Tuesday, February 3, 2026

नाभि खसकना: सच, भ्रम या आयुर्वेदिक लॉजिक?

 Navel Displacement - नाभि खसकना: सच, भ्रम या आयुर्वेदिक लॉजिक?

क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आप डॉक्टर के पास गए हों और उनसे कहा हो –

“डॉक्टर साहब, मेरी नाभि खसक गई है”?


और जवाब में डॉक्टर ने बिल्कुल straight बोल दिया हो –

“ऐसा कुछ नहीं होता, नाभि खसकने जैसी कोई बीमारी नहीं है”?


यहीं से confusion शुरू होता है।

क्योंकि दूसरी तरफ YouTube, Instagram, Facebook, हर जगह लोग बोल रहे हैं –

नाभि खसक गई, नाभि बिठवानी पड़ी, मटका लगवाया, लोटा रखा, किसी ने धागा बांधा।


अब सवाल उठता है -

ये सच में कोई problem है या बस एक गलतफहमी?

या फिर… दिक्कत नाभि की नहीं, किसी और चीज़ की है?


इसी topic को हम आयुर्वेद के नजरिए से detail में समझने वाले हैं।


नाभि खसकने पर लोगों को क्या-क्या दिक्कत होती है?

जिन लोगों को लगता है कि उनकी नाभि खसक गई है, वो ज़्यादातर ये complaints बताते हैं:


भूख बिल्कुल नहीं लगती

बहुत ज्यादा गैस बनती है

पेट में खिंचाव, फड़कन या कुछ “हिलता-डुलता” सा लगता है

अपच, ढकार, पेट ठीक से साफ न होना

वजन धीरे-धीरे कम होते जाना

पेट के आसपास लगातार दर्द या भारीपन


कुछ लोग ये भी कहते हैं कि

नाभि कभी नीचे चली जाती है,

कभी ऊपर,

कभी लेफ्ट, कभी राइट।


और ये सब अक्सर कब होता है?


अचानक भारी सामान उठाने के बाद

तेज़ लूज मोशन के बाद

ज़्यादा ट्रैवल करने पर

बहुत ज़्यादा थकावट या कमजोरी के बाद


आयुर्वेद क्या कहता है? 

आयुर्वेद के हिसाब से

“नाभि खसकना” कोई अलग बीमारी नहीं है।


ये एक symptom है।

और इसका root cause है — समान वायु का बिगड़ जाना।


अब ये समान वायु क्या है, वहीं से असली समझ शुरू होती है।


आयुर्वेद का बेसिक फंडा: दोष और वायु

आयुर्वेद में हर बीमारी को समझने के लिए हम सबसे पहले जाते हैं:


वात

पित्त

कफ


इनमें से वात को सबसे powerful दोष माना गया है।


और वात खुद पाँच हिस्सों में काम करता है:


प्राण वायु

उदान वायु

व्यान वायु

अपान वायु

समान वायु


नाभि का एरिया खास तौर पर समान वायु का क्षेत्र होता है।


समान वायु का काम क्या है?

समान वायु आपके digestion का पूरा control संभालती है।


इसका काम होता है:


खाना लेना

खाने को पचाना

पचे हुए खाने को अलग-अलग हिस्सों में बांटना

पोषण को पूरे शरीर में भेजना


और waste को नीचे की तरफ निकालने के लिए आगे भेजना


यानि digestion से लेकर nutrition तक — सब कुछ समान वायु पर depend करता है।


जब समान वायु बिगड़ती है, तब क्या होता है?

अब ध्यान दीजिए -

जिन complaints को लोग “नाभि खसकना” कहते हैं,

वही symptoms आयुर्वेद में समान वायु खराब होने के लक्षण बताए गए हैं।


जैसे:


शूल (Pain)

नाभि के आसपास लगातार दर्द

कभी सुई चुभने जैसा

कभी मरोड़ या ऐंठन

कभी खाने के बाद बढ़ता है

कभी खाली पेट ज्यादा दर्द करता है


गुल्म (Gas lump / moving gas)

पेट में गैस का गोला सा घूमता हुआ लगना

कभी ऊपर, कभी नीचे

कभी एक जगह टिकता ही नहीं


Modern science इसे कई बार “psychological” कह देती है,

लेकिन आयुर्वेद इसे वात की गड़बड़ी मानता है।


Digestive disorders

IBS

ग्रहणी

कब्ज

लूज मोशन

ब्लोटिंग

पेट साफ न होना


तो सीधा सा निष्कर्ष क्या निकला?

नाभि खसकना = समान वायु का बिगड़ जाना


अब अगला सवाल obvious है 

इसे ठीक कैसे करें?


समान वायु को ठीक करने का आयुर्वेदिक तरीका

आयुर्वेद में सिर्फ दवा नहीं,

दवा का टाइम भी उतना ही important होता है।


समान वायु के लिए दवा लेने का सही समय बताया गया है —

खाने के बीच में।


खाने के बीच में कैसे?

अगर 2 रोटी खाते हैं -

1 रोटी खाई - दवा ली - दूसरी रोटी खाई


अगर चावल खाते हैं -

आधा खाना - दवा - बाकी आधा खाना


इसे आयुर्वेद में कहते हैं समान काल।


अब सवाल: कौन सी दवा या चीज?

ये depend करता है कि

समान वायु के साथ कौन-सा दोष और बिगड़ा है।


जब समान वायु + पित्त बिगड़ा हो

लक्षण:


बहुत ज्यादा पसीना

खाने के समय sweating

शरीर में जलन

पेट में गर्मी

बार-बार प्यास, मुंह सूखना


क्या करें?

देसी A2 गाय का घी

1 चम्मच + चुटकी भर सेंधा नमक

खाने के बीच में

या

नागरमोथा (मुस्ता) पाउडर

 1/4 चम्मच + शहद

खाने के बीच में

या

शतावरी पाउडर

1/4 चम्मच + 1 चम्मच घी


जब समान वायु + कफ बिगड़ा हो

लक्षण:


बहुत ठंड लगना

पसीना कम आना

भूख बिल्कुल न लगना


क्या करें?

हरड़ पाउडर 1/2 चम्मच

सोंठ पाउडर 1/4 चम्मच


1–2 चुटकी सेंधा नमक

खाने के बीच में

या

50–100 ml छाछ (अगर सूट करे)


योग और लाइफस्टाइल सपोर्ट

पवनमुक्तासन

भुजंगासन


भारी काम अचानक न करें

ज्यादा देर भूखे न रहें

ओवर-exertion avoid करें


बार-बार नाभि खसकती है? Root treatment क्या है?

अगर बार-बार नाभि “बिठवानी” पड़ रही है,

तो temporary fix से काम नहीं चलेगा।


आयुर्वेदिक पंचकर्म options:

समान वायु + कफ

वमन + बस्ती


समान वायु + पित्त

विरेचन + बस्ती


ये treatments root से समस्या को ठीक करने में मदद करते हैं।


ठीक होने में कितना टाइम लगता है?

Simple cases - 2–3 महीने

IBS / ग्रहणी जैसे cases - 1 से 1.5 साल


Ready-made आयुर्वेदिक दवाइयाँ?

हाँ, मौजूद हैं:


हिंग्वाष्टक चूर्ण

लवण भास्कर

शंख वटी

लहसुनादि वटी

कुमारी आसव


लेकिन कौन सी दवा, कितनी, कब -

ये patient-to-patient बदलता है।


Conclusion

नाभि खसकना कोई अलग बीमारी नहीं,

बल्कि समान वायु के बिगड़ने का संकेत है।


इसके साथ कौन-सा दोष जुड़ा है,

उसी हिसाब से इलाज किया जाता है।


पित्त बढ़ गया है

 Home Remedies for Pitta - पित्त बढ़ गया है? घबराइए नहीं—इलाज आपके किचन में ही है - अगर आपको बार-बार जलन, मुंह में छाले, पूरे शरीर में अजीब सी गर्मी, बहुत ज़्यादा पसीना, हाथ-पैरों में आग लगने जैसा फील, या फिर पूरी बॉडी में बर्निंग सेंसेशन रहता है-तो समझ लीजिए पित्त ओवरएक्टिव हो चुका है।


इसके साथ अगर गुस्सा जल्दी आना, चिड़चिड़ापन, या फिर ब्लीडिंग से जुड़ी दिक्कतें (नाक से खून, पाइल्स में ब्लीडिंग, पीरियड्स में ज़्यादा ब्लड, स्किन पर लाल-लाल चकत्ते) भी जुड़ जाएं, तो ये सारे क्लासिक पित्त डिसऑर्डर के साइन हैं।


अब सवाल आता है-

“ठीक है, आयुर्वेद में इलाज तो बहुत बताए जाते हैं, लेकिन घर पर ऐसा क्या करें जिससे पित्त कंट्रोल में आए?”


आज हम बात करेंगे ऐसी 5 परफेक्ट चीज़ों की, जो:


आसानी से मिल जाती हैं

ज़्यादा महंगी नहीं हैं

और सही तरीके से इस्तेमाल की जाएं, तो पित्त को काफी हद तक शांत कर देती हैं


औषधि #1: कुष्मांड (पेठा / कोहड़ा / Ash Gourd)

सबसे पहले बात उस सब्ज़ी की जो पित्त के लिए किसी रामबाण से कम नहीं—कुष्मांड।

आप इसे पेठा, कोहड़ा, वाइट ऐश गार्ड या कहीं-कहीं पंपकिन भी कहते हैं (लेकिन यहां बात हरे छिलके और सफेद अंदर वाले कोहड़े की हो रही है)।


आयुर्वेद में इसके नाम में ही हिंट है-

“कु + ऊष्म”, यानी शरीर की ऊष्णता, हीट और जलन को दबाने वाली चीज़।


 यह:


शरीर की अंदरूनी गर्मी कम करता है

पित्त से जुड़े ब्लड डिसऑर्डर्स में मदद करता है

जलन, बर्निंग और ओवरहीटिंग को शांत करता है


कैसे लें?


सब्ज़ी बनाकर

जूस के रूप में

घी और मिश्री डालकर हलवे जैसा बनाकर

किसी भी फॉर्म में, बस इसे डाइट में शामिल करें।


शरद ऋतु

15 सितंबर से लेकर लगभग 15 नवंबर तक का समय आयुर्वेद में शरद ऋतु माना जाता है।

इस दौरान वातावरण और शरीर—दोनों में पित्त बढ़ता है।

अगर आप पित्त प्रकृति के हैं या आपको गर्मी ज़्यादा लगती है, तो इस मौसम में कुष्मांड को इग्नोर मत कीजिए।


इसीलिए शरद पूर्णिमा पर चंद्रमा की रोशनी में खीर रखकर खाने की परंपरा है—ताकि बढ़ी हुई गर्मी को शांत किया जा सके।


औषधि #2: आंवला (Amla / Amlaki)

दूसरी सुपरहिट और बजट-फ्रेंडली औषधि है—आंवला।

आयुर्वेद के अनुसार आंवला होता है:


शीत (बेहद ठंडा)

रूक्ष (ड्राय)


ये खासतौर पर उस पित्त के लिए बेस्ट है जिसे आयुर्वेद में “गीला पित्त” कहते हैं।


गीला पित्त क्या होता है?

बहुत ज़्यादा पसीना

खुजली और लाल चकत्ते

चिपचिपा मोशन, तेज़ जलन

खट्टा-कड़वा पानी, एसिडिटी

नाक, मुंह, पाइल्स या पीरियड्स में ज़्यादा ब्लीडिंग


इन सब कंडीशन्स में आंवला गेम-चेंजर है।


कैसे लें?


10–20 ml आंवला जूस

कच्चा आंवला काटकर

आंवले का पाउडर

या अगर सूट करता है तो आंवले का अचार


बोनस फायदा:

पित्त की वजह से बाल जल्दी सफेद होना, एजिंग जल्दी दिखना—इन सब में भी आंवला कमाल करता है।


औषधि #3: करेला - कड़वा, लेकिन असरदार

करेले का नाम सुनते ही लोग मुंह बना लेते हैं—

“छी, इतना कड़वा!”


लेकिन सच यही है कि इसी कड़वेपन में पित्त का इलाज छुपा है।


आयुर्वेद के अनुसार:


खट्टा, नमकीन, तीखा → पित्त बढ़ाते हैं

मीठा, कसैला, कड़वा → पित्त घटाते हैं


और इन तीनों में सबसे ताकतवर है—कड़वा रस (तिक्त रस)।


करेला:


अंदर की हीट कम करता है

छाले, जलन, पित्त वाली डिस्चार्ज को कंट्रोल करता है


कैसे खाएं?


घी में बनी करेले की सब्ज़ी

अगर पित्त है, तो करेले को लाइफस्टाइल से हटाइए मत—बस सही तरीके से खाइए।


औषधि #4: सिंघाड़ा (Water Chestnut)

अब बात उस चीज़ की जो:


ठंडी है

टेस्टी है

और शरीर को नरिशमेंट भी देती है


नाम है—सिंघाड़ा (संस्कृत: श्रृंगाटक)।


करेला पित्त घटाता है, लेकिन वज़न भी कम करता है।

अगर कोई बोले:

“मेरा पित्त तो है, लेकिन बॉडी पहले से ही कमज़ोर और सूखी है”


तो ऐसे केस में करेला नहीं—सिंघाड़ा बेहतर है।


कैसे लें?


कच्चा काटकर

सिंघाड़े का आटा

हलवा बनाकर

ये शुक्र धातु तक काम करता है,

जल्दी डिस्चार्ज, अंदरूनी जलन, और कमजोरी वाले केस में खास फायदेमंद।


औषधि #5: घी – पित्त शांत करने का राजा

आख़िर में, लेकिन सबसे ज़रूरी—घी (घृत)।


आयुर्वेद में पित्त को कंट्रोल करने के दो तरीके हैं:


दबाना (Shamana)

शरीर से बाहर निकालना (Shodhana)


पित्त को दबाने के लिए घी से बेहतर कुछ नहीं।


खासतौर पर उन लोगों के लिए:

जिन्हें बहुत गुस्सा आता है

जो ज़्यादा सोचते हैं

ब्रेन-वर्क, स्ट्रेस, लेट नाइट स्टडी

मानसिक थकान के कारण पित्त बढ़ा हुआ है


घी कैसे यूज़ करें?


रोज़ 10–15 ml खाने में

पैरों के तलवों पर मालिश

नाक में (नस्य)

मुंह के छालों में कुल्ला (देसी गाय का घी)


मज़बूत डाइजेशन वालों के लिए भैंस का घी भी चल सकता है।


जब ये सब करने के बाद भी पित्त कंट्रोल न हो…

अगर आपने खान-पान, ये सारी चीज़ें सब ट्राय कर लीं,

फिर भी पित्त बहुत ज़्यादा है—तो आयुर्वेद कहता है:


अब उसे दबाओ मत, निकालो।


इसके लिए:


विरेचन पंचकर्म (पित्त को मोशन के ज़रिये बाहर निकालना)

हर 6 महीने में रक्तमोक्षण (ब्लड निकालना)

लोकल पित्त में लीच थेरेपी / कपिंग


ये सब करने के बाद जब आप ऊपर बताई गई चीज़ें खाते हैं,

तो रिज़ल्ट कई गुना बेहतर आता है।


फाइनल बात

आज हमने सिर्फ 5 चीज़ों की बात की है,

लिस्ट इससे कहीं लंबी है।


अगर आप चाहते हैं:


और घरेलू उपाय

और फूड लिस्ट

या किसी खास पित्त प्रॉब्लम पर डीप वीडियो


तो कमेंट में ज़रूर बताइए:


आपने आज क्या सीखा

और अगला वीडियो किस टॉपिक पर चाहिए 



वात, पित्त और कफ तीनों बिगड़ जाएं तो क्या करें?

 Ayurvedic Tridosha Treatment - वात, पित्त और कफ तीनों बिगड़ जाएं तो क्या करें?

जब तीनों दोष बिगड़ जाएँ – इसे ही सन्निपात कहते हैं - आयुर्वेद में सबसे चुनौतीपूर्ण स्थिति तब मानी जाती है जब शरीर के तीनों दोष – वात, पित्त और कफ – एक साथ असंतुलित हो जाते हैं। इस अवस्था को सन्निपात कहा जाता है।


यहीं पर लोग सबसे बड़ी गलती करते हैं। वे किसी एक दोष को ठीक करने की दवा या उपाय शुरू करते हैं और अनजाने में दूसरा दोष और ज्यादा बिगड़ जाता है।


आज हम उन्हीं आयुर्वेदिक सिद्धांतों पर आधारित पाँच ऐसे तरीकों की बात करेंगे, जिनसे तीनों दोषों को एक साथ बैलेंस किया जा सकता है और शरीर को दोबारा ट्रैक पर लाया जा सकता है।


त्रिदोष क्यों बिगड़ते हैं – असली जड़ क्या है?

