर पर क्या करें? 

यह बातें उन लोगों के लिए हैं जिन्हें

गले में जलन/दर्द, एसिड रिफ्लक्स, कफ, एलर्जी, भारीपन या सालों पुरानी पाचन की दिक्कत रहती है।


यह इलाज का विकल्प नहीं, बल्कि इलाज को काम करने लायक बनाने की ज़मीन है।


1. सुबह की शुरुआत कैसे करें

उठते ही

गुनगुना पानी 1–2 गिलास

रात का जमा कफ ढीला करता है

अपान वायु को मूवमेंट देता है


अगर जलन ज्यादा रहती है:

गुनगुने पानी में

½ चम्मच सौंफ या धनिया पानी (रात में भिगोया हुआ)


2. अग्नि सुधार – सबसे ज़रूरी काम

अगर पाचन ठीक नहीं होगा, तो:


एसिड बनेगा

कफ ऊपर जाएगा

गला बार-बार खराब होगा


खाने से पहले (दिन में 1–2 बार)

अदरक का छोटा टुकड़ा + 1 चुटकी सेंधा नमक


बहुत जलन हो - अदरक न लें

या

जीरा + धनिया + सौंफ (बराबर मात्रा)

उबालकर गुनगुना पानी पिएँ


यह अग्नि को शांत तरीके से सुधारता है, भड़काता नहीं।


3. गले की जलन / दर्द के लिए

 दिन में 2 बार

मुलेठी (Yashtimadhu) ½ चम्मच पाउडर

गुनगुने पानी या शहद के साथ

डायबिटीज़ हो तो शहद न लें


 मुलेठी:


पित्त को शांत करती है

गले की परत को heal करती है

एसिड की जलन कम करती है


गरारे

गुनगुना पानी + चुटकी हल्दी + चुटकी सेंधा नमक

रात को खासतौर पर फायदेमंद


4. कफ और एसिड साथ में हो तो

यह कॉम्बिनेशन बहुत आम है।


सुबह या शाम

त्रिफला चूर्ण ½ चम्मच

गुनगुने पानी के साथ (रात में बेहतर)


इससे:


मल साफ होता है

कफ नीचे की ओर मूव होता है

एसिड ऊपर नहीं चढ़ता


5. खाने का तरीका 

क्या करें

खाना गर्म, ताज़ा और सिंपल

दिन में 2–3 बार ही ठीक से खाएँ

बहुत देर तक भूखे न रहें


क्या कम करें

खट्टा, बहुत तीखा, तला हुआ

रात में दही, छाछ

बिस्कुट, नमकीन, बेकरी

चाय-कॉफी (खासकर खाली पेट)


क्या बेहतर रहता है

मूंग दाल

लौकी, तोरी, गाजर, टिंडा

चावल कम मात्रा में

रोटी सीमित

घी 1–2 चम्मच (डरें नहीं)


6. खाने के बाद क्या न करें

खाने के तुरंत बाद लेटना नहीं

पानी बहुत ज़्यादा नहीं

मोबाइल पर झुककर बैठना नहीं


खाने के बाद

5–10 मिनट टहलना

यह छोटी आदत एसिड रिफ्लक्स आधा कर देती है।


7. साँस और मन का रोल 

पित्त और एसिड सिर्फ पेट की नहीं,

नर्वस सिस्टम की भी समस्या है।


रोज़ 10 मिनट

अनुलोम-विलोम

भ्रामरी (गुनगुनाहट वाली)


इससे:


एसिड का ओवरफ्लो कम

गले की जकड़न ढीली

नींद बेहतर


8. सबसे बड़ी गलती जो लोग करते हैं

“दवा खा ली, अब सब चल जाएगा”

“कभी ठीक, कभी खराब—चलता है”


लेकिन याद रखें:


जो बीमारी सालों में बनी है,

वो कुछ हफ्तों में नहीं जाएगी।


घर की ये आदतें:


दवा का असर बढ़ाती हैं

शोधन के लिए शरीर तैयार करती हैं

और relapse से बचाती हैं


आख़िरी बात (बहुत ज़रूरी)

अगर:


जलन रोज़ है

वजन गिर रहा है

रात में नींद टूटती है

दवाइयों से भी आराम नहीं


तो सिर्फ घरेलू उपायों पर न रुकें।

किसी अनुभवी आयुर्वेदिक वैद्य से सही मूल्यांकन ज़रूरी है।


लेकिन

घर पर ये सब करना शुरू कर देंगे,

तो आधी लड़ाई वहीं जीत लेंगे।


आयुर्वेद से डर या भरोसा?

बहुत लोगों को डराया जाता है:


“आयुर्वेद से किडनी खराब हो जाएगी”

“लीवर खराब हो जाएगा”

“आप बहुत कमजोर हैं”


लेकिन सच्चाई यह है:


गलत हाथों में कोई भी चिकित्सा नुकसान कर सकती है,

और सही हाथों में आयुर्वेद शरीर को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखता है।


आख़िरी बात

जो समस्याएँ सालों से चली आ रही हैं,

उनका समाधान भी धैर्य, अनुशासन और सही दिशा से ही आता है।


आयुर्वेद कोई जादू नहीं,

लेकिन अगर सही समझ के साथ अपनाया जाए,

तो वह शरीर को दोबारा बैलेंस में लाने की ताकत ज़रूर रखता है।


बीमारी ठीक होने में समय लगे-यह स्वीकार्य है,

लेकिन ठीक हो सकती है, यह भरोसा सबसे ज़रूरी है।

वात-पित्त वाले लोग कौन-सी दाल खाएं

 Foods for Vata Pitta - वात-पित्त वाले लोग कौन-सी दाल खाएं? क्या दाल सच में आपको सूट नहीं करती? या फिर गड़बड़ है आपकी बॉडी टाइप में? क्या आपको दाल खाना अच्छा लगता है, लेकिन हर बार खाने के बाद पेट फूलकर गुब्बारे जैसा हो जाता है? 


या फिर सीने में इतनी तेज़ जलन होती है कि अगली बार दाल देखने का मन ही नहीं करता?

अगर हां, तो ज़रा रुकिए। प्रॉब्लम दाल में नहीं, आपकी प्रकृति (Body Type) में छुपी हो सकती है।


खासतौर पर अगर आपकी प्रकृति वात–पित्त की है - मतलब गैस भी जल्दी बनती है और शरीर में गर्मी भी तुरंत बढ़ जाती है - तो हो सकता है आप रोज़ ऐसी दालें खा रहे हों जो आपके पेट के अंदर “महाभारत” करा रही हों।


हम इस Post में बात करेंगे -

कौन सी दालें आपके लिए अमृत हैं और कौन सी दालें बन जाती हैं धीमा ज़हर।


वात–पित्त प्रकृति आखिर होती क्या है?

आयुर्वेद के अनुसार, वात–पित्त का मतलब है हवा + आग का कॉम्बिनेशन।


वात की वजह से शरीर में सूखापन, गैस, ब्लोटिंग होती है

पित्त की वजह से जलन, एसिडिटी, गर्मी और चिड़चिड़ापन


अब दिक्कत ये है कि ज़्यादातर दालें होती हैं रूक्ष (सूखी)।

सूखी चीज़ें वात को बढ़ाती हैं।

और अगर वही दाल गर्म तासीर की हुई, तो पित्त भी भड़क जाता है।


यानी गलत दाल = गैस + जलन = पेट का सत्यानाश 


दालों का सुपरहीरो: मूंग दाल 

पित्त वाले की लाइफसेवर है — मूंग दाल।

आयुर्वेद इसे यूं ही दालों का राजा नहीं कहता।

क्योंकि:


ये पचने में बहुत हल्की है

इसकी तासीर ठंडी होती है (शीतवीर्य)

ये वात और पित्त — दोनों को शांत रखती है


अगर आपका पेट अक्सर खराब रहता है, गैस बनती है या एसिडिटी रहती है —

तो पीली मूंग दाल आपके लिए किसी मेडिसिन से कम नहीं।


ये दालें बन सकती हैं आपकी मुसीबत

अब बात उन दालों की जो वात–पित्त वालों के लिए भारी पड़ सकती हैं।


1. कुलथी दाल (Horse Gram)

इसे किडनी स्टोन के लिए फायदेमंद माना जाता है, लेकिन

वात–पित्त वालों के लिए ये बहुत ज़्यादा गर्म है।


ये शरीर में इतनी गर्मी बढ़ा सकती है कि:


स्किन पर रैशेज़ आ जाएं

या नाक से खून आने लगे


2. चना और छोले

ये दालें होती हैं हद से ज़्यादा रूखी।


वात वालों के लिए गैस का परमाणु बम 

पचने में इतनी भारी कि आपकी पाचन अग्नि सुस्त पड़ जाए


3. राजमा

राजमा का स्वभाव होता है विदाही —

यानि पचते वक्त ये अंदर जलन पैदा करता है।


वात और पित्त — दोनों के लिए

राजमा से दूरी बनाना ही समझदारी है।


उड़द दाल: दोस्त या दुश्मन?

उड़द दाल को लेकर लोग कंफ्यूज़ रहते हैं।

असल में:


ये चिकनी होती है, इसलिए वात को शांत करती है

लेकिन इसकी तासीर गर्म होती है, जो पित्त को भड़का देती है


इसलिए नियम साफ है -

उड़द दाल सिर्फ सर्दियों में, वो भी लिमिट में।


अरहर (तुअर) दाल का सच

अरहर दाल पित्त के लिए ठीक मानी जाती है,

लेकिन एक प्रॉब्लम है - ये गैस बहुत बनाती है।


तो क्या इसे छोड़ दें?

नहीं।

बस सही तरीके से पकाना सीख लें।


कुकिंग सीक्रेट्स: दाल को बनाएं पेट-फ्रेंडली

अगर दाल सही तरीके से पकाई जाए, तो उसके साइड इफेक्ट काफी हद तक कम हो जाते हैं।


1. भिगोना ज़रूरी है

दाल को कम से कम 30 मिनट से 2 घंटे तक भिगोकर रखें।

इससे गैस बनाने वाले तत्व कम हो जाते हैं।


2. घी डालना मत भूलिए

वात–पित्त वालों के लिए घी किसी अमृत से कम नहीं।


पित्त की गर्मी को शांत करता है

वात के रूखेपन को खत्म करता है


3. सही मसालों का तड़का

तड़के में इस्तेमाल करें:


सौंफ — पेट की गर्मी शांत करती है

धनिया — पित्त को कंट्रोल करता है

जीरा — पाचन सुधारता है


फाइनल टेकअवे 

मूंग दाल और लाल मसूर को अपना बेस्ट फ्रेंड बनाइए

चना, छोले और राजमा से दूरी रखिए

दाल में घी और सौंफ का तड़का ज़रूर लगाइए


अगर आपको ये जानकारी काम की लगी हो, 

तो post को लाइक करें 

कमेंट में बताएं आपकी पसंदीदा दाल कौन सी है

और इसे उन दोस्तों के साथ ज़रूर शेयर करें

जो हर समय एसिडिटी की शिकायत करते रहते हैं 



श्वास रोग

 Ayurveda for Lungs - श्वास रोग में “एक दवा सब पर भारी” क्यों? इस Post में हम एक ऐसी आयुर्वेदिक औषधि की बात कर रहे हैं, जिसके बारे में आचार्य वाग्भट ने बहुत स्ट्रॉन्ग स्टेटमेंट दिया है। 


"श्वास और कास यानी पूरी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट की बीमारियों में बाकी सारी दवाइयाँ एक तरफ, और ये एक औषधि एक तरफ।"


अगर आपको सांस फूलने की समस्या है, सूखी या बलगम वाली खांसी रहती है, गले में खराश, बार-बार कफ जमा होना, ब्रोंकाइटिस, पुराना टीबी, निमोनिया के बाद कमजोर फेफड़े, या स्मोकिंग की वजह से सांस की दिक्कत—तो ये Post आपके लिए बहुत ज़रूरी है।


इस post का मकसद सिर्फ नुस्खा बताना नहीं है, बल्कि यह समझाना है कि यह औषधि क्यों और कैसे काम करती है, ताकि आयुर्वेद का लॉजिक आपको क्लियर हो सके।


शास्त्रीय संदर्भ: वाग्भट ऋषि क्या कहते हैं?

आचार्य वाग्भट ने अष्टांग हृदय, चिकित्सा स्थान, अध्याय 3 के श्लोक 172 में कहा है—


“सर्वेषु श्वासकासेषु केवलं विभीतकी”


अर्थात श्वास और कास की सभी बीमारियों में केवल विभीतकी (बहेड़ा) ही पर्याप्त है।

इतना बड़ा क्लेम आयुर्वेद में बहुत कम दवाओं के लिए मिलता है।


यह औषधि कौन-सी है?

जिस औषधि की बात हो रही है, वह है विभीतकी, जिसे आम भाषा में बहेड़ा कहते हैं।

यह त्रिफला का एक महत्वपूर्ण घटक है, लेकिन श्वास-कास रोगों में इसका रोल अलग और बहुत पावरफुल माना गया है।


किन समस्याओं में बहेड़ा उपयोगी है?

अगर आपको इनमें से कोई भी समस्या है, तो विभीतकी उपयोगी मानी जाती है:


सांस फूलना

सूखी खांसी या कफ वाली खांसी

गले में बार-बार खराश या भारीपन

ब्रोंकाइटिस

स्मोकिंग के बाद सांस की दिक्कत

पुराने टीबी या निमोनिया के बाद कमजोर लंग्स

रात में कफ जम जाना, सुबह गला पूरी तरह भरा हुआ लगना

नाक से ज्यादा पानी गिरना, साइनस की समस्या


बहेड़ा कैसे लें? (प्रयोग विधि)

1. गुड़ के साथ गोली बनाकर

बहेड़ा पाउडर एक चुटकी

पुराना देसी गुड़ थोड़ा सा

दोनों मिलाकर चना दाने जितनी छोटी गोली बना लें

दिन में 4–5 बार, खाने के बाद चूसने की तरह लें


इसे एक बार में निगलना नहीं है, धीरे-धीरे मुंह में घुलने देना है।

क्योंकि श्वास रोग में आयुर्वेद बार-बार अल्प मात्रा में औषधि लेने को कहता है।


2. पाउडर + गर्म पानी

आधा चम्मच बहेड़ा पाउडर

हल्के गुनगुने पानी के साथ

खासकर रात में सोने से पहले


यह तरीका उन लोगों के लिए खास है जिनका गला रात में बंद हो जाता है और सुबह भारी कफ निकलता है।


अब आयुर्वेदिक लॉजिक समझिए 

श्वास रोग की जड़ कहाँ है?

आयुर्वेद के अनुसार श्वास रोग सीधे फेफड़ों से शुरू नहीं होता।

सबसे पहले गड़बड़ी होती है:


आमाशय (पेट) में

अग्नि (डाइजेस्टिव फायर) कमजोर होती है

रस धातु ठीक से नहीं बनती

रस धातु का मल = कफ, जो ज़्यादा बनने लगता है

यही कफ ऊपर जाकर छाती और लंग्स में जमा हो जाता है

यानी अगर पेट ठीक नहीं, तो सांस भी ठीक नहीं।


बहेड़ा किन गुणों की वजह से काम करता है?

आयुर्वेदिक गुण (Guna)

लघु – हल्का, कफ को तोड़ने वाला

रूक्ष – अतिरिक्त चिकनाई हटाता है

उष्ण – गर्म प्रकृति, वात-कफ शमन


विपाक

मधुर विपाक – यानी पाचन के बाद शरीर को संतुलन देता है


दोषों पर प्रभाव

वात को अनुलोमन करता है

कफ को विशेष रूप से कम करता है

पित्त को संतुलित रखता है


धातुओं पर प्रभाव: क्यों फेफड़ों के लिए खास है?

