"मन की दौड़"
ज़िन्दगी कोई प्रतियोगिता नहीं,
हर कोई अपनी राह पर है,
वक़्त की रेत पर सबके पाँव
अलग दिशा में चलते हैं।
कोई मंज़िल जल्दी पा लेता है,
कोई देर से पहुँचता है
पर रास्ते वही सबसे गहरे होते हैं
जहाँ अकेलापन भी साथी बन जाता है।
हर आत्मा का एक संघर्ष है,
हर मुस्कान के पीछे एक सिसकती रात।
तू देखता है मुझे और सोचता है
"ये तो कुछ भी नहीं झेलता होगा…"
पर सच तो ये है कि
हम सब बिखरे हुए हैं किसी न किसी रूप में,
कुछ ज़ख़्म हँसकर छुपा लेते हैं,
कुछ खुद को "बुरा" कहलवाकर
अपने दर्द से बदला लेते हैं।
हाँ, मेरा अहंकार ऊँचा है,
इतना कि नफ़रत भी अब इज़्ज़त सी लगती है,
लोग जब पीठ पीछे बुरा कहते हैं,
तो यकीन हो जाता है
अब मैं खुद के सच के क़रीब हूँ।
क्योंकि "अच्छा" बनकर भी
कई बार बिखर जाते हैं लोग,
पर "बुरा" बनकर
वो अपनी हदों से वाक़िफ़ हो जाते हैं।
शायद यही वजह है
कि कुछ औरतें “बुरे लड़कों” की ओर खिंच जाती हैं
जो दर्द छुपाकर हँसते हैं,
जो ज़िन्दगी की किताब बिना मुखपृष्ठ के पढ़ते हैं।
ऐसा नहीं कि उन्हें प्यार की तमीज़ नहीं,
पर वो गहराई में उतरने से डरते नहीं।
जो सच को कहने की हिम्मत रखते हैं,
और झूठ की पॉलिश में चमकते नहीं।
पर जब कोई ऐसा मिल जाता है,
जो तुम्हारे मन की भाषा समझता है
बिना कहे पढ़ लेता है वो बातें
जो तुमने कभी खुद से भी न कहीं हों
तो उस एक क्षण में,
हर भ्रम टूट जाता है,
हर दीवार गिर जाती है,
और तुम जान जाते हो
“शरीर का साथ एक सुख है,
पर मन की समझ
वो तो परम आत्मीयता है।”
तो चलो
न तुलना करें, न दौड़ें,
अपनी चाल में चलें,
अपने सत्य में जलें।
क्योंकि अंत में,
सबसे सुंदर प्रेम वो होता है
जो तुम्हारे भीतर के तूफ़ान को
बिना डरे थाम लेता है।
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