आयुर्वेद के अनुसार त्रिदोष का असंतुलन तब शुरू होता है जब जठराग्नि यानी डाइजेस्टिव फायर कमजोर पड़ जाती है।

कमज़ोर अग्नि की वजह से शरीर में आम यानी टॉक्सिन्स जमा होने लगते हैं और यहीं से रोगों की चेन रिएक्शन शुरू होती है।


इसीलिए इलाज की शुरुआत हमेशा अग्नि सुधारने से होती है, दवा से नहीं।


पहला स्टेप: लंघन – शरीर को खुद को साफ करने का मौका दें

सबसे पहले तीन दिन तक सिर्फ गुनगुना पानी पिएँ और मूंग दाल की पतली खिचड़ी लें।

आयुर्वेद में इसे लंघन कहा जाता है।


लॉजिक साफ़ है – जब सिस्टम पर लोड कम होगा, तभी शरीर खुद की सफाई कर पाएगा। यह शरीर को रीसेट करने जैसा है।


क्यों पहले वात को बैलेंस करना ज़रूरी है?

आयुर्वेद का एक मूल सिद्धांत है –

“वायुना विना दोषाणां गतिर्नास्ति”

मतलब, बिना वात के पित्त और कफ हिल भी नहीं सकते।


इसलिए जब तीनों दोष बिगड़े हों, तो सबसे पहले वात को शांत करना जरूरी है।


वात संतुलन का सबसे सरल उपाय

तिल के तेल से रोज़ हल्की मालिश।

यह शरीर के सूखेपन को खत्म करता है और नर्वस सिस्टम को शांत करता है।


दूसरा स्टेप: पित्त के लिए घी क्यों ज़रूरी है?

पित्त का मतलब सिर्फ गर्मी नहीं, बल्कि ओवरएक्टिव मेटाबॉलिज़्म भी है।

देसी घी पित्त को ठंडा करता है, लेकिन अग्नि को कमजोर नहीं करता।


इसीलिए पित्त संतुलन के लिए घी को आयुर्वेद में अमृत कहा गया है।


तीसरा स्टेप: कफ के लिए शहद और मूवमेंट

कफ का नेचर है भारीपन और जड़ता।

शहद कफ को काटता है और हल्का व्यायाम कफ को जमा नहीं होने देता।


ध्यान रहे – शहद हमेशा कच्चा लें, गर्म न करें।


जब तीनों दोष बिगड़े हों, तो डाइट कैसी होनी चाहिए?

ऐसी डाइट जो न बहुत ठंडी हो, न बहुत गर्म।

आयुर्वेद इसे सामान्य आहार कहता है।


अब अपनी थाली में ये पाँच बदलाव आज से शुरू करें।


1. अनाज – हल्का लेकिन पोषक

भारी गेहूं की रोटियाँ फिलहाल कम करें।

उसकी जगह:


पुराना चावल

जौ

मूंग की दाल


मूंग दाल इकलौती ऐसी दाल है जो वात, पित्त और कफ – तीनों को बैलेंस करती है।


2. सब्ज़ियाँ – हमेशा पकी हुई

कच्चा प्याज़ बिल्कुल बंद करें। यह वात बढ़ाता है।

हमेशा पकी हुई सब्ज़ियाँ खाएँ जैसे:


लौकी

तोरई

कद्दू

परवल


ये पचने में हल्की होती हैं और सिस्टम पर बोझ नहीं डालतीं।


3. फल – हर फल आपके लिए नहीं

इस समय सबसे सुरक्षित फल हैं:


अनार

पपीता


बहुत खट्टे या बहुत मीठे फलों से अभी दूरी बनाए रखें।


4. मसाले – कम लेकिन सही

लाल मिर्च को फिलहाल रसोई से बाहर रखें।

उसकी जगह:


जीरा

धनिया

सौंफ


ये तीनों मिलकर पाचन सुधारते हैं बिना पित्त को भड़काए।


5. कुकिंग फैट – देसी घी क्यों सबसे बेस्ट है?

रिफाइंड तेल छोड़ें।

देसी घी:


वात को चिकनाई देता है

पित्त को शांत करता है

कफ को जमा नहीं होने देता


इसीलिए यह त्रिदोष संतुलन का सबसे सुरक्षित फैट है।


शुरुआत समझ नहीं आ रही? ये करें

3 से 7 दिन तक सिर्फ मूंग दाल की खिचड़ी खाएँ।

यह आपके पाचन तंत्र के लिए फैक्ट्री रिसेट जैसा काम करता है।


कुछ चीज़ें जो तीनों दोषों पर काम करती हैं

1. आंवला

इकलौता फल जो:


पित्त को ठंडा करता है

वात को शांत करता है

कफ को सुखाता है


2. गिलोय

इसे त्रिदोष शामक कहा जाता है।

यह खून साफ करती है और शरीर में बैलेंस बनाती है।


3. त्रिफला – सही तरीके से लें

रात को गुनगुने पानी से लें - वात और पित्त को बाहर निकालता है

शहद के साथ लें - कफ को काटता है


दवा ले रहे हैं लेकिन गलत खाना खा रहे हैं?

तो त्रिदोष कभी ठीक नहीं होंगे।


इन विरुद्ध आहार से बचें:

दूध के साथ नमक या खट्टे फल

रात में दही

ठंडा पानी

ठंडा पानी वात और कफ को तुरंत बिगाड़ देता है।


समय का पालन – आयुर्वेद का सबसे अनदेखा नियम

रात 10 बजे तक सो जाएँ

सुबह ब्रह्म मुहूर्त में उठें

रोज़ 15 मिनट अनुलोम-विलोम या नाड़ी शोधन करें


यह प्राण वायु को संतुलित करता है और तीनों दोषों को स्थिर करता है।


Conclusion

त्रिदोष को बैलेंस करने के लिए:


पाचन सुधारें

आंवला और गिलोय को शामिल करें

विरुद्ध आहार से बचें


त्रिदोष का इलाज धैर्य माँगता है, लेकिन सही दिशा में किया गया प्रयास शरीर को स्थायी संतुलन देता है।


Monday, February 2, 2026

गोत्र प्रवर वेद शाखा सूत्र देवता

 गोत्र प्रवर वेद शाखा सूत्र देवता 

हमारी महान् वैदिक परम्परा रही है कि हम सब अपने-अपने गोत्रों को याद रखते हैं । इसके लिए हमारे मनीषियों, ऋषियों ने कितनी अच्छी परम्परा शुरु की थी कि विभिन्न संस्कारों का प्रारम्भ संकल्प-पाठ से कराते थे, जिसके अन्तर्गत अपने पिता, प्रपिता, पितामह, प्रपितामह के साथ-साथ गोत्र, प्रवर, आदि का परिचय भी दिया जाता था । इसमें जन्मभूमि, भारतवर्ष का भी उल्लेख होता था। इसमें सृष्टि के एक-एक पल का गणन होता था और संवत् को भी याद रखा जाता था । यह परम्परा आज भी प्रचलित है, कुछ न्यूनताओं के साथ। गोत्र और प्रवर की आवश्यकता विवाह के समय भी होती है । इसलिए इसे जानना आवश्यक है । इसके अन्तर्गत हम इन पाँच विषयों पर चर्चा करेंगे : ---


1) गोत्र


2) प्रवर


3) वेद


4) शाखा


5) सूत्र


6) देवता


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(1) गोत्र : ----


गोत्र का अर्थ है, कि वह कौन से ऋषिकुल का है। या उसका जन्म किस ऋषिकुल में हुआ है। किसी व्यक्ति की वंश परंपरा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता है। हम सभी जानते हैं कि हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान हैं । इस प्रकार से जो जिस गोत्र ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया। 


#इन_गोत्रों_के_मूल_ऋषि :– 

अंगिरा, भृगु, अत्रि, कश्यप, वशिष्ठ, अगस्त्य, तथा कुशिक थे, और इनके वंश अंगिरस, भार्गव,आत्रेय, काश्यप, वशिष्ठ अगस्त्य, तथा कौशिक हुए। [ इन गोत्रों के अनुसार इकाई को "गण" नाम दिया गया, यह माना गया कि एक गण का व्यक्ति अपने गण में विवाह न कर अन्य गण में करेगा। इस तरह इन सप्त ऋषियों के पश्चात् उनकी संतानों के विद्वान ऋषियों के नामों से अन्य गोत्रों का नामकरण हुआ।


गोत्र शब्द का एक अर्थ गो जो पृथ्वी का पर्याय भी है । 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी है। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करने वाले ऋषि से ही है। गो शब्द इंद्रियों का वाचक भी है, ऋषि मुनि अपनी इंद्रियों को वश में कर अन्य प्रजा जनो का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्र कारक कहलाए। ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे, वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परंपरा पड़ गई। 


(2) प्रवर : ----


प्रवर का शाब्दिक अर्थ है--श्रेष्ठ । गोत्र और प्रवर का घनिष्ठ सम्बन्ध है । एक ही गोत्र में अनेक ऋषि हुए । वे ऋषि भी अपनी विद्वत्ता और श्रेष्ठता के कारण प्रसिद्ध हो गए । जिस गोत्र में जो व्यक्ति प्रसिद्ध हो जाता है, उस गोत्र की पहचान उसी व्यक्ति के नाम से प्रचलित हो जाती है । 


एक सामान्य उदाहरण देखिए :-


श्रीराम सूर्यवंश में हुए । इस वंश के प्रथम व्यक्ति सूर्य थे । आगे चलकर इसी वंश में रघु राजा प्रसिद्ध हो गए । तो आगे चलकर इनके नाम से ही रघुवंश या राघव वंश प्रचलित हो गया । इसी प्रकार इक्ष्वाकु भी प्रसिद्ध राजा हुए, तो उनके नाम से भी इस वंश का नाम इक्ष्वाकु वंश पड गया ।


इसी प्रकार ब्राह्मणों के ऋषि वंश में उदाहरण के साथ मिलान करें । जैसेः---वशिष्ठ ऋषि का वंश । वशिष्ठ के नाम से वशिष्ठ गोत्र चल पडा । अब इसी वंश में वाशिष्ठ, आत्रेय और जातुकर्ण्य ऋषि भी हुए , जो अति प्रसिद्धि को प्राप्त कर गए । अब इस वंश के तीन व्यक्ति अर्थात् तीन मार्ग हुए । इन तीनों के नाम से भी वंश का नाम पड गया । ये यद्यपि पृथक् हो गए, किन्तु इन तीनों का मूल पुरुष वशिष्ठ तो एक ही व्यक्ति है, अतः ये तीनों एक ही वंश के हैं, इसलिए ये तीनों आपस विवाह सम्बन्ध नहीं रख सकते । 


ये तीनों इस वंश श्रेष्ठ कहलाए, इसलिए ये प्रवर हैं । इस प्रकार एक गोत्र में तीन या पाँच प्रवर हो सकते हैं । भरद्वाज गोत्र में पाँच प्रवर हैं, अर्थात् इस गोत्र में पाँच ऋषि बहुत प्रसिद्धि को प्राप्त हो गए, इसलिए इनके नाम से भी गोत्र चल पडा, ये गोत्र ही प्रवर हैं । मूल गोत्र भरद्वाज है और इसके प्रवर ऋषि हुए---आंगिरस्, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, शौङ्ग, शैशिर ।


ये प्रवर तीसरी पीढी की सन्तान हो सकते हैं, या पाँचवी पीढी की । अपत्यं पौत्रप्रभृति गोत्रम्---अष्टाध्यायी--4.1.162 सूत्रार्थ यह है कि पौत्र से लेकर जो सन्तान है, उसकी भी गोत्र संज्ञा होती है । अर्थात् पौत्र की तथा उससे आगे की सन्तानों की गोत्र संज्ञा होती है । इस सूत्र से गोत्र अर्थात् प्रवर की व्यवस्था है । इस व्यवस्था से या तो आप कह सकते हैं कि गोत्र और प्रवर एक ही है या फिर यह कह सकते हैं कि थोडा-सा अन्तर है । दोनों एक ही मूल पुरुष से जुड़े हुए हैं ।


प्रवर में यह व्यवस्था है कि प्रथम प्रवर गोत्र के ऋषि का होता है, दूसरा प्रवर ऋषि के पुत्र का होता है, तीसरा प्रवर गोत्र के ऋषि पौत्र का होता है । (यह व्यवस्था आधुनिक है । प्राचीन व्यवस्था पाणिनि के सूत्र से ज्ञात होता है, जो ऊपर दिया हुआ है ।) इस प्रकार प्रवर से उस गोत्र प्रवर्तक ऋषि की तीसरी पीढी और पाँचवी पीढी तक का पता लगता है । हम आपको एक बार और बता देना चाहते हैं कि एक समान गोत्र और प्रवर में विवाह निषिद्ध है । 


#कुछ_गोत्र_प्रवर : --


🔸(1) अगस्त्य---इसमें तीन प्रवर हैं---आगसस्त्य, माहेन्द्र, मायोभुव ।


🔹(2) उपमन्यु---वाशिष्ठ, ऐन्द्रप्रमद, आभरद्वसव्य ।


🔸(3) कण्व---आंगिरस्, घौर, काण्व ।


🔹(4) कश्यप---कश्यप, असित, दैवल ।


🔸(5) कात्यायन---वैश्वामित्र, कात्य, कील ।


🔹(6) कुण्डिन---वाशिष्ठ, मैत्रावरुण, कौण्डिन्य ।


🔸(7) कुशिक---वैश्वामित्र, देवरात, औदल ।


🔹(8) कृष्णात्रेय---आत्रेय, आर्चनानस, श्यावाश्व ।


🔸(9) कौशिक---वैश्वामित्र, आश्मरथ्य, वाघुल ।


🔹(10) गर्ग---आंगिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, गार्ग्य, शैन्य ।


🔸(11) गौतम---आंगिरस्, औचथ्य, गौतम ।


🔹(12) घृतकौशिक---वैश्वामित्र, कापातरस, घृत ।


🔸(13) चान्द्रायण---आंगिरस, गौरुवीत, सांकृत्य ।


🔹(14) पराशर---वाशिष्ठ, शाक्त्य, पाराशर्य ।


🔸(15) भरद्वाजः---आंगिरस्, बार्हस्पत्य, भारद्वाज, शौङ्ग, शैशिर ।


🔹(16) भार्गव---भार्गव, च्यावन, आप्नवान्, और्व, जामदग्न्य ।


🔸(17) मौनस---मौनस, भार्ग्व, वीतहव्य ।


🔹(18) वत्स---भार्गव, च्यावन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य ।


#कुछ_प्रसिद्ध_गोत्रों_के_प्रवर_आदि_नीचे_लिखे_हैं :


🔸(1) कश्यप,


🔹(2) काश्यप के काश्यप, असित, देवल अथवा काश्यप, आवत्सार, नैधु्रव तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के ब्राह्मण ये हैं - जैथरिया, किनवार, बरुवार, दन्सवार, मनेरिया, कुढ़नियाँ, नोनहुलिया, तटिहा, कोलहा, करेमुवा, भदैनी चौधरी, त्रिफला पांडे, परहापै, सहस्रामै, दीक्षित, जुझौतिया, बवनडीहा, मौवार, दघिअरे, मररें, सिरियार, धौलानी, डुमरैत, भूपाली आदि।


🔸(3) पराशर के वसिष्ठ, शक्‍ति, पराशर तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के ब्राह्मण एकसरिया, सहदौलिया, सुरगणे हस्तगामे आदि है।


🔹(4) वसिष्ठ के वसिष्ठ, शक्‍ति, पराशर अथवा वसिष्ठ, भरद्वसु, इंद्र प्रमद ये तीन प्रवर हैं। ये ब्राह्मण कस्तुवार, डरवलिया, मार्जनी मिश्र आदि हैं। कोई वसिष्ठ, अत्रि, संस्कृति प्रवर मानते हैं।


🔸(5) शांडिल्य के शांडिल्य, असित, देवल तीन प्रवर हैं। दिघवैत, कुसुमी-तिवारी, नैनजोरा, रमैयापांडे, कोदरिए, अनरिए, कोराँचे, चिकसौरिया, करमहे, ब्रह्मपुरिए, पहितीपुर पांडे, बटाने, सिहोगिया आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔹(6) भरद्वाज,