विभीतकी का प्रभाव इन धातुओं पर बताया गया है:


रस धातु

रक्त धातु

मांस धातु

मेद धातु


आयुर्वेद कहता है कि फेफड़ों (फुफ्फुस) की उत्पत्ति रक्त धातु से होती है।

जब रक्त धातु शुद्ध और मजबूत होती है, तो लंग्स भी मजबूत होते हैं।


बहेड़ा:


पाचन सुधारता है

रस और रक्त धातु को शुद्ध करता है

कफ का एक्सेस प्रोडक्शन रोकता है

सीधे नाक से लेकर लंग्स तक काम करता है


किन मरीजों में असर सबसे ज्यादा दिखता है?

जिनके सीने में भारी कफ भरा रहता है


जिनको पीला या सफेद गाढ़ा बलगम निकलता है

जिनकी खांसी लंबे समय से ठीक नहीं हो रही

जिनको रात में सांस लेने में ज्यादा दिक्कत होती है

ऐसे मामलों में बहेड़ा को आयुर्वेद “मोर देन हाफ ट्रीटमेंट” मानता है।


Conclusion: क्यों इसे श्वास रोग की स्पेशल दवा कहा गया?

यह पाचन की जड़ से इलाज करती है


कफ को सिर्फ दबाती नहीं, बनने से रोकती है

लंग्स, गला, नाक—पूरी रेस्पिरेटरी ट्रैक्ट पर काम करती है

शास्त्रों में इसका स्पष्ट और स्ट्रॉन्ग उल्लेख है


इसीलिए आचार्य वाग्भट ने कहा—

श्वास रोग में अगर एक औषधि चुननी हो, तो विभीतकी पर्याप्त है।


अगर यह जानकारी आपको उपयोगी लगी, तो कमेंट में ज़रूर बताइए।


सिर्फ डायबिटीज़ वालों के लिए

 Ayurvedic Diet for Diabetes - डायबिटीज़ में सही खान-पान क्यों सबसे ज़रूरी है? इस पोस्ट में हम बात करेंगे कि डायबिटीज़ के मरीज़ों को अपना खान-पान कैसा रखना चाहिए और उनके लिए सबसे बेहतर डाइट प्लान क्या हो सकता है।


 लेकिन यह बात यहीं तक सीमित नहीं है। सच यह है कि जो डाइट प्लान हम जानेगें, वह सिर्फ डायबिटीज़ वालों के लिए नहीं, बल्कि हर उस व्यक्ति के लिए फायदेमंद है जो भविष्य में कभी भी डायबिटीज़ नहीं चाहता।


यह डाइट उन लोगों के लिए भी उतनी ही ज़रूरी है जिनकी शुगर बॉर्डरलाइन रहती है, जिन्हें एसिडिटी की दवाइयाँ चल रही हैं या जिनमें डायबिटीज़ से जुड़ी जटिलताएँ जैसे डायबिटिक न्यूरोपैथी या रेटिनोपैथी शुरू हो चुकी हैं। कुल मिलाकर, अगर शरीर में किसी भी तरह की मेटाबॉलिक गड़बड़ी है, तो यह डाइट प्लान सबसे सुरक्षित और संतुलित विकल्प है।


इस पोस्ट में हम आसान टिप्स जानेगें। ये कोई सख्त नियम नहीं हैं, बल्कि रोज़मर्रा की ज़िंदगी में आसानी से अपनाई जा सकने वाली बातें हैं। 


1.आयुर्वेद की भोजन विधि: सिर्फ क्या नहीं, कैसे भी ज़रूरी है

आयुर्वेद में केवल यह नहीं बताया गया कि क्या खाना चाहिए, बल्कि यह भी बताया गया है कि खाना कैसे बनाना है और कैसे खाना है। भोजन बनाते समय मन शांत और प्रसन्न होना चाहिए। खाना घर का बना, सात्विक, ताज़ा और पचने में हल्का होना चाहिए।


खाना तभी खाना चाहिए जब सही मायने में भूख लगी हो। खाते समय टीवी, मोबाइल या बातचीत से दूरी बनाकर, शांत मन से, हर निवाले को अच्छे से चबाकर खाना चाहिए। यह पूरी प्रक्रिया शरीर और मन दोनों पर गहरा असर डालती है।


2. निदान परिवर्जन: बीमारी की जड़ पर काम करना

डायबिटीज़ के इलाज में आयुर्वेद का दूसरा बड़ा सिद्धांत है निदान परिवर्जन, यानी जिन कारणों से बीमारी हुई है, उन्हें हटाना। आचार्य चरक ने प्रमेह के कई कारण बताए हैं, जिनमें मधुमेह भी शामिल है।


अगर खान-पान की बात करें, तो बार-बार दही खाना, खासकर रात में दही लेना, बहुत ज़्यादा तरल आहार लेना, बार-बार पानी पीते रहना, अत्यधिक नॉनवेज खाना, नया चावल या नया अनाज ज़्यादा खाना, रोज़ाना मीठा या गुड़ से बने पदार्थों का अधिक सेवन करना – ये सभी कफ और मेद को बढ़ाने वाले कारण हैं, जो डायबिटीज़ को जन्म देते हैं।


आचार्य सुश्रुत ने भी ठंडी चीज़ों का अत्यधिक सेवन, बार-बार बासी भोजन, बहुत तला-भुना और ज़्यादा चिकनाई वाला खाना डायबिटीज़ को बढ़ाने वाला बताया है। इसलिए इन आदतों से दूरी बनाना बेहद ज़रूरी है।


3. सिर्फ कड़वा खाना सही नहीं: रसों का संतुलन समझिए

अक्सर जैसे ही किसी का शुगर लेवल बढ़ता है, उसे हर कोई सलाह देने लगता है कि अब कड़वा ज़्यादा खाओ, मीठा पूरी तरह बंद कर दो। लेकिन आयुर्वेद इस सोच से थोड़ा अलग है।


आयुर्वेद के अनुसार हमारा आहार षड्-रसात्मक होना चाहिए, यानी उसमें छह स्वाद होने चाहिए –

मधुर (मीठा), अम्ल (खट्टा), लवण (नमकीन), कटु (तीखा), तिक्त (कड़वा) और कषाय (कसैला)।


मतलब यह नहीं कि मीठा पूरी तरह बंद कर दिया जाए, बल्कि यह ज़रूरी है कि किसी भी एक रस का अत्यधिक सेवन न हो।


a. मधुर रस: सही मात्रा में ज़रूरी क्यों है?

मधुर रस यानी मीठा स्वाद आयुर्वेद के अनुसार जन्म से ही शरीर के अनुकूल होता है। माँ का दूध इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। यह सप्त धातुओं – रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र – को पोषण देता है।


मीठा रस त्वचा, बालों, इंद्रियों और ओज को बढ़ाता है और दीर्घायु में सहायक होता है। लेकिन जब यही मधुर रस ज़रूरत से ज़्यादा लिया जाए, तो कफ और चर्बी बढ़ाकर डायबिटीज़ की समस्या पैदा करता है।


b. डायबिटीज़ में सुरक्षित मधुर विकल्प क्या हैं?

आयुर्वेद ने ऐसे कई मधुर विकल्प बताए हैं जो संतुलन बनाए रखते हैं। जैसे देसी गाय का घी, जिसे दिन में 2 से 3 छोटे चम्मच तक लिया जा सकता है। यह मीठे स्वाद का होता है और शरीर के लिए पोषक है।


स्वर्णसिद्ध जल यानी सोने के टुकड़े के साथ उबला पानी भी बताया गया है। इसके अलावा शुद्ध शहद, जो कफ को कम करता है, सीमित मात्रा में लिया जा सकता है।


मौसमी फल, शतावरी, बला, अतिबला, विदारीकंद जैसी औषधियाँ भी मधुर रस में आती हैं और सही मात्रा में फायदेमंद हैं। वहीं आर्टिफिशियल स्वीटनर और शुगर-फ्री टैबलेट से बचना बेहतर है।


c. तिक्त रस: कड़वे स्वाद का सही इस्तेमाल

तिक्त रस यानी कड़वा स्वाद शरीर की सफाई में मदद करता है। यह बुखार, जलन, कीड़े, कफ और अतिरिक्त चर्बी को कम करता है, इसलिए डायबिटीज़ में उपयोगी माना जाता है।


करेले की सब्ज़ी, आम के पत्ते, मेथी-सौंफ की सब्ज़ी, मूंग दाल के साथ बनी हल्की सब्ज़ियाँ, धनिया-जीरा जैसे मसाले इस श्रेणी में आते हैं। ध्यान बस इतना रखना है कि जिन लोगों को एसिडिटी या सीने में जलन रहती है, वे मेथी का सेवन सीमित रखें।


d. कड़वे रस की सही मात्रा क्यों ज़रूरी है?

इसके साथ ही आप गिलोय की बेल के पत्तों का काढ़ा बना सकते हैं. लेकिन यहाँ मात्रा का ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है। इन काढ़ों की सही मात्रा लगभग 20 से 30 मिली ही होती है।


आजकल बहुत से लोग सुबह-सुबह एक पूरा गिलास करेले का जूस पी लेते हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह तरीका सही नहीं है। इतनी ज़्यादा मात्रा में लिया गया कड़वा रस न केवल पचने में भारी होता है, बल्कि शरीर को इसकी ज़रूरत भी नहीं होती। ऊपर से, डायबिटीज़ के कारणों में आयुर्वेद ने द्रव आहार यानी ज़्यादा लिक्विड डाइट को भी जिम्मेदार माना है।


इस तरह अगर बहुत ज़्यादा मात्रा में कड़वे जूस लिए जाएँ, तो फायदा सीमित होता है और नुकसान की संभावना बढ़ जाती है।


e. ज्यादा कड़वा लेने से नुकसान भी हो सकता है

एक और अहम बात यह है कि अगर लंबे समय तक बहुत ज़्यादा कड़वा या कसैला रस लिया जाए, तो इससे वात दोष बढ़ सकता है और धातु क्षय भी हो सकता है। आचार्य वाग्भट्ट ने इस बारे में साफ चेतावनी दी है।


आयुर्वेद में शरीर की बनावट के आधार पर लोगों को मोटे तौर पर दो समूहों में बाँटा गया है।

पहला समूह वे लोग जिनका वजन ज़्यादा है, शरीर में चर्बी अधिक है या जिनमें कफ दोष की प्रधानता के कारण डायबिटीज़ हुई है। ऐसे लोगों को कड़वा रस लेने से आमतौर पर फायदा होता है।


लेकिन दूसरा समूह वे लोग हैं जिनका शरीर पहले से ही दुबला है, जिनमें वात दोष अधिक है। अगर ऐसे लोग बहुत ज़्यादा कड़वा या कसैला रस लेने लगते हैं, तो उनमें भूख न लगना, जोड़ों में दर्द, अत्यधिक थकान और कमजोरी जैसी समस्याएँ बढ़ सकती हैं। इसलिए हर रस का सेवन शरीर की प्रकृति देखकर करना चाहिए।


4. डायबिटीज़ की सरल लेकिन असरदार आयुर्वेदिक औषधि

आयुर्वेद में डायबिटीज़ के लिए एक बेहद आसान और असरदार योग बताया गया है, जिसे निशा आमलक योग या हरिद्रा आमलक योग कहा जाता है। यहाँ निशा या हरिद्रा का मतलब है हल्दी और आमलक का मतलब है आंवला।


अगर आपको ताज़ा आंवला मिल जाता है, तो एक आंवला कद्दूकस करके उसमें दो से तीन चुटकी हल्दी मिलाएँ और इसे सुबह खाली पेट लें।

अगर आंवले का रस निकालना चाहें, तो 15 से 20 मिली आंवले के रस में थोड़ी सी हल्दी मिलाकर सुबह सेवन किया जा सकता है।


अगर कच्ची हल्दी उपलब्ध हो, तो उसे भी हल्का सा कद्दूकस करके आंवले के साथ लिया जा सकता है।

और अगर आंवला या ताज़ी हल्दी न मिले, तो आंवला चूर्ण के साथ थोड़ी सी हल्दी मिलाकर सेवन किया जा सकता है।


यह योग इसलिए खास है क्योंकि आंवला एक श्रेष्ठ रसायन है और हल्दी हमारे रोज़ के भोजन में भी रहती है। जब ये दोनों साथ आते हैं, तो डायबिटीज़ में बहुत अच्छा असर दिखाते हैं।


5. क्या रसोई के मसाले भी दवा बन सकते हैं?

अब सवाल आता है कि क्या हमारे किचन में मौजूद मसाले और अचार डायबिटीज़ में मदद कर सकते हैं? जवाब है – हाँ, अगर सही तरीके से इस्तेमाल किए जाएँ।


आजकल जो रेडीमेड अचार बाज़ार से आते हैं, उनमें प्रिज़र्वेटिव, फूड कलर और घटिया तेल मिला होता है। यही वजह है कि बहुत से लोगों को अचार खाने से एसिडिटी, सिरदर्द या जलन होने लगती है।


लेकिन घर का बना अचार, जैसे आंवले का अचार, हल्दी का अचार या करेले का अचार, डायबिटीज़ में औषधि की तरह काम करता है। इनमें इस्तेमाल होने वाले मसाले जैसे हल्दी, जीरा, सरसों और थोड़ा सा तेल खुद औषधीय गुण रखते हैं।


बस ध्यान इतना रखना है कि अचार को सब्ज़ी की तरह नहीं खाना है। इसकी मात्रा हमेशा सीमित रखें।


6. विरुद्ध आहार: गलत फूड कॉम्बिनेशन से बचें

आयुर्वेद में कुछ ऐसे फूड कॉम्बिनेशन बताए गए हैं जो साथ में लेने पर शरीर को नुकसान पहुँचाते हैं। इन्हें विरुद्ध आहार कहा जाता है।


जैसे रात में दही खाना, दही को गर्म करना, या बहुत ज़्यादा मात्रा में अकेले दही खाना शरीर के लिए ठीक नहीं है।

इसी तरह शहद और गर्म पानी का कॉम्बिनेशन भी आयुर्वेद के अनुसार विरुद्ध आहार माना गया है। भले ही शहद और गर्म पानी अलग-अलग अच्छे हों, लेकिन साथ में लेने पर यह शरीर के लिए हानिकारक हो सकता है।


खट्टे फलों को दूध के साथ लेना, जैसे मिल्कशेक बनाकर पीना, अलग-अलग फलों को एक साथ मिलाकर खाना या उन पर कस्टर्ड डालकर खाना भी सही नहीं है।


7. ज़्यादा पानी और लिक्विड डाइट भी नुकसानदेह

आजकल “स्टे हाइड्रेटेड” के नाम पर लोग ज़रूरत से ज़्यादा पानी और जूस पीने लगे हैं। आयुर्वेद के अनुसार यह भी डायबिटीज़ का एक बड़ा कारण है।


जब बिना प्यास के बार-बार पानी पिया जाता है, तो यह कफ दोष को बढ़ाता है और आम (अपचित पदार्थ) उत्पन्न करता है। इससे शरीर में चिपचिपापन और गीलापन बढ़ता है, जो आगे चलकर डायबिटीज़, हाई ब्लड प्रेशर, किडनी और यूरिन से जुड़ी समस्याओं को जन्म देता है।


इसलिए पानी हमेशा प्यास के अनुसार और मौसम व शरीर की प्रकृति को ध्यान में रखकर ही पीना चाहिए।


8. बार-बार खाना सही है या गलत?

