Thursday, February 5, 2026

गिलोय का इस्तेमाल

गिलोय का इस्तेमाल बुखार, डायबिटीज, पीलिया, गठिया, एसिडिटी, अपच और पेशाब संबंधी समस्याओं को दूर करने के लिए किया जाता है. गिलोय एक ऐसी होती है जो वात, पित्त, कफ तीनों के रोगियों को फायदा पहुंचाती है. शरीर से विषैले और हानिकारक पदार्थ को निकालने में भी गिलोय मदद करता है।

अगर आप गिलोय के पत्तों को जूस के रूप में अपने आहार में शामिल करना चाहते हैं, तो आपको बस इतना करना है कि पौधे को छोटे-छोटे टुकड़ों में काट लें और थोड़े से पानी के साथ पेस्ट बना लें। पेस्ट बन जाने के बाद, इसे हल्दी के साथ एक कड़ाही में डालें और तब तक उबालें जब तक कि यह गाढ़ा जूस न बन जाए। आप इसे हर सुबह पी सकते हैं।


🙏#गिलोय एक ही ऐसी बेल है, जिसे आप सौ मर्ज की एक दवा कह सकते हैं। इसलिए इसे संस्कृत में अमृता नाम दिया गया है। 


कहते हैं कि देवताओं और दानवों के बीच समुद्र मंथन के दौरान जब अमृत निकला और इस अमृत की बूंदें जहां-जहां छलकीं, वहां-वहां गिलोय की उत्पत्ति हुई।


#इसका वानस्पिक नाम( Botanical name) टीनोस्पोरा कॉर्डीफोलिया (tinospora cordifolia है। इसके पत्ते पान के पत्ते जैसे दिखाई देते हैं और जिस पौधे पर यह चढ़ जाती है, उसे मरने नहीं देती। इसके बहुत सारे लाभ आयुर्वेद में बताए गए हैं, जो न केवल आपको सेहतमंद रखते हैं, बल्कि आपकी सुंदरता को भी निखारते हैं। 


#आइए_जानते_हैं_गिलोय_के_फायदे…....


#गिलोय बढ़ाती है रोग प्रतिरोधक क्षमता


गिलोय एक ऐसी बेल है, जो व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ा कर उसे बीमारियों से दूर रखती है। इसमें भरपूर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट्स होते हैं, जो शरीर में से विषैले पदार्थों को बाहर निकालने का काम करते हैं। यह खून को साफ करती है, बैक्टीरिया से लड़ती है। लिवर और किडनी की अच्छी देखभाल भी गिलोय के बहुत सारे कामों में से एक है। ये दोनों ही अंग खून को साफ करने का काम करते हैं।


#ठीक करती है बुखार


अगर किसी को बार-बार बुखार आता है तो उसे गिलोय का सेवन करना चाहिए। गिलोय हर तरह के बुखार से लडऩे में मदद करती है। इसलिए डेंगू के मरीजों को भी गिलोय के सेवन की सलाह दी जाती है। डेंगू के अलावा मलेरिया, स्वाइन फ्लू में आने वाले बुखार से भी गिलोय छुटकारा दिलाती है।


#गिलोय के फायदे – डायबिटीज के रोगियों के लिए


गिलोय एक हाइपोग्लाइसेमिक एजेंट है यानी यह खून में शर्करा की मात्रा को कम करती है। इसलिए इसके सेवन से खून में शर्करा की मात्रा कम हो जाती है, जिसका फायदा टाइप टू डायबिटीज के मरीजों को होता है।


#पाचन शक्ति बढ़ाती है


यह बेल पाचन तंत्र के सारे कामों को भली-भांति संचालित करती है और भोजन के पचने की प्रक्रिया में मदद कती है। इससे व्यक्ति कब्ज और पेट की दूसरी गड़बडिय़ों से बचा रहता है।


#कम करती है स्ट्रेस


गलाकाट प्रतिस्पर्धा के इस दौर में तनाव या स्ट्रेस एक बड़ी समस्या बन चुका है। गिलोय एडप्टोजन की तरह काम करती है और मानसिक तनाव और चिंता (एंजायटी) के स्तर को कम करती है। इसकी मदद से न केवल याददाश्त बेहतर होती है बल्कि मस्तिष्क की कार्यप्रणाली भी दुरूस्त रहती है और एकाग्रता बढ़ती है।


#बढ़ाती है आंखों की रोशनी


गिलोय को पलकों के ऊपर लगाने पर आंखों की रोशनी बढ़ती है। इसके लिए आपको गिलोय पाउडर को पानी में गर्म करना होगा। जब पानी अच्छी तरह से ठंडा हो जाए तो इसे पलकों के ऊपर लगाएं।


#अस्थमा में भी फायदेमंद


मौसम के परिवर्तन पर खासकर सर्दियों में अस्थमा को मरीजों को काफी परेशानी होती है। ऐसे में अस्थमा के मरीजों को नियमित रूप से गिलोय की मोटी डंडी चबानी चाहिए या उसका जूस पीना चाहिए। इससे उन्हें काफी आराम मिलेगा।


#गठिया में मिलेगा आराम


गठिया यानी आर्थराइटिस में न केवल जोड़ों में दर्द होता है, बल्कि चलने-फिरने में भी परेशानी होती है। गिलोय में एंटी आर्थराइटिक गुण होते हैं, जिसकी वजह से यह जोड़ों के दर्द सहित इसके कई लक्षणों में फायदा पहुंचाती है।


#अगर हो गया हो एनीमिया, तो करिए गिलोय का सेवन


भारतीय महिलाएं अक्सर एनीमिया यानी खून की कमी से पीडि़त रहती हैं। इससे उन्हें हर वक्त थकान और कमजोरी महसूस होती है। गिलोय के सेवन से शरीर में लाल रक्त कणिकाओं की संख्या बढ़ जाती है और एनीमिया से छुटकारा मिलता है।


#बाहर निकलेगा कान का मैल


कान का जिद्दी मैल बाहर नहीं आ रहा है तो थोड़ी सी गिलोय को पानी में पीस कर उबाल लें। ठंडा करके छान के कुछ बूंदें कान में डालें। एक-दो दिन में सारा मैल अपने आप बाहर जाएगा।


#कम होगी पेट की चर्बी


गिलोय शरीर के उपापचय (मेटाबॉलिजम) को ठीक करती है, सूजन कम करती है और पाचन शक्ति बढ़ाती है। ऐसा होने से पेट के आस-पास चर्बी जमा नहीं हो पाती और आपका वजन कम होता है।


#खूबसूरती बढ़ाती है गिलोय


गिलोय न केवल सेहत के लिए बहुत फायदेमंद है, बल्कि यह त्वचा और बालों पर भी चमत्कारी रूप से असर करती है….


#जवां रखती है गिलोय


गिलोय में एंटी एजिंग गुण होते हैं, जिसकी मदद से चेहरे से काले धब्बे, मुंहासे, बारीक लकीरें और झुर्रियां दूर की जा सकती हैं। इसके सेवन से आप ऐसी निखरी और दमकती त्वचा पा सकते हैं, जिसकी कामना हर किसी को होती है। अगर आप इसे त्वचा पर लगाते हैं तो घाव बहुत जल्दी भरते हैं। त्वचा पर लगाने के लिए गिलोय की पत्तियों को पीस कर पेस्ट बनाएं। अब एक बरतन में थोड़ा सा नीम या अरंडी का तेल उबालें। गर्म तेल में पत्तियों का पेस्ट मिलाएं। ठंडा करके घाव पर लगाएं। इस पेस्ट को लगाने से त्वचा में कसावट भी आती है।


#बालों की समस्या भी होगी दूर


अगर आप बालों में ड्रेंडफ, बाल झडऩे या सिर की त्वचा की अन्य समस्याओं से जूझ रहे हैं तो गिलोय के सेवन से आपकी ये समस्याएं भी दूर हो जाएंगी।


#गिलोय का प्रयोग ऐसे करें :--


अब आपने गिलोय के फायदे जान लिए हैं, तो यह भी जानिए कि गिलोय को इस्तेमाल कैसे करना है…


#गिलोय जूस


गिलोय की डंडियों को छील लें और इसमें पानी मिलाकर मिक्सी में अच्छी तरह पीस लें। छान कर सुबह-सुबह खाली पेट पीएं। अलग-अलग ब्रांड का गिलोय जूस भी बाजार में उपलब्ध है।


#काढ़ा


चार इंच लंबी गिलोय की डंडी को छोटा-छोटा काट लें। इन्हें कूट कर एक कप पानी में उबाल लें। पानी आधा होने पर इसे छान कर पीएं। अधिक फायदे के लिए आप इसमें लौंग, अदरक, तुलसी भी डाल सकते हैं।


#पाउडर


यूं तो गिलोय पाउडर बाजार में उपलब्ध है। आप इसे घर पर भी बना सकते हैं। इसके लिए गिलोय की डंडियों को धूप में अच्छी तरह से सुखा लें। सूख जाने पर मिक्सी में पीस कर पाउडर बनाकर रख लें।


#गिलोय वटी


बाजार में गिलोय की गोलियां यानी टेबलेट्स भी आती हैं। अगर आपके घर पर या आस-पास ताजा गिलोय उपलब्ध नहीं है तो आप इनका सेवन करें।


साथ में अलग-अलग बीमारियों में आएगी काम


अरंडी यानी कैस्टर के तेल के साथ गिलोय मिलाकर लगाने से गाउट(जोड़ों का गठिया) की समस्या में आराम मिलता है।इसे अदरक के साथ मिला कर लेने से रूमेटाइड आर्थराइटिस की समस्या से लड़ा जा सकता है।खांड के साथ इसे लेने से त्वचा और लिवर संबंधी बीमारियां दूर होती हैं।आर्थराइटिस से आराम के लिए इसे घी के साथ इस्तेमाल करें।कब्ज होने पर गिलोय में गुड़ मिलाकर खाएं।


#साइड इफेक्ट्स का रखें ध्यान


वैसे तो गिलोय को नियमित रूप से इस्तेमाल करने के कोई गंभीर दुष्परिणाम अभी तक सामने नहीं आए हैं लेकिन चूंकि यह खून में शर्करा की मात्रा कम करती है। इसलिए इस बात पर नजर रखें कि ब्लड शुगर जरूरत से ज्यादा कम न हो जाए। 



पेट में गैस बनती है और कब्ज की समस्या

 Isabgol for Vata - क्या वात प्रकृति वाले इसबगोल ले सकते हैं? वात प्रकृति, कब्ज और इसबगोल को लेकर सबसे बड़ा कन्फ्यूजन - अगर आपकी प्रकृति वात की है, यानी शरीर में रूखापन रहता है, जोड़ों में कड़क-कड़क की आवाज़ आती है, 


पेट में गैस बनती है और कब्ज की समस्या बार-बार परेशान करती है, तो आपके मन में एक सवाल ज़रूर आता होगा।


कब्ज होने पर क्या इसबगोल लेना सही है?