🔸(7) भारद्वाज के आंगिरस, बार्हस्पत्य, भारद्वाज अथवा आंगिरस, गार्ग्य, शैन्य तीन प्रवर हैं। दुमटिकार, जठरवार, हीरापुरी पांडे, बेलौंचे, अमवरिया, चकवार, सोनपखरिया, मचैयांपांडे, मनछिया आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(8) गर्ग


🔸(9) गार्ग्य के आंगिरस, गार्ग्य, शैन्य तीन अथवा धृत, कौशिक मांडव्य, अथर्व, वैशंपायन पाँच प्रवर हैं। मामखोर के शुक्ल, बसमैत, नगवाशुक्ल, गर्ग आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(10) सावर्ण्य के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य पाँच, या सावर्ण्य, पुलस्त्य, पुलह तीन प्रवर हैं। पनचोभे, सवर्णियाँ, टिकरा पांडे, अरापै बेमुवार आदि इस गोत्र के हैं।


🔸(11) वत्स के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, और्व, जामदग्न्य पाँच, या भार्गव, च्यवन, आप्नवान तीन प्रवर हैं। दोनवार, गानामिश्र, सोनभदरिया, बगौछिया, जलैवार, शमसेरिया, हथौरिया, गगटिकैत आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(12) गौतम के आंगिरस बार्हिस्पत्य, भारद्वाज या अंगिरा, वसिष्ठ, गार्हपत्य, तीन, या अंगिरा, उतथ्य, गौतम, उशिज, कक्षीवान पाँच प्रवर हैं। पिपरामिश्र, गौतमिया, करमाई, सुरौरे, बड़रमियाँ दात्यायन, वात्स्यायन आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔸(13) भार्गव के भार्गव, च्यवन, आप्नवान, तीन या भार्गव, च्यवन आप्नवन, और्व, जायदग्न्य, पाँच प्रवर हैं, भृगुवंश, असरिया, कोठहा आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔹(14) सांकृति के सांकृति, सांख्यायन, किल, या शक्‍ति, गौरुवीत, संस्कृति या आंगिरस, गौरुवीत, संस्कृति तीन प्रवर हैं। सकरवार, मलैयांपांडे फतूहाबादी मिश्र आदि इन गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔸(15) कौशिक के कौशिक, अत्रि, जमदग्नि, या विश्‍वामित्रा, अघमर्षण, कौशिक तीन प्रवर हैं। कुसौझिया, टेकार के पांडे, नेकतीवार आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔹(16) कात्यायन के कात्यायन, विश्‍वामित्र, किल या कात्यायन, विष्णु, अंगिरा तीन प्रवर हैं। वदर्का मिश्र, लमगोड़िया तिवारी, श्रीकांतपुर के पांडे आदि इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔸(17) विष्णुवृद्ध के अंगिरा, त्रासदस्यु, पुरुकुत्स तीन प्रवर हैं। इस गोत्र के कुथवैत आदि ब्राह्मण हैं! 


🔹(18) आत्रेय।


🔸(19) कृष्णात्रेय के आत्रेय, आर्चनानस, श्यावाश्‍व तीन प्रवर हैं। मैरियापांडे, पूले, इनरवार इस गोत्र के ब्राह्मण हैं।


🔹(20) कौंडिन्य के आस्तीक, कौशिक, कौंडिन्य या मैत्रावरुण वासिष्ठ, कौंडिन्य तीन प्रवर हैं। इनका अथर्ववेद भी है। अथर्व विजलपुरिया आदि ब्राह्मण इस गोत्र के हैं।


🔸(21) मौनस के मौनस, भार्गव, वीतहव्य (वेधास) तीन प्रवर हैं।


🔹(22) कपिल के अंगिरा, भारद्वाज, कपिल तीन प्रवर हैं।

इस गोत्र के ब्राह्मण जसरायन आदि हैं।


🔸(23) तांडय गोत्र के तांडय, अंगिरा, मौद्गलय तीन प्रवर हैं।


🔹(24) लौगाक्षि के लौगाक्षि, बृहस्पति, गौतम तीन प्रवर हैं।


🔸(25) मौद्गल्य के मौद्गल्य, अंगिरा, बृहस्पति तीन प्रवर हैं।


🔹(26) कण्व के आंगिरस, आजमीढ़, काण्व, या आंगिरस, घौर, काण्व तीन प्रवर हैं।


🔸(27) धनंजय के विश्‍वामित्र, मधुच्छन्दस, धनंजय तीन प्रवर हैं।


🔹(28) उपमन्यु के वसिष्ठ, इंद्रप्रमद, अभरद्वसु तीन प्रवर हैं।


🔸(29) कौत्स के आंगिरस, मान्धाता, कौत्स तीन प्रवर हैं।


🔹(30) अगस्त्य के अगस्त्य, दाढर्यच्युत, इधमवाह तीन प्रवर हैं। अथवा केवल अगस्त्यही।


इसके सिवाय और गोत्रों के प्रवर प्रवरदर्पण आदि से अथवा ब्राह्मणों की वंशावलियों से जाने जा सकते हैं।ब्राम्हण का एकादश परिचय 1 गोत्र .गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है । किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया ।


विश्‍वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतम:।

अत्रिवर्सष्ठि: कश्यपइत्येतेसप्तर्षय:॥ 

सप्तानामृषी-णामगस्त्याष्टमानां 

यदपत्यं तदोत्रामित्युच्यते॥


विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। 


इस तरह आठ ऋषियों की वंश-परम्परा में जितने ऋषि (वेदमन्त्र द्रष्टा) आ गए वे सभी गोत्र कहलाते हैं। और आजकल ब्राह्मणों में जितने गोत्र मिलते हैं वह उन्हीं के अन्तर्गत है।


 सिर्फ भृगु, अंगिरा के वंशवाले ही उनके सिवाय और हैं जिन ऋषियों के नाम से भी गोत्र व्यवहार होता है। 


इस प्रकार कुल दस ऋषि मूल में है। इस प्रकार देखा जाता है कि इन दसों के वंशज ऋषि लाखों हो गए होंगे और उतने ही गोत्र भी होने चाहिए।


गोत्र शब्द एक अर्थ में गो अर्थात् पृथ्वी का पर्याय भी है ओर 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी हे। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करें वाले ऋषि से ही है। 


गो शब्द इन्द्रियों का वाचक भी है, ऋषि- मुनि अपनी इन्द्रियों को वश में कर अन्य प्रजाजनों का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्रकारक कहलाए। 


ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे , वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परम्परा आव.....

1 गोत्र .....


गोत्र का अर्थ है कि वह कौन से ऋषिकुल का है या उसका जन्म किस ऋषिकुल से सम्बन्धित है । किसी व्यक्ति की वंश-परम्परा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। 


हम सभी जानते हें की हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान है, इस प्रकार से जो जिस ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया ।


*विश्‍वामित्रो जमदग्निर्भरद्वाजोऽथ गौतम:।*

*अत्रिवर्सष्ठि: कश्यपइत्येतेसप्तर्षय:॥*

*सप्तानामृषी-णामगस्त्याष्टमानां* 

*यदपत्यं तदोत्रामित्युच्यते॥*


विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप- इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। 


इस तरह आठ ऋषियों की वंश-परम्परा में जितने ऋषि (वेदमन्त्र द्रष्टा) आ गए वे सभी गोत्र कहलाते हैं। और आजकल ब्राह्मणों में जितने गोत्र मिलते हैं वह उन्हीं के अन्तर्गत है।


 सिर्फ भृगु, अंगिरा के वंशवाले ही उनके सिवाय और हैं जिन ऋषियों के नाम से भी गोत्र व्यवहार होता है। 


इस प्रकार कुल दस ऋषि मूल में है। इस प्रकार देखा जाता है कि इन दसों के वंशज ऋषि लाखों हो गए होंगे और उतने ही गोत्र भी होने चाहिए।


गोत्र शब्द एक अर्थ में गो अर्थात् पृथ्वी का पर्याय भी है ओर 'त्र' का अर्थ रक्षा करने वाला भी हे। यहाँ गोत्र का अर्थ पृथ्वी की रक्षा करें वाले ऋषि से ही है। 


गो शब्द इन्द्रियों का वाचक भी है, ऋषि- मुनि अपनी इन्द्रियों को वश में कर अन्य प्रजाजनों का मार्ग दर्शन करते थे, इसलिए वे गोत्रकारक कहलाए। 


ऋषियों के गुरुकुल में जो शिष्य शिक्षा प्राप्त कर जहा कहीं भी जाते थे , वे अपने गुरु या आश्रम प्रमुख ऋषि का नाम बतलाते थे, जो बाद में उनके वंशधरो में स्वयं को उनके वही गोत्र कहने की परम्परा आविर्भसरयूपारीण सभी ब्राहमणों के मुख्य गाँव और गोत्र : 


गर्ग (शुक्ल- वंश)


गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|


(१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं|


उपगर्ग (शुक्ल-वंश) 


उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|


बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार


यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|


गौतम (मिश्र-वंश)


गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|


(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी


इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं|


उप गौतम (मिश्र-वंश)


उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|


(१) कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े (६) कपीसा


इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति मानी जाति है|


वत्स गोत्र ( मिश्र- वंश)


वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|


(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (*गोत्र, प्रवर, वेद, शाखा, सूत्र, देवता*


हमारी महान् वैदिक परम्परा रही है कि हम सब अपने-अपने गोत्रों को याद रखते हैं । इसके लिए हमारे मनीषियों, ऋषियों ने कितनी अच्छी परम्परा शुरु की थी कि विभिन्न संस्कारों का प्रारम्भ संकल्प-पाठ से कराते थे, जिसके अन्तर्गत अपने पिता, प्रपिता, पितामह, प्रपितामह के साथ-साथ गोत्र, प्रवर, आदि का परिचय भी दिया जाता था । इसमें जन्मभूमि, भारतवर्ष का भी उल्लेख होता था। इसमें सृष्टि के एक-एक पल का गणन होता था और संवत् को भी याद रखा जाता था । यह परम्परा आज भी प्रचलित है, कुछ न्यूनताओं के साथ। गोत्र और प्रवर की आवश्यकता विवाह के समय भी होती है । इसलिए इसे जानना आवश्यक है । इसके अन्तर्गत हम इन पाँच विषयों पर चर्चा करेंगे : ---


1) गोत्र


2) प्रवर


3) वेद


4) शाखा


5) सूत्र


6) देवता


=============================================


(1) गोत्र : ----


गोत्र का अर्थ है, कि वह कौन से ऋषिकुल का है। या उसका जन्म किस ऋषिकुल में हुआ है। किसी व्यक्ति की वंश परंपरा जहां से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता है। हम सभी जानते हैं कि हम किसी न किसी ऋषि की ही संतान हैं । इस प्रकार से जो जिस गोत्र ऋषि से प्रारम्भ हुआ वह उस ऋषि का वंशज कहा गया। 


इन गोत्रों के मूल ऋषि – अंगिरा, भृगु, अत्रि, कश्यप, वशिष्ठ, अगस्त्य, तथा कुशिक थे, और इनके वंश अंगिरस, भार्गव,आत्रेय, काश्यप, वशिष्ठ अगस्त्य, तथा कौशिक हुए। [ इन गोत्रों के अनुसार इकाई को "गण" नाम दिया गया, यह माना गया कि एक गण का व्यक्ति अपने गण में विवाह न कर अन्य गण में करेगा। इस तरह इन सप्त ऋषियों के पश्चात् उनकी संतानों के विद्वान ऋषियों के नामों से अन्य गोत्रों का नामकरण हुआ।


गोत्र शब्द का एक अर्थ गब्राह्मण वंशावली (गोत्र प्रवर परिचय)


सरयूपारीण ब्राह्मण या सरवरिया ब्राह्मण या सरयूपारी ब्राह्मण सरयू नदी के पूर्वी तरफ बसे हुए ब्राह्मणों को कहा जाता है। यह कान्यकुब्ज ब्राह्मणो कि शाखा है। श्रीराम ने लंका विजय के बाद कान्यकुब्ज ब्राह्मणों से यज्ञ करवाकर उन्हे सरयु पार स्थापित किया था। सरयु नदी को सरवार भी कहते थे। ईसी से ये ब्राह्मण सरयुपारी ब्राह्मण कहलाते हैं। सरयुपारी ब्राह्मण पूर्वी उत्तरप्रदेश, उत्तरी मध्यप्रदेश, बिहार छत्तीसगढ़ और झारखण्ड में भी होते हैं। मुख्य सरवार क्षेत्र पश्चिम मे उत्तर प्रदेश राज्य के अयोध्या शहर से लेकर पुर्व मे बिहार के छपरा तक तथा उत्तर मे सौनौली से लेकर दक्षिण मे मध्यप्रदेश के रींवा शहर तक है। काशी, प्रयाग, रीवा, बस्ती, गोरखपुर, अयोध्या, छपरा इत्यादि नगर सरवार भूखण्ड में हैं।


एक अन्य मत के अनुसार श्री राम ने कान्यकुब्जो को सरयु पार नहीं बसाया था बल्कि रावण जो की ब्राह्मण थे उनकी हत्या करने पर ब्रह्म हत्या के पाप से मुक्त होने के लिए जब श्री राम ने भोजन ओर दान के लिए ब्राह्मणों को आमंत्रित किया तो जो ब्राह्मण स्नान करने के बहाने से सरयू नदी पार करके उस पार चले गए ओर भोजन तथा दान समंग्री ग्रहण नहीं की वे ब्राह्मण सरयुपारीन ब्राह्मण कहे गए।


#सरयूपारीण_ब्राहमणों_के_मुख्य_गाँव : 


गर्ग (शुक्ल- वंश)


गर्ग ऋषि के तेरह लडके बताये जाते है जिन्हें गर्ग गोत्रीय, पंच प्रवरीय, शुक्ल बंशज कहा जाता है जो तेरह गांवों में बिभक्त हों गये थे| गांवों के नाम कुछ इस प्रकार है|


(१) मामखोर (२) खखाइज खोर (३) भेंडी (४) बकरूआं (५) अकोलियाँ (६) भरवलियाँ (७) कनइल (८) मोढीफेकरा (९) मल्हीयन (१०) महसों (११) महुलियार (१२) बुद्धहट (१३) इसमे चार गाँव का नाम आता है लखनौरा, मुंजीयड, भांदी, और नौवागाँव| ये सारे गाँव लगभग गोरखपुर, देवरियां और बस्ती में आज भी पाए जाते हैं।


उपगर्ग (शुक्ल-वंश):


उपगर्ग के छ: गाँव जो गर्ग ऋषि के अनुकरणीय थे कुछ इस प्रकार से हैं|

(१)बरवां (२) चांदां (३) पिछौरां (४) कड़जहीं (५) सेदापार (६) दिक्षापार

यही मूलत: गाँव है जहाँ से शुक्ल बंश का उदय माना जाता है यहीं से लोग अन्यत्र भी जाकर शुक्ल बंश का उत्थान कर रहें हैं यें सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं।


गौतम (मिश्र-वंश):


गौतम ऋषि के छ: पुत्र बताये जातें हैं जो इन छ: गांवों के वाशी थे|

(१) चंचाई (२) मधुबनी (३) चंपा (४) चंपारण (५) विडरा (६) भटीयारी

इन्ही छ: गांवों से गौतम गोत्रीय, त्रिप्रवरीय मिश्र वंश का उदय हुआ है, यहीं से अन्यत्र भी पलायन हुआ है ये सभी सरयूपारीण ब्राह्मण हैं।


उप गौतम (मिश्र-वंश):


उप गौतम यानि गौतम के अनुकारक छ: गाँव इस प्रकार से हैं|

(१) कालीडीहा (२) बहुडीह (३) वालेडीहा (४) भभयां (५) पतनाड़े (६) कपीसा

इन गांवों से उप गौतम की उत्पत्ति मानी जाति है।


वत्स गोत्र (मिश्र- वंश):


वत्स ऋषि के नौ पुत्र माने जाते हैं जो इन नौ गांवों में निवास करते थे|

(१) गाना (२) पयासी (३) हरियैया (४) नगहरा (५) अघइला (६) सेखुई (७) पीडहरा (८) राढ़ी (९) मकहडा

बताया जाता है की इनके वहा पांति का प्रचलन था अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है।


कौशिक गोत्र (मिश्र-वंश):


तीन गांवों से इनकी उत्पत्ति बताई जाती है जो निम्न है।

(१) धर्मपुरा (२) सोगावरी (३) देशी


वशिष्ठ गोत्र (मिश्र-वंश):


