Wednesday, December 10, 2025

अवचेतन मन

 "अवचेतन मन: वह दुनिया जो ‘दूसरों’ को नहीं जानती"


हमारी चेतना यानी वह हिस्सा जो सोचता है, निर्णय लेता है और बाहरी दुनिया से बातचीत करता है—एक जटिल, बहुस्तरीय अस्तित्व का केवल ऊपरी भाग है। इसके नीचे एक विशाल, मौन, परंतु अत्यंत शक्तिशाली परत होती है अवचेतन मन (Subconscious Mind)। यह वही मन है जो लगभग 90 से 95% विचारों, भावनाओं और प्रतिक्रियाओं को स्वचालित रूप से संचालित करता है, और यह वही मन है जिसमें एक अद्भुत और चौंकाने वाली विशेषता होती है


"अवचेतन मन ‘दूसरों’ को नहीं जानता। यह केवल ‘आपको’ जानता है।"


अवचेतन मन के लिए आप ही पूरा ब्रह्मांड हैं


अवचेतन मन के लिए ‘आप’ और ‘अन्य लोग’ दो अलग संस्थाएँ नहीं हैं। यह विभाजन केवल हमारी जागरूक चेतना की अवधारणा है। अवचेतन की दृष्टि में हर विचार, हर शब्द, और हर भावना अंततः आपके भीतर ही प्रकट होती है।


जब आप कहते हैं


“वह बहुत बुरा है”


“वह हमेशा गलत करता है”


“लोग भरोसे के लायक नहीं होते”


“दुनिया खराब है”


तो आपकी चेतना भले ही इन वाक्यों को किसी और के लिए बोल रही हो, परंतु आपका अवचेतन मन इन वाक्यों को सीधे आपके बारे में ग्रहण करता है।


क्यों?


क्योंकि अवचेतन मन ‘दूसरों’ की पहचान को समझने में सक्षम नहीं है।

उसके लिए हर अनुभव, हर विचार, और हर शब्द आपकी आंतरिक वास्तविकता है

और वह उसे उसी रूप में सत्य मानकर आपकी ऊर्जा, भावनाओं और भविष्य की क्रियाओं को तय करने लगता है।


क्यों आलोचना आपकी ही आत्मा को चोट पहुँचाती है


जब हम किसी की आलोचना करते हैं, दोष निकालते हैं, या किसी का अपमान करते हैं, तो हम सोचते हैं कि यह नकारात्मक ऊर्जा बाहर जा रही है दूसरे व्यक्ति की ओर।

परंतु अवचेतन मन इस ऊर्जा को बाहर जाने ही नहीं देता।


अवचेतन का नियम सरल है:


 “जो कुछ आप कह रहे हैं, सोच रहे हैं या महसूस कर रहे हैं वह आपके ही अंदर घट रहा है।”


इसलिए जब आप किसी को ‘अयोग्य’, ‘बुरा’, ‘धोखेबाज़’ कहते हैं, तो आपका अवचेतन मन आपके अंदर के विश्वास-तंत्र को उसी अनुसार ढालने लगता है।

धीरे-धीरे आप खुद पर भी वही लेबल चिपकाने लगते हैं, जिनका उपयोग आप दूसरों के लिए करते हैं।


इसका परिणाम?


आत्मविश्वास कम होना


गुस्सा बढ़ना


रिश्तों में तनाव


खुद को साबित करने की अनंत कोशिश


भीतर ही भीतर अपराधबोध


भावनात्मक थकान


यही कारण है कि नकारात्मक बातें करने वाले लोग अक्सर सबसे अधिक परेशान, दबे हुए और टूटी हुई आत्मा वाले होते हैं भले ही बाहर से वे मजबूत दिखते हों।


अपने शब्दों की शक्ति को समझने की जरूरत


हम अपने शब्दों को हल्के में लेते हैं, परंतु अवचेतन मन हर शब्द को आदेश की तरह लेता है।

शब्द ऊर्जा बनते हैं, ऊर्जा भावनाएँ बनती हैं, भावनाएँ आदतें बनती हैं, और आदतें हमारी वास्तविकता।


यदि हम दुनिया के बारे में नकारात्मक तरीके से बोलते हैं, तो अवचेतन मन हमारी दुनिया को उसी दृष्टि से बनाना शुरू कर देता है।

अनजाने में हम खुद के लिए ही कठिनाइयाँ, समस्याएँ और नकारात्मक परिस्थितियाँ आकर्षित करने लगते हैं।


कैसे आपके शब्द आपकी नियति बनाते हैं


मान लीजिए आप कहते हैं


“लोग भरोसे के लायक नहीं।” आपको अधिक धोखे मिलेंगे।


“मैं तो हमेशा असफल रहता हूँ।” असफलता बढ़ती जाएगी।


“मेरी किस्मत खराब है।” अवचेतन मन आपको ऐसे अवसर दिखाना बंद कर देगा जहाँ किस्मत आपके पक्ष में होती।


असल में आपकी बातें भविष्य का रास्ता बन जाती हैं।

अवचेतन मन उसी रास्ते पर आपको चलाना शुरू कर देता है।


तो समाधान क्या है?


1. शब्दों को फ़िल्टर करें


सोच-समझकर बोलें, क्योंकि हर शब्द अंदर ही अंकुरित होता है।


2. दूसरों पर दया और सम्मान दिखाएँ


दूसरों के लिए कही गई सकारात्मक बातें भी आपके भीतर ही फल देती हैं।


3. आलोचना से पहले रुककर सोचें


क्या यह बात जरूरी है?

क्या इससे मुझे या किसी को सुधरने में मदद मिलेगी?


4. आत्म-संवाद को कोमल बनाएं


अवचेतन मन आपकी आवाज़ को सच मानता है।

इसे प्यार दें, यह आपको वह जीवन देगा जिसे आप चाहते हैं।


5. भावना की जिम्मेदारी लें


जो आप महसूस करते हैं, वही आप अपने जीवन में बनाते हैं।


         " अवचेतन मन आपका दर्पण है"


इस गहरे सत्य को समझ लेने से जीवन बदलने लगता है

कि आपका अवचेतन मन केवल आपको जानता है।

इसलिए दुनिया में कही गई हर बात अंततः आपके भीतर ही वापस आती है।


जब यह बात भीतर तक समझ में आ जाती है,

तो व्यक्ति दूसरों पर प्रहार करना बंद कर देता है और

अपने भीतर की दुनिया को सुंदर बनाने पर ध्यान देना शुरू करता है।


और जैसा आपका अंदर है वैसी ही बाहरी दुनिया आकार लेने लगती है।

Friday, November 28, 2025

ॐ का रहस्य : ब्रह्मांड की पहली ध्वनि

 ॐ का रहस्य : ब्रह्मांड की पहली ध्वनि


मन को नियंत्रण में रखकर किए गए शब्द-उच्चारण को मंत्र कहा जाता है। मंत्र-विज्ञान हमारे तन और मन दोनों को प्रभावित करता है, इसलिए कहा गया है— “जैसा मन, वैसा तन।”

मन को शांत और स्थिर रखने का सबसे सरल साधन है— ॐ का जप।


ॐ – तीन अक्षरों का विराट ब्रह्मांड


ॐ तीन ध्वनियों से बना है— अ, उ, म।


अ – सृजन, व्यापकता और उपासना का प्रतीक।


उ – बुद्धि, नियम, सूक्ष्मता और संचालन का संकेत।


म – अनंतता, ज्ञान, पालन और स्थिरता का रूप।


इन तीनों का सम्मिलित अर्थ है— परम सत्ता का सम्पूर्ण रूप, इसलिए इसे सभी मंत्रों का बीज मंत्र कहा गया है।


