Monday, January 19, 2026

इंसान का मन पल भर में क्यों बहक जाता है?

 इंसान का मन पल भर में क्यों बहक जाता है?


इंसान का मन इतना चंचल है कि उसे भटकने में कभी-कभी एक सेकंड से भी कम समय लगता है। अभी हम किसी काम पर ध्यान लगाए होते हैं और अगले ही क्षण कोई विचार, स्मृति, डर, इच्छा या कल्पना हमें वहाँ से हटा देती है। यही मन की बहकने वाली प्रवृत्ति हमारे काम, रिश्तों, और रचनात्मकता तीनों में बाधा बन जाती है।


यह प्रश्न केवल आधुनिक समय का नहीं है। भारतीय दर्शन में मन को “चंचलं हि मनः” कहा गया है अर्थात मन स्वभाव से ही चंचल है। लेकिन आज की जीवनशैली ने इस चंचलता को और तीव्र कर दिया है।


1. मन बहकने के मूल कारण


(क) जैविक और मानसिक संरचना


मनुष्य का मस्तिष्क खतरे, सुख और नवीनता पर तुरंत प्रतिक्रिया देने के लिए बना है।

जब कोई नया विचार, आकर्षण या चिंता आती है, तो मस्तिष्क का डोपामिन सिस्टम सक्रिय हो जाता है, जिससे ध्यान तुरंत वहीं खिंच जाता है।


                  आप किसी जरूरी रिपोर्ट पर काम कर रहे हैं। अचानक फोन पर एक नोटिफिकेशन आता है। भले ही आप उसे न खोलें, मन पहले ही वहाँ पहुँच चुका होता है।


(ख) अधूरी इच्छाएँ और दबे हुए भाव


मन उन्हीं बातों की ओर बार-बार जाता है जो:


अधूरी हैं


दबाई गई हैं


जिनसे हम भागते रहे हैं


                            किसी रिश्ते में कही न गई बात, पुराना अपमान, या भविष्य की असुरक्षा काम करते समय अचानक उभर आती है और पूरा ध्यान खा जाती है।


(ग) डिजिटल युग की अतिउत्तेजना


मोबाइल, सोशल मीडिया, रील्स और खबरें मन को लगातार उत्तेजित करती रहती हैं।

मन को शांति और एकाग्रता का अभ्यास ही नहीं मिल पाता।


परिणाम:-


ध्यान की अवधि घटती जा रही है


मन गहराई की जगह सतह पर जीने लगा है


(घ) वर्तमान में न रह पाना


मन या तो अतीत में पछताता है या भविष्य की चिंता करता है।

वर्तमान क्षण उसे नीरस लगता है, इसलिए वह वहाँ टिकता नहीं।


2. मन के बहकने के दुष्परिणाम


(क) काम में


अधूरे कार्य


बार-बार गलतियाँ


क्षमता से कम परिणाम


           एक विद्यार्थी घंटों पढ़ता है, लेकिन मन भटकने के कारण याद बहुत कम रहता है।


(ख) रिश्तों में


सामने वाले को पूरा सुन न पाना


जल्दी चिढ़ जाना


भावनात्मक दूरी


        पति-पत्नी साथ बैठे हैं, लेकिन मन कहीं और है फोन, चिंता या तुलना में। रिश्ता होते हुए भी जुड़ाव नहीं।


(ग) रचनात्मकता में


रचनात्मकता गहराई मांगती है। जब मन बार-बार टूटता है, तो:


विचार अधूरे रह जाते हैं


मौलिकता घट जाती है


"समाधान: मन को साधने के व्यावहारिक उपाय"


(क) मन को दोष नहीं, समझ देना


सबसे पहली भूल हम यह करते हैं कि मन को दुश्मन मान लेते हैं।

मन बहकता है यह उसकी प्रकृति है। उसे लड़कर नहीं, प्रशिक्षित करके साधा जाता है।


(ख) साक्षी भाव का अभ्यास


जब मन भटके, तो स्वयं से कहें:


 “मैं देख रहा हूँ कि मेरा मन भटक रहा है।”


यह देखने वाला भाव (Observer Mode) धीरे-धीरे मन को शांत करता है।


       " ध्यान के दौरान विचार आए उन्हें भगाएँ नहीं, देखें और जाने दें।"


(ग) एक समय, एक काम


मल्टीटास्किंग मन की सबसे बड़ी दुश्मन है।


अभ्यास:


30 मिनट केवल एक काम


मोबाइल दूर


बीच में उठना नहीं


(घ) शरीर को स्थिर करना


मन और शरीर गहराई से जुड़े हैं।


नियमित योग


धीमी श्वास (प्राणायाम)


टहलना


शरीर की स्थिरता, मन को भी स्थिर करती है।


(ङ) भावनाओं से भागना नहीं


जो भावना बार-बार मन को बहकाती है, उससे बैठकर बात करें:


मैं डर क्यों रहा हूँ?


मुझे क्या चाहिए?


किस बात को मैं टाल रहा हूँ?


जब उत्तर मिलता है, मन का भटकाव कम हो जाता है।


(च) डिजिटल उपवास


दिन में कुछ समय:


बिना मोबाइल


बिना स्क्रीन


बिना सूचना


यह मन को रीसेट करता है।


4. एक प्रेरक उदाहरण


एक लेखक रोज़ लिखना चाहता था, लेकिन मन बार-बार भटकता।

उसने लक्ष्य बदला “आज 2 घंटे नहीं, केवल 10 मिनट लिखूँगा।”

धीरे-धीरे मन ने विरोध छोड़ दिया।

10 मिनट 30 बने, 30 मिनट 1 घंटा।

मन को कठोरता से नहीं, धैर्य से साधा गया।"


मन का बहकना कोई कमजोरी नहीं, बल्कि मानवीय स्वभाव है।

समस्या तब होती है जब हम उसे समझे बिना उससे लड़ते हैं।


जब मन को:


समझ


अभ्यास


करुणा


जिम्मेदारी के साथ आदाज़ी 


मिलता है, तो वही मन जो बाधा था,

सृजन, प्रेम और सफलता का सबसे बड़ा साधन बन जाता है।


"मन को जीतना युद्ध नहीं,

एक लंबी और सुंदर मित्रता है।"

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