इनका निवास भी इन तीन गांवों में बताई जाती है।

(१) बट्टूपुर मार्जनी (२) बढ़निया (३) खउसी


शांडिल्य गोत्र ( तिवारी,त्रिपाठी वंश) 


शांडिल्य ऋषि के बारह पुत्र बताये जाते हैं जो इन बाह गांवों से प्रभुत्व रखते हैं।


(१) सांडी (२) सोहगौरा (३) संरयाँ (४) श्रीजन (५) धतूरा (६) भगराइच (७) बलूआ (८) हरदी (९) झूडीयाँ (१०) उनवलियाँ (११) लोनापार (१२) कटियारी, लोनापार में लोनाखार, कानापार, छपरा भी समाहित है।

इन्ही बारह गांवों से आज चारों तरफ इनका विकास हुआ है, यें सरयूपारीण ब्राह्मण हैं। इनका गोत्र श्री मुख शांडिल्य त्रि प्रवर है, श्री मुख शांडिल्य में घरानों का प्रचलन है जिसमे राम घराना, कृष्ण घराना, नाथ घराना, मणी घराना है, इन चारों का उदय, सोहगौरा गोरखपुर से है जहाँ आज भी इन चारों का अस्तित्व कायम है। 


उप शांडिल्य ( तिवारी- त्रिपाठी, वंश):


इनके छ: गाँव बताये जाते हैं जी निम्नवत हैं।

(१) शीशवाँ (२) चौरीहाँ (३) चनरवटा (४) जोजिया (५) ढकरा (६) क़जरवटा

भार्गव गोत्र (तिवारी या त्रिपाठी वंश):

भार्गव ऋषि के चार पुत्र बताये जाते हैं जिसमें चार गांवों का उल्लेख मिलता है|

(१) सिंघनजोड़ी (२) सोताचक (३) चेतियाँ (४) मदनपुर।


भारद्वाज गोत्र (दुबे वंश):


भारद्वाज ऋषि के चार पुत्र बाये जाते हैं जिनकी उत्पत्ति इन चार गांवों से बताई जाती है|

(१) बड़गईयाँ (२) सरार (३) परहूँआ (४) गरयापार


कन्चनियाँ और लाठीयारी इन दो गांवों में दुबे घराना बताया जाता है जो वास्तव में गौतम मिश्र हैं लेकिन इनके पिता क्रमश: उठातमनी और शंखमनी गौतम मिश्र थे परन्तु वासी (बस्ती) के राजा बोधमल ने एक पोखरा खुदवाया जिसमे लट्ठा न चल पाया, राजा के कहने पर दोनों भाई मिल कर लट्ठे को चलाया जिसमे एक ने लट्ठे सोने वाला भाग पकड़ा तो दुसरें ने लाठी वाला भाग पकड़ा जिसमे कन्चनियाँ व लाठियारी का नाम पड़ा, दुबे की गादी होने से ये लोग दुबे कहलाने लगें। सरार के दुबे के वहां पांति का प्रचलन रहा है अतएव इनको तीन के समकक्ष माना जाता है।


सावरण गोत्र ( पाण्डेय वंश)


सावरण ऋषि के तीन पुत्र बताये जाते हैं इनके वहां भी पांति का प्रचलन रहा है जिन्हें तीन के समकक्ष माना जाता है जिनके तीन गाँव निम्न हैं| 


(१) इन्द्रपुर (२) दिलीपपुर (३) रकहट (चमरूपट्टी) 


सांकेत गोत्र (मलांव के पाण्डेय वंश)


सांकेत ऋषि के तीन पुत्र इन तीन गांवों से सम्बन्धित बाते जाते हैं|


(१) मलांव (२) नचइयाँ (३) चकसनियाँ


कश्यप गोत्र (त्रिफला के पाण्डेय वंश)


इन तीन गांवों से बताये जाते हैं।


(१) त्रिफला (२) मढ़रियाँ (३) ढडमढीयाँ 


ओझा वंश 


इन तीन गांवों से बताये जाते हैं।


(१) करइली (२) खैरी (३) निपनियां 


चौबे -चतुर्वेदी, वंश (कश्यप गोत्र)


इनके लिए तीन गांवों का उल्लेख मिलता है।


(१) वंदनडीह (२) बलूआ (३) बेलउजां 


एक गाँव कुसहाँ का उल्लेख बताते है जो शायद उपाध्याय वंश का मालूम पड़ता है।


ब्राह्मणों की वंशावली


भविष्य पुराण के अनुसार ब्राह्मणों का इतिहास है की प्राचीन काल में महर्षि कश्यप के पुत्र कण्वय की आर्यावनी नाम की देव कन्या पत्नी हुई। ब्रम्हा की आज्ञा से दोनों कुरुक्षेत्र वासनी

सरस्वती नदी के तट पर गये और कण् व चतुर्वेदमय सूक्तों में सरस्वती देवी की स्तुति करने लगे एक वर्ष बीत जाने पर वह देवी प्रसन्न हो वहां आयीं और ब्राम्हणो की समृद्धि के लिये उन्हें 

वरदान दिया। वर के प्रभाव कण्वय के आर्य बुद्धिवाले दस पुत्र हुए जिनका क्रमानुसार नाम था 👇👇


उपाध्याय,

दीक्षित,

पाठक,

शुक्ला,

मिश्रा,

अग्निहोत्री,

दुबे,

तिवारी,

पाण्डेय,

और

चतुर्वेदी।


इन लोगो का जैसा नाम था वैसा ही गुण। इन लोगो ने नत मस्तक हो सरस्वती देवी को प्रसन्न किया। बारह वर्ष की अवस्था वाले उन लोगो को भक्तवत्सला शारदा देवी ने अपनी कन्याए प्रदान की।

वे क्रमशः


उपाध्यायी,

दीक्षिता,

पाठकी,

शुक्लिका,

मिश्राणी,

अग्निहोत्रिधी,

द्विवेदिनी,

तिवेदिनी

पाण्ड्यायनी,

और

चतुर्वेदिनी कहलायीं।


फिर उन कन्याआं के भी अपने-अपने पति से सोलह-सोलह पुत्र हुए हैं वे सब गोत्रकार हुए जिनका नाम -


कष्यप,

भरद्वाज,

विश्वामित्र,

गौतम,

जमदग्रि,

वसिष्ठ,

वत्स,

गौतम,

पराशर,

गर्ग,

अत्रि,

भृगडत्र,

अंगिरा,

श्रंगी,

कात्याय,

और

याज्ञवल्क्य।


इन नामो से सोलह-सोलह पुत्र जाने जाते हैं।

मुख्य 10 प्रकार ब्राम्हणों ये हैं-


🔸(1) तैलंगा,

🔸(2) महार्राष्ट्रा,

🔸(3) गुर्जर,

🔸(4) द्रविड,

🔸(5) कर्णटिका,

यह पांच "द्रविण" कहे जाते हैं, ये विन्ध्यांचल के दक्षिण में पाय जाते हैं। तथा विंध्यांचल के उत्तर मं पाये जाने वाले या वास करने वाले ब्राम्हण


🔹(1) सारस्वत,

🔹(2) कान्यकुब्ज,

🔹(3) गौड़,

🔹(4) मैथिल,

🔹(5) उत्कलये,

उत्तर के पंच गौड़ कहे जाते हैं। वैसे ब्राम्हण अनेक हैं जिनका वर्णन आगे लिखा है।

ऐसी संख्या मुख्य 115 की है। शाखा भेद अनेक हैं । इनके अलावा संकर जाति ब्राम्हण अनेक है।

यहां मिली जुली उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हणों की नामावली 115 की दे रहा हूं। जो एक से दो और 2 से 5 और 5 से 10 और 10 से 84 भेद हुए हैं,

फिर उत्तर व दक्षिण के ब्राम्हण की संख्या शाखा भेद से 230 के लगभग है। तथा और भी शाखा भेद हुए हैं, जो लगभग 300 के करीब ब्राम्हण भेदों की संख्या का लेखा पाया गया है। उत्तर व दक्षिणी ब्राम्हणां के भेद इस प्रकार है 81 ब्राम्हाणां की 31 शाखा कुल 115 ब्राम्हण संख्या, मुख्य है -


(1) गौड़ ब्राम्हण,

(2)गुजरगौड़ ब्राम्हण (मारवाड,मालवा)

(3) श्री गौड़ ब्राम्हण,

(4) गंगापुत्र गौडत्र ब्राम्हण,

(5) हरियाणा गौड़ ब्राम्हण,

(6) वशिष्ठ गौड़ ब्राम्हण,

(7) शोरथ गौड ब्राम्हण,

(8) दालभ्य गौड़ ब्राम्हण,

(9) सुखसेन गौड़ ब्राम्हण,

(10) भटनागर गौड़ ब्राम्हण,

(11) सूरजध्वज गौड ब्राम्हण(षोभर),

(12) मथुरा के चौबे ब्राम्हण,

(13) वाल्मीकि ब्राम्हण,

(14) रायकवाल ब्राम्हण,

(15) गोमित्र ब्राम्हण,

(16) दायमा ब्राम्हण,

(17) सारस्वत ब्राम्हण,

(18) मैथल ब्राम्हण,

(19) कान्यकुब्ज ब्राम्हण,

(20) उत्कल ब्राम्हण,

(21) सरवरिया ब्राम्हण,

(22) पराशर ब्राम्हण,

(23) सनोडिया या सनाड्य,

(24)मित्र गौड़ ब्राम्हण,

(25) कपिल ब्राम्हण,

(26) तलाजिये ब्राम्हण,

(27) खेटुवे ब्राम्हण,

(28) नारदी ब्राम्हण,

(29) चन्द्रसर ब्राम्हण,

(30)वलादरे ब्राम्हण,

(31) गयावाल ब्राम्हण,

(32) ओडये ब्राम्हण,

(33) आभीर ब्राम्हण,

(34) पल्लीवास ब्राम्हण,

(35) लेटवास ब्राम्हण,

(36) सोमपुरा ब्राम्हण,

(37) काबोद सिद्धि ब्राम्हण,

(38) नदोर्या ब्राम्हण,

(39) भारती ब्राम्हण,

(40) पुश्करर्णी ब्राम्हण,

(41) गरुड़ गलिया ब्राम्हण,

(42) भार्गव ब्राम्हण,

(43) नार्मदीय ब्राम्हण,

(44) नन्दवाण ब्राम्हण,

(45) मैत्रयणी ब्राम्हण,

(46) अभिल्ल ब्राम्हण,

(47) मध्यान्दिनीय ब्राम्हण,

(48) टोलक ब्राम्हण,

(49) श्रीमाली ब्राम्हण,

(50) पोरवाल बनिये ब्राम्हण,

(51) श्रीमाली वैष्य ब्राम्हण 

(52) तांगड़ ब्राम्हण,

(53) सिंध ब्राम्हण,

(54) त्रिवेदी म्होड ब्राम्हण,

(55) इग्यर्शण ब्राम्हण,

(56) धनोजा म्होड ब्राम्हण,

(57) गौभुज ब्राम्हण,

(58) अट्टालजर ब्राम्हण,

(59) मधुकर ब्राम्हण,

(60) मंडलपुरवासी ब्राम्हण,

(61) खड़ायते ब्राम्हण,

(62) बाजरखेड़ा वाल ब्राम्हण,

(63) भीतरखेड़ा वाल ब्राम्हण,

(64) लाढवनिये ब्राम्हण,

(65) झारोला ब्राम्हण,

(66) अंतरदेवी ब्राम्हण,

(67) गालव ब्राम्हण,

(68) गिरनारे ब्राम्हण


#ब्राह्मण_गौत्र_और_गौत्र_कारक_115_ऋषि 🚩


(1). अत्रि, (2). भृगु, (3). आंगिरस, (4). मुद्गल, (5). पातंजलि, (6). कौशिक,(7). मरीच, (8). च्यवन, (9). पुलह, (10). आष्टिषेण, (11). उत्पत्ति शाखा, (12). गौतम गोत्र,(13). वशिष्ठ और संतान (13.1). पर वशिष्ठ, (13.2). अपर वशिष्ठ, (13.3). उत्तर वशिष्ठ, (13.4). पूर्व वशिष्ठ, (13.5). दिवा वशिष्ठ, (14). वात्स्यायन,(15). बुधायन, (16). माध्यन्दिनी, (17). अज, (18). वामदेव, (19). शांकृत्य, (20). आप्लवान, (21). सौकालीन, (22). सोपायन, (23). गर्ग, (24). सोपर्णि, (25). शाखा, (26). मैत्रेय, (27). पराशर, (28). अंगिरा, (29). क्रतु, (30. अधमर्षण, (31). बुधायन, (32). आष्टायन कौशिक, (33). अग्निवेष भारद्वाज, (34). कौण्डिन्य, (34). मित्रवरुण,(36). कपिल, (37). शक्ति, (38). पौलस्त्य, (39). दक्ष, (40). सांख्यायन कौशिक, (41). जमदग्नि, (42). कृष्णात्रेय, (43). भार्गव, (44). हारीत, (45). धनञ्जय, (46). पाराशर, (47). आत्रेय, (48). पुलस्त्य, (49). भारद्वाज, (50). कुत्स, (51). शांडिल्य, (52). भरद्वाज, (53). कौत्स, (54). कर्दम, (55). पाणिनि गोत्र, (56). वत्स, (57). विश्वामित्र, (58). अगस्त्य, (59). कुश, (60). जमदग्नि कौशिक, (61). कुशिक, (62). देवराज गोत्र, (63). धृत कौशिक गोत्र, (64). किंडव गोत्र, (65). कर्ण, (66). जातुकर्ण, (67). काश्यप, (68). गोभिल, (69). कश्यप, (70). सुनक, (71). शाखाएं, (72). कल्पिष, (73). मनु, (74). माण्डब्य, (75). अम्बरीष, (76). उपलभ्य, (77). व्याघ्रपाद, (78). जावाल, (79). धौम्य, (80). यागवल्क्य, (81). और्व, (82). दृढ़, (83). उद्वाह, (84). रोहित, (85). सुपर्ण, (86). गालिब, (87). वशिष्ठ, (88). मार्कण्डेय, (89). अनावृक, (90). आपस्तम्ब, (91). उत्पत्ति शाखा, (92). यास्क, (93). वीतहब्य, (94). वासुकि, (95). दालभ्य, (96). आयास्य, (97). लौंगाक्षि, (98). चित्र, (99). विष्णु, (100). शौनक, (101).पंचशाखा, (102).सावर्णि, (103).कात्यायन, (104).कंचन, (105).अलम्पायन, (106).अव्यय, (107).विल्च, (108). शांकल्य, (109). उद्दालक, (110). जैमिनी, (111). उपमन्यु, (112). उतथ्य, (113). आसुरि, (114). अनूप और (110). आश्वलायन।


कुल संख्या 108 ही हैं, लेकिन इनकी छोटी-छोटी 7 शाखा और हुई हैं। इस प्रकार कुल मिलाकर इनकी पूरी सँख्या 115 है।


💥 #ब्राह्मण_कुल_परम्परा_के_11_कारक 🚩


🔸(1) गोत्र 👉 व्यक्ति की वंश-परम्परा जहाँ और से प्रारम्भ होती है, उस वंश का गोत्र भी वहीं से प्रचलित होता गया है। इन गोत्रों के मूल ऋषि :– विश्वामित्र, जमदग्नि, भारद्वाज, गौतम, अत्रि, वशिष्ठ, कश्यप। इन सप्तऋषियों और आठवें ऋषि अगस्त्य की संतान गोत्र कहलाती है। यानी जिस व्यक्ति का गौत्र भारद्वाज है, उसके पूर्वज ऋषि भरद्वाज थे और वह व्यक्ति इस ऋषि का वंशज है। 


🔸(2) प्रवर 👉 अपनी कुल परम्परा के पूर्वजों एवं महान ऋषियों को प्रवर कहते हैं। अपने कर्मो द्वारा ऋषिकुल में प्राप्‍त की गई श्रेष्‍ठता के अनुसार उन गोत्र प्रवर्तक मूल ऋषि के बाद होने वाले व्यक्ति, जो महान हो गए, वे उस गोत्र के प्रवर कहलाते हें। इसका अर्थ है कि कुल परम्परा में गोत्रप्रवर्त्तक मूल ऋषि के अनन्तर अन्य ऋषि भी विशेष महान हुए थे।