ब्रह्मांड की पहली ध्वनि


पुराण कहते हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में जो पहली अनाहत ध्वनि गूंजी वह थी— ॐ।

यह ध्वनि किसी टकराव से नहीं बनी, बल्कि स्वयं ब्रह्मांड की गति और ऊर्जा से उत्पन्न हुई।

ध्यान की गहन अवस्था में साधक आज भी इस अनहद नाद को सुनते हैं और इसे परम शांति का स्रोत बताते हैं।


आध्यात्मिक रहस्य


ओम् का जप मन को शुद्ध करता है।


व्यक्ति को परमात्मा के निकट लाता है।


साधना में स्थिरता, मौन और अंतरात्मा की जागृति बढ़ाता है।


ईश्वर की अनुभूति हेतु यह सबसे सरल मार्ग माना गया है।


इसलिए हर मंत्र की शुरुआत ॐ से होती है—

ॐ नमः शिवाय, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, आदि।


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ॐ के वैज्ञानिक लाभ


मंत्र का उच्चारण केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि वैज्ञानिक कंपन है।

ओम् का उच्चारण शरीर के विभिन्न हिस्सों— जीभ, तालू, कंठ, फेफड़ों और नाभि— में कंपन पैदा करता है, जो सीधे ग्रंथियों और चक्रों को सक्रिय करता है।


प्रमुख लाभ :


1. तनाव दूर करता है, शरीर पूरी तरह रिलैक्स होता है।


2. घबराहट और अधीरता कुछ ही मिनटों में गायब होती है।


3. शरीर में फैले विषाक्त तत्वों का संतुलन बनाता है।


4. हृदय और रक्तसंचार को नियमित करता है।


5. पाचन शक्ति तेज होती है।


6. शरीर में युवावस्था जैसी ऊर्जा लौट आती है।


7. थकान दूर होती है।


8. अनिद्रा का श्रेष्ठ उपचार— नींद आने तक मन ही मन इसका जप करें।


9. कुछ प्राणायाम के साथ करने पर फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है।


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वास्तु और मानसिक ऊर्जा पर प्रभाव


वास्तुविद मानते हैं कि घर में अक्सर जप किया जाए तो


नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है,


वातावरण शांत होता है,


मनोवैज्ञानिक तनाव हटता है।


प्रिय शब्दों से सकारात्मक हार्मोन बनते हैं,

अप्रिय शब्दों से विषैले रसायन।

इसलिए ॐ की शांत लय मन, मस्तिष्क और हृदय पर अमृत की तरह काम करती है।


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108 बार जप क्यों?


कम से कम 108 बार ॐ का उच्चारण करने से—


शरीर तनावमुक्त हो जाता है


ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है


प्रकृति के साथ तालमेल बनता है


परिस्थितियों का पूर्वानुमान करने की क्षमता बढ़ती है


व्यवहार में शालीनता और धैर्य आता है


निराशा, उदासी और आत्महत्या जैसे विचार दूर होते हैं


बच्चों में पढ़ाई का मन न लगे या स्मरण शक्ति कमजोर हो—

नियमित ओम् जप से अद्भुत लाभ मिलता है।


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उच्चारण की सही विधि


प्रातः स्नान के बाद शांत वातावरण में बैठें।


मुद्रा : पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन या वज्रासन।


जितनी बार समय मिले— 5, 7, 10 या 21 बार।


पहले “ओ——” को लंबा खींचें, अंत में “म्” हल्की गूंज की तरह।


जप माला से भी कर सकते हैं।


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निष्कर्ष


ॐ केवल एक मंत्र नहीं — यह आत्मा का संगीत है, ब्रह्मांड की धड़कन है।

यह वह ध्वनि है जो हमें प्रकृति, ऊर्जा, चेतना और ईश्वर से जोड़ती है।

जो इसे नियमित करता है, उसके जीवन में शांति, स्थिरता, स्फूर्ति और दिव्यता स्वयं उतर आती है।

Thursday, November 27, 2025

Raj Sir Words



दोस्तों क्या खूब लिखा है लिखने वाले ने...सत्य मेंरी माता है, ज्ञान ही मेरे पिता है, धर्म मेरा भाई है, दया मेरी बहन है, शांति मेरी पत्नी है तथा दया और क्षमा मेरे पुत्र है...हालात खराब हों तो लोग हाल पूछ कर मजे लेते हैं...प्रशंसा के पुल पर सफलता की इमारत खड़ी नहीं होती.सफलता का भवन बनाने के लिए परिश्रम के मज़बूत खंभों की ज़रूरत होती है.सबका स्थान सीमित रखिए यही सब से उत्तम तरीका है स्वयं को प्रसन्न रखने का...सदैव ध्यान रखे कि मृत्युलोक में भले ही कुछ तुच्छ प्राणी आपके कार्यों की निंदा करे या आपका अपमान करे पर वह उनका कर्म है , उन्हें करने दें, आप अपना सत्कर्म करे, समय आने पर कर्म अनुसार फल मिलना ही है...तुलनाये कभी भी किसी से मत करिए स्वयं में अच्छा होने और स्वयं से अच्छा करने का प्रयास करिए.यदि हम अपने अंदर सचमुच चमत्कारी शक्तियों का उदय करना चाहते हैं तो सबसे पहले हमें अपने आप को दूसरों से तुलनाये करने से ब्रेक अप लेना होगा...फिर अपने भावनाओं के जरिए अपने आप को सबसे अच्छा होने का ख्वाब देखने की आदत बनानी होगी. यह स्वयं से अच्छा करने का सबसे कारगर प्रयास होगा...इंसान को कोई किताब इतना नहीं बदल सकती, जितना उसके ऊपर गुजरी हुई तकलीफें, जिम्मेदारिया और मजबूरिया उसे बदल देते है...इंसान को बदलने वाली सबसे बड़ी चीज़ उसकी सोच होती है। उसकी ज़िंदगी में किस्मत और चाहत भी अहम भूमिका निभाते हैं। इंसान वही पाता है जिसकी वह सच्ची इच्छा और सोच रखता है, लेकिन केवल सोच लेने से कोई चीज़ पूरी नहीं होती। उसे पूरा करने के लिए साहस, मेहनत और क्षमता की भी जरूरत होती है। जब इंसान हिम्मत के साथ प्रयास करता है, तभी वह अपनी ज़िंदगी में आगे बढ़ पाता है...इंसान जीवन में सबको जानने के बाद एकांत चुनता है.इंसान जब लोगों के चेहरे, इरादे और सच्चाइयाँ पहचान लेता है,तब एकांत उसे दर्द नहीं देता सुकून देने लगता है। भरे बाज़ार से बेहतर लगने लगता है अपना शांत कमरा,क्योंकि वहीं वह खुद से सबसे सच्ची मुलाक़ात करता है...जीवन काल्पनिक है इस बात का प्रमाण मृत्यु हैं लेकिन मुर्ख मनुष्य इस बात को समझने का प्रयास कभी नहीँ करते...सहानुभूति वो ताकत है जो सबसे कम लोगों में मिलती है.स्वयं को खोकर जीना सरल है पर स्वयं को पा कर जीना ही कौशल है...अदाकारी में माहिर सभी लोग बस वफादारी में हार जाते है...ज़िंदगी में एक बात तय है कि कुछ भी तय नहीं है...राज Sir

हल्की सी वफ़ा का भी वजन कितना होता है...

