Friday, January 30, 2026

प्रेम और मोह

 पाठ 1


प्रेम और मोह ...

आखिर क्या है यह प्रेम..

और क्या है यह मोह...? 

कितने लोग इसके बीच का फर्क समझते हैं ??


'प्रेम' और 'मोह' यह दो ऐसे शब्द है 

जिनके बीच जमीन और आसमान का फर्क है ..!


अर्थात - प्रेम वह जिसमें पाने की कोई चाह नहीं होती... और मोह वह जो पाने के लिए विवश कर दे ...

जब व्यक्ति किसी इंसान से या किसी भी वस्तु से प्रेम करता है तो उसे पाने के लिए 

न जाने वह क्या-क्या करता है ..

पर असल में वह व्यक्ति की चाहत बन जाती है ....

और चाहत कब मोह का रूप ले लेती है ..

यह व्यक्ति समझ ही नहीं पाता 

और उस पाने की चाह को ही प्रेम समझ बैठता है.. 

किंतु जब हम किसी से सच में प्रेम करते हैं 

तो हम बस उसको खुश देखना चाहते हैं 

उसकी खुशी में ही स्वयं की खुशी ढूंढ लेते हैं..!


मनुष्य की सबसे प्रिय चीज होती है उसकी " स्वतंत्रता "


जब हम किसी व्यक्ति को जिससे हम कहते हैं 

कि हम बहुत प्रेम करते हैं 

उसको बांधने की कोशिश करते हैं ...

उसको समझते नहीं ..

उसको उसकी जिंदगी अपने हिसाब से 

नहीं जीने देते ..

उससे बहुत सी उम्मीदें करते हैं 


परंतु क्या यह सच में प्रेम है ...?


जिससे आप प्यार करते हो उसको पाना ..

अपना बनाना या खुद से बांध कर रखना 

क्या यह प्रेम है ..? 


नहीं असल में यह मोह है ...

इंसान मोह को प्रेम का नाम दे देता है 

क्योंकि जब आप किसी से सच्चा प्यार करते हैं 

तो उसको आजाद छोड़ देते हैं 

क्योंकि आपको उस पर भरोसा होता है 

कि वह व्यक्ति विशेष चाहे कुछ भी करें परंतु 

वह रहेगा आपका ही होकर हमेशा ...


विश्वास एक ऐसी डोर होती है ..

जो किसी भी रिश्ते के लिए बहुत जरूरी होती है ....

यदि आपको अपने रिश्ते पर भरोसा नहीं होगा तो 

रिश्ता कामयाब नहीं होगा..

अतः यदि प्रेम है तो भरोसा भी करना पड़ेगा 

तभी रिश्ते की डोर मजबूत बनेगी ...!


हम स्वयं क्यों नहीं यह बात आजमा कर देखते .. 

जब वह व्यक्ति जिसे आप प्रेम करते हो 

वह जरूरत से ज्यादा आप को बांधकर रखें 

हमेशा अपनी इच्छाओं का पालन करवाएं 

बजाए आपकी इच्छाओं को महत्व देने के 

और आपसे प्रत्येक क्षण पर सवाल करें 

और उस मोह को प्रेम का नाम दें 

तो कैसा महसूस होता है ..?


बहुत सीधा सा जवाब है 

जाहिर सी बात है हमें पसंद नहीं आता ..क्यों ? 


क्योंकि हमें आजादी की आदत होती है ...

हम सभी को अपनी जिंदगी अपने 

तरह से जीने की आदत होती है 

ठीक उसी प्रकार सामने वाला भी है 

यदि आप उसको सच में प्रेम करते हैं 

तो उसको समझना सीखिए 

उस पर भरोसा करना सीखिए 

जरूरी नहीं आप जिससे प्रेम करो 

उसको अपना बनाओ तभी वह प्रेम है.. 


अतः प्रेम वह है जो निस्वार्थ भाव से किया जाए, 

प्रेम जिससे आप प्यार करो उसकी खुशी ही 

आपके लिए सब कुछ हो वह खुश तो आप खुश...

रिश्ते में मोह होगा तो कभी भी रिश्ता कामयाब नहीं होगा रिश्ता चाहे कोई भी हो 

अगर उसे प्यार के पानी से सिंचा जाएगा 

तभी वह खिलेगा..

मजबूत बनेगा ..

अतः मोह के बंधन में 

बंधा होगा तो टूट जाएगा..!


अतः जिससे आप प्रेम करते हैं, 

उसको स्वतंत्र छोड़ दीजिए 

मोह हट जाएगा तो 

पाठ 2....

प्रेम है मन की मृत्यु...