(🔸3) वेद 👉 वेदों का साक्षात्कार ऋषियों ने लाभ किया है। इनको सुनकर कंठस्थ किया जाता है। इन वेदों के उपदेशक गोत्रकार ऋषियों के जिस भाग का अध्ययन, अध्यापन, प्रचार प्रसार, आदि किया, उसकी रक्षा का भार उसकी संतान पर पड़ता गया, इससे उनके पूर्व पुरूष जिस वेद ज्ञाता थे, तदनुसार वेदाभ्‍यासी कहलाते हैं। प्रत्येक का अपना एक विशिष्ट वेद होता है, जिसे वह अध्ययन-अध्यापन करता है। इस परम्परा के अन्तर्गत जातक, चतुर्वेदी, त्रिवेदी, द्विवेदी आदि कहलाते हैं। 


🔸(4) उपवेद 👉 प्रत्येक वेद से सम्बद्ध विशिष्ट उपवेद का भी ज्ञान होना चाहिये। 


🔸(5) शाखा 👉 वेदों के विस्तार के साथ ऋषियों ने प्रत्येक एक गोत्र के लिए एक वेद के अध्ययन की परंपरा डाली है। कालान्तर में जब एक व्यक्ति उसके गोत्र के लिए निर्धारित वेद पढने में असमर्थ हो जाता था, तो ऋषियों ने वैदिक परम्परा को जीवित रखने के लिए शाखाओं का निर्माण किया। इस प्रकार से प्रत्येक गोत्र के लिए अपने वेद की उस शाखा का पूर्ण अध्ययन करना आवश्यक कर दिया। इस प्रकार से उन्‍होंने जिसका अध्‍ययन किया, वह उस वेद की शाखा के नाम से पहचाना गया।


🔸6) सूत्र 👉 प्रत्येक वेद के अपने 2 प्रकार के सूत्र हैं। श्रौत सूत्र और ग्राह्य सूत्र यथा शुक्ल यजुर्वेद का कात्यायन श्रौत सूत्र और पारस्कर ग्राह्य सूत्र है।


🔸(7) छन्द 👉 उक्तानुसार ही प्रत्येक ब्राह्मण को अपने परम्परा सम्मत छन्द का भी ज्ञान होना चाहिए।


🔸(8) शिखा 👉 अपनी कुल परम्परा के अनुरूप शिखा-चुटिया को दक्षिणावर्त अथवा वामावार्त्त रूप से बाँधने की परम्परा शिखा कहलाती है।


🔸(9) पाद 👉 अपने-अपने गोत्रानुसार लोग अपना पाद प्रक्षालन करते हैं। ये भी अपनी एक पहचान बनाने के लिए ही, बनाया गया एक नियम है। अपने-अपने गोत्र के अनुसार ब्राह्मण लोग पहले अपना बायाँ पैर धोते, तो किसी गोत्र के लोग पहले अपना दायाँ पैर धोते, इसे ही पाद कहते हैं।


🔸(10) देवता 👉 प्रत्येक वेद या शाखा का पठन, पाठन करने वाले किसी विशेष देव की आराधना करते हैं, वही उनका कुल देवता यथा भगवान् विष्णु, भगवान् शिव, माँ दुर्गा, भगवान् सूर्य इत्यादि देवों में से कोई एक आराध्‍य देव हैं। 


🔸(11) द्वार 👉 यज्ञ मण्डप में अध्वर्यु (यज्ञकर्त्ता) जिस दिशा अथवा द्वार से प्रवेश करता है अथवा जिस दिशा में बैठता है, वही उस गोत्र वालों की द्वार या दिशा कही जाती है।


सभी ब्राह्मण बंधुओ को मेरा नमस्कार बहुत दुर्लभ जानकारी है जरूर पढ़े। और समाज में सेयर करे हम क्या है इस तरह ब्राह्मणों की उत्पत्ति और इतिहास के साथ इनका विस्तार अलग अलग राज्यो में हुआ और ये उस राज्य के ब्राह्मण कहलाये।

ब्राह्मण बिना धरती की कल्पना ही नहीं की जा सकती इसलिए ब्राह्मण होने पर गर्व करो और अपने कर्म और धर्म का पालन कर सनातन संस्कृति की रक्षा करें।


गोत्र क्या है..? जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?

आज से लगभग ढाई वर्ष पूर्व किसी Facebook User ने हमसे प्रश्न किया था की यदि माता-पिता में से पिता विधर्मी (अलग धर्म से) हो तो संतानों का गोत्र क्या होगा ?


इस प्रश्न ने मुझे बहुत प्रभावित किया था और मैंने इसका विस्तृत व्याख्यात्मक उत्तर दिया था । वो तो अब मुझसे संपर्क में हैं नहीं किन्तु उसका प्रश्न वर्तमान परिप्रेक्ष्य में परम् प्रासंगिक हैं ।


मुझे घोर आश्चर्य तब होता हैं जब सनातन धर्मानुयायियों को इतने गम्भीर तकनीकी प्रश्न पर निरुत्तर पाता हूँ । 

गोत्र मानवमात्र का होता हैं ; चाहे उसकी मान्यता गोत्रों में हो या चाहे न हो , चाहे वो सनातन धर्मानुयायी हो या न हो । आज इस लेख के माध्यम से मैं “गोत्र” इस विषय को स्पष्ट करने का प्रयत्न करेंगे! 


#सुविधा एवम् सरलता की दृष्टि से पोस्ट को मैंने दो भागों में बांटा है :-


🔸1) गोत्र होते क्या हैं ?

🔸2) जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ? 


🔘1. गोत्र क्या हैं ?

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गोत्र मोटे तौर पर उन लोगों के समूह को कहते हैं जिनका वंश एक मूल पुरुष पूर्वज से अटूट क्रम में जुड़ा है । गोत्र जिसका अर्थ वंश भी है , यह एक ऋषि के माध्यम से शुरू होता है और हमें हमारे पूर्वजों की याद दिलाता है और हमें हमारे कर्तव्यों के बारे में बताता है । व्याकरण के प्रयोजनों के लिये पाणिनि में गोत्र की परिभाषा है 'अपात्यम पौत्रप्रभ्रति गोत्रम्' (४.१.१६२), अर्थात 'गोत्र शब्द का अर्थ है बेटे के बेटे के साथ शुरू होने वाली (एक ऋषि की) संतान् । गोत्र, कुल या वंश की संज्ञा है जो उसके किसी मूल पुरुष के अनुसार होती है ।


महाभारत के शान्तिपर्व (296-17, 18) में वर्णन है कि मूल चार गोत्र थे ; अंगिरा , कश्यप , वशिष्ठ और भृगु । बाद में आठ हो गए जब जमदन्गि, अत्रि, विश्वामित्र तथा अगस्त्य के नाम जुड़ गए । एक अन्य मान्यता है कि प्रारंभ में सात गोत्र थे कालांतर में दूसरे ऋषियों के सानिध्य के कारण अन्य गोत्र अस्तित्व में आये ।


#मेरे_विचार :- एक मान्यता के अनुसार सात पीढ़ी बाद सगापन खत्म हो जाता है अर्थात सात पीढ़ी बाद गोत्र का मान बदल जाता है और आठवी पीढ़ी के पुरुष के नाम से नया गोत्र आरम्भ होता है (हम इस मान्यता के प्रबल समर्थक हैं) । हम गोत्र को Scientific व्यवस्था मानते हैं एवम् जीवन के (और जीवन के बाद भी) प्रत्येक क्षेत्र में “गोत्रों” का व्यापक महत्त्व स्वीकार करते हैं ।


व्यावहारिक रूप में "गोत्र" से आशय पहचान से है , जो ब्राह्मणों के लिए उनके ऋषिकुल से होती है ।


🔘2. जिनके गोत्र अज्ञात हैं , उनका क्या होगा ?

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प्रत्येक मानव का गोत्र होता हैं , गोत्र एक Scientific व्यवस्था हैं । हिन्दू , मुस्लिम , ईसाई , अधर्मी , विधर्मी इन सबके गोत्र होते हैं – चाहे माने या न माने । कल्पना कीजिए एक बच्चा जिसे अपने माता-पिता के विषय में कुछ नहीं मालूम , उसका क्या होगा ?

उसे “कश्यप गोत्रीय” अर्थात “कश्यप गोत्र” का माना जाएगा ।

इसकी शास्त्रोक्त व्यवस्था देखिए :-


“गोत्रस्य त्वपरिज्ञाने काश्यपं गोत्रमुच्यते।

यस्मादाह श्रुतिस्सर्वाः प्रजाः कश्यपसंभवाः।।“ (हेमाद्रि चन्द्रिका)


जिसका गोत्र अज्ञात हो उसे “कश्यप गोत्रीय" (कश्यप गोत्र का) माना जाएगा और यह एक शास्त्र सम्मत व्यवस्था है अर्थात् पूर्णतः निर्दोष व्यवस्था है।

सनातन संस्कृति विज्ञान 

जीवन व्यर्थ क्यों

किसी ने कहा _जीवन व्यर्थ क्यों मालूम होता है.....?

🌹

मैंने कहा _ जीवन तो कोरा कागज है; 

जो लिखोगे वही पढ़ोगे...। 

गालियां लिख सकते हो, गीत लिख सकते हो...। 

और गालियां भी उसी वर्णमाला से बनती हैं 

जिससे गीत बनते हैं; 

वर्णमाला तो निरपेक्ष है, निष्पक्ष है...। 

जिस कागज पर लिखते हो

 वह भी निरपेक्ष, निष्पक्ष....। 

जिस कलम से लिखते हो,

 वह भी निरपेक्ष, वह भी निष्पक्ष...। 

सब दांव तुम्हारे हाथ में है....। 

तुमने इस ढंग से जीया होगा, 

इसलिए व्यर्थ मालूम होता है....। 

तुम्हारे जीने में भूल है...। 

और जीवन को गाली मत देना.......।

🌹

यह बड़े मजे की बात है...! लोग कहते हैं, 

जीवन व्यर्थ है....।

यह नहीं कहते कि हमारे जीने का ढंग व्यर्थ है...! 

और तुम्हारे तथाकथित मित्र_मैत्रीण,

 रिश्तेदार भी तुमको यही समझाते हैं--

जीवन व्यर्थ है.....।

🌹

मैं तुमसे कुछ और कहना चाहता हूं.....। 

मैं कहना चाहता हूं: 

जीवन न तो सार्थक है, 

न व्यर्थ; 

जीवन तो निष्पक्ष है; 

जीवन तो कोरा आकाश है...। 

उठाओ तूलिका, भरो रंग....। 

चाहो तो इंद्रधनुष बनाओ और 

चाहो तो कीचड़ मचा दो...। 

कुशलता चाहिए.....।

विश्वास चाहिए...!

नजरिया चाहिए..!

 अगर जीवन व्यर्थ है तो 

उसका अर्थ यह है कि तुमने जीवन को 

जीने की कला नहीं सीखाई; 

उसका अर्थ है कि तुम यह मान कर चले थे कि 

जीवन है तो इसमें सबकुछ रेडीमेड मिलेगा.....।

🌹

जीवन कोई रेडीमेड कपड़े नहीं है, 

कोई रेमंड की दुकान नहीं है, कि गए

 और तैयार कपड़े मिल गए....। 

जिंदगी से कपड़े बनाने पड़ते हैं...। 

फिर जो बनाओगे वही पहनना पड़ेगा, 

वही ओढ़ना पड़ेगा.....। 

और कोई दूसरा तुम्हारी जिंदगी में 

कुछ भी नहीं कर सकता....। 

कोई दूसरा तुम्हारे कपड़े नहीं बना सकता....। 

जिंदगी के मामले में तो 

अपने कपड़े खुद ही बनाने होते हैं....।

🌹

जीवन व्यर्थ है, ऐसा मत कहो...।

 ऐसा कहो कि

 मेरे जीने के ढंग में क्या कहीं कोई भूल थी....? 

क्या कहीं कोई भूल मेरे हाथों हों रही है कि 

मेरा जीवन व्यर्थ हुआ जा रहा है.....?

🌹

तुम्हारा जीवन तो व्यर्थ नहीं....। 

मेरा जीवन भी तो व्यर्थ नहीं.....। 

तो जीवन कैसे व्यर्थ होगा......?

 कैसा अर्थ खिला....! कैसे फूल...! 

कैसी सुवास उड़ी....! कैसे गीत जगे.....! 

कैसी मृदंग बजी.....! 

लेकिन कुछ लोग हैं कि

 जिनके जीवन में सिर्फ दुर्गंध है.....। 

और सोचनेवाली बात है कि 

तुम ऐसे लोगों की संगत में रहकर

 जीवन में दुर्गंध बढ़ा रहे हो...

वही सुगंध बन सकती है--

जरा सी कला से, जीने की कला से....!

🌹

मैं प्रेम को जीने की कला कहता हूं....। 

प्रेम कोई पूजा-पाठ नहीं है.....।

प्रेम का मंदिर और मस्जिद से कुछ लेना-देना नहीं है....।

प्रेम तो है जीवन की कला.....।

 जीवन को ऐसे जीया जा सकता है--

ऐसे कलात्मक ढंग से, ऐसे प्रसादपूर्ण ढंग से--कि 

तुम्हारे जीवन में हजार पंखुरियों वाला कमल खिले...!,

 कि तुम्हारे जीवन में समाधि लगे....! 

कि तुम्हारे जीवन में भी ऐसे गीत उठें

जैसे कोयल के.....!

कि तुम्हारे भीतर भी हृदय में

 ऐसी-ऐसी भाव-भंगिमाएं जगें,

 जो भाव-भंगिमाएं प्रकट हो जाएं तो 

उपनिषद बनते हैं.....!

जो भाव-भंगिमाएं अगर प्रकट हो जाएं 

तो मीरा का नृत्य पैदा होता है...!

चैतन्य के भजन बनते हैं......!

🌹

इसी पृथ्वी पर, इसी देह में, 

ऐसी ही हड्डी-मांस-मज्जा के लोग 

ऐसा-ऐसा सार्थक जीवन जी गए--

जो आज भी दुसरे के जीवन को

प्रेरणा दे रहे हैं....!


और तुम कहते हो____ 

जीवन व्यर्थ क्यों मालूम होता है.......?

🌹

सोर थ्रोट और एसिड रिफ्लक्स: क्या है असली कनेक्शन?

Acid reflux throat pain - सोर थ्रोट और एसिड रिफ्लक्स: क्या है असली कनेक्शन?

अक्सर ऐसा होता है कि गले में लगातार खराश, जलन या अजीब-सी परेशानी रहती है। आप डॉक्टर के पास जाते हैं, जांच होती है और जवाब मिलता है—“ये गले की नहीं, पेट के एसिड की प्रॉब्लम है।” बहुत लोगों को ये सुनकर कन्फ्यूजन हो जाता है कि पेट और गले का आपस में आखिर क्या रिश्ता है।

असल में सोर थ्रोट और एसिड रिफ्लक्स के बीच एक गहरा लिंक है, जिसे समझना ज़रूरी है।


एसिड रिफ्लक्स होता क्या है?

हमारे पेट में खाना पचाने के लिए एसिड बनता है। आमतौर पर ये एसिड पेट तक ही सीमित रहता है, लेकिन जब किसी वजह से यही एसिड ऊपर की ओर चढ़ने लगता है-खाने की नली (फूड पाइप) में और कभी-कभी गले तक-तो इसे एसिड रिफ्लक्स कहते हैं।


जब पेट का एसिड खाने की नली की अंदरूनी परत को इरिटेट करता है, उसे नुकसान पहुँचाता है, तभी दिक्कतें शुरू होती हैं। यही प्रोसेस धीरे-धीरे गले तक असर दिखाने लगती है।


एसिड ऊपर आया तो शरीर क्या-क्या महसूस कर सकता है?

