Thursday, February 5, 2026

नारी चुंबकीय शक्ति

नारी जितना पुरुष के संसर्ग में आती है वह उतनी ही चुंबकीय शक्ति का क्षरण करती जाती है।🌹 


चुंबकीय शक्ति ही आद्याशक्ति है जिसे अंतर्निहित करके काम शक्ति को आत्मशक्ति में परिवर्तित किया जाता है। यह शक्ति दो केंद्रों में विलीन होती है। प्रथमत: मूलाधार चक्र में, जहां से यह ऊर्जा जननेंद्रिय के मार्ग से नीचे प्रवाहित होकर प्रकृति में विलीन हो जाती है और यदि यही ऊर्जा भौंहों के मध्य स्‍थि‍त आज्ञा चक्र से जब ऊपर को प्रवाहित होती है तो सहस्रार स्‍थि‍त ब्रह्म से एकीकृत हो जाती है।


इसलिए कुंआरी कन्या का प्रयोग तंत्र साधना में उसकी शक्ति की सहायता से दैहिक सुख प्राप्त करने हेतु नहीं, ‍अपितु उसे भैरवी रूप में प्रतिष्ठित करके ब्रह्म से सायुज्य प्राप्त करने हेतु किया जाता है।


यह संपूर्ण संसार द्वंद्वात्मक है, मिथुनजन्य है एवं इसके समस्त पदार्थ स्त्री तथा पुरुष में विभाजित हैं। इन दोनों के बीच आकर्षण शक्ति ही संसार के अस्तित्व का मूलाधार है जिसे आदि शंकराचार्यजी ने सौंदर्य लहरी के प्रथम श्लोक में व्यक्त किया है।


शिव:शक्तया युक्तो यदि भवति शक्त: प्रभवितुं।

न चेदेवं देवो न खलु कुशल: स्पन्दितुमपि। 


यह आकर्षण ही कामशक्ति है जिसे तंत्र में आदिशक्ति कहा गया है। यह परंपरागत पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) में से एक है। तंत्र शास्त्र के अनुसार नारी इसी आदिशक्ति का साकार प्रतिरूप है। षटचक्र भेदन व तंत्र साधना में स्त्री की उपस्थिति अनिवार्य है, क्योंकि साधना स्थूल शरीर द्वारा न होकर सूक्ष्म शरीर द्वारा ही संभव है।


तंत्र साधना का यौनक्रिया सामान्य यौनक्रिया नही है, इस यौनक्रिया में प्रेम का संबंध होता है,जो सूक्ष्म शरीर द्वारा ही संभव है। सामान्य यौनक्रिया बस वासना से प्रेरित होता है जो सिर्फ स्थूल शरीर का अनुभव है। तंत्र साधना में यौनक्रिया द्वारा भैरव अपने हृदय की ऊर्जा को अपने भैरवी के हृदय में उतरता हैं और दो आत्माओं के बीच ऊर्जा का एक बंध बन जाता है


तंत्र साधना में यौनक्रिया के लिए, आपको मानसिक, शारीरिक और वाचिक रूप से पवित्र होना पड़ेगा, आपके हृदय में प्रेम, श्रद्धा और समर्पण होना चाहिए, वासना नही, क्योंकि तंत्र साधना में यौनक्रिया बहुत ही उच्च कोटि के साधक साधिकाओं के लिए है जिसका उद्देश्य सिर्फ और अपने इष्ट से सायुज्य प्राप्त करना होता है।


ज्यादातर साधना इस प्रकार की हैं कि वो बस व्यक्तिगत ही हैं, मतलब सिर्फ एक व्यक्ति ही आध्यात्मिक उन्नति कर सकता है और उसके लिए भी उसे सन्यास की जरूरत होगी


लेकिन तंत्र एकमात्र ऐसी साधना है जिसमे पति पत्नी साथ में आध्यात्मिक उन्नति कर सकते हैं, तंत्र साधना गृहस्थ और सन्यासी दोनों के लिए अलग अलग मार्ग से है, लेकिन इस साधना के लिए पति पत्नी के बीच गहरा और निस्वार्थ प्रेम आवश्यक है और दोनों का ही ईश्वर के लिए श्रद्धा, विश्वास और समर्पण भी आवश्यक है


हमारे शरीर में X तथा Y दो क्रोमोसोम पाए जाते हैं, अर्थात हमारे अंदर स्त्री और पुरुष दोनों के गुण मौजूद हैं। हमारे सूक्ष्म शरीर भी स्त्री तत्व और पुरुष तत्व दो तत्व से मिलकर बना है, स्त्री तत्व को शक्ति और पुरुष तत्व को शिव कहा गया है। मोक्ष के लिए जरूरी है कि हमारे दोनों तत्व व्यवस्थित हो जाए और ऊर्जा के प्रबाह के लिए मार्ग खुल जाए जिसे हम कुंडलिनी जागरण भी कहते हैं


तंत्र साधना में पुरुष और स्त्री की आबश्यकता का एक और कारण यह है कि स्त्री में पुरुष तत्व का जागरण करने के लिए पुरुष अपनी पुरुषत्व की ऊर्जा स्त्री में यौनक्रिया के माध्यम से प्रबाहित करता है जिससे जो पुरुष तत्व स्त्री में सुप्त था उसका जागरण हो जाये। स्त्री भी इसी प्रकार पुरूष का स्त्री तत्व जगाने में मदद करती है जो अर्धनारीश्वर का स्वरूप है।


प्रेम के बहुत सारे स्तर होते हैं, प्रेम का स्तर जितना सूक्ष्म होता जाएगा, प्रेम उतना ही पवित्र और आध्यात्मिक उन्नति उतनी ही प्रबल होती जाएगी क्योंकि ईश्वर प्रेमस्वरूप ही हैं। जो मनुष्य केवल शारिरिक प्रेम करता है, उसे बस कुछ छणों के लिए आनंद की प्राप्ति होती है, जिस मानव का प्रेम थोड़ा सूक्ष्म होकर मानसिक हो गया है वो थोड़ा अधिक आनंद का अनुभव करेगा पर जिस मानव ने अपनी स्वयं की चेतना में उतरकर अध्यत्मिक प्रेम का विकास कर लिया उसके आनंद का वर्णन संभव ही नही है


शारीरिक और मानसिक प्रेम में वासना की प्रधानता रहती है परंतु आध्यात्मिक प्रेम में बस प्रेम ही रहता है, वासना का अस्तित्व ही समाप्त हो जाता है, फिर तो जो आनंद हृदय में महसूस होता है वो इस संसार के सब सुखों से हज़ारों गुना ज्यादा है


तंत्र एक बेहद पवित्र मार्ग है, प्रेम से भरा हुआ मार्ग और यह मार्ग स्वयं शिव ने दिया है जिनसे पवित्र इस संसार में कुछ भी नही है

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