डायबिटीज़ में अक्सर सलाह दी जाती है कि थोड़ा-थोड़ा और बार-बार खाना चाहिए। लेकिन आयुर्वेद इसे “अध्यशन” कहता है।


अगर पिछला भोजन पूरी तरह पचा नहीं है और फिर भी आप दोबारा खाना खा लेते हैं, तो यह आम को बढ़ाता है और कफ दोष को बढ़ाता है। इससे शरीर में चिपचिपापन बढ़ता है और बीमारी गहराती है।


हर व्यक्ति की अग्नि अलग होती है। पित्त प्रकृति वालों की अग्नि तेज़ होती है, उन्हें जल्दी भूख लगती है। कफ प्रकृति वालों की अग्नि मंद होती है, उन्हें देर से भूख लगती है। वात प्रकृति वालों की भूख अनियमित होती है।


इसलिए खाना हमेशा अपनी पाचन शक्ति और भूख के अनुसार ही खाना चाहिए। एक ही नियम सभी पर लागू नहीं होता।


Conclusion: संतुलन ही सबसे बड़ा इलाज है

इस post में हमने डायबिटीज़ के मरीज़ों के लिए बेस्ट आयुर्वेदिक डाइट प्लान को आसान लेकिन प्रभावी टिप्स के रूप में समझा। यह डाइट प्लान कोई ज़बरदस्ती नहीं करता, बल्कि शरीर को संतुलन की ओर लौटने का मौका देता है। अगर आप इसे समझदारी से अपनाते हैं, तो न सिर्फ शुगर कंट्रोल में रहती है, बल्कि भविष्य की कई बीमारियों से भी बचाव होता है।


दर्द और थकान होती है

 Muscular Fatigue - क्या आपको भी बिना वजह ऐसा दर्द और थकान होती है? क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि अचानक शरीर में इतना ज़्यादा दर्द होने लगे कि आप किसी से कह बैठें—


“यार, आज तो शरीर टूट गया है… ऐसा लग रहा है जैसे किसी ने डंडे से मारा हो या ज़ोर-ज़ोर से मुक्के मारे हों।”


कभी ऐसा भी हुआ कि दर्द के साथ इतनी ज़्यादा थकान हो जाए कि कुछ करने का मन ही न करे?

और सबसे अजीब बात ये कि ना कोई चोट लगी, ना गिरना हुआ, ना एक्सीडेंट-फिर भी दर्द ऐसा कि मानो किसी ने आकर पीट दिया हो।


ऐसे में मन में सबसे पहला सवाल यही आता है-

“आख़िर ये दर्द आया कहां से?”


इस Post में हम इसी सवाल का जवाब आयुर्वेद के नज़रिए से समझने वाले हैं।

साथ ही ये भी जानेंगे कि


ये दर्द क्यों होता है

शरीर के अंदर क्या गड़बड़ चल रही होती है

और आयुर्वेद में इसका इलाज क्या बताया गया है

साथ ही घर पर आप क्या-क्या कर सकते हैं


आयुर्वेद में दर्द को कैसे देखा जाता है?

आयुर्वेद में किसी भी बीमारी या दर्द को समझने का बेस बहुत साफ़ है-

वात, पित्त और कफ।


दुनिया की कोई भी बीमारी हो, किसी भी तरह का दर्द हो-

आयुर्वेद उसे इन्हीं तीन दोषों के आधार पर समझता और ट्रीट करता है।


अब हर तरह का दर्द, चाहे वो सिर का हो, दांत का हो, कमर का हो, घुटनों का हो, मसल्स का हो, जॉइंट्स का हो या फिर नर्व्स से जुड़ा दर्द-

आयुर्वेद के अनुसार उसका मूल कारण हमेशा वात होता है।


यह बात बिल्कुल क्लियर है।


जब दर्द ऐसा लगे जैसे डंडे या मुक्कों से मारा गया हो

वात अलग-अलग तरह से शरीर में दर्द पैदा करता है।

लेकिन एक खास तरह का दर्द ऐसा होता है जिसमें-


पूरे शरीर में टूटन महसूस होती है

मांसपेशियों में बहुत ज़्यादा दर्द होता है

ऐसा लगता है जैसे किसी ने ज़ोर-ज़ोर से मारा हो

और साथ में असहनीय थकान रहती है

मानो शरीर में जान ही नहीं बची हो।


आयुर्वेद कहता है, ऐसा दर्द तब होता है जब

वात बढ़कर शरीर की दो खास धातुओं में जाकर बैठ जाता है।


कौन-सी दो धातुएं ज़िम्मेदार हैं?

इन दो धातुओं के नाम हैं-


मांस धातु

मेद धातु


आयुर्वेद में कुल 7 धातुएं बताई गई हैं-

रस, रक्त, मांस, मेद, अस्थि, मज्जा और शुक्र।


सरल भाषा में समझें तो-


मांस धातु को हम मसल्स से जोड़ सकते हैं

मेद धातु को फैट टिश्यू से


जब बढ़ा हुआ वात इन दोनों धातुओं में प्रवेश करता है,

तब दर्द ऐसा लगता है जैसे डंडे या मुक्कों से मारा गया हो,

और शरीर में ज़बरदस्त थकान छा जाती है।


आयुर्वेद का श्लोक क्या कहता है?

आचार्य चरक ने इसे बहुत ही साफ़ शब्दों में बताया है।


चरक संहिता, चिकित्सा स्थान, अध्याय 28 में कहा गया है-


“दण्ड-मुष्टि हतं तथा सरुक् श्रम अत्यर्थम्

मांस-मेदो गते अनिले”


अर्थात-

जब वात मांस और मेद धातु में चला जाता है,

तो व्यक्ति को ऐसा दर्द और थकान होती है

जैसे उसे डंडे या मुक्कों से मारा गया हो।


आखिर वात बढ़ता क्यों है?

अब सवाल उठता है-

इतना वात बढ़ा कैसे?


इसके पीछे कई लाइफस्टाइल कारण होते हैं, जैसे-


ज़रूरत से ज़्यादा शारीरिक मेहनत

बहुत भारी वजन उठाना

ओवर-एक्सरसाइज़ या वेट ट्रेनिंग

लगातार ट्रैवल करना

रात में देर तक जागना

नींद पूरी न होना

लगातार मानसिक तनाव

ठंडी हवा, AC या पंखे में ज़्यादा देर बैठना

रूखा-सूखा खाना

लंबे उपवास

भूख लगने पर खाना टालना

पेशाब या मोशन को रोककर रखना

ये सभी आदतें शरीर में वात को तेज़ी से बढ़ाती हैं।


आयुर्वेदिक ट्रीटमेंट क्या है?

आचार्य चरक ने सिर्फ कारण ही नहीं, इलाज भी बताया है।


1. विरेचन (Panchkarma)

सबसे पहले बताया गया है-

विरेचन।


विरेचन का मतलब है शरीर की गहरी सफाई।


इसमें-


कुछ दिनों तक घी का सेवन कराया जाता है

फिर पूरे शरीर की मालिश

और उसके बाद विशेष तरीके से लूज़ मोशन्स के ज़रिए शुद्धि


ये प्रक्रिया हमेशा अनुभवी आयुर्वेदिक डॉक्टर की देखरेख में ही होनी चाहिए।


2. बस्ति चिकित्सा

विरेचन के बाद

बस्ति यानी मेडिकेटेड एनीमा।


यह वात को कंट्रोल करने की सबसे प्रभावी थैरेपी मानी जाती है,

खासकर जब वात मांस और मेद धातु में बैठ गया हो।


घर पर क्या कर सकते हैं?

अब सबसे ज़रूरी सवाल-

घर पर हम क्या करें?


1. रोज़ाना अभ्यंग (तेल मालिश)

अभ्यंग यानी तेल से मालिश।

यह वात को शांत करने का सबसे आसान और असरदार तरीका है।


आयुर्वेद कहता है-

जो व्यक्ति रोज़ अभ्यंग करता है—


उसे जल्दी बुढ़ापा नहीं आता

थकान कम होती है


और वात के रोग नहीं होते


2. कौन-सा तेल?

सबसे बेस्ट-

तिल का तेल, खासकर ठंड के मौसम में।

अगर काले तिल का तेल मिल जाए तो और भी अच्छा।


नहाने से पहले पूरे शरीर की मालिश करें।


खाने में क्या शामिल करें?

लहसुन

लहसुन वात को कम करता है और मांस-मेद धातु पर काम करता है।


3–5 लहसुन की कलियां

तिल के तेल में हल्का सेंककर

खाने के साथ लें


दही

अच्छी तरह जमा हुआ दही—


उष्ण

स्निग्ध

वातशामक


हफ्ते में 2–3 बार ज़रूर लें, पर दिन में रात में नहीं।


उड़द का वड़ा

उड़द वात पर बेहतरीन काम करता है।

घर पर बना मेंदू वड़ा इस दर्द में मददगार हो सकता है।


लाइफस्टाइल में ज़रूरी बदलाव


पूरी नींद लें

ओवर-एक्सरसाइज़ से बचें

थकान होने पर रुकें

बेवजह खुद को ज़्यादा न झोंकें

ठंड और ड्राफ्ट से बचाव करें


दूध वाला उपाय

अगर दूध सूट करता है, तो-


1 ग्राम पिप्पली पाउडर

दूध + पानी में उबालकर

पी सकते हैं


यह वात और दर्द दोनों में मदद करता है।


अंत में

अगर दर्द ऐसा है जैसे किसी ने डंडे या मुक्कों से मारा हो

और साथ में गहरी थकान भी है-

तो इसे हल्के में न लें।

यह मांस और मेद धातु में बढ़े वात का संकेत हो सकता है।


डायबिटीज़ को कंट्रोल में

 Reverse Diabetes - डायबिटीज़ को कंट्रोल में रखने के लिए हमें क्या खाना चाहिए? डायबिटीज़ को नियंत्रण में रखने के लिए हमें यह समझना बहुत ज़रूरी है कि हमें किस तरह का खाना खाना चाहिए, ताकि वजन कंट्रोल में रहे, इंसुलिन की ज़रूरत न पड़े और डायबिटीज़ की जटिलताओं से बचा जा सके।


इसके लिए सबसे पहले आपको यह जान लेना चाहिए कि आपका खाना अनप्रोसेस्ड और घर का बना हुआ होना चाहिए।


किसी की बात मत सुनिए, किसी के कहने में मत आइए। बस एक नियम अपनाइए — घर का बना खाना खाइए।


सबसे पहले: प्रोसेस्ड फूड पूरी तरह छोड़िए

सबसे पहला और सबसे ज़रूरी नियम है कि आपको प्रोसेस्ड फूड पूरी तरह से बंद करना होगा।

जैसे:


Bread

बिस्कुट

नमकीन

पैकेट वाले जूस

कॉर्नफ्लेक्स

आइसक्रीम

कोल्ड ड्रिंक्स

चॉकलेट

सेवई

मैगी

पास्ता


हम सबको सुबह Bread खाने और चाय के साथ बिस्कुट खाने की आदत पड़ गई है। लेकिन ये सारे प्रोसेस्ड फूड लिवर को फैटी बना देते हैं।


जब लिवर फैटी हो जाता है, तो वहां इंसुलिन काम नहीं करता। नतीजा यह होता है कि ब्लड शुगर बढ़ने लगती है।


प्रोसेस्ड फूड के नुकसान

ये प्रोसेस्ड फूड:


फैटी लिवर बनाते हैं

इंसुलिन रेजिस्टेंस बढ़ाते हैं

LDL यानी खराब कोलेस्ट्रॉल बढ़ाते हैं

हार्ट डिज़ीज़ का खतरा बढ़ाते हैं

भविष्य में कैंसर का risk बढ़ाते हैं

याददाश्त कम करते हैं

अल्ज़ाइमर जैसी बीमारियों का कारण बनते हैं

हमारे पूर्वज ऐसे खाने नहीं खाते थे। इसलिए उन्हें फैटी लिवर नहीं होता था।


चीनी: नुकसानदायक है

चीनी मत खाइए।

चीनी नुकसानदायक है।


हमें याद है कि जब हम छोटे थे, तो पूरे परिवार के लिए चीनी का कोटा होता था। पूरे परिवार को महीने में सिर्फ 2 किलो चीनी मिलती थी।

पांच लोग, और सिर्फ 2 किलो चीनी।


पेप्सी भी दो महीने में एक बार मिलती थी। 3 भाई बहन मिलकर एक ही बोतल बांट लेते थे।

पार्टी में भी बस बिस्कुट, रोटी और कभी-कभी नाश्ता होता था।


आज हालात उल्टे हैं। आज लगभग हर किसी को फैटी लिवर है।

आपका पेट जितना बड़ा होगा, आपका लिवर उतना ही मोटा होगा।


दूसरा नियम: अनाज कम करें

अगर आप ज़्यादा शारीरिक मेहनत नहीं करते, तो आपको ज़्यादा अनाज खाने की ज़रूरत नहीं है।

मजदूर और किसान इसलिए रोटी-चावल खा पाते हैं क्योंकि वे दिन भर मेहनत करते हैं।


हम लोग कुर्सी पर बैठने वाले लोग हैं। हम दिन में कितना व्यायाम करते हैं?

ज़्यादा से ज़्यादा एक घंटा।


अनाज क्या होते हैं?


रोटी

चावल

मक्का

ओट्स

बाजरा

ज्वार

रागी

जौ


इन सबमें कार्बोहाइड्रेट और ग्लूकोज़ होता है।

खाने के बाद अगर आप बैठे रहते हैं, तो शुगर बढ़ेगी ही।


पेट भरने का सही तरीका (बिना ज्यादा अनाज)

सिर्फ रोटी और चावल से पेट भरना ज़रूरी नहीं है।

ऐसे खाने को शामिल करें जिनमें अनाज न हो।


सभी लोगों के लिए एक आसान फार्मूला:


आधा किलो गेहूं का आटा

आधा किलो चने का आटा

आधा किलो सोयाबीन का आटा


इन्हें मिलाकर इस्तेमाल करें।


घी और मक्खन से मत डरिए

हर डायबिटीज़ के मरीज़ को रोज़ कम से कम 4 चम्मच घी या मक्खन खाना चाहिए।


इसके फायदे:


अच्छा कोलेस्ट्रॉल (HDL) 30% बढ़ता है

हार्ट के लिए बहुत अच्छा है

हार्ट अटैक का खतरा कम करता है


नट्स और प्रोटीन भरपूर खाइए

आप खुलकर खा सकते हैं:


बादाम

अखरोट

पिस्ता

काजू

मूंगफली


जब भी भूख लगे, एक मुट्ठी नट्स खा लीजिए। इससे शुगर नहीं बढ़ती।


इसके अलावा:


पनीर

सोयाबीन

सोयाबीन की दाल


जितना चाहें उतना खा सकते हैं।


एक संतुलित थाली कैसी हो?

1 रोटी (घी लगी हुई)

50 ग्राम पनीर

1 कटोरी दही

भरपूर सब्ज़ी

सलाद

हरी पत्तेदार सब्ज़ियाँ


इससे पेट अच्छी तरह भरता है।


खाने की फ्रीक्वेंसी और चाय-कॉफी

दिन में 2 बार खाने की कोशिश करें।

चाय 3 कप तक या कॉफी 2 कप तक पी सकते हैं।


चाय और कॉफी में मौजूद कैटेचिन:


एंटीऑक्सिडेंट है

हार्ट अटैक का रिस्क 11% तक कम करता है


दिन भर में आधा किलो फुल क्रीम दूध ले सकते हैं।

बस उसमें चीनी न डालें।


फल, बीज और मिठाई

रोज़ 1 फल खाएं (150–200 ग्राम से ज्यादा नहीं)


बहुत मीठे फल कम मात्रा में लें

आम के मौसम में आधा आम रोज़ खा सकते हैं


अच्छे बीज:


अलसी

चिया

कद्दू के बीज


आइसक्रीम, चॉकलेट कभी-कभी पार्टी में खा सकते हैं।

एक स्कूप लें, बांटकर खाएं।


वजन घटाइए, डायबिटीज़ उलट जाएगी

अगर आपका वजन 85 किलो है और आप वजन घटा लेते हैं, तो डायबिटीज़ रिवर्स हो सकती है।


कम कार्बोहाइड्रेट

ज़्यादा सलाद

नियमित व्यायाम


टीवी देखते समय भी डंबल उठाइए।

कार में बैठे हों तो बीच-बीच में चलिए।


फैटी लिवर का सच

फैटी लिवर घी, मक्खन या तेल से नहीं, बल्कि कार्बोहाइड्रेट से बनता है।


कार्बोहाइड्रेट के स्रोत:


रोटी

चावल

चीनी

गुड़

दूध

दही

फल


घी, मक्खन, सरसों का तेल, नारियल तेल, तिल का तेल — ये लिवर को नुकसान नहीं पहुंचाते।


आख़िरी बात

अगर आप वजन नहीं बढ़ाते, अनाज कम खाते हैं और एक्टिव रहते हैं, तो:


शुगर कंट्रोल में रहेगी

दवाइयों की ज़रूरत कम होगी

सेहत बेहतर रहेगी


समझदारी से खाइए, संतुलन बनाइए और एक्टिव रहिए।

 

HbA1c सात से नीचे क्यों नहीं आ रहा?