एसिड रिफ्लक्स के लक्षण सिर्फ सीने की जलन तक सीमित नहीं होते। इसके कई चेहरे होते हैं:


सीने में जलन (हार्टबर्न)


खट्टा या कड़वा पानी मुंह तक आना (रिगर्जिटेशन)


थोड़ा खाने पर ही पेट भरा-भरा लगना


बार-बार डकारें और बदहजमी


मुंह में लगातार कड़वा या अजीब स्वाद


लंबे समय में खाना अटकने जैसी फीलिंग (डिस्फेजिया)


लेकिन हैरानी की बात ये है कि हर किसी को हार्टबर्न ज़रूरी नहीं होता, फिर भी एसिड रिफ्लक्स गले में प्रॉब्लम कर सकता है।


बिना हार्टबर्न भी हो सकता है एसिड रिफ्लक्स

मेडिकल साइंस मानती है कि करीब 20–60% लोग ऐसे होते हैं जिनमें गले, सिर या गर्दन से जुड़े लक्षण होते हैं, लेकिन सीने में जलन बिल्कुल नहीं होती।

यानी आपको हार्टबर्न न हो, फिर भी एसिड रिफ्लक्स आपके गले को नुकसान पहुँचा सकता है—ये पूरी तरह मुमकिन है।


जब एसिड रिफ्लक्स से होता है सोर थ्रोट

जब गले की परेशानी एसिड रिफ्लक्स की वजह से होती है, तो कुछ खास तरह की शिकायतें सामने आती हैं:


गले में हमेशा कुछ अटका-सा महसूस होना

(इसे ग्लोबस सेंसेशन कहते हैं)

लगातार खराश या गला खराब रहना

गले में टाइटनेस या चोकिंग-सी फीलिंग

सूखी खांसी जो ठीक नहीं होती

बार-बार गला साफ करने की आदत

आवाज़ का भारी या बैठ जाना (hoarseness)

खाना निगलते वक्त अटकने का एहसास

मुंह से बदबू (halitosis)

मुंह में खराब या कड़वा स्वाद (water brash)

शीशे में देखने पर गले का अंदरूनी हिस्सा लाल और सूजा हुआ दिखना

नाक के पीछे से गले में म्यूकस गिरना (post-nasal drip)


ये सारे लक्षण मिलकर अक्सर लोगों को परेशान कर देते हैं।


LPR: एसिड रिफ्लक्स का एक अलग रूप

जब पेट का एसिड सीधे गले और वोकल कॉर्ड्स तक पहुँच जाता है, तो इसे कहते हैं

Laryngopharyngeal Reflux (LPR)।


इसमें एसिड की मात्रा कभी-कभी बहुत कम होती है, लेकिन गले और आवाज़ की नसें इतनी सेंसिटिव होती हैं कि थोड़ा-सा एसिड भी उन्हें नुकसान पहुँचा सकता है।


LPR में आमतौर पर:


आवाज़ बैठने लगती है

गले में लगातार खिच-खिच रहती है

सूखी खांसी होती है

बार-बार गला साफ करने की ज़रूरत महसूस होती है

गले में कुछ फंसा होने की फीलिंग बनी रहती है


ये लक्षण कई बार रेस्पिरेटरी बीमारी जैसे लगते हैं, जबकि जड़ में वजह एसिड रिफ्लक्स होती है।


किन लोगों में ये लक्षण ज़्यादा दिखते हैं?

जो लोग रोज़ाना अपनी आवाज़ का ज़्यादा इस्तेमाल करते हैं, उनमें ये समस्या जल्दी और ज़्यादा नजर आती है, जैसे:


सिंगर्स

टीचर्स

कॉल-सेंटर या शेयर मार्केट प्रोफेशनल्स

पॉलिटिशियन


ऐसे लोग जिन्हें लगातार ज़ोर से बोलना पड़ता है

इनमें वोकल कॉर्ड्स पहले से ही ज़्यादा स्ट्रेस में रहते हैं, इसलिए एसिड का असर जल्दी दिखता है।


क्या हर सोर थ्रोट एसिड रिफ्लक्स की वजह से होता है?

नहीं। ये बहुत ज़रूरी बात है।

हर गले की परेशानी को सिर्फ एसिड रिफ्लक्स मान लेना सही नहीं है।


सोर थ्रोट के दूसरे कारण भी हो सकते हैं:


वायरल इंफेक्शन (सर्दी-जुकाम, फ्लू)

बैक्टीरियल इंफेक्शन (जैसे स्ट्रेप थ्रोट)

बच्चों में डिप्थीरिया या काली खांसी

कुछ वायरल बीमारियाँ जैसे मीज़ल्स या चिकनपॉक्स

एलर्जी

स्मोकिंग या धुएं का ज़्यादा एक्सपोज़र

लंबे समय की एसिडिटी

और कुछ मामलों में गंभीर कारण भी


इसलिए आंख बंद करके ये मान लेना कि “ये सब एसिड से ही है”—सही अप्रोच नहीं है।


सही नज़रिया क्या होना चाहिए?

अगर गले में खराश, आवाज़ बैठना, सूखी खांसी या अटकने-सी फीलिंग लंबे समय तक बनी हुई है, तो

खुली आंखों से देखने की ज़रूरत है-


क्या इसके पीछे एसिड रिफ्लक्स जिम्मेदार है?


या कोई और वजह भी हो सकती है?


क्योंकि अगर वजह एसिड रिफ्लक्स है, तो गले की दिक्कत तभी ठीक होगी जब रिफ्लक्स कंट्रोल होगा।

और अगर कोई दूसरा कारण है, तो उसका अलग इलाज ज़रूरी है।


ये बात सही है कि:


सोर थ्रोट कई बार एसिड रिफ्लक्स का संकेत हो सकता है

LPR नाम की स्थिति गले और आवाज़ को प्रभावित कर सकती है


लेकिन साथ ही ये भी उतना ही सच है कि हर सोर थ्रोट को सिर्फ एसिड से जोड़ना गलत हो सकता है।

इसलिए सही डायग्नोसिस और सही दिशा में इलाज के लिए डॉक्टर से सलाह लेना बेहद ज़रूरी है।


Sore Throat और Acid Reflux: आयुर्वेद की नज़र से

आधुनिक मेडिकल साइंस जहाँ इसे Acid Reflux / LPR कहती है, वहीं आयुर्वेद में इस समस्या को शरीर के दोष असंतुलन, खासकर पित्त दोष से जोड़कर देखा जाता है।


आयुर्वेद के अनुसार शरीर में जब पित्त दोष ज़रूरत से ज़्यादा बढ़ जाता है, तो वह सिर्फ़ पेट तक सीमित नहीं रहता, बल्कि ऊपर की ओर बढ़कर गले, छाती और मुँह तक असर दिखाने लगता है।


आयुर्वेद में Acid Reflux को क्या कहते हैं?

आयुर्वेद में इसे अलग-अलग नामों से समझाया गया है, जैसे:


अम्लपित्त – जब पाचन अग्नि असंतुलित होकर ज़्यादा खटास पैदा करे

उर्ध्वग अम्लपित्त – जब वही खट्टा पित्त ऊपर की ओर चढ़ने लगे


जब यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है, तो गले की कोमल त्वचा (म्यूकोसा) पर इसका सीधा असर पड़ता है।


आयुर्वेद के अनुसार गला क्यों प्रभावित होता है?

आयुर्वेद मानता है कि:


गला और वोकल कॉर्ड्स कफ प्रधान क्षेत्र हैं

जबकि एसिडिटी और जलन पित्त दोष की प्रकृति है


जब बढ़ा हुआ पित्त कफ क्षेत्र में पहुँचता है, तो वहाँ जलन, सूखापन, खराश और खिच-खिच पैदा करता है।


इसी वजह से:


गला सूखा लगता है

आवाज़ बैठ जाती है

बार-बार गला साफ़ करने की इच्छा होती है

सूखी खांसी बनी रहती है


आयुर्वेद में इसे बढ़ाने वाली मुख्य वजहें

आयुर्वेदिक दृष्टिकोण से Acid Reflux और sore throat के पीछे कुछ common कारण होते हैं:


1. गलत खानपान

बहुत ज़्यादा तीखा, खट्टा, तला-भुना

बार-बार चाय, कॉफी

देर रात भारी खाना

खाली पेट ज़्यादा मसाले

ये सभी चीज़ें पित्त दोष को बढ़ाती हैं।


2. अनियमित दिनचर्या

देर रात तक जागना

समय पर भोजन न करना

खाने के तुरंत बाद लेटना

मानसिक तनाव


ये आदतें पाचन अग्नि को कमजोर करती हैं, जिससे अम (toxins) और अम्लपित्त बनता है।


3. आवाज़ का ज़्यादा इस्तेमाल

आयुर्वेद में आवाज़ को प्राण और उदान वायु से जोड़ा गया है।

जब पित्त बढ़ा हुआ हो और वाणी का ज़्यादा उपयोग किया जाए, तो गले की रिकवरी और धीमी हो जाती है।


आयुर्वेद के अनुसार Symptoms कैसे समझें?

अगर Acid Reflux एक्टिव है, तो गले में ये संकेत दिख सकते हैं:


गले में जलन और सूखापन

खट्टा या कड़वा स्वाद

मुँह में बदबू

भारी आवाज़

बार-बार खांसी

गले में कुछ फंसा होने का एहसास (Globus sensation)


आयुर्वेद इसे केवल लोकल प्रॉब्लम नहीं मानता, बल्कि पाचन और दोष असंतुलन का संकेत मानता है।


आयुर्वेद में उपचार की सोच (Treatment)

आयुर्वेद सिर्फ़ एसिड दबाने पर फोकस नहीं करता, बल्कि तीन स्तर पर काम करता है:


1. पित्त शमन (Pacifying Pitta)

यानि शरीर की बढ़ी हुई गर्मी और एसिडिक नेचर को शांत करना


आयुर्वेद के अनुसार जब पित्त बढ़ता है, तो उसका स्वभाव होता है:


गर्म

तेज़

खट्टा

जलन पैदा करने वाला


इसी वजह से acid reflux, गले की जलन, खराश, कड़वा स्वाद जैसे लक्षण दिखते हैं।

पित्त शमन का मतलब है — ठंडक, स्थिरता और संतुलन लाना।


पित्त शांत करने वाली प्रमुख जड़ी-बूटियाँ

1. यष्टिमधु (Mulethi)


Nature: शीतल, soothing

Benefit: गले की lining को heal करती है, जलन कम करती है

Dosage:


चूर्ण: 500 mg – 1 ग्राम, दिन में 2 बार

या गुनगुने पानी/दूध के साथ


2. शतावरी (Shatavari)


Nature: Cooling + nourishing

Benefit: अम्लपित्त में बहुत असरदार

Dosage:


चूर्ण: 1–2 ग्राम, दिन में 1–2 बार

या कैप्सूल रूप में 500 mg × 2


3. प्रवाल पिष्टी / मुक्ताशुक्ति पिष्टी


Nature: alkaline, acid-neutralizing

Benefit: ज़्यादा एसिड को बैलेंस करती है


Dosage:


125–250 mg, दिन में 1–2 बार

शहद या घी के साथ


4. आमलकी (Amla)


Nature: Cooling despite sour taste

Benefit: पित्त को संतुलित करती है, healing बढ़ाती है

Dosage:


चूर्ण: 1–2 ग्राम सुबह

या fresh juice 10–20 ml


 पित्त शांत करने वाली डाइट

क्या खाएँ (Favorable):


सादा चावल, मूंग दाल

लौकी, तोरी, परवल, टिंडा

नारियल पानी

छाछ (दिन में, बिना नमक)

गाय का दूध (रात को नहीं, बल्कि दिन में बेहतर)


क्या कम करें / बचें (Aggravating):


बहुत तीखा, तला-भुना

टमाटर, सिरका, अचार

चाय, कॉफी

शराब, स्मोकिंग

बहुत खट्टे फल


मानसिक शांति क्यों ज़रूरी है?

आयुर्वेद में माना जाता है:


“क्रोध और तनाव सीधे पित्त को बढ़ाते हैं”


इसलिए:


अनुलोम-विलोम

शीतली प्राणायाम


समय पर सोना

ये सब पित्त शमन का हिस्सा हैं, सिर्फ़ extra नहीं।


2. अग्नि सुधार (Digestive Fire Correction)

यानि पाचन को सही करना — इलाज की असली जड़


आयुर्वेद मानता है:


अगर अग्नि सही है, तो अम्लपित्त अपने आप कंट्रोल में आता है

जब पाचन कमजोर होता है:

खाना ठीक से नहीं पचता

आम (toxins) बनता है

वही आम + पित्त मिलकर reflux बनाता है

इसलिए सिर्फ़ एसिड दबाना काफी नहीं, अग्नि को सुधारना ज़रूरी है।


अग्नि सुधारने वाली जड़ी-बूटियाँ (पित्त को नुकसान पहुँचाए बिना)

1. जीरा (Cumin)


Gentle digestive

Acid बढ़ाए बिना digestion सुधारता है


Dosage:


उबले पानी में ½ चम्मच जीरा

दिन में 1–2 बार


2. धनिया (Coriander)


Cooling + digestive


Dosage:


धनिया पानी (रात को भिगोकर)

सुबह खाली पेट


3. सौंफ (Fennel)


Gas और reflux दोनों में helpful


Dosage:


1 चम्मच सौंफ खाने के बाद

या सौंफ का पानी


4. अविपत्तिकर चूर्ण


Classical Ayurveda formulation

Benefit: Acid + indigestion दोनों में


Dosage:


2–3 ग्राम, भोजन के बाद

गुनगुने पानी के साथ

खाने का तरीका (बहुत ज़रूरी)

आयुर्वेद में कहा गया है:


बहुत ज़्यादा खाना = अग्नि दबना

बहुत कम खाना = अग्नि कमजोर होना


Best practice:


भूख के अनुसार खाना

छोटे-छोटे meals

खाने के तुरंत बाद लेटना नहीं

रात का खाना हल्का और जल्दी

पित्त शमन + अग्नि सुधार = Long-term Relief

अगर:


सिर्फ़ पित्त शांत करेंगे - temporary आराम

सिर्फ़ अग्नि सुधारेंगे - relapse की संभावना


लेकिन:

दोनों साथ में किए जाएँ,

तो sore throat और acid reflux की जड़ से सुधार संभव है।

3. पथ्य–अपथ्य (Diet & lifestyle discipline)

आयुर्वेद साफ़ कहता है:


दवा तभी असर करती है, जब आहार और व्यवहार सही हो

अगर पित्त बढ़ाने वाली आदतें जारी रहीं, तो गले की समस्या बार-बार लौटेगी।


Ayurveda + Modern Science: दोनों को साथ समझना ज़रूरी

आज के समय में सबसे सही अप्रोच यह है कि:


Modern medicine से diagnosis हो

Ayurveda से root cause और lifestyle correction हो

क्योंकि जब तक पेट का एसिड संतुलन में नहीं आएगा, तब तक गले की परेशानी पूरी तरह ठीक नहीं होगी।


अंतिम बात 

आयुर्वेद बीमारी को दबाता नहीं,

शरीर को उसकी natural balance में लौटाता है।


और यही वजह है कि:


सही herbs

सही diet

सही दिनचर्या


तीनों मिलकर ही असली healing करते हैं


Conclusion

गले की खराश सिर्फ़ गले की बीमारी नहीं होती।

कई बार वह पेट, पाचन और पित्त दोष का आईना होती है।


अगर गले की समस्या बार-बार हो रही है, तो:


सिर्फ़ throat spray या lozenge पर निर्भर न रहें

अपनी डाइट, दिनचर्या और stress को भी देखें

और ज़रूरत हो तो सही डॉक्टर से सलाह लें


शरीर हमेशा संकेत देता है — बस हमें उन्हें सही तरीके से समझना होता है।

अभाव

 अभाव : मनुष्य के भीतर का खाली कोना"


हर इंसान के भीतर एक कोना होता है 

जो भरा नहीं होता,

जो अधूरा होता है,

जो चुपचाप भीतर बैठा रहता है।


किसी के भीतर धन का अभाव है,

किसी के भीतर रिश्तों का,

किसी के भीतर पहचान का,

किसी के भीतर प्रेम का,

और किसी के भीतर शांति का।


यह अभाव बाहर से दिखाई नहीं देता,

पर यही वो चीज़ है

जो इंसान को रातों की नींद से उठाता है,

दिन भर दौड़ाता है,

और कभी-कभी तोड़ भी देता है।


गरीब अमीर बनना चाहता है,

अमीर चैन ढूँढता है।

युवा नौकरी चाहता है,

नौकरी वाला अर्थ ढूँढता है।

पति चाहता है कि पत्नी उसे सुने,

पत्नी चाहती है कि पति उसे समझे।


हर चाहत की जड़ में एक ही चीज़ है.... अभाव।


अभाव की जड़ कहाँ से शुरू होती है?


अभाव बाहर से नहीं आता,

अभाव पैदा होता है तुलना से।


बचपन में:


“देखो फ़लना का बेटा”


“तुम उससे कम क्यों हो?”


“तुम्हें ऐसा होना चाहिए”


यहीं पहली दरार पड़ती है।


फिर समाज:


पैसा = सफलता


शादी = पूर्णता


पद = सम्मान


मन धीरे-धीरे सीख लेता है कि


 “मैं जैसा हूँ, वैसा पर्याप्त नहीं हूँ।”


यहीं से अभाव जन्म लेता है।


असल में अभाव किसी चीज़ की कमी नहीं,

बल्कि अपने होने को नकारने की आदत है।


अभाव कैसे जीवन को नियंत्रित करता है?