हर रात की आखिरी सोंच,हर सुबह की पहला ख्याल हो तुम दोस्त... तूने जिस कदर इश्क लुटाया है हम पर,एक बार तुम्हारे हिस्से जरूर आना चाहेगे हम दोस्त... प्रेम का कारण चाहे जो भी हो,ठहराव का कारण हमेशा समझदारी और विश्वास ही होता है दोस्त...शब्द ही खुशी शब्द ही ग़म,शब्द ही पीड़ा और शब्द ही मरहम दोस्त...दुःख तो तब होता हैं जब हमें एहसास हो,की जिसे हम महत्व दे रहे हैं उसकी नज़रों में हमरा कोई महत्व नहीं हैं दोस्त...अहसास के तराज़ू पर तोल कर देखो,हल्की सी वफ़ा का भी वजन कितना होता दोस्त...जब कभी भी तुम दुनिया से थक कर‌ मायूस हो जाओ,धीरे से एक बार पीछे मुड़कर देख लेना वहा मैं तुम्हे जरूर दिखूंगा दोस्त...अक्सर वही दिए हाथों को जला देते हैं, जिनको हम हथेली से हवाओं से बचा रहे होते हैं दोस्त...अब तक की सभी घटनाओं में, तुम मेरे जीवन में घटित मेरी सबसे पसंदीदा और खूबसूरत घटना हो दोस्त...मेरा प्रेम तुम्हारे लिए घर के बाहर बने स्वास्तिक के निशान जैसा है ,जो तुम्हारे लिए हमेशा मंगल कामना करता है दोस्त...ये नरम लहजा, गंदी बातें, ये ठरकीपन सब तेरे लिए है,हम इस लहज़े में सबसे बात नहीं करते...मैंने कब कहा तुमसे की तुम मुझे मिल ही जाए,बस इतना दिखे की ऑंखों और दिल को सुकून आ जाए दोस्त...उदासी शाम, तन्हाइयो कि कसक,यादों की बेचैनी, बेक़रारीया दिल कि यही मेरे अपने है दोस्त...राज

I never forget you...

I hope you never get tired of loving me. No matter what happens to us, I hope you still choose to stay with me. I know that I am not perfect. I'm sorry for all the times that I hurt you unintentionally. But I want you to know that I never want to lose you. I still love you even though there are so many times where you break my heart and make me sad. I hope one day you'll finally realize how much you mean to me. I want you to know that even if you hate me sometimes, I will still love you with all my heart. I cannot promise you that things will get better soon, but I will try my best to make you feel loved and valued...I never forget you... Raj

10 MOST MISTAKES IN LIFE...


1. "Mistakes are the portals of discovery." - James Joyce


2. "YOU make mistakes. MISTAKES DON'T MAKE YOU." - Maxwell Maltz


3. "Mistakes are the growing pains of WISDOM." - William George Jordan


4. "If you're not making mistakes, then you're not making decisions." - Catherine Cook


5. "Fear of mistakes is the root of lack of confidence." - Dan Rockwell


6. "An error doesn't become a mistake until you refuse to correct it." - Orlando A. Battista


7. "Fear of mistakes is just another way of procrastinating, of never moving forward." - Robin S. Sharma


8. "The greatest mistake you can make in life is to be continually fearing you will make one." - Elbert Hubbard


9. "I can accept failure, everyone fails at something. But I can't accept not trying." - Michael Jordan


10. "The only real mistake is the one from which we learn nothing." - Henry Ford



Have a wonderful night friends...

सात्विक जीवन का संदेश




सात्विक जीवन का संदेश


आज दुनिया में बहुत शोर है,
हर कोई अपनी बात को सही बताता है,
कोई कहता – “मेरा धर्म बड़ा”,
कोई कहता – “मेरा भगवान सच्चा है।”

पर क्या कभी किसी ने सोचा,
ईश्वर, अल्लाह, गॉड या राम 
नाम अलग हैं, पर भावना एक ही है,
सबमें बसता वही एक प्रकाश, वही एक धाम।

जब हम जन्म लेते हैं,
ना कोई पंथ होता, ना कोई जात,
केवल एक मासूम बच्चा होता,
जिसके मन में न द्वेष, न कोई घात।

पर धीरे-धीरे हम सीखते हैं,
कौन अपना, कौन पराया है,
कौन ऊँचा, कौन नीचा है,
और मन में अंधेरा छा जाता है।

रजोगुणी बुद्धिवाद चमकता जरूर है,
पर उसके भीतर सच्ची शांति नहीं,
तमोगुणी अंधविश्वास डराता जरूर है,
पर उसमें सच्चा प्रेम कहीं नहीं।

सात्विकता ही एक रास्ता है,
जहाँ मन शांत होता है,
जहाँ हृदय प्रेम से भरता है,
जहाँ जीवन में उजियारा होता है।

सात्विक जीवन का मतलब क्या?
सादा खाना, सच्चे विचार,
किसी को चोट न पहुँचाना,
हर जीव में भगवान का आकार।

बच्चों को यही सिखाना चाहिए,
कि दया ही सबसे बड़ा धर्म है,
कभी झूठ, छल, घृणा न करना,
प्रेम ही जीवन का मर्म है।

माँ-बाप खुद उदाहरण बनें,
बच्चे वही करते हैं जो देखते हैं,
अगर घर में झगड़े, ईर्ष्या हों,
तो संस्कार कैसे टिकते हैं?

गुरु, आचार्य और शिक्षक भी,
सिखाएँ बच्चों को सच्चा मार्ग,
कहें कि इंसान पहले मनुष्य बने,
फिर माने कोई भी ईश्वर जाग।

ना कोई छोटा, ना कोई बड़ा,
ना कोई हिंदू, ना कोई मुसलमान,
सबका रचयिता एक ही है,
सबकी साँसों में वही भगवान।

जो इसे समझ गया,
वह किसी से नफरत नहीं करेगा,
वह हर जीव से प्रेम करेगा,
हर स्थिति में शांत रहेगा।

समाज तभी बचेगा,
जब राजनीति धर्म पर न बिकेगी,
जब नेता लोगों को बाँटे नहीं,
बल्कि जोड़ने की बात करेगा।

जब मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारे,
सब कहेंगे “हम सब एक हैं”,
जब मानवता धर्म से ऊपर होगी,
तभी धरती पर सच्ची स्वर्ग बनेंगे।

हर माँ-बाप, हर गुरु, हर नेता,
अगर सात्विकता को अपनाएगा,
तो यह देश और दुनिया,
फिर से उजियारा पाएगा।

शायद यह बात आज कोई न सुने,
क्योंकि दुनिया में बहुत शोर है,
पर जिसने प्रेम और दया को जान लिया,
वह हर हाल में खुश और चितचोर है।

तो आओ 
अपने घर से ही शुरुआत करें,
बच्चों को सिखाएँ सच्चा जीवन,
हर दिन थोड़ा और सात्विक बनें।

झूठ, छल, ईर्ष्या, क्रोध को त्यागें,
सादा जीवन, उच्च विचार अपनाएँ,
जो मिला है, उसमें संतोष करें,
सबसे पहले खुद मनुष्य बन जाएँ।

तभी जीवन में शांति होगी,
तभी घर में सुख रहेगा,
तभी समाज और देश में
सच्चा प्रेम बसेगा।

क्योंकि सात्विकता ही जीवन का सार है,
बाकी सब बातें बस गुज़रती धार हैं।

Tuesday, November 25, 2025

शायद यही मोहब्बत है



कभी-कभी किसी से इतना गहरा लगाव हो जाता है, कि वो सिर्फ इंसान नहीं रहता एहसास बन जाता है।ऐसा एहसास, जो सांसों की तरह होता है… दिखता नहीं, पर उसके बिना सब कुछ अधूरा लगता है।

बस एक दिन उससे बात न हो, तो लगता है जैसे दिन अधूरा है

फोन की स्क्रीन बार-बार जलती है,

हर नोटिफिकेशन पर दिल धड़कता है 

“शायद उसी का मैसेज हो…”

पर जब नहीं होता, तो वो धड़कन भी खामोशी में बदल जाती है।

कभी लगता है खुद से कह दूं 

“क्या हुआ, एक दिन ही तो बात नहीं हुई।”

पर दिल मानता कहाँ है!