लोगों का सबसे बड़ा डर यही होता है कि इसबगोल की तासीर ठंडी मानी जाती है। तो क्या यह वात को और बढ़ा देगा?

क्या इससे पेट और ज़्यादा फूल जाएगा?

और सबसे आम सवाल, क्या इसकी आदत पड़ जाती है?


इस Post में हम आयुर्वेद के प्राचीन ग्रंथों और आधुनिक साइंस की रिसर्च के आधार पर इन सभी सवालों का जवाब जानेगें। साथ ही इसबगोल लेने का वह सही और सुरक्षित तरीका भी जानेगें, जो खासतौर पर वात प्रकृति वालों के लिए अमृत जैसा काम करता है।


क्या वात प्रकृति वाले इसबगोल ले सकते हैं?

सीधा और साफ़ जवाब है — हां, बिल्कुल ले सकते हैं।

इतना ही नहीं, सही तरीके से लिया जाए तो यह वात रोगियों के लिए सबसे बेहतरीन औषधियों में से एक है।


आयुर्वेद के अनुसार इसबगोल का स्वाद मधुर यानी मीठा होता है और पाचन के बाद भी इसका प्रभाव मधुर ही रहता है।

और आप जानते हैं, मीठा स्वाद वात को शांत करता है।


वात का मुख्य गुण है रूखापन। जब आंतें सूख जाती हैं, तो मल सख़्त हो जाता है और कब्ज होती है।

इसबगोल में दो बहुत महत्वपूर्ण गुण होते हैं।

पहला स्निग्ध, यानी चिकनाई देने वाला।

दूसरा पिच्छिल, यानी लिसलिसापन पैदा करने वाला।


ये दोनों गुण आंतों में नमी लाते हैं, जो वात के रूखेपन को खत्म करने में सबसे ज़्यादा मदद करते हैं।


ठंडी तासीर से वात बढ़ेगा या नहीं?

अब आते हैं उस डर पर, जो ज़्यादातर लोगों को रोक देता है।


यह सच है कि इसबगोल का वीर्य शीत यानी ठंडा होता है।

अगर आप इसे ठंडे पानी के साथ लेंगे, तो यह वात को बढ़ा सकता है और पेट में मरोड़, गैस या असहजता पैदा कर सकता है।


लेकिन आयुर्वेद का एक बहुत बड़ा सिद्धांत है — संस्कार और अनुपान।

मतलब, आप किसी चीज़ को किसके साथ लेते हैं, यह उसके प्रभाव को पूरी तरह बदल सकता है।


वात की कब्ज में असली समस्या ठंडक नहीं, बल्कि रूखापन होता है।

इसबगोल की चिकनाई उस रूखेपन को खत्म कर देती है।

और जो ठंडी तासीर है, उसे हम गर्म दूध और घी के साथ पूरी तरह बैलेंस कर देते हैं।


आगे हम इसका सही तरीका विस्तार से समझेंगे।


क्या इसबगोल की आदत पड़ जाती है?

यह सवाल भी बहुत ज़रूरी है।


सच यह है कि केमिकल रूप से इसबगोल की लत नहीं लगती।

बाज़ार में मिलने वाले कई कब्ज के चूर्ण जैसे सनायुक्त चूर्ण या तेज़ दवाइयां आंतों की नसों को इरिटेट करती हैं।

इससे आंतें धीरे-धीरे कमजोर हो जाती हैं।


इसबगोल ऐसा नहीं करता।

यह केवल फाइबर का एक बल्क बनाता है, जिससे मल को बाहर निकलने में आसानी होती है।


लेकिन वात प्रकृति वालों के लिए एक महत्वपूर्ण चेतावनी है।

रिसर्च बताती है कि अगर इसबगोल को रोज़ाना कई महीनों तक लिया जाए, तो यह भोजन से कैल्शियम और आयरन को सोख सकता है।


वात प्रकृति वालों की हड्डियां पहले से ही नाज़ुक होती हैं।

इसलिए इसे आदत न बनाएं।

जब ज़रूरत हो तभी लें और बीच-बीच में ब्रेक ज़रूर दें।


वात प्रकृति के लिए इसबगोल लेने का गोल्डन तरीका

अब ध्यान से नोट कीजिए।

यह तरीका वात वालों के लिए Golden rule  है।


वात की कब्ज में इसबगोल को कभी भी सूखे या ठंडे पानी से नहीं लेना चाहिए।


एक गिलास गर्म दूध लें।

गाय का दूध सबसे अच्छा माना जाता है।

इसमें एक चम्मच देसी घी मिलाएं।

घी वात का सबसे बड़ा दुश्मन है।


अब इसमें एक चम्मच इसबगोल डालें और तुरंत पी लें।


अगर आपको दूध नहीं पचता, तो आप तेज़ गर्म पानी में घी मिलाकर, फिर उसमें इसबगोल डालकर भी ले सकते हैं।

घी डालना बहुत ज़रूरी है क्योंकि यह आंतों को स्नेहन देता है, यानी अंदर से लुब्रिकेशन करता है।


कब इसबगोल बिल्कुल नहीं लेना चाहिए?

कुछ स्थितियां ऐसी होती हैं, जहां चाहे कब्ज कितनी भी हो, इसबगोल नहीं लेना चाहिए।


अगर आपकी जीभ पर मोटी सफेद परत जमी हो,

मल बहुत चिपचिपा और बदबूदार हो,

तो आयुर्वेद में इसे आम यानी टॉक्सिन्स कहा जाता है।


इसबगोल गुरु यानी भारी होता है।

ऐसी स्थिति में यह पचेगा नहीं और समस्या और बढ़ा देगा।


पहले पाचन को ठीक करें।

सोंठ का पानी या जीरा पानी लें।

जब आम साफ हो जाए, तभी इसबगोल शुरू करें।


Conclusion

वात प्रकृति वाले लोग इसबगोल ले सकते हैं और लेना उनके लिए फायदेमंद भी हो सकता है।

बस सही तरीके से लेना ज़रूरी है।


हमेशा गर्म दूध या गर्म पानी और घी के साथ लें, ताकि इसकी ठंडी तासीर बैलेंस हो जाए।

इसकी केमिकल लत नहीं लगती, लेकिन लंबे समय तक लगातार लेने से बचें।

इसे रात में सोते समय लें, भोजन के साथ नहीं।



I hated alcohol

 I hated alcohol.

Not because I was an addict.

Not because I blacked out every night.

Not because my life was “out of control.”

I hated alcohol because every time I drank, my body betrayed me.

At 31, I still enjoyed it.

At 33, I had reasons.

By 38, I had rituals down to a science.

I told myself I was a “social drinker.”

That wine helps me relax.

That real adults unwind like this.

That everyone needs something after a long day.

That was bullshit.

The truth?

Alcohol scared me.

I didn’t hate drinking.

I hated what came after.

The moment my body shifted into low power mode:

Brain fog.

Tight chest.

Flat emotions.

That dull, heavy feeling like life was happening behind glass.

Nothing kills momentum faster than numbness.

My first burnout didn’t look dramatic.

No rock bottom. No lost job.

Just slower mornings.

Then missed workouts.

Then cancelled plans.

Then silence inside my head.

I blamed stress.

Then work.

Then age.

So when I “cut back,” I was sure this time would be different.

Only weekends.

Only wine.

Only socially.

The first month? Fine.

The second? Still manageable.

Then it happened again.

Not hangovers.

Something worse.

I woke up tired even after sleep.

Motivation disappeared by noon.

I’d drink just to feel something again.

I started delaying real life.

“I’ll start Monday.”

“After this project.”

“Just one more week.”

I wasn’t relaxing.

I was avoiding myself.

Here’s what no one tells you:

When alcohol messes with your nervous system, clarity doesn’t disappear first.

Agency does.

My body felt… muted.

No drive. No edge.

No hunger for progress.

Just flat.

I tried fixing it the hard way.

More discipline.

More caffeine.

More productivity hacks.

Nothing touched the core issue.

Meanwhile, my habits were quietly wrecking me:

– Drinking “to switch off”

– Scrolling for hours after

– Shallow sleep

– Constant low-grade anxiety

– Zero recovery

My body wasn’t broken.

It was dysregulated.

Alcohol doesn’t announce itself as a problem.

It erodes you.

You stop initiating change.

You stop trusting your energy.

You stop believing tomorrow will feel different.

The turning point wasn’t a hangover.

It was waking up one morning and realizing:

I hadn’t felt clear in years.

Not once.

That’s when it hit me:

This wasn’t about willpower.

This was neurological.

Alcohol affects:

– dopamine

– cortisol

– sleep cycles

– emotional regulation

– motivation

Week 2:

Mornings felt lighter.

Week 4:

Focus came back — not forced, not hyped.

Natural.

Week 6:

Evenings stopped feeling like something to survive.

Week 8:

I didn’t think about drinking at all.

I just… lived.

That’s when I realized something uncomfortable:

I never hated alcohol.

I hated who I became with it.

If this story makes you uneasy — good.

It means your body is trying to tell you something.

Alcohol doesn’t ruin your life overnight.

It makes you quiet.

And quiet kills momentum faster than failure.

Don’t wait until numbness becomes your personality.

Fix the system — not the habit.

Your clarity isn’t gone.

It’s suppressed.

And it’s reversible.

Take the 3-minute quiz.

See what alcohol is actually doing to your brain and body.

