"शिप ऑफ़ थीसियस" का प्रश्न सदियों से मनुष्यों को परेशान करता आया है।
यदि किसी जहाज़ के सारे तख्ते एक-एक करके बदल दिए जाएँ, तो क्या वह वही जहाज़ रहता है? और यदि नहीं रहता, तो वह कब बदल गया? पहला तख्ता बदलने पर? आख़िरी तख्ता बदलने पर? या फिर हर क्षण थोड़ा-थोड़ा?
मुझे अपना शरीर याद आता है।
मेरी त्वचा जो बदल चुकी है। मेरे विचार पूर्णतः बदल चुके हैं। मेरी इच्छाएँ, भय, विश्वास, प्रेम सब बदल चुके हैं।
जो व्यक्ति मैं पाँच वर्ष पहले थी, वह अब लेशमात्र भी कहीं नहीं है।
और फिर भी मैं स्वयं को उसी नाम से पुकारती हूँ।
या शायद पहचान कोई वास्तविक वस्तु नहीं, बल्कि स्मृतियों द्वारा रचा गया एक सुंदर भ्रम है।
ठंडी हवा अब भी मेरे मन को शांत करने का असफल प्रयास किए जा रही है, पेड़ों से कुछ सूखे फूल सड़क पर गिर रहे हैं।
जिन्हें देखकर मुझे एंट्रॉपी याद आ गई ।
ब्रह्मांड का वह नियम जो कहता है कि हर व्यवस्थित चीज़ धीरे-धीरे अव्यवस्था की ओर बढ़ती जाती है।
तारे बुझ जाएँगे। आकाशगंगाएँ दूर चली जाएँगी। पर्वत धूल बन जाएँगे। यहाँ तक कि सारी स्मृतियाँ भी।
पहली बार लगा कि मृत्यु कोई दुर्घटना नहीं है। वह ब्रह्मांड का सबसे पुराना अनुशासन है। जिसका पालन प्रकाश भी करता है। जिसका पालन समय भी करता है। और अंततः हम भी।
तभी एक दूसरा विचार आया..... यदि सब कुछ नष्ट हो जाता है, तो फिर अर्थ कहाँ से आता है?
और ये विचार भी कभी थमने का नाम ही नहीं लेते।
यहीं मुझे अस्तित्ववाद की सबसे विचित्र बात समझ आई
कि अर्थ खोजा नहीं जाता अर्थ को पैदा किया जाता है....
जिस प्रकार एक कवि जानता है कि उसकी कविता एक दिन खो जाएगी, फिर भी वह लिखता है।
जिस प्रकार कोई प्रेम करता है, जबकि उसे पता है कि एक दिन बिछड़ना निश्चित है और फिर भी इतनी शिद्दत से प्रेम कर लेता है कि उन्मादी हो जाता है।
फूल खिलते हैं, हालाँकि उन्हें मालूम है कि उनकी पंखुड़ियाँ टिकने वाली नहीं फिर भी रोज खिलते हैं।
मुझे लगा कि क्षणभंगुरता ही मूल्य पैदा करती है। यदि हम अमर होते, तो शायद किसी भी आलिंगन का महत्व नहीं होता, न किसी भी विदाई का, न किसी के प्रेम का ।
अब रात और गहरी हो चुकी है। चाँद अब बादलों के पीछे चला गया है आकाश को देखते हुए मुझे कार्ल युंग की एक अवधारणा याद आई "सामूहिक अचेतन"।
क्या पता जिन प्रतीकों से हम प्रेम करते हैं चाँद, नदी, जंगल, तारे, मृत्यु, यात्रा वे केवल काव्यात्मक वस्तुएँ नहीं हो। क्या पता वे लाखों वर्षों की मानवीय स्मृतियों के अवशेष हों।
क्या पता जब मैं चाँद को देखकर कभी कभी विचलित हो जाती हूँ, तो वह मेरा निजी भाव नहीं।
वह उन असंख्य लोगों का अनुभव हो, जो मुझसे पहले इसी पृथ्वी पर खड़े होकर इसी चाँद को देखते रहे हों।
शायद हम उतने अलग नहीं हैं जितना हम सोचते हैं।
हम सब एक बहुत पुराने स्वप्न के अलग-अलग पात्र हैं।