 HbA1c - HbA1c सात से नीचे क्यों नहीं आ रहा? डायबिटीज़ कंट्रोल को सही तरह समझना ज़रूरी है - डायबिटीज़ से जूझ रहे ज़्यादातर लोग एक ही सवाल बार-बार पूछते हैं- “हमारी शुगर तो कभी-कभी ठीक रहती है, फिर HbA1c सात से नीचे क्यों नहीं आ रहा?”


WHO की गाइडलाइन्स के मुताबिक अगर HbA1c 7 से कम है, तो उसे अच्छा कंट्रोल माना जाता है।

अगर 6 से नीचे आ जाए, तो उसे और बेहतर कंट्रोल कहा जाता है।

यानी हर डायबिटीज़ वाले व्यक्ति का टारगेट यही होना चाहिए कि HbA1c सात से नीचे आए।


लेकिन इसके लिए सिर्फ़ दवा खाना या कभी-कभार शुगर चेक करना काफ़ी नहीं होता।


HbA1c आखिर होता क्या है?

HbA1c को आसान भाषा में समझें तो यह

पिछले 2–3 महीनों की औसत ब्लड शुगर की रिपोर्ट होती है।


जब भी ब्लड में शुगर बढ़ती है, तो उसका एक हिस्सा हमारे खून में मौजूद हीमोग्लोबिन से चिपक जाता है।

इसी चिपकी हुई शुगर को कहा जाता है Glycosylated Hemoglobin, यानी HbA1c।


अगर खाली पेट शुगर ज़्यादातर समय 100 से कम

और खाने के बाद 140 से कम रहती है

तो HbA1c लगभग 6 के आसपास आ सकता है।


सिर्फ़ एक टाइम शुगर ठीक होना काफ़ी नहीं

यह सबसे बड़ी गलतफहमी है कि

“सुबह की शुगर ठीक है, तो कंट्रोल अच्छा है।”


HbA1c कम करने के लिए ज़रूरी है कि:


खाली पेट

नाश्ते के बाद

लंच से पहले और बाद

डिनर के आसपास


हर समय शुगर एक लिमिट में रहे।


टारगेट ये होना चाहिए:


खाली पेट: 100 से कम

खाने से पहले: 120 से कम


यह आसान नहीं है, लेकिन नामुमकिन भी नहीं।


HbA1c कम करना है तो Monitoring बदलनी पड़ेगी

अधिकतर लोग क्या करते हैं?

महीने में एक बार या दो महीने में एक बार शुगर चेक करवा लेते हैं।


लेकिन अगर HbA1c सात से नीचे लाना है,

तो कम से कम रोज़ एक बार शुगर चेक करना पड़ेगा।


हर दिन एक ही समय नहीं—


कभी खाली पेट

कभी नाश्ते के बाद

कभी लंच से पहले या बाद

कभी डिनर के आसपास


ताकि ये समझ आए कि

शुगर किस टाइम सबसे ज़्यादा बिगड़ रही है।


जब तक यह पता नहीं चलेगा, सुधार कैसे होगा?


इसी वजह से सिर्फ़ भारत में ही नहीं,

बल्कि अमेरिका और यूके जैसे देशों में भी

क़रीब 50% डायबिटीज़ मरीजों का HbA1c 8 से ऊपर रहता है।

कारण वही—डेली मॉनिटरिंग और लाइफस्टाइल कंट्रोल की कमी।


डाइट, एक्सरसाइज़ और दवा—तीनों का बैलेंस ज़रूरी

HbA1c कंट्रोल करने के लिए

सिर्फ़ दवा या सिर्फ़ डाइट से काम नहीं चलता।

तीनों का तालमेल ज़रूरी है।


1. कार्बोहाइड्रेट का सही हिसाब

डेली कैलोरी में:


कार्बोहाइड्रेट 50% से ज़्यादा नहीं होने चाहिए


हम इंडियन लोग ज़्यादातर:


रोटी

चावल

बाजरा

ओट्स

आलू

मटर

इनसे बहुत ज़्यादा कार्ब्स ले लेते हैं।


एक ग्राम कार्बोहाइड्रेट = 4 कैलोरी


अगर किसी की रोज़ की ज़रूरत 1600 कैलोरी है,

तो उसमें से अधिकतम:


200 ग्राम कार्बोहाइड्रेट ही लेने चाहिए।


कार्ब्स को पूरे दिन में सही तरह बाँटना

कार्ब्स एक साथ नहीं, पूरे दिन में फैलाकर लें:


नाश्ता: 20–25%

लंच: 25–30%

डिनर: 25–30%

बीच के स्नैक्स: बाकी


नाश्ता कैसा हो?

1 रोटी

थोड़ा स्प्राउट

दही

1–2 अंडे


इससे प्रोटीन और फाइबर बढ़ता है और शुगर धीरे बढ़ती है।


लंच में:

2 रोटी

बिना आलू की सब्ज़ी

दाल

दही या सलाद

चाहें तो थोड़ा चिकन या अंडा


डिनर हल्का रखें:

1 रोटी

सब्ज़ी

थोड़ा प्रोटीन

सलाद


स्नैक्स में:

10-15 बादाम

भुने चने

एक कप दूध

हल्की चाय (बिना शुगर)


छोटे हिस्सों में खाने से

शुगर धीरे बढ़ती है और कंट्रोल में रहती है।


एक्सरसाइज़ और रूटीन का रोल

डाइट के साथ-साथ:


रोज़ 30–40 मिनट तेज़ चलना

या कोई भी रेगुलर फिज़िकल एक्टिविटी


बहुत ज़रूरी है।


दवाइयाँ:


समय पर लें

और शुगर का रिकॉर्ड रखें


अगर शुगर बार-बार लिमिट से बाहर जा रही है,

तो पहले:


डाइट सुधारें

एक्सरसाइज़ बढ़ाएँ


और ज़रूरत पड़े तो डॉक्टर से सलाह लें।


HbA1c सात से नीचे लाना संभव है

अगर आप चाहते हैं कि HbA1c सच में सात से नीचे आए,

तो उसके लिए:


मेहनत

अनुशासन

और consistency


तीनों चाहिए।


यह कोई एक दिन का काम नहीं है,

लेकिन सही तरीके से किया जाए

तो कंट्रोल बिल्कुल मुमकिन है।


डायबिटीज़ को हराना नहीं,

समझदारी से मैनेज करना सीखना पड़ता है

नाभि खसकना: सच, भ्रम या आयुर्वेदिक लॉजिक?

 Navel Displacement - नाभि खसकना: सच, भ्रम या आयुर्वेदिक लॉजिक?

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप डॉक्टर के पास गए हों और उनसे कहा हो –

“डॉक्टर साहब, मेरी नाभि खसक गई है”?


और जवाब में डॉक्टर ने बिल्कुल straight बोल दिया हो –

“ऐसा कुछ नहीं होता, नाभि खसकने जैसी कोई बीमारी नहीं है”?


यहीं से confusion शुरू होता है।

क्योंकि दूसरी तरफ YouTube, Instagram, Facebook, हर जगह लोग बोल रहे हैं –

नाभि खसक गई, नाभि बिठवानी पड़ी, मटका लगवाया, लोटा रखा, किसी ने धागा बांधा।


अब सवाल उठता है -

ये सच में कोई problem है या बस एक गलतफहमी?

या फिर… दिक्कत नाभि की नहीं, किसी और चीज़ की है?


इसी topic को हम आयुर्वेद के नजरिए से detail में समझने वाले हैं।


नाभि खसकने पर लोगों को क्या-क्या दिक्कत होती है?

जिन लोगों को लगता है कि उनकी नाभि खसक गई है, वो ज़्यादातर ये complaints बताते हैं:


भूख बिल्कुल नहीं लगती

बहुत ज्यादा गैस बनती है

पेट में खिंचाव, फड़कन या कुछ “हिलता-डुलता” सा लगता है

अपच, ढकार, पेट ठीक से साफ न होना

वजन धीरे-धीरे कम होते जाना

पेट के आसपास लगातार दर्द या भारीपन


कुछ लोग ये भी कहते हैं कि

नाभि कभी नीचे चली जाती है,

कभी ऊपर,

कभी लेफ्ट, कभी राइट।


और ये सब अक्सर कब होता है?


अचानक भारी सामान उठाने के बाद

तेज़ लूज मोशन के बाद

ज़्यादा ट्रैवल करने पर

बहुत ज़्यादा थकावट या कमजोरी के बाद


आयुर्वेद क्या कहता है? 

आयुर्वेद के हिसाब से

“नाभि खसकना” कोई अलग बीमारी नहीं है।


ये एक symptom है।

और इसका root cause है — समान वायु का बिगड़ जाना।


अब ये समान वायु क्या है, वहीं से असली समझ शुरू होती है।


आयुर्वेद का बेसिक फंडा: दोष और वायु

आयुर्वेद में हर बीमारी को समझने के लिए हम सबसे पहले जाते हैं:


वात

पित्त

कफ


इनमें से वात को सबसे powerful दोष माना गया है।


और वात खुद पाँच हिस्सों में काम करता है:


प्राण वायु

उदान वायु

व्यान वायु

अपान वायु

समान वायु


नाभि का एरिया खास तौर पर समान वायु का क्षेत्र होता है।


समान वायु का काम क्या है?

समान वायु आपके digestion का पूरा control संभालती है।


इसका काम होता है:


खाना लेना

खाने को पचाना

पचे हुए खाने को अलग-अलग हिस्सों में बांटना

पोषण को पूरे शरीर में भेजना


और waste को नीचे की तरफ निकालने के लिए आगे भेजना


यानि digestion से लेकर nutrition तक — सब कुछ समान वायु पर depend करता है।


जब समान वायु बिगड़ती है, तब क्या होता है?

अब ध्यान दीजिए -

जिन complaints को लोग “नाभि खसकना” कहते हैं,

वही symptoms आयुर्वेद में समान वायु खराब होने के लक्षण बताए गए हैं।


जैसे:


शूल (Pain)

नाभि के आसपास लगातार दर्द

कभी सुई चुभने जैसा

कभी मरोड़ या ऐंठन

कभी खाने के बाद बढ़ता है

कभी खाली पेट ज्यादा दर्द करता है


गुल्म (Gas lump / moving gas)

पेट में गैस का गोला सा घूमता हुआ लगना

कभी ऊपर, कभी नीचे

कभी एक जगह टिकता ही नहीं


Modern science इसे कई बार “psychological” कह देती है,

लेकिन आयुर्वेद इसे वात की गड़बड़ी मानता है।


Digestive disorders

IBS

ग्रहणी

कब्ज

लूज मोशन

ब्लोटिंग

पेट साफ न होना


तो सीधा सा निष्कर्ष क्या निकला?

नाभि खसकना = समान वायु का बिगड़ जाना


अब अगला सवाल obvious है 

इसे ठीक कैसे करें?


समान वायु को ठीक करने का आयुर्वेदिक तरीका

आयुर्वेद में सिर्फ दवा नहीं,

दवा का टाइम भी उतना ही important होता है।


समान वायु के लिए दवा लेने का सही समय बताया गया है —

खाने के बीच में।


खाने के बीच में कैसे?

अगर 2 रोटी खाते हैं -

1 रोटी खाई - दवा ली - दूसरी रोटी खाई


अगर चावल खाते हैं -

आधा खाना - दवा - बाकी आधा खाना


इसे आयुर्वेद में कहते हैं समान काल।


अब सवाल: कौन सी दवा या चीज?

ये depend करता है कि

समान वायु के साथ कौन-सा दोष और बिगड़ा है।


जब समान वायु + पित्त बिगड़ा हो

लक्षण:


बहुत ज्यादा पसीना

खाने के समय sweating

शरीर में जलन

पेट में गर्मी

बार-बार प्यास, मुंह सूखना


क्या करें?

देसी A2 गाय का घी

1 चम्मच + चुटकी भर सेंधा नमक

खाने के बीच में

या

नागरमोथा (मुस्ता) पाउडर

 1/4 चम्मच + शहद

खाने के बीच में

या

शतावरी पाउडर

1/4 चम्मच + 1 चम्मच घी


जब समान वायु + कफ बिगड़ा हो

लक्षण:


बहुत ठंड लगना

पसीना कम आना

भूख बिल्कुल न लगना


क्या करें?

हरड़ पाउडर 1/2 चम्मच

सोंठ पाउडर 1/4 चम्मच


1–2 चुटकी सेंधा नमक

खाने के बीच में

या

50–100 ml छाछ (अगर सूट करे)


योग और लाइफस्टाइल सपोर्ट

पवनमुक्तासन

भुजंगासन


भारी काम अचानक न करें

ज्यादा देर भूखे न रहें

ओवर-exertion avoid करें


बार-बार नाभि खसकती है? Root treatment क्या है?

अगर बार-बार नाभि “बिठवानी” पड़ रही है,

तो temporary fix से काम नहीं चलेगा।


आयुर्वेदिक पंचकर्म options:

समान वायु + कफ

वमन + बस्ती


समान वायु + पित्त

विरेचन + बस्ती


ये treatments root से समस्या को ठीक करने में मदद करते हैं।


ठीक होने में कितना टाइम लगता है?

Simple cases - 2–3 महीने

IBS / ग्रहणी जैसे cases - 1 से 1.5 साल


Ready-made आयुर्वेदिक दवाइयाँ?

हाँ, मौजूद हैं:


हिंग्वाष्टक चूर्ण

लवण भास्कर

शंख वटी

लहसुनादि वटी

कुमारी आसव


लेकिन कौन सी दवा, कितनी, कब -

ये patient-to-patient बदलता है।


Conclusion

नाभि खसकना कोई अलग बीमारी नहीं,

बल्कि समान वायु के बिगड़ने का संकेत है।


इसके साथ कौन-सा दोष जुड़ा है,

उसी हिसाब से इलाज किया जाता है।


पित्त बढ़ गया है

 Home Remedies for Pitta - पित्त बढ़ गया है? घबराइए नहीं—इलाज आपके किचन में ही है - अगर आपको बार-बार जलन, मुंह में छाले, पूरे शरीर में अजीब सी गर्मी, बहुत ज़्यादा पसीना, हाथ-पैरों में आग लगने जैसा फील, या फिर पूरी बॉडी में बर्निंग सेंसेशन रहता है-तो समझ लीजिए पित्त ओवरएक्टिव हो चुका है।


इसके साथ अगर गुस्सा जल्दी आना, चिड़चिड़ापन, या फिर ब्लीडिंग से जुड़ी दिक्कतें (नाक से खून, पाइल्स में ब्लीडिंग, पीरियड्स में ज़्यादा ब्लड, स्किन पर लाल-लाल चकत्ते) भी जुड़ जाएं, तो ये सारे क्लासिक पित्त डिसऑर्डर के साइन हैं।


अब सवाल आता है-

“ठीक है, आयुर्वेद में इलाज तो बहुत बताए जाते हैं, लेकिन घर पर ऐसा क्या करें जिससे पित्त कंट्रोल में आए?”


आज हम बात करेंगे ऐसी 5 परफेक्ट चीज़ों की, जो:


आसानी से मिल जाती हैं

ज़्यादा महंगी नहीं हैं

और सही तरीके से इस्तेमाल की जाएं, तो पित्त को काफी हद तक शांत कर देती हैं


औषधि #1: कुष्मांड (पेठा / कोहड़ा / Ash Gourd)

सबसे पहले बात उस सब्ज़ी की जो पित्त के लिए किसी रामबाण से कम नहीं—कुष्मांड।

आप इसे पेठा, कोहड़ा, वाइट ऐश गार्ड या कहीं-कहीं पंपकिन भी कहते हैं (लेकिन यहां बात हरे छिलके और सफेद अंदर वाले कोहड़े की हो रही है)।


आयुर्वेद में इसके नाम में ही हिंट है-

“कु + ऊष्म”, यानी शरीर की ऊष्णता, हीट और जलन को दबाने वाली चीज़।


 यह:


शरीर की अंदरूनी गर्मी कम करता है

पित्त से जुड़े ब्लड डिसऑर्डर्स में मदद करता है

जलन, बर्निंग और ओवरहीटिंग को शांत करता है


कैसे लें?


