Wednesday, February 4, 2026

विरोध नहीं…न्याय की विनती है...

सेवक कहूं…या...चौकीदार कहूं…अपरिभाषित तुम…

 और आहत हैं हम...


सेवक कहूँ…

तो सेवा में जीवन अर्पित दिखते हो,


चौकीदार कहूँ…

तो रातों की नींदें गिरवी रखते हो।


राजा कहूँ…

तो ताज नहीं, ज़िम्मेदारियाँ उठाए चलते हो,


पहरेदार कहूँ…

तो सरहद-सा हर दर्द पर खड़े मिलते हो।


शब्द कम पड़ जाते हैं हर बार,

नाम से नहीं, काम से जाने जाते हो।


क्योंकि कुछ लोग

पद (position) से नहीं,

प्रयास (efforts) और परिणाम (results) से पहचाने जाते हैं।


तुमने वर्षों से उलझे भारत को धीरे-धीरे सुलझाया है…

इतिहास के पन्नों पर जब-जब भारत ने करवट ली है,

किसी ने तलवार उठाई, किसी ने कलम…

और किसी ने चुपचाप राष्ट्र को सींचा है अपने श्रम से।


तुम उन्हीं में से एक लगे 

जो बोले कम, deliver ज़्यादा करे।


सत्तर वर्षों की उलझनों को सुलझाया, जो गाँठें पीढ़ियाँ नहीं खोल पाईं, उन्हें तुमने साहस से खोला।


स्वाभिमान लौटाया, राम को उनका धाम दिलाया,

370 जैसी दशकों पुरानी दीवार गिराई,

कश्मीर को भारत का अभिमान बनाया।


Triple Talaq का अन्याय रोका, 

सीमा पर सेना को free hand दिया,

दुनिया के सामने झुकते भारत को सीना तानना सिखाया।


भारत को

soft state से

strong nation बनाया।


इतिहास की बहुत सी गलतियाँ सुधरीं…


पर साहब…!!

एक टीस अब भी बाकी है।


वो टीस

किसी जाति की नहीं,

किसी वर्ग की नहीं…


वो टीस है...

एक पिता की आँखों में,

एक माँ की चिंता में,

एक बच्चे के टूटते सपनों में।


जब

95% लाने वाला बच्चा

सिर्फ “सामान्य” कहलाकर पीछे रह जाता है,

और 60% वाला

सिर्फ “आरक्षित” कहलाकर आगे निकल जाता है…


तब दर्द नंबर का नहीं होता,

दर्द injustice का होता है।


साहब…

भूख जाति देखकर नहीं लगती,

गरीबी धर्म देखकर नहीं आती,

संघर्ष उपनाम पूछकर नहीं होता…


फिर अधिकार भी

जाति देखकर क्यों बाँटे जाते हैं…?


हम किसी का हक छीनना नहीं चाहते,

न किसी को पीछे धकेलना चाहते हैं…

पर अपने ही बच्चों के सपनों का गला घोंटकर

किसी और का भविष्य बनाना 

ये justice नहीं, विवशता है।


आरक्षण कभी सहारा था,

पर अब बैसाखी बन गया है।

और बैसाखियाँ

पीढ़ियाँ अपाहिज बना देती हैं।


हमें ऐसा भारत नहीं चाहिए

जहाँ बच्चे

जाति लिखकर सपने देखें…


हमें ऐसा भारत चाहिए

जहाँ identity सिर्फ एक हो 

Indian.


जहाँ

equal opportunity हो,

fair competition हो,

और success

मेहनत से मिले…

न कि certificate से।


साहब…!!

हम फिर वही भारत नहीं चाहते

जहाँ तुष्टिकरण policy हो,

जहाँ स्वाभिमान अपराध हो,

जहाँ मेहनती बच्चा ही guilty बना दिया जाए।


आपने बहुत मुश्किल से

इस राष्ट्र का सिर ऊँचा किया है…

अब उसे फिर से झुकते नहीं देख सकते।


और अंत में…

हम हमेशा से तेरे थे,

तेरे हैं

और तेरे ही रहेंगे…


क्योंकि...

उँगली को कमल के सिवा

दूसरा कोई स्पर्श पसंद ही नहीं…


लेकिन क्या करें,

जब दिल आहत हो,

मन मजबूर हो,

और अपने ही बच्चों का future धुंधला लगे 


तो आख़िर में NOTA ही दबाएँगे…

सुन लीजिए साहब…!! 

यही हमारा अंतिम सच है।


क्योंकि

हम किसी दल के नहीं,

न्याय, merit और इंसानियत के पक्षधर हैं।


हमें बस

आरक्षण नहीं…

equal rights वाला, इंसानियत भरा भारत चाहिए... #SONY


ये कोई प्रचार नहीं, कोई राजनीति नहीं,

कोई विद्वेष नहीं…ये बस एक आहत हृदय की आवाज़ है।

अगर शब्दों में सच्चाई लगे,तो इसे रोकिए मत…

आगे बढ़ाइए…क्योंकि ये विरोध नहीं…न्याय की विनती है।


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