Friday, July 10, 2026

परमात्मा स्वयं मिलने को उत्सुक

परमात्मा स्वयं मिलने को उत्सुक...


हम सभी के जीवन में ऐसे पल आते हैं जब हम हररोज ध्यान अभ्यास करके भी शांति का अनुभव नहीं कर पाते तो खुद को हारा हुआ महसूस करते हैं। लेकिन निराशा का दामन थामने की बजाय अगर हम गहराई से चिंतन करें तो पाएंगे कि हर इंसान को वही मिलता है, जिसका वह वाकई हकदार होता है। आज आपके पास जो कुछ भी है, कहीं-न-कहीं आपके अंदर उसकी पात्रता जरूर रही होगी। 


इसके उलट आज आपके पास जो नहीं है, उसकी पात्रता का भी आपमें अभाव होगा ही। वृक्ष की भव्यता के पीछे बीज की छुपी क्षमता को नकारा नहीं जा सकता है। इसलिए परमात्मा के सानिध्य की प्राप्ति और श्वासों के पथ पर जीवट के साथ बढ़ने के लिए जरूरी है कि हम साक्षी भाव के ध्यान अभ्यास के प्रति प्रतिबद्ध होकर अपने भीतर पात्रता विकसित करें। 


एक प्याला तभी उपयोगी है जब उसमें द्रव को थामने की, उसे अपने भीतर समेटे रहने की पात्रता हो। इसलिए जीवन को शांति के अनुभव से सफल करने का सर्वोच्च लक्ष्य हासिल करने की पहली शर्त है उसके लिए आवश्यक पात्रता स्वयं में पैदा करना। सच्चे गुरुओं को परमात्मा का सानिध्य इसलिए मिला क्योंकि उन्होंने उसकी पात्रता ध्यान अभ्यास से विकसित की है। 


एक बार ध्यान अभ्यास से मन को स्वांसों के साथ एकाकार कर लिया तो बाकी सब कुछ अपने आप घटित होने लगता है। जैसे-जैसे आप योग्य पात्