नारी चुंबकीय शक्ति

नारी जितना पुरुष के संसर्ग में आती है वह उतनी ही चुंबकीय शक्ति का क्षरण करती जाती है।🌹 


चुंबकीय शक्ति ही आद्याशक्ति है जिसे अंतर्निहित करके काम शक्ति को आत्मशक्ति में परिवर्तित किया जाता है। यह शक्ति दो केंद्रों में विलीन होती है। प्रथमत: मूलाधार चक्र में, जहां से यह ऊर्जा जननेंद्रिय के मार्ग से नीचे प्रवाहित होकर प्रकृति में विलीन हो जाती है और यदि यही ऊर्जा भौंहों के मध्य स्‍थि‍त आज्ञा चक्र से जब ऊपर को प्रवाहित होती है तो सहस्रार स्‍थि‍त ब्रह्म से एकीकृत हो जाती है।


इसलिए कुंआरी कन्या का प्रयोग तंत्र साधना में उसकी शक्ति की सहायता से दैहिक सुख प्राप्त करने हेतु नहीं, ‍अपितु उसे भैरवी रूप में प्रतिष्ठित करके ब्रह्म से सायुज्य प्राप्त करने हेतु किया जाता है।


यह संपूर्ण संसार द्वंद्वात्मक है, मिथुनजन्य है एवं इसके समस्त पदार्थ स्त्री तथा पुरुष में विभाजित हैं। इन दोनों के बीच आकर्षण शक्ति ही संसार के अस्तित्व का मूलाधार है जिसे आदि शंकराचार्यजी ने सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में व्यक्त किया है।


शिव:शक्तया युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभवितुं।

न चेदेवं देवो न खलु कुशल: स्पन्दितुमपि। 


यह आकर्षण ही कामशक्ति है जिसे तंत्र में आदिशक्ति कहा गया है। यह परंपरागत पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। तंत्र शास्त्र के अनुसार नारी इसी आदिशक्ति का साकार प्रतिरूप है। षटचक्र भेदन व तंत्र साधना में स्त्री की उपस्थिति अनिवार्य है, क्योंकि साधना स्थूल शरीर द्वारा न होकर सूक्ष्म शरीर द्वारा ही संभव है।


तंत्र साधना का यौनक्रिया सामान्य यौनक्रिया नही है, इस यौनक्रिया में प्रेम का संबंध होता है,जो सूक्ष्म शरीर द्वारा ही संभव है। सामान्य यौनक्रिया बस वासना से प्रेरित होता है जो सिर्फ स्थूल शरीर का अनुभव है। तंत्र साधना में यौनक्रिया द्वारा भैरव अपने हृदय की ऊर्जा को अपने भैरवी के हृदय में उतरता हैं और दो आत्माओं के बीच ऊर्जा का एक बंध बन जाता है


तंत्र साधना में यौनक्रिया के लिए, आपको मानसिक, शारीरिक और वाचिक रूप से पवित्र होना पड़ेगा, आपके हृदय में प्रेम, श्रद्धा और समर्पण होना चाहिए, वासना नही, क्योंकि तंत्र साधना में यौनक्रिया बहुत ही उच्च कोटि के साधक साधिकाओं के लिए है जिसका उद्देश्य सिर्फ और अपने इष्ट से सायुज्य प्राप्त करना होता है।


ज्यादातर साधना इस प्रकार की हैं कि वो बस व्यक्तिगत ही हैं, मतलब सिर्फ एक व्यक्ति ही आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है और उसके लिए भी उसे सन्यास की जरूरत होगी


लेकिन तंत्र एकमात्र ऐसी साधना है जिसमे पति पत्नी साथ में आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं, तंत्र साधना गृहस्थ और सन्यासी दोनों के लिए अलग अलग मार्ग से है, लेकिन इस साधना के लिए पति पत्नी के बीच गहरा और निस्वार्थ प्रेम आवश्यक है और दोनों का ही ईश्वर के लिए श्रद्धा, विश्वास और समर्पण भी आवश्यक है


हमारे शरीर में X तथा Y दो क्रोमोसोम पाए जाते हैं, अर्थात हमारे अंदर स्त्री और पुरुष दोनों के गुण मौजूद हैं। हमारे सूक्ष्म शरीर भी स्त्री तत्व और पुरुष तत्व दो तत्व से मिलकर बना है, स्त्री तत्व को शक्ति और पुरुष तत्व को शिव कहा गया है। मोक्ष के लिए जरूरी है कि हमारे दोनों तत्व व्यवस्थित हो जाए और ऊर्जा के प्रबाह के लिए मार्ग खुल जाए जिसे हम कुंडलिनी जागरण भी कहते हैं


तंत्र साधना में पुरुष और स्त्री की आबश्यकता का एक और कारण यह है कि स्त्री में पुरुष तत्व का जागरण करने के लिए पुरुष अपनी पुरुषत्व की ऊर्जा स्त्री में यौनक्रिया के माध्यम से प्रबाहित करता है जिससे जो पुरुष तत्व स्त्री में सुप्त था उसका जागरण हो जाये। स्त्री भी इसी प्रकार पुरूष का स्त्री तत्व जगाने में मदद करती है जो अर्धनारीश्वर का स्वरूप है।


प्रेम के बहुत सारे स्तर होते हैं, प्रेम का स्तर जितना सूक्ष्म होता जाएगा, प्रेम उतना ही पवित्र और आध्यात्मिक उन्नति उतनी ही प्रबल होती जाएगी क्योंकि ईश्वर प्रेमस्वरूप ही हैं। जो मनुष्य केवल शारिरिक प्रेम करता है, उसे बस कुछ छणों के लिए आनंद की प्राप्ति होती है, जिस मानव का प्रेम थोड़ा सूक्ष्म होकर मानसिक हो गया है वो थोड़ा अधिक आनंद का अनुभव करेगा पर जिस मानव ने अपनी स्वयं की चेतना में उतरकर अध्यत्मिक प्रेम का विकास कर लिया उसके आनंद का वर्णन संभव ही नही है


शारीरिक और मानसिक प्रेम में वासना की प्रधानता रहती है परंतु आध्यात्मिक प्रेम में बस प्रेम ही रहता है, वासना का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है, फिर तो जो आनंद हृदय में महसूस होता है वो इस संसार के सब सुखों से हज़ारों गुना ज्यादा है


तंत्र एक बेहद पवित्र मार्ग है, प्रेम से भरा हुआ मार्ग और यह मार्ग स्वयं शिव ने दिया है जिनसे पवित्र इस संसार में कुछ भी नही है

आजकल लोग इतने आक्रामक क्यों हो गए हैं

आजकल लोग इतने आक्रामक क्यों हो गए हैं और इससे कैसे बाहर आएँ?


आजकल जब हम बाहर निकलते हैं, तो छोटी-सी बात पर झगड़े, सड़क पर गुस्से वाले लोग, और घरों में अपनों के बीच लड़ाई की खबरें अक्सर सुनने को मिलती हैं। कभी-कभी ये हिंसा इतनी बड़ी हो जाती है कि हत्या, बलात्कार या घरेलू हिंसा जैसी घटनाएं सामने आती हैं। यह अचानक नहीं होता। यह हमारे रोज़मर्रा के जीवन की आदतों, सोच और भावनाओं का नतीजा है।


क्यों बढ़ रही है आक्रामकता?


1. जल्दी सब कुछ पाने की चाह


आज के समय में लोग हर चीज़ तुरंत चाहते हैं पैसा, सफलता, पहचान। लेकिन जीवन हमेशा हमारी इच्छानुसार नहीं चलता।

उदाहरण: एक बच्चा मोबाइल गेम जीतना चाहता है। हर बार हारने पर वह गुस्सा करता है। वैसे ही बड़े लोग भी छोटी असफलताओं पर जल्दी चिड़चिड़ा हो जाते हैं।


2. पैसा और ताकत की होड़


पैसा और पावर को सफलता का पैमाना मान लिया गया है। इससे तुलना और जलन बढ़ती है।

उदाहरण: अगर किसी पड़ोसी ने नया घर बना लिया, तो जलन या ईर्ष्या के कारण आप छोटा महसूस कर सकते हैं। यही भावना कभी-कभी गुस्से में बदल जाती है।


3. नशा और गलत आदतें


शराब, तंबाकू, मोबाइल या वीडियो गेम जैसी आदतें सोचने-समझने की शक्ति को कमजोर करती हैं।

उदाहरण: शराब पीकर घर आए व्यक्ति को छोटी-सी बात पर भी गुस्सा आ सकता है।


4. रिश्तों में दूरी और प्रेम की कमी


आज लोग परिवार और दोस्तों के साथ समय कम बिताते हैं। मोबाइल ने पास जरूर रखा है, लेकिन असली बातचीत कम हो गई है।

उदाहरण: बच्चे अपने माता-पिता से बातें कम करते हैं और मोबाइल पर खेलते रहते हैं। इससे घर में दूरी और चिड़चिड़ापन बढ़ता है।


5. संवेदनशीलता की कमी


अखबार और सोशल मीडिया पर हर समय हिंसक और डरावनी खबरें आती रहती हैं। धीरे-धीरे मन कठोर हो जाता है।

उदाहरण: पहले किसी सड़क दुर्घटना को देखकर लोग दुखी होते थे, अब बस गुजर जाते हैं।


6. राजनीतिक और बाहरी प्रभाव


आज सोशल मीडिया और विज्ञापन लोगों की सोच और भावनाओं पर गहरा असर डालते हैं। राजनीति, प्रचार और सेक्सुअल सामग्री भी गुस्से या गलत अपेक्षाओं को बढ़ाती है।

उदाहरण:


कोई फेसबुक या व्हाट्सएप पोस्ट पढ़कर बहुत गुस्सा हो जाता है, और परिवार या पड़ोसियों के साथ लड़ाई कर देता है।


टीवी या ऑनलाइन विज्ञापन में दिखाए गए लग्ज़री जीवन को देखकर लोग अपनी स्थिति पर असंतोष महसूस करते हैं।


सेक्सुअल कंटेंट के कारण कुछ लोग अपने रिश्तों और अपेक्षाओं को असली जीवन से जोड़कर तनाव या जलन महसूस करते हैं।


इन बाहरी प्रभावों के कारण, कई बार इंसान अपने भावनाओं को नियंत्रित नहीं कर पाता और छोटी बातों पर भी आक्रामक हो जाता है।