प्रेम है मन की मृत्यु, 

प्रेम है मन का समाप्त हो 

जाना, 


प्रेम है मन का अपने प्रियतम के मन में विलीन हो जाना...!!!!!


जैसे बिना प्रेम के मन में लहरें उठती हैं, 

कोई हमसे आकर पूछता है कि 

जब मन शांत होता है तो लहरों 

की क्या अवस्था होती है, 

तो हम कहते है


 जब मन प्रेम में अकंठ डुब जाता है 

तो शांत होता है 


वहाँ लहरें होती ही नहीं.....


लहरों की अवस्था का 


सवाल नहीं....


प्रेम बिना मन अशांत होता है तो 


अनगिनत लहरें होती हैं...


असल में लहरें और अशांति 


एक ही चीज के दो नाम हैं...


अशांति नहीं रही तो लहरें भी नहीं रहेंगी, 


रह जायेंगा प्रेम.......


बिना प्रेम मन है अशांति, मन है लहर। 


जब मन प्रेम को समर्पित हो जाता है तो 


लहरें चली जाती है,,


विचार चले जाते है, 


मन भी विलीन हो जाता है और


 रह जाता है प्रेम, रह जाती है आत्मा...!


 मन की जो लहरें हैं वे ही हमें अलग - अलग 


व्यक्ति बना देती हैं....


एक - एक लहर को अगर होश आ जाए


तो वह कहेगी ‘मैं हूं।’ 


और उसे पता भी नहीं होगा कि वह नहीं है, 


वह अशांति है....


यह जो हमें खयाल उठता है 


कि ‘मैं हूं’ यह हमारी एक - एक मन 


की अशांत लहरों का जोड़ है...


 ये लहरें जब प्रेम में


विलीन हो जाएंगी तो 


आप नहीं रहेंगे, मन नहीं रहेगा...


रह जाएगा प्रेम....


रह जाएगा 


एक प्रेम का सागर....


_प्रेम स्वयं ही बढ़ जाएगा ..!


पाठ 3...


_*प्रेम है अनतता*_ 


प्रेम का पहला सबक है: 

प्रेम को मांगो मत, 

सिर्फ दो। 

एक दाता बनो।


प्रेम का अपना आंतरिक आनंद है। 

यह तब होता है जब तुम प्रेम करते हो। 

परिणाम के लिए प्रतीक्षा करने की 

कोई आवश्यकता नहीं है। 

बस प्रेम करना शुरू करो। 

धीरे-धीरे तुम देखोगे कि बहुत ज्यादा प्रेम 

वापस तुम्हारे पास आ रहा है। 

व्यक्ति प्रेम करता है और प्रेम 

करके ही जानता है कि प्रेम क्या है। 

जैसा कि तैराकी तैरने से ही आती है, 

प्रेम प्रेम के द्वारा ही सीखा जाता है।


प्रेम अधिक कठिन है। 

यह किसी और के साथ नाच है। 

दूसरे के लिए भी जानने की 

जरूरत है कि नृत्य क्या है। 

किसी के साथ तालमेल 

बिठाना एक महान कला है। 

दो लोगों के बीच एक सामंजस्य बनाना … 

दो लोगों का मतलब दो अलग दुनियाएं। 

जब दो दुनियाएं करीब आती हैं,

 संघर्ष अनिवार्य है। 

तुम नहीं जानते कि कैसे सामंजस्य बनाना। 

प्रेम समस्वरितता है। और खुशी, स्वास्थ्य, 

समस्वरितता, सब कुछ प्रेम से उपजता है।


प्रेम करना सीखो। समझने की जल्दी मत करो, 

प्रेम करना सीखो। सबसे पहले एक महान 

प्रेमी बन जाओ।


प्रेम एक जुनून नहीं है, प्रेम एक भावना नहीं है। 

प्रेम एक बहुत गहरी समझ है कि कोई और 

किसी तरह तुम्हें पूरा करता है। 

कोई तुमको एक पूरा वर्तुल बनाता है। 

किसी अन्य की उपस्थिति तुम्हारी 

उपस्थिति को बढ़ाती है। 

प्रेम तुम्हें स्वयं होने की स्वतंत्रता देता है, 

यह स्वामित्व नहीं है।


प्रेम अनंतता है। 

यदि वह है, तो यह बढ़ता चला जाता है, 

बढ़ता चला जाता है। प्रेम शुरुआत जानता है, 

लेकिन अंत नहीं जानता......

और जब मेरा भी #प्रिती में मन लग गया तब 

मैं प्रेम की अनतता जान पाया और मेहसूस हुआ

#प्रीति_के_प्रेम_में_जीवन_उत्सव_है.....


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