Wednesday, February 4, 2026

नसों में ब्लॉकेज की शिकायत है

Ayurvedic heart care - अगर दिल, कोलेस्ट्रॉल या शुगर से जुड़ी परेशानी है - असरदार 5 Ayurvedic Tips , अगर आपको,


हार्ट से जुड़ी कोई दिक्कत है

कोलेस्ट्रॉल लेवल बढ़ा हुआ है

नसों में ब्लॉकेज की शिकायत है

डायबिटीज या ब्लड प्रेशर है


तो ये POST आपके लिए बहुत काम का है।


इस में हम बात करेंगे 5 ऐसे आयुर्वेदिक उपायों की,

जो सिर्फ बीमारी को कंट्रोल करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि:


आने वाली बीमारियों को prevent करते हैं

healthy weight loss में मदद करते हैं

digestion को improve करते हैं

और lifestyle disorders की जड़ पर काम करते हैं


आयुर्वेद में “कोलेस्ट्रॉल” शब्द क्यों नहीं मिलता?

आयुर्वेद में भले ही “cholesterol” शब्द न हो,

लेकिन जिन बीमारियों को आज हम lifestyle disorders कहते हैं -

उनका पूरा वर्णन आयुर्वेद में मिलता है।


जैसे:


हाई ब्लड प्रेशर

डायबिटीज

हार्ट डिज़ीज

आर्टरी ब्लॉकेज

हाइपोथायरॉइड

मोटापा


आयुर्वेद इन्हें संतर्पणजन्य विकार मानता है —

यानी ऐसी बीमारियाँ जो गलत खान-पान और lifestyle से पैदा होती हैं।


कोलेस्ट्रॉल बढ़ा है या नहीं — कैसे पता चले?

इसके लिए एक simple सा टेस्ट है -

Lipid Profile


इसमें हमें पता चलता है:


Total Cholesterol

Triglycerides

LDL (Bad Cholesterol)

HDL (Good Cholesterol)


ध्यान रखने वाली बात ये है कि

हर कोलेस्ट्रॉल बुरा नहीं होता।


HDL = अच्छा कोलेस्ट्रॉल

LDL = वही जो नसों में चिपककर ब्लॉकेज बनाता है


LDL क्यों बढ़ता है?

कुछ common वजहें होती हैं:


ज़्यादा non-veg

ज़्यादा paneer, cheese, milk products

fried, bakery, junk, packaged food

sedentary lifestyle

exercise की कमी

ज़्यादा stress

नींद पूरी न होना

addictions

family history


LDL धीरे-धीरे arteries की inner wall पर जमने लगता है

और वहीं से blockage की शुरुआत होती है।


अब आते हैं आयुर्वेद के 5 असरदार उपायों पर

1. अर्जुन की छाल — हार्ट की best friend

Arjuna (Terminalia arjuna)

आयुर्वेद की सबसे भरोसेमंद हृदय औषधि है।


आयुर्वेद में इसे:


हृद्य कहा गया है

कफ-पित्त शमन करने वाला बताया गया है


ये:

चर्बी कम करता है

cholesterol deposition घटाता है

BP balance करता है

arteries को support करता है


कैसे लें?

Option 1: Powder


3–5 ग्राम (½–1 चम्मच)

दिन में 1–2 बार


Option 2: काढ़ा


½–1 चम्मच मोटा पाउडर

2 कप पानी → ½ कप बचने तक उबालें

सुबह खाली पेट

भूख लगने तक कुछ न खाएँ


Option 3: Arjunarishta


15–20 ml


खाने के बाद गुनगुने पानी के साथ


2. करेला + जामुन — शुगर और पित्त दोनों के लिए

अगर आपको Type-2 Diabetes है

या sugar control में नहीं रहती,

तो ये combo बहुत काम का है।


आयुर्वेद में:


करेला = Karavella

जामुन = Jambu


इनका रस:


blood sugar naturally कम करता है

blood purification करता है

acidity और पित्त को शांत करता है


सेवन विधि:

30 ml juice

30 ml पानी

दिन में 2 बार, खाने से पहले


अगर इसके साथ आंवला जूस भी जोड़ दें,

तो result और बेहतर मिलता है।


3. आंवला — immunity, metabolism और fat control

आंवला:


digestion सुधरता है

immunity boost करता है

hair fall कम करता है

skin और weight management में मदद करता है


सेवन:

30 ml juice

30 ml पानी

रोज़ाना


4. कुलथी (Horse Gram) — चर्बी और ब्लॉकेज के लिए

कुलथी:


तासीर में गर्म

वात-कफ शमन

मेद धातु (fat) कम करने वाली


कैसे लें?

Option 1: Powder


3–5 ग्राम


Option 2: Dal


4–5 घंटे भिगोकर

simple तड़के के साथ

 गर्म तासीर की वजह से मात्रा सीमित रखें।


5. Natural fasting + movement — सबसे underrated उपाय

Natural fasting कैसे?

रात खाना 7–7:30 तक


अगली सुबह भूख लगने तक कुछ न खाएँ


ये:


अपचित आहार हटाता है

fat metabolism improve करता है

cholesterol कम करने में मदद करता है


हफ्ते में 1 दिन:


एक ही समय खाना

बाकी समय फल


Exercise + Udvartana (उबटन)

आयुर्वेद दिनचर्या में कहता है:


व्यायाम - अग्नि बढ़ाता है

उदवर्तन - मेद धातु कम करता है


योग में:


सूर्य नमस्कार

पवनमुक्तासन

भुजंगासन

धनुरासन


उबटन:


बेसन + हल्दी + थोड़ा तेल/पानी

स्नान से पहले


Final Takeaway

ये 5 उपाय:


cholesterol

blockage

diabetes

BP

obesity


सब पर root level पर काम करते हैं।


अगर आप consistency से इन्हें अपनाएँ,

तो body खुद healing mode में चली जाती है।

यह युद्ध इंसान का है

 यह युद्ध इंसान का है

यह युद्ध स्त्री बनाम पुरुष का नहीं,

यह टकराव देहों का नहीं, नामों का नहीं।

यह लड़ाई है उन दीवारों से

जो सोच के भीतर चुपचाप खड़ी हैं,

और पीढ़ियों से हमें बाँटती आई हैं।


यह इंसान बनाम असमानता है

जहाँ एक को पंख मिलते हैं,

दूसरे को “मर्यादा” के नाम पर ज़मीन।

जहाँ सपनों का वज़न

लिंग से तौला जाता है,

और हौसलों पर ताले जड़ दिए जाते हैं।


यह इंसान बनाम डर है

वह डर जो लड़की को सिखाया जाता है

धीरे चलना, चुप रहना, सह जाना।

वह डर जो लड़के को सिखाया जाता है

रोना मत, झुकना मत, टूटना मत।

दोनों ही डर में पलते हैं,

दोनों ही अधूरे रह जाते हैं।


यह इंसान बनाम रूढ़ सोच है

जो कहती है

“तू यही कर सकता है”

और

“तू यह नहीं कर सकती।”

जो प्रेम को कमज़ोरी,

और संवेदना को दोष मानती है।


यह आवाज़ है हर उस इंसान की

जो बस इंसान की तरह जीना चाहता है

बिना सफ़ाई दिए,

बिना डर के,

बिना खुद को छोटा किए।


क्योंकि जब तक बराबरी को

माँग समझा जाएगा,

और सम्मान को एहसान

तब तक हार स्त्री की भी होगी,

और पुरुष की भी।


जीत उस दिन होगी

जब हम पूछेंगे नहीं

“वह स्त्री है या पुरुष?”

बल्कि कहेंगे

“वह इंसान है,

और इतना ही काफ़ी है।”

विरोध नहीं…न्याय की विनती है...

सेवक कहूं…या...चौकीदार कहूं…अपरिभाषित तुम…

 और आहत हैं हम...


सेवक कहूँ…

तो सेवा में जीवन अर्पित दिखते हो,


चौकीदार कहूँ…

तो रातों की नींदें गिरवी रखते हो।


राजा कहूँ…

तो ताज नहीं, ज़िम्मेदारियाँ उठाए चलते हो,


पहरेदार कहूँ…

तो सरहद-सा हर दर्द पर खड़े मिलते हो।


शब्द कम पड़ जाते हैं हर बार,

नाम से नहीं, काम से जाने जाते हो।


क्योंकि कुछ लोग

पद (position) से नहीं,

प्रयास (efforts) और परिणाम (results) से पहचाने जाते हैं।


तुमने वर्षों से उलझे भारत को धीरे-धीरे सुलझाया है…

इतिहास के पन्नों पर जब-जब भारत ने करवट ली है,

किसी ने तलवार उठाई, किसी ने कलम…

और किसी ने चुपचाप राष्ट्र को सींचा है अपने श्रम से।


तुम उन्हीं में से एक लगे 

जो बोले कम, deliver ज़्यादा करे।


सत्तर वर्षों की उलझनों को सुलझाया, जो गाँठें पीढ़ियाँ नहीं खोल पाईं, उन्हें तुमने साहस से खोला।


स्वाभिमान लौटाया, राम को उनका धाम दिलाया,

370 जैसी दशकों पुरानी दीवार गिराई,

कश्मीर को भारत का अभिमान बनाया।


Triple Talaq का अन्याय रोका, 

सीमा पर सेना को free hand दिया,

दुनिया के सामने झुकते भारत को सीना तानना सिखाया।


भारत को

soft state से

strong nation बनाया।


इतिहास की बहुत सी गलतियाँ सुधरीं…


पर साहब…!!

एक टीस अब भी बाकी है।


वो टीस

किसी जाति की नहीं,

किसी वर्ग की नहीं…


वो टीस है...

एक पिता की आँखों में,

एक माँ की चिंता में,

एक बच्चे के टूटते सपनों में।


जब

95% लाने वाला बच्चा

सिर्फ “सामान्य” कहलाकर पीछे रह जाता है,

और 60% वाला

सिर्फ “आरक्षित” कहलाकर आगे निकल जाता है…


तब दर्द नंबर का नहीं होता,

दर्द injustice का होता है।


साहब…

भूख जाति देखकर नहीं लगती,

गरीबी धर्म देखकर नहीं आती,

संघर्ष उपनाम पूछकर नहीं होता…


फिर अधिकार भी

जाति देखकर क्यों बाँटे जाते हैं…?


हम किसी का हक छीनना नहीं चाहते,

न किसी को पीछे धकेलना चाहते हैं…

पर अपने ही बच्चों के सपनों का गला घोंटकर

किसी और का भविष्य बनाना 

ये justice नहीं, विवशता है।


आरक्षण कभी सहारा था,

पर अब बैसाखी बन गया है।

और बैसाखियाँ

पीढ़ियाँ अपाहिज बना देती हैं।


हमें ऐसा भारत नहीं चाहिए

जहाँ बच्चे

जाति लिखकर सपने देखें…


हमें ऐसा भारत चाहिए

जहाँ identity सिर्फ एक हो 

Indian.


जहाँ

equal opportunity हो,

fair competition हो,

और success

मेहनत से मिले…

न कि certificate से।


साहब…!!

हम फिर वही भारत नहीं चाहते

जहाँ तुष्टिकरण policy हो,

जहाँ स्वाभिमान अपराध हो,

जहाँ मेहनती बच्चा ही guilty बना दिया जाए।


आपने बहुत मुश्किल से

इस राष्ट्र का सिर ऊँचा किया है…

अब उसे फिर से झुकते नहीं देख सकते।


और अंत में…

हम हमेशा से तेरे थे,

तेरे हैं

और तेरे ही रहेंगे…


क्योंकि...