कैसे पहचानें कि गुस्सा बढ़ रहा है


छोटी-सी बात पर बार-बार चिड़चिड़ा होना


अपने ही लोगों से दूरी बनाना


हर असहमति को व्यक्तिगत हमला समझना


दूसरों के दुख से उदासीन होना


बाहरी खबरों, पोस्ट या विज्ञापनों पर तुरंत प्रतिक्रिया देना


उदाहरण: अगर आप सोशल मीडिया पर कोई पोस्ट देखकर तुरंत गुस्सा कर रहे हैं, या परिवार में किसी की छोटी गलती पर चिल्ला रहे हैं, तो यह चेतावनी है।


इस चक्र से बाहर कैसे आएँ


1. रुकना और सोचना


गुस्से में कोई भी फैसला तुरंत न लें। गहरी साँस लें और 1–2 मिनट सोचें।


2. बात करना


अपने मन की उलझन किसी भरोसेमंद व्यक्ति से साझा करें। इससे मन हल्का होता है।


3. रिश्तों में समय देना


बिना मोबाइल के साथ बैठें, बात करें, खेलें और खाना मिलकर खाएं।


4. जिम्मेदारी स्वीकार करना


दुनिया जैसी भी है, अपने व्यवहार का चुनाव हम खुद करते हैं।


5. संवेदनशील बने रहना


किसी की मदद करना, किसी के दुख को समझना, किताब पढ़ना, संगीत सुनना या प्रकृति के साथ समय बिताना ये सब मन को नरम और शांत बनाते हैं।


उदाहरण: सड़क पर किसी बुजुर्ग को भारी सामान उठाते हुए देखना और मदद करना। सिर्फ बुजुर्ग को राहत नहीं मिलेगी, आपका मन भी शांत होगा।


6. बाहरी प्रभावों पर नियंत्रण


सोशल मीडिया, विज्ञापन और प्रचार को बिना सोचे-समझे प्रतिक्रिया न दें। खुद से पूछें: "क्या यह मेरे लिए सही है? क्या मैं इससे परेशान हो रहा हूँ?"

उदाहरण: कोई राजनीतिक पोस्ट देखकर गुस्सा आए, तो तुरंत टिप्पणी न करें, पहले 5 मिनट सोचना और शांत होना।


गुस्सा और हिंसा अचानक पैदा नहीं होते। यह हमारे जीवन की तेजी, अधैर्य, नशा, रिश्तों की दूरी, संवेदनशीलता की कमी और बाहरी प्रभावों का परिणाम है।


यदि हम....


रुकना सीखें


सुनें और समझें


छोटे-छोटे रिश्तों में प्यार और समय दें


अपने व्यवहार की जिम्मेदारी लें


और बाहरी प्रभावों को सोच-समझकर स्वीकार करें तो न केवल हमारा जीवन शांत होगा, बल्कि समाज भी धीरे-धीरे कम आक्रामक बनेगा।

स्त्री-पुरुष समानता

 "स्त्री-पुरुष समानता: शब्दों से आगे की वास्तविकता"


महिलाओं के विषय में लिखते समय मैं किसी प्रकार की राय थोपने या किसी व्यक्ति के चरित्र पर निर्णय देने का दावा नहीं करता। मेरा मानना है कि किसी भी समाज में स्त्री और पुरुष दोनों ही पहले इंसान हैं, और इंसान होने के नाते उनके अधिकार समान होने चाहिए। यह समानता केवल संविधान, भाषणों या नारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि जीवन की वास्तविक परिस्थितियों में दिखाई देनी चाहिए।


समान अधिकार का अर्थ क्या केवल कानून है?


आज हम “समान अधिकार” शब्द का उपयोग बहुत सहजता से करते हैं, लेकिन अक्सर यह शब्द व्यवहार में खोखला साबित होता है। वास्तविक समानता का अर्थ है 50-50 भागीदारी न केवल अधिकारों में, बल्कि अवसरों और स्वतंत्रताओं में भी।


यदि कोई लड़का अकेले घर से बाहर यात्रा कर सकता है, तो वही स्वतंत्रता लड़की को भी मिलनी चाहिए।

यदि किसी परियोजना, शोध या निर्णय-प्रक्रिया में लड़कों की भागीदारी स्वाभाविक मानी जाती है, तो लड़कियों की भागीदारी को भी उतना ही सामान्य और आवश्यक समझा जाना चाहिए।

रोज़गार, शिक्षा, राजनीति, व्यापार हर क्षेत्र में समान अवसर केवल काग़ज़ पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर दिखने चाहिए।


समानता के नाम पर महिलाओं का “उपयोग”


दुर्भाग्य से, हमारे देश ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में महिलाओं को समान अधिकार देने के नाम पर अक्सर अपने हितों के अनुसार उपयोग किया जाता है। जब सुविधाजनक हो, तब “महिला सशक्तिकरण” की बात होती है, और जब सत्ता, पूँजी या नीति-निर्माण की बात आती है, तब महिलाएँ पीछे रह जाती हैं।


हॉलीवुड की 2023 में आई फ़िल्म Barbie इसी सच्चाई की ओर इशारा करती है कि कैसे पुरुष-प्रधान संरचनाएँ अपने साम्राज्य और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए महिलाओं की छवि, श्रम और भावनाओं का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन वास्तविक शक्ति अपने पास ही रखती हैं। यह केवल फ़िल्म की कहानी नहीं, बल्कि समाज का आईना है।


नीति-निर्माण में महिलाओं की अनुपस्थिति


आज सबसे बड़ा और ज़रूरी सवाल यह है कि

राजनीतिक और व्यावसायिक नीति-निर्माण में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी कितनी है?


जहाँ कानून बनाए जाते हैं, योजनाएँ तय होती हैं, बजट और प्राथमिकताएँ निर्धारित होती हैं वहाँ महिलाओं की उपस्थिति प्रतिशत में भी बहुत कम है। जब निर्णय लेने की मेज़ पर महिलाएँ होंगी ही नहीं, तो क्या उनके अनुभवों, ज़रूरतों और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर न्यायपूर्ण फैसले लिए जा सकते हैं?


महिला के जीवन की वास्तविक चुनौतियाँ सुरक्षा, स्वास्थ्य, कार्यस्थल पर सम्मान, मातृत्व और करियर का संतुलन इन सबको वही बेहतर समझ सकती है जो इन्हें जीती है।


"विकसित देश की असली परिभाषा"


किसी देश का विकास केवल उसकी अर्थव्यवस्था, तकनीक या सैन्य शक्ति से नहीं आँका जा सकता।

जिस देश में महिलाओं को जितना सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकार मिलते हैं वही देश वास्तव में विकसित है।


"एक विकसित समाज वह होता है जहाँ....


स्त्री को बोझ नहीं, सहयोगी माना जाता है


उसकी स्वतंत्रता पर शक नहीं, विश्वास किया जाता है


और उसे “महिला” होने से पहले “इंसान” समझा जाता है


विकसित देश वही है जो इंसान को इंसान मानता है लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि गरिमा के आधार पर।


स्त्री-पुरुष समानता कोई दया नहीं, कोई एहसान नहीं, बल्कि एक मौलिक आवश्यकता है। जब तक यह समानता व्यवहार, सोच और सत्ता-संरचनाओं में नहीं उतरेगी, तब तक समाज अधूरा रहेगा।


सच्ची समानता वही है जहाँ अधिकार माँगने नहीं पड़ें, बल्कि स्वाभाविक रूप से मिलें क्योंकि वे इंसान होने के नाते पहले से ही मिलने चाहिए।


ज़िंदगी किसी के लिए एक-सी कभी नहीं रहती, क्योंकि समय हर व्यक्ति को अलग-अलग कसौटियों पर परखता है। कोई आज शिखर पर होता है तो कल साधारण राहों पर, और कोई संघर्षों के अँधेरों से निकलकर उजाले की ओर बढ़ता है। हर इंसान की तक़दीर अलग होती है, इसलिए तुलना और घमंड दोनों ही निरर्थक हैं। जो आज हमारे पास है, वह स्थायी नहीं, बस एक पड़ाव है, जिसे समय जब चाहे बदल सकता है।


इंसान चाहे कितने ही रूप बदल ले....वेश, हैसियत या सोच के,

पर शीशा हर बार उसे उसकी सच्चाई से रू-बरू करा देता है। बाहरी पहचान बदल सकती है, पर भीतर की छवि वही रहती है, वही चेहरा जो आत्मा की गहराइयों में बसता है। जब यह सत्य समझ में आ जाता है, तब घमंड पिघल जाता है और मन में विनम्रता जन्म लेती है, क्योंकि अंततः इंसान वही होता है, जो वह स्वयं से छुपा नहीं सकता।




शरीर में किसी भी गांठ को खत्म करें

शरीर में किसी भी गांठ को खत्म करें इन रामबाण औषधि से,समय रहते सतर्क रहे, आयुर्वेद अपनाए...


गांठ के लिए 10 आयुर्वेदिक औषधियाँ

1) कंचनार गुग्गुल

किसके लिए उपयोगी: गले, थायरॉइड, लिम्फ नोड की गांठ


कैसे लें: 1–2 गोली दिन में दो बार गुनगुने पानी के साथ


2) वरुणादि कषाय / वरुण चूर्ण

लाभ: सिस्ट, लिपोमा, चर्बी की गांठ में उपयोगी


सेवन: चिकित्सक की सलाह से


3) त्रिफला चूर्ण

लाभ: शरीर की विषाक्तता कम करता है, गांठ को नरम करता है


कैसे लें: रात को 1 चम्मच गुनगुने पानी/दूध के साथ


4) गुग्गुल (शुद्ध गुग्गुल)

लाभ: सूजन घटाता है, गांठ को गलाने में सहायक


सेवन: आयुर्वेदिक चिकित्सक की सलाह से


5) निर्गुंडी (निशिंद) चूर्ण/काढ़ा

लाभ: दर्द व सूजन वाली गांठ में उपयोगी


कैसे लें: काढ़ा बनाकर पी सकते हैं


6) कुटकी चूर्ण

लाभ: रक्त व यकृत शुद्धि, गांठ के कारण बनने वाली गंदगी कम करता है


सेवन: बहुत कम मात्रा में (डॉक्टर की सलाह जरूरी)


7) हरिद्रा (हल्दी) + नीम

लाभ: एंटी-इंफ्लेमेटरी व एंटी-बैक्टीरियल


कैसे उपयोग करें:


1 चम्मच हल्दी + नीम का काढ़ा रोज सुबह


8) गिलोय रस

लाभ: प्रतिरक्षा बढ़ाता है, सूजन घटाता है


सेवन: 10–15 मि.ली. दिन में 1–2 बार


9) रक्तशोधक सिरप (आयुर्वेदिक)

लाभ: खून साफ करता है, गांठ बनने की प्रवृत्ति कम करता है


सेवन: लेबल के अनुसार


10) अश्वगंधा + शिलाजीत (हल्की गांठ में)

लाभ: शरीर को मजबूत करता है, अंदरूनी सूजन कम करता है


सेवन: रात में दूध के साथ (डॉक्टर की सलाह से)

IBS क्या है और क्यों होता है?

