Thursday, February 5, 2026

स्त्री-पुरुष समानता

 "स्त्री-पुरुष समानता: शब्दों से आगे की वास्तविकता"


महिलाओं के विषय में लिखते समय मैं किसी प्रकार की राय थोपने या किसी व्यक्ति के चरित्र पर निर्णय देने का दावा नहीं करता। मेरा मानना है कि किसी भी समाज में स्त्री और पुरुष दोनों ही पहले इंसान हैं, और इंसान होने के नाते उनके अधिकार समान होने चाहिए। यह समानता केवल संविधान, भाषणों या नारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि जीवन की वास्तविक परिस्थितियों में दिखाई देनी चाहिए।


समान अधिकार का अर्थ क्या केवल कानून है?


आज हम “समान अधिकार” शब्द का उपयोग बहुत सहजता से करते हैं, लेकिन अक्सर यह शब्द व्यवहार में खोखला साबित होता है। वास्तविक समानता का अर्थ है 50-50 भागीदारी न केवल अधिकारों में, बल्कि अवसरों और स्वतंत्रताओं में भी।


यदि कोई लड़का अकेले घर से बाहर यात्रा कर सकता है, तो वही स्वतंत्रता लड़की को भी मिलनी चाहिए।

यदि किसी परियोजना, शोध या निर्णय-प्रक्रिया में लड़कों की भागीदारी स्वाभाविक मानी जाती है, तो लड़कियों की भागीदारी को भी उतना ही सामान्य और आवश्यक समझा जाना चाहिए।

रोज़गार, शिक्षा, राजनीति, व्यापार हर क्षेत्र में समान अवसर केवल काग़ज़ पर नहीं, बल्कि ज़मीन पर दिखने चाहिए।


समानता के नाम पर महिलाओं का “उपयोग”


दुर्भाग्य से, हमारे देश ही नहीं बल्कि विश्व के कई देशों में महिलाओं को समान अधिकार देने के नाम पर अक्सर अपने हितों के अनुसार उपयोग किया जाता है। जब सुविधाजनक हो, तब “महिला सशक्तिकरण” की बात होती है, और जब सत्ता, पूँजी या नीति-निर्माण की बात आती है, तब महिलाएँ पीछे रह जाती हैं।


हॉलीवुड की 2023 में आई फ़िल्म Barbie इसी सच्चाई की ओर इशारा करती है कि कैसे पुरुष-प्रधान संरचनाएँ अपने साम्राज्य और व्यवस्था को बनाए रखने के लिए महिलाओं की छवि, श्रम और भावनाओं का इस्तेमाल करती हैं, लेकिन वास्तविक शक्ति अपने पास ही रखती हैं। यह केवल फ़िल्म की कहानी नहीं, बल्कि समाज का आईना है।


नीति-निर्माण में महिलाओं की अनुपस्थिति


आज सबसे बड़ा और ज़रूरी सवाल यह है कि

राजनीतिक और व्यावसायिक नीति-निर्माण में महिलाओं की वास्तविक भागीदारी कितनी है?


जहाँ कानून बनाए जाते हैं, योजनाएँ तय होती हैं, बजट और प्राथमिकताएँ निर्धारित होती हैं वहाँ महिलाओं की उपस्थिति प्रतिशत में भी बहुत कम है। जब निर्णय लेने की मेज़ पर महिलाएँ होंगी ही नहीं, तो क्या उनके अनुभवों, ज़रूरतों और सुरक्षा से जुड़े मुद्दों पर न्यायपूर्ण फैसले लिए जा सकते हैं?


महिला के जीवन की वास्तविक चुनौतियाँ सुरक्षा, स्वास्थ्य, कार्यस्थल पर सम्मान, मातृत्व और करियर का संतुलन इन सबको वही बेहतर समझ सकती है जो इन्हें जीती है।


"विकसित देश की असली परिभाषा"


किसी देश का विकास केवल उसकी अर्थव्यवस्था, तकनीक या सैन्य शक्ति से नहीं आँका जा सकता।

जिस देश में महिलाओं को जितना सम्मान, सुरक्षा और समान अधिकार मिलते हैं वही देश वास्तव में विकसित है।


"एक विकसित समाज वह होता है जहाँ....


स्त्री को बोझ नहीं, सहयोगी माना जाता है


उसकी स्वतंत्रता पर शक नहीं, विश्वास किया जाता है


और उसे “महिला” होने से पहले “इंसान” समझा जाता है


विकसित देश वही है जो इंसान को इंसान मानता है लिंग के आधार पर नहीं, बल्कि गरिमा के आधार पर।


स्त्री-पुरुष समानता कोई दया नहीं, कोई एहसान नहीं, बल्कि एक मौलिक आवश्यकता है। जब तक यह समानता व्यवहार, सोच और सत्ता-संरचनाओं में नहीं उतरेगी, तब तक समाज अधूरा रहेगा।


सच्ची समानता वही है जहाँ अधिकार माँगने नहीं पड़ें, बल्कि स्वाभाविक रूप से मिलें क्योंकि वे इंसान होने के नाते पहले से ही मिलने चाहिए।


ज़िंदगी किसी के लिए एक-सी कभी नहीं रहती, क्योंकि समय हर व्यक्ति को अलग-अलग कसौटियों पर परखता है। कोई आज शिखर पर होता है तो कल साधारण राहों पर, और कोई संघर्षों के अँधेरों से निकलकर उजाले की ओर बढ़ता है। हर इंसान की तक़दीर अलग होती है, इसलिए तुलना और घमंड दोनों ही निरर्थक हैं। जो आज हमारे पास है, वह स्थायी नहीं, बस एक पड़ाव है, जिसे समय जब चाहे बदल सकता है।


इंसान चाहे कितने ही रूप बदल ले....वेश, हैसियत या सोच के,

पर शीशा हर बार उसे उसकी सच्चाई से रू-बरू करा देता है। बाहरी पहचान बदल सकती है, पर भीतर की छवि वही रहती है, वही चेहरा जो आत्मा की गहराइयों में बसता है। जब यह सत्य समझ में आ जाता है, तब घमंड पिघल जाता है और मन में विनम्रता जन्म लेती है, क्योंकि अंततः इंसान वही होता है, जो वह स्वयं से छुपा नहीं सकता।




No comments:

Post a Comment