उँगली को कमल के सिवा

दूसरा कोई स्पर्श पसंद ही नहीं…


लेकिन क्या करें,

जब दिल आहत हो,

मन मजबूर हो,

और अपने ही बच्चों का future धुंधला लगे 


तो आख़िर में NOTA ही दबाएँगे…

सुन लीजिए साहब…!! 

यही हमारा अंतिम सच है।


क्योंकि

हम किसी दल के नहीं,

न्याय, merit और इंसानियत के पक्षधर हैं।


हमें बस

आरक्षण नहीं…

equal rights वाला, इंसानियत भरा भारत चाहिए... #SONY


ये कोई प्रचार नहीं, कोई राजनीति नहीं,

कोई विद्वेष नहीं…ये बस एक आहत हृदय की आवाज़ है।

अगर शब्दों में सच्चाई लगे,तो इसे रोकिए मत…

आगे बढ़ाइए…क्योंकि ये विरोध नहीं…न्याय की विनती है।


राम नाम सत्य है

 नीचे एक विस्तृत, भावपूर्ण और आध्यात्मिक दृष्टि से गहन लंबा लेख प्रस्तुत है—शैली वही रखी गई है जो आप अक्सर पसंद करते हैं: कथा + दर्शन + जीवन-संदेश 🌿


🔥 “राम नाम सत्य है” — अंतिम यात्रा का उद्घोष या जीवन का परम सत्य? 🔥


🌼 भूमिका


भारतीय संस्कृति में कुछ वाक्य केवल शब्द नहीं होते, वे अनुभव, दर्शन और सत्य होते हैं।

“राम नाम सत्य है” ऐसा ही एक वाक्य है, जिसे हम प्रायः केवल अंतिम यात्रा से जोड़कर देखते हैं।

पर क्या यह वाक्य केवल मृत्यु के समय बोला जाने वाला एक मंत्र है?

या फिर यह पूरे जीवन का सबसे गहरा और अंतिम सत्य है?


जब कोई जीव इस संसार से विदा होता है, तब उसके साथ न धन जाता है, न संबंध, न शरीर—

तब केवल एक ही उद्घोष गूंजता है—

“राम नाम सत्य है।”



🕯️ मृत्यु के द्वार पर सत्य का उद्घाटन


मृत्यु जीवन की वह सच्चाई है जिसे कोई टाल नहीं सकता।

जीवन भर मनुष्य “मेरा” करता रहता है—

मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा सम्मान, मेरा शरीर।


पर जब अंतिम समय आता है,

तो यही “मेरा” शब्द सबसे पहले टूटता है।


श्मशान की राह पर चलते समय,

हर कदम यह स्मरण कराता है कि—


जो जन्मा है, उसका जाना निश्चित है।


और तभी यह उद्घोष उठता है—

“राम नाम सत्य है।”


यह वाक्य जीवितों को भी झकझोर देता है—

कि जो जा रहा है, वह भी कभी “मैं” था,

और जो पीछे खड़े हैं, वे भी एक दिन उसी मार्ग पर चलेंगे।



📜 गोस्वामी तुलसीदास जी और “राम नाम सत्य है” की कथा


लोक परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास जी से जुड़ी एक अत्यंत मार्मिक कथा प्रचलित है,

जो इस उद्घोष को केवल शब्द नहीं, जीवंत सत्य सिद्ध करती है।


🌿 कथा का सार


जब तुलसीदास जी प्रभु राम की भक्ति में लीन थे,

तब समाज ने उन्हें पाखंडी कहा, तिरस्कृत किया।

वे गंगा तट पर साधना में लीन हो गए।


उसी समय गाँव में एक नवविवाहित युवक की अचानक मृत्यु हो गई।

शवयात्रा निकली।

उसकी नववधू भी सती होने का निश्चय कर चुकी थी।


मार्ग में उसने एक ब्राह्मण को देखकर चरण स्पर्श किया—

और तुलसीदास जी के मुख से सहज ही निकल पड़ा—

“अखंड सौभाग्यवती भवः।”


लोग हँसे, उपहास किया—

“जिसका पति मर चुका, वह अखंड सौभाग्यवती कैसे?”


तब तुलसीदास जी ने कहा—


“मैं झूठा हो सकता हूँ,

पर मेरे राम कभी झूठे नहीं हो सकते।”


उन्होंने मृत युवक के कान में कहा—

“राम नाम सत्य है।”


एक बार—शरीर में कंपन

दूसरी बार—चेतना

तीसरी बार—प्राणों की वापसी


मृत युवक जीवित हो उठा।



✨ इस कथा का आध्यात्मिक अर्थ


यह कथा चमत्कार से अधिक चेतना का संदेश है।


“राम” यहाँ केवल दशरथ पुत्र नहीं हैं—

राम का अर्थ है— जो हर कण में रमण करता है।

जो सत्य है, जो चेतना है, जो आत्मा है।


“राम नाम सत्य है” का अर्थ हुआ—


ईश्वर ही सत्य है,

बाकी सब अस्थायी है।



🕉️ राम नाम का दर्शन


सनातन परंपरा में कहा गया है—


नाम और नामी में भेद नहीं होता।


राम का नाम लेने से—

 • मन शांत होता है

 • अहंकार गलता है

 • भय समाप्त होता है


इसलिए मृत्यु के समय भी—

जब शरीर साथ छोड़ देता है,

तब नाम ही जीव को थामता है।



🌾 जीवन में “राम नाम सत्य है” का अर्थ


यदि हम इस वाक्य को केवल मृत्यु तक सीमित कर दें,

तो यह अन्याय होगा।


वास्तविक संदेश यह है:


जीवन जीते हुए ही यह समझ लेना कि—

“जो कुछ दिख रहा है, वह स्थायी नहीं है।”


यदि मनुष्य जीवन में ही “राम नाम” को पकड़ ले—

 • तो मृत्यु भय नहीं बनती

 • तो दुःख बोझ नहीं लगता

 • तो अहंकार स्वतः गल जाता है



🔔 क्यों कहा जाता है शवयात्रा में यह वाक्य?

 1. मृत आत्मा को स्मरण कराने के लिए

— कि अब केवल ईश्वर ही सहारा है।

 2. जीवितों को चेताने के लिए

— कि समय सीमित है।

 3. अहंकार को तोड़ने के लिए

— क्योंकि श्मशान में सभी समान हैं।

 4. सत्य का उद्घोष करने के लिए

— कि इस संसार में केवल राम ही सत्य हैं।



🌺 निष्कर्ष: मृत्यु नहीं, स्मरण है “राम नाम सत्य है”


“राम नाम सत्य है” मृत्यु का घोष नहीं,

बल्कि जीवन का दर्पण है।


जो इसे जीवन में समझ लेता है—

उसे मृत्यु डराती नहीं।


और जो इसे केवल शवयात्रा में सुनता है—

वह बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझा रहता है।


🙏

जीवन का सार यही है—


राम को जीवन में पकड़ लो,

मृत्यु अपने आप सरल हो जाएगी।


🚩 ।। राम नाम सत्य है ।।

🚩 ।। जय सियाराम ।।



यदि आप चाहें तो मैं इसी विषय पर:

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बस आदेश दीजिए 🌸 विस्तृत, भावपूर्ण और आध्यात्मिक दृष्टि से गहन लंबा लेख प्रस्तुत है—शैली वही रखी गई है जो आप अक्सर पसंद करते हैं: कथा + दर्शन + जीवन-संदेश 🌿



🔥 “राम नाम सत्य है” — अंतिम यात्रा का उद्घोष या जीवन का परम सत्य? 🔥


🌼 भूमिका


भारतीय संस्कृति में कुछ वाक्य केवल शब्द नहीं होते, वे अनुभव, दर्शन और सत्य होते हैं।

“राम नाम सत्य है” ऐसा ही एक वाक्य है, जिसे हम प्रायः केवल अंतिम यात्रा से जोड़कर देखते हैं।

पर क्या यह वाक्य केवल मृत्यु के समय बोला जाने वाला एक मंत्र है?

या फिर यह पूरे जीवन का सबसे गहरा और अंतिम सत्य है?


जब कोई जीव इस संसार से विदा होता है, तब उसके साथ न धन जाता है, न संबंध, न शरीर—

तब केवल एक ही उद्घोष गूंजता है—

“राम नाम सत्य है।”



🕯️ मृत्यु के द्वार पर सत्य का उद्घाटन


मृत्यु जीवन की वह सच्चाई है जिसे कोई टाल नहीं सकता।

जीवन भर मनुष्य “मेरा” करता रहता है—

मेरा घर, मेरा परिवार, मेरा सम्मान, मेरा शरीर।


पर जब अंतिम समय आता है,

तो यही “मेरा” शब्द सबसे पहले टूटता है।


श्मशान की राह पर चलते समय,

हर कदम यह स्मरण कराता है कि—


जो जन्मा है, उसका जाना निश्चित है।


और तभी यह उद्घोष उठता है—

“राम नाम सत्य है।”


यह वाक्य जीवितों को भी झकझोर देता है—

कि जो जा रहा है, वह भी कभी “मैं” था,

और जो पीछे खड़े हैं, वे भी एक दिन उसी मार्ग पर चलेंगे।



📜 गोस्वामी तुलसीदास जी और “राम नाम सत्य है” की कथा


लोक परंपरा में गोस्वामी तुलसीदास जी से जुड़ी एक अत्यंत मार्मिक कथा प्रचलित है,

जो इस उद्घोष को केवल शब्द नहीं, जीवंत सत्य सिद्ध करती है।


🌿 कथा का सार


जब तुलसीदास जी प्रभु राम की भक्ति में लीन थे,

तब समाज ने उन्हें पाखंडी कहा, तिरस्कृत किया।

वे गंगा तट पर साधना में लीन हो गए।


उसी समय गाँव में एक नवविवाहित युवक की अचानक मृत्यु हो गई।

शवयात्रा निकली।

उसकी नववधू भी सती होने का निश्चय कर चुकी थी।


मार्ग में उसने एक ब्राह्मण को देखकर चरण स्पर्श किया—

और तुलसीदास जी के मुख से सहज ही निकल पड़ा—

“अखंड सौभाग्यवती भवः।”


लोग हँसे, उपहास किया—

“जिसका पति मर चुका, वह अखंड सौभाग्यवती कैसे?”


तब तुलसीदास जी ने कहा—


“मैं झूठा हो सकता हूँ,

पर मेरे राम कभी झूठे नहीं हो सकते।”


उन्होंने मृत युवक के कान में कहा—

“राम नाम सत्य है।”


एक बार—शरीर में कंपन

दूसरी बार—चेतना

तीसरी बार—प्राणों की वापसी


मृत युवक जीवित हो उठा।



✨ इस कथा का आध्यात्मिक अर्थ


यह कथा चमत्कार से अधिक चेतना का संदेश है।


“राम” यहाँ केवल दशरथ पुत्र नहीं हैं—

राम का अर्थ है— जो हर कण में रमण करता है।

जो सत्य है, जो चेतना है, जो आत्मा है।


“राम नाम सत्य है” का अर्थ हुआ—


ईश्वर ही सत्य है,

बाकी सब अस्थायी है।



🕉️ राम नाम का दर्शन


सनातन परंपरा में कहा गया है—


नाम और नामी में भेद नहीं होता।


राम का नाम लेने से—

 • मन शांत होता है

 • अहंकार गलता है

 • भय समाप्त होता है


इसलिए मृत्यु के समय भी—

जब शरीर साथ छोड़ देता है,

तब नाम ही जीव को थामता है।



🌾 जीवन में “राम नाम सत्य है” का अर्थ


यदि हम इस वाक्य को केवल मृत्यु तक सीमित कर दें,

तो यह अन्याय होगा।


वास्तविक संदेश यह है:


जीवन जीते हुए ही यह समझ लेना कि—

“जो कुछ दिख रहा है, वह स्थायी नहीं है।”


यदि मनुष्य जीवन में ही “राम नाम” को पकड़ ले—

 • तो मृत्यु भय नहीं बनती

 • तो दुःख बोझ नहीं लगता

 • तो अहंकार स्वतः गल जाता है



🔔 क्यों कहा जाता है शवयात्रा में यह वाक्य?

