आखिर दार्शनिक अरस्तू को एथेंस क्यों छोड़ना पड़ा?
Aristotle को इतिहास के सबसे महान दार्शनिकों में गिना जाता है। उन्होंने तर्कशास्त्र, राजनीति, विज्ञान, नैतिकता और दर्शन के अनेक क्षेत्रों में ऐसे विचार दिए, जिनका प्रभाव आज भी दिखाई देता है। लेकिन अपने जीवन के अंतिम दिनों में उन्हें उस शहर को छोड़ना पड़ा, जहाँ उन्होंने वर्षों तक शिक्षा दी और अपना प्रसिद्ध विद्यालय लाइसीयम (Lyceum) स्थापित किया था। यह शहर था Athens।
सिकंदर महान से संबंध
अरस्तू केवल एक दार्शनिक ही नहीं थे, बल्कि वे Alexander the Great के शिक्षक भी थे। सिकंदर ने आगे चलकर एक विशाल साम्राज्य स्थापित किया, जो यूनान से लेकर मिस्र और भारत तक फैला हुआ था।
अरस्तू का जन्म मैसेडोनिया के निकट हुआ था और उनके परिवार का मैसेडोनियाई राजघराने से संबंध था। जब सिकंदर शक्तिशाली शासक बना, तब अरस्तू के लिए एथेंस में रहना आसान था क्योंकि मैसेडोनिया का प्रभाव पूरे यूनान पर था।
परिस्थिति कैसे बदली?
323 ईसा पूर्व में अचानक सिकंदर महान की मृत्यु हो गई। उसकी मृत्यु के बाद पूरे यूनान, विशेषकर एथेंस में, मैसेडोनिया के प्रति गुस्सा बढ़ने लगा। एथेंस के बहुत से लोग पहले से ही मैसेडोनियाई शासन को पसंद नहीं करते थे। सिकंदर की मृत्यु ने उन्हें विद्रोह करने का अवसर दे दिया।
ऐसे माहौल में अरस्तू भी संदेह के घेरे में आ गए। लोग उन्हें मैसेडोनिया का समर्थक मानने लगे क्योंकि उनका संबंध सिकंदर और उसके परिवार से था।
अरस्तू पर धार्मिक आरोप
अरस्तू के विरोधियों ने उन पर "अधार्मिकता" (Impiety) का आरोप लगाया। प्राचीन यूनान में यह बहुत गंभीर अपराध माना जाता था। आरोप यह था कि उन्होंने देवताओं का उचित सम्मान नहीं किया और धार्मिक परंपराओं का अपमान किया है।
हालाँकि अधिकांश इतिहासकार मानते हैं कि यह आरोप वास्तव में धार्मिक नहीं बल्कि राजनीतिक था। विरोधी सीधे-सीधे अरस्तू पर राजनीतिक हमला नहीं कर सकते थे, इसलिए उन्होंने धर्म को हथियार बनाया।
सुकरात की याद
अरस्तू से लगभग 76 वर्ष पहले महान दार्शनिक Socrates पर भी इसी प्रकार का आरोप लगाया गया था। सुकरात पर युवाओं को भटकाने और देवताओं का अपमान करने का आरोप लगा था। अंततः उन्हें मृत्युदंड दिया गया और उन्होंने हेमलॉक नामक विष पीकर अपने प्राण त्याग दिए।
अरस्तू इस घटना को अच्छी तरह जानते थे। उन्हें डर था कि यदि वे मुकदमे का सामना करेंगे, तो उनका भी वही हश्र हो सकता है जो सुकरात का हुआ था।
एथेंस छोड़ने का निर्णय
स्थिति को समझते हुए अरस्तू ने मुकदमे का सामना करने के बजाय एथेंस छोड़ने का फैसला किया। कहा जाता है कि उन्होंने यह प्रसिद्ध वाक्य कहा:
"मैं एथेनियनों को दर्शनशास्त्र के विरुद्ध दूसरी बार अपराध करने का अवसर नहीं दूँगा।"
इस कथन का अर्थ था कि सुकरात की हत्या दर्शनशास्त्र के विरुद्ध पहला अपराध थी और वे नहीं चाहते थे कि एथेंस उनके साथ भी वही करे।
अरस्तू का अंतिम दिन
अरस्तू एथेंस छोड़कर Chalcis नामक स्थान पर चले गए, जो यूबोइया द्वीप पर स्थित था। वहाँ उन्होंने अपने जीवन का अंतिम वर्ष बिताया।
322 ईसा पूर्व में, लगभग 62 वर्ष की आयु में, बीमारी के कारण उनकी मृत्यु हो गई। इस प्रकार दुनिया के सबसे महान विचारकों में से एक का जीवन समाप्त हुआ।
इतिहास से मिलने वाली सीख
अरस्तू की कहानी हमें बताती है कि महान विद्वान और दार्शनिक भी राजनीति के प्रभाव से नहीं बच सके। उन पर लगाए गए आरोप शायद धार्मिक कम और राजनीतिक अधिक थे। यह घटना इस बात का उदाहरण है कि जब समाज में राजनीतिक तनाव बढ़ता है, तो ज्ञान और विचारों की स्वतंत्रता भी खतरे में पड़ सकती है।
आज अरस्तू को दुनिया के महानतम दार्शनिकों में गिना जाता है, जबकि जिन लोगों ने उन्हें एथेंस छोड़ने पर मजबूर किया था, उनके नाम इतिहास में लगभग खो चुके हैं। यही ज्ञान की सबसे बड़ी विजय है।
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