कल का चिंतन आज !
“ काकरोच जानता पार्टी vs शोषण समाप्ति “
जब मैं ये बात बोल रहा हूँ तो ज़्यादातर लोग सोंचेंगे कि होना तो कॉकरोच जानता पार्टी vs भारतीय जानता पार्टी
लेकिन समझने वाली बात ये है कि ये आवाज़ जो काकरोच जानता पार्टी उठा रही है ये तो दरअसल शोषण के ख़िलाफ़ है
कुछ देर के लिए मान लेते है कि काकरोच जानता पार्टी BJP को उखाड़ फेंकेगी
और सत्ता पर नेपाल
की तरह कोई zen ji बैठ कर सरकार चलायेगा और सब बदल जाएगा ।
क्या वास्तव में ये सब उतना आसान है जितना दिखाई पड़ता है
इसपर चिंतन ज़रूरी है
इसी चर्चा को लेकर एक व्यक्ति ने कभी मुझे प्रश्न किया
प्रश्न था:-
सखा, क्या वास्तव में हमारी समस्याओं का कारण कोई विशेष पार्टी है?
क्या BJP, Congress, AAP, या कोई और दल हट जाए तो शोषण समाप्त हो जाएगा?
क्या लोकतंत्र वास्तव में जनता को स्वतंत्र बनाता है?
सखा का उत्तर :
मेरे देखे समस्या किसी एक पार्टी में नहीं है।
समस्या उस व्यवस्था में है जिसके भीतर सभी पार्टियाँ जन्म लेती हैं, बढ़ती हैं और सत्ता प्राप्त करती हैं।
आज लोग एक-दूसरे से लड़ रहे हैं।
कोई BJP के पक्ष में है, कोई विपक्ष के पक्ष में।
कोई मानता है कि वर्तमान सरकार समस्या है।
कोई मानता है कि विपक्ष समस्या है।
लेकिन मुझे लगता है कि हम सभी उस कमरे की दीवारों पर बहस कर रहे हैं, जबकि असली प्रश्न उस कमरे पर होना चाहिए जिसमें हम सब बंद हैं।
और मेरी दृष्टि में वह कमरा है — लोकतांत्रिक सत्ता संरचना।
लोकतंत्र हमें यह विश्वास दिलाता है कि जनता शासन कर रही है।
लेकिन वास्तव में जनता क्या करती है?
हर पाँच वर्ष में कुछ विकल्पों में से एक विकल्प चुनती है।
वह विकल्प भी वही होते हैं जिन्हें राजनीतिक दल, धनबल, प्रचार तंत्र और सत्ता संरचनाएँ पहले से तैयार करके जनता के सामने रखती हैं।
यानी जनता शासक नहीं चुनती।
जनता उपलब्ध विकल्पों में से चयन करती है।
और यह दोनों बातें एक जैसी नहीं हैं।
फिर चुनाव की पूरी प्रक्रिया को देखिए।
एक साधारण नागरिक के लिए चुनाव लड़ना लगभग असंभव होता जा रहा है।
चुनाव में धन चाहिए।
* प्रचार चाहिए।
* कार्यकर्ता चाहिए।
* संगठन चाहिए।
* मीडिया तक पहुँच चाहिए।
* प्रभावशाली लोगों का समर्थन चाहिए।
अर्थात योग्यता से अधिक महत्व संसाधनों का हो जाता है।
और जब प्रवेश द्वार ही इतना महँगा हो जाए तो भीतर पहुँचने वाले लोग किस प्रकार के होंगे, यह समझना कठिन नहीं है।
इसके बाद एक और विचित्र स्थिति उत्पन्न होती है।
जो व्यक्ति चुनाव जीतता है, उसे पता है कि पाँच वर्ष बाद फिर चुनाव लड़ना है।
इसलिए उसका ध्यान केवल शासन पर नहीं होता।
उसे अपनी लोकप्रियता भी बनाए रखनी होती है।
उसे अपने समर्थक भी बनाए रखने होते हैं।
उसे अपने वोट बैंक को भी संतुष्ट रखना होता है।
उसे अगला चुनाव भी जीतना होता है।
फिर हम आशा करते हैं कि वह केवल राष्ट्रहित में निर्णय लेगा।
यह वैसा ही है जैसे किसी विद्यार्थी को पढ़ाई से अधिक अगली परीक्षा की चिंता हो।
अब संविधान की बात करते हैं।
हमें बचपन से सिखाया जाता है कि संविधान सर्वोच्च है।
देश संविधान से चलता है।
सभी नागरिक संविधान के सामने बराबर हैं।
लेकिन यदि संविधान ही सर्वोच्च है तो फिर एक प्रश्न उठता है।
* हर राजनीतिक दल का एजेंडा अलग क्यों है?