सब्ज़ी बनाकर

जूस के रूप में

घी और मिश्री डालकर हलवे जैसा बनाकर

किसी भी फॉर्म में, बस इसे डाइट में शामिल करें।


शरद ऋतु

15 सितंबर से लेकर लगभग 15 नवंबर तक का समय आयुर्वेद में शरद ऋतु माना जाता है।

इस दौरान वातावरण और शरीर—दोनों में पित्त बढ़ता है।

अगर आप पित्त प्रकृति के हैं या आपको गर्मी ज़्यादा लगती है, तो इस मौसम में कुष्मांड को इग्नोर मत कीजिए।


इसीलिए शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की रोशनी में खीर रखकर खाने की परंपरा है—ताकि बढ़ी हुई गर्मी को शांत किया जा सके।


औषधि #2: आंवला (Amla / Amlaki)

दूसरी सुपरहिट और बजट-फ्रेंडली औषधि है—आंवला।

आयुर्वेद के अनुसार आंवला होता है:


शीत (बेहद ठंडा)

रूक्ष (ड्राय)


ये खासतौर पर उस पित्त के लिए बेस्ट है जिसे आयुर्वेद में “गीला पित्त” कहते हैं।


गीला पित्त क्या होता है?

बहुत ज़्यादा पसीना

खुजली और लाल चकत्ते

चिपचिपा मोशन, तेज़ जलन

खट्टा-कड़वा पानी, एसिडिटी

नाक, मुंह, पाइल्स या पीरियड्स में ज़्यादा ब्लीडिंग


इन सब कंडीशन्स में आंवला गेम-चेंजर है।


कैसे लें?


10–20 ml आंवला जूस

कच्चा आंवला काटकर

आंवले का पाउडर

या अगर सूट करता है तो आंवले का अचार


बोनस फायदा:

पित्त की वजह से बाल जल्दी सफेद होना, एजिंग जल्दी दिखना—इन सब में भी आंवला कमाल करता है।


औषधि #3: करेला - कड़वा, लेकिन असरदार

करेले का नाम सुनते ही लोग मुंह बना लेते हैं—

“छी, इतना कड़वा!”


लेकिन सच यही है कि इसी कड़वेपन में पित्त का इलाज छुपा है।


आयुर्वेद के अनुसार:


खट्टा, नमकीन, तीखा → पित्त बढ़ाते हैं

मीठा, कसैला, कड़वा → पित्त घटाते हैं


और इन तीनों में सबसे ताकतवर है—कड़वा रस (तिक्त रस)।


करेला:


अंदर की हीट कम करता है

छाले, जलन, पित्त वाली डिस्चार्ज को कंट्रोल करता है


कैसे खाएं?


घी में बनी करेले की सब्ज़ी

अगर पित्त है, तो करेले को लाइफस्टाइल से हटाइए मत—बस सही तरीके से खाइए।


औषधि #4: सिंघाड़ा (Water Chestnut)

अब बात उस चीज़ की जो:


ठंडी है

टेस्टी है

और शरीर को नरिशमेंट भी देती है


नाम है—सिंघाड़ा (संस्कृत: श्रृंगाटक)।


करेला पित्त घटाता है, लेकिन वज़न भी कम करता है।

अगर कोई बोले:

“मेरा पित्त तो है, लेकिन बॉडी पहले से ही कमज़ोर और सूखी है”


तो ऐसे केस में करेला नहीं—सिंघाड़ा बेहतर है।


कैसे लें?


कच्चा काटकर

सिंघाड़े का आटा

हलवा बनाकर

ये शुक्र धातु तक काम करता है,

जल्दी डिस्चार्ज, अंदरूनी जलन, और कमजोरी वाले केस में खास फायदेमंद।


औषधि #5: घी – पित्त शांत करने का राजा

आख़िर में, लेकिन सबसे ज़रूरी—घी (घृत)।


आयुर्वेद में पित्त को कंट्रोल करने के दो तरीके हैं:


दबाना (Shamana)

शरीर से बाहर निकालना (Shodhana)


पित्त को दबाने के लिए घी से बेहतर कुछ नहीं।


खासतौर पर उन लोगों के लिए:

जिन्हें बहुत गुस्सा आता है

जो ज़्यादा सोचते हैं

ब्रेन-वर्क, स्ट्रेस, लेट नाइट स्टडी

मानसिक थकान के कारण पित्त बढ़ा हुआ है


घी कैसे यूज़ करें?


रोज़ 10–15 ml खाने में

पैरों के तलवों पर मालिश

नाक में (नस्य)

मुंह के छालों में कुल्ला (देसी गाय का घी)


मज़बूत डाइजेशन वालों के लिए भैंस का घी भी चल सकता है।


जब ये सब करने के बाद भी पित्त कंट्रोल न हो…

अगर आपने खान-पान, ये सारी चीज़ें सब ट्राय कर लीं,

फिर भी पित्त बहुत ज़्यादा है—तो आयुर्वेद कहता है:


अब उसे दबाओ मत, निकालो।


इसके लिए:


विरेचन पंचकर्म (पित्त को मोशन के ज़रिये बाहर निकालना)

हर 6 महीने में रक्तमोक्षण (ब्लड निकालना)

लोकल पित्त में लीच थेरेपी / कपिंग


ये सब करने के बाद जब आप ऊपर बताई गई चीज़ें खाते हैं,

तो रिज़ल्ट कई गुना बेहतर आता है।


फाइनल बात

आज हमने सिर्फ 5 चीज़ों की बात की है,

लिस्ट इससे कहीं लंबी है।


अगर आप चाहते हैं:


और घरेलू उपाय

और फूड लिस्ट

या किसी खास पित्त प्रॉब्लम पर डीप वीडियो


तो कमेंट में ज़रूर बताइए:


आपने आज क्या सीखा

और अगला वीडियो किस टॉपिक पर चाहिए 



वात, पित्त और कफ तीनों बिगड़ जाएं तो क्या करें?

 Ayurvedic Tridosha Treatment - वात, पित्त और कफ तीनों बिगड़ जाएं तो क्या करें?

जब तीनों दोष बिगड़ जाएँ – इसे ही सन्निपात कहते हैं - आयुर्वेद में सबसे चुनौतीपूर्ण स्थिति तब मानी जाती है जब शरीर के तीनों दोष – वात, पित्त और कफ – एक साथ असंतुलित हो जाते हैं। इस अवस्था को सन्निपात कहा जाता है।


यहीं पर लोग सबसे बड़ी गलती करते हैं। वे किसी एक दोष को ठीक करने की दवा या उपाय शुरू करते हैं और अनजाने में दूसरा दोष और ज्यादा बिगड़ जाता है।


आज हम उन्हीं आयुर्वेदिक सिद्धांतों पर आधारित पाँच ऐसे तरीकों की बात करेंगे, जिनसे तीनों दोषों को एक साथ बैलेंस किया जा सकता है और शरीर को दोबारा ट्रैक पर लाया जा सकता है।


त्रिदोष क्यों बिगड़ते हैं – असली जड़ क्या है?

आयुर्वेद के अनुसार त्रिदोष का असंतुलन तब शुरू होता है जब जठराग्नि यानी डाइजेस्टिव फायर कमजोर पड़ जाती है।

कमज़ोर अग्नि की वजह से शरीर में आम यानी टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं और यहीं से रोगों की चेन रिएक्शन शुरू होती है।


इसीलिए इलाज की शुरुआत हमेशा अग्नि सुधारने से होती है, दवा से नहीं।


पहला स्टेप: लंघन – शरीर को खुद को साफ करने का मौका दें

सबसे पहले तीन दिन तक सिर्फ गुनगुना पानी पिएँ और मूंग दाल की पतली खिचड़ी लें।

आयुर्वेद में इसे लंघन कहा जाता है।


लॉजिक साफ़ है – जब सिस्टम पर लोड कम होगा, तभी शरीर खुद की सफाई कर पाएगा। यह शरीर को रीसेट करने जैसा है।


क्यों पहले वात को बैलेंस करना ज़रूरी है?

आयुर्वेद का एक मूल सिद्धांत है –

“वायुना विना दोषाणां गतिर्नास्ति”

मतलब, बिना वात के पित्त और कफ हिल भी नहीं सकते।


इसलिए जब तीनों दोष बिगड़े हों, तो सबसे पहले वात को शांत करना जरूरी है।


वात संतुलन का सबसे सरल उपाय

तिल के तेल से रोज़ हल्की मालिश।

यह शरीर के सूखेपन को खत्म करता है और नर्वस सिस्टम को शांत करता है।


दूसरा स्टेप: पित्त के लिए घी क्यों ज़रूरी है?

पित्त का मतलब सिर्फ गर्मी नहीं, बल्कि ओवरएक्टिव मेटाबॉलिज़्म भी है।

देसी घी पित्त को ठंडा करता है, लेकिन अग्नि को कमजोर नहीं करता।


इसीलिए पित्त संतुलन के लिए घी को आयुर्वेद में अमृत कहा गया है।


तीसरा स्टेप: कफ के लिए शहद और मूवमेंट

कफ का नेचर है भारीपन और जड़ता।

शहद कफ को काटता है और हल्का व्यायाम कफ को जमा नहीं होने देता।


ध्यान रहे – शहद हमेशा कच्चा लें, गर्म न करें।


जब तीनों दोष बिगड़े हों, तो डाइट कैसी होनी चाहिए?

ऐसी डाइट जो न बहुत ठंडी हो, न बहुत गर्म।

आयुर्वेद इसे सामान्य आहार कहता है।


अब अपनी थाली में ये पाँच बदलाव आज से शुरू करें।


1. अनाज – हल्का लेकिन पोषक

भारी गेहूं की रोटियाँ फिलहाल कम करें।

उसकी जगह:


पुराना चावल

जौ

मूंग की दाल


मूंग दाल इकलौती ऐसी दाल है जो वात, पित्त और कफ – तीनों को बैलेंस करती है।


2. सब्ज़ियाँ – हमेशा पकी हुई

कच्चा प्याज़ बिल्कुल बंद करें। यह वात बढ़ाता है।

हमेशा पकी हुई सब्ज़ियाँ खाएँ जैसे:


लौकी

तोरई

कद्दू

परवल


ये पचने में हल्की होती हैं और सिस्टम पर बोझ नहीं डालतीं।


3. फल – हर फल आपके लिए नहीं

इस समय सबसे सुरक्षित फल हैं:


अनार

पपीता


बहुत खट्टे या बहुत मीठे फलों से अभी दूरी बनाए रखें।


4. मसाले – कम लेकिन सही

लाल मिर्च को फिलहाल रसोई से बाहर रखें।

उसकी जगह:


जीरा

धनिया

सौंफ


ये तीनों मिलकर पाचन सुधारते हैं बिना पित्त को भड़काए।


5. कुकिंग फैट – देसी घी क्यों सबसे बेस्ट है?

रिफाइंड तेल छोड़ें।

देसी घी:


वात को चिकनाई देता है

पित्त को शांत करता है

कफ को जमा नहीं होने देता


इसीलिए यह त्रिदोष संतुलन का सबसे सुरक्षित फैट है।


शुरुआत समझ नहीं आ रही? ये करें

3 से 7 दिन तक सिर्फ मूंग दाल की खिचड़ी खाएँ।

यह आपके पाचन तंत्र के लिए फैक्ट्री रिसेट जैसा काम करता है।


कुछ चीज़ें जो तीनों दोषों पर काम करती हैं

1. आंवला

इकलौता फल जो:


पित्त को ठंडा करता है

वात को शांत करता है

कफ को सुखाता है


2. गिलोय

इसे त्रिदोष शामक कहा जाता है।

यह खून साफ करती है और शरीर में बैलेंस बनाती है।


3. त्रिफला – सही तरीके से लें

रात को गुनगुने पानी से लें - वात और पित्त को बाहर निकालता है

शहद के साथ लें - कफ को काटता है


दवा ले रहे हैं लेकिन गलत खाना खा रहे हैं?

तो त्रिदोष कभी ठीक नहीं होंगे।


इन विरुद्ध आहार से बचें:

दूध के साथ नमक या खट्टे फल

रात में दही

ठंडा पानी

ठंडा पानी वात और कफ को तुरंत बिगाड़ देता है।


समय का पालन – आयुर्वेद का सबसे अनदेखा नियम

रात 10 बजे तक सो जाएँ

सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें

रोज़ 15 मिनट अनुलोम-विलोम या नाड़ी शोधन करें


यह प्राण वायु को संतुलित करता है और तीनों दोषों को स्थिर करता है।


Conclusion

त्रिदोष को बैलेंस करने के लिए:


पाचन सुधारें

आंवला और गिलोय को शामिल करें

विरुद्ध आहार से बचें


त्रिदोष का इलाज धैर्य माँगता है, लेकिन सही दिशा में किया गया प्रयास शरीर को स्थायी संतुलन देता है।


Monday, February 2, 2026

सोर थ्रोट और एसिड रिफ्लक्स: क्या है असली कनेक्शन?

Acid reflux throat pain - सोर थ्रोट और एसिड रिफ्लक्स: क्या है असली कनेक्शन?

अक्सर ऐसा होता है कि गले में लगातार खराश, जलन या अजीब-सी परेशानी रहती है। आप डॉक्टर के पास जाते हैं, जांच होती है और जवाब मिलता है—“ये गले की नहीं, पेट के एसिड की प्रॉब्लम है।” बहुत लोगों को ये सुनकर कन्फ्यूजन हो जाता है कि पेट और गले का आपस में आखिर क्या रिश्ता है।

असल में सोर थ्रोट और एसिड रिफ्लक्स के बीच एक गहरा लिंक है, जिसे समझना ज़रूरी है।


एसिड रिफ्लक्स होता क्या है?

हमारे पेट में खाना पचाने के लिए एसिड बनता है। आमतौर पर ये एसिड पेट तक ही सीमित रहता है, लेकिन जब किसी वजह से यही एसिड ऊपर की ओर चढ़ने लगता है-खाने की नली (फूड पाइप) में और कभी-कभी गले तक-तो इसे एसिड रिफ्लक्स कहते हैं।


जब पेट का एसिड खाने की नली की अंदरूनी परत को इरिटेट करता है, उसे नुकसान पहुँचाता है, तभी दिक्कतें शुरू होती हैं। यही प्रोसेस धीरे-धीरे गले तक असर दिखाने लगती है।


एसिड ऊपर आया तो शरीर क्या-क्या महसूस कर सकता है?

