“आनंद की तलाश: देह, नशा और मनुष्य"
सेक्स यह शब्द अक्सर समाज में दो अतियों के बीच झूलता रहा है। कुछ इसे केवल प्राकृतिक प्रवृत्ति मानकर “जानवरों जैसी जरूरत” तक सीमित कर देते हैं, जबकि कुछ इसे जीवन की सबसे गूढ़ और रहस्यमय अनुभूति के रूप में देखते हैं। सच तो यह है कि सेक्स केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि एक गहरी मानसिक, भावनात्मक और आध्यात्मिक यात्रा भी है।
मनुष्य जब किसी के साथ शारीरिक रूप से जुड़ता है, तो वह केवल देह नहीं, बल्कि अपने भीतर की एकांतता, जिज्ञासा और अधूरेपन को भी साझा कर रहा होता है। लेकिन अधिकांश लोग इस अनुभव की केवल सतह को छू पाते हैं वे उस गहराई में उतरने का साहस नहीं कर पाते, जहाँ देह के पार आत्मा का संवाद शुरू होता है।
समाज ने इस विषय को या तो पाप घोषित किया, या मनोरंजन का साधन बना दिया। परिणाम यह हुआ कि सेक्स एक ‘छिपाने योग्य’ अनुभव बन गया जबकि यह मनुष्य की भावनात्मक संरचना का अभिन्न हिस्सा है। इसी तरह नशे का आकर्षण भी उसी अनुभव-तृष्णा से जन्म लेता है। नशा केवल पदार्थ नहीं, बल्कि मन की एक खोज है एक ऐसी कोशिश जिससे व्यक्ति खुद को अपने सीमाओं से परे महसूस करना चाहता है।
सेक्स और नशा, दोनों में एक समानता है दोनों ही ‘स्व’ से परे जाने की लालसा हैं। कोई अपने भीतर की रिक्तता को देह के माध्यम से भरना चाहता है, तो कोई रसायन के सहारे चेतना को बदलना चाहता है। समाज इन प्रवृत्तियों को नियंत्रित करने की कोशिश करता है, पर यह नहीं समझ पाता कि इनकी जड़ में मानव-मनोविज्ञान की गहरी भूख है प्रेम, जुड़ाव, और अर्थ की भूख।
जब तक हम सेक्स या नशे को केवल वर्जना या अपराध की दृष्टि से देखेंगे, तब तक हम उस मनोवैज्ञानिक सत्य को नहीं समझ पाएँगे, जो इनके पीछे छिपा है कि मनुष्य केवल सुख नहीं, अर्थ की तलाश में जीता है। और जब अर्थ की कमी होती है, तो वह उसे आनंद, नशे या संबंधों के अतिरेक में खोजता है।
सच्चा समाधान दमन में नहीं, बल्कि समझ में है उस आंतरिक खालीपन की पहचान में, जो हमें इन अनुभवों की ओर खींचता है। जब हम इस खोज को समझने लगते हैं, तभी सेक्स देह से संवाद बनता है और नशा आत्म-अभिज्ञान का रूप ले सकता है।
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