* हर दल अलग घोषणापत्र क्यों बनाता है?
* हर दल अलग प्रकार का भारत क्यों बनाना चाहता है?
* हर दल अलग प्रकार के मतदाता क्यों तैयार करता है?
यदि सबको अंततः संविधान के अनुसार ही चलना है, तो इतनी वैचारिक लड़ाइयाँ क्यों?
और यदि दल अपने एजेंडे के आधार पर वोट माँगते हैं, तो सत्ता में आने के बाद वे संविधान को प्राथमिकता देंगे या अपने एजेंडे को?
यही वह बिंदु है जहाँ लोकतंत्र का सबसे बड़ा विरोधाभास दिखाई देता है।
और एक और प्रश्न है।
यदि संविधान वास्तव में इतना पवित्र और सर्वोच्च है, तो उसे बार-बार संशोधित क्यों किया जाता है?
उसे बदलने की शक्ति किसके पास है?
उसी राजनीतिक वर्ग के पास जो चुनाव जीतकर आता है।
यानी जिस व्यवस्था को संविधान नियंत्रित करने वाला था, वही व्यवस्था संविधान में संशोधन भी कर सकती है।
फिर प्रश्न उठता है—
सर्वोच्च कौन है ?
संविधान ?
या वह राजनीतिक शक्ति जो संविधान को बदलने की क्षमता रखती है ?
मैं यह नहीं कहता कि संविधान व्यर्थ है।
न ही मैं यह कहता हूँ कि लोकतंत्र के कोई लाभ नहीं हैं।
निश्चित रूप से लोकतंत्र ने राजतंत्रों और तानाशाहियों की तुलना में अनेक स्वतंत्रताएँ प्रदान की हैं।
लेकिन किसी व्यवस्था में कुछ अच्छाइयाँ होना और उस व्यवस्था का अंतिम सत्य होना — दोनों अलग बातें हैं।
मेरे लिए सबसे बड़ा प्रश्न आज भी वही है।
क्या हम शोषण के कारणों को समझ रहे हैं ?
या केवल शोषकों के चेहरे बदल रहे हैं ?
क्योंकि इतिहास गवाह है कि सत्ता बदलना आसान है।
झंडे बदलना आसान है।
नारे बदलना आसान है।
पार्टियाँ बदलना आसान है।
लेकिन यदि व्यवस्था वही रहे तो शोषण केवल अपना रूप बदलता है, समाप्त नहीं होता।
इसलिए मेरा प्रश्न किसी पार्टी से नहीं है।
मेरा प्रश्न व्यवस्था से है।
और जब तक समाज व्यवस्था पर प्रश्न पूछना नहीं सीखेगा, तब तक वह नेताओं पर बहस करता रहेगा।
क्योंकि संभव है कि समस्या शासकों में नहीं, बल्कि उस खेल के नियमों में हो जिन्हें हमने बिना जाँचे-परखे स्वीकार कर लिया है।
और शायद सबसे बड़ा प्रश्न यही है —
क्या हम वास्तव में स्वतंत्र हैं, या केवल स्वतंत्रता का अनुभव कर रहे हैं ?
मैं ये सब जब लिख रहा हूँ तो इसका मतलब ये नहीं है कि जब तक सारे चिंतन न हो जाये तब तक भ्रष्टाचार का विरोध नहीं होना चाहिए ,
विरोध अवश्य होना चाहिए , उसके लिए जनता का आकृष्ट होना अगर ज़रूरी है तो वो आक्रोश भी निकलना ज़रूरी है
क्यूंकि यही सब बार बार दोहराये जाना ही
एक दिन उस चिंतन को भी करने पर मजबूर करेगा ,
जो आज मैं ऊपर लिखकर उठा रहा हूँ , क्यूँकि अभी ये आपकी समझ में आना मुश्किल पड़ेगा , क्यूँकि आप में से अधिकतर लोगो को अभी यही पता है कि डेमोक्रेसी ही आज़ादी है ,
उसी तरह जैसे आपको बचपन से बताया गया , कि डाक्टरी भगवान होते है
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