 1. मृत आत्मा को स्मरण कराने के लिए

— कि अब केवल ईश्वर ही सहारा है।

 2. जीवितों को चेताने के लिए

— कि समय सीमित है।

 3. अहंकार को तोड़ने के लिए

— क्योंकि श्मशान में सभी समान हैं।

 4. सत्य का उद्घोष करने के लिए

— कि इस संसार में केवल राम ही सत्य हैं।



🌺 निष्कर्ष: मृत्यु नहीं, स्मरण है “राम नाम सत्य है”


“राम नाम सत्य है” मृत्यु का घोष नहीं,

बल्कि जीवन का दर्पण है।


जो इसे जीवन में समझ लेता है—

उसे मृत्यु डराती नहीं।


और जो इसे केवल शवयात्रा में सुनता है—

वह बार-बार जन्म-मृत्यु के चक्र में उलझा रहता है।


🙏

जीवन का सार यही है—


राम को जीवन में पकड़ लो,

मृत्यु अपने आप सरल हो जाएगी।


🚩 ।। राम नाम सत्य है ।।

🚩 ।। जय सियाराम ।।

Heart, Kidney और Liver

Diabetic Food Guide - Heart, Kidney और Liver Complications के बचाव की Diet - डायबिटीज़ में सही डाइट क्या होनी चाहिए? शुगर कंट्रोल, वजन कंट्रोल और लंबी उम्र का फॉर्मूला डायबिटीज़ के मरीज़ को आखिर खाना क्या चाहिए, ताकि:


ब्लड शुगर कंट्रोल में रहे

वजन बढ़े नहीं

और आगे चलकर हार्ट, किडनी, लिवर जैसी गंभीर बीमारियाँ न हों


इस पूरी डाइट को हम कहते हैं -

2000 कैलोरी डायबिटिक डाइट


खाना असल में बनता किससे है?

हम जो भी खाते हैं, वो mainly तीन चीज़ों से बना होता है:


कार्बोहाइड्रेट (Carbohydrate)

प्रोटीन (Protein)

फैट (Fat)


अब ध्यान से समझिए —

ब्लड शुगर सबसे ज़्यादा किससे बढ़ती है?


कार्बोहाइड्रेट से


क्यों?

क्योंकि कार्बोहाइड्रेट आखिरकार टूटकर ग्लूकोज़ (शुगर) बनते हैं।


कार्बोहाइड्रेट किन-किन चीज़ों में होते हैं?

लगभग हर आम खाने वाली चीज़ में:


अनाज (Grains)

गेहूं

चावल

मक्का

ज्वार, बाजरा, रागी

ओट्स, क्विनोआ, कुट्टू

सिंघाड़े का आटा


स्टार्च वाली सब्ज़ियाँ

आलू

शकरकंद

कॉर्न

कद्दू

अरबी

कमल ककड़ी


 फल

सारे फल में फ्रक्टोज़ होता है (यानी शुगर)


दूध और दूध से बनी चीज़ें

दूध, दही, छाछ

100 ml दूध में लगभग 5 ग्राम कार्बोहाइड्रेट


दालें

चना, मसूर, मूंग —

लगभग 50% कार्बोहाइड्रेट


मीठे सूखे मेवे

खजूर, किशमिश, अंजीर


इसलिए अगर शुगर कंट्रोल करनी है,

तो सबसे पहले कार्बोहाइड्रेट पर कंट्रोल ज़रूरी है।


प्रोटीन का रोल क्या है?

प्रोटीन शरीर बनाने के लिए ज़रूरी है।


अच्छे प्रोटीन सोर्स:

पनीर

अंडा

चिकन

मछली

अच्छी क्वालिटी सोयाबीन


सही मात्रा में प्रोटीन:


शुगर नहीं बढ़ाता

पेट देर तक भरा रखता है

वजन कंट्रोल करता है


कितना प्रोटीन?

1 ग्राम प्रति किलो बॉडी वेट

(अगर किडनी की समस्या हो तो थोड़ा कम)


फैट से डरना बंद करो

यह सबसे बड़ा myth है।


Healthy Fats:

घी

मक्खन

सरसों का तेल

नारियल तेल

तिल का तेल

Extra virgin olive oil


ये:


शुगर नहीं बढ़ाते

वजन नहीं बढ़ाते

हार्ट के लिए safe होते हैं


हमारे दादा-परदादा रोज़ घी खाते थे,

फिर भी हार्ट अटैक rare था।


ड्राय फ्रूट्स और बीज – डायबिटीज़ के दोस्त

ड्राय फ्रूट्स (Daily)

3 अखरोट

15–20 बादाम

8–10 काजू

मूंगफली


काजू से शुगर बढ़ती है — ये झूठ है

100 ग्राम काजू में सिर्फ 26g carbs

जबकि आटे में 70g होते हैं।


हेल्दी बीज

अलसी (Flaxseed) – 3 चम्मच

चिया सीड्स

कद्दू के बीज


ये:


शुगर नहीं बढ़ाते

कब्ज नहीं होने देते

हार्ट को मजबूत बनाते हैं


कम कार्ब आटा – सबसे ज़रूरी बदलाव

अगर रोटी छोड़ नहीं सकते,

तो आटा बदलो।


घर पर Low Carb आटा कैसे बनाएं:

1/2  किलो गेहूं / ज्वार / रागी

1/2  किलो मूंगफली पिसी हुई

1/2  किलो नारियल पाउडर


इससे बनी रोटी:


शुगर बहुत कम बढ़ाएगी

पेट भरा रखेगी


एक normal गेहूं की रोटी

40–50 पॉइंट शुगर बढ़ा देती है

Low carb रोटी

5–10 पॉइंट से ज़्यादा नहीं


कितने कार्बोहाइड्रेट खाने चाहिए?

आजकल लोग:

250 ग्राम carbs रोज़ खाते हैं


लेकिन सही मात्रा:

130 ग्राम/day


उसमें से:


अनाज से सिर्फ 60g

बाकी दूध, दाल, फल से


दिन की शुरुआत कैसे करें?

सुबह:

बिना चीनी की चाय / कॉफी

Full cream दूध (पेट भरेगा)


साथ में:


ड्राय फ्रूट्स

अंडा / पनीर


पेट फैट से भरेगा

तो आप कम रोटी खाओगे


क्या नहीं खाना है (बहुत ज़रूरी)

बिस्किट (कोई भी)

नमकीन, रस्क

पैकेज्ड फूड

कोल्ड ड्रिंक, जूस

फ्रेंच फ्राइज, समोसा

रिफाइंड तेल (सोया, सनफ्लावर)


 ये:


लिवर फैटी करते हैं

सूजन बढ़ाते हैं

हार्ट अटैक, कैंसर का रिस्क बढ़ाते हैं


खाने की टाइमिंग

अगर शुगर की दवा लेते हैं:


दिन में सिर्फ 2 बार खाना


सुबह 10 बजे

रात 8–9 बजे


बार-बार खाने से:


शरीर में inflammation


फैटी लिवर

डायबिटीज़ बिगड़ती है


फल खाने का सही तरीका

फल ज़रूरी नहीं हैं

सब पोषण सब्ज़ियों से मिल जाता है


फिर भी:


150 ग्राम/day से ज़्यादा नहीं

जूस कभी नहीं

पूरा फल ही खाओ


आख़िरी बात – याद रखो

कार्ब कम

प्रोटीन ठीक

फैट से डर नहीं

नेचुरल खाना

कम बार खाना


इस तरह:


शुगर कंट्रोल

वजन घटेगा

हार्ट, किडनी, लिवर सुरक्षित

वात दोष से होने वाली सामान्य परेशानियां

 Flaxseed Oil - Flaxseed oil - वात की बीमारियों का आयुर्वेदिक समाधान – अलसी का तेल - हम बात करेंगे वात दोष और उससे जुड़ी हर बीमारी के लिए एक सबसे प्रभावशाली तेल के बारे में। 


आयुर्वेद में जब भी किसी बीमारी का इलाज किया जाता है, उसका बेस होता है दोष – वात, पित्त और कफ। लेकिन इन तीनों में सबसे ताकतवर और नियंत्रक कौन है? इसका जवाब है वात।


वात इतना महत्वपूर्ण है कि मन, बुद्धि, इंद्रियां, हार्मोन्स और शरीर की हर छोटी-सी एक्टिविटी – जैसे अंगुली हिलना, पलक झपकना – सब वात नियंत्रित करता है।


वात दोष से होने वाली सामान्य परेशानियां


जोड़ों का दर्द (ऑस्टियोआर्थराइटिस, रुमेटॉइड आर्थराइटिस)

मसल्स सूखना, घुटनों का ग्रीस खत्म होना

पेट में गैस, कब्ज, मल कड़क होना

पीरियड्स के दौरान दर्द और सूखापन

ड्राई स्किन, ड्राई हेयर, डैंड्रफ

वजाइनल ड्राइनेस और संबंध के दौरान दर्द

कान में घंटी बजने जैसा साउंड, सिर दर्द, हेडेक


वात दोष से जुड़ी ये सारी परेशानियां शरीर में सूखापन और हल्का होने के कारण होती हैं।


आयुर्वेद में अलसी – अतिसी / Flax Seeds

नाम और पहचान:


हिंदी: अलसी

मराठी: जवस

अंग्रेजी: Flax Seeds

गुजरात: मुखवास के रूप में उपयोग


विशेषताएँ:


गुरु (भारी)

स्निग्ध (चिकना)

उष्ण प्रकृति


काम करने का तरीका:


वात जो हल्का, ठंडा और सूखा होता है, उसे भारी, चिकना और गर्म प्रकृति वाला अलसी तेल संतुलित करता है।

पेट, स्किन, हेयर और जोड़ों में सूखापन और दर्द को कम करता है।

मल को नरम करता है और कब्ज को दूर करता है।


अलसी के तेल के लाभ

1. पेट और मल संबंधी परेशानियां

कब्ज, कड़क मल, पेट में गैस


इस्तेमाल: 2 चम्मच अलसी का तेल + आधा चम्मच नींबू, गर्म करके खाने से राहत


2. त्वचा और मसल्स

ड्राई स्किन, एसी पंखे में बैठने से सूखापन, मसल्स कमजोरी


मालिश में इस्तेमाल करने से सूखापन और दर्द कम होता है


3. महिलाओं के लिए

पीरियड्स से पहले दर्द और क्रैंप

वजाइनल ड्राइनेस, संबंध के दौरान दर्द


उपयोग: बस्ती (एनिमा) या पिचू – कॉटन को तेल में भिगोकर 5–15 मिनट लगाने से राहत


4. पुरुषों के लिए

अत्यधिक हस्त मैथुन के कारण पेन या सूखापन

वृषण (टेस्टिस) और वेरिकोसाइल जैसी तकलीफें


5. जोड़ों और हड्डियों के लिए

घुटनों और एड़ियों का दर्द, सूखापन


मालिश करने से जोड़ और मसल्स मजबूत होते हैं


6. बाल और स्किन

ड्राई डैंड्रफ, सूखे बाल

एसी पंखे या ठंडी हवा से सिर दर्द


7. कैंसर में भी उपयोग

बुडविग प्रोटोकॉल के अनुसार, अलसी तेल और मक्खन रोगी को दिया जाता है

वात दोष के कारण अनियंत्रित सेल ग्रोथ को नियंत्रित करने में मदद


अलसी का तेल किसके लिए सही नहीं

पहले से कफ और पित्त अधिक होने वालों को एलसी तेल नहीं लेना चाहिए


जैसे एसिडिटी, ज्यादा पसीना, गर्मी, मुंह में छाले

आंखों की समस्या होने पर भी सीधा सेवन ना करें


सेफ्टी टिप:


