Tuesday, February 3, 2026

मिट्टी, इमारतों, सड़कों और शरीर

 हम जिस दुनिया में जीते हैं, वो केवल मिट्टी, इमारतों, सड़कों और शरीरों से नहीं बनी। उसका एक बड़ा हिस्सा हमारे सोचने के तरीके से जन्म लेता है। जो कुछ हमने देखा, सहा, खोया, पाया, उसी की स्मृतियाँ मिलकर विचार बनती हैं। फिर उन्हीं विचारों से हम भविष्य की कल्पना करते हैं, संबंधों की परिभाषा गढ़ते हैं, और अपने होने का अर्थ तय करते हैं। हमें लगता है कि हम दुनिया को देख रहे हैं, पर अक्सर हम सिर्फ अपनी स्मृतियों की परछाइयों को देख रहे होते हैं।


ये सोच बहुत पुरानी होती है, पर हमें हर दिन नई लगती है। क्योंकि हर सुबह हम उसी मानसिक ढांचे के साथ उठते हैं, जिसे हमने बरसों में तैयार किया है। उसमें सुरक्षा के नाम पर डर जमा होता है, पहचान के नाम पर सीमाएँ बनती हैं, और सही होने की इच्छा के नाम पर दूसरों से दूरी। हम इन सबको स्वाभाविक मान लेते हैं, जैसे ये जीवन का हिस्सा हों, जबकि असल में ये विचारों का विस्तार होते हैं।


धीरे धीरे ये सोच इतनी ठोस लगने लगती है कि हमें लगता है, इसके बाहर कुछ है ही नहीं। जो भी अलग दिखता है, वो खतरा बन जाता है। जो भी हमारे जैसा नहीं सोचता, वो अजनबी हो जाता है। इस तरह हम एक ऐसी दुनिया में रहने लगते हैं, जो बाहर से बड़ी दिखती है, पर भीतर से बहुत संकरी होती है।


विचार से बनी हुई सीमाएँ:


धर्म, राष्ट्र, संस्कृति, परंपरा, विचारधारा, ये सब विचार की ही संतान हैं। शुरू में शायद इनका जन्म किसी समझ या सुविधा से हुआ होगा, पर समय के साथ ये पहचान बन गईं। पहचान, जो कहती है, मैं ये हूँ, और तुम वो हो। इसी एक रेखा से विभाजन पैदा होता है। बिना हथियार उठाए भी हम रोज़ किसी न किसी को अपने से बाहर कर देते हैं।


ये सीमाएँ केवल देशों के नक्शों पर नहीं होतीं, हमारे भीतर भी खिंची होती हैं। हम अपने मन में तय कर लेते हैं कि कौन अपना है, कौन पराया। कौन सही है, कौन गलत। और फिर उसी हिसाब से देखना शुरू कर देते हैं। देखने से पहले ही फैसला तैयार होता है। इस तरह वास्तविकता देखने से पहले ही हम उसे ढाल लेते हैं।


डर इसी ढांचे में पनपता है। डर कि मेरी पहचान टूट न जाए, मेरा समूह कमजोर न हो जाए, मेरी सोच गलत साबित न हो जाए। इस डर को हम तर्क, नैतिकता और परंपरा के कपड़े पहनाते हैं, ताकि वो सभ्य लगे। पर भीतर वो डर ही रहता है, जो किसी भी असहमति को खतरा समझता है।


हम कहते हैं कि दुनिया में हिंसा है, पर शायद हिंसा की जड़ ये विचार हैं, जो अलगाव पैदा करते हैं। जब मैं खुद को केंद्र मानता हूँ, तब हर दूसरा या तो उपयोगी होता है, या बाधा। बीच की जगह बहुत कम बचती है।


मानसिक वास्तविकता का जाल:


समय के साथ हम एक ऐसी दुनिया में रहने लगते हैं, जो बाहर से कम और भीतर से ज्यादा बनी होती है। हमारा दुख, हमारी खुशी, हमारा अपमान, हमारा गर्व, सब विचारों की व्याख्या पर टिका होता है। कोई एक शब्द कह देता है, और हम घंटों परेशान रहते हैं। कोई छोटी सी तारीफ मिल जाती है, और हम खुद को बड़ा मानने लगते हैं।


ये सब एक तरह की मानसिक वास्तविकता है। इसमें घटनाएँ कम, उनकी व्याख्या ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाती है। दो लोग एक ही स्थिति से गुजरते हैं, पर एक टूट जाता है, दूसरा शांत रहता है। फर्क घटना में नहीं, सोच में होता है।


हम इस सोच को अपनी सुरक्षा समझते हैं। लगता है कि अगर हमने सब कुछ समझ लिया, वर्गीकृत कर लिया, नाम दे दिए, तो हम सुरक्षित हैं। पर असल में ये सुरक्षा बहुत नाजुक होती है। एक खबर, एक दुर्घटना, एक अस्वीकृति, और पूरा ढांचा हिल जाता है।