 IBS in Ayurveda - IBS क्या है और क्यों होता है? (Ayurveda की भाषा में) आईबीएस यानी Irritable Bowel Syndrome – एक ऐसी समस्या जिसमें पेट बार-बार परेशान रहता है। कभी कब्ज़, कभी loose motion, कभी पेट भारी, कभी गैस, तो कभी जलन।


आयुर्वेद में IBS को सीधे IBS नहीं कहा गया, बल्कि इसे ग्रहणी रोग के नाम से समझाया गया है।


ग्रहणी क्या है?

ग्रहणी वह हिस्सा है जो


आमाशय (stomach)

और पक्वाशय (large intestine)

के बीच का functional zone होता है।

यहीं से तय होता है कि खाना ठीक से पचेगा या नहीं।


जड़ में समस्या कहाँ है? – मंद अग्नि

आयुर्वेद साफ़ कहता है:


जब अग्नि (digestive fire) कमजोर होती है, तब ग्रहणी बिगड़ती है।

इसी कमजोर अग्नि से जुड़ी तीन बड़ी बीमारियाँ बताई गई हैं:


1. अतिसार – बार-बार loose motion

2. ग्रहणी (IBS) – कभी loose, कभी constipation

3. अर्श (Piles)


मतलब साफ है:

पाचन गड़बड़ = पेट की बड़ी बीमारियाँ


IBS सबका एक जैसा नहीं होता

यह बहुत ज़रूरी बात है।


IBS के चार प्रकार बताए गए हैं:


वातज ग्रहणी – गैस, पेट फूलना, कब्ज़

पित्तज ग्रहणी – जलन, एसिडिटी, loose motion, burning

कफज ग्रहणी – भारीपन, sticky stool, आलस

सन्निपातज ग्रहणी – तीनों दोष एक साथ


इसलिए आयुर्वेद में one-diet-fits-all जैसा कुछ नहीं होता।


सबसे ज़रूरी बात: क्या न करें (Diet से पहले)

IBS में “क्या खाना है” से ज़्यादा important है

क्या नहीं करना है


1. दस्त के तुरंत बाद खाना

Loose motion के बाद जब तक भूख सही से न लगे, खाना पेट को और खराब करता है।


2. भूख लगने पर भी न खाना

ऑफिस, फास्टिंग, देर से lunch –

भूख को दबाना भी IBS को न्योता देता है।


3. अधपचा खाना ऊपर से खाना

पहला खाना digest नहीं हुआ

और ऊपर से दूसरा –

यही IBS की classic गलती है।


4. बार-बार कुछ न कुछ खाते रहना

सुबह नाश्ता → fruit → snack → lunch → चाय → street food → dinner → दूध

ऐसा pattern अग्नि को पूरी तरह confuse कर देता है।


5. अनियमित timing

कभी 9 बजे खाना, कभी 12 बजे, कभी skip –

इसे आयुर्वेद में विषमाशन कहते हैं।


6. जानते हुए भी गलत खाना

पता है कि पानीपुरी से acidity होती है,

फिर भी खाना – यही असात्म्य भोजन है।


खाना कैसा हो – Heavy नहीं, Smart

IBS में rule simple है:


जितना हल्का खाना, उतना फायदा।


Juice नहीं, Soup से शुरुआत

कच्चे जूस (पालक, धनिया, नींबू)

कमज़ोर पेट को और irritate करते हैं।


बेहतर है:


मूंग दाल का पानी

अरहर / चना का सूप

जौ (barley) का पानी

ये सब अग्नि संस्कार से गुज़रे होते हैं, इसलिए digest होते हैं।


धीरे-धीरे मसाले जोड़ें

जब digestion सुधरने लगे:


जीरा

धनिया

हल्दी

थोड़ा सा घी

धीरे-धीरे introduce करें।


छाछ – सही तरीके से, सही इंसान के लिए

छाछ (तक्र) IBS में बहुत उपयोगी है, लेकिन हर किसी के लिए नहीं।


पतली छाछ से शुरू करें

मसाले: काली मिर्च, सोंठ

गर्मी में

bleeding, चक्कर, ज़्यादा heat वालों में सावधानी


Loose motion वाले IBS में क्या खाएँ?

अनार

बेल

पाठा

जीरे का पानी

ये stool को normalize करते हैं।


Constipation वाले IBS में क्या करें?

करेला

परवल

ज्वार, बाजरा

गेहूं अगर suit न करे तो avoid


Dairy अगर suit नहीं करती?

मतलब शरीर में कफ + पित्त ज़्यादा है।

ऐसे में:


दूध

दही

छाछ

temporary avoid करें।


Ayurveda में ऐसे cases में

शोधन (Panchakarma) की ज़रूरत पड़ती है

जैसे:


कफ dominant - वमन

पित्त dominant - विरेचन


Ulcerative Colitis और IBS

Ayurveda disease का इलाज नाम से नहीं,

दोष से करता है।


Ulcers = पित्त का बढ़ना

इसलिए:


गूलर

नागरमोथा

नागकेसर


बहुत effective रहते हैं।


एक बात हमेशा याद रखें

चरक संहिता का golden rule:


“पुरुषं पुरुषं वीक्ष्य”

हर इंसान अलग है।


जो एक को suit करे, ज़रूरी नहीं दूसरे को भी करे।


Self-medication क्यों dangerous है?

कभी ज़्यादा ठंडी दवा - कफ बढ़ गया

कभी ज़्यादा गर्म दवा - पित्त flare हो गया


इसलिए IBS में:

 random YouTube advice

एक नाम सुनकर दवा लेना


काम नहीं करता।


 IBS / ग्रहणी – आयुर्वेदिक औषधि 

आयुर्वेद में दवा का उद्देश्य सिर्फ symptoms दबाना नहीं होता, बल्कि

अग्नि सुधार + दोष संतुलन + आंतों की healing करना होता है।


1. अग्नि सुधारने की दवाएँ 

जब तक अग्नि ठीक नहीं होगी, IBS बार-बार लौटेगा।


 हिंग्वाष्टक चूर्ण

काम: गैस, bloating, indigestion

Dose: 1/2 चम्मच

कैसे लें: गुनगुने पानी या छाछ के साथ

कब: खाने से पहले


अजमोदादि चूर्ण

काम: वातजन्य IBS, पेट फूलना

Dose:1/2 चम्मच

कब: रात में


2. पित्त शमन (Acidity, Burning, Loose motion)

अगर IBS में


जलन

खट्टे डकार

पतले दस्त

गुदा में जलन

होती है, तो पित्त dominant है।


 प्रवाल पंचामृत

काम: एसिडिटी, burning, ulcer tendency

Dose: 125 mg

कैसे: शहद या मिश्री पानी के साथ

कब: भोजन के बाद


कामदुधा रस (मुक्ता युक्त)

काम: तीव्र पित्त शमन

Dose: 125 mg

कब: दिन में 1–2 बार


3. Loose Motion dominant IBS (IBS-D)

कुटज घन वटी

काम: बार-बार दस्त, mucus, urgency

Dose: 1–2 गोली

कब: दिन में 2 बार


बिल्वादि चूर्ण

काम: stool binding, ग्रहणी strength

Dose: ½ चम्मच

कैसे: छाछ के साथ


4. Constipation dominant IBS (IBS-C)

त्रिफला चूर्ण

काम: bowel regulation

Dose: ½–1 चम्मच

कब: रात को, गुनगुने पानी के साथ


एरण्ड भृष्ट हरितकी

काम: hard stool, gas

Dose: 1–2 गोली

कब: रात में


5. मानसिक तनाव से जुड़ा IBS (Mind–Gut Connection)

Ayurveda IBS को सिर्फ पेट की बीमारी नहीं मानता।

Stress = अग्नि disturbance


ब्राह्मी वटी

काम: anxiety, overthinking

Dose: 1 गोली

कब: सुबह-शाम


अश्वगंधा चूर्ण

काम: nervous system support

Dose: 1/2 चम्मच

कैसे: गुनगुने पानी / दूध (दूध अगर suit करे)


7. Colon Healing & Strengthening

शंख वटी

काम: IBS pain, spasm

Dose: 1 गोली

कब: खाने के बाद


घृत (घी) चिकित्सा

पुराने IBS में


डॉक्टर की देखरेख में medicated ghee उपयोगी


बहुत ज़रूरी सावधानी

एक साथ बहुत सारी दवाएँ न लें

YouTube देखकर heavy रस-औषधि न शुरू करें

Pitta वाले व्यक्ति वात की दवा खुद से न लें


दोष, उम्र, strength और symptoms देखकर selection ज़रूरी है. Consult your local Ayurvedic Doctor.


