शरीर नौ चक्र
कुण्डलिनी चक्र एक आध्यात्मिक अवधारणा है जिसमें शरीर की आधार (मूलाधार) में सोई हुई दिव्य ऊर्जा (कुण्डलिनी) को योग और ध्यान के माध्यम से जगाया जाता है, जो फिर रीढ़ की हड्डी के साथ-साथ सात मुख्य चक्रों (मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत, विशुद्ध, आज्ञा, सहस्रार) से होकर गुजरती है, जिससे गहन आध्यात्मिक अनुभव और चेतना का विस्तार होता है। यह एक शक्तिशाली प्रक्रिया है जिसे अनुभवी गुरु के मार्गदर्शन में सावधानी से करना चाहिए, क्योंकि इसके जागृत होने पर शारीरिक और मानसिक बदलाव आते हैं। मनुष्य शरीर में उपलब्ध इन चक्रों पर ध्यान टिकाने से असीम मानसिक तथा आध्यात्मिक शक्तियाँ आ जाती हैं मानव शरीर में पाँच कर्म इंद्रियाँ, पाँच ज्ञानेंद्रियाँ व चार सूक्षम इंद्रियाँ भी हैं।
जो इस प्रकार हैं। कर्म इंद्रियाँ - मुंह, हाथ, पैर, गुदा, लिंग । ज्ञानेंद्रियाँ - कान, मुंह, त्वचा, आंख, नाक । सूक्ष्म इंद्रियाँ - मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार । मन का निवास सुषमना नाड़ी में है । यह नाड़ी नाक के दोनों छिद्रों की नाड़ियों इडा तथा पिंगला के बीच की नाड़ी होती है। मन इसी सुषमना नाड़ी में बैठकर मस्तिष्क को आदेश देता है । यही मन इस नाशवान संसार की हर गतिविधि को नियंत्रित करता है।वहीं, कुंडलिनी जागरण में, कुंडलिनी शक्ति होती है, जो कि एक आध्यात्मिक ऊर्जा है और उसे ही जागृत किया जाता है। यह शक्ति मानव शरीर के मूलाधार चक्र में सुप्त अवस्था में मानी जाती है। कुंडलिनी एक ऐसी शक्ति है, जो एक कुंडली मारकर बैठे हुए सर्प की भांति शरीर के सबसे नीचे के चक्र मूलाधार में स्थित होती है। निरंतर ध्यान, योग और आत्म-संयम इत्यादि की मदद से जब यह जाग्रत होने लगती है, तो साधक को ऐसा प्रतीत होने लगता है जैसे कोई सर्पिलाकार तरंग घूमती हुई ऊपर की ओर उठ रही है।
हमारे शरीर में सात चक्रों में से कुंडलिनी का एक छोर मूलाधार चक्र पर स्थित होता है।और दूसरा छोर रीढ़ की हड्डी के चारों तरफ लिपटा हुआ जब ऊपर की ओर गति करता है, तो उसका उद्देश्य सभी चक्रों को सक्रिय करते हुए सातवें चक्र सहस्रार तक पहुंचना होता है। जिस भी व्यक्ति का कुण्डलिनी जागरण होता है, तो आप कह सकते हैं कि उसके शरीर में एक प्रकार से ऊर्जा का विस्फोट होता है।
कुण्डलिनी जागरण एक खतरनाक लेकिन दिव्य प्रक्रिया है। अगर वह व्यक्ति उस ऊर्जा को संतुलित नहीं कर पाया, तो वह पागल भी हो सकता है या उसकी मृत्यु भी हो सकती है। लेकिन अगर वह इसे संतुलित कर लेता है, तो उसकी तीसरी आँख जागृत हो जाती है, उसकी आध्यात्मिक जागरूकता और अंतर्दृष्टि बढ़ती है और वह सांसारिक भौतिक सुखों के पीछे भागना बंद कर देता है। कुण्डलिनी हमेशा के लिए जागृत नहीं होती बल्कि जब तक व्यक्ति संयम और ध्यान करता है, तब तक इसे नियंत्रित रख पाता है लेकिन अगर जागरण के बीच में अगर वह साधना छोड़ देता है, तो यह सर्प गति करता हुआ किसी भी चक्र पर रुक सकता है।
तत्त्व विज्ञान को अनुसार ये नौ ऊर्जा बिन्दु ही प्रमुख है इनकी संरचना भी परमाणु जैसी ही होती है और ये क्रिया भी नाभिक की ही भाँति करते है ये नाभिक की ऊर्जा से आविशित होते रहते है।और उसी प्रकार से ऊर्जा उत्सर्जन करते है नौ ऊर्जा बिन्दु को जिनमे केवल एक नाभिक मुख्य होता है, शेष सह नाभिक योग साधना मे नौ निधि कहा जाता है।इन नौ से बने आठ ऊर्जा क्षेत्रों की सिद्धि को अष्ट सिद्धि कहा जाता है तंत्र विधा मे इन्ही को शक्ति को नौ रूपों मे सिद्ध किया जाता है और शून्य को मिलाकर ये ही दसमहाविधाएं है।
और मनुष्य से शरीर के ऊर्जा चक्र भी वही है जो ब्रह्माण्ड या परमाणु का है।इसलिए तंत्र, योग,आदि साधनाओं मे अपने शरीर के इन्हीं ऊर्जा बिन्दूओ की सिद्धि की जाती है ये सिद्धि क्या है और कैसे प्राप्त की जाती है ।आवश्यक यह है कि इस ऊर्जा संरचना के वैज्ञानिक स्वरूप को समझा जाये।
इस सृष्टि मे जहां कहीं भी ऊर्जा का उत्सर्जन होता है वह इसी प्रकार के नाभिकों से होता है और यह निरन्तर प्रवाहित नही होती है, अपितु इसकी बौछार फव्वारे की तरह होती रहती है वैसे ही जैसे कोई पम्प से फुहार फेकता हो एक विस्फोट को बाद दुसरे विस्फोट से मध्य मे निष्क्रियता रहती है।
इसी तरह ब्रह्माण्ड मे जितनी भी ऊर्जा तरंगें गमन करती है या उत्सर्जित होती है उनमे धड़कन होती है यह धड़कन ही किसी इकाई को जीवित रखती है इस स्वचालित धड़कन का कारण धन और ऋण अर्द्धचन्द्राकार गड्ढे मे पडने वाले मूलतत्त्व का दबाव है।
ऊर्जा परिपथ मे शून्य को नीचे का बिन्दु शून्य को घेरे रहता है इसे शिव कहा जाता है और इस बिन्दु को शैवमार्ग मे शिव कि अर्द्धांगिनी मानाजाता है शिव शून्य परम तत्त्व का ही अंश समझा जाता है नीचे के आठ चक्र बिन्दु को आठ शिवलिंग माना जाता है इन शिवलिगों से ऊर्जा यानि शक्ति की फुहार निकलती है जिनकी प्रकृति भिन्न भिन्न प्रकार की होती है
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