मैंने जो देना था, दे दिया... अब आपकी बारी है
मुझे जो कहना था, मैं कह चुका हूँ।
जो अनुभव मुझे ध्यान में मिला...
जो सत्य मुझे भीतर दिखाई दिया...
जो अमृत मुझे चखने को मिला...
वह सब मैं तुम्हारे सामने रख चुका हूँ।
अब यह तुम्हारे ऊपर है कि तुम इसे केवल सुनकर चले जाओगे या इसे अपने जीवन में उतारोगे।
कल किसने देखा है?
कौन जानता है कि अगला क्षण हमारे पास होगा या नहीं?
इसलिए मैं भविष्य की चिंता नहीं करता।
मैंने अपना फर्ज पूरा कर दिया है।
जो दीपक मेरे भीतर जला, उसकी लौ मैंने तुम्हारे हाथों में सौंप दी है।
अब उसे जलाए रखना तुम्हारी जिम्मेदारी है।
साधको...
ज्ञान सुनना आसान है।
ज्ञान पर चर्चा करना आसान है।
लेकिन ज्ञान को जीना सबसे कठिन है।
सैकड़ों लोग नदी के किनारे खड़े होकर पानी की बातें करते हैं।
लेकिन प्यास केवल उसी की बुझती है जो पानी पीता है।
ठीक इसी प्रकार...
ध्यान के बारे में सुनने से मुक्ति नहीं मिलेगी।
ध्यान में उतरना पड़ेगा।
डॉक्टर और दवा का उदाहरण
मान लो कोई डॉक्टर तुम्हें अमूल्य दवा दे दे।
वह कहे—
"यह दवा तुम्हारे सारे रोग मिटा सकती है।"
लेकिन तुम दवा को घर में रख दो...
उसकी पूजा करो...
उसकी चर्चा करो...
और कभी उसे खाओ ही नहीं।
तो क्या रोग मिटेंगे?
कभी नहीं।
ठीक यही स्थिति साधकों की है।
ध्यान की बात सुनते हैं...
पुस्तकें पढ़ते हैं...
प्रवचन सुनते हैं...
लेकिन अभ्यास नहीं करते।
फिर कहते हैं—
"जीवन में शांति क्यों नहीं आती?"
शांति सुनने से नहीं,
जीने से आती है।
मेरा अनुभव
मैंने जो अनुभव किया है, वही तुम्हें बता रहा हूँ।
मैं कोई सिद्धांत नहीं दे रहा।
मैं कोई उधार का ज्ञान नहीं सुना रहा।
मैं वही कह रहा हूँ जो मैंने जिया है।
ध्यान में उतरते ही मैंने पाया—
दुःख बाहर नहीं था...
दुःख मेरे मन की पकड़ में था।
जैसे ही पकड़ ढीली हुई,
वैसे ही दुःख दूर होने लगा।
जैसे अंधकार सूर्य के सामने टिक नहीं सकता,
वैसे ही जागरूकता के सामने दुःख टिक नहीं सकता।
दुःख को दूर रखने का रहस्य
तुम पूछते हो—
"दुःख से कैसे बचें?"
मैं कहता हूँ—
दुःख से मत लड़ो।
जाग जाओ।
जो जाग गया,
उसके लिए दुःख भी शिक्षक बन जाता है।
जो सोया हुआ है,
उसके लिए सुख भी दुःख बन जाता है।
ध्यान तुम्हें जगाता है।
और जो जाग गया,
उससे दुःख सौ कोस नहीं,
हजारों कोस दूर भाग जाता है।
अंतिम संदेश
हो सकता है मैं कल रहूँ...
हो सकता है न रहूँ...
यह शरीर एक दिन मिट्टी में मिल जाएगा।
लेकिन सत्य कभी नहीं मरता।
यदि मेरे शब्दों में तुम्हें सत्य की झलक मिली हो,
तो उन्हें केवल सुनकर मत छोड़ देना।
उन्हें अपने जीवन में उतार लेना।
प्रतिदिन कुछ समय ध्यान में बैठना।
अपने भीतर उतरना।
अपने विचारों को देखना।
अपने अहंकार को पहचानना।
और धीरे-धीरे उस मौन में प्रवेश करना
जहाँ परमात्मा तुम्हारी प्रतीक्षा कर रहा है।
याद रखना—
मैंने जो देना था, दे दिया।
अब आपकी बारी है।
यदि तुमने इस ज्ञान पर अमल कर लिया,
तो तुम्हारी जिंदगी से दुःख बहुत दूर चला जाएगा।
और जिस दिन तुमने अपने भीतर के परमात्मा को पहचान लिया,
उस दिन जानोगे कि जिस आनंद को तुम बाहर खोज रहे थे,
वह हमेशा से तुम्हारे भीतर ही था।
No comments:
Post a Comment