मक्खन (देसी गाय का) के साथ लेने से एलसी तेल सुरक्षित बनता है

वात प्रकृति वाले लोग इसे रोज़ाना 1 चम्मच मक्खन के साथ ले सकते हैं


उपयोग का तरीका

ओरल सेवन:

1–2 चम्मच अलसी तेल + आधा चम्मच नींबू या मक्खन, खाने से पहले


मालिश:

जोड़ों, एड़ियों, मसल्स और ड्राई स्किन पर


पिचू / बस्ती:

वजाइनल ड्राइनेस, कब्ज और पेन के लिए

कॉटन को तेल में भिगोकर 5–15 मिनट प्रभावित जगह पर रखें


भुने बीज:


कब्ज या लूज मोशन रोकने के लिए

बालों और स्किन की मजबूती के लिए


Conclusion

वात से जुड़ी हर परेशानी – पेट, जोड़ों, स्किन, बाल, पीरियड्स, पुरुष या महिला की तकलीफ – में अलसी का तेल एक भारी, स्निग्ध और गर्म प्रकृति वाली आयुर्वेदिक दवा है।


रोज़ाना सेवन और सही तरीके से इस्तेमाल करने से वात दोष नियंत्रित होता है

शरीर में सूखापन, दर्द और कब्ज कम होते हैं

हड्डियों, मसल्स, बाल, स्किन और पेट की समस्याओं में सुधार आता है


टिप: हमेशा अपने दोष के अनुसार मात्रा और तरीका चुनें – पित्त और कफ ज्यादा होने पर सावधानी बरतें।


भारत के विकास की बाधाएँ

 सरकारी योजनाएँ, ज़मीनी सच्चाई और भारत के विकास की बाधाएँ "


भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में सरकार का सबसे बड़ा दायित्व यह होता है कि वह विकास की योजनाओं का लाभ सीधे देश की जनता तक पहुँचाए। केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष हज़ारों योजनाएँ बनाती हैं, लाखों–करोड़ों का बजट तय करती हैं और यह दावा करती हैं कि यह सब देश की जनता, विशेषकर युवाओं और वंचित वर्गों के लिए है।

लेकिन जब हम ज़मीनी हकीकत देखते हैं, तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है।


1. योजनाओं और ज़मीन के बीच की खाई


काग़ज़ों पर योजनाएँ आदर्श होती हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका प्रभाव बेहद सीमित दिखता है।


प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) जैसी योजनाओं में 20–30 हज़ार रुपये तक की अवैध वसूली आम बात बन चुकी है।


सड़क निर्माण में ठेकेदारों द्वारा आधा माल हजम कर लिया जाता है, जिससे सड़क कुछ ही वर्षों में टूटने लगती है।


बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए करोड़ों रुपये जारी होते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर वैसा विकास नज़र नहीं आता जैसा दिखना चाहिए।


युवाओं की इंटर्नशिप और स्किल डेवलपमेंट के लिए करोड़ों का बजट होता है, लेकिन वास्तविक लाभार्थियों की संख्या हज़ारों तक सिमट जाती है।


स्टार्टअप और इनोवेशन के लिए लाखों-करोड़ों की घोषणाएँ होती हैं, पर ज़मीनी स्तर पर बहुत कम युवा वास्तव में इस सहायता तक पहुँच पाते हैं।


यह स्पष्ट संकेत देता है कि समस्या केवल बजट की नहीं, बल्कि इम्प्लीमेंटेशन (क्रियान्वयन) की है।


2. दलाल तंत्र और सिस्टम की कमजोरियाँ


सरकार और जनता के बीच एक ऐसा दलाल तंत्र खड़ा हो गया है, जो योजनाओं का असली लाभ खुद हड़प लेता है।


कई बार दूसरे लोगों के घरों या प्रोजेक्ट्स की तस्वीरें खींचकर उन्हें अपने नाम से जोड़ दिया जाता है।


एक व्यक्ति की सुरक्षा और सुविधा के लिए बनाए गए नियम को तोड़ने के लिए कुछ लोग हज़ार नए रास्ते निकाल लेते हैं।


प्रशासनिक स्तर पर निगरानी की कमी और जवाबदेही का अभाव इस समस्या को और गहरा कर देता है।


नतीजा यह होता है कि ईमानदार और ज़रूरतमंद व्यक्ति सिस्टम से बाहर रह जाता है, जबकि चालाक व्यक्ति हर योजना का लाभ उठा लेता है।


3. जांच और कार्रवाई का अभाव


सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि:


जांच समय पर नहीं होती,


और जब होती भी है, तो कार्रवाई देर से या नाममात्र की होती है।


यदि किसी योजना में भ्रष्टाचार सामने आता है, तो उसे उदाहरण बनाकर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि सिस्टम में डर और जवाबदेही दोनों बने। लेकिन ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है।


4. सरकार को चाहिए नया विज़न और समर्पित टीम


अब समय आ गया है कि सरकार केवल योजनाएँ बनाने तक सीमित न रहे, बल्कि:


एक स्वतंत्र और प्रोफेशनल निगरानी टीम बनाए,


जो यह देखे कि पैसा कहाँ, कैसे और किसके द्वारा खर्च किया जा रहा है,


हर प्रोजेक्ट की रियल-टाइम रिपोर्ट और फ़ोटो/वीडियो ऑनलाइन सार्वजनिक की जाए,


ताकि आम नागरिक भी निगरानी कर सके।


यह पारदर्शिता भ्रष्टाचार की जड़ पर सीधा प्रहार करेगी।


5. युवाओं और इनोवेशन के लिए खुला मंच


यदि भारत को सच में विश्व गुरु बनना है, तो सरकार को हर क्षेत्र में नए विचारों के लिए दरवाज़े खोलने होंगे...


विज्ञान


दवाई और स्वास्थ्य


शिक्षा


सामाजिक विज्ञान


ध्यान, योग और मानसिक स्वास्थ्य


दर्शन


व्यापार और स्टार्टअप


सरकार को ऐसा सरल, पारदर्शी और तेज़ प्लेटफॉर्म बनाना चाहिए जहाँ कोई भी युवा अपना विज़न प्रस्तुत कर सके।

अगर वह विज़न वास्तव में देश और दुनिया में सकारात्मक बदलाव ला सकता है, तो सरकार को:


आर्थिक सहायता,


प्रशासनिक सहयोग,


और कानूनी संरक्षण

हर स्तर पर देना चाहिए।


6. आउटकम आधारित गवर्नेंस की ज़रूरत


सरकार को अब यह सवाल खुद से पूछना होगा


क्या वर्तमान योजनाओं से वैसा आउटकम मिल रहा है जैसा लक्ष्य रखा गया था?


अगर नहीं, तो कहाँ चूक हो रही है?


पिछली कई योजनाओं के परिणाम यह दिखाते हैं कि:


जहाँ लाखों युवाओं को लाभ मिलना था,


वहाँ केवल कुछ हज़ार ही लाभान्वित हो पाए।


यह सीधा संकेत है कि सिस्टम में गंभीर त्रुटियाँ हैं।


7. विश्व गुरु बनने का असली रास्ता


भारत केवल योजनाओं, भाषणों और काग़ज़ी दावों से विश्व गुरु नहीं बन सकता।

इसके लिए ज़रूरी है...


ज़मीनी स्तर पर ईमानदार इम्प्लीमेंटेशन,


युवाओं को सीधा और सरल लाभ,


उन्हें प्रेरणा, अवसर और विश्वास देना,


और सबसे बढ़कर, एक स्पष्ट और साहसी विज़न।


जब सरकार पूरे देश को सहज बनाएगी, युवाओं को आगे बढ़ने का मंच देगी और भ्रष्टाचार पर सख़्ती से वार करेगी

तभी भारत सच में नवाचार, ज्ञान और नेतृत्व का केंद्र बन सकेगा।


विजन के बिना विकास नहीं होता, और ईमानदार इम्प्लीमेंटेशन के बिना कोई भी विज़न सफल नहीं हो सकता।

Tuesday, February 3, 2026

मिट्टी, इमारतों, सड़कों और शरीर

 हम जिस दुनिया में जीते हैं, वो केवल मिट्टी, इमारतों, सड़कों और शरीरों से नहीं बनी। उसका एक बड़ा हिस्सा हमारे सोचने के तरीके से जन्म लेता है। जो कुछ हमने देखा, सहा, खोया, पाया, उसी की स्मृतियाँ मिलकर विचार बनती हैं। फिर उन्हीं विचारों से हम भविष्य की कल्पना करते हैं, संबंधों की परिभाषा गढ़ते हैं, और अपने होने का अर्थ तय करते हैं। हमें लगता है कि हम दुनिया को देख रहे हैं, पर अक्सर हम सिर्फ अपनी स्मृतियों की परछाइयों को देख रहे होते हैं।


ये सोच बहुत पुरानी होती है, पर हमें हर दिन नई लगती है। क्योंकि हर सुबह हम उसी मानसिक ढांचे के साथ उठते हैं, जिसे हमने बरसों में तैयार किया है। उसमें सुरक्षा के नाम पर डर जमा होता है, पहचान के नाम पर सीमाएँ बनती हैं, और सही होने की इच्छा के नाम पर दूसरों से दूरी। हम इन सबको स्वाभाविक मान लेते हैं, जैसे ये जीवन का हिस्सा हों, जबकि असल में ये विचारों का विस्तार होते हैं।


धीरे धीरे ये सोच इतनी ठोस लगने लगती है कि हमें लगता है, इसके बाहर कुछ है ही नहीं। जो भी अलग दिखता है, वो खतरा बन जाता है। जो भी हमारे जैसा नहीं सोचता, वो अजनबी हो जाता है। इस तरह हम एक ऐसी दुनिया में रहने लगते हैं, जो बाहर से बड़ी दिखती है, पर भीतर से बहुत संकरी होती है।


विचार से बनी हुई सीमाएँ:


धर्म, राष्ट्र, संस्कृति, परंपरा, विचारधारा, ये सब विचार की ही संतान हैं। शुरू में शायद इनका जन्म किसी समझ या सुविधा से हुआ होगा, पर समय के साथ ये पहचान बन गईं। पहचान, जो कहती है, मैं ये हूँ, और तुम वो हो। इसी एक रेखा से विभाजन पैदा होता है। बिना हथियार उठाए भी हम रोज़ किसी न किसी को अपने से बाहर कर देते हैं।


ये सीमाएँ केवल देशों के नक्शों पर नहीं होतीं, हमारे भीतर भी खिंची होती हैं। हम अपने मन में तय कर लेते हैं कि कौन अपना है, कौन पराया। कौन सही है, कौन गलत। और फिर उसी हिसाब से देखना शुरू कर देते हैं। देखने से पहले ही फैसला तैयार होता है। इस तरह वास्तविकता देखने से पहले ही हम उसे ढाल लेते हैं।