वो कहता है 

एक दिन नहीं, पूरी उम्र सूनी लग रही है बिना उसके।


उसकी हंसी याद आती है,

वो छोटे-छोटे नखरे, वो ‘पता नहीं’ बोलकर छेड़ना,वो हर बात में छिपा है 

वो जब कहती थी, “तुम पागल हो ना,”

और मैं जवाब देता था, तेरे लिए ही तो 

और फिर एहसास होता है 

प्यार का मतलब हमेशा साथ होना नहीं,

कभी-कभी बस उसका न होना ही ये जताने को काफी होता है

कि वो तुम्हारे भीतर कितना गहराई तक बस चुका है।

शायद यही मोहब्बत है 

जब एक दिन की खामोशी, हज़ार बातों से ज़्यादा बोल जाती है…

और उस खामोशी में भी बस एक ही आवाज़ आती है 

“कब बात होगी फिर?”

Sunday, November 23, 2025

Raj Sir Words


What is definition of ability & self confidence... Ability is allow to do something special but self confidence is instruct you to do anything else whatever you want in your planing life...


Who is your planner...Your own mind...Since your planning is on base of so many dream as per your life wish... According to it...your mind is more important than your thought...but both are cofused by your own society people... Never care about it...Go ahead... And do What your mind want to do... Friend once again I say... Our mind mad computer... Computer did not make our mind... Therefore computer is producer of our mind... Plan your work and work on your planing... Accelerat your mind as per your pickup... Your achievement will be in your foot...Raj Sir


इन हिंदी...




योग्यता और आत्मविश्वास की परिभाषा क्या है...योग्यता आपको कुछ खास करने की अनुमति देती है, लेकिन आत्मविश्वास आपको अपने नियोजित जीवन में जो चाहें करने का निर्देश देता है...


आपका योजनाकार कौन है...आपका अपना मन...चूँकि आपकी योजनाएँ आपके जीवन की इच्छाओं के अनुसार कई सपनों पर आधारित होती हैं... इसके अनुसार...आपका मन आपके विचारों से ज़्यादा महत्वपूर्ण है...लेकिन दोनों ही आपके अपने समाज के लोगों द्वारा भ्रमित किया जाता हैं...इसकी परवाह मत करो...आगे बढ़ो...और वही करो जो तुम्हारा मन करना चाहता है...दोस्त, एक बार फिर मैंने कहता हूँ...हमारे मन ने कंप्यूटर बनाया...कंप्यूटर ने हमारे मन को नहीं बनाया...इसलिए कंप्यूटर हमारे मन का आविष्कार है...अपने काम की योजना बनाओ और अपनी योजना पर काम करो...अपने मन को अपनी गति के अनुसार गति दो...आपकी उपलब्धि आपके कदमों में होगी...राज सर


दीवानो के किश्मत में तो तन्हाई और जुदाई है ही,पर कुछ लोग उनके फूलो के मौसम का बहुत गलत फ़ायदा उठाते दोस्त...तेरी दीवानगी का सरूर इतना है मेरे अंदर, की अब मैं तेरे प्यार में आवारगी करना सरु कर दिया है दोस्त...तेरे याद तो मुझमें पल पल रहती है और रहेगी, मेंरी मोहब्बत आजमाइस नहीँ गुजारिश है दोस्त...पता नहीं मैं तेरे ख्याल में रहता हूँ की नहीँ, पर तू तो मेंरी जिंदिगी की ख्वाब और खोवाइस दोनों हो दोस्त...सुन ना तेरे से एक बात कहनी है दोस्त, तू सोंच अपनी बदल दे क्यूंकि तेरी अनुमान मेरे अरमान को मार रहे दोस्त...प्यार की परिभाषा तो तूने मुझे समझाने की कोशिश की, जब मैं समझने लगा तो दूर क्यों जाना चाहते हो दोस्त... देख यार तेरी यारी मेरे लिए गद्दारी न बन जाय, इससे पहले हम दोनों को अपनी वफ़ादारी निभाना होगा दोस्त...कृष्ण रुक्मणि के होके भी राधा के रहे यार, मैं तो तेरा पहला कृष्ण था दोस्त...विश्वास कर अब तेरे प्यार में मैं कुछ ऐसा कर जाऊंगा, जो तेरे पुरे जिंदिगी कोइ नहीं कर पाएगा दोस्त... One Qutatetion in English for love ... Too much mony may be many things dost but it can never take place of so many peaceful place...दिल, जिगर, ज़िन्दगी क्या चीज क्या तेरे लिए है दोस्त...तुम तो ऐ बता पहली मोहब्बत आखरी खोइस क्या है उसपे सब कुर्बान है...दस्तूर और कसूर दोनों दिल और नजरो का कसूर होता है...पर इल्जाम सिर्फ दो दिलो के ऊपर होती है दोस्त...हो सकता है मेरे इस बेकरारी से तुझे करार आता हो, पर मैंने तुझ पर एतवार और तेरे इकरार दोनों को पाला है दोस्त...प्यार की वो सौगाते कैसे मैं भुलादू दोस्त, आज जो कुछ भी हूँ उसी के बदौलत हूँ... तेरा राज...

जब तुम्हरा कोई बेगाना सा सलूक करे, तब तुम आँख बंद कर के अपने अफसाने को याद करना...ऐसे दीवाने बहुत कम लोगो के किश्मत के नशीब होते है...मेरे नजरओ का तो दीदार हो ही तुम, पर मेरे दिल के प्यार होने से क्यों कतराते हो यार... यार प्यार वसना नहीँ है,ऐ तो उन दो दिलो के उपसना और असना है जो न किसी का हुआ न किसी को किसी का होने दिया... तुम क्या सोचती जिस्म का मिलन इकरार है, पागल जब जिस्म जा रहा था तो रूह मुस्करा रहा था...और सुन दिल किसी खूबसूरत चेहरे को कभी नहीँ जनता, दिल उस चेहरा को जनता है जो उसके लिये हमेसा लाजबाब है...और बताऊ तुझे, बंदना, आरती, पूजा, उपसना, रोना धोना, हाथ पर ब्लेंड से लकीर खींचना हम दोनों के नाम के ये सब ऐ तेरे मोहब्बत की नशानी है...love statement for u... Monny may be many things for you & me.. But mind on this matter...it can never take place of evening things... Your love can be for you or not for me.... Because of it you have no knowledge what is definition of abilitys& self confidence...रात अधूरी होती जान तेरे बिना, पर तु अपनी अधूरी राते हँसी ख़ुशी के साथ सही गुजार रही है... तुझे ना देखु तो चैन मुझे आता नहीँ... इस पल में कोइ तेरे सिवा मुझे बहलता नहीं...किसी न किसी को किसी पर एतबार हो जाता है,एक अजनबी सा चेहरा ही यार हो जाता है,खूबियों से ही नही होती मोहब्बत सदा किसी की,कमीयो से भी कभी प्यार हो जाता है...राज


तन्हाई भी उस हरजाई हमसफ़र की तरह होती...


मैं अक्सर सोचता हूँ,कि ये जो शब्द काग़ज़ पर उतरते हैं,ये कहाँ से आते हैं...