एसिड रिफ्लक्स के लक्षण सिर्फ सीने की जलन तक सीमित नहीं होते। इसके कई चेहरे होते हैं:


सीने में जलन (हार्टबर्न)


खट्टा या कड़वा पानी मुंह तक आना (रिगर्जिटेशन)


थोड़ा खाने पर ही पेट भरा-भरा लगना


बार-बार डकारें और बदहजमी


मुंह में लगातार कड़वा या अजीब स्वाद


लंबे समय में खाना अटकने जैसी फीलिंग (डिस्फेजिया)


लेकिन हैरानी की बात ये है कि हर किसी को हार्टबर्न ज़रूरी नहीं होता, फिर भी एसिड रिफ्लक्स गले में प्रॉब्लम कर सकता है।


बिना हार्टबर्न भी हो सकता है एसिड रिफ्लक्स

मेडिकल साइंस मानती है कि करीब 20–60% लोग ऐसे होते हैं जिनमें गले, सिर या गर्दन से जुड़े लक्षण होते हैं, लेकिन सीने में जलन बिल्कुल नहीं होती।

यानी आपको हार्टबर्न न हो, फिर भी एसिड रिफ्लक्स आपके गले को नुकसान पहुँचा सकता है—ये पूरी तरह मुमकिन है।


जब एसिड रिफ्लक्स से होता है सोर थ्रोट

जब गले की परेशानी एसिड रिफ्लक्स की वजह से होती है, तो कुछ खास तरह की शिकायतें सामने आती हैं:


गले में हमेशा कुछ अटका-सा महसूस होना

(इसे ग्लोबस सेंसेशन कहते हैं)

लगातार खराश या गला खराब रहना

गले में टाइटनेस या चोकिंग-सी फीलिंग

सूखी खांसी जो ठीक नहीं होती

बार-बार गला साफ करने की आदत

आवाज़ का भारी या बैठ जाना (hoarseness)

खाना निगलते वक्त अटकने का एहसास

मुंह से बदबू (halitosis)

मुंह में खराब या कड़वा स्वाद (water brash)

शीशे में देखने पर गले का अंदरूनी हिस्सा लाल और सूजा हुआ दिखना

नाक के पीछे से गले में म्यूकस गिरना (post-nasal drip)


ये सारे लक्षण मिलकर अक्सर लोगों को परेशान कर देते हैं।


LPR: एसिड रिफ्लक्स का एक अलग रूप

जब पेट का एसिड सीधे गले और वोकल कॉर्ड्स तक पहुँच जाता है, तो इसे कहते हैं

Laryngopharyngeal Reflux (LPR)।


इसमें एसिड की मात्रा कभी-कभी बहुत कम होती है, लेकिन गले और आवाज़ की नसें इतनी सेंसिटिव होती हैं कि थोड़ा-सा एसिड भी उन्हें नुकसान पहुँचा सकता है।


LPR में आमतौर पर:


आवाज़ बैठने लगती है

गले में लगातार खिच-खिच रहती है

सूखी खांसी होती है

बार-बार गला साफ करने की ज़रूरत महसूस होती है

गले में कुछ फंसा होने की फीलिंग बनी रहती है


ये लक्षण कई बार रेस्पिरेटरी बीमारी जैसे लगते हैं, जबकि जड़ में वजह एसिड रिफ्लक्स होती है।


किन लोगों में ये लक्षण ज़्यादा दिखते हैं?

जो लोग रोज़ाना अपनी आवाज़ का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, उनमें ये समस्या जल्दी और ज़्यादा नजर आती है, जैसे:


सिंगर्स

टीचर्स

कॉल-सेंटर या शेयर मार्केट प्रोफेशनल्स

पॉलिटिशियन


ऐसे लोग जिन्हें लगातार ज़ोर से बोलना पड़ता है

इनमें वोकल कॉर्ड्स पहले से ही ज़्यादा स्ट्रेस में रहते हैं, इसलिए एसिड का असर जल्दी दिखता है।


क्या हर सोर थ्रोट एसिड रिफ्लक्स की वजह से होता है?

नहीं। ये बहुत ज़रूरी बात है।

हर गले की परेशानी को सिर्फ एसिड रिफ्लक्स मान लेना सही नहीं है।


सोर थ्रोट के दूसरे कारण भी हो सकते हैं:


वायरल इंफेक्शन (सर्दी-जुकाम, फ्लू)

बैक्टीरियल इंफेक्शन (जैसे स्ट्रेप थ्रोट)

बच्चों में डिप्थीरिया या काली खांसी

कुछ वायरल बीमारियाँ जैसे मीज़ल्स या चिकनपॉक्स

एलर्जी

स्मोकिंग या धुएं का ज़्यादा एक्सपोज़र

लंबे समय की एसिडिटी

और कुछ मामलों में गंभीर कारण भी


इसलिए आंख बंद करके ये मान लेना कि “ये सब एसिड से ही है”—सही अप्रोच नहीं है।


सही नज़रिया क्या होना चाहिए?

अगर गले में खराश, आवाज़ बैठना, सूखी खांसी या अटकने-सी फीलिंग लंबे समय तक बनी हुई है, तो

खुली आंखों से देखने की ज़रूरत है-


क्या इसके पीछे एसिड रिफ्लक्स जिम्मेदार है?


या कोई और वजह भी हो सकती है?


क्योंकि अगर वजह एसिड रिफ्लक्स है, तो गले की दिक्कत तभी ठीक होगी जब रिफ्लक्स कंट्रोल होगा।

और अगर कोई दूसरा कारण है, तो उसका अलग इलाज ज़रूरी है।


ये बात सही है कि:


सोर थ्रोट कई बार एसिड रिफ्लक्स का संकेत हो सकता है

LPR नाम की स्थिति गले और आवाज़ को प्रभावित कर सकती है


लेकिन साथ ही ये भी उतना ही सच है कि हर सोर थ्रोट को सिर्फ एसिड से जोड़ना गलत हो सकता है।

इसलिए सही डायग्नोसिस और सही दिशा में इलाज के लिए डॉक्टर से सलाह लेना बेहद ज़रूरी है।


Sore Throat और Acid Reflux: आयुर्वेद की नज़र से

आधुनिक मेडिकल साइंस जहाँ इसे Acid Reflux / LPR कहती है, वहीं आयुर्वेद में इस समस्या को शरीर के दोष असंतुलन, खासकर पित्त दोष से जोड़कर देखा जाता है।


आयुर्वेद के अनुसार शरीर में जब पित्त दोष ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ जाता है, तो वह सिर्फ़ पेट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ऊपर की ओर बढ़कर गले, छाती और मुँह तक असर दिखाने लगता है।


आयुर्वेद में Acid Reflux को क्या कहते हैं?

आयुर्वेद में इसे अलग-अलग नामों से समझाया गया है, जैसे:


अम्लपित्त – जब पाचन अग्नि असंतुलित होकर ज़्यादा खटास पैदा करे

उर्ध्वग अम्लपित्त – जब वही खट्टा पित्त ऊपर की ओर चढ़ने लगे


जब यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो गले की कोमल त्वचा (म्यूकोसा) पर इसका सीधा असर पड़ता है।


आयुर्वेद के अनुसार गला क्यों प्रभावित होता है?

आयुर्वेद मानता है कि:


गला और वोकल कॉर्ड्स कफ प्रधान क्षेत्र हैं

जबकि एसिडिटी और जलन पित्त दोष की प्रकृति है


जब बढ़ा हुआ पित्त कफ क्षेत्र में पहुँचता है, तो वहाँ जलन, सूखापन, खराश और खिच-खिच पैदा करता है।


इसी वजह से:


गला सूखा लगता है

आवाज़ बैठ जाती है

बार-बार गला साफ़ करने की इच्छा होती है

सूखी खांसी बनी रहती है


आयुर्वेद में इसे बढ़ाने वाली मुख्य वजहें

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से Acid Reflux और sore throat के पीछे कुछ common कारण होते हैं:


1. गलत खानपान

बहुत ज़्यादा तीखा, खट्टा, तला-भुना

बार-बार चाय, कॉफी

देर रात भारी खाना

खाली पेट ज़्यादा मसाले

ये सभी चीज़ें पित्त दोष को बढ़ाती हैं।


2. अनियमित दिनचर्या

देर रात तक जागना

समय पर भोजन न करना

खाने के तुरंत बाद लेटना

मानसिक तनाव


ये आदतें पाचन अग्नि को कमजोर करती हैं, जिससे अम (toxins) और अम्लपित्त बनता है।


3. आवाज़ का ज़्यादा इस्तेमाल

आयुर्वेद में आवाज़ को प्राण और उदान वायु से जोड़ा गया है।

जब पित्त बढ़ा हुआ हो और वाणी का ज़्यादा उपयोग किया जाए, तो गले की रिकवरी और धीमी हो जाती है।


आयुर्वेद के अनुसार Symptoms कैसे समझें?

अगर Acid Reflux एक्टिव है, तो गले में ये संकेत दिख सकते हैं:


गले में जलन और सूखापन

खट्टा या कड़वा स्वाद

मुँह में बदबू

भारी आवाज़

बार-बार खांसी

गले में कुछ फंसा होने का एहसास (Globus sensation)


आयुर्वेद इसे केवल लोकल प्रॉब्लम नहीं मानता, बल्कि पाचन और दोष असंतुलन का संकेत मानता है।


आयुर्वेद में उपचार की सोच (Treatment)

आयुर्वेद सिर्फ़ एसिड दबाने पर फोकस नहीं करता, बल्कि तीन स्तर पर काम करता है:


1. पित्त शमन (Pacifying Pitta)

यानि शरीर की बढ़ी हुई गर्मी और एसिडिक नेचर को शांत करना


आयुर्वेद के अनुसार जब पित्त बढ़ता है, तो उसका स्वभाव होता है:


गर्म

तेज़

खट्टा

जलन पैदा करने वाला


इसी वजह से acid reflux, गले की जलन, खराश, कड़वा स्वाद जैसे लक्षण दिखते हैं।

पित्त शमन का मतलब है — ठंडक, स्थिरता और संतुलन लाना।


पित्त शांत करने वाली प्रमुख जड़ी-बूटियाँ

1. यष्टिमधु (Mulethi)


Nature: शीतल, soothing

Benefit: गले की lining को heal करती है, जलन कम करती है

Dosage:


चूर्ण: 500 mg – 1 ग्राम, दिन में 2 बार

या गुनगुने पानी/दूध के साथ


2. शतावरी (Shatavari)


Nature: Cooling + nourishing

Benefit: अम्लपित्त में बहुत असरदार

Dosage:


चूर्ण: 1–2 ग्राम, दिन में 1–2 बार

या कैप्सूल रूप में 500 mg × 2


3. प्रवाल पिष्टी / मुक्ताशुक्ति पिष्टी


Nature: alkaline, acid-neutralizing

Benefit: ज़्यादा एसिड को बैलेंस करती है


Dosage:


125–250 mg, दिन में 1–2 बार

शहद या घी के साथ


4. आमलकी (Amla)


Nature: Cooling despite sour taste

Benefit: पित्त को संतुलित करती है, healing बढ़ाती है

Dosage:


चूर्ण: 1–2 ग्राम सुबह

या fresh juice 10–20 ml


 पित्त शांत करने वाली डाइट

क्या खाएँ (Favorable):


सादा चावल, मूंग दाल

लौकी, तोरी, परवल, टिंडा

नारियल पानी

छाछ (दिन में, बिना नमक)

गाय का दूध (रात को नहीं, बल्कि दिन में बेहतर)


क्या कम करें / बचें (Aggravating):


बहुत तीखा, तला-भुना

टमाटर, सिरका, अचार

चाय, कॉफी

शराब, स्मोकिंग

बहुत खट्टे फल


मानसिक शांति क्यों ज़रूरी है?

आयुर्वेद में माना जाता है:


“क्रोध और तनाव सीधे पित्त को बढ़ाते हैं”


इसलिए:


अनुलोम-विलोम

शीतली प्राणायाम


समय पर सोना

ये सब पित्त शमन का हिस्सा हैं, सिर्फ़ extra नहीं।


2. अग्नि सुधार (Digestive Fire Correction)

यानि पाचन को सही करना — इलाज की असली जड़


आयुर्वेद मानता है:


अगर अग्नि सही है, तो अम्लपित्त अपने आप कंट्रोल में आता है

जब पाचन कमजोर होता है:

खाना ठीक से नहीं पचता

आम (toxins) बनता है

वही आम + पित्त मिलकर reflux बनाता है

इसलिए सिर्फ़ एसिड दबाना काफी नहीं, अग्नि को सुधारना ज़रूरी है।


अग्नि सुधारने वाली जड़ी-बूटियाँ (पित्त को नुकसान पहुँचाए बिना)

1. जीरा (Cumin)


Gentle digestive

Acid बढ़ाए बिना digestion सुधारता है


Dosage:


उबले पानी में ½ चम्मच जीरा

दिन में 1–2 बार


2. धनिया (Coriander)


Cooling + digestive


Dosage:


धनिया पानी (रात को भिगोकर)

सुबह खाली पेट


3. सौंफ (Fennel)


Gas और reflux दोनों में helpful


Dosage:


1 चम्मच सौंफ खाने के बाद

या सौंफ का पानी


4. अविपत्तिकर चूर्ण


Classical Ayurveda formulation

Benefit: Acid + indigestion दोनों में


Dosage:


2–3 ग्राम, भोजन के बाद

गुनगुने पानी के साथ

खाने का तरीका (बहुत ज़रूरी)

आयुर्वेद में कहा गया है:


बहुत ज़्यादा खाना = अग्नि दबना

बहुत कम खाना = अग्नि कमजोर होना


Best practice:


भूख के अनुसार खाना

छोटे-छोटे meals

खाने के तुरंत बाद लेटना नहीं

रात का खाना हल्का और जल्दी

पित्त शमन + अग्नि सुधार = Long-term Relief

अगर:


सिर्फ़ पित्त शांत करेंगे - temporary आराम

सिर्फ़ अग्नि सुधारेंगे - relapse की संभावना


लेकिन:

दोनों साथ में किए जाएँ,

तो sore throat और acid reflux की जड़ से सुधार संभव है।

3. पथ्य–अपथ्य (Diet & lifestyle discipline)

आयुर्वेद साफ़ कहता है:


दवा तभी असर करती है, जब आहार और व्यवहार सही हो

अगर पित्त बढ़ाने वाली आदतें जारी रहीं, तो गले की समस्या बार-बार लौटेगी।


Ayurveda + Modern Science: दोनों को साथ समझना ज़रूरी

आज के समय में सबसे सही अप्रोच यह है कि:


Modern medicine से diagnosis हो

Ayurveda से root cause और lifestyle correction हो

क्योंकि जब तक पेट का एसिड संतुलन में नहीं आएगा, तब तक गले की परेशानी पूरी तरह ठीक नहीं होगी।


अंतिम बात 

आयुर्वेद बीमारी को दबाता नहीं,

शरीर को उसकी natural balance में लौटाता है।


और यही वजह है कि:


सही herbs

सही diet

सही दिनचर्या


तीनों मिलकर ही असली healing करते हैं


Conclusion

गले की खराश सिर्फ़ गले की बीमारी नहीं होती।

कई बार वह पेट, पाचन और पित्त दोष का आईना होती है।


अगर गले की समस्या बार-बार हो रही है, तो:


सिर्फ़ throat spray या lozenge पर निर्भर न रहें

अपनी डाइट, दिनचर्या और stress को भी देखें

और ज़रूरत हो तो सही डॉक्टर से सलाह लें


शरीर हमेशा संकेत देता है — बस हमें उन्हें सही तरीके से समझना होता है।

Saturday, January 31, 2026

फलों के छिलकों में भी होते हैं औषधीय गुण

 फलों के छिलकों में भी होते हैं औषधीय गुण,बस बीमारी अनुसार सेवन का तरीका आना चाहिए,कैसे करें छिलकों का सेवन देखें विवरण...