डर इसी ढांचे में पनपता है। डर कि मेरी पहचान टूट न जाए, मेरा समूह कमजोर न हो जाए, मेरी सोच गलत साबित न हो जाए। इस डर को हम तर्क, नैतिकता और परंपरा के कपड़े पहनाते हैं, ताकि वो सभ्य लगे। पर भीतर वो डर ही रहता है, जो किसी भी असहमति को खतरा समझता है।


हम कहते हैं कि दुनिया में हिंसा है, पर शायद हिंसा की जड़ ये विचार हैं, जो अलगाव पैदा करते हैं। जब मैं खुद को केंद्र मानता हूँ, तब हर दूसरा या तो उपयोगी होता है, या बाधा। बीच की जगह बहुत कम बचती है।


मानसिक वास्तविकता का जाल:


समय के साथ हम एक ऐसी दुनिया में रहने लगते हैं, जो बाहर से कम और भीतर से ज्यादा बनी होती है। हमारा दुख, हमारी खुशी, हमारा अपमान, हमारा गर्व, सब विचारों की व्याख्या पर टिका होता है। कोई एक शब्द कह देता है, और हम घंटों परेशान रहते हैं। कोई छोटी सी तारीफ मिल जाती है, और हम खुद को बड़ा मानने लगते हैं।


ये सब एक तरह की मानसिक वास्तविकता है। इसमें घटनाएँ कम, उनकी व्याख्या ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। दो लोग एक ही स्थिति से गुजरते हैं, पर एक टूट जाता है, दूसरा शांत रहता है। फर्क घटना में नहीं, सोच में होता है।


हम इस सोच को अपनी सुरक्षा समझते हैं। लगता है कि अगर हमने सब कुछ समझ लिया, वर्गीकृत कर लिया, नाम दे दिए, तो हम सुरक्षित हैं। पर असल में ये सुरक्षा बहुत नाजुक होती है। एक खबर, एक दुर्घटना, एक अस्वीकृति, और पूरा ढांचा हिल जाता है।


इसलिए हम लगातार खुद को व्यस्त रखते हैं। नई जानकारी, नई बहस, नए लक्ष्य, ताकि भीतर की अस्थिरता को महसूस न करना पड़े। हम भागते रहते हैं, और उसे प्रगति का नाम देते हैं।


देखने का आमंत्रण:


कुछ दृष्टिकोण हमें रुकने को कहते हैं। न मानने को, न विरोध करने को, बस देखने को। ये देखने का अर्थ आंखों से देखना नहीं, बल्कि ये देखना कि हम कैसे सोचते हैं, कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, कैसे डरते हैं, कैसे किसी एक पहचान से चिपक जाते हैं।


जब हम खुद को देखते हैं, बिना सफाई दिए, बिना दोष डाले, तब एक अजीब बात होती है। सोच थोड़ी धीमी पड़ती है। जैसे किसी नदी की धार अचानक शांत हो जाए। उस क्षण हमें पता चलता है कि हम और हमारी सोच अलग नहीं हैं। जो उलझन है, वो बाहर नहीं, भीतर है।


ये देखना कोई तकनीक नहीं है। इसमें कोई अभ्यास नहीं, कोई मंज़िल नहीं। ये बस ईमानदारी है। ये मान लेना कि जो कुछ चल रहा है, वो देखा जा सकता है, बदले बिना भी।


इस देखने में कोई सुधार की योजना नहीं होती। जैसे ही हम सुधार की सोचते हैं, सोच फिर नियंत्रण बन जाती है। पर जब हम सिर्फ देखते हैं, तब नियंत्रण गिरने लगता है।


विचार के पार का मौन:


कभी कभी, बहुत छोटे क्षणों के लिए, सोच रुकती है। शायद किसी गहरी थकान में, या किसी अप्रत्याशित सुंदरता को देखते हुए। उस समय कोई टिप्पणी नहीं चलती, कोई तुलना नहीं होती। बस जो है, वो है।


ये क्षण दुर्लभ नहीं हैं, पर हम उन्हें पकड़ने की कोशिश में खो देते हैं। जैसे ही हम कहते हैं, ये अच्छा है, इसे फिर चाहिए, सोच लौट आती है, और मौन खत्म हो जाता है।


पर ये क्षण एक इशारा हैं कि जीवन केवल सोच से नहीं बना। सोच जीवन का एक औज़ार है, मालिक नहीं। जब औज़ार मालिक बन जाता है, तब समस्या शुरू होती है।


विचार के पार कोई स्वर्ग नहीं, कोई अलौकिक अनुभव नहीं, बल्कि एक सादगी होती है। जिसमें कोई केंद्र नहीं होता, कोई विशेष व्यक्ति नहीं होता, कोई तुलना नहीं होती।


उस सादगी में डर को टिकने की जगह नहीं मिलती, क्योंकि डर भविष्य की कल्पना से बनता है। वहाँ संघर्ष नहीं होता, क्योंकि संघर्ष दो छवियों के टकराव से पैदा होता है।


बिना दीवारों की दुनिया:


अगर सोच की बनाई दीवारें ढीली पड़ें, तो दुनिया वैसी नहीं रहती जैसी हमें सिखाई गई है। तब कोई देश दुश्मन नहीं लगता, कोई धर्म श्रेष्ठ नहीं लगता, कोई विचार अंतिम सत्य नहीं लगता।


इसका अर्थ ये नहीं कि समाज खत्म हो जाएगा, या नियम टूट जाएंगे। इसका अर्थ बस इतना है कि भीतर का विभाजन कम हो जाएगा। और जब भीतर का विभाजन कम होता है, तो बाहर का भी असर बदलने लगता है।


हम अक्सर बड़ी क्रांतियों की बात करते हैं, व्यवस्था बदलने की, सत्ता पलटने की। पर शायद सबसे गहरी क्रांति ये है कि हम अपनी सोच को देखें, बिना उसे सजाए, बिना उसे बचाए।


ये देखना आसान नहीं, क्योंकि इसमें हमारी सारी सुरक्षा हिलती है। हमारी पहचान, हमारी श्रेष्ठता, हमारी शिकायतें, सब सवालों में आ जाती हैं।


पर इसी असहजता में एक नई तरह की शांति छिपी होती है। ऐसी शांति, जो किसी विचार पर टिकी नहीं, किसी उपलब्धि पर निर्भर नहीं, किसी तुलना से बनी नहीं।


और शायद इसी शांति में वो जीवन संभव है, जो स्पष्ट है, जो बोझ से हल्का है, जो किसी विचारधारा का प्रचार नहीं करता, बस खुद होकर जीता है।


जहाँ सोच होती है, पर राज नहीं करती।

जहाँ पहचान होती है, पर दीवार नहीं बनती।

जहाँ जीवन किसी सिद्धांत की परीक्षा नहीं, बल्कि एक खुली साँस की तरह घटता है।

नार्सिसिस्ट रिश्ते

 नार्सिसिस्ट रिश्ते

आपकी आत्मा को एक झटके में नहीं तोड़ते।

वे आपको धीरे-धीरे पहले आपके सर्कल, और फिर आपसे भी दूर कर देते हैं।


पहले आपकी हँसी बदलती है।

फिर आपकी पसंद।

फिर आपकी चुप्पी बढ़ने लगती है।


और एक दिन ऐसा आता है …

आप आईने में खुद को देखकर पूछती हैं -


“मैं असल में हूँ कौन?”

" मैं ऐसी तो नहीं थी "


यह प्रश्न सामान्य नहीं होता।

यह आपकी आत्मा की वह पुकार होती है

जिसे आपने किसी और को बचाने के लिए

खुद से ही दबा दिया होता है।


मनोविज्ञान इसे कहता है -

Identity Diffusion।


जब कोई स्त्री लंबे समय तक -


अपनी इच्छाओं को दबाती है


“ना” कहना भूल जाती है


हर टकराव से बचती है


हर गलती खुद पर ले लेती है


तो उसकी पहचान धुंधली होने लगती है।


धीरे-धीरे वह भूल जाती है -


“मैं क्या चाहती हूँ?”

और ये केवल जानती है कि -


“उसे क्या चाहिए?”


यहीं से आत्म-विस्मृति शुरू होती है।


सबसे बड़ा प्रश्न : आप निकल क्यों नहीं पातीं?


आप जानती हैं वह गलत है।

फिर भी आपका मन नहीं मानता।


क्यों?


क्योंकि यह रिश्ता

केवल भावनात्मक नहीं होता -

यह एक मानसिक सम्मोहन होता है।


मानव मन की प्रकृति : किसी विशेष चीज की प्राप्ति का आनंद 


कोई ऐसी चीज जो विशेष हो, उसकी प्राप्ति या उसका जीवन मे होना किसी भी मनुष्य को आनंद से भर देता है -


जैसे : -


किसी असाधारण व्यक्ति से प्रेम का मिलना 


विशेष मान्यता का मिलना 


“मैं खास हूँ” का एहसास 


अथवा किसी मूल्यवान वस्तु का स्वामित्व होना 


इनकी प्राप्ति के लिए मनुष्य अथक परिश्रम या कोई भी कीमत देने को, हर दुःख उठाने को तैयार हो जाता है। क्यूँ कि उस से प्राप्त आनंद (540Hz frequency) अतुलनीय होती है 


और एक Narcissist इतनी अच्छी ऐक्टिंग करता है, की वो एक स्त्री को उपरोक्त चारों अह्सास खुद के बारे मे करा देता है।


अब वह Narcissist केवल प्रेमी नही रहा, बल्कि उस स्त्री के लिए एक ऐसा अनमोल चीज हो जाता है जैसे कोई अनमोल "हीरा", जिसे दुनिया पहचान नही सकी और उसने हासिल कर लिया।


एक उदाहरण से उस स्त्री की मानसिक अवस्था को बेहतर समझ सकते हैं -


मान लीजिए किसी को

एक नकली हीरा मिल जाए।


जो देखने में बिल्कुल असली जैसा हो।


दस विशेषज्ञ कहें -

“यह नकली है।”


फिर भी वह व्यक्ति मानेगा नहीं।


क्यों?


क्योंकि उसका मन

पहले ही मान चुका है -


“मेरे पास कुछ बहुत कीमती है।”


"शायद बताने वाला ही मुझे गुमराह करना चाहता है" 


ठीक यही स्थिति

नार्सिसिस्ट रिश्ते में होती है। 


आपके सामने सच होता है -

लोग चेतावनी देते हैं -

संकेत मिलते हैं -

दर्द बढ़ता है -


फिर भी मन कहता है -


“नहीं… वह ऐसा नहीं हो सकता।”

"मेरा मन जानता है "

“वह अंदर से अच्छा है।”

“वह बदलेगा।”

“गलती मेरी है।”


वह मनुष्य एक स्त्री के नज़र में इतना अनमोल होता है कि, हज़ारों दर्द के बावजूद वो उसे खोना नहीं चाहती। बार बार Narcissist द्वारा अपमानित और प्रताड़ित होने के बाद भी उसका आकर्षण खत्म नही होता।


क्या करें?