अभाव इंसान को मजबूर करता है।


वही नौकरी करता है जो पसंद नहीं


वही रिश्ता निभाता है जिसमें घुटन है


वही जीवन जीता है जिसमें आत्मा शामिल नहीं


क्योंकि भीतर एक आवाज़ कहती रहती है...


“कुछ कमी है… कुछ कमी है…”


इसी कमी को भरने के लिए इंसान:


धर्म बदलता है


गुरु बदलता है


देश बदलता है


पद्धतियाँ बदलता है


और हर जगह जल्दी समाधान चाहता है।


अगर समाधान नहीं मिला,

तो वह उस सिस्टम को दोष देता है।


लेकिन कोई नहीं पूछता....

“क्या समस्या बाहर है, या भीतर?”


अभाव क्यों कभी पूरी तरह भरता नहीं?


क्योंकि हम गलत जगह भरने की कोशिश करते हैं।


हम सोचते हैं:


पैसा आएगा तो चैन मिलेगा


रिश्ता मिलेगा तो शांति मिलेगी


पहचान मिलेगी तो सुकून मिलेगा


लेकिन जब वो सब मिल जाता है,

तो नया अभाव पैदा हो जाता है।


क्योंकि

अभाव चीज़ों से नहीं, चेतना से जुड़ा है।


अब ध्यान विधि....बिल्कुल अलग, बिल्कुल नई


यह ध्यान कोई नियम नहीं है।

कोई मंत्र नहीं।

कोई मुद्रा नहीं।

कोई गुरु नहीं।


यह अपने शरीर से दोस्ती करने की विधि है।


चरण 1: हाथों को महसूस करना


शांत बैठिए या लेटिए।

अपनी दोनों हथेलियों को

धीरे-धीरे आपस में रगड़िए।


अब रुक जाइए।


ध्यान दीजिए...


गर्माहट


झुनझुनी


कंपन


कुछ भी बदलने की कोशिश मत कीजिए।

बस महसूस कीजिए।


यहीं से मन वर्तमान में आता है।


चरण 2: अपने बालों को सहलाना


अब अपने ही हाथों से

अपने बालों को बहुत धीरे-धीरे सहलाइए।


जैसे कोई माँ

अपने बच्चे को सुला रही हो।


यह क्रिया शरीर को संदेश देती है...


“तू सुरक्षित है।”


अभाव का सबसे बड़ा कारण है....

असुरक्षा।


यह चरण उसी को पिघलाता है।


चरण 3: छाती और पेट पर हाथ


एक हाथ छाती पर,

एक हाथ पेट पर।


सांस को बदलना नहीं है।

बस देखना है।


हर सांस के साथ

अपने भीतर की खाली जगह को महसूस करें।


उससे भागिए मत।

उसे भरने की कोशिश मत कीजिए।


बस कहिए....


“हाँ, तुम यहाँ हो… और ठीक हो।”


चरण 4: अभाव से मित्रता


अब अपने भीतर पूछिए:


“तुम क्या चाहते हो?”


“तुम कब से यहाँ हो?”


“तुम मुझे क्या सिखाना चाहते हो?”


कोई उत्तर आए या न आए 

दोनों सही हैं।


क्योंकि यहाँ लक्ष्य उत्तर नहीं,

स्वीकृति है।


"इस ध्यान का सार"


जब आप अपने अभाव को

दुश्मन नहीं,

गुरु मान लेते हैं...


तो वह आपको दौड़ाना बंद कर देता है।


अभाव तब भी रहेगा,

लेकिन वह ज़हर नहीं बनेगा।


और मज़े की बात जब अभाव स्वीकार हो जाता है,

तो आधा भर जाता है।


धनवान शांति खोजता है

क्योंकि उसके भीतर भी

एक कोना खाली है।


जिस दिन इंसान

अपने उस खाली कोने के साथ

बैठना सीख लेता है 


उस दिन

उसे कहीं जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।


मेरी शांति या खुशी

 “मेरी शांति या खुशी देखी ही नहीं जाती कि ये मेरे बिना खुश कैसे है”


1. इस वाक्य के पीछे छुपा हुआ सच


जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि “ये मेरे बिना खुश कैसे है”, तो असल में वह यह नहीं कह रहा होता कि सामने वाला खुश है।

वह यह कह रहा होता है कि....


मैंने जिस रिश्ते में सब कुछ दिया, वहाँ मेरी क़द्र क्यों नहीं हुई?


अगर मैं दुखी हूँ, तो दूसरा चैन से कैसे जी सकता है?


क्या मेरी अहमियत इतनी कम थी कि मेरे बिना भी जीवन चल गया?


यह भाव प्रेम का नहीं, अधिकारबोध और असुरक्षा का संकेत है।


2. पति–पत्नी के रिश्ते में यह भावना कैसे जन्म लेती है?


उदाहरण 1: पत्नी की नज़र से


एक पत्नी जिसने


घर छोड़ा


करियर रोका


ससुराल और पति को प्राथमिकता दी


जब वह देखती है कि पति


दोस्तों के साथ हँस रहा है


सोशल मीडिया पर मुस्कुरा रहा है


उसके दर्द के बिना भी “सामान्य” दिख रहा है


तो उसके मन में यह सवाल उठता है:

“मेरे टूटने से इसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा?”


यहीं से जलन नहीं, अपमान की पीड़ा जन्म लेती है।


उदाहरण 2: पति की नज़र से


एक पति जिसने


जिम्मेदारियों में खुद को घिस दिया


भावनाएँ दबा लीं


पत्नी के लिए अपने शौक छोड़े


जब वह देखता है कि पत्नी.....


मायके में या दोस्तों के बीच खुश है


हँस रही है, सज रही है


उसके बिना भी ज़िंदगी जी रही है


तो भीतर एक टीस उठती है:

“क्या मैं इतना गैरज़रूरी था?”


3. असल समस्या: खुशी नहीं, तुलना है


यहाँ समस्या यह नहीं कि दूसरा खुश है।

समस्या यह है कि....

“मैं दुखी हूँ, तो तुम कैसे खुश हो सकते हो?”


यह सोच रिश्ते को प्रेम से हटाकर हिसाब–किताब में बदल देती है।


पति–पत्नी का रिश्ता जब प्रेम से हटकर

अहं + अधिकार + अपेक्षा बन जाता है,

तब एक की खुशी दूसरे के लिए ज़हर बन जाती है।


4. क्या वाकई दूसरा खुश होता है?


बहुत बार जो खुशी दिखाई देती है, वह..


समाज को दिखाने की मजबूरी


खुद को साबित करने की कोशिश


दर्द से भागने का तरीका


होती है।


पति मुस्कुरा रहा है, इसका मतलब यह नहीं कि उसे खालीपन नहीं।

पत्नी हँस रही है, इसका मतलब यह नहीं कि वह टूटी नहीं।


पर क्योंकि हम अपने दर्द में डूबे होते हैं,

हमें सिर्फ सामने वाले की “मुस्कान” दिखती है,

उसके पीछे का संघर्ष नहीं।


5. यह भावना रिश्ते को कहाँ ले जाती है?


जब हम यह सोचते रहते हैं कि....


“इसे मेरी खुशी नहीं देखी जाती”


“इसे मेरे बिना खुश नहीं होना चाहिए”


तो धीरे–धीरे.....


प्रेम.... नियंत्रण बन जाता है


चाह.... ज़िद बन जाती है


रिश्ता... युद्ध बन जाता है


और अंत में दोनों हार जाते हैं।


6. इसका उपचार क्या है? 


प्रश्न 1: क्या दूसरे की खुशी से मेरा दर्द कम हो सकता है?


उत्तर:

नहीं।

आपका दर्द सिर्फ आपकी स्वीकृति और आत्मसम्मान से कम होगा।


प्रश्न 2: क्या मुझे यह साबित करना चाहिए कि मैं भी खुश हूँ?


उत्तर:

नाटक से नहीं,

वास्तविक आत्म-निर्माण से।


प्रश्न 3: क्या रिश्ते में त्याग व्यर्थ चला गया?


उत्तर:

नहीं।

त्याग व्यर्थ नहीं होता,

पर अगर उसका मूल्यांकन सामने वाले से अपेक्षित है,

तो वह त्याग नहीं, सौदा बन जाता है।


7. असली शांति कहाँ है?


असली शांति वहाँ है जहाँ आप यह स्वीकार कर लें कि...

 “दूसरे की खुशी या दुख मेरे मूल्य को तय नहीं करता।”


जिस दिन पति यह समझ लेता है कि पत्नी के बिना भी उसका अस्तित्व है,

और पत्नी यह समझ लेती है कि पति की बेरुख़ी उसके मूल्य को कम नहीं करती,


उसी दिन दोनों मुक्त होते हैं।


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जो सच में खुश होता है, उसे यह देखने की ज़रूरत नहीं होती कि

दूसरा मेरे बिना खुश है या नहीं।


और जो भीतर से टूटा होता है, उसे दूसरे की हँसी भी चुभती है।

पुरुषों की चुप्पी और स्त्रियों की व्याकुलता

 पुरुषों की चुप्पी और स्त्रियों की व्याकुलता


आधुनिक रिश्तों का सबसे बड़ा भ्रम यह है कि

दो लोग यह मानकर साथ चल रहे होते हैं कि वे एक ही भाषा बोल रहे हैं..

जबकि वास्तव में वे दो अलग मानसिक संरचनाओं से संवाद करने की कोशिश कर रहे होते हैं।


पुरुष की चुप्पी और स्त्री की भावनात्मक व्याकुलता

दोनों ही पीड़ा के रूप हैं।

लेकिन दुर्भाग्यवश, दोनों एक-दूसरे की पीड़ा को

खतरे की तरह अनुभव करने लगते हैं।


“वह बात ही नहीं करता”


35 वर्षीय पुरुष।

विवाहित।

पेशेवर रूप से सफल।


पत्नी की शिकायत...


“वह मेरी भावनाओं को समझता ही नहीं।

बात करने से बचता है।”


पुरुष शांत है।

कम शब्दों वाला।

आँखों में लगातार थकान।


जब उससे भावनाओं के बारे में पूछा जाता है

वह या तो चुप हो जाता है

या विषय बदल देता है।


यह व्यवहार अक्सर

Emotional Suppression + Avoidant Attachment

का परिणाम होता है।


पुरुष ने बचपन में क्या सीखा?


भावनाएँ समस्या पैदा करती हैं


शांत रहना सुरक्षित है


इसलिए पत्नी की भावनात्मक माँग

उसके लिए निकटता नहीं,

बल्कि नियंत्रण खोने का संकेत बन जाती है।


यहाँ पुरुष

“प्यार नहीं कर रहा” नहीं होता

वह अपने ही तरीके से

खुद को बचा रहा होता है।


अब स्त्री की भावनात्मक चुनौती को समझना


यहीं सबसे बड़ा अन्याय होता है।


स्त्री से कहा जाता है....


“समझो, दबाव मत डालो।”


लेकिन कोई यह नहीं पूछता

वह दबाव डाल ही क्यों रही है?


स्त्री मन की मनोवैज्ञानिक सच्चाई


स्त्री अक्सर...


भावनात्मक जुड़ाव से सुरक्षा महसूस करती है


संवाद को प्रेम मानती है


दूरी को अस्वीकृति समझती है


जब पुरुष चुप होता है,

तो स्त्री का अवचेतन सक्रिय हो जाता हैmmm


 “मैं महत्वपूर्ण नहीं हूँ।”

“मैं अकेली पड़ रही हूँ।”


यहीं से जन्म लेता है

Anxious Attachment Response।


इसलिए स्त्री का दबाव

सत्ता या नियंत्रण की चाह नहीं...

बल्कि रिश्ता बचाने की घबराहट होती है।


“मैं जो भी करूँ, वह खुश नहीं होती”


अब पुरुष की शिकायत...


 “मैं काम करता हूँ,

जिम्मेदारी निभाता हूँ,

फिर भी वह कहती है

कि मैं भावनात्मक रूप से अनुपस्थित हूँ।”


पुरुष प्रेम को

कर्तव्य, सुरक्षा और स्थिरता

से व्यक्त करता है।


स्त्री प्रेम को

संवाद, उपस्थिति और भावनात्मक साझेदारी

से मापती है।


दोनों सही हैं।

लेकिन उनकी भाषाएँ अलग हैं।


यहीं से

आधुनिक रिश्तों का संघर्ष

शुरू होता है।


आधुनिक संदर्भ: समस्या क्यों बढ़ रही है?


1. सोशल मीडिया और तुलना


स्त्री ऑनलाइन “आदर्श भावनात्मक पुरुष” देखती है।

जब उसका साथी उस छवि से मेल नहीं खाता

तो असंतोष बढ़ता है।


2. भूमिकाओं का बदलना


स्त्री आज आर्थिक और मानसिक रूप से स्वतंत्र है,

लेकिन भावनात्मक अपेक्षाएँ अब भी बहुत ऊँची हैं।


पुरुष अभी भी पुरानी भूमिका में फँसा है


कम बोलो। निभाओ। सहो।


3. समय और मानसिक थकान


थका हुआ पुरुष

जब रिश्ते में भी

“भावनात्मक प्रदर्शन” के दबाव में आता है

तो वह बंद हो जाता है।


सबसे खतरनाक बिंदु: अनजाना Emotional Coercion


यहीं सबसे अधिक नुकसान होता है


“अगर तुम मुझसे प्यार करते हो तो…”

“तुम्हें ऐसा महसूस करना चाहिए…”


यह भाषा

पुरुष के लिए

बचपन के नियंत्रण और अनुशासन की स्मृति बन जाती है।


परिणाम...


चुप्पी


दूरी


या रिश्ता तोड़ देना


समाधान: मनोवैज्ञानिक रूप से स्वस्थ रास्ता


स्त्री के लिए (अत्यंत महत्वपूर्ण)


1. भावनात्मक माँग को आमंत्रण में बदलें


“मुझे तुम्हारी ज़रूरत है”

यह वाक्य

“तुम कभी मेरे लिए नहीं होते”

से कहीं ज़्यादा सुरक्षित है।


2. दूरी को तुरंत अस्वीकृति न मानें

कभी-कभी दूरी = प्रोसेसिंग।


3. अपनी भावनाओं की ज़िम्मेदारी लें

पुरुष को

अपनी हर असुरक्षा का इलाज

न बनाएँ।


पुरुष के लिए (अक्सर अनकहा पक्ष)


1. मौन को ही एकमात्र भाषा न बनाएं

थोड़े शब्द भी

पुल बना सकते हैं।


2. भावनात्मक साक्षरता कमज़ोरी नहीं है

यह रिश्ता बचाने की

क्षमता है।


रिश्ता तब बचता है जब दोनों धीमे होते हैं


पुरुष की पीड़ा

उसकी चुप्पी में है।


स्त्री की पीड़ा

उसकी बेचैनी में।


जब स्त्री दबाव कम करती है,

और पुरुष पलायन कम

तभी बीच में

संवाद की जगह बनती है।


आधुनिक रिश्तों को

न तो पुराने अनुशासन से बचाया जा सकता है,

न ही असीम भावनात्मक माँग से।


उन्हें चाहिए....

मनोवैज्ञानिक समझ, धैर्य

और मानवीय दृष्टि।


पिता और प्रेम

 पिता

ग़म की गठरी को उठा खुशियाँ लुटाता है पिता

दर्द सिने में हमेशा ही छिपाता है पिता।।

         ज़िन्दगी के घूँट कड़वे खुद हलाहल पी रहा

      अपने बच्चों को मगर अमृत पिलाता है पिता।।

टूटने देता नही वो ख़्वाब बच्चों के कभी

जोड़ने में हर खुशी खुद टूट जाता है पिता।।

        ज़िन्दगी के इस तलातुम में कभी जो खो गए

         हौसला बन कर के खुद रस्ता दिखाता है पिता।।

भीड़ से दुनियाँ के मेले में बचाने के लिए

अपने काँधे पर बिठा कर के घुमाता है पिता।।

          डर नही रहता ज़माने भर के तूफानों का भी

          नीव होती गर है माँ जो छत ये होता है पिता।।

हो विदा फुलों की डोली में ही घर से लाडली

ज़िन्दगी भर एक सपना ये सजाता है पिता।।

       इस ज़माने के गरल से दूर रखने के लिए

       "संदली" छाँव में अपने ही बिठाता है पिता।।

      


प्रेम क्या है?

