Thursday, November 27, 2025

सात्विक जीवन का संदेश




सात्विक जीवन का संदेश


आज दुनिया में बहुत शोर है,
हर कोई अपनी बात को सही बताता है,
कोई कहता – “मेरा धर्म बड़ा”,
कोई कहता – “मेरा भगवान सच्चा है।”

पर क्या कभी किसी ने सोचा,
ईश्वर, अल्लाह, गॉड या राम 
नाम अलग हैं, पर भावना एक ही है,
सबमें बसता वही एक प्रकाश, वही एक धाम।

जब हम जन्म लेते हैं,
ना कोई पंथ होता, ना कोई जात,
केवल एक मासूम बच्चा होता,
जिसके मन में न द्वेष, न कोई घात।

पर धीरे-धीरे हम सीखते हैं,
कौन अपना, कौन पराया है,
कौन ऊँचा, कौन नीचा है,
और मन में अंधेरा छा जाता है।

रजोगुणी बुद्धिवाद चमकता जरूर है,
पर उसके भीतर सच्ची शांति नहीं,
तमोगुणी अंधविश्वास डराता जरूर है,
पर उसमें सच्चा प्रेम कहीं नहीं।

सात्विकता ही एक रास्ता है,
जहाँ मन शांत होता है,
जहाँ हृदय प्रेम से भरता है,
जहाँ जीवन में उजियारा होता है।

सात्विक जीवन का मतलब क्या?
सादा खाना, सच्चे विचार,
किसी को चोट न पहुँचाना,
हर जीव में भगवान का आकार।

बच्चों को यही सिखाना चाहिए,
कि दया ही सबसे बड़ा धर्म है,
कभी झूठ, छल, घृणा न करना,
प्रेम ही जीवन का मर्म है।

माँ-बाप खुद उदाहरण बनें,
बच्चे वही करते हैं जो देखते हैं,
अगर घर में झगड़े, ईर्ष्या हों,
तो संस्कार कैसे टिकते हैं?

गुरु, आचार्य और शिक्षक भी,
सिखाएँ बच्चों को सच्चा मार्ग,
कहें कि इंसान पहले मनुष्य बने,
फिर माने कोई भी ईश्वर जाग।

ना कोई छोटा, ना कोई बड़ा,
ना कोई हिंदू, ना कोई मुसलमान,
सबका रचयिता एक ही है,
सबकी साँसों में वही भगवान।

जो इसे समझ गया,
वह किसी से नफरत नहीं करेगा,
वह हर जीव से प्रेम करेगा,
हर स्थिति में शांत रहेगा।

समाज तभी बचेगा,
जब राजनीति धर्म पर न बिकेगी,
जब नेता लोगों को बाँटे नहीं,
बल्कि जोड़ने की बात करेगा।

जब मंदिर, मस्जिद, गिरजाघर, गुरुद्वारे,
सब कहेंगे “हम सब एक हैं”,
जब मानवता धर्म से ऊपर होगी,
तभी धरती पर सच्ची स्वर्ग बनेंगे।

हर माँ-बाप, हर गुरु, हर नेता,
अगर सात्विकता को अपनाएगा,
तो यह देश और दुनिया,
फिर से उजियारा पाएगा।

शायद यह बात आज कोई न सुने,
क्योंकि दुनिया में बहुत शोर है,
पर जिसने प्रेम और दया को जान लिया,
वह हर हाल में खुश और चितचोर है।

तो आओ 
अपने घर से ही शुरुआत करें,
बच्चों को सिखाएँ सच्चा जीवन,
हर दिन थोड़ा और सात्विक बनें।

झूठ, छल, ईर्ष्या, क्रोध को त्यागें,
सादा जीवन, उच्च विचार अपनाएँ,
जो मिला है, उसमें संतोष करें,
सबसे पहले खुद मनुष्य बन जाएँ।

तभी जीवन में शांति होगी,
तभी घर में सुख रहेगा,
तभी समाज और देश में
सच्चा प्रेम बसेगा।

क्योंकि सात्विकता ही जीवन का सार है,
बाकी सब बातें बस गुज़रती धार हैं।

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