ऐसी स्थिति से निकलने की पहली शर्त है भ्रम का टूटना।

जब तक भ्रम नहीं टूटता,

Healing शुरू ही नहीं होती।


सवाल खुद से पूछिए,


जिस रिश्ते को पाने में -


आपकी नींद चली गई


आत्म-सम्मान टूट गया


मानसिक शांति खत्म हो गई


आत्मविश्वास मर गया


आप खुद तिल तिल मर रही हैं 


ऐसे में यदि वो हीरा असली भी है, तो उस “हीरे” का आप करेंगी क्या? उसका उपयोग क्या है आपके जीवन मे?


क्या कोई चीज़

आपकी जान से ज्यादा कीमती है?


नहीं।


कभी नहीं।


निष्पक्ष दृष्टि रखें : सच्चाई का आईना


अब खुद से ईमानदारी से पूछिए 


अगर किसी रिश्ते में आपके हिस्से में -


केवल तनाव है


केवल डर है


केवल भ्रम है


केवल अकेलापन है


तो शायद वह प्रेम नहीं है।


वह केवल भावनात्मक शोषण है।


और सच्चाई यह है -


नार्सिसिस्ट आपको तब तक ही चाहता है

जब तक आपकी ऊर्जा बची है या कोई और विकल्प नहीं है।


जब आप खाली हो जाती हैं -

वह आपको ऐसे फेंक देता है

जैसे कोई इस्तेमाल किया हुआ काग़ज़। क्यूँ कि एक Narcissist बिना कोई मतलब किसी से सम्बन्ध रखता ही नहीं।

किसी ने उसे छोड़ा नहीं है, पर जो लोग उसे जानते हैं,

उन्हें अच्छे से पता होता है कि, ये इंसान भरोसे के लायक नहीं। आपने केवल एकतरफ़ा कहानियाँ उसके मुँह से सुनी हैं, जिसमें वो victim तथा पूरी दुनियाँ अत्याचारी और मतलबी है। 


कभी एक बार तो सोचें, कि "सारी दुनिया ही गलत कैसे हो सकती है?" कहीं ये इंसान ही तो गलत नहीं? और आपके साथ भी तो वही कर रहा है... कहीं ऐसा तो नही कि आप ही नकली हीरे के मोहपाश में बंधी हैं?


स्मरण रखिए : यदि आप किसी के लिए केवल विकल्प हैं तो उसका अर्थ केवल इतना ही है कि आपकी जरूरत स्थायी नहीं, अस्थायी है।


आप किसी की ज़रूरत पूरी करने की मशीन नहीं हैं।


आप किसी का प्रोजेक्ट नहीं हैं।


आप के जीवन का उद्देश्य किसी को सुधारने की ठेकेदारी नहीं हैं।


आप एक पूर्ण आत्मा हैं।


आपका अस्तित्व

किसी की स्वीकृति पर निर्भर नहीं।


यदि उपरोक्त बात आपको समझ आ जाए तो आप स्वयं की ओर लौटने लगती हैं।

मोह तत्क्षण खत्म हो जाता है ।


Healing का रास्ता कहीं बाहर नहीं, आपके ही भीतर है।


1️⃣ अपनी स्पष्ट आवाज़ वापस लाएँ

2️⃣ “ना” कहना सीखें

3️⃣ अपराधबोध छोड़ें

4️⃣ सीमाएँ बनाएँ

5️⃣ खुद को प्राथमिकता दें


शुरुआत कठिन होगी।

अकेलापन आएगा।

डर लगेगा।


लेकिन याद रखिए -


यह डर

गुलामी से बेहतर है।


याद रखें : 

यह अनुभव

आपको कमज़ोर बनाने नहीं आया।


यह आपको

जगाने आया है।


आप अब वही नहीं रहेंगी

जो चुप रहती थी।


आप अब वह बनेंगी

जो खुद के लिए खड़ी होती है।


और जब आप खुद को चुन लेंगी 


तो पाएँगी नाहक ही आपने एक भ्रम के पीछे अपने जीवन के कीमती क्षणों को व्यर्थ कर दिया।

बिखरी हुई ऊर्जा का एक हो जाना

 "ध्यान' बिखरी हुई ऊर्जा का एक हो जाना"


ध्यान किसी विशेष आसन में बैठने का नाम नहीं है,

न ही यह केवल आँखें बंद करने की प्रक्रिया है।


ध्यान का वास्तविक अर्थ है 

हमारी बिखरी हुई ऊर्जाओं को कोमलता से एक दिशा में प्रवाहित करना।


मनुष्य के भीतर अनेक प्रकार की ऊर्जाएँ होती हैं...

इन्द्रियों की ऊर्जा, जो देखती, सुनती और अनुभव करती है


मन की ऊर्जा, जो सोचती, कल्पना करती और चिंतित होती है


शरीर की ऊर्जा, जो कर्म करती और क्रिया में लगी रहती है


सामान्य जीवन में ये तीनों एक साथ नहीं होते।

शरीर यहाँ होता है, मन कहीं और भटक रहा होता है,

इन्द्रियाँ बाहरी दुनिया में उलझी रहती हैं।


यही अवस्था अधूरापन है।

और इसी अधूरेपन से जीवन की अधिकांश समस्याएँ जन्म लेती हैं।


ध्यान = इन्द्रियाँ, मन और शरीर का एक सूत्र में बंध जाना


जब हम ध्यान का अभ्यास करते हैं,

तो हम इन बिखरी ऊर्जाओं को धीरे-धीरे एक साथ लाना सीखते हैं।


इन्द्रियाँ वर्तमान क्षण में टिकने लगती हैं


मन विचारों की भीड़ से बाहर आने लगता है


शरीर स्थिर और सहज हो जाता है


अब ये तीनों अलग-अलग दिशाओं में नहीं बहते,

बल्कि एक ही प्रवाह में चलने लगते हैं।


जैसे दीपक जलाते समय 

अगर हाथ काँप रहा हो,

मन कहीं और उलझा हो,

और आँख ध्यान से न देख रही हो,

तो दीपक बार-बार बुझ जाएगा।


लेकिन जब हाथ, आँख और मन 

तीनों एक साथ उसी क्रिया में उपस्थित हों,

तो दीपक सहजता से जल उठता है।


यही ध्यान है।


"जब ध्यान अधूरा होता है"


अक्सर ऐसा होता है कि व्यक्ति ध्यान तो करता है,

लेकिन उसकी ऊर्जा अभी भी बिखरी रहती है।


शरीर बैठा है


मन भविष्य या अतीत में घूम रहा है


इन्द्रियाँ ध्वनियों और विचारों में फँसी हैं


यह कोई असफलता नहीं है,

यह केवल अभ्यास की अवस्था है।


क्योंकि ध्यान में जब तक हम पूरे नहीं होते,

तब तक ध्यान भी पूरा नहीं होता।


और जब ध्यान अधूरा रहता है,

तो जीवन के काम भी अधूरेपन के साथ होने लगते हैं।


"बिखरी ऊर्जा का प्रभाव जीवन पर"


जब हमारी ऊर्जा एक जगह केंद्रित नहीं होती 


काम में बार-बार रुकावट आती है


निर्णय लेने में असमंजस रहता है


मन में अविश्वास पैदा होता है


हम खुद पर शक करने लगते हैं


ऐसा इसलिए नहीं कि हम कमजोर हैं,

बल्कि इसलिए कि हमारी शक्ति बिखरी हुई है।


जैसे पानी अगर फैल जाए तो

वह ज़मीन को भिगो देता है,

लेकिन अगर वही पानी एक धार में बहने लगे,

तो पत्थर भी काट सकता है।


"ध्यान और दैनिक जीवन"


दैनिक जीवन में हम अधिकांश काम

आधे मन से करते हैं।


खाते समय मोबाइल देखना


चलते समय सोच में डूबे रहना


बात करते समय जवाब पहले से तय कर लेना


ध्यान सिखाता है......जो कर रहे हो, पूरे होकर वही करो।


जब आप चाय पीते समय

उसकी गर्माहट, खुशबू और स्वाद को पूरी तरह महसूस करते हैं,

तो वही साधारण क्रिया भी ध्यान बन जाती है।


यहीं से जीवन में

शांति, संतुलन और सहजता आने लगती है।


"ध्यान और काम (कर्म)"


काम में थकान अक्सर मेहनत से नहीं,

मन के बिखराव से आती है।


मन परिणाम से डरता है


शरीर बोझ महसूस करता है


ध्यान भविष्य में अटका रहता है


ध्यान हमें सिखाता है ....अभी के काम में पूरी तरह उतर जाना।


जैसे किसान बीज बोते समय

फल की चिंता नहीं करता,

वह बस मिट्टी, बीज और अपने हाथों में उपस्थित रहता है।


जब मन, शरीर और इन्द्रियाँ

एक ही काम में जुड़ जाते हैं,

तो काम बोझ नहीं,

साधना बन जाता है।


"ध्यान और संबंध"


संबंधों में दुख का सबसे बड़ा कारण है 

अनुपस्थिति।


सामने वाला बोल रहा होता है


हम सुन नहीं रहे होते


मन पुराने अनुभवों में उलझा होता है


ध्यान सिखाता है ....

सुनना, पूरे मन से।


जब आप किसी को

बिना टोके, बिना निर्णय बनाए सुनते हैं,

तो सामने वाला स्वयं को

सम्मानित और स्वीकार किया हुआ महसूस करता है।


यहीं से


करुणा जन्म लेती है


टकराव कम होते हैं


संबंध गहरे होते हैं


"ध्यान और रचनात्मकता"


रचनात्मकता ज़बरदस्ती नहीं आती।

वह तब आती है जब भीतर प्रवाह होता है।


लेखक, कलाकार या संगीतकार —

जब पूरी तरह अपने काम में डूब जाता है,

तो समय का भान भी नहीं रहता।


यह वही अवस्था है

जहाँ ऊर्जा एक दिशा में बह रही होती है।


ध्यान रचनात्मकता पैदा नहीं करता,

ध्यान सिर्फ रास्ता साफ करता है,

ताकि रचना स्वयं जन्म ले सके।


"जब सारी ऊर्जा एक दिशा में बहती है"


ध्यान के माध्यम से

जब इन्द्रियाँ, मन और शरीर

एक ही प्रवाह में बहने लगते हैं,

तो इंसान उस क्षण रचने लगता है।


अब उसे ज़ोर नहीं लगाना पड़ता,

अब वह जान जाता है 

ऊर्जा को किस दिशा में ले जाना है।


और जब इंसान यह जान जाता है,

तो उसका जीवन भी सधा हुआ हो जाता है।


"ध्यान का सार"


ध्यान हमें कुछ नया नहीं देता।

ध्यान हमें पूरा बनाता है।


और जब इंसान पूरा होता है 


उसका काम स्पष्ट होता है


उसके संबंध गहरे होते हैं


उसकी रचना सच्ची होती है


और उसका जीवन सहज रूप से बहने लगता है


यही ध्यान की वास्तविक साधना है 

शरीर नौ चक्र

शरीर नौ चक्र


कुण्डलिनी चक्र एक आध्यात्मिक अवधारणा है जिसमें शरीर की आधार (मूलाधार) में सोई हुई दिव्य ऊर्जा (कुण्डलिनी) को योग और ध्यान के माध्यम से जगाया जाता है, जो फिर रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ सात मुख्य चक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, सहस्रार) से होकर गुजरती है, जिससे गहन आध्यात्मिक अनुभव और चेतना का विस्तार होता है। यह एक शक्तिशाली प्रक्रिया है जिसे अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन में सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि इसके जागृत होने पर शारीरिक और मानसिक बदलाव आते हैं। मनुष्य शरीर में उपलब्ध इन चक्रों पर ध्यान टिकाने से असीम मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्तियाँ आ जाती हैं मानव शरीर में पाँच कर्म इंद्रियाँ, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ व चार सूक्षम इंद्रियाँ भी हैं।