आयुर्वेदिक Golden Rule (Charak)

“न हि सर्वेषु रोगेषु एकमेवौषधं हितम्”

हर रोगी के लिए एक ही दवा सही नहीं होती।


Bottom Line

IBS कोई single disease नहीं है।

ये गलत digestion + गलत lifestyle + गलत timing का result है।


हल्का खाना

regular timing

दोष के हिसाब से diet


दोष, उम्र, strength और symptoms देखकर medicine selection

और ज़रूरत पड़े तो Panchakarma

यही आयुर्वेद का रास्ता है।

Wednesday, February 4, 2026

नसों में ब्लॉकेज की शिकायत है

Ayurvedic heart care - अगर दिल, कोलेस्ट्रॉल या शुगर से जुड़ी परेशानी है - असरदार 5 Ayurvedic Tips , अगर आपको,


हार्ट से जुड़ी कोई दिक्कत है

कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ा हुआ है

नसों में ब्लॉकेज की शिकायत है

डायबिटीज या ब्लड प्रेशर है


तो ये POST आपके लिए बहुत काम का है।


इस में हम बात करेंगे 5 ऐसे आयुर्वेदिक उपायों की,

जो सिर्फ बीमारी को कंट्रोल करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि:


आने वाली बीमारियों को prevent करते हैं

healthy weight loss में मदद करते हैं

digestion को improve करते हैं

और lifestyle disorders की जड़ पर काम करते हैं


आयुर्वेद में “कोलेस्ट्रॉल” शब्द क्यों नहीं मिलता?

आयुर्वेद में भले ही “cholesterol” शब्द न हो,

लेकिन जिन बीमारियों को आज हम lifestyle disorders कहते हैं -

उनका पूरा वर्णन आयुर्वेद में मिलता है।


जैसे:


हाई ब्लड प्रेशर

डायबिटीज

हार्ट डिज़ीज

आर्टरी ब्लॉकेज

हाइपोथायरॉइड

मोटापा


आयुर्वेद इन्हें संतर्पणजन्य विकार मानता है —

यानी ऐसी बीमारियाँ जो गलत खान-पान और lifestyle से पैदा होती हैं।


कोलेस्ट्रॉल बढ़ा है या नहीं — कैसे पता चले?

इसके लिए एक simple सा टेस्ट है -

Lipid Profile


इसमें हमें पता चलता है:


Total Cholesterol

Triglycerides

LDL (Bad Cholesterol)

HDL (Good Cholesterol)


ध्यान रखने वाली बात ये है कि

हर कोलेस्ट्रॉल बुरा नहीं होता।


HDL = अच्छा कोलेस्ट्रॉल

LDL = वही जो नसों में चिपककर ब्लॉकेज बनाता है


LDL क्यों बढ़ता है?

कुछ common वजहें होती हैं:


ज़्यादा non-veg

ज़्यादा paneer, cheese, milk products

fried, bakery, junk, packaged food

sedentary lifestyle

exercise की कमी

ज़्यादा stress

नींद पूरी न होना

addictions

family history


LDL धीरे-धीरे arteries की inner wall पर जमने लगता है

और वहीं से blockage की शुरुआत होती है।


अब आते हैं आयुर्वेद के 5 असरदार उपायों पर

1. अर्जुन की छाल — हार्ट की best friend

Arjuna (Terminalia arjuna)

आयुर्वेद की सबसे भरोसेमंद हृदय औषधि है।


आयुर्वेद में इसे:


हृद्य कहा गया है

कफ-पित्त शमन करने वाला बताया गया है


ये:

चर्बी कम करता है

cholesterol deposition घटाता है

BP balance करता है

arteries को support करता है


कैसे लें?

Option 1: Powder


3–5 ग्राम (½–1 चम्मच)

दिन में 1–2 बार


Option 2: काढ़ा


½–1 चम्मच मोटा पाउडर

2 कप पानी → ½ कप बचने तक उबालें

सुबह खाली पेट

भूख लगने तक कुछ न खाएँ


Option 3: Arjunarishta


15–20 ml


खाने के बाद गुनगुने पानी के साथ


2. करेला + जामुन — शुगर और पित्त दोनों के लिए

अगर आपको Type-2 Diabetes है

या sugar control में नहीं रहती,

तो ये combo बहुत काम का है।


आयुर्वेद में:


करेला = Karavella

जामुन = Jambu


इनका रस:


blood sugar naturally कम करता है

blood purification करता है

acidity और पित्त को शांत करता है


सेवन विधि:

30 ml juice

30 ml पानी

दिन में 2 बार, खाने से पहले


अगर इसके साथ आंवला जूस भी जोड़ दें,

तो result और बेहतर मिलता है।


3. आंवला — immunity, metabolism और fat control

आंवला:


digestion सुधरता है

immunity boost करता है

hair fall कम करता है

skin और weight management में मदद करता है


सेवन:

30 ml juice

30 ml पानी

रोज़ाना


4. कुलथी (Horse Gram) — चर्बी और ब्लॉकेज के लिए

कुलथी:


तासीर में गर्म

वात-कफ शमन

मेद धातु (fat) कम करने वाली


कैसे लें?

Option 1: Powder


3–5 ग्राम


Option 2: Dal


4–5 घंटे भिगोकर

simple तड़के के साथ

 गर्म तासीर की वजह से मात्रा सीमित रखें।


5. Natural fasting + movement — सबसे underrated उपाय

Natural fasting कैसे?

रात खाना 7–7:30 तक


अगली सुबह भूख लगने तक कुछ न खाएँ


ये:


अपचित आहार हटाता है

fat metabolism improve करता है

cholesterol कम करने में मदद करता है


हफ्ते में 1 दिन:


एक ही समय खाना

बाकी समय फल


Exercise + Udvartana (उबटन)

आयुर्वेद दिनचर्या में कहता है:


व्यायाम - अग्नि बढ़ाता है

उदवर्तन - मेद धातु कम करता है


योग में:


सूर्य नमस्कार

पवनमुक्तासन

भुजंगासन

धनुरासन


उबटन:


बेसन + हल्दी + थोड़ा तेल/पानी

स्नान से पहले


Final Takeaway

ये 5 उपाय:


cholesterol

blockage

diabetes

BP

obesity


सब पर root level पर काम करते हैं।


अगर आप consistency से इन्हें अपनाएँ,

तो body खुद healing mode में चली जाती है।

यह युद्ध इंसान का है

 यह युद्ध इंसान का है

यह युद्ध स्त्री बनाम पुरुष का नहीं,

यह टकराव देहों का नहीं, नामों का नहीं।

यह लड़ाई है उन दीवारों से

जो सोच के भीतर चुपचाप खड़ी हैं,

और पीढ़ियों से हमें बाँटती आई हैं।


यह इंसान बनाम असमानता है

जहाँ एक को पंख मिलते हैं,

दूसरे को “मर्यादा” के नाम पर ज़मीन।

जहाँ सपनों का वज़न

लिंग से तौला जाता है,

और हौसलों पर ताले जड़ दिए जाते हैं।


यह इंसान बनाम डर है

वह डर जो लड़की को सिखाया जाता है

धीरे चलना, चुप रहना, सह जाना।

वह डर जो लड़के को सिखाया जाता है

रोना मत, झुकना मत, टूटना मत।

दोनों ही डर में पलते हैं,

दोनों ही अधूरे रह जाते हैं।


यह इंसान बनाम रूढ़ सोच है

जो कहती है

“तू यही कर सकता है”

और

“तू यह नहीं कर सकती।”

जो प्रेम को कमज़ोरी,

और संवेदना को दोष मानती है।


यह आवाज़ है हर उस इंसान की

जो बस इंसान की तरह जीना चाहता है

बिना सफ़ाई दिए,

बिना डर के,

बिना खुद को छोटा किए।


क्योंकि जब तक बराबरी को

माँग समझा जाएगा,

और सम्मान को एहसान

तब तक हार स्त्री की भी होगी,

और पुरुष की भी।


जीत उस दिन होगी

जब हम पूछेंगे नहीं

“वह स्त्री है या पुरुष?”

बल्कि कहेंगे

“वह इंसान है,

और इतना ही काफ़ी है।”

विरोध नहीं…न्याय की विनती है...

सेवक कहूं…या...चौकीदार कहूं…अपरिभाषित तुम…

 और आहत हैं हम...


सेवक कहूँ…

तो सेवा में जीवन अर्पित दिखते हो,


चौकीदार कहूँ…

तो रातों की नींदें गिरवी रखते हो।


राजा कहूँ…

तो ताज नहीं, ज़िम्मेदारियाँ उठाए चलते हो,


पहरेदार कहूँ…

तो सरहद-सा हर दर्द पर खड़े मिलते हो।


शब्द कम पड़ जाते हैं हर बार,

नाम से नहीं, काम से जाने जाते हो।


क्योंकि कुछ लोग

पद (position) से नहीं,

प्रयास (efforts) और परिणाम (results) से पहचाने जाते हैं।


तुमने वर्षों से उलझे भारत को धीरे-धीरे सुलझाया है…

इतिहास के पन्नों पर जब-जब भारत ने करवट ली है,

किसी ने तलवार उठाई, किसी ने कलम…

और किसी ने चुपचाप राष्ट्र को सींचा है अपने श्रम से।


तुम उन्हीं में से एक लगे 

जो बोले कम, deliver ज़्यादा करे।


सत्तर वर्षों की उलझनों को सुलझाया, जो गाँठें पीढ़ियाँ नहीं खोल पाईं, उन्हें तुमने साहस से खोला।


स्वाभिमान लौटाया, राम को उनका धाम दिलाया,

370 जैसी दशकों पुरानी दीवार गिराई,

कश्मीर को भारत का अभिमान बनाया।


Triple Talaq का अन्याय रोका, 

सीमा पर सेना को free hand दिया,

दुनिया के सामने झुकते भारत को सीना तानना सिखाया।


भारत को

soft state से

strong nation बनाया।


इतिहास की बहुत सी गलतियाँ सुधरीं…


पर साहब…!!

एक टीस अब भी बाकी है।


वो टीस

किसी जाति की नहीं,

किसी वर्ग की नहीं…


वो टीस है...

एक पिता की आँखों में,

एक माँ की चिंता में,

एक बच्चे के टूटते सपनों में।


जब

95% लाने वाला बच्चा

सिर्फ “सामान्य” कहलाकर पीछे रह जाता है,

और 60% वाला

सिर्फ “आरक्षित” कहलाकर आगे निकल जाता है…


तब दर्द नंबर का नहीं होता,

दर्द injustice का होता है।


साहब…

भूख जाति देखकर नहीं लगती,

गरीबी धर्म देखकर नहीं आती,

संघर्ष उपनाम पूछकर नहीं होता…


फिर अधिकार भी

जाति देखकर क्यों बाँटे जाते हैं…?


