Wednesday, February 4, 2026

यह युद्ध इंसान का है

 यह युद्ध इंसान का है

यह युद्ध स्त्री बनाम पुरुष का नहीं,

यह टकराव देहों का नहीं, नामों का नहीं।

यह लड़ाई है उन दीवारों से

जो सोच के भीतर चुपचाप खड़ी हैं,

और पीढ़ियों से हमें बाँटती आई हैं।


यह इंसान बनाम असमानता है

जहाँ एक को पंख मिलते हैं,

दूसरे को “मर्यादा” के नाम पर ज़मीन।

जहाँ सपनों का वज़न

लिंग से तौला जाता है,

और हौसलों पर ताले जड़ दिए जाते हैं।


यह इंसान बनाम डर है

वह डर जो लड़की को सिखाया जाता है

धीरे चलना, चुप रहना, सह जाना।

वह डर जो लड़के को सिखाया जाता है

रोना मत, झुकना मत, टूटना मत।

दोनों ही डर में पलते हैं,

दोनों ही अधूरे रह जाते हैं।


यह इंसान बनाम रूढ़ सोच है

जो कहती है

“तू यही कर सकता है”

और

“तू यह नहीं कर सकती।”

जो प्रेम को कमज़ोरी,

और संवेदना को दोष मानती है।


यह आवाज़ है हर उस इंसान की

जो बस इंसान की तरह जीना चाहता है

बिना सफ़ाई दिए,

बिना डर के,

बिना खुद को छोटा किए।


क्योंकि जब तक बराबरी को

माँग समझा जाएगा,

और सम्मान को एहसान

तब तक हार स्त्री की भी होगी,

और पुरुष की भी।


जीत उस दिन होगी

जब हम पूछेंगे नहीं

“वह स्त्री है या पुरुष?”

बल्कि कहेंगे

“वह इंसान है,

और इतना ही काफ़ी है।”

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