शायद...जब तुम चुप हो जाती हो,तो तुम्हारी ख़ामोशी मेरे अंदर कुछ कहने लगती है..


जब तुम दूर हो जाती हो,तो तुम्हारी कमी अल्फ़ाज़ में आकार लेने लगती है...


मैं जब भी कुछ लिखता हूँ,तो वो कविता नहीं होती—

वो तुम्हारा अक्स होता है,तुम्हारे होने और न होने के बीच की लड़ाई...


लोग कहते हैं...बहुत गहराई है तुम्हारे शब्दों में…

उन्हें क्या पता,हर पंक्ति में मैंने तुम्हारा चेहरा गढ़ा है...


तुम मेरी कलम की सबसे प्यारी गलती हो,जिसे हर बार दोहराने का मन करता है...


तुम्हें भुलाने की कोशिश में ही मैंने लिखना सीखा है,

और अब...तुम्हें महसूस करते हुए हर शब्द बस 'तुम' बन जाता है...


कुछ तारीखें...कुछ लम्हें...और कुछ खास दिन होते हैं...जो वक़्त के सैलाब में भी फीके नहीं पड़ते...


ये वो सुनहरी यादें होती हैं...जो दिल के कोने-कोने में बस जाती हैं,हर दर्द को सहलाती हैं,और हर खुशी को दोगुना कर देती हैं...


ये यादें हमारे जज़्बातों की वो कश्ती हैं...जो हर तूफान में हमें किनारे तक पहुंचाती हैं...कुछ पल, कुछ चेहरे, कुछ बातें ऐसी होती हैं...जो ज़िंदगी की किताब में

सबसे खूबसूरत अफसाने बनकर रह जाती हैं...


जब कोई चुप हो, तो हम बोलने की बजाय बस उसके पास बैठ जाएँ, बिना घड़ी देखे, बिना कोई समाधान दिए...


जब कोई ग़लती कर बैठे, तो उसे उसकी ग़लती से ज़्यादा उसकी थकान को समझें और उसका हाथ पकड़ लें, "चलो, दोबारा कोशिश करते हैं" कहने के लिए...


जब हम ग़ुस्से में हों, तो जीतने की बजाय समझने की कोशिश करें — "क्या तुम थके हुए हो?" इतना पूछ लेना भी प्रेम है...


जब कोई हमें दूर करे, तो हम ज़बरदस्ती न करें — लेकिन एक छोटा सा संदेश छोड़ दें, "मैं यहीं हूँ, जब भी चाहो...


किसी का डर या अनजाना दुख दिखे, तो यह न कहें कि “डरने की ज़रूरत नहीं” — बस आँखों में आँखें डालकर कहें, “मैं समझता हूँ...


जब कोई हमारे करीब आना चाहे, अपने पूरे सच के साथ, तो हम खुद को थोड़ा सा खोल दें — ताकि वो देख सके कि वो अकेला नहीं है...


इस दर्शन में प्रेम चिल्लाता नहीं, वह धीरे से दरवाज़ा खोलता है...


शब्द नहीं, स्पर्श बनो...

वादे नहीं, उपस्थिति बनो...

समझदारी नहीं, समझ बनो...


Some Special line in English...


As you get older, you start to see life differently. You begin to understand that true happiness is not about how much money you make, how many degrees you have, or how big your house or car is. At some point, material things lose their value. What truly matters is peace in your heart, joy in your days, and calmness in your life...


When you're young, it’s common to chase after success, status, and wealth. We often think these things will make us happy forever. But over time, we learn that real happiness comes from the simple things—like sitting with loved ones, laughing over old memories, or just enjoying a quiet evening at home...


Family and true friends become your most valuable treasures. The people who care for you, who are there during tough times, who love you for who you are these are the ones that really matter. Their support means more than anything money can buy...


You stop needing more and start feeling thankful for what you already have. You learn that having a few close, real friends is better than having many fake ones. A small, peaceful home is better than a large, stressful one. And a heart full of love is more valuable than a bank account full of money...


With age, you discover the best things in life aren’t things at all. Love, peace, kindness, and simple joys bring the most happiness. And that’s when you truly start living...


In the end, life isn’t about what you own, it’s about how you feel, who you love, and how you spend your time...


Have a wonderful night Friends...



जो लोग प्यार प्यार की मायने समझते उनके के लिए... ऐ प्यार भरा शब्द है मेरे ओर से...राज...


यह बात सच है कि जिन लोगों के करीब बहुत लोग होते हैं, उनसे अक्सर दूरी बनाना ही बेहतर होता है। क्योंकि जब आप बहुत करीब होते हैं, तो लोग आपकी अच्छाई को मान लेते हैं और आपकी कमजोरियों को नजरअंदाज कर देते हैं। लेकिन जब आप दूरी बनाए रखते हैं, तो लोग आपकी अच्छाई को और भी ज्यादा महसूस करते हैं और आपकी जरूरत को समझते हैं।


यह वाक्य प्रेम की सच्चाई को दर्शाता है। प्रेम कभी भी संपत्ति या किसी और चीज़ की मांग नहीं करता, वह सिर्फ अपने प्रेमी के साथ और उनके प्रेम की मांग करता है। यह प्रेम की निस्वार्थ और शुद्ध भावना को प्रकट करता है।


बहुत ही सुंदर और रोमांटिक है आपका यह ख्याल! यह लाइनें दिल को छू जाती हैं और प्यार की गहराई को दर्शाती हैं। आपकी ख्यालों की दुनिया में उनका होना कितना खास है, यह बात बहुत ही खूबसूरती से व्यक्त की गई है।


यह एक गहरा और सुंदर विचार है! इसका अर्थ है कि अगर किसी से सच्चा प्रेम हो जाता है, तो उससे द्वेष या नफरत करना असंभव हो जाता है, भले ही वह व्यक्ति हमारे साथ गलत करे। प्रेम की भावना इतनी शक्तिशाली होती है कि वह हमारे दिल में द्वेष की जगह नहीं रहने देती।


Have a wonderful night friend...

Tuesday, November 4, 2025

माँ अनपढ़ सही, पर जीवन की किताब है

 "माँ अनपढ़ सही, पर जीवन की किताब है"


एक बच्चा नंबर लाया, नब्बे प्रतिशत पास,

बाप ने खुश हो बोला, आज बनेगा खास पकवान।

माँ दौड़ी आई बोली दिखा तो सही बेटा मेरा,

क्या कमाल कर दिया इसने, देखूँ मैं भी ज़रा।


पर बेटे ने कह डाला “माँ कुछ नहीं समझेगी,

ये अनपढ़ है, रिज़ल्ट क्या जानेगी?”