हम किसी का हक छीनना नहीं चाहते,

न किसी को पीछे धकेलना चाहते हैं…

पर अपने ही बच्चों के सपनों का गला घोंटकर

किसी और का भविष्य बनाना 

ये justice नहीं, विवशता है।


आरक्षण कभी सहारा था,

पर अब बैसाखी बन गया है।

और बैसाखियाँ

पीढ़ियाँ अपाहिज बना देती हैं।


हमें ऐसा भारत नहीं चाहिए

जहाँ बच्चे

जाति लिखकर सपने देखें…


हमें ऐसा भारत चाहिए

जहाँ identity सिर्फ एक हो 

Indian.


जहाँ

equal opportunity हो,

fair competition हो,

और success

मेहनत से मिले…

न कि certificate से।


साहब…!!

हम फिर वही भारत नहीं चाहते

जहाँ तुष्टिकरण policy हो,

जहाँ स्वाभिमान अपराध हो,

जहाँ मेहनती बच्चा ही guilty बना दिया जाए।


आपने बहुत मुश्किल से

इस राष्ट्र का सिर ऊँचा किया है…

अब उसे फिर से झुकते नहीं देख सकते।


और अंत में…

हम हमेशा से तेरे थे,

तेरे हैं

और तेरे ही रहेंगे…


क्योंकि...

उँगली को कमल के सिवा

दूसरा कोई स्पर्श पसंद ही नहीं…


लेकिन क्या करें,

जब दिल आहत हो,

मन मजबूर हो,

और अपने ही बच्चों का future धुंधला लगे 


तो आख़िर में NOTA ही दबाएँगे…

सुन लीजिए साहब…!! 

यही हमारा अंतिम सच है।


क्योंकि

हम किसी दल के नहीं,

न्याय, merit और इंसानियत के पक्षधर हैं।


हमें बस

आरक्षण नहीं…

equal rights वाला, इंसानियत भरा भारत चाहिए... #SONY


ये कोई प्रचार नहीं, कोई राजनीति नहीं,

कोई विद्वेष नहीं…ये बस एक आहत हृदय की आवाज़ है।

अगर शब्दों में सच्चाई लगे,तो इसे रोकिए मत…

आगे बढ़ाइए…क्योंकि ये विरोध नहीं…न्याय की विनती है।


राम नाम सत्य है

 नीचे एक विस्तृत, भावपूर्ण और आध्यात्मिक दृष्टि से गहन लंबा लेख प्रस्तुत है—शैली वही रखी गई है जो आप अक्सर पसंद करते हैं: कथा + दर्शन + जीवन-संदेश 🌿


🔥 “राम नाम सत्य है” — अंतिम यात्रा का उद्घोष या जीवन का परम सत्य? 🔥


🌼 भूमिका


भारतीय संस्कृति में कुछ वाक्य केवल शब्द नहीं होते, वे अनुभव, दर्शन और सत्य होते हैं।

“राम नाम सत्य है” ऐसा ही एक वाक्य है, जिसे हम प्रायः केवल अंतिम यात्रा से जोड़कर देखते हैं।

पर क्या यह वाक्य केवल मृत्यु के समय बोला जाने वाला एक मंत्र है?

या फिर यह पूरे जीवन का सबसे गहरा और अंतिम सत्य है?


जब कोई जीव इस संसार से विदा होता है, तब उसके साथ न धन जाता है, न संबंध, न शरीर—

तब केवल एक ही उद्घोष गूंजता है—

“राम नाम सत्य है।”



🕯️ मृत्यु के द्वार पर सत्य का उद्घाटन


मृत्यु जीवन की वह सच्चाई है जिसे कोई टाल नहीं सकता।

जीवन भर मनुष्य “मेरा” करता रहता है—

मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा सम्मान, मेरा शरीर।


पर जब अंतिम समय आता है,

तो यही “मेरा” शब्द सबसे पहले टूटता है।


श्मशान की राह पर चलते समय,

हर कदम यह स्मरण कराता है कि—


जो जन्मा है, उसका जाना निश्चित है।


और तभी यह उद्घोष उठता है—

“राम नाम सत्य है।”


यह वाक्य जीवितों को भी झकझोर देता है—

कि जो जा रहा है, वह भी कभी “मैं” था,

और जो पीछे खड़े हैं, वे भी एक दिन उसी मार्ग पर चलेंगे।



📜 गोस्वामी तुलसीदास जी और “राम नाम सत्य है” की कथा


लोक परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास जी से जुड़ी एक अत्यंत मार्मिक कथा प्रचलित है,

जो इस उद्घोष को केवल शब्द नहीं, जीवंत सत्य सिद्ध करती है।


🌿 कथा का सार


जब तुलसीदास जी प्रभु राम की भक्ति में लीन थे,

तब समाज ने उन्हें पाखंडी कहा, तिरस्कृत किया।

वे गंगा तट पर साधना में लीन हो गए।


उसी समय गाँव में एक नवविवाहित युवक की अचानक मृत्यु हो गई।

शवयात्रा निकली।

उसकी नववधू भी सती होने का निश्चय कर चुकी थी।


मार्ग में उसने एक ब्राह्मण को देखकर चरण स्पर्श किया—

और तुलसीदास जी के मुख से सहज ही निकल पड़ा—

“अखंड सौभाग्यवती भवः।”


लोग हँसे, उपहास किया—

“जिसका पति मर चुका, वह अखंड सौभाग्यवती कैसे?”


तब तुलसीदास जी ने कहा—


“मैं झूठा हो सकता हूँ,

पर मेरे राम कभी झूठे नहीं हो सकते।”


उन्होंने मृत युवक के कान में कहा—

“राम नाम सत्य है।”


एक बार—शरीर में कंपन

दूसरी बार—चेतना

तीसरी बार—प्राणों की वापसी


मृत युवक जीवित हो उठा।



✨ इस कथा का आध्यात्मिक अर्थ


यह कथा चमत्कार से अधिक चेतना का संदेश है।


“राम” यहाँ केवल दशरथ पुत्र नहीं हैं—

राम का अर्थ है— जो हर कण में रमण करता है।

जो सत्य है, जो चेतना है, जो आत्मा है।


“राम नाम सत्य है” का अर्थ हुआ—


ईश्वर ही सत्य है,

बाकी सब अस्थायी है।



🕉️ राम नाम का दर्शन


सनातन परंपरा में कहा गया है—


नाम और नामी में भेद नहीं होता।


राम का नाम लेने से—

 • मन शांत होता है

 • अहंकार गलता है

 • भय समाप्त होता है


इसलिए मृत्यु के समय भी—

जब शरीर साथ छोड़ देता है,

तब नाम ही जीव को थामता है।



🌾 जीवन में “राम नाम सत्य है” का अर्थ


यदि हम इस वाक्य को केवल मृत्यु तक सीमित कर दें,

तो यह अन्याय होगा।


वास्तविक संदेश यह है:


जीवन जीते हुए ही यह समझ लेना कि—

“जो कुछ दिख रहा है, वह स्थायी नहीं है।”


यदि मनुष्य जीवन में ही “राम नाम” को पकड़ ले—

 • तो मृत्यु भय नहीं बनती

 • तो दुःख बोझ नहीं लगता

 • तो अहंकार स्वतः गल जाता है



🔔 क्यों कहा जाता है शवयात्रा में यह वाक्य?

 1. मृत आत्मा को स्मरण कराने के लिए

— कि अब केवल ईश्वर ही सहारा है।

 2. जीवितों को चेताने के लिए

— कि समय सीमित है।

 3. अहंकार को तोड़ने के लिए

— क्योंकि श्मशान में सभी समान हैं।

 4. सत्य का उद्घोष करने के लिए

— कि इस संसार में केवल राम ही सत्य हैं।



🌺 निष्कर्ष: मृत्यु नहीं, स्मरण है “राम नाम सत्य है”


“राम नाम सत्य है” मृत्यु का घोष नहीं,

बल्कि जीवन का दर्पण है।


जो इसे जीवन में समझ लेता है—

उसे मृत्यु डराती नहीं।


और जो इसे केवल शवयात्रा में सुनता है—

वह बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझा रहता है।


🙏

जीवन का सार यही है—


राम को जीवन में पकड़ लो,

मृत्यु अपने आप सरल हो जाएगी।


🚩 ।। राम नाम सत्य है ।।

🚩 ।। जय सियाराम ।।



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🔥 “राम नाम सत्य है” — अंतिम यात्रा का उद्घोष या जीवन का परम सत्य? 🔥


🌼 भूमिका


भारतीय संस्कृति में कुछ वाक्य केवल शब्द नहीं होते, वे अनुभव, दर्शन और सत्य होते हैं।

“राम नाम सत्य है” ऐसा ही एक वाक्य है, जिसे हम प्रायः केवल अंतिम यात्रा से जोड़कर देखते हैं।

पर क्या यह वाक्य केवल मृत्यु के समय बोला जाने वाला एक मंत्र है?

या फिर यह पूरे जीवन का सबसे गहरा और अंतिम सत्य है?


जब कोई जीव इस संसार से विदा होता है, तब उसके साथ न धन जाता है, न संबंध, न शरीर—

तब केवल एक ही उद्घोष गूंजता है—

“राम नाम सत्य है।”



🕯️ मृत्यु के द्वार पर सत्य का उद्घाटन


मृत्यु जीवन की वह सच्चाई है जिसे कोई टाल नहीं सकता।

जीवन भर मनुष्य “मेरा” करता रहता है—

मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा सम्मान, मेरा शरीर।


पर जब अंतिम समय आता है,

तो यही “मेरा” शब्द सबसे पहले टूटता है।


श्मशान की राह पर चलते समय,

हर कदम यह स्मरण कराता है कि—


जो जन्मा है, उसका जाना निश्चित है।


और तभी यह उद्घोष उठता है—

“राम नाम सत्य है।”


यह वाक्य जीवितों को भी झकझोर देता है—

कि जो जा रहा है, वह भी कभी “मैं” था,

और जो पीछे खड़े हैं, वे भी एक दिन उसी मार्ग पर चलेंगे।



📜 गोस्वामी तुलसीदास जी और “राम नाम सत्य है” की कथा


लोक परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास जी से जुड़ी एक अत्यंत मार्मिक कथा प्रचलित है,

जो इस उद्घोष को केवल शब्द नहीं, जीवंत सत्य सिद्ध करती है।


🌿 कथा का सार


जब तुलसीदास जी प्रभु राम की भक्ति में लीन थे,

तब समाज ने उन्हें पाखंडी कहा, तिरस्कृत किया।

वे गंगा तट पर साधना में लीन हो गए।


उसी समय गाँव में एक नवविवाहित युवक की अचानक मृत्यु हो गई।

शवयात्रा निकली।

उसकी नववधू भी सती होने का निश्चय कर चुकी थी।


मार्ग में उसने एक ब्राह्मण को देखकर चरण स्पर्श किया—

और तुलसीदास जी के मुख से सहज ही निकल पड़ा—

“अखंड सौभाग्यवती भवः।”


लोग हँसे, उपहास किया—

“जिसका पति मर चुका, वह अखंड सौभाग्यवती कैसे?”


