Monday, February 2, 2026

अभाव

 अभाव : मनुष्य के भीतर का खाली कोना"


हर इंसान के भीतर एक कोना होता है 

जो भरा नहीं होता,

जो अधूरा होता है,

जो चुपचाप भीतर बैठा रहता है।


किसी के भीतर धन का अभाव है,

किसी के भीतर रिश्तों का,

किसी के भीतर पहचान का,

किसी के भीतर प्रेम का,

और किसी के भीतर शांति का।


यह अभाव बाहर से दिखाई नहीं देता,

पर यही वो चीज़ है

जो इंसान को रातों की नींद से उठाता है,

दिन भर दौड़ाता है,

और कभी-कभी तोड़ भी देता है।


गरीब अमीर बनना चाहता है,

अमीर चैन ढूँढता है।

युवा नौकरी चाहता है,

नौकरी वाला अर्थ ढूँढता है।

पति चाहता है कि पत्नी उसे सुने,

पत्नी चाहती है कि पति उसे समझे।


हर चाहत की जड़ में एक ही चीज़ है.... अभाव।


अभाव की जड़ कहाँ से शुरू होती है?


अभाव बाहर से नहीं आता,

अभाव पैदा होता है तुलना से।


बचपन में:


“देखो फ़लना का बेटा”


“तुम उससे कम क्यों हो?”


“तुम्हें ऐसा होना चाहिए”


यहीं पहली दरार पड़ती है।


फिर समाज:


पैसा = सफलता


शादी = पूर्णता


पद = सम्मान


मन धीरे-धीरे सीख लेता है कि


 “मैं जैसा हूँ, वैसा पर्याप्त नहीं हूँ।”


यहीं से अभाव जन्म लेता है।


असल में अभाव किसी चीज़ की कमी नहीं,

बल्कि अपने होने को नकारने की आदत है।


अभाव कैसे जीवन को नियंत्रित करता है?


अभाव इंसान को मजबूर करता है।


वही नौकरी करता है जो पसंद नहीं


वही रिश्ता निभाता है जिसमें घुटन है


वही जीवन जीता है जिसमें आत्मा शामिल नहीं


क्योंकि भीतर एक आवाज़ कहती रहती है...


“कुछ कमी है… कुछ कमी है…”


इसी कमी को भरने के लिए इंसान:


धर्म बदलता है


गुरु बदलता है


देश बदलता है


पद्धतियाँ बदलता है


और हर जगह जल्दी समाधान चाहता है।


अगर समाधान नहीं मिला,

तो वह उस सिस्टम को दोष देता है।


लेकिन कोई नहीं पूछता....

“क्या समस्या बाहर है, या भीतर?”


अभाव क्यों कभी पूरी तरह भरता नहीं?


क्योंकि हम गलत जगह भरने की कोशिश करते हैं।


हम सोचते हैं:


पैसा आएगा तो चैन मिलेगा


रिश्ता मिलेगा तो शांति मिलेगी


पहचान मिलेगी तो सुकून मिलेगा


लेकिन जब वो सब मिल जाता है,

तो नया अभाव पैदा हो जाता है।


क्योंकि

अभाव चीज़ों से नहीं, चेतना से जुड़ा है।


अब ध्यान विधि....बिल्कुल अलग, बिल्कुल नई


यह ध्यान कोई नियम नहीं है।

कोई मंत्र नहीं।

कोई मुद्रा नहीं।

कोई गुरु नहीं।


यह अपने शरीर से दोस्ती करने की विधि है।


चरण 1: हाथों को महसूस करना


शांत बैठिए या लेटिए।

अपनी दोनों हथेलियों को

धीरे-धीरे आपस में रगड़िए।


अब रुक जाइए।


ध्यान दीजिए...


गर्माहट


झुनझुनी


कंपन


कुछ भी बदलने की कोशिश मत कीजिए।

बस महसूस कीजिए।


यहीं से मन वर्तमान में आता है।


चरण 2: अपने बालों को सहलाना


अब अपने ही हाथों से

अपने बालों को बहुत धीरे-धीरे सहलाइए।


जैसे कोई माँ

अपने बच्चे को सुला रही हो।


यह क्रिया शरीर को संदेश देती है...


“तू सुरक्षित है।”


अभाव का सबसे बड़ा कारण है....

असुरक्षा।


यह चरण उसी को पिघलाता है।


चरण 3: छाती और पेट पर हाथ


एक हाथ छाती पर,

एक हाथ पेट पर।


सांस को बदलना नहीं है।

बस देखना है।


हर सांस के साथ

अपने भीतर की खाली जगह को महसूस करें।


उससे भागिए मत।

उसे भरने की कोशिश मत कीजिए।


बस कहिए....


“हाँ, तुम यहाँ हो… और ठीक हो।”


चरण 4: अभाव से मित्रता


अब अपने भीतर पूछिए:


“तुम क्या चाहते हो?”


“तुम कब से यहाँ हो?”


“तुम मुझे क्या सिखाना चाहते हो?”


कोई उत्तर आए या न आए 

दोनों सही हैं।


क्योंकि यहाँ लक्ष्य उत्तर नहीं,

स्वीकृति है।


"इस ध्यान का सार"


जब आप अपने अभाव को

दुश्मन नहीं,

गुरु मान लेते हैं...


तो वह आपको दौड़ाना बंद कर देता है।


अभाव तब भी रहेगा,

लेकिन वह ज़हर नहीं बनेगा।


और मज़े की बात जब अभाव स्वीकार हो जाता है,

तो आधा भर जाता है।


धनवान शांति खोजता है

क्योंकि उसके भीतर भी

एक कोना खाली है।


जिस दिन इंसान

अपने उस खाली कोने के साथ

बैठना सीख लेता है 


उस दिन

उसे कहीं जाने की ज़रूरत नहीं पड़ती।


No comments:

Post a Comment