Friday, July 10, 2026

कृष्ण की अदालत में सुदामा की वकालत...

 कृष्ण की अदालत में सुदामा की वकालत...

सुदामा और कृष्ण कभी सहपाठी थे। वर्षों बाद सुदामा की पत्नी ने कहा कि जाओ, अपने मित्र से मिल आओ। कुछ मांगना मत। मित्र खुद समझ जाएगा कि तुम क्यों आए हो।


सुदामा द्वारिका पहुंचे। कृष्ण ने उनका ऐसा स्वागत किया कि सदियों तक दोस्ती की मिसाल दी जाती रही। कहते हैं, लौटते समय सुदामा की गरीबी समाप्त हो चुकी थी।


कहानी यहीं समाप्त हो जाती है और हम सब प्रसन्न हो जाते हैं। हम कहते हैं कि मित्रता हो तो ऐसी।


लेकिन बचपन से संजय सिन्हा में एक बुरी आदत रही है। कहानी खत्म होने के बाद उनके मन में कहानी शुरू होती है।


सवाल कृष्ण से नहीं है। मेरा सवाल राजा से है।

राजा का अपना क्या होता है?


राजा का महल उसका नहीं होता। राजा का खजाना उसका नहीं होता। हाथी, घोड़े, सैनिक, सेवक, रत्न, सोना, चांदी कुछ भी उसका निजी नहीं होता। वह सब प्रजा का होता है। राजा केवल उसका संरक्षक होता है। वह ट्रस्टी होता है, मालिक नहीं।


आज की भाषा में कहें तो राजा जनता के टैक्स के पैसे का संरक्षक होता है।


ऐसे में अगर कोई पुराना मित्र आता है और राजा उस पर राजकोष लुटा देता है तो क्या कोई प्रश्न नहीं उठना चाहिए?


कल्पना कीजिए कि द्वारिका में कैग होती। ऑडिट होता। लोक लेखा समिति होती। क्या वे यह नहीं पूछते कि ये श्रीमान सुदामा कौन हैं? किस योजना के लाभार्थी हैं? किस नियम के तहत इन्हें यह सब मिला? किस खाते से भुगतान हुआ?


मित्रता अपनी जगह है। सार्वजनिक धन अपनी जगह।

यहीं से मेरी बेचैनी शुरू होती है।


मैं देखता हूं कि हमारे देश में लगभग हर व्यवस्था धीरे-धीरे एक क्लब में बदल जाती है। पत्रकारों का क्लब। अफसरों का क्लब। नेताओं का क्लब। उद्योगपतियों का क्लब। और कभी-कभी न्यायपालिका का भी क्लब।


क्लब की सबसे बड़ी विशेषता क्या होती है?


वहां नियम बाद में आते हैं, पहचान पहले आती है। वहां योग्यता के साथ परिचय भी चलता है। वहां कानून के साथ नेटवर्क भी चलता है।

फिर हम सब धीरे-धीरे यह मानने लगते हैं कि यही सामान्य है।


मान लीजिए दो लोग साथ-साथ न्यायाधीश बने। साथ काम किया। साथ सेमिनारों में गए। साथ बैठकों में बैठे। एक दिन उनमें से एक सेवानिवृत्त हो गया। दूसरा सर्वोच्च अदालत तक पहुंच गया।

पहले व्यक्ति ने वकालत शुरू कर दी।


अब एक दिन वह अपने पुराने साथी की अदालत में खड़ा है।

मैं यह नहीं कह रहा कि कुछ गलत होगा।

मैं यह भी नहीं कह रहा कि कानून टूट जाएगा।

मैं केवल इतना पूछ रहा हूं कि लोकतंत्र को ऐसी स्थिति पैदा ही क्यों करनी चाहिए?


न्याय का सिद्धांत केवल निष्पक्षता नहीं है। न्याय का सिद्धांत यह भी है कि निष्पक्षता दिखाई दे।


अगर जनता को बार-बार समझाना पड़े कि नहीं, सब ठीक है, सब नियमों के अनुसार है, सब निष्पक्ष है, तो इसका अर्थ है कि व्यवस्था में कहीं न कहीं सुधार की आवश्यकता है।


मुझे औरंगज़ेब की एक कहानी याद आती है। कहा जाता है कि वह रात में टोपी सिलता था और उससे अपने निजी खर्च चलाता था। इतिहास की बहस में मैं नहीं पड़ता। लेकिन उस विचार पर जरूर ठहरता हूं कि राज्य का पैसा प्रजा का है।


यही विचार लोकतंत्र की आत्मा है।

अगर राज्य का पैसा जनता का है, अगर राज्य की प्रतिष्ठा जनता की है, अगर राज्य की संस्थाएं जनता की हैं, तो फिर हर विशेषाधिकार पर प्रश्न पूछने का अधिकार भी जनता का होना चाहिए।


इसीलिए मैं पूछता हूं कि क्या हमें इस पर राष्ट्रीय बहस नहीं करनी चाहिए कि उच्च न्यायालयों और सर्वोच्च न्यायालय के सेवानिवृत्त न्यायाधीशों को सक्रिय अदालतों में वकालत करने की अनुमति होनी चाहिए या नहीं?


उन्हें पेंशन मिलती है। सम्मान मिलता है। प्रतिष्ठा मिलती है।

फिर उसी व्यवस्था में लौटकर, जहां वे कल तक निर्णायक थे, आज पक्षकार बनकर खड़े होने की आवश्यकता क्या है?


यह किसी व्यक्ति का प्रश्न नहीं है। यह किसी न्यायाधीश का प्रश्न नहीं है। यह किसी मुकदमे का प्रश्न नहीं है। यह संस्थाओं की विश्वसनीयता का प्रश्न है।


कृष्ण और सुदामा की कहानी मित्रता की सबसे सुंदर कहानी हो सकती है। लेकिन लोकतंत्र की सबसे सुंदर कहानी वह होगी जिसमें किसी कृष्ण को अपने सुदामा की पहचान याद रखने की आवश्यकता ही न पड़े।


जहां निर्णय केवल नियम से हो। जहां पहचान का कोई मूल्य न हो।

जहां मित्रता कानून से छोटी हो। और जहां जनता को यह भरोसा हो कि उसके अधिकार किसी सुदामा की मौजूदगी से नहीं, केवल संविधान और कानून से तय होंगे।

ऐसा होता तो सुदामा अमीर होकर कृष्ण के दरबार से न लौटे होते। 


नोट- 

आज की कहानी समझने में मुश्किल होगी तो इसे बाद में कभी स्पष्ट कर दूंगा। वैसे कहना इतना ही है कि सुप्रीम कोर्ट में जब किसी हाई कोर्ट के रिटायर जज वकील बन कर खड़े होते हैं तो लगता है जैसे कृष्ण के सामने सुदामा खड़े हैं और जो बिना मांगे पाकर चले जाएंगे...

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