सरकारी योजनाएँ, ज़मीनी सच्चाई और भारत के विकास की बाधाएँ "
भारत जैसे विशाल और विविधताओं से भरे देश में सरकार का सबसे बड़ा दायित्व यह होता है कि वह विकास की योजनाओं का लाभ सीधे देश की जनता तक पहुँचाए। केंद्र और राज्य सरकारें हर वर्ष हज़ारों योजनाएँ बनाती हैं, लाखों–करोड़ों का बजट तय करती हैं और यह दावा करती हैं कि यह सब देश की जनता, विशेषकर युवाओं और वंचित वर्गों के लिए है।
लेकिन जब हम ज़मीनी हकीकत देखते हैं, तो तस्वीर बिल्कुल अलग दिखाई देती है।
1. योजनाओं और ज़मीन के बीच की खाई
काग़ज़ों पर योजनाएँ आदर्श होती हैं, लेकिन ज़मीन पर उनका प्रभाव बेहद सीमित दिखता है।
प्रधानमंत्री आवास योजना (PMAY) जैसी योजनाओं में 20–30 हज़ार रुपये तक की अवैध वसूली आम बात बन चुकी है।
सड़क निर्माण में ठेकेदारों द्वारा आधा माल हजम कर लिया जाता है, जिससे सड़क कुछ ही वर्षों में टूटने लगती है।
बड़े-बड़े प्रोजेक्ट्स के लिए करोड़ों रुपये जारी होते हैं, लेकिन ज़मीनी स्तर पर वैसा विकास नज़र नहीं आता जैसा दिखना चाहिए।
युवाओं की इंटर्नशिप और स्किल डेवलपमेंट के लिए करोड़ों का बजट होता है, लेकिन वास्तविक लाभार्थियों की संख्या हज़ारों तक सिमट जाती है।
स्टार्टअप और इनोवेशन के लिए लाखों-करोड़ों की घोषणाएँ होती हैं, पर ज़मीनी स्तर पर बहुत कम युवा वास्तव में इस सहायता तक पहुँच पाते हैं।
यह स्पष्ट संकेत देता है कि समस्या केवल बजट की नहीं, बल्कि इम्प्लीमेंटेशन (क्रियान्वयन) की है।
2. दलाल तंत्र और सिस्टम की कमजोरियाँ
सरकार और जनता के बीच एक ऐसा दलाल तंत्र खड़ा हो गया है, जो योजनाओं का असली लाभ खुद हड़प लेता है।
कई बार दूसरे लोगों के घरों या प्रोजेक्ट्स की तस्वीरें खींचकर उन्हें अपने नाम से जोड़ दिया जाता है।
एक व्यक्ति की सुरक्षा और सुविधा के लिए बनाए गए नियम को तोड़ने के लिए कुछ लोग हज़ार नए रास्ते निकाल लेते हैं।
प्रशासनिक स्तर पर निगरानी की कमी और जवाबदेही का अभाव इस समस्या को और गहरा कर देता है।
नतीजा यह होता है कि ईमानदार और ज़रूरतमंद व्यक्ति सिस्टम से बाहर रह जाता है, जबकि चालाक व्यक्ति हर योजना का लाभ उठा लेता है।
3. जांच और कार्रवाई का अभाव
सरकार की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि:
जांच समय पर नहीं होती,
और जब होती भी है, तो कार्रवाई देर से या नाममात्र की होती है।
यदि किसी योजना में भ्रष्टाचार सामने आता है, तो उसे उदाहरण बनाकर सख़्त कार्रवाई होनी चाहिए, ताकि सिस्टम में डर और जवाबदेही दोनों बने। लेकिन ऐसा बहुत कम देखने को मिलता है।
4. सरकार को चाहिए नया विज़न और समर्पित टीम
अब समय आ गया है कि सरकार केवल योजनाएँ बनाने तक सीमित न रहे, बल्कि:
एक स्वतंत्र और प्रोफेशनल निगरानी टीम बनाए,
जो यह देखे कि पैसा कहाँ, कैसे और किसके द्वारा खर्च किया जा रहा है,
हर प्रोजेक्ट की रियल-टाइम रिपोर्ट और फ़ोटो/वीडियो ऑनलाइन सार्वजनिक की जाए,
ताकि आम नागरिक भी निगरानी कर सके।
यह पारदर्शिता भ्रष्टाचार की जड़ पर सीधा प्रहार करेगी।
5. युवाओं और इनोवेशन के लिए खुला मंच
यदि भारत को सच में विश्व गुरु बनना है, तो सरकार को हर क्षेत्र में नए विचारों के लिए दरवाज़े खोलने होंगे...
विज्ञान
दवाई और स्वास्थ्य
शिक्षा
सामाजिक विज्ञान
ध्यान, योग और मानसिक स्वास्थ्य
दर्शन
व्यापार और स्टार्टअप
सरकार को ऐसा सरल, पारदर्शी और तेज़ प्लेटफॉर्म बनाना चाहिए जहाँ कोई भी युवा अपना विज़न प्रस्तुत कर सके।
अगर वह विज़न वास्तव में देश और दुनिया में सकारात्मक बदलाव ला सकता है, तो सरकार को:
आर्थिक सहायता,
प्रशासनिक सहयोग,
और कानूनी संरक्षण
हर स्तर पर देना चाहिए।
6. आउटकम आधारित गवर्नेंस की ज़रूरत
सरकार को अब यह सवाल खुद से पूछना होगा
क्या वर्तमान योजनाओं से वैसा आउटकम मिल रहा है जैसा लक्ष्य रखा गया था?
अगर नहीं, तो कहाँ चूक हो रही है?
पिछली कई योजनाओं के परिणाम यह दिखाते हैं कि:
जहाँ लाखों युवाओं को लाभ मिलना था,
वहाँ केवल कुछ हज़ार ही लाभान्वित हो पाए।
यह सीधा संकेत है कि सिस्टम में गंभीर त्रुटियाँ हैं।
7. विश्व गुरु बनने का असली रास्ता
भारत केवल योजनाओं, भाषणों और काग़ज़ी दावों से विश्व गुरु नहीं बन सकता।
इसके लिए ज़रूरी है...
ज़मीनी स्तर पर ईमानदार इम्प्लीमेंटेशन,
युवाओं को सीधा और सरल लाभ,
उन्हें प्रेरणा, अवसर और विश्वास देना,
और सबसे बढ़कर, एक स्पष्ट और साहसी विज़न।
जब सरकार पूरे देश को सहज बनाएगी, युवाओं को आगे बढ़ने का मंच देगी और भ्रष्टाचार पर सख़्ती से वार करेगी
तभी भारत सच में नवाचार, ज्ञान और नेतृत्व का केंद्र बन सकेगा।
विजन के बिना विकास नहीं होता, और ईमानदार इम्प्लीमेंटेशन के बिना कोई भी विज़न सफल नहीं हो सकता।
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