उसकी बात से माँ की आँखें भर आईं,

चुपचाप फिर रसोई में खीर बनाने चल पड़ी भाई।


पिता ने बेटे को समझाया 

हाँ बेटा, तेरी माँ अनपढ़ है,

पर सुन जो अब मैं बताता हूँ,

जिससे तेरी सोच का भ्रम हटता है।


जब शादी के बाद तू पेट में आया,

माँ ने हर ख्वाहिश, हर सपना तज दिया।

दूध से नफ़रत थी उसे, पर तेरे लिए पीती थी,

तेरे अच्छे स्वास्थ्य के लिए वो खुद से भी लड़ती थी।


हर सुबह उठकर तेरे लिए नाश्ता बनाती,

तू स्कूल जाए समय पे, इसलिए खुद नींद भूल जाती।

रात में तू पढ़ते-पढ़ते सो जाता,

माँ चुपचाप तेरी किताबें समेटती जाती।


तू बीमार रहता माँ सारी रात जागती,

सुबह होते ही फिर काम में लग जाती।

तेरे लिए ब्रांडेड कपड़े,

माँ ने अपना साड़ी भी सालों न बदले।


बेटा, पढ़े-लिखों का मतलब सिर्फ डिग्री नहीं होता,

माँ की ममता, त्याग उससे बड़ा कुछ नहीं होता।

माँ अनपढ़ सही, पर हर रिश्ते की जान है,

तेरी असली गुरू, तेरे जीवन की पहचान है।


बेटा रोते हुए बोला 

“माँ, मैंने तो बस अंक पाए हैं,

पर आपसे बड़ा ज्ञान कोई न पाए है।

आपने ही मुझे सिखाया क्या है जीवन,

आज भी मैं अनपढ़ हूँ,

अगर माँ को समझ न पाया ये मन।”


तो सलाम है उस माँ को,

जो पढ़ न सकी किताबें,

पर बना गई एक इंसान,

जो कर सके ज़िंदगी में कुछ कमाल।


दशहरा-दीवाली के इस पर्व के बाद,

चलो माँ को करें दिल से याद।

माँ है तो सब कुछ है,

वरना हर जीत अधूरी है।


🙏 "माँ को सम्मान दें, क्योंकि वही है जीवन का पहला पाठशाला।" 🙏

ग़रीबी की असली जड़

 "ग़रीबी की असली जड़"


ग़रीबी पैसे की कमी नहीं, सोच की हार है,

यह एक आदत है जो भीतर छिपा विकार है।

पचास हज़ार कमा कर भी कोई खाली रह जाता है,

क्योंकि पैसा नहीं, नियंत्रण ही दौलत का रास्ता है।


जब “ना” कहना मुश्किल हो, तब विनाश शुरू होता है,

भोग की चाह में मनुष्य अपने मूल से दूर होता है।

खर्च बढ़ता है जहाँ इच्छाएँ बेलगाम हो जाती हैं,

और भावनाओं की लहरों में पूरी कमाई बह जाती है।


कमी आमदनी की नहीं, आदतों की है जनाब,

कम में भी बचाया जाए तो बनता है हिसाब।

जो दो हज़ार बचा ले, वो बीस हज़ार उड़ाने वाले से आगे है,

क्योंकि वो भविष्य बनाता है, दूसरा दिखावे में भागे है।


भोग-विलास आज का नया जाल है,

मोबाइल, पार्टी, रिश्तों का बेहिसाब माल है।

हर "एंजॉयमेंट" जो जेब हल्की करे,

दरअसल वो ग़रीबी की चुपचाप रखी ईंटें गढ़े।


जिन्हें खुद पर काबू नहीं, वो कभी ऊँचा नहीं उड़ते,

थोड़ी सफलता पाते ही अपने ही बोझ से टूटते।

क्योंकि जो भूखे थे अनुशासन के,

वो अमीरी में मदहोश हो जाते हैं और खो देते हैं सबके सबके।


लोग आज मेहनत नहीं करते तरक्की के लिए,

बल्कि approval के लिए, validation के लिए।

महँगा फोन, महँगा कपड़ा, दिखावे का प्यार,

इन सबसे ना कोई बचत होती, ना कोई संवार।


ध्यान बंटा हो जहाँ-तहाँ, वहाँ फोकस कहाँ से आए?

ऊर्जा बहे व्यर्थ में तो लक्ष्य तक कौन जाए?

स्त्री, शराब, सोशल मीडिया यही तो खलीफा हैं,

जो हर पुरुष की ताक़त को चुपचाप लुटा देते हैं।


असली अमीरी शांति में बसती है, शोर में नहीं,

जो कम कमाता है पर सोचता गहरे वो गरीब नहीं।

जो नियंत्रण में जीता है, भविष्य उसी के क़दम चूमता है,

और जो उछलता है अभी वो कल आँसू में डूबता है।


तो सुन लो अब एक अंतिम चेतावनी की बात,

पैसे की भूख नहीं नियंत्रण की कमी है असली ज़हर की सौगात।

अगर खुद को ना संभाल सको 

तो लाखों भी आएं, फिर भी तुम फटेहाल रहोगे।


ज़रूरत नहीं है ज़्यादा कमाने की,

ज़रूरत है खुद को साधने की।

क्योंकि जहाँ नियंत्रण है, वहाँ उन्नति निश्चित है 

और जहाँ सिर्फ़ इच्छाएँ हैं, वहाँ ग़रीबी अपरिहार्य है।

मन की दौड़

 "मन की दौड़"


ज़िन्दगी कोई प्रतियोगिता नहीं,

हर कोई अपनी राह पर है,

वक़्त की रेत पर सबके पाँव

अलग दिशा में चलते हैं।


कोई मंज़िल जल्दी पा लेता है,

कोई देर से पहुँचता है 

पर रास्ते वही सबसे गहरे होते हैं

जहाँ अकेलापन भी साथी बन जाता है।


हर आत्मा का एक संघर्ष है,

हर मुस्कान के पीछे एक सिसकती रात।

तू देखता है मुझे और सोचता है 

"ये तो कुछ भी नहीं झेलता होगा…"


पर सच तो ये है कि

हम सब बिखरे हुए हैं किसी न किसी रूप में,

कुछ ज़ख़्म हँसकर छुपा लेते हैं,

कुछ खुद को "बुरा" कहलवाकर

अपने दर्द से बदला लेते हैं।


हाँ, मेरा अहंकार ऊँचा है,

इतना कि नफ़रत भी अब इज़्ज़त सी लगती है,

लोग जब पीठ पीछे बुरा कहते हैं,

तो यकीन हो जाता है 

अब मैं खुद के सच के क़रीब हूँ।


क्योंकि "अच्छा" बनकर भी

कई बार बिखर जाते हैं लोग,

पर "बुरा" बनकर 

वो अपनी हदों से वाक़िफ़ हो जाते हैं।


शायद यही वजह है

कि कुछ औरतें “बुरे लड़कों” की ओर खिंच जाती हैं 

जो दर्द छुपाकर हँसते हैं,

जो ज़िन्दगी की किताब बिना मुखपृष्ठ के पढ़ते हैं।


ऐसा नहीं कि उन्हें प्यार की तमीज़ नहीं,

पर वो गहराई में उतरने से डरते नहीं।

जो सच को कहने की हिम्मत रखते हैं,

और झूठ की पॉलिश में चमकते नहीं।


पर जब कोई ऐसा मिल जाता है,

जो तुम्हारे मन की भाषा समझता है 

बिना कहे पढ़ लेता है वो बातें

जो तुमने कभी खुद से भी न कहीं हों 


तो उस एक क्षण में,

हर भ्रम टूट जाता है,

हर दीवार गिर जाती है,

और तुम जान जाते हो 


“शरीर का साथ एक सुख है,

पर मन की समझ 

वो तो परम आत्मीयता है।”


तो चलो 

न तुलना करें, न दौड़ें,

अपनी चाल में चलें,

अपने सत्य में जलें।


क्योंकि अंत में,

सबसे सुंदर प्रेम वो होता है

जो तुम्हारे भीतर के तूफ़ान को

बिना डरे थाम लेता है।

समानता के रेखाचित्र

 "समानता के रेखाचित्र"