🍎 फलों के छिलकों के औषधीय लाभ

1. सेब का छिलका/कोलेस्ट्रॉल कम करता है

हृदय को मजबूत बनाता है/वजन घटाने में सहायक

कब्ज दूर करता है

2. केले का छिलका/दाँत चमकाने में उपयोगी

त्वचा की खुजली व दाग में लाभ/मस्सों में राहत

पौधों के लिए उत्तम खाद

3. संतरे का छिलका/चेहरे की चमक बढ़ाता है

पाचन सुधारता है/खाँसी-जुकाम में लाभ

त्वचा के दाग कम करता है

4. नींबू का छिलका/लीवर साफ करता है

रोग प्रतिरोधक शक्ति बढ़ाता है/मुँह की दुर्गंध दूर करता है

चर्बी कम करने में सहायक

5. अनार का छिलका/दस्त व पेचिश में लाभ

मसूड़ों की मजबूती/पेट के कीड़े नष्ट करता है

गले के संक्रमण में उपयोगी

6. आम का छिलका/पाचन तंत्र मजबूत करता है

त्वचा के लिए लाभकारी/कमजोरी दूर करता है

7. पपीते का छिलका/त्वचा को निखारता है

मुहाँसे कम करता है/मृत त्वचा हटाता है

8. अमरूद का छिलका/मधुमेह में लाभ

कब्ज व गैस में उपयोगी/इम्युनिटी बढ़ाता है

9. तरबूज का छिलका/किडनी साफ करता है

सूजन कम करता है/मूत्र संबंधी रोगों में लाभ

10. अनानास का छिलका/पाचन एंजाइम बढ़ाता है

जोड़ों के दर्द में सहायक/सूजन कम करता है

11. नाशपाती का छिलका/रक्त शुद्ध करता है

हृदय रोग में लाभ/पाचन सुधारता है

12. चीकू का छिलका/दस्त रोकने में सहायक

पेट को ठंडक देता है

🍊🍎 फलों के छिलकों का सेवन विधि

1. छिलका पाउडर बनाकर

सबसे सुरक्षित तरीका

छिलके धोकर छाया में सुखाएँ

मिक्सी में पीसकर पाउडर बना लें

मात्रा: ½ चम्मच

सेवन: गुनगुने पानी / शहद के साथ

समय: सुबह खाली पेट


2. काढ़ा बनाकर

खाँसी, पाचन, इम्युनिटी के लिए

सूखे छिलके 1 चम्मच

पानी 1 कप

उबालें जब ½ रह जाए

छानकर पिएँ

दिन में 1 बार


3. चाय के रूप में

थकान, मोटापा, पाचन में लाभ

संतरा / नींबू / सेब के छिलके

5 मिनट उबालें

शहद मिलाकर पिएँ


4. चूर्ण + दही

कब्ज व पेट की समस्या में

½ चम्मच छिलका चूर्ण

1 कटोरी दही

रात में सेवन करें


5. पेस्ट बनाकर (बाहरी उपयोग)

त्वचा के लिए

छिलका पीसकर पेस्ट बनाएँ

चेहरे पर 10–15 मिनट

फिर धो लें


6. सब्जी या चटनी में

(तरबूज, कद्दू, नींबू छिलका)

बारीक काटकर सब्जी/चटनी में मिलाएँ

स्वाद व पोषण दोनों बढ़ते हैं


⚠️ सावधानी

केमिकल लगे फलों के छिलके न लें

हमेशा अच्छी तरह धोएँ

अधिक मात्रा में न लें

गर्भवती महिला व गंभीर रोगी पहले पूछें

एलोवेरा किस किस बीमारी में लाभकारी,कैसे

 एलोवेरा किस किस बीमारी में लाभकारी,कैसे...


🩺 एलोवेरा किन बीमारियों में लाभकारी है

1️⃣ पेट की बीमारियाँ

कब्ज

गैस, एसिडिटी

अल्सर

अपच

लाभ: पाचन सुधारे, आँतों की सफाई करे


2️⃣ मधुमेह (शुगर)

ब्लड शुगर नियंत्रित करता है

इंसुलिन की क्रिया बेहतर करता है


3️⃣ त्वचा रोग

मुंहासे, फोड़े-फुंसी

दाग-धब्बे

जलन, खुजली, एलर्जी

लाभ: त्वचा को ठंडक और नमी देता है


4️⃣ बालों की समस्याएँ

बाल झड़ना

रूसी (डैंड्रफ)

बालों का कमजोर होना


5️⃣ जोड़ों का दर्द व सूजन

गठिया

घुटनों का दर्द

सूजन


6️⃣ इम्युनिटी कमजोर होना

बार-बार बीमार पड़ना

थकान, कमजोरी


7️⃣ हृदय रोग

कोलेस्ट्रॉल कम करता है

रक्त संचार सुधारता है


8️⃣ मूत्र रोग

जलन

संक्रमण

पेशाब में रुकावट


9️⃣ महिला रोग

अनियमित मासिक धर्म

कमजोरी

श्वेत प्रदर


🔟 वजन बढ़ना

मेटाबॉलिज्म तेज करता है

चर्बी घटाने में सहायक


🍃 एलोवेरा का सेवन कैसे करें

✅ 1. एलोवेरा जूस

मात्रा: 20–30 ml

तरीका: सुबह खाली पेट गुनगुने पानी के साथ

लाभ: शरीर डिटॉक्स, पाचन ठीक


✅ 2. ताजा एलोवेरा जेल

पत्ती काटकर अंदर का पारदर्शी जेल निकालें

मात्रा: 1 चम्मच

शहद या पानी के साथ लें

लाभ: पेट, त्वचा, इम्युनिटी के लिए


✅ 3. त्वचा पर लगाने का तरीका

ताजा जेल सीधे चेहरे या प्रभावित स्थान पर लगाएं

20 मिनट बाद धो लें

लाभ: चमकदार त्वचा, दाग कम


✅ 4. बालों में लगाने का तरीका

एलोवेरा जेल + नारियल तेल

सप्ताह में 2 बार

लाभ: बाल मजबूत, रूसी खत्म

Friday, January 30, 2026

बुजुर्गों में टांगों की कमजोरी क़े कारण

 Leg Cramps - बुजुर्गों में टांगों की कमजोरी: कारण, कमी और समाधान - अगर आपकी टांगें मजबूत हों, तो ज़िंदगी अपने आप आसान हो जाती है - ज़रा एक पल के लिए कल्पना कीजिए।


सुबह उठते ही आपकी टांगें भारी नहीं, बल्कि मजबूत और स्टेबल महसूस हो रही हैं।

अब मसल वीकनेस नहीं है।

चलते वक्त क्रैंप्स नहीं पड़ते।

बैलेंस बनाने में डर नहीं लगता।

और सबसे बड़ी बात — गिरने का डर खत्म हो चुका है।


अगर आप एक्टिव रहना चाहते हैं, आत्मनिर्भर रहना चाहते हैं और हर उम्र में कॉन्फिडेंट महसूस करना चाहते हैं, तो इसका राज एक्सरसाइज़ से भी पहले सही न्यूट्रिशन में छुपा है।


इस Post में हम बात करेंगे 7 ऐसे बेहद ज़रूरी विटामिन्स और मिनरल्स की, जो आपकी टांगों को सिर्फ मजबूत नहीं बल्कि unstoppable बना सकते हैं।


ये न्यूट्रिएंट्स मसल फंक्शन सुधारते हैं, हड्डियों की मजबूती बनाए रखते हैं और ब्लड सर्कुलेशन को बेहतर करते हैं।


इनका असर सिर्फ चलने पर नहीं, बल्कि इस बात पर पड़ता है कि आप रोज़ खुद को कैसा महसूस करते हैं।


अगर आपको पार्क में टहलना पसंद है, डांस करना अच्छा लगता है या आप दूसरों पर निर्भर हुए बिना अपनी ज़िंदगी जीना चाहते हैं, तो यह post आपके लिए है।


1. विटामिन D – टांगों की ताकत की नींव

जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, शरीर में कुछ नेचुरल बदलाव आते हैं।

मसल मास धीरे-धीरे कम होने लगता है।

हड्डियों की घनता घटने लगती है।

और जो काम पहले आसान लगते थे, वो धीरे-धीरे मुश्किल हो जाते हैं।


इन सबका एक बहुत बड़ा कारण है — विटामिन D की कमी।


अक्सर लोग सोचते हैं कि विटामिन D सिर्फ हड्डियों के लिए जरूरी है, लेकिन सच्चाई यह है कि यह टांगों को मजबूत, संतुलित और फंक्शनल बनाए रखने में सीधा रोल निभाता है।


उम्र बढ़ने के साथ हमारी त्वचा धूप से विटामिन D बनाना कम कर देती है।

ऊपर से सीनियर सिटिज़न्स धूप में कम निकलते हैं — कभी मोबिलिटी की वजह से, कभी स्किन डैमेज के डर से।

नतीजा? शरीर में विटामिन D का लेवल चुपचाप गिरता चला जाता है।


इस कमी का सीधा असर मसल स्ट्रेंथ पर पड़ता है।

टांगें कमजोर होने लगती हैं, बैलेंस बिगड़ता है और गिरने का खतरा बढ़ जाता है।


रिसर्च साफ बताती है कि जिन बुजुर्गों में विटामिन D का लेवल सही होता है:


उनके मसल फाइबर्स ज्यादा मजबूत होते हैं

कोऑर्डिनेशन बेहतर रहता है

और गिरने व फ्रैक्चर का रिस्क कम होता है


इसके उलट, जिनमें कमी होती है, उनके लिए सीढ़ियाँ चढ़ना या कुर्सी से उठना भी चुनौती बन जाता है।


विटामिन D मसल्स में प्रोटीन सिंथेसिस को सपोर्ट करता है और नर्व-मसल कम्युनिकेशन को बेहतर बनाता है।

इसे आप अपने लेग मसल्स का फ्यूल समझ सकते हैं।


खासतौर पर यह फास्ट-ट्विच मसल फाइबर्स को सुरक्षित रखता है, जो अचानक संतुलन बिगड़ने पर आपको संभाल लेते हैं।

इनके कमजोर होने पर रिएक्शन स्लो हो जाता है और चोट का खतरा बढ़ जाता है।


अच्छी बात यह है कि विटामिन D को मेंटेन करना मुश्किल नहीं है।

रोज़ 15–30 मिनट की सुबह या शाम की धूप काफी मदद कर सकती है।

धूप लेते समय सनस्क्रीन न लगाएं।


खाने में फैटी फिश, अंडे का पीला हिस्सा और धूप में उगे मशरूम शामिल करें।

अगर जरूरत पड़े तो 800–1000 IU का सप्लीमेंट लिया जा सकता है।

ज्यादा कमी होने पर डॉक्टर की निगरानी में हाई डोज़ दी जाती है।


2. कैल्शियम – सिर्फ हड्डियों के लिए नहीं, मूवमेंट के लिए भी

उम्र के साथ हड्डियों का कमजोर होना आम बात है।

लेकिन जब कैल्शियम कम होता है, तब एक छोटा सा गिरना भी बड़े फ्रैक्चर में बदल सकता है।


कैल्शियम सिर्फ हड्डियों को मजबूत नहीं करता, बल्कि हर मसल मूवमेंट के लिए जरूरी होता है।

चलना, खड़े होना, कदम बढ़ाना — सब कुछ कैल्शियम और मसल फाइबर्स के तालमेल पर निर्भर करता है।


कैल्शियम की कमी से:


मसल क्रैंप्स पड़ते हैं

टांगों में कमजोरी महसूस होती है

मूवमेंट स्लो और अस्थिर हो जाती है


दूध, दही और पनीर अच्छे सोर्स हैं, लेकिन हरी पत्तेदार सब्जियां, बादाम और मछली भी उतने ही जरूरी हैं।


अगर डाइट से पर्याप्त कैल्शियम न मिले, तो सप्लीमेंट मदद कर सकता है — लेकिन विटामिन D के साथ।


बुजुर्गों के लिए रोज़ाना 1000–1200 mg कैल्शियम की जरूरत होती है।


ध्यान रखें, सिर्फ कैल्शियम लेना काफी नहीं है।

वॉकिंग और हल्की वेट-बेयरिंग एक्सरसाइज़ इसे सही जगह तक पहुंचाने में मदद करती है।


3. विटामिन B12 – नर्व्स का पावर सपोर्ट

जब बात टांगों की ताकत की होती है, तो अक्सर लोग नर्व हेल्थ को भूल जाते हैं।

यहीं पर विटामिन B12 बेहद अहम बन जाता है।


यह नर्व्स को मजबूत रखता है और ब्रेन से टांगों तक जाने वाले सिग्नल्स को साफ और तेज बनाता है।


B12 की कमी से:


टांगों में भारीपन

सुन्नपन या झनझनाहट

बैलेंस की समस्या

बार-बार गिरना


यह कमी बुजुर्गों में बहुत आम है, क्योंकि उम्र के साथ पेट का एसिड कम हो जाता है और B12 का अब्सॉर्प्शन घट जाता है।


अच्छी बात यह है कि समय पर टेस्ट और सही सप्लीमेंट से इसे पूरी तरह रोका जा सकता है।


4. मैग्नीशियम – क्रैंप्स का सबसे बड़ा दुश्मन

अगर आपको रात में टांगों में दर्दनाक क्रैंप्स पड़ते हैं, तो मैग्नीशियम की कमी इसका बड़ा कारण हो सकती है।


मैग्नीशियम:


मसल रिलैक्सेशन को कंट्रोल करता है

स्पैज़्म और थकान कम करता है

बैलेंस और फ्लेक्सिबिलिटी बढ़ाता है

यह कैल्शियम को सही जगह तक पहुंचाने में भी मदद करता है।


हरी सब्जियां, नट्स, बीज और साबुत अनाज इसके बेहतरीन सोर्स हैं।


5. पोटेशियम – स्मूद मूवमेंट का राज़

सुबह उठते ही पिंडली में क्रैंप पड़ना या चलते वक्त टांगों का कांपना — ये सब पोटेशियम की कमी के संकेत हो सकते हैं।


पोटेशियम मसल सेल्स के अंदर फ्लूइड बैलेंस बनाए रखता है और नर्व सिग्नल्स को सही रखता है।


केला, आलू, पालक, बीन्स और संतरा इसे नेचुरली पूरा करते हैं।


6. विटामिन K – कैल्शियम को सही रास्ता दिखाने वाला

विटामिन K वह न्यूट्रिएंट है जो कैल्शियम को हड्डियों तक पहुंचाता है, न कि आर्टरीज में जमा होने देता है।


यह:


हड्डियों की घनता बढ़ाता है

जॉइंट स्टिफनेस कम करता है

फ्रैक्चर का रिस्क घटाता है


पालक, केल, फर्मेंटेड फूड और अंडे इसके अच्छे सोर्स हैं।


7. विटामिन B6 – मसल रिपेयर और एनर्जी का साथी

विटामिन B6:


नर्व सिग्नलिंग सुधारता है

मसल रिकवरी तेज करता है

प्रोटीन का सही इस्तेमाल करवाता है

इसकी कमी से थकान, भारीपन और कमजोर स्टैमिना महसूस होता है।


केला, चना, आलू, फिश और पोल्ट्री इसके अच्छे सोर्स हैं।


आख़िरी बात

मजबूत टांगें सिर्फ चलने के लिए नहीं, आत्मनिर्भर ज़िंदगी के लिए जरूरी हैं।

सही न्यूट्रिशन के बिना उम्र बढ़ने का असर जल्दी दिखने लगता है।


अगर यह जानकारी आपके काम आई हो, तो इसे अपने परिवार और दोस्तों के साथ ज़रूर शेयर करें।

और कमेंट में बताइए — आपको इनमें से कौन-सा न्यूट्रिएंट सबसे ज्यादा सरप्राइज़िंग लगा?


मिर्च हैं औषधी का रूप

 ये मिर्च हैं औषधी का रूप,किस बीमारी में कौनसी मिर्च करती है दवाई का काम,जाने संपूर्ण विधि...


🌶️ मिर्च और उनके औषधीय उपयोग

1. हरी मिर्च

लाभकारी रोग

पाचन कमजोर होना

भूख न लगना

विटामिन C की कमी

सर्दी-जुकाम

कैसे काम करती है – पाचन रस बढ़ाती है, रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाती है


2. लाल मिर्च (सूखी)

लाभकारी रोग

जोड़ो का दर्द

रक्त संचार की कमी

मोटापा

जुकाम में नाक बंद होना

कैसे काम करती है – शरीर को गर्म करती है, रक्त प्रवाह तेज करती है


3. काली मिर्च

लाभकारी रोग

खांसी, कफ, दमा

गला खराब

अपच

सर्दी

कैसे काम करती है – कफ नाशक, अग्नि प्रदीपक


4. सफेद मिर्च

लाभकारी रोग

कमजोर पाचन

गैस, अपच

थकान

कैसे काम करती है – पेट को हल्का व साफ रखती है


5. हरी गोल मिर्च (पेपरकॉर्न)

लाभकारी रोग

एसिडिटी

पेट दर्द

कब्ज

कैसे काम करती है – पाचन सुधारे, गैस कम करे


6. कश्मीरी मिर्च

लाभकारी रोग

हृदय कमजोरी

उच्च रक्तचाप

रक्त शुद्धि

कैसे काम करती है – हल्की गर्म, रक्त को साफ करती है


7. भूत जोलोकिया (तीखी मिर्च)

लाभकारी रोग

साइनस

नाक बंद

माइग्रेन

सूजन

कैसे काम करती है – तीव्र गर्म तासीर से जमी हुई कफ को तोड़ती है

⚠️ बहुत कम मात्रा में उपयोग करें


8. शिमला मिर्च

लाभकारी रोग

एनीमिया

त्वचा रोग

आंखों की कमजोरी

कैसे काम करती है – विटामिन A, C से भरपूर


9. तीखी हरी देसी मिर्च

लाभकारी रोग

भूख की कमी

मोटापा

आलस्य

कैसे काम करती है – मेटाबॉलिज्म तेज करती है


10. सूखी देसी मिर्च (बीज रहित)

लाभकारी रोग

सर्दी में ठंड लगना

कमजोर रक्त संचार

कैसे काम करती है – शरीर में गर्मी बढ़ाती है


 सावधानी

अल्सर, पित्त, बवासीर, गर्भावस्था में अधिक मिर्च न लें

हमेशा मात्रा अनुसार ही उपयोग करें।


Tuesday, January 27, 2026

Most important tips for health

#कितने प्रकार की रोटियां #कैसे और कब किस रोटी का आहार ले जानिए बीमारी अनुसार...
1️⃣ मधुमेह (डायबिटीज)
खाएँ: ज्वार, बाजरा, जौ, रागी की रोटी
लाभ: कम ग्लाइसेमिक इंडेक्स, शुगर धीरे बढ़ती है
बचें: मैदा व बहुत मुलायम गेहूं की रोटी

2️⃣ मोटापा
खाएँ: जौ, ज्वार, बाजरा, ओट्स की रोटी
लाभ: अधिक फाइबर, देर तक पेट भरा रहता है
बचें: मैदा, घी-मक्खन लगी रोटियाँ

3️⃣ कब्ज
खाएँ: गेहूं (चोकर सहित), ज्वार, बाजरा की रोटी
लाभ: आँतों की गति सुधरती है
साथ में: पर्याप्त पानी

4️⃣ हृदय रोग
खाएँ: ज्वार, जौ, ओट्स, रागी की रोटी
लाभ: कोलेस्ट्रॉल घटाने में सहायक
बचें: रिफाइंड आटा

5️⃣ उच्च रक्तचाप
खाएँ: ज्वार, बाजरा, रागी की रोटी
लाभ: पोटैशियम व फाइबर से रक्तचाप संतुलन
बचें: बहुत नमक वाली रोटियाँ

6️⃣ एनीमिया (खून की कमी)
खाएँ: बाजरा, रागी, चना आटा की रोटी
लाभ: आयरन की अच्छी मात्रा
साथ में: विटामिन-C युक्त भोजन

7️⃣ थायरॉइड
खाएँ: ज्वार, बाजरा, रागी की रोटी
लाभ: पोषक तत्व संतुलित
बचें: अत्यधिक मैदा

8️⃣ कमजोरी व कुपोषण
खाएँ: गेहूं, चना आटा मिश्रित रोटी
लाभ: प्रोटीन व ऊर्जा में वृद्धि

9️⃣ पेट की गैस/अम्लता
खाएँ: जौ, रागी की हल्की रोटी
बचें: बहुत मोटी व अधपकी रोटियाँ

🔟 बच्चों व वृद्धों के लिए
खाएँ: नरम गेहूं या जौ की रोटी
लाभ: पचने में आसान

#जादुई है अश्वगंधा का सेवन करना #कई बीमारियों का इलाज छुपा है इसमें #जाने कैसे करे बीमारी अनुसार सेवन संपूर्ण विवरण......

1️⃣ कमजोरी व थकान
मात्रा: ½ चम्मच
तरीका: गुनगुने दूध के साथ
समय: रात को
लाभ: शरीर में बल व ऊर्जा बढ़ाता है

2️⃣ तनाव, चिंता व अवसाद
मात्रा: ½ चम्मच
तरीका: गुनगुने पानी या दूध के साथ
समय: सुबह खाली पेट या रात को
लाभ: मानसिक शांति, बेहतर नींद

3️⃣ अनिद्रा (नींद न आना)
मात्रा: ½ चम्मच
तरीका: दूध + थोड़ा शहद
समय: सोने से पहले
लाभ: गहरी व शांत नींद

4️⃣ पुरुषों में कमजोरी व बांझपन
मात्रा: 1 चम्मच
तरीका: दूध + मिश्री
समय: रात को
लाभ: वीर्य की गुणवत्ता व शक्ति में वृद्धि

5️⃣ महिलाओं में हार्मोन असंतुलन
मात्रा: ½ चम्मच
तरीका: गुनगुना दूध
समय: रात को
लाभ: हार्मोन संतुलन, थकान में राहत

6️⃣ गठिया व जोड़ों का दर्द
मात्रा: ½ चम्मच
तरीका: गुनगुने दूध के साथ
समय: रात को
लाभ: सूजन व दर्द में कमी

7️⃣ मधुमेह (शुगर)
मात्रा: ¼–½ चम्मच
तरीका: गुनगुना पानी
समय: सुबह खाली पेट
लाभ: शुगर नियंत्रण में सहायक

8️⃣ उच्च रक्तचाप (ब्लड प्रेशर)
मात्रा: ¼ चम्मच
तरीका: गुनगुना पानी
समय: सुबह
लाभ: तनाव कम कर BP संतुलन में मदद

9️⃣ रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम होना
मात्रा: ½ चम्मच
तरीका: दूध या काढ़ा
समय: सुबह
लाभ: इम्यूनिटी मजबूत करता है

🔟 थायरॉयड
मात्रा: ¼ चम्मच
तरीका: गुनगुना पानी
समय: सुबह


औषधीय चटनियां जो करती हैं कई बीमारियों से हमारी रक्षा

 स्वास्थ्यवर्धक औषधीय चटनियां जो करती हैं कई बीमारियों से हमारी रक्षा,कैसे बनाए चटनी एवं किस बीमारी में कौनसी है लाभकारी जाने डिटेल...

1️⃣ हरी धनिया चटनी

विधि:

हरा धनिया, हरी मिर्च, अदरक, नींबू रस, थोड़ा नमक पीस लें।

लाभकारी:

👉 पाचन कमजोरी, गैस, भूख न लगना

2️⃣ पुदीना चटनी

विधि:

पुदीना पत्ते, धनिया, भुना जीरा, नींबू रस पीसें।

लाभकारी:

👉 एसिडिटी, मुंह की दुर्गंध, पेट की जलन

3️⃣ लहसुन की चटनी

विधि:

लहसुन, सूखी लाल मिर्च, नमक, थोड़ा सरसों तेल पीसें।

लाभकारी:

👉 उच्च रक्तचाप, हृदय रोग, कोलेस्ट्रॉल

4️⃣ आंवला चटनी

विधि:

कद्दूकस आंवला, धनिया, जीरा, थोड़ा गुड़ मिलाकर पीसें।

लाभकारी:

👉 रोग प्रतिरोधक क्षमता, बाल झड़ना, कमजोरी

5️⃣ अलसी (तीसी) चटनी

विधि:

भुनी अलसी, लहसुन, हरी मिर्च पीसें।

लाभकारी:

👉 कब्ज, जोड़ों का दर्द, मोटापा

6️⃣ अदरक चटनी

विधि:

अदरक, नींबू रस, शहद, नमक पीसें।

लाभकारी:

👉 सर्दी-खांसी, गले में खराश, अपच

7️⃣ करी पत्ता चटनी

विधि:

करी पत्ता, नारियल, हरी मिर्च, राई पीसें।

लाभकारी:

👉 मधुमेह, बालों की कमजोरी, एनीमिया

8️⃣ नीम पत्ती चटनी

विधि:

कोमल नीम पत्ते, धनिया, नींबू रस पीसें।

लाभकारी:

👉 त्वचा रोग, रक्त शुद्धि, कील-मुंहासे

9️⃣ सहजन पत्ती चटनी

विधि:

सहजन पत्ते, लहसुन, नींबू रस पीसें।

लाभकारी:

👉 कमजोरी, सूजन, मधुमेह

🔟 तिल की चटनी

विधि:

भुने तिल, लहसुन, सूखी मिर्च पीसें।

लाभकारी:

👉 हड्डियों की कमजोरी, ठंड में जोड़ों का दर्द

1️⃣1️⃣ प्याज की चटनी

विधि:

प्याज, लहसुन, सूखी लाल मिर्च, नमक भूनकर पीसें।

लाभकारी:

👉 मधुमेह, कमजोरी, रक्त संचार

1️⃣2️⃣ टमाटर–लहसुन चटनी

विधि:

टमाटर, लहसुन, लाल मिर्च भूनकर पीसें।

लाभकारी:

👉 हृदय रोग, उच्च रक्तचाप

1️⃣3️⃣ तोरई के छिलके की चटनी

विधि:

धुले छिलके, लहसुन, हरी मिर्च पीसें।

लाभकारी:

👉 कब्ज, लीवर की कमजोरी

1️⃣4️⃣ केले के छिलके की चटनी

विधि:

उबले केले के छिलके, नारियल, जीरा पीसें।

लाभकारी:

👉 पेट के घाव, अल्सर, कब्ज

1️⃣5️⃣ कद्दू के छिलके की चटनी

विधि:

छिलके, लहसुन, हरी मिर्च भूनकर पीसें।

लाभकारी:

👉 वजन घटाने, पेट की सफाई

1️⃣6️⃣ इमली की चटनी

विधि:

इमली, गुड़, सौंफ, सोंठ उबालकर पीसें।

लाभकारी:

👉 अपच, भूख की कम


घर पर बनाए ये हेल्थी स्ट्रीट फूड

 घर पर बनाए ये हेल्थी स्ट्रीट फूड,स्वाद भी सेहत भी, देखें बनाने की संपूर्ण विधि...

1️⃣ अंकुरित मूंग चाट

विधि:

अंकुरित मूंग उबालें → प्याज़, टमाटर, हरा धनिया, नींबू रस, काला नमक मिलाएँ → हल्का चाट मसाला डालकर परोसें।

2️⃣ सब्ज़ी पोहा

विधि:

पोहा धोकर रखें → कढ़ाही में थोड़ा तेल, राई, करी पत्ता → सब्ज़ियाँ डालें → पोहा, हल्दी, नमक मिलाकर भाप में पकाएँ → नींबू डालें।

3️⃣ इडली–सांभर

विधि:

इडली बैटर को साँचे में भाप दें।

सांभर हेतु दाल उबालें → सब्ज़ी, इमली, सांभर मसाला डालकर उबालें।

4️⃣ मूंग दाल चीला

विधि:

भीगी मूंग दाल पीसें → अदरक, जीरा, नमक मिलाएँ → तवे पर पतला फैलाकर कम तेल में सेंकें।

5️⃣ स्टीम वेज मोमोज

विधि:

मैदे/गेहूँ आटे की लोई बनाएँ → सब्ज़ी भरें → मोमोज आकार देकर भाप में पकाएँ।

6️⃣ उबला भुट्टा

विधि:

मकई उबालें → नींबू, नमक, मिर्च छिड़कें।

7️⃣ कॉर्न चाट

विधि:

उबली मकई → प्याज़, टमाटर, शिमला मिर्च → नींबू, चाट मसाला मिलाएँ।

8️⃣ सब्ज़ी उत्तपम

विधि:

डोसा बैटर तवे पर डालें → ऊपर कटी सब्ज़ियाँ डालें → ढककर धीमी आँच पर पकाएँ।

9️⃣ पनीर टिक्का

विधि:

पनीर को दही, हल्दी, मिर्च, नमक में मेरिनेट करें → तवे/ग्रिल पर सेकें।

🔟 सादा डोसा

विधि:

फर्मेंटेड बैटर तवे पर फैलाएँ → कुरकुरा होने तक सेंकें।

11️⃣ ब्राउन ब्रेड वेज सैंडविच

विधि:

ब्रेड पर हरी चटनी → सब्ज़ियाँ रखें → ग्रिल/तवे पर हल्का सेंकें।

12️⃣ हेल्दी भेल

विधि:

मुरमुरा, उबला चना → प्याज़, टमाटर → इमली/हरी चटनी कम मात्रा में मिलाएँ।

13️⃣ वेज कटलेट

विधि:

उबली सब्ज़ियाँ मैश करें → मसाले मिलाएँ → टिक्की बनाकर शैलो फ्राय करें।

14️⃣ वेज फ्रैंकी

विधि:

गेहूँ रोटी सेंकें → सब्ज़ी भरें → लपेटकर परोसें।

15️⃣ चना चाट

विधि:

उबला काला चना → प्याज़, टमाटर → नींबू, काला नमक मिलाएँ।

16️⃣ ओट्स टिक्की

विधि:

ओट्स भिगोकर सब्ज़ियों संग मिलाएँ → टिक्की बनाकर तवे पर सेंकें।

17️⃣ वेज उपमा

विधि:

सूजी भूनें → सब्ज़ियाँ व पानी डालें → ढककर पकाएँ।

18️⃣ ढोकला

विधि:

बेसन में दही, ईनो मिलाएँ → भाप में पकाएँ → राई-हरी मिर्च का तड़का दें।

19️⃣ रागी डोसा

विधि:

रागी बैटर तवे पर फैलाएँ → कुरकुरा सेंकें।

20️⃣ वेज सूप

विधि:

सब्ज़ियाँ उबालें → काली मिर्च, नमक डालें → हल्का गाढ़ा कर परोसें।


सलाद के प्रकार और उनके लाभ

 हेल्थी सलाद खाए बीमारी दूर भगाए,जानिए किस बीमारी में कौनसी सलाद खानी चाहिए...


🥗 सलाद के प्रकार और उनके लाभ

1️⃣ हरा सलाद (खीरा, टमाटर, पत्ता गोभी, गाजर)

किसके लिए:

✔ वजन घटाने वाले

✔ कब्ज वाले

✔ त्वचा सुधार के लिए


2️⃣ फल सलाद (सेब, पपीता, अनार, केला, संतरा)

किसके लिए:

✔ कमजोरी में

✔ बच्चों और बुजुर्गों के लिए

✔ रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने हेतु


3️⃣ अंकुरित सलाद (अंकुरित मूंग, चना, मसूर)

किसके लिए:

✔ मधुमेह रोगी

✔ प्रोटीन की कमी

✔ जिम/योग करने वाले


4️⃣ चुकंदर सलाद

किसके लिए:

✔ खून की कमी

✔ निम्न रक्तचाप

✔ गर्भवती महिलाएँ


5️⃣ गाजर सलाद

किसके लिए:

✔ आँखों की कमजोरी

✔ त्वचा व बालों के लिए

✔ पाचन सुधार हेतु


6️⃣ खीरा सलाद

किसके लिए:

✔ गर्मी में

✔ पेशाब की जलन

✔ शरीर की गर्मी शांत करने के लिए


7️⃣ पत्ता गोभी सलाद

किसके लिए:

✔ गैस व एसिडिटी

✔ पेट की सफाई

✔ वजन कम करने में सहायक


8️⃣ टमाटर सलाद

किसके लिए:

✔ हृदय रोगी

✔ उच्च रक्तचाप

✔ त्वचा निखार के लिए


9️⃣ अंकुरित + सब्ज़ी सलाद

किसके लिए:

✔ कमजोरी

✔ थकान

✔ लंबे समय तक ऊर्जा के लिए


🔟 दही सलाद (रायता)

किसके लिए:

✔ पेट की जलन

✔ मसालेदार भोजन के बाद

✔ पाचन सुधार हेतु


⚠️ जरूरी सलाह

❌ रात में ज्यादा कच्चा सलाद न खाएँ

✔ सुबह या दोपहर सबसे अच्छा समय

✔ हमेशा ताज़ा सलाद ही खाएँ