जो इस प्रकार हैं। कर्म इंद्रियाँ - मुंह, हाथ, पैर, गुदा, लिंग । ज्ञानेंद्रियाँ - कान, मुंह, त्वचा, आंख, नाक । सूक्ष्म इंद्रियाँ - मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार । मन का निवास सुषमना नाड़ी में है । यह नाड़ी नाक के दोनों छिद्रों की नाड़ियों इडा तथा पिंगला के बीच की नाड़ी होती है। मन इसी सुषमना नाड़ी में बैठकर मस्तिष्क को आदेश देता है । यही मन इस नाशवान संसार की हर गतिविधि को नियंत्रित करता है।वहीं, कुंडलिनी जागरण में, कुंडलिनी शक्ति होती है, जो कि एक आध्यात्मिक ऊर्जा है और उसे ही जागृत किया जाता है। यह शक्ति मानव शरीर के मूलाधार चक्र में सुप्त अवस्था में मानी जाती है। कुंडलिनी एक ऐसी शक्ति है, जो एक कुंडली मारकर बैठे हुए सर्प की भांति शरीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार में स्थित होती है। निरंतर ध्यान, योग और आत्म-संयम इत्यादि की मदद से जब यह जाग्रत होने लगती है, तो साधक को ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे कोई सर्पिलाकार तरंग घूमती हुई ऊपर की ओर उठ रही है। 


हमारे शरीर में सात चक्रों में से कुंडलिनी का एक छोर मूलाधार चक्र पर स्थित होता है।और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ लिपटा हुआ जब ऊपर की ओर गति करता है, तो उसका उद्देश्य सभी चक्रों को सक्रिय करते हुए सातवें चक्र सहस्रार तक पहुंचना होता है। जिस भी व्यक्ति का कुण्डलिनी जागरण होता है, तो आप कह सकते हैं कि उसके शरीर में एक प्रकार से ऊर्जा का विस्फोट होता है।


कुण्डलिनी जागरण एक खतरनाक लेकिन दिव्य प्रक्रिया है। अगर वह व्यक्ति उस ऊर्जा को संतुलित नहीं कर पाया, तो वह पागल भी हो सकता है या उसकी मृत्यु भी हो सकती है। लेकिन अगर वह इसे संतुलित कर लेता है, तो उसकी तीसरी आँख जागृत हो जाती है, उसकी आध्यात्मिक जागरूकता और अंतर्दृष्टि बढ़ती है और वह सांसारिक भौतिक सुखों के पीछे भागना बंद कर देता है। कुण्डलिनी हमेशा के लिए जागृत नहीं होती बल्कि जब तक व्यक्ति संयम और ध्यान करता है, तब तक इसे नियंत्रित रख पाता है लेकिन अगर जागरण के बीच में अगर वह साधना छोड़ देता है, तो यह सर्प गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है।


तत्त्व विज्ञान को अनुसार ये नौ ऊर्जा बिन्दु ही प्रमुख है इनकी संरचना भी परमाणु जैसी ही होती है और ये क्रिया भी नाभिक की ही भाँति करते है ये नाभिक की ऊर्जा से आविशित होते रहते है।और उसी प्रकार से ऊर्जा उत्सर्जन करते है नौ ऊर्जा बिन्दु को जिनमे केवल एक नाभिक मुख्य होता है, शेष सह नाभिक योग साधना मे नौ निधि कहा जाता है।इन नौ से बने आठ ऊर्जा क्षेत्रों की सिद्धि को अष्ट सिद्धि कहा जाता है तंत्र विधा मे इन्ही को शक्ति को नौ रूपों मे सिद्ध किया जाता है और शून्य को मिलाकर ये ही दसमहाविधाएं है। 


और मनुष्य से शरीर के ऊर्जा चक्र भी वही है जो ब्रह्माण्ड या परमाणु का है।इसलिए तंत्र, योग,आदि साधनाओं मे अपने शरीर के इन्हीं ऊर्जा बिन्दूओ की सिद्धि की जाती है ये सिद्धि क्या है और कैसे प्राप्त की जाती है ।आवश्यक यह है कि इस ऊर्जा संरचना के वैज्ञानिक स्वरूप को समझा जाये।


इस सृष्टि मे जहां कहीं भी ऊर्जा का उत्सर्जन होता है वह इसी प्रकार के नाभिकों से होता है और यह निरन्तर प्रवाहित नही होती है, अपितु इसकी बौछार फव्वारे की तरह होती रहती है वैसे ही जैसे कोई पम्प से फुहार फेकता हो एक विस्फोट को बाद दुसरे विस्फोट से मध्य मे निष्क्रियता रहती है।


इसी तरह ब्रह्माण्ड मे जितनी भी ऊर्जा तरंगें गमन करती है या उत्सर्जित होती है उनमे धड़कन होती है यह धड़कन ही किसी इकाई को जीवित रखती है इस स्वचालित धड़कन का कारण धन और ऋण अर्द्धचन्द्राकार गड्ढे मे पडने वाले मूलतत्त्व का दबाव है।


ऊर्जा परिपथ मे शून्य को नीचे का बिन्दु शून्य को घेरे रहता है इसे शिव कहा जाता है और इस बिन्दु को शैवमार्ग मे शिव कि अर्द्धांगिनी मानाजाता है शिव शून्य परम तत्त्व का ही अंश समझा जाता है नीचे के आठ चक्र बिन्दु को आठ शिवलिंग माना जाता है इन शिवलिगों से ऊर्जा यानि शक्ति की फुहार निकलती है जिनकी प्रकृति भिन्न भिन्न प्रकार की होती है

बीमारी की शुरुआत कहाँ से होती है?

 Chronic illness - एक बीमारी कितने साल तक पीछा कर सकती है? अक्सर जब किसी से पूछा जाए कि एक बीमारी इंसान को कितने समय तक परेशान कर सकती है, तो जवाब आता है-दो महीने, छह महीने, एक साल या ज़्यादा से ज़्यादा पाँच साल।


लेकिन हकीकत यह है कि अगर बीमारी की जड़ पर काम न हो, तो वही समस्या 15–20 साल या उससे भी ज़्यादा समय तक इंसान की ज़िंदगी को जकड़े रख सकती है।


बहुत से लोग ऐसे होते हैं जो सालों तक अलग-अलग इलाज कराते रहते हैं, रिपोर्ट्स करवाते रहते हैं, दवाइयाँ बदलते रहते हैं—लेकिन असली राहत नहीं मिलती।


बीमारी की शुरुआत कहाँ से होती है?

अधिकांश लंबे समय तक चलने वाली समस्याएँ अचानक नहीं आतीं।

इनकी शुरुआत धीरे-धीरे होती है और अक्सर पाचन तंत्र (Digestive system) से शुरू होती है।


आमतौर पर क्रम कुछ ऐसा होता है:


पहले कब्ज (Constipation)

फिर धीरे-धीरे एलर्जी, सर्दी-जुकाम, राइनाइटिस

उसके बाद भूख कम लगना

फिर कभी लूज़ मोशन, कभी अनियमित मल

आगे चलकर पेट में जलन, सीने में जलन, गैस

साथ में नाक-गले से कफ, तालू में खुजली, छींक

और समय के साथ यूरिन, मोशन, सीने तक जलन का एहसास

यानी समस्या पेट से शुरू होकर पूरे शरीर में फैल जाती है।


क्यों नॉर्मल रिपोर्ट के बावजूद तकलीफ बनी रहती है?

कई लोग बड़े-बड़े अस्पतालों में जाते हैं,

एंडोस्कोपी, कोलोनोस्कोपी, CT स्कैन, अल्ट्रासाउंड—सब कराते हैं।


रिपोर्ट्स आती हैं:


“सब नॉर्मल है”

लेकिन तकलीफ नॉर्मल नहीं होती।


ऐसा इसलिए क्योंकि:


जाँच में संरचना (Structure) दिखती है

लेकिन कार्यप्रणाली (Function) का असंतुलन नहीं दिखता


आयुर्वेद इसी फंक्शनल गड़बड़ी को पकड़ता है।


आयुर्वेद के अनुसार असली गड़बड़ी क्या होती है?

आयुर्वेद के नजरिए से देखें तो ऐसे लंबे समय तक चलने वाले मामलों में आमतौर पर:


अपान वायु बिगड़ चुकी होती है

कफ शरीर में जमा होता जाता है

अग्नि (Digestive fire) कमजोर हो जाती है

शरीर अंदर से सूखा होता है, बाहर से कफ भरा लगता है


इसी वजह से:


एलर्जी बार-बार होती है

कफ साफ नहीं होता

जलन बनी रहती है

वजन नहीं बढ़ता

दवाइयों का असर टिकता नहीं


सिर्फ दवा क्यों काफी नहीं होती?

जब बीमारी 10–15–20 साल पुरानी हो, तो सिर्फ गोली या काढ़ा काफी नहीं होता।

ऐसे मामलों में आयुर्वेद कहता है:


“पहले शरीर से जमा हुआ दोष निकालो, फिर पोषण दो।”


अगर कफ शरीर में भरा पड़ा है और उसे निकाले बिना सिर्फ टॉनिक या दवा दी जाए, तो फायदा नहीं होता।


शोधन चिकित्सा का रोल

लंबे समय से चली आ रही समस्याओं में शोधन (Detoxification) बहुत अहम हो जाता है।


शोधन का मतलब:


शरीर में जमा दोष को बाहर निकालना

अग्नि को फिर से जगाना

चैनल्स को साफ करना


इसमें प्रमुख तौर पर:


वमन – जब कफ प्रधान समस्या हो

बस्ती – जब वात ज्यादा बिगड़ा हो


डर की बात यह नहीं है कि शोधन होगा या नहीं,

असल सवाल यह है कि:


क्या सही तरीके से, सही व्यक्ति में, सही तैयारी के साथ किया जा रहा है या नहीं?


दुबले-पतले लोग और शोधन का डर

एक आम डर यह भी होता है कि:


“मैं दुबला हूँ, कमजोर हूँ, मेरा शोधन कैसे होगा?”


आयुर्वेद साफ कहता है:


अगर अग्नि तैयार की जाए

अगर बल धीरे-धीरे बढ़ाया जाए

और सही क्रम अपनाया जाए

तो दुबले से दुबले व्यक्ति का भी शोधन सुरक्षित रूप से हो सकता है।


बीमार व्यक्ति का शोधन मौसम से बंधा नहीं होता,

ऋतु अनुसार शोधन स्वस्थ व्यक्ति के लिए होता है।


शोधन के बाद क्या बदलाव आते हैं?

जब सही तरीके से कफ बाहर निकलता है और वात को संतुलित किया जाता है, तो लोग अक्सर बताते हैं:


शरीर हल्का लगने लगता है

जलन में तेजी से कमी

भूख वापस आने लगती है

नाक-गले का कफ साफ

एलर्जी के अटैक कम

एसी, ठंड, मौसम से डर कम

एनर्जी लेवल बेहतर


यहीं से असली रिकवरी की जर्नी शुरू होती है।


बस्ती का लॉन्ग-टर्म रोल

जहाँ बीमारी की जड़ वात में हो, वहाँ बस्ती सबसे असरदार इलाज माना गया है।


नियमित बस्ती से:


अपान वायु सुधरती है

मल-मूत्र की जलन कम होती है

गैस और ब्लोटिंग कंट्रोल में आती है

एलर्जी की फ्रीक्वेंसी घटती है


इसीलिए कई मामलों में बस्ती को लंबे समय तक अपनाने की सलाह दी जाती है।


घर पर क्या करें? 

