ॐ का रहस्य : ब्रह्मांड की पहली ध्वनि
मन को नियंत्रण में रखकर किए गए शब्द-उच्चारण को मंत्र कहा जाता है। मंत्र-विज्ञान हमारे तन और मन दोनों को प्रभावित करता है, इसलिए कहा गया है— “जैसा मन, वैसा तन।”
मन को शांत और स्थिर रखने का सबसे सरल साधन है— ॐ का जप।
ॐ – तीन अक्षरों का विराट ब्रह्मांड
ॐ तीन ध्वनियों से बना है— अ, उ, म।
अ – सृजन, व्यापकता और उपासना का प्रतीक।
उ – बुद्धि, नियम, सूक्ष्मता और संचालन का संकेत।
म – अनंतता, ज्ञान, पालन और स्थिरता का रूप।
इन तीनों का सम्मिलित अर्थ है— परम सत्ता का सम्पूर्ण रूप, इसलिए इसे सभी मंत्रों का बीज मंत्र कहा गया है।
ब्रह्मांड की पहली ध्वनि
पुराण कहते हैं कि सृष्टि के प्रारंभ में जो पहली अनाहत ध्वनि गूंजी वह थी— ॐ।
यह ध्वनि किसी टकराव से नहीं बनी, बल्कि स्वयं ब्रह्मांड की गति और ऊर्जा से उत्पन्न हुई।
ध्यान की गहन अवस्था में साधक आज भी इस अनहद नाद को सुनते हैं और इसे परम शांति का स्रोत बताते हैं।
आध्यात्मिक रहस्य
ओम् का जप मन को शुद्ध करता है।
व्यक्ति को परमात्मा के निकट लाता है।
साधना में स्थिरता, मौन और अंतरात्मा की जागृति बढ़ाता है।
ईश्वर की अनुभूति हेतु यह सबसे सरल मार्ग माना गया है।
इसलिए हर मंत्र की शुरुआत ॐ से होती है—
ॐ नमः शिवाय, ॐ नमो भगवते वासुदेवाय, आदि।
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ॐ के वैज्ञानिक लाभ
मंत्र का उच्चारण केवल धार्मिक क्रिया नहीं, बल्कि वैज्ञानिक कंपन है।
ओम् का उच्चारण शरीर के विभिन्न हिस्सों— जीभ, तालू, कंठ, फेफड़ों और नाभि— में कंपन पैदा करता है, जो सीधे ग्रंथियों और चक्रों को सक्रिय करता है।
प्रमुख लाभ :
1. तनाव दूर करता है, शरीर पूरी तरह रिलैक्स होता है।
2. घबराहट और अधीरता कुछ ही मिनटों में गायब होती है।
3. शरीर में फैले विषाक्त तत्वों का संतुलन बनाता है।
4. हृदय और रक्तसंचार को नियमित करता है।
5. पाचन शक्ति तेज होती है।
6. शरीर में युवावस्था जैसी ऊर्जा लौट आती है।
7. थकान दूर होती है।
8. अनिद्रा का श्रेष्ठ उपचार— नींद आने तक मन ही मन इसका जप करें।
9. कुछ प्राणायाम के साथ करने पर फेफड़ों की क्षमता बढ़ती है।
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वास्तु और मानसिक ऊर्जा पर प्रभाव
वास्तुविद मानते हैं कि घर में अक्सर जप किया जाए तो
नकारात्मक ऊर्जा दूर होती है,
वातावरण शांत होता है,
मनोवैज्ञानिक तनाव हटता है।
प्रिय शब्दों से सकारात्मक हार्मोन बनते हैं,
अप्रिय शब्दों से विषैले रसायन।
इसलिए ॐ की शांत लय मन, मस्तिष्क और हृदय पर अमृत की तरह काम करती है।
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108 बार जप क्यों?
कम से कम 108 बार ॐ का उच्चारण करने से—
शरीर तनावमुक्त हो जाता है
ऊर्जा का प्रवाह बढ़ता है
प्रकृति के साथ तालमेल बनता है
परिस्थितियों का पूर्वानुमान करने की क्षमता बढ़ती है
व्यवहार में शालीनता और धैर्य आता है
निराशा, उदासी और आत्महत्या जैसे विचार दूर होते हैं
बच्चों में पढ़ाई का मन न लगे या स्मरण शक्ति कमजोर हो—
नियमित ओम् जप से अद्भुत लाभ मिलता है।
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उच्चारण की सही विधि
प्रातः स्नान के बाद शांत वातावरण में बैठें।
मुद्रा : पद्मासन, अर्धपद्मासन, सुखासन या वज्रासन।
जितनी बार समय मिले— 5, 7, 10 या 21 बार।
पहले “ओ——” को लंबा खींचें, अंत में “म्” हल्की गूंज की तरह।
जप माला से भी कर सकते हैं।
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निष्कर्ष
ॐ केवल एक मंत्र नहीं — यह आत्मा का संगीत है, ब्रह्मांड की धड़कन है।
यह वह ध्वनि है जो हमें प्रकृति, ऊर्जा, चेतना और ईश्वर से जोड़ती है।
जो इसे नियमित करता है, उसके जीवन में शांति, स्थिरता, स्फूर्ति और दिव्यता स्वयं उतर आती है।
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