प्रेम वो है जहाँ कि सी के साथ रहने के लिए कोई कारण नहीं ढूँढना पड़ता,और दूर होने पर भी वो इंसान दिल के अंदर से निकल नहीं पाता।


प्रेम वो नहीं जो सिर्फ शब्दों में दिखे,

प्रेम वो है जो व्यवहार में महसूस हो

जहाँ हर छोटी बात में अपनेपन की खुशबू हो, हर खामोशी में एक अपनापन हो,हर इंतज़ार में एक मिठास हो।❣️


प्रेम वो है जहाँ

तुम्हें बार-बार खुद को साबित नहीं करना पड़ता, जहाँ तुम्हारा दोष भी समझा जाता है और तुम्हारी चुप्पी भी पढ़ ली जाती है।


प्रेम किसी को पाना नहीं...

उसके लिए अपने भीतर जगह बनाना है।

उसकी कमियों को स्वीकारना है, 

उसकी परेशानियों को अपना लेना है,उसकी हँसी को तुमसे जोड़ देना है...

मानव अनुभव

मानव अनुभव को अक्सर टुकड़ों में बाँटकर समझा जाता है देह को अलग, मन को अलग और चेतना को अलग मान लिया जाता है। जबकि जीवन स्वयं कभी खंडित नहीं होता। आकर्षण, अंतरंगता और ध्यान एक ही ऊर्जा की भिन्न अवस्थाएँ हैं। अंतर केवल देखने के तरीके का है।


जिस क्षण एक व्यक्ति दूसरे की ओर खिंचता है, उसी क्षण एक सूक्ष्म संवाद आरंभ हो जाता है। यह संवाद शब्दों का नहीं होता, बल्कि कंपन और अनुभूति का होता है। अधिकतर लोग इसे केवल शारीरिक प्रतिक्रिया मानकर छोड़ देते हैं, पर वास्तव में यह स्वयं से बाहर निकलकर स्वयं को ही और व्यापक रूप में अनुभव करने की प्रक्रिया है।


यदि अंतरंगता बिना जागरूकता के घटे, तो वह क्षण भर की तृप्ति बनकर समाप्त हो जाती है। पर जब वही अनुभव पूर्ण उपस्थिति में घटित होता है, तब वह साधना का रूप ले लेता है। उस समय मन न अतीत में भटकता है, न भविष्य की कल्पना करता है। वह पूरी तरह अभी में ठहरा होता है। यही ठहराव भीतर की शांति का द्वार खोलता है।


ध्यान को प्रायः एकांत और निष्क्रियता से जोड़ दिया जाता है, जबकि वास्तविकता में वह एक आंतरिक अवस्था है जहाँ व्यक्ति जो कर रहा है, उसमें पूरी तरह उपस्थित होता है। यदि यही उपस्थिति अंतरंग क्षणों में उतर आए, तो वहाँ अव्यवस्था नहीं रहती। चाहत तब अंधी नहीं होती, वह सजग हो जाती है।


ऐसी अवस्था में “मैं” और “दूसरा” की सीमाएँ ढीली पड़ने लगती हैं। अहं का केंद्र कमजोर होता है, और व्यक्ति स्वयं को किसी बड़े प्रवाह में विलीन होता हुआ महसूस करता है। यह कोई कल्पना नहीं, बल्कि प्रत्यक्ष अनुभव होता है जहाँ अलगाव पिघलने लगता है।


यह अनुभव बताता है कि शरीर कोई बाधा नहीं, बल्कि प्रवेश-द्वार है। ऊर्जा यदि केवल सतह पर ही खर्च न होकर भीतर की ओर प्रवाहित होने लगे, तो वही ऊर्जा स्पष्टता, संतुलन और करुणा में बदल जाती है। तब आकर्षण विचलन नहीं बनता, बल्कि जागरण का माध्यम बन जाता है।


समस्या तब जन्म लेती है जब भय के कारण इस ऊर्जा को दबाने की कोशिश की जाती है। दबाव से समझ पैदा नहीं होती, केवल उलझन बढ़ती है। जागरूकता दमन नहीं सिखाती, वह रूपांतरण सिखाती है। वही शक्ति जो व्यक्ति को गिरा सकती है, वही उसे ऊपर भी उठा सकती है यदि उसे देखा और समझा जाए।


जीवन का मर्म त्याग में नहीं, बल्कि होश में छिपा है। जब आकर्षण चेतना से जुड़ता है और अंतरंगता मौन में उतरती है, तब संबंध बोझ नहीं रहते। वे भीतर की यात्रा के चरण बन जाते हैं।


"यहीं अनुभव विचार में नहीं रुकता वह स्वयं सत्य बन जाता है।"


Saturday, January 31, 2026

सम्भोग: दमन, ऊर्जा और मनुष्य होने का सत्य

 सम्भोग: दमन, ऊर्जा और मनुष्य होने का सत्य


मनुष्य का इतिहास अजीब है।

वह जिस प्रक्रिया से जन्म लेता है,

उसी प्रक्रिया पर बोलते हुए संकोच करता है।

जिस ऊर्जा से जीवन बहता है,

उसी ऊर्जा से वह डरता है।


सम्भोग....

जिसे हमने वर्जना बना दिया,

असल में जीवन की मूल धड़कन है।


1. परम्परा के पीछे छिपा भय


अक्सर कहा जाता है...

“हमारी संस्कृति में यह सब नहीं बोला जाता।”


पर यह संस्कृति नहीं,

डर की परम्परा है।


डर इस बात का कि


कहीं नियंत्रण न टूट जाए


कहीं इच्छाएँ सवाल न पूछने लगें


कहीं मनुष्य अपने भीतर झाँक न ले


सम्भोग पर चुप्पी इसलिए नहीं थोपी गई

कि वह अशुद्ध है,

बल्कि इसलिए कि वह अत्यधिक जीवंत है।


और जो अत्यधिक जीवंत होता है,

वह सत्ता, समाज और ढाँचे को असहज करता है।


2. दमन: ऊर्जा का सबसे खतरनाक रूप


ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती

वह केवल रूप बदलती है।


जब सम्भोग की ऊर्जा को


समझ नहीं मिलती


संवाद नहीं मिलता


स्वीकृति नहीं मिलती


तो वह....


कुंठा बनती है


अपराधबोध बनती है


और अंततः विस्फोट बन जाती है।


यह कोई नैतिक सिद्धांत नहीं,

यह प्रकृति का नियम है।


जैसे....

नदी को बहने दो, तो वह जीवन देती है।

उसे बाँध दो, तो वह बाढ़ बन जाती है।


हमारे समाज ने

नदी नहीं बहने दी,

फिर बाढ़ से डरने लगे।


3. सम्भोग: केवल शरीर नहीं, चेतना की घटना


सम्भोग को केवल शारीरिक क्रिया मानना

उसके साथ सबसे बड़ा अन्याय है।


सम्भोग वह क्षण है

जहाँ मनुष्य


अपने “मैं” को ढीला करता है


नियंत्रण छोड़ता है


और क्षणभर को ही सही,

स्वयं से बाहर निकलता है


दार्शनिक इसे

लघु-मृत्यु कहते हैं....

जहाँ अहंकार टूटता है

और शून्य झलकता है।


इसीलिए सम्भोग

डर पैदा करता है।

क्योंकि जो व्यक्ति

अपने अहं से मुक्त होना सीख ले,

उसे बाँधना कठिन हो जाता है।


4. चरित्र का भ्रम और मौन की हिंसा


हमने चरित्र को

दमन से जोड़ दिया है।


जो जितना चुप,

उतना “अच्छा”।


पर सच्चा चरित्र

चुप्पी से नहीं,

जागरूकता से बनता है।


जो अपनी इच्छा को


देख सकता है


समझ सकता है


और दिशा दे सकता है


वही चरित्रवान है।


पर जो इच्छा से भागता है,

वही अंततः

उसका शिकार बनता है।


सम्भोग पर मौन

सबसे हिंसक शिक्षा है

क्योंकि जो समझाया नहीं जाता,

वह अंधेरे में सीख लिया जाता है।


5. आंतरिक ब्रह्माण्ड और सृजन


हर मनुष्य के भीतर

एक ब्रह्माण्ड है

इच्छाओं का, कल्पनाओं का, ऊर्जा का।


वही ऊर्जा

जीवन को जन्म देती है

और वही ऊर्जा

जीवन को अर्थ देती है


जब इस ऊर्जा को


प्रेम


संवेदनशीलता


और समझ मिलती है


तो वही

कला बनती है,

करुणा बनती है,

सृजन बनती है।


और जब वही ऊर्जा

डर और अपराधबोध में पलती है,

तो वह

हिंसा और विनाश बन जाती है।


6. स्वीकृति


सम्भोग को

न देवता बनाना है,

न दानव।


उसे बस

मानव अनुभव की तरह स्वीकारना है।


संवाद से,

शिक्षा से,

और चेतना से।


क्योंकि

सम्भोग समस्या नहीं,

समस्या है उसका इनकार।


सम्भोग जीवन के विरुद्ध नहीं,

जीवन का प्रमाण है।


उसे दबाने से

पवित्रता नहीं आती,

केवल विस्फोट टलता है।


और जो विस्फोट

समय पर नहीं होता,

वह अधिक तबाही लाता है।


जो ऊर्जा समझ के साथ बहती है

वह संसार रचती है

और जो ऊर्जा डर में दबती है

वह संसार जला देती है।


यह लेख सम्भोग का पक्ष नहीं लेता

यह मनुष्य के पक्ष में खड़ा होता है।


हमारे जीवन में संबंध महत्वपूर्ण हैं

 जब संबंध थकान और दर्द लाए खुद को बचाने का मार्ग


हमारे जीवन में संबंध महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि वे केवल साथ रहने तक सीमित नहीं होते वे हमारी भावनाओं, समझ और सम्मान की गहराई से जुड़े होते हैं। लेकिन कभी-कभी हम अपने प्रयासों और प्रेम के बावजूद दूसरों से वही समझ और समर्थन नहीं पाते जिसकी हमें आवश्यकता है। ऐसे समय में यह केवल संबंध की समस्या नहीं होती, बल्कि हमारी मानसिक और भावनात्मक ऊर्जा पर भारी बोझ बन जाती है।


1. शब्दों का खेल और भीतर की चुप्पी


कई बार हम बातें करते हैं, लेकिन लगता है कि सामने वाला केवल अपनी ही बात पर अड़ा है। इस स्थिति में संवाद होने का भ्रम उत्पन्न होता है बाहर से सब ठीक लगता है, पर भीतर मन खाली और थका हुआ महसूस करता है।


उदाहरण:

सोचिए आप अपने मित्र को अपने मन की बात समझाने की कोशिश कर रहे हैं। आप धीरे-धीरे अपनी भावनाओं को साझा करते हैं, पर वह बार-बार अपनी ही राय कहता है और आपकी बात पर ध्यान नहीं देता। बाहर से बातचीत चल रही है, लेकिन आप भीतर खाली और असहाय महसूस करते हैं।


उपचारात्मक कदम:

अपने अनुभवों को लिखें, अपनी भावनाओं को किसी भरोसेमंद व्यक्ति से साझा करें, या ध्यान की साधना करें। यह आपको भीतर से सुनने और समझने में मदद करेगा।


2. जब प्रयासों का महत्व न माने जाए


“ये तो कुछ भी नहीं” जैसे शब्द हमें चोट पहुंचाते हैं और हमारी भावनाओं को नकारते हैं। बार-बार ऐसा अनुभव होने पर आत्म-संदेह और कमज़ोरी का भाव जन्म ले सकता है।


उदाहरण:

आपने अपनी माँ के लिए उनके पसंद का उपहार चुना और उन्हें खुश करने के लिए समय निकाला, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया होती है: “ये तो कुछ भी नहीं।” बार-बार ऐसा होने पर आप सोचने लगते हैं: “शायद मैं ही पर्याप्त नहीं हूँ।”


उपचारात्मक कदम:

याद रखें कि आपके प्रयासों की मूल्यवानता आपके भीतर है, न कि दूसरों की स्वीकृति में। खुद को सहानुभूति देना और अपनी उपलब्धियों को स्वीकार करना मानसिक स्वास्थ्य की पहली सीढ़ी है।


3. सम्मान और सीमाओं की रक्षा


अगर कोई व्यक्ति आपकी सीमाओं, भावनाओं और जिम्मेदारियों का सम्मान नहीं करता, तो यह केवल व्यक्तिगत समस्या नहीं यह आपको अस्थिर महसूस करवा सकती है।


उदाहरण:

आपने अपने साथी से अनुरोध किया कि वह समय पर घर लौटें ताकि परिवार के साथ समय बिताया जा सके, लेकिन वह बार-बार अनदेखा करता है और अपनी मर्जी चलता है। इससे आप लगातार थकान और असहाय महसूस करते हैं।


उपचारात्मक कदम:

स्पष्ट सीमाएँ तय करें। यह “स्वार्थ” नहीं, बल्कि खुद की सुरक्षा है। सीमाओं को सुरक्षित रखने से आप मानसिक रूप से मजबूत बनते हैं।


4. शक्ति के खेल से बचाव


कुछ लोग अपने अहंकार के कारण धमकी, ब्लैकमेल या दोषारोपण का सहारा लेते हैं। यह शक्ति के खेल हमारे आत्मसम्मान को चुनौती दे सकते हैं।


उदाहरण:

आपने अपने वरिष्ठ या शिक्षक से मदद मांगी, लेकिन उनकी प्रतिक्रिया होती है कि “तुम ही गलती कर रहे हो, तुम्हें सीखना चाहिए।” इसके बाद वह आपको दोषी ठहराते हुए दूसरों के सामने नीचा दिखाते हैं।


उपचारात्मक कदम:

अपनी मानसिक शक्ति बढ़ाएँ। खुद से कहें कि आप किसी की भावना या नियंत्रण के अधीन नहीं हैं। कभी-कभी दूरी बनाना ही सबसे बड़ी सुरक्षा और उपचार है।


5. भीतर का स्वास्थ्य, बाहर के नकली चेहरे से अधिक महत्वपूर्ण


आपके शरीर का स्वास्थ्य बाहरी रूप से सामान्य लग सकता है, लेकिन लगातार तनाव और अस्वीकार के कारण मन धीरे-धीरे थक जाता है। यह नींद, ध्यान और निर्णय क्षमता को प्रभावित कर सकता है।


उदाहरण:

एक कर्मचारी लगातार आलोचना और अवहेलना झेलता है। बाहर से वह सामान्य दिखता है, लेकिन रात को नींद नहीं आती, निर्णय लेने में कठिनाई होती है, और आत्मविश्वास कम होता है।


उपचारात्मक कदम:

ध्यान, योग, गहरी साँस की तकनीक, रचनात्मक गतिविधियाँ और आत्म-सहानुभूति को नियमित जीवन में शामिल करें। यह मानसिक थकान को कम करने में मदद करता है।


6. संबंध नहीं, आपकी चेतना की सुरक्षा


जब कोई लगातार समझने से इंकार करता है, तो यह केवल रिश्ता नहीं, बल्कि आपकी आंतरिक शांति पर भी हमला है। ऐसे समय में अपने भीतर दो हिस्से हो सकते हैं—एक जो संबंध बचाने की कोशिश करता है, और एक जो खुद को बचाने की चाह रखता है।


उदाहरण:

आपके जीवनसाथी लगातार आपकी भावनाओं को अनदेखा करते हैं और केवल अपनी जरूरतें देखते हैं। आप भीतर से टूटते जा रहे हैं, पर बाहर से घर सामान्य चलता दिखता है। इस समय खुद को बचाने के लिए दूरी बनाना या संबंध के पैटर्न बदलना ही मानसिक सुरक्षा है।


उपचारात्मक कदम:

खुद को बचाने की दिशा में कदम उठाना स्वार्थ नहीं है। अपने स्वास्थ्य और आत्म-सम्मान की रक्षा करना प्राथमिकता है।


"खुद को चुनना उपचार है"


हर संबंध में समझौता होता है, लेकिन जब संवाद, सम्मान और मानसिक सुरक्षा खतरे में हो, तो खुद को चुनना ही सबसे बड़ा कदम है। यह केवल दूरी बनाने का सवाल नहीं यह अपने अस्तित्व और मानसिक शांति को सुरक्षित रखने का मार्ग है।


जो लगातार आपकी समझ और भावनाओं को नकारता है, वह आपका परिवर्तन नहीं चाहता, बल्कि आपके अस्तित्व को कमतर दिखाना चाहता है। ऐसे में खुद को बचाना सच्ची शक्ति है।