इसलिए हम लगातार खुद को व्यस्त रखते हैं। नई जानकारी, नई बहस, नए लक्ष्य, ताकि भीतर की अस्थिरता को महसूस न करना पड़े। हम भागते रहते हैं, और उसे प्रगति का नाम देते हैं।


देखने का आमंत्रण:


कुछ दृष्टिकोण हमें रुकने को कहते हैं। न मानने को, न विरोध करने को, बस देखने को। ये देखने का अर्थ आंखों से देखना नहीं, बल्कि ये देखना कि हम कैसे सोचते हैं, कैसे प्रतिक्रिया देते हैं, कैसे डरते हैं, कैसे किसी एक पहचान से चिपक जाते हैं।


जब हम खुद को देखते हैं, बिना सफाई दिए, बिना दोष डाले, तब एक अजीब बात होती है। सोच थोड़ी धीमी पड़ती है। जैसे किसी नदी की धार अचानक शांत हो जाए। उस क्षण हमें पता चलता है कि हम और हमारी सोच अलग नहीं हैं। जो उलझन है, वो बाहर नहीं, भीतर है।


ये देखना कोई तकनीक नहीं है। इसमें कोई अभ्यास नहीं, कोई मंज़िल नहीं। ये बस ईमानदारी है। ये मान लेना कि जो कुछ चल रहा है, वो देखा जा सकता है, बदले बिना भी।


इस देखने में कोई सुधार की योजना नहीं होती। जैसे ही हम सुधार की सोचते हैं, सोच फिर नियंत्रण बन जाती है। पर जब हम सिर्फ देखते हैं, तब नियंत्रण गिरने लगता है।


विचार के पार का मौन:


कभी कभी, बहुत छोटे क्षणों के लिए, सोच रुकती है। शायद किसी गहरी थकान में, या किसी अप्रत्याशित सुंदरता को देखते हुए। उस समय कोई टिप्पणी नहीं चलती, कोई तुलना नहीं होती। बस जो है, वो है।


ये क्षण दुर्लभ नहीं हैं, पर हम उन्हें पकड़ने की कोशिश में खो देते हैं। जैसे ही हम कहते हैं, ये अच्छा है, इसे फिर चाहिए, सोच लौट आती है, और मौन खत्म हो जाता है।


पर ये क्षण एक इशारा हैं कि जीवन केवल सोच से नहीं बना। सोच जीवन का एक औज़ार है, मालिक नहीं। जब औज़ार मालिक बन जाता है, तब समस्या शुरू होती है।


विचार के पार कोई स्वर्ग नहीं, कोई अलौकिक अनुभव नहीं, बल्कि एक सादगी होती है। जिसमें कोई केंद्र नहीं होता, कोई विशेष व्यक्ति नहीं होता, कोई तुलना नहीं होती।


उस सादगी में डर को टिकने की जगह नहीं मिलती, क्योंकि डर भविष्य की कल्पना से बनता है। वहाँ संघर्ष नहीं होता, क्योंकि संघर्ष दो छवियों के टकराव से पैदा होता है।


बिना दीवारों की दुनिया:


अगर सोच की बनाई दीवारें ढीली पड़ें, तो दुनिया वैसी नहीं रहती जैसी हमें सिखाई गई है। तब कोई देश दुश्मन नहीं लगता, कोई धर्म श्रेष्ठ नहीं लगता, कोई विचार अंतिम सत्य नहीं लगता।


इसका अर्थ ये नहीं कि समाज खत्म हो जाएगा, या नियम टूट जाएंगे। इसका अर्थ बस इतना है कि भीतर का विभाजन कम हो जाएगा। और जब भीतर का विभाजन कम होता है, तो बाहर का भी असर बदलने लगता है।


हम अक्सर बड़ी क्रांतियों की बात करते हैं, व्यवस्था बदलने की, सत्ता पलटने की। पर शायद सबसे गहरी क्रांति ये है कि हम अपनी सोच को देखें, बिना उसे सजाए, बिना उसे बचाए।


ये देखना आसान नहीं, क्योंकि इसमें हमारी सारी सुरक्षा हिलती है। हमारी पहचान, हमारी श्रेष्ठता, हमारी शिकायतें, सब सवालों में आ जाती हैं।


पर इसी असहजता में एक नई तरह की शांति छिपी होती है। ऐसी शांति, जो किसी विचार पर टिकी नहीं, किसी उपलब्धि पर निर्भर नहीं, किसी तुलना से बनी नहीं।


और शायद इसी शांति में वो जीवन संभव है, जो स्पष्ट है, जो बोझ से हल्का है, जो किसी विचारधारा का प्रचार नहीं करता, बस खुद होकर जीता है।


जहाँ सोच होती है, पर राज नहीं करती।

जहाँ पहचान होती है, पर दीवार नहीं बनती।

जहाँ जीवन किसी सिद्धांत की परीक्षा नहीं, बल्कि एक खुली साँस की तरह घटता है।

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