तब तुलसीदास जी ने कहा—


“मैं झूठा हो सकता हूँ,

पर मेरे राम कभी झूठे नहीं हो सकते।”


उन्होंने मृत युवक के कान में कहा—

“राम नाम सत्य है।”


एक बार—शरीर में कंपन

दूसरी बार—चेतना

तीसरी बार—प्राणों की वापसी


मृत युवक जीवित हो उठा।



✨ इस कथा का आध्यात्मिक अर्थ


यह कथा चमत्कार से अधिक चेतना का संदेश है।


“राम” यहाँ केवल दशरथ पुत्र नहीं हैं—

राम का अर्थ है— जो हर कण में रमण करता है।

जो सत्य है, जो चेतना है, जो आत्मा है।


“राम नाम सत्य है” का अर्थ हुआ—


ईश्वर ही सत्य है,

बाकी सब अस्थायी है।



🕉️ राम नाम का दर्शन


सनातन परंपरा में कहा गया है—


नाम और नामी में भेद नहीं होता।


राम का नाम लेने से—

 • मन शांत होता है

 • अहंकार गलता है

 • भय समाप्त होता है


इसलिए मृत्यु के समय भी—

जब शरीर साथ छोड़ देता है,

तब नाम ही जीव को थामता है।



🌾 जीवन में “राम नाम सत्य है” का अर्थ


यदि हम इस वाक्य को केवल मृत्यु तक सीमित कर दें,

तो यह अन्याय होगा।


वास्तविक संदेश यह है:


जीवन जीते हुए ही यह समझ लेना कि—

“जो कुछ दिख रहा है, वह स्थायी नहीं है।”


यदि मनुष्य जीवन में ही “राम नाम” को पकड़ ले—

 • तो मृत्यु भय नहीं बनती

 • तो दुःख बोझ नहीं लगता

 • तो अहंकार स्वतः गल जाता है



🔔 क्यों कहा जाता है शवयात्रा में यह वाक्य?

 1. मृत आत्मा को स्मरण कराने के लिए

— कि अब केवल ईश्वर ही सहारा है।

 2. जीवितों को चेताने के लिए

— कि समय सीमित है।

 3. अहंकार को तोड़ने के लिए

— क्योंकि श्मशान में सभी समान हैं।

 4. सत्य का उद्घोष करने के लिए

— कि इस संसार में केवल राम ही सत्य हैं।



🌺 निष्कर्ष: मृत्यु नहीं, स्मरण है “राम नाम सत्य है”


“राम नाम सत्य है” मृत्यु का घोष नहीं,

बल्कि जीवन का दर्पण है।


जो इसे जीवन में समझ लेता है—

उसे मृत्यु डराती नहीं।


और जो इसे केवल शवयात्रा में सुनता है—

वह बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझा रहता है।


🙏

जीवन का सार यही है—


राम को जीवन में पकड़ लो,

मृत्यु अपने आप सरल हो जाएगी।


🚩 ।। राम नाम सत्य है ।।

🚩 ।। जय सियाराम ।।

Heart, Kidney और Liver

Diabetic Food Guide - Heart, Kidney और Liver Complications के बचाव की Diet - डायबिटीज़ में सही डाइट क्या होनी चाहिए? शुगर कंट्रोल, वजन कंट्रोल और लंबी उम्र का फॉर्मूला डायबिटीज़ के मरीज़ को आखिर खाना क्या चाहिए, ताकि:


ब्लड शुगर कंट्रोल में रहे

वजन बढ़े नहीं

और आगे चलकर हार्ट, किडनी, लिवर जैसी गंभीर बीमारियाँ न हों


इस पूरी डाइट को हम कहते हैं -

2000 कैलोरी डायबिटिक डाइट


खाना असल में बनता किससे है?

हम जो भी खाते हैं, वो mainly तीन चीज़ों से बना होता है:


कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrate)

प्रोटीन (Protein)

फैट (Fat)


अब ध्यान से समझिए —

ब्लड शुगर सबसे ज़्यादा किससे बढ़ती है?


कार्बोहाइड्रेट से


क्यों?

क्योंकि कार्बोहाइड्रेट आखिरकार टूटकर ग्लूकोज़ (शुगर) बनते हैं।


कार्बोहाइड्रेट किन-किन चीज़ों में होते हैं?

लगभग हर आम खाने वाली चीज़ में:


अनाज (Grains)

गेहूं

चावल

मक्का

ज्वार, बाजरा, रागी

ओट्स, क्विनोआ, कुट्टू

सिंघाड़े का आटा


स्टार्च वाली सब्ज़ियाँ

आलू

शकरकंद

कॉर्न

कद्दू

अरबी

कमल ककड़ी


 फल

सारे फल में फ्रक्टोज़ होता है (यानी शुगर)


दूध और दूध से बनी चीज़ें

दूध, दही, छाछ

100 ml दूध में लगभग 5 ग्राम कार्बोहाइड्रेट


दालें

चना, मसूर, मूंग —

लगभग 50% कार्बोहाइड्रेट


मीठे सूखे मेवे

खजूर, किशमिश, अंजीर


इसलिए अगर शुगर कंट्रोल करनी है,

तो सबसे पहले कार्बोहाइड्रेट पर कंट्रोल ज़रूरी है।


प्रोटीन का रोल क्या है?

प्रोटीन शरीर बनाने के लिए ज़रूरी है।


अच्छे प्रोटीन सोर्स:

पनीर

अंडा

चिकन

मछली

अच्छी क्वालिटी सोयाबीन


सही मात्रा में प्रोटीन:


शुगर नहीं बढ़ाता

पेट देर तक भरा रखता है

वजन कंट्रोल करता है


कितना प्रोटीन?

1 ग्राम प्रति किलो बॉडी वेट

(अगर किडनी की समस्या हो तो थोड़ा कम)


फैट से डरना बंद करो

यह सबसे बड़ा myth है।


Healthy Fats:

घी

मक्खन

सरसों का तेल

नारियल तेल

तिल का तेल

Extra virgin olive oil


ये:


शुगर नहीं बढ़ाते

वजन नहीं बढ़ाते

हार्ट के लिए safe होते हैं


हमारे दादा-परदादा रोज़ घी खाते थे,

फिर भी हार्ट अटैक rare था।


ड्राय फ्रूट्स और बीज – डायबिटीज़ के दोस्त

ड्राय फ्रूट्स (Daily)

3 अखरोट

15–20 बादाम

8–10 काजू

मूंगफली


काजू से शुगर बढ़ती है — ये झूठ है

100 ग्राम काजू में सिर्फ 26g carbs

जबकि आटे में 70g होते हैं।


हेल्दी बीज

अलसी (Flaxseed) – 3 चम्मच

चिया सीड्स

कद्दू के बीज


ये:


शुगर नहीं बढ़ाते

कब्ज नहीं होने देते

हार्ट को मजबूत बनाते हैं


कम कार्ब आटा – सबसे ज़रूरी बदलाव

अगर रोटी छोड़ नहीं सकते,

तो आटा बदलो।


घर पर Low Carb आटा कैसे बनाएं:

1/2  किलो गेहूं / ज्वार / रागी

1/2  किलो मूंगफली पिसी हुई

1/2  किलो नारियल पाउडर


इससे बनी रोटी:


शुगर बहुत कम बढ़ाएगी

पेट भरा रखेगी


एक normal गेहूं की रोटी

40–50 पॉइंट शुगर बढ़ा देती है

Low carb रोटी

5–10 पॉइंट से ज़्यादा नहीं


कितने कार्बोहाइड्रेट खाने चाहिए?

आजकल लोग:

250 ग्राम carbs रोज़ खाते हैं


लेकिन सही मात्रा:

130 ग्राम/day


उसमें से:


अनाज से सिर्फ 60g

बाकी दूध, दाल, फल से


दिन की शुरुआत कैसे करें?

सुबह:

बिना चीनी की चाय / कॉफी

Full cream दूध (पेट भरेगा)


साथ में:


ड्राय फ्रूट्स

अंडा / पनीर


पेट फैट से भरेगा

तो आप कम रोटी खाओगे


क्या नहीं खाना है (बहुत ज़रूरी)

बिस्किट (कोई भी)

नमकीन, रस्क

पैकेज्ड फूड

कोल्ड ड्रिंक, जूस

फ्रेंच फ्राइज, समोसा

रिफाइंड तेल (सोया, सनफ्लावर)


 ये:


लिवर फैटी करते हैं

सूजन बढ़ाते हैं

हार्ट अटैक, कैंसर का रिस्क बढ़ाते हैं


खाने की टाइमिंग

अगर शुगर की दवा लेते हैं:


दिन में सिर्फ 2 बार खाना


सुबह 10 बजे

रात 8–9 बजे


बार-बार खाने से:


शरीर में inflammation


फैटी लिवर

डायबिटीज़ बिगड़ती है


फल खाने का सही तरीका

फल ज़रूरी नहीं हैं

सब पोषण सब्ज़ियों से मिल जाता है


फिर भी:


150 ग्राम/day से ज़्यादा नहीं

जूस कभी नहीं

पूरा फल ही खाओ


आख़िरी बात – याद रखो

कार्ब कम

प्रोटीन ठीक

फैट से डर नहीं

नेचुरल खाना

कम बार खाना


इस तरह:


शुगर कंट्रोल

वजन घटेगा

हार्ट, किडनी, लिवर सुरक्षित