किसी ने कहा _जीवन व्यर्थ क्यों मालूम होता है.....?
🌹
मैंने कहा _ जीवन तो कोरा कागज है;
जो लिखोगे वही पढ़ोगे...।
गालियां लिख सकते हो, गीत लिख सकते हो...।
और गालियां भी उसी वर्णमाला से बनती हैं
जिससे गीत बनते हैं;
वर्णमाला तो निरपेक्ष है, निष्पक्ष है...।
जिस कागज पर लिखते हो
वह भी निरपेक्ष, निष्पक्ष....।
जिस कलम से लिखते हो,
वह भी निरपेक्ष, वह भी निष्पक्ष...।
सब दांव तुम्हारे हाथ में है....।
तुमने इस ढंग से जीया होगा,
इसलिए व्यर्थ मालूम होता है....।
तुम्हारे जीने में भूल है...।
और जीवन को गाली मत देना.......।
🌹
यह बड़े मजे की बात है...! लोग कहते हैं,
जीवन व्यर्थ है....।
यह नहीं कहते कि हमारे जीने का ढंग व्यर्थ है...!
और तुम्हारे तथाकथित मित्र_मैत्रीण,
रिश्तेदार भी तुमको यही समझाते हैं--
जीवन व्यर्थ है.....।
🌹
मैं तुमसे कुछ और कहना चाहता हूं.....।
मैं कहना चाहता हूं:
जीवन न तो सार्थक है,
न व्यर्थ;
जीवन तो निष्पक्ष है;
जीवन तो कोरा आकाश है...।
उठाओ तूलिका, भरो रंग....।
चाहो तो इंद्रधनुष बनाओ और
चाहो तो कीचड़ मचा दो...।
कुशलता चाहिए.....।
विश्वास चाहिए...!
नजरिया चाहिए..!
अगर जीवन व्यर्थ है तो
उसका अर्थ यह है कि तुमने जीवन को
जीने की कला नहीं सीखाई;
उसका अर्थ है कि तुम यह मान कर चले थे कि
जीवन है तो इसमें सबकुछ रेडीमेड मिलेगा.....।
🌹
जीवन कोई रेडीमेड कपड़े नहीं है,
कोई रेमंड की दुकान नहीं है, कि गए
और तैयार कपड़े मिल गए....।
जिंदगी से कपड़े बनाने पड़ते हैं...।
फिर जो बनाओगे वही पहनना पड़ेगा,
वही ओढ़ना पड़ेगा.....।
और कोई दूसरा तुम्हारी जिंदगी में
कुछ भी नहीं कर सकता....।
कोई दूसरा तुम्हारे कपड़े नहीं बना सकता....।
जिंदगी के मामले में तो
अपने कपड़े खुद ही बनाने होते हैं....।
🌹
जीवन व्यर्थ है, ऐसा मत कहो...।
ऐसा कहो कि
मेरे जीने के ढंग में क्या कहीं कोई भूल थी....?
क्या कहीं कोई भूल मेरे हाथों हों रही है कि
मेरा जीवन व्यर्थ हुआ जा रहा है.....?
🌹
तुम्हारा जीवन तो व्यर्थ नहीं....।
मेरा जीवन भी तो व्यर्थ नहीं.....।
तो जीवन कैसे व्यर्थ होगा......?
कैसा अर्थ खिला....! कैसे फूल...!
कैसी सुवास उड़ी....! कैसे गीत जगे.....!
कैसी मृदंग बजी.....!
लेकिन कुछ लोग हैं कि
जिनके जीवन में सिर्फ दुर्गंध है.....।
और सोचनेवाली बात है कि
तुम ऐसे लोगों की संगत में रहकर
जीवन में दुर्गंध बढ़ा रहे हो...
वही सुगंध बन सकती है--
जरा सी कला से, जीने की कला से....!
🌹
मैं प्रेम को जीने की कला कहता हूं....।
प्रेम कोई पूजा-पाठ नहीं है.....।
प्रेम का मंदिर और मस्जिद से कुछ लेना-देना नहीं है....।
प्रेम तो है जीवन की कला.....।
जीवन को ऐसे जीया जा सकता है--
ऐसे कलात्मक ढंग से, ऐसे प्रसादपूर्ण ढंग से--कि
तुम्हारे जीवन में हजार पंखुरियों वाला कमल खिले...!,
कि तुम्हारे जीवन में समाधि लगे....!
कि तुम्हारे जीवन में भी ऐसे गीत उठें
जैसे कोयल के.....!
कि तुम्हारे भीतर भी हृदय में
ऐसी-ऐसी भाव-भंगिमाएं जगें,
जो भाव-भंगिमाएं प्रकट हो जाएं तो
उपनिषद बनते हैं.....!
जो भाव-भंगिमाएं अगर प्रकट हो जाएं
तो मीरा का नृत्य पैदा होता है...!
चैतन्य के भजन बनते हैं......!
🌹
इसी पृथ्वी पर, इसी देह में,
ऐसी ही हड्डी-मांस-मज्जा के लोग
ऐसा-ऐसा सार्थक जीवन जी गए--
जो आज भी दुसरे के जीवन को
प्रेरणा दे रहे हैं....!
और तुम कहते हो____
जीवन व्यर्थ क्यों मालूम होता है.......?
🌹
No comments:
Post a Comment