“मेरी शांति या खुशी देखी ही नहीं जाती कि ये मेरे बिना खुश कैसे है”
1. इस वाक्य के पीछे छुपा हुआ सच
जब कोई व्यक्ति यह कहता है कि “ये मेरे बिना खुश कैसे है”, तो असल में वह यह नहीं कह रहा होता कि सामने वाला खुश है।
वह यह कह रहा होता है कि....
मैंने जिस रिश्ते में सब कुछ दिया, वहाँ मेरी क़द्र क्यों नहीं हुई?
अगर मैं दुखी हूँ, तो दूसरा चैन से कैसे जी सकता है?
क्या मेरी अहमियत इतनी कम थी कि मेरे बिना भी जीवन चल गया?
यह भाव प्रेम का नहीं, अधिकारबोध और असुरक्षा का संकेत है।
2. पति–पत्नी के रिश्ते में यह भावना कैसे जन्म लेती है?
उदाहरण 1: पत्नी की नज़र से
एक पत्नी जिसने
घर छोड़ा
करियर रोका
ससुराल और पति को प्राथमिकता दी
जब वह देखती है कि पति
दोस्तों के साथ हँस रहा है
सोशल मीडिया पर मुस्कुरा रहा है
उसके दर्द के बिना भी “सामान्य” दिख रहा है
तो उसके मन में यह सवाल उठता है:
“मेरे टूटने से इसे कोई फर्क ही नहीं पड़ा?”
यहीं से जलन नहीं, अपमान की पीड़ा जन्म लेती है।
उदाहरण 2: पति की नज़र से
एक पति जिसने
जिम्मेदारियों में खुद को घिस दिया
भावनाएँ दबा लीं
पत्नी के लिए अपने शौक छोड़े
जब वह देखता है कि पत्नी.....
मायके में या दोस्तों के बीच खुश है
हँस रही है, सज रही है
उसके बिना भी ज़िंदगी जी रही है
तो भीतर एक टीस उठती है:
“क्या मैं इतना गैरज़रूरी था?”
3. असल समस्या: खुशी नहीं, तुलना है
यहाँ समस्या यह नहीं कि दूसरा खुश है।
समस्या यह है कि....
“मैं दुखी हूँ, तो तुम कैसे खुश हो सकते हो?”
यह सोच रिश्ते को प्रेम से हटाकर हिसाब–किताब में बदल देती है।
पति–पत्नी का रिश्ता जब प्रेम से हटकर
अहं + अधिकार + अपेक्षा बन जाता है,
तब एक की खुशी दूसरे के लिए ज़हर बन जाती है।
4. क्या वाकई दूसरा खुश होता है?
बहुत बार जो खुशी दिखाई देती है, वह..
समाज को दिखाने की मजबूरी
खुद को साबित करने की कोशिश
दर्द से भागने का तरीका
होती है।
पति मुस्कुरा रहा है, इसका मतलब यह नहीं कि उसे खालीपन नहीं।
पत्नी हँस रही है, इसका मतलब यह नहीं कि वह टूटी नहीं।
पर क्योंकि हम अपने दर्द में डूबे होते हैं,
हमें सिर्फ सामने वाले की “मुस्कान” दिखती है,
उसके पीछे का संघर्ष नहीं।
5. यह भावना रिश्ते को कहाँ ले जाती है?
जब हम यह सोचते रहते हैं कि....
“इसे मेरी खुशी नहीं देखी जाती”
“इसे मेरे बिना खुश नहीं होना चाहिए”
तो धीरे–धीरे.....
प्रेम.... नियंत्रण बन जाता है
चाह.... ज़िद बन जाती है
रिश्ता... युद्ध बन जाता है
और अंत में दोनों हार जाते हैं।
6. इसका उपचार क्या है?
प्रश्न 1: क्या दूसरे की खुशी से मेरा दर्द कम हो सकता है?
उत्तर:
नहीं।
आपका दर्द सिर्फ आपकी स्वीकृति और आत्मसम्मान से कम होगा।
प्रश्न 2: क्या मुझे यह साबित करना चाहिए कि मैं भी खुश हूँ?
उत्तर:
नाटक से नहीं,
वास्तविक आत्म-निर्माण से।
प्रश्न 3: क्या रिश्ते में त्याग व्यर्थ चला गया?
उत्तर:
नहीं।
त्याग व्यर्थ नहीं होता,
पर अगर उसका मूल्यांकन सामने वाले से अपेक्षित है,
तो वह त्याग नहीं, सौदा बन जाता है।
7. असली शांति कहाँ है?
असली शांति वहाँ है जहाँ आप यह स्वीकार कर लें कि...
“दूसरे की खुशी या दुख मेरे मूल्य को तय नहीं करता।”
जिस दिन पति यह समझ लेता है कि पत्नी के बिना भी उसका अस्तित्व है,
और पत्नी यह समझ लेती है कि पति की बेरुख़ी उसके मूल्य को कम नहीं करती,
उसी दिन दोनों मुक्त होते हैं।
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जो सच में खुश होता है, उसे यह देखने की ज़रूरत नहीं होती कि
दूसरा मेरे बिना खुश है या नहीं।
और जो भीतर से टूटा होता है, उसे दूसरे की हँसी भी चुभती है।
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