Sunday, January 11, 2026

रिश्ते चलते हैं भरोसे से

जब भरोसे की डोर धीरे-धीरे कटने लगती है


रिश्ते सिर्फ साथ रहने से नहीं चलते,

रिश्ते चलते हैं भरोसे से।


पति-पत्नी के रिश्ते में यह भरोसा सबसे कीमती होता है,

क्योंकि यहाँ इंसान अपना वह चेहरा दिखाता है

जो वह दुनिया से छुपाता है।


पुरुष की दुनिया बाहर से मजबूत दिखती है


लेकिन भीतर से वह भी उतना ही संवेदनशील होता है।


एक पुरुष दिन भर बाहर की दुनिया में लड़ता है

काम का दबाव, जिम्मेदारियों का बोझ,

कभी असफलता का डर,

कभी भविष्य की चिंता।


वह सब किसी को नहीं बताता।

क्योंकि उसे सिखाया गया है

“मर्द रोते नहीं”,

“कमज़ोरी मत दिखाओ।”


लेकिन जब वह घर लौटता है,

तो वह मर्द नहीं रहना चाहता

वह सिर्फ एक इंसान बनना चाहता है।


और उस इंसान को सबसे सुरक्षित जगह लगती है

अपनी पत्नी के पास।


वह सोचता है

“यह वही इंसान है जो मुझे जज नहीं करेगा,

जो मेरी बात को बाहर नहीं ले जाएगा,

जो मेरी कमजोरी को मेरी ताकत समझेगा।”


इसलिए वह अपनी असफलताएँ, डर, गुस्सा,

यहाँ तक कि अपने अधूरे सपने भी

सबसे पहले अपनी पत्नी से साझा करता है।


लेकिन स्त्री की भी अपनी दुनिया होती है


स्त्री अक्सर यह नहीं समझ पाती

कि जो बात उसके लिए साधारण बातचीत है,

वही बात पुरुष के लिए उसकी आत्मा का रहस्य हो सकती है।


वह कभी-कभी सोचती है

“मैंने तो यूँ ही मम्मी से कह दिया।”

“बस सहेली से शेयर किया था।”

“थोड़ा मज़ाक ही तो था।”


उसका इरादा बुरा नहीं होता।

वह दर्द देना नहीं चाहती।


लेकिन समस्या इरादे की नहीं,

असर की होती है।


जब पुरुष को पता चलता है

कि उसकी कही हुई बात

अब किसी और की जुबान पर है

तो उसके भीतर कुछ टूट जाता है।


वह सोचता है

“अगर मेरी सबसे निजी बात भी सुरक्षित नहीं,

तो मैं फिर किस पर भरोसा करूँ?”


यहीं से रिश्ते में चुप्पी जन्म लेती है


वह लड़ता नहीं।

शिकायत भी नहीं करता।


वह बस चुप हो जाता है।


अब वह कहता है

“कुछ खास नहीं।”

“सब ठीक है।”

“थक गया हूँ।”


लेकिन सच यह होता है

उसने अपने दिल का दरवाज़ा

धीरे से बंद कर लिया होता है।


स्त्री को लगता है

“वह बदल गया है।”

“अब पहले जैसा नहीं रहा।”


और पुरुष सोचता है

“अब बोलने का कोई मतलब नहीं।”


यहीं से रिश्ता

प्यार से उतरकर

सिर्फ जिम्मेदारी बन जाता है।


इस कहानी में कोई एक दोषी नहीं होता


यह लेख किसी स्त्री को दोषी ठहराने के लिए नहीं है,

और न ही पुरुष को पीड़ित साबित करने के लिए।


यह सिर्फ याद दिलाने के लिए है कि


भरोसा काँच की तरह होता है

एक बार टूट जाए, तो जुड़ तो जाता है

लेकिन दरार रह ही जाती है।


हर बात साझा करने की नहीं होती

कुछ बातें सिर्फ संभाल कर रखने के लिए होती हैं।


पति हो या पत्नी दोनों पहले इंसान हैं।


एक छोटा सा आत्म-मंथन


स्त्री खुद से पूछे

क्या मेरे पति आज भी मुझसे दिल की बात कहते हैं?

या मैंने अनजाने में उनकी चुप्पी की वजह बन गई?


पुरुष खुद से पूछे

क्या मैं अपनी पीड़ा को शब्दों में कह पा रहा हूँ?

या मैं सिर्फ सहता जा रहा हूँ?


क्योंकि रिश्ता तभी बचता है

जब बोलने वाले को सुरक्षा मिले

और सुनने वाला उसे संभाल सके।

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