मांगना एक कर्म नहीं केवल यह संवाद है,

जहाँ अपनापन जन्म लेता है, जहां विस्थापित आत्माएं पाती हैं घर।

दौलत का माप, आर्थिक भूख की सीमा नहीं,

यह हृदय की गहराई, जहाँ बंधन बुनते हैं सहानुभूति के धागे।


विनम्रता वह कला है जो बराबरी में रंग भरती है,

मांगना और देना दो समानांतर धाराएँ जो मिलती हैं,

मज़लूमों के पैरों तले जब रखा जाए गरम रेत का बोझ,

तब ही समझ में आता है साझा दर्द का अर्थ और मूल्य।


जो मांगते हैं, वे खुद को मिटाते नहीं, वे अस्तित्व की पुष्टि करते हैं,

उनके छोटे-छोटे अनुरोधों में छुपा है समुदाय का आधार।

रिश्तों का ढांचा तब तक मजबूत रहता है, जब तक सहारा एकतरफा नहीं होता,

एक-दूसरे की जरूरतों को महसूस करना, यही है असली मानवता।


यह वही शिक्षा है जो माँ से मिली

कि सहानुभूति का अर्थ है कमजोर को कमजोर न समझना,

बल्कि उसे बराबर की ताकत देना,

जिसमें दोनों तरफ़ छिपी होती है परस्पर निर्भरता की महिमा।


यह ज्ञान नहीं, जीवन का अनिवार्य पाठ है

समाज तभी टिकता है जब हम एक-दूसरे के लिए सच्चे रहें,

जब माँग और देना, दोनों में हो गरिमा का समान वितरण,

तभी बनती है वह दुनिया जहाँ हर कोई महसूस करे “मैं भी यहाँ हूँ”।

देह, नशा और मनुष्य

 “आनंद की तलाश: देह, नशा और मनुष्य"


सेक्स यह शब्द अक्सर समाज में दो अतियों के बीच झूलता रहा है। कुछ इसे केवल प्राकृतिक प्रवृत्ति मानकर “जानवरों जैसी जरूरत” तक सीमित कर देते हैं, जबकि कुछ इसे जीवन की सबसे गूढ़ और रहस्यमय अनुभूति के रूप में देखते हैं। सच तो यह है कि सेक्स केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक यात्रा भी है।


मनुष्य जब किसी के साथ शारीरिक रूप से जुड़ता है, तो वह केवल देह नहीं, बल्कि अपने भीतर की एकांतता, जिज्ञासा और अधूरेपन को भी साझा कर रहा होता है। लेकिन अधिकांश लोग इस अनुभव की केवल सतह को छू पाते हैं वे उस गहराई में उतरने का साहस नहीं कर पाते, जहाँ देह के पार आत्मा का संवाद शुरू होता है।


समाज ने इस विषय को या तो पाप घोषित किया, या मनोरंजन का साधन बना दिया। परिणाम यह हुआ कि सेक्स एक ‘छिपाने योग्य’ अनुभव बन गया जबकि यह मनुष्य की भावनात्मक संरचना का अभिन्न हिस्सा है। इसी तरह नशे का आकर्षण भी उसी अनुभव-तृष्णा से जन्म लेता है। नशा केवल पदार्थ नहीं, बल्कि मन की एक खोज है एक ऐसी कोशिश जिससे व्यक्ति खुद को अपने सीमाओं से परे महसूस करना चाहता है।


सेक्स और नशा, दोनों में एक समानता है दोनों ही ‘स्व’ से परे जाने की लालसा हैं। कोई अपने भीतर की रिक्तता को देह के माध्यम से भरना चाहता है, तो कोई रसायन के सहारे चेतना को बदलना चाहता है। समाज इन प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने की कोशिश करता है, पर यह नहीं समझ पाता कि इनकी जड़ में मानव-मनोविज्ञान की गहरी भूख है प्रेम, जुड़ाव, और अर्थ की भूख।


जब तक हम सेक्स या नशे को केवल वर्जना या अपराध की दृष्टि से देखेंगे, तब तक हम उस मनोवैज्ञानिक सत्य को नहीं समझ पाएँगे, जो इनके पीछे छिपा है कि मनुष्य केवल सुख नहीं, अर्थ की तलाश में जीता है। और जब अर्थ की कमी होती है, तो वह उसे आनंद, नशे या संबंधों के अतिरेक में खोजता है।


सच्चा समाधान दमन में नहीं, बल्कि समझ में है उस आंतरिक खालीपन की पहचान में, जो हमें इन अनुभवों की ओर खींचता है। जब हम इस खोज को समझने लगते हैं, तभी सेक्स देह से संवाद बनता है और नशा आत्म-अभिज्ञान का रूप ले सकता है।

मौन और पुरुषार्थ: आत्मसंयम की कला

 "मौन और पुरुषार्थ: आत्मसंयम की कला"


आज का विश्व शोर और हलचल से भरा हुआ है। हर कोई अपनी बात साबित करने, अपनी पहचान बनाने और किसी न किसी रूप में नजर आने में व्यस्त है। शब्दों की भरमार में अक्सर समझ की कमी हो जाती है। ऐसे समय में, जो व्यक्ति चुप्पी साधता है, उसे अक्सर कमजोर या उदासीन समझा जाता है। परन्तु सत्य यह है कि मौन केवल अनुपस्थिति नहीं, बल्कि अदृश्य शक्ति और आत्मसंयम का प्रतीक है।


वे सोचते हैं तुम्हारा मौन तुम्हारी हार है।

वे मानते हैं तुम्हारी शांति निष्क्रियता है।

वे कहते हैं तुम्हारा दूर रहना, अनिच्छा या उदासीनता है।

पर वे भूल जाते हैं कि मौन कभी पराजय का संकेत नहीं होता। यह आत्म-नियंत्रण और गहन समझ की भाषा है।


एक सच्चा पुरुष अपने हर कदम की घोषणा नहीं करता। वह गणना करता है, निरीक्षण करता है और सही समय आने पर प्रहार करता है। यह वही कला है जो अर्जुन ने महाभारत की युद्धभूमि में अपनाई केवल वही धनुष उठाता है, जो समय और परिस्थिति के अनुसार सबसे उपयुक्त हो। यही सच्चा पुरुषार्थ है धैर्य, विवेक और शक्ति का संयोजन।


मौन उसकी कमजोरी नहीं, संयम है।

शांति उसकी निष्क्रियता नहीं, संतुलन है।

धैर्य उसकी पराजय नहीं, तपस्या है।


इतिहास और पौराणिक कथाएँ हमें यही सिखाती हैं।

चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में लिखा है कि सत्य और शक्ति का सही प्रयोग तभी वास्तविक प्रभाव डालता है, जब वह चुपचाप और सोच-समझकर किया जाए।

बुद्ध ने मौन और ध्यान को आत्मज्ञान का मार्ग बताया।

अर्जुन ने केवल सही समय पर ही धनुष उठाया और वही व्यक्ति सच्चा विजयी माना गया।


मौन उसकी तलवार है भ्रम और शोर को काटने वाली।

शांति उसका कवच है अज्ञान और जल्दबाजी से बचाने वाला।

संयम उसकी धारा है जो भीतर से शक्ति और स्पष्टता उत्पन्न करती है।

यह कला केवल शारीरिक शक्ति की नहीं, बल्कि मन और आत्मा की शक्ति की है।


जो व्यक्ति अपने भीतर का नियंत्रण पा चुका है, उसे बाहरी दुनिया जीतने की कोई जल्दी नहीं होती। उसने समझ लिया है कि सबसे बड़ा युद्ध स्वयं के भीतर का युद्ध है और सबसे महान विजय स्वयं पर विजय है।


मौन और संयम केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, यह जीवन जीने की कला और दर्शन हैं। यह कला बुद्धिमत्ता, धैर्य और दूरदर्शिता से ही संभव होती है। जो इसे अपनाता है, वह शोर और हलचल से भरे संसार में भी संतुल और स्थिर रहता है।


