Tuesday, November 4, 2025

माँ अनपढ़ सही, पर जीवन की किताब है

 "माँ अनपढ़ सही, पर जीवन की किताब है"


एक बच्चा नंबर लाया, नब्बे प्रतिशत पास,

बाप ने खुश हो बोला, आज बनेगा खास पकवान।

माँ दौड़ी आई बोली दिखा तो सही बेटा मेरा,

क्या कमाल कर दिया इसने, देखूँ मैं भी ज़रा।


पर बेटे ने कह डाला “माँ कुछ नहीं समझेगी,

ये अनपढ़ है, रिज़ल्ट क्या जानेगी?”

उसकी बात से माँ की आँखें भर आईं,

चुपचाप फिर रसोई में खीर बनाने चल पड़ी भाई।


पिता ने बेटे को समझाया 

हाँ बेटा, तेरी माँ अनपढ़ है,

पर सुन जो अब मैं बताता हूँ,

जिससे तेरी सोच का भ्रम हटता है।


जब शादी के बाद तू पेट में आया,

माँ ने हर ख्वाहिश, हर सपना तज दिया।

दूध से नफ़रत थी उसे, पर तेरे लिए पीती थी,

तेरे अच्छे स्वास्थ्य के लिए वो खुद से भी लड़ती थी।


हर सुबह उठकर तेरे लिए नाश्ता बनाती,

तू स्कूल जाए समय पे, इसलिए खुद नींद भूल जाती।

रात में तू पढ़ते-पढ़ते सो जाता,

माँ चुपचाप तेरी किताबें समेटती जाती।


तू बीमार रहता माँ सारी रात जागती,

सुबह होते ही फिर काम में लग जाती।

तेरे लिए ब्रांडेड कपड़े,

माँ ने अपना साड़ी भी सालों न बदले।


बेटा, पढ़े-लिखों का मतलब सिर्फ डिग्री नहीं होता,

माँ की ममता, त्याग उससे बड़ा कुछ नहीं होता।

माँ अनपढ़ सही, पर हर रिश्ते की जान है,

तेरी असली गुरू, तेरे जीवन की पहचान है।


बेटा रोते हुए बोला 

“माँ, मैंने तो बस अंक पाए हैं,

पर आपसे बड़ा ज्ञान कोई न पाए है।

आपने ही मुझे सिखाया क्या है जीवन,

आज भी मैं अनपढ़ हूँ,

अगर माँ को समझ न पाया ये मन।”


तो सलाम है उस माँ को,

जो पढ़ न सकी किताबें,

पर बना गई एक इंसान,

जो कर सके ज़िंदगी में कुछ कमाल।


दशहरा-दीवाली के इस पर्व के बाद,

चलो माँ को करें दिल से याद।

माँ है तो सब कुछ है,

वरना हर जीत अधूरी है।


🙏 "माँ को सम्मान दें, क्योंकि वही है जीवन का पहला पाठशाला।" 🙏

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