"ग़रीबी की असली जड़"
ग़रीबी पैसे की कमी नहीं, सोच की हार है,
यह एक आदत है जो भीतर छिपा विकार है।
पचास हज़ार कमा कर भी कोई खाली रह जाता है,
क्योंकि पैसा नहीं, नियंत्रण ही दौलत का रास्ता है।
जब “ना” कहना मुश्किल हो, तब विनाश शुरू होता है,
भोग की चाह में मनुष्य अपने मूल से दूर होता है।
खर्च बढ़ता है जहाँ इच्छाएँ बेलगाम हो जाती हैं,
और भावनाओं की लहरों में पूरी कमाई बह जाती है।
कमी आमदनी की नहीं, आदतों की है जनाब,
कम में भी बचाया जाए तो बनता है हिसाब।
जो दो हज़ार बचा ले, वो बीस हज़ार उड़ाने वाले से आगे है,
क्योंकि वो भविष्य बनाता है, दूसरा दिखावे में भागे है।
भोग-विलास आज का नया जाल है,
मोबाइल, पार्टी, रिश्तों का बेहिसाब माल है।
हर "एंजॉयमेंट" जो जेब हल्की करे,
दरअसल वो ग़रीबी की चुपचाप रखी ईंटें गढ़े।
जिन्हें खुद पर काबू नहीं, वो कभी ऊँचा नहीं उड़ते,
थोड़ी सफलता पाते ही अपने ही बोझ से टूटते।
क्योंकि जो भूखे थे अनुशासन के,
वो अमीरी में मदहोश हो जाते हैं और खो देते हैं सबके सबके।
लोग आज मेहनत नहीं करते तरक्की के लिए,
बल्कि approval के लिए, validation के लिए।
महँगा फोन, महँगा कपड़ा, दिखावे का प्यार,
इन सबसे ना कोई बचत होती, ना कोई संवार।
ध्यान बंटा हो जहाँ-तहाँ, वहाँ फोकस कहाँ से आए?
ऊर्जा बहे व्यर्थ में तो लक्ष्य तक कौन जाए?
स्त्री, शराब, सोशल मीडिया यही तो खलीफा हैं,
जो हर पुरुष की ताक़त को चुपचाप लुटा देते हैं।
असली अमीरी शांति में बसती है, शोर में नहीं,
जो कम कमाता है पर सोचता गहरे वो गरीब नहीं।
जो नियंत्रण में जीता है, भविष्य उसी के क़दम चूमता है,
और जो उछलता है अभी वो कल आँसू में डूबता है।
तो सुन लो अब एक अंतिम चेतावनी की बात,
पैसे की भूख नहीं नियंत्रण की कमी है असली ज़हर की सौगात।
अगर खुद को ना संभाल सको
तो लाखों भी आएं, फिर भी तुम फटेहाल रहोगे।
ज़रूरत नहीं है ज़्यादा कमाने की,
ज़रूरत है खुद को साधने की।
क्योंकि जहाँ नियंत्रण है, वहाँ उन्नति निश्चित है
और जहाँ सिर्फ़ इच्छाएँ हैं, वहाँ ग़रीबी अपरिहार्य है।
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