सच्चे पुरुषार्थ का माप केवल बाहरी सफलताओं से नहीं, बल्कि मन और आत्मा की स्थिरता, निर्णय की स्पष्टता और कार्य की प्रभावशीलता से होता है। जो व्यक्ति इन गुणों को आत्मसात कर लेता है, वह जीवन की हर परिस्थिति में शांति और शक्ति का सामंजस्य बनाए रखता है।


अतः मौन और आत्मसंयम केवल नैतिक गुण नहीं हैं, बल्कि जीवन के सबसे गहन रहस्यों की कुंजी हैं। यह वही रहस्य है जो हमें यह सिखाता है कि वास्तविक शक्ति दिखाने में नहीं, बल्कि समझने, सोचने और सही समय पर कार्य करने में है।


यह निबंध हमें यह याद दिलाता है कि सच्चा पुरुष वह है, जो चुप रहता है, पर भीतर से सबसे प्रखर होता है। जो संयमित है, वही मजबूत है। जो शांत है, वही संतुलित है। और जो अपने भीतर विजय प्राप्त कर चुका है, वही सच्चा स्वतंत्र और विजयी है।

मन की उदासी और भीतर की शांति की खोज

 "मन की उदासी और भीतर की शांति की खोज"


इंसान का जीवन सुख-सुविधाओं, सपनों और उम्मीदों से भरा हुआ है। हर कोई चाहता है कि उसे सुकून मिले, मन को ठहराव मिले। मगर यह सवाल हमेशा बना रहता है क्या यह सुकून बाहर की चीज़ों से मिलता है, या यह हमारे अंदर कहीं गहराई में छिपा है?


अक्सर जब ज़िंदगी हमारी उम्मीदों के अनुसार नहीं चलती, तो मन उदास हो जाता है। कभी किसी रिश्ते के टूटने से, कभी असफलता से, और कभी उस अजीब से खालीपन से जो सबकुछ होते हुए भी भीतर महसूस होता है। यही खालीपन इंसान को अंदर से तोड़ देता है और उसे अपने ही अस्तित्व से दूर कर देता है।


 उदासी की दो परतें बाहर की और अंदर की


हर उदासी की अपनी एक कहानी होती है। लेकिन उसकी जड़ें दो जगहों पर होती हैं बाहरी और भीतरी।


बाहरी उदासी


जब हालात इंसान के खिलाफ हो जाते हैं, तब यह उदासी जन्म लेती है।

जब कोई अपना साथ छोड़ दे, जब मेहनत के बावजूद सफलता न मिले, या जब सपने अधूरे रह जाएँ तब मन पर एक बोझ-सा छा जाता है।

यह उदासी कुछ समय की होती है, क्योंकि इसका कारण बाहरी दुनिया में छिपा होता है। जैसे ही परिस्थितियाँ बदलती हैं, यह भी बदल जाती है।


भीतरी उदासी


यह उदासी कहीं ज़्यादा गहरी होती है।

यह तब आती है जब इंसान के पास सबकुछ होता है, फिर भी भीतर से खालीपन महसूस होता है। यह उस ग़लत पहचान का परिणाम है जहाँ इंसान सोचने लगता है 


“मैं वही हूँ जो मेरे पास है।


लेकिन जब यह ‘पास’ छिन जाता है चाहे वह पैसा हो, संबंध हो या पहचान तब भीतर का आधार भी हिल जाता है। यही से शुरू होती है असली उदासी, जो किसी बाहरी कारण से नहीं, बल्कि खुद से दूर होने से पैदा होती है।


सुकून की तलाश में इंसान का भ्रम


हर इंसान सुकून चाहता है लेकिन वह उसे बाहरी चीज़ों में ढूँढता है।

धन, शोहरत, रिश्ते, ताम-झाम ये सब शरीर को आराम तो दे सकते हैं, लेकिन मन को स्थिरता नहीं दे सकते।


सच्चाई यह है कि शांति कोई वस्तु नहीं, जिसे पाया जा सके; यह तो एक अवस्था है, जो पहले से हमारे भीतर मौजूद है।

हम उसे इसलिए महसूस नहीं कर पाते क्योंकि हमारा मन निरंतर बाहर भागता रहता है तुलना में, अपेक्षा में, और अधूरेपन की दौड़ में।


“बाहर की दुनिया शोर से भरी है,

और भीतर का संसार मौन में खिलता है।”


जब इंसान यह समझने लगता है कि बाहरी साधन सिर्फ़ साधन हैं, मंज़िल नहीं तभी वह भीतर की यात्रा शुरू करता है।


भीतर की ओर यात्रा शांति की ओर लौटना


असली सुकून बाहर नहीं, भीतर है। उसे पाने के लिए किसी चमत्कार की नहीं, बल्कि आत्म-जागरूकता की ज़रूरत होती है।


मन का अवलोकन (Observation)


मन को बस देखिए।

विचार आ रहे हैं, भावनाएँ उठ रही हैं उन्हें बिना रोक-टोक बस देखें।

जब इंसान देखने वाला बन जाता है, तब मन का शोर अपने आप धीमा होने लगता है।


स्वीकृति (Acceptance)


जो भी महसूस हो रहा है उदासी, गुस्सा, डर उसे दबाएँ नहीं।

स्वीकार करें कि यह भी मेरी ही एक अवस्था है।

स्वीकृति से ही भीतर की ऊर्जा संतुलित होती है और मन हल्का हो जाता है।


साक्षीभाव (Witnessing)


धीरे-धीरे इंसान यह समझने लगता है कि “मैं” मेरे विचार या भावनाएँ नहीं हूँ, बल्कि उन्हें देखने वाला साक्षी हूँ।

यही आत्मा का पहला अनुभव है जब देखने वाला और विचार अलग दिखाई देने लगते हैं।


ध्यान और मौन (Meditation)


जब मन शांत होता है, तब भीतर का मौन जागता है।

उस मौन में जो सुकून मिलता है, वह किसी परिस्थिति पर निर्भर नहीं होता।

यह वही शांति है जो सदा हमारे भीतर थी, बस मन के शोर में दब गई थी।


 मन की यांत्रिकी कैसे बदलता है बेचैनी में सुकून


मन स्वयं ऊर्जा है।

जब यह ऊर्जा बाहर की इच्छाओं में भागती है, तो बिखर जाती है और इंसान अस्थिर हो जाता है।

लेकिन जब यही ऊर्जा ध्यान, जागरूकता और आत्म-अवलोकन के माध्यम से भीतर लौटती है, तो यह स्थिर और एकाग्र हो जाती है।


जिस तरह शांत झील में साफ़ आसमान का प्रतिबिंब दिखाई देता है,

उसी तरह जब मन शांत होता है, तो उसमें आत्मा का प्रकाश झलकने लगता है।

वही प्रकाश शांति है वही सुकून है।


 शांति की सच्चाई


मन की उदासी कोई दोष नहीं, बल्कि संकेत है 

यह बताती है कि अब भीतर झाँकने का समय है।


बाहर की दुनिया अस्थायी है, पर भीतर की शांति शाश्वत है।

जब इंसान खुद को देखना और स्वीकार करना सीख जाता है, तब बाहरी उतार-चढ़ाव भी उसकी आंतरिक शांति को नहीं डिगा पाते।


“शांति कोई जगह नहीं, बल्कि एक अनुभव है।

जब मन रुक जाता है तब आत्मा बोलने लगती है।”


इंसान को यह समझना होगा कि सुकून खरीदा नहीं जा सकता,

वह तो महसूस किया जाता है 

अपने भीतर लौटकर, खुद से मिलने पर।

जब भीतर और बाहर में संतुलन आता है, तभी जीवन में सच्ची स्थिरता और आनंद खिलता है।