Tuesday, November 4, 2025

मौन और पुरुषार्थ: आत्मसंयम की कला

 "मौन और पुरुषार्थ: आत्मसंयम की कला"


आज का विश्व शोर और हलचल से भरा हुआ है। हर कोई अपनी बात साबित करने, अपनी पहचान बनाने और किसी न किसी रूप में नजर आने में व्यस्त है। शब्दों की भरमार में अक्सर समझ की कमी हो जाती है। ऐसे समय में, जो व्यक्ति चुप्पी साधता है, उसे अक्सर कमजोर या उदासीन समझा जाता है। परन्तु सत्य यह है कि मौन केवल अनुपस्थिति नहीं, बल्कि अदृश्य शक्ति और आत्मसंयम का प्रतीक है।


वे सोचते हैं तुम्हारा मौन तुम्हारी हार है।

वे मानते हैं तुम्हारी शांति निष्क्रियता है।

वे कहते हैं तुम्हारा दूर रहना, अनिच्छा या उदासीनता है।

पर वे भूल जाते हैं कि मौन कभी पराजय का संकेत नहीं होता। यह आत्म-नियंत्रण और गहन समझ की भाषा है।


एक सच्चा पुरुष अपने हर कदम की घोषणा नहीं करता। वह गणना करता है, निरीक्षण करता है और सही समय आने पर प्रहार करता है। यह वही कला है जो अर्जुन ने महाभारत की युद्धभूमि में अपनाई केवल वही धनुष उठाता है, जो समय और परिस्थिति के अनुसार सबसे उपयुक्त हो। यही सच्चा पुरुषार्थ है धैर्य, विवेक और शक्ति का संयोजन।


मौन उसकी कमजोरी नहीं, संयम है।

शांति उसकी निष्क्रियता नहीं, संतुलन है।

धैर्य उसकी पराजय नहीं, तपस्या है।


इतिहास और पौराणिक कथाएँ हमें यही सिखाती हैं।

चाणक्य ने अपने अर्थशास्त्र में लिखा है कि सत्य और शक्ति का सही प्रयोग तभी वास्तविक प्रभाव डालता है, जब वह चुपचाप और सोच-समझकर किया जाए।

बुद्ध ने मौन और ध्यान को आत्मज्ञान का मार्ग बताया।

अर्जुन ने केवल सही समय पर ही धनुष उठाया और वही व्यक्ति सच्चा विजयी माना गया।


मौन उसकी तलवार है भ्रम और शोर को काटने वाली।

शांति उसका कवच है अज्ञान और जल्दबाजी से बचाने वाला।

संयम उसकी धारा है जो भीतर से शक्ति और स्पष्टता उत्पन्न करती है।

यह कला केवल शारीरिक शक्ति की नहीं, बल्कि मन और आत्मा की शक्ति की है।


जो व्यक्ति अपने भीतर का नियंत्रण पा चुका है, उसे बाहरी दुनिया जीतने की कोई जल्दी नहीं होती। उसने समझ लिया है कि सबसे बड़ा युद्ध स्वयं के भीतर का युद्ध है और सबसे महान विजय स्वयं पर विजय है।


मौन और संयम केवल व्यक्तिगत गुण नहीं, यह जीवन जीने की कला और दर्शन हैं। यह कला बुद्धिमत्ता, धैर्य और दूरदर्शिता से ही संभव होती है। जो इसे अपनाता है, वह शोर और हलचल से भरे संसार में भी संतुल और स्थिर रहता है।


सच्चे पुरुषार्थ का माप केवल बाहरी सफलताओं से नहीं, बल्कि मन और आत्मा की स्थिरता, निर्णय की स्पष्टता और कार्य की प्रभावशीलता से होता है। जो व्यक्ति इन गुणों को आत्मसात कर लेता है, वह जीवन की हर परिस्थिति में शांति और शक्ति का सामंजस्य बनाए रखता है।


अतः मौन और आत्मसंयम केवल नैतिक गुण नहीं हैं, बल्कि जीवन के सबसे गहन रहस्यों की कुंजी हैं। यह वही रहस्य है जो हमें यह सिखाता है कि वास्तविक शक्ति दिखाने में नहीं, बल्कि समझने, सोचने और सही समय पर कार्य करने में है।


यह निबंध हमें यह याद दिलाता है कि सच्चा पुरुष वह है, जो चुप रहता है, पर भीतर से सबसे प्रखर होता है। जो संयमित है, वही मजबूत है। जो शांत है, वही संतुलित है। और जो अपने भीतर विजय प्राप्त कर चुका है, वही सच्चा स्वतंत्र और विजयी है।

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