यह बातें उन लोगों के लिए हैं जिन्हें

गले में जलन/दर्द, एसिड रिफ्लक्स, कफ, एलर्जी, भारीपन या सालों पुरानी पाचन की दिक्कत रहती है।


यह इलाज का विकल्प नहीं, बल्कि इलाज को काम करने लायक बनाने की ज़मीन है।


1. सुबह की शुरुआत कैसे करें

उठते ही

गुनगुना पानी 1–2 गिलास

रात का जमा कफ ढीला करता है

अपान वायु को मूवमेंट देता है


अगर जलन ज्यादा रहती है:

गुनगुने पानी में

½ चम्मच सौंफ या धनिया पानी (रात में भिगोया हुआ)


2. अग्नि सुधार – सबसे ज़रूरी काम

अगर पाचन ठीक नहीं होगा, तो:


एसिड बनेगा

कफ ऊपर जाएगा

गला बार-बार खराब होगा


खाने से पहले (दिन में 1–2 बार)

अदरक का छोटा टुकड़ा + 1 चुटकी सेंधा नमक


बहुत जलन हो - अदरक न लें

या

जीरा + धनिया + सौंफ (बराबर मात्रा)

उबालकर गुनगुना पानी पिएँ


यह अग्नि को शांत तरीके से सुधारता है, भड़काता नहीं।


3. गले की जलन / दर्द के लिए

 दिन में 2 बार

मुलेठी (Yashtimadhu) ½ चम्मच पाउडर

गुनगुने पानी या शहद के साथ

डायबिटीज़ हो तो शहद न लें


 मुलेठी:


पित्त को शांत करती है

गले की परत को heal करती है

एसिड की जलन कम करती है


गरारे

गुनगुना पानी + चुटकी हल्दी + चुटकी सेंधा नमक

रात को खासतौर पर फायदेमंद


4. कफ और एसिड साथ में हो तो

यह कॉम्बिनेशन बहुत आम है।


सुबह या शाम

त्रिफला चूर्ण ½ चम्मच

गुनगुने पानी के साथ (रात में बेहतर)


इससे:


मल साफ होता है

कफ नीचे की ओर मूव होता है

एसिड ऊपर नहीं चढ़ता


5. खाने का तरीका 

क्या करें

खाना गर्म, ताज़ा और सिंपल

दिन में 2–3 बार ही ठीक से खाएँ

बहुत देर तक भूखे न रहें


क्या कम करें

खट्टा, बहुत तीखा, तला हुआ

रात में दही, छाछ

बिस्कुट, नमकीन, बेकरी

चाय-कॉफी (खासकर खाली पेट)


क्या बेहतर रहता है

मूंग दाल

लौकी, तोरी, गाजर, टिंडा

चावल कम मात्रा में

रोटी सीमित

घी 1–2 चम्मच (डरें नहीं)


6. खाने के बाद क्या न करें

खाने के तुरंत बाद लेटना नहीं

पानी बहुत ज़्यादा नहीं

मोबाइल पर झुककर बैठना नहीं


खाने के बाद

5–10 मिनट टहलना

यह छोटी आदत एसिड रिफ्लक्स आधा कर देती है।


7. साँस और मन का रोल 

पित्त और एसिड सिर्फ पेट की नहीं,

नर्वस सिस्टम की भी समस्या है।


रोज़ 10 मिनट

अनुलोम-विलोम

भ्रामरी (गुनगुनाहट वाली)


इससे:


एसिड का ओवरफ्लो कम

गले की जकड़न ढीली

नींद बेहतर


8. सबसे बड़ी गलती जो लोग करते हैं

“दवा खा ली, अब सब चल जाएगा”

“कभी ठीक, कभी खराब—चलता है”


लेकिन याद रखें:


जो बीमारी सालों में बनी है,

वो कुछ हफ्तों में नहीं जाएगी।


घर की ये आदतें:


दवा का असर बढ़ाती हैं

शोधन के लिए शरीर तैयार करती हैं

और relapse से बचाती हैं


आख़िरी बात (बहुत ज़रूरी)

अगर:


जलन रोज़ है

वजन गिर रहा है

रात में नींद टूटती है

दवाइयों से भी आराम नहीं


तो सिर्फ घरेलू उपायों पर न रुकें।

किसी अनुभवी आयुर्वेदिक वैद्य से सही मूल्यांकन ज़रूरी है।


लेकिन

घर पर ये सब करना शुरू कर देंगे,

तो आधी लड़ाई वहीं जीत लेंगे।


आयुर्वेद से डर या भरोसा?

बहुत लोगों को डराया जाता है:


“आयुर्वेद से किडनी खराब हो जाएगी”

“लीवर खराब हो जाएगा”

“आप बहुत कमजोर हैं”


लेकिन सच्चाई यह है:


गलत हाथों में कोई भी चिकित्सा नुकसान कर सकती है,

और सही हाथों में आयुर्वेद शरीर को जड़ से ठीक करने की क्षमता रखता है।


आख़िरी बात

जो समस्याएँ सालों से चली आ रही हैं,

उनका समाधान भी धैर्य, अनुशासन और सही दिशा से ही आता है।


आयुर्वेद कोई जादू नहीं,

लेकिन अगर सही समझ के साथ अपनाया जाए,

तो वह शरीर को दोबारा बैलेंस में लाने की ताकत ज़रूर रखता है।


बीमारी ठीक होने में समय लगे-यह स्वीकार्य है,

लेकिन ठीक हो सकती है, यह भरोसा सबसे ज़रूरी है।

कलेश और हीलिंग

 कलेश और हीलिंग


1. जब रिश्ता सहज होता है


जब पति-पत्नी के बीच सब कुछ ठीक चल रहा होता है, तब जीवन में एक स्वाभाविक शांति होती है।

बातें सहज होती हैं, चुप्पी भी बोझ नहीं बनती।

एक-दूसरे की मौजूदगी ही काफी लगती है।


यह स्थिति इसलिए बनती है क्योंकि:


दोनों सुने जाने का अनुभव करते हैं


भावनाएँ दबाई नहीं जातीं


अपेक्षाएँ स्पष्ट या सीमित होती हैं


अहंकार रिश्ते से बड़ा नहीं होता


पर यह स्थिति स्थायी नहीं रहती, क्योंकि मन स्थिर नहीं होता।


2. तनाव की शुरुआत: छोटे कारण, गहरी जड़ें


तनाव अक्सर किसी बड़े झगड़े से नहीं, बल्कि छोटी-छोटी उपेक्षाओं से शुरू होता है।


बाहरी कारण (जो दिखते हैं):


समय न देना


मोबाइल / काम / परिवार को प्राथमिकता देना


बातों को टालना


शारीरिक या भावनात्मक दूरी


तुलना (माँ, बहन, दोस्त, पूर्व संबंध)


अदृश्य कारण (जो नहीं दिखते):


मान्यता की कमी


 “मेरी अहमियत नहीं रही”


असुरक्षा


“क्या मैं अब पर्याप्त नहीं हूँ?”


अधूरी अपेक्षाएँ

जो कभी कही ही नहीं गईं


बीते घाव

जो पहले कभी भरे ही नहीं


अहं का टकराव

“मैं क्यों झुकूँ?”


यहीं से तनाव अंदर ही अंदर जमने लगता है जैसे ज़मीन के नीचे दबा लावा।


3. जब तनाव हद से बढ़ता है: कलेश की उत्पत्ति


जब दबा हुआ भाव बाहर निकलता है, तो वह संवाद नहीं होता वह विस्फोट होता है।


कलेश के गहरे कारण:


1. भावनात्मक भूख

स्त्री को समझा जाना चाहिए

पुरुष को सम्मान चाहिए

दोनों को प्यार चाहिए

लेकिन मांगने की भाषा नहीं आती


2. पुरानी स्मृतियाँ

वर्तमान झगड़े में अतीत भी शामिल हो जाता है


 “तुम हमेशा…”

“पहले भी ऐसा ही था…”


3. असहायता की भावना

जब लगता है कुछ बदल नहीं रहा

तब गुस्सा आख़िरी हथियार बन जाता है


4. मैं बनाम तुम

रिश्ता “हम” से हटकर “मैं सही, तुम गलत” हो जाता है


4. कलेश के संकेत (बहुत सूक्ष्म लेकिन गहरे)


कलेश सिर्फ चिल्लाने से नहीं दिखता।


सूक्ष्म संकेत:


चुप्पी का भारी हो जाना


सामने होते हुए भी अनुपस्थिति


व्यंग्य, ताने


बातों में कटुता


स्पर्श की कमी


एक-दूसरे की खुशी से दूरी


“जो करना है करो” वाली मानसिकता


जब ये संकेत लगातार हों तो समझिए कलेश भीतर जड़ पकड़ चुका है।


5. उस वक़्त क्या करना चाहिए (सबसे कठिन लेकिन ज़रूरी)


1. प्रतिक्रिया नहीं, ठहराव


झगड़े के बीच तुरंत समाधान नहीं होता

पहले मन को शांत करना ज़रूरी है


2. दोष नहीं, भाव बोलना


“तुम ऐसे हो”..... नहीं 

 “मुझे ऐसा महसूस होता है”.... हाँ 


3. सही समय चुनना


गुस्से में नहीं.....शांति में बात करें


4. जीत नहीं, जुड़ाव चुनें


रिश्ता जीतने से ज़्यादा बचाने की चीज़ है


6. हीलिंग की प्रक्रिया: भीतर से बाहर


हीलिंग का मतलब सिर्फ माफ करना नहीं 

हीलिंग का मतलब है खुद से मिलना।


7. ध्यान गहरी हीलिंग के लिए


ध्यान का उद्देश्य


अपने भीतर के दर्द को देखना


प्रतिक्रिया की जगह साक्षी बनना


मन की गांठों को ढीला करना


ध्यान अभ्यास (गहरा उदाहरण)


स्थान:

शांत जगह, अकेले

रीढ़ सीधी, आँखें बंद


श्वास पर ध्यान:

धीमी सांस लें

छोड़ते समय महसूस करें...बोझ निकल रहा है


अब मन में देखें:

अपने साथी को सामने बैठे देखें

कुछ मत कहें

बस देखें....बिना जजमेंट


अब खुद से पूछें (मन में):


मुझे सबसे ज़्यादा दर्द किस बात ने दिया?


मैं क्या चाहता/चाहती था जो मिला नहीं?


भाव आएँगे.... रोना, गुस्सा, खालीपन

उन्हें रोकें नहीं


फिर मन में कहें:

 “मैं तुम्हें नहीं, अपने दर्द को छोड़ रहा/रही हूँ”


कुछ देर बाद दोनों को प्रकाश में ढकते हुए कल्पना करें

यह प्रकाश स्वीकृति और करुणा का है


धीरे-धीरे आँख खोलें


8. स्त्री-पुरुष की मानसिक परतें 


स्त्री अधिक भावनात्मक सुरक्षा चाहती है


पुरुष अधिक स्वीकार्यता और सम्मान


दोनों अपने-अपने तरीके से प्रेम मांगते हैं


समस्या प्रेम की कमी नहीं भाषा की भिन्नता है


कलेश दुश्मन नहीं है

वह संकेत है कुछ सुना नहीं गया

कुछ समझा नहीं गया


और हीलिंग कोई जादू नहीं

वह रोज़-रोज़ चुना गया सच, धैर्य और आत्म-जागरूकता है।