सम्भोग: दमन, ऊर्जा और मनुष्य होने का सत्य
मनुष्य का इतिहास अजीब है।
वह जिस प्रक्रिया से जन्म लेता है,
उसी प्रक्रिया पर बोलते हुए संकोच करता है।
जिस ऊर्जा से जीवन बहता है,
उसी ऊर्जा से वह डरता है।
सम्भोग....
जिसे हमने वर्जना बना दिया,
असल में जीवन की मूल धड़कन है।
1. परम्परा के पीछे छिपा भय
अक्सर कहा जाता है...
“हमारी संस्कृति में यह सब नहीं बोला जाता।”
पर यह संस्कृति नहीं,
डर की परम्परा है।
डर इस बात का कि
कहीं नियंत्रण न टूट जाए
कहीं इच्छाएँ सवाल न पूछने लगें
कहीं मनुष्य अपने भीतर झाँक न ले
सम्भोग पर चुप्पी इसलिए नहीं थोपी गई
कि वह अशुद्ध है,
बल्कि इसलिए कि वह अत्यधिक जीवंत है।
और जो अत्यधिक जीवंत होता है,
वह सत्ता, समाज और ढाँचे को असहज करता है।
2. दमन: ऊर्जा का सबसे खतरनाक रूप
ऊर्जा कभी नष्ट नहीं होती
वह केवल रूप बदलती है।
जब सम्भोग की ऊर्जा को
समझ नहीं मिलती
संवाद नहीं मिलता
स्वीकृति नहीं मिलती
तो वह....
कुंठा बनती है
अपराधबोध बनती है
और अंततः विस्फोट बन जाती है।
यह कोई नैतिक सिद्धांत नहीं,
यह प्रकृति का नियम है।
जैसे....
नदी को बहने दो, तो वह जीवन देती है।
उसे बाँध दो, तो वह बाढ़ बन जाती है।
हमारे समाज ने
नदी नहीं बहने दी,
फिर बाढ़ से डरने लगे।
3. सम्भोग: केवल शरीर नहीं, चेतना की घटना
सम्भोग को केवल शारीरिक क्रिया मानना
उसके साथ सबसे बड़ा अन्याय है।
सम्भोग वह क्षण है
जहाँ मनुष्य
अपने “मैं” को ढीला करता है
नियंत्रण छोड़ता है
और क्षणभर को ही सही,
स्वयं से बाहर निकलता है
दार्शनिक इसे
लघु-मृत्यु कहते हैं....
जहाँ अहंकार टूटता है
और शून्य झलकता है।
इसीलिए सम्भोग
डर पैदा करता है।
क्योंकि जो व्यक्ति
अपने अहं से मुक्त होना सीख ले,
उसे बाँधना कठिन हो जाता है।
4. चरित्र का भ्रम और मौन की हिंसा
हमने चरित्र को
दमन से जोड़ दिया है।
जो जितना चुप,
उतना “अच्छा”।
पर सच्चा चरित्र
चुप्पी से नहीं,
जागरूकता से बनता है।
जो अपनी इच्छा को
देख सकता है
समझ सकता है
और दिशा दे सकता है
वही चरित्रवान है।
पर जो इच्छा से भागता है,
वही अंततः
उसका शिकार बनता है।
सम्भोग पर मौन
सबसे हिंसक शिक्षा है
क्योंकि जो समझाया नहीं जाता,
वह अंधेरे में सीख लिया जाता है।
5. आंतरिक ब्रह्माण्ड और सृजन
हर मनुष्य के भीतर
एक ब्रह्माण्ड है
इच्छाओं का, कल्पनाओं का, ऊर्जा का।
वही ऊर्जा
जीवन को जन्म देती है
और वही ऊर्जा
जीवन को अर्थ देती है
जब इस ऊर्जा को
प्रेम
संवेदनशीलता
और समझ मिलती है
तो वही
कला बनती है,
करुणा बनती है,
सृजन बनती है।
और जब वही ऊर्जा
डर और अपराधबोध में पलती है,
तो वह
हिंसा और विनाश बन जाती है।
6. स्वीकृति
सम्भोग को
न देवता बनाना है,
न दानव।
उसे बस
मानव अनुभव की तरह स्वीकारना है।
संवाद से,
शिक्षा से,
और चेतना से।
क्योंकि
सम्भोग समस्या नहीं,
समस्या है उसका इनकार।
सम्भोग जीवन के विरुद्ध नहीं,
जीवन का प्रमाण है।
उसे दबाने से
पवित्रता नहीं आती,
केवल विस्फोट टलता है।
और जो विस्फोट
समय पर नहीं होता,
वह अधिक तबाही लाता है।
जो ऊर्जा समझ के साथ बहती है
वह संसार रचती है
और जो ऊर्जा डर में दबती है
वह संसार जला देती है।
यह लेख सम्भोग का पक्ष नहीं लेता
यह मनुष्य के पक्ष में खड़ा होता है।
No comments:
Post a Comment