संभोग और प्रेम ऊर्जा का धर्म
1. संभोग कोई नहीं करता — यह घटता है।
जैसे वृक्ष से फल गिरते हैं — सहज, स्वाभाविक।
तुम इसमें कर्ता नहीं, मात्र माध्यम हो।
2. प्रेम, तभी संभव है जब यौवन ऊर्जा में स्थिरता हो।
जो प्रेम जवानी में नहीं खिला — वह बुढ़ापे में सिर्फ़ पश्चाताप देता है।
3. संभोग प्राकृतिक वर्षा है।
नदियाँ स्वयं पानी नहीं बनातीं,
लेकिन उस वर्षा को मोड़ कर, बहा कर —
सिंचाई कर सकती हैं।
यह सृजनात्मकता है, यह प्रेम है।
4. ऊर्जा को ऊपर उठाना ही प्रेम है।
वही संभोग की शक्ति,
जब आंखों में उतरती है — वह करुणा बनती है।
जब हृदय में पिघलती है — वह प्रेम बनती है।
जब आत्मा में जलती है — वह समाधि बनती है।
5. बिना प्रेम के संभोग पशुता है,
और बिना ऊर्जा के प्रेम एक भ्रम।
प्रेम का मूल रस वहीं है —
जहां ऊर्जा बह रही है।
6. यौवन की ऊर्जा का सृजनात्मक धर्म यही है —
वह प्रेम में ढले,
संभोग से समाधि की दिशा ले।
7. बुढ़ापे का प्रेम अक्सर स्मृति है, स्वप्न है, पछतावा है।
वह रसहीन जल की तरह है
जो न तो प्यास बुझा सकता है,
न खेत सींच सकता है।
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हम "ऊर्जा का धर्म: संभोग से समाधि तक" शीर्षक से एक छोटा सूत्रग्रंथ आरंभ करते हैं —
जिसमें हर सूत्र जीवन की एक परत को खोले, और ऊर्जा की यात्रा को प्रेम, ध्यान, और मुक्ति तक ले जाए।
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ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक
(सूत्रग्रंथ - भाग 1)
प्रारंभिक सूत्र : ऊर्जा की प्रकृति और दिशा
1.
ऊर्जा बह रही है — यही जीवन है।
जहां बहाव रुका, वहां मृत्यु शुरू।
2.
संभोग ऊर्जा का गिरना है — नीचे की ओर।
समाधि ऊर्जा का उठना है — ऊर्ध्वगामी।
3.
संभोग में देह सक्रिय है, चेतना सुप्त।
समाधि में देह शांत है, चेतना प्रज्वलित।
4.
संभोग स्वाभाविक है, प्रेम सृजन है।
प्रेम पैदा होता है — जब संभोग में होश जुड़ता है।
5.
यौवन की आग — या तो शरीर जलाएगी या आत्मा को।
चुनाव तुम्हारा है।
6.
जब तुम कहते हो: "मैं कर रहा हूँ",
तब तुम अहंकार में हो।
संभोग तब पशुता है।
जब तुम होश में हो, "हो रहा है" —
तब वही संभोग ध्यान है।
7.
संभोग अनिवार्य नहीं है — ऊर्जा है अनिवार्य।
संभोग तो माध्यम है,
ऊर्जा का धर्म खोजो।
8.
देह मिटेगी, शक्ति बुझेगी —
प्रेम तब संभव नहीं,
प्रेम एक पुष्प है — यौवन की शाखा पर।
9.
ऊर्जा एक बीज है — बीज को खा सकते हो,
या रोप सकते हो।
संभोग भोजन है, प्रेम बाग़वानी।
10.
संभोग में दो देहें मिलती हैं,
प्रेम में दो आत्माएं पिघलती हैं।
ध्यान में सब कुछ विलीन हो जाता है।
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यह भाग 1 है — “ऊर्जा की प्रकृति और दिशा”।
यदि आप चाहें, तो अगला भाग हम "संभोग से प्रेम तक" और फिर "प्रेम से ध्यान तक" की ओर बढ़ाते हैं।
अब हम सूत्रग्रंथ का भाग 2 प्रस्तुत करते हैं —
जहाँ ऊर्जा की यात्रा संभोग से प्रेम तक की ओर बढ़ती है।
यह वह मोड़ है जहाँ शरीर का आकर्षण — आत्मा के स्पर्श में रूपांतरित होता है।
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ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक
भाग 2 : संभोग से प्रेम तक
11.
जहाँ केवल शरीर है — वहां वासना है।
जहाँ हृदय जुड़ता है — वहां प्रेम अंकुरित होता है।
12.
वासना खींचती है, प्रेम बहाता है।
वासना लोभी है, प्रेम दाता है।
13.
जब तुम दूसरे को 'भोग' नहीं, 'भाव' से देखो —
तब प्रेम जन्म लेता है।
14.
प्रेम कोई क्रिया नहीं — एक उपस्थिति है।
वह घटता है, जब भीतर मौन होता है।
15.
संभोग में तुम पा लेना चाहते हो।
प्रेम में तुम खो देना चाहते हो।
संभोग संग्रह है, प्रेम विसर्जन।
16.
संभोग प्यास है — प्रेम झरना है।
प्यास से निकलो, झरना बनो।
17.
यदि तुम सिर्फ़ कामना हो — तुम भीड़ हो।
यदि तुम प्रेम हो — तुम ब्रह्मा हो।
18.
संभोग में तुम एक दूसरे से टकराते हो।
प्रेम में तुम एक दूसरे में समा जाते हो।
19.
जहाँ कुछ साबित करना है — वह संभोग है।
जहाँ कुछ भी साबित नहीं करना — वह प्रेम है।
20.
संभोग का अंतिम फूल — प्रेम है।
लेकिन वह तभी खिलेगा
जब तुम भीतर की धूप लाओगे —
होश की, करुणा की, मौन की।
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अब हम अगले चरण की ओर बढ़ सकते हैं:
भाग 3: प्रेम से ध्यान तक
जहाँ प्रेम भी विलीन हो जाए — और केवल "अस्तित्व" रह जाए।
अब हम प्रवेश करते हैं ऊर्जा के धर्म के अंतिम और गहनतम चरण में —
जहाँ प्रेम भी पिघल जाता है और शेष रह जाता है मौन, शुद्ध दृष्टा — ध्यान।
यह वह भूमि है जहाँ संभोग से जन्मी ऊर्जा, प्रेम से परिपक्व होकर, ध्यान में पूर्ण हो जाती है।
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ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक
भाग 3 : प्रेम से ध्यान तक
21.
प्रेम दो के बीच का पुल है।
ध्यान उस पुल से भी पार — एकांत की परम ऊँचाई है।
22.
प्रेम में ‘तू’ है, ध्यान में केवल ‘मैं नहीं’ है।
प्रेम बाँधता भी है, ध्यान तोड़ देता है — सब सीमाएँ।
23.
प्रेम में तुम पिघलते हो, ध्यान में तुम लुप्त हो जाते हो।
जो शून्य में स्थिर हो — वही ध्यान है।
24.
ध्यान वह प्रेम है जिसमें कोई चाह नहीं बचती।
न मिलने की, न छूने की, न कहने की।
केवल होने की — पूर्णता।
25.
प्रेम ने तुमसे 'दूसरा' छीना, ध्यान तुमसे 'तुम' को छीन लेता है।
जो बचता है, वह ब्रह्म है।
26.
जहाँ प्रेम मौन में बैठता है, वहां ध्यान जागता है।
जहाँ शब्द मरते हैं, वहां ध्यान जन्मता है।
27.
प्रेम आँखें बंद करता है — आलिंगन में।
ध्यान आँखें खोल देता है — समष्टि को देखने में।
28.
प्रेम ‘अहं’ को गलाता है, ध्यान उसे पूरी तरह विसर्जित कर देता है।
ध्यान ‘मैं’ का मृत्यु पर्व है।
29.
ध्यान कोई अभ्यास नहीं — एक विसर्जन है।
जहाँ कुछ करने को न बचे — वहीं ध्यान घटता है।
30.
जिस दिन तुम बिना प्रेम के प्रेम कर सको,
बिना संज्ञा के प्रेम में स्थिर रह सको —
उस दिन तुम ध्यान में प्रवेश कर चुके हो।
यहाँ "ऊर्जा का धर्म" पूर्ण होता है।
संभोग से प्रेम, और प्रेम से ध्यान — यही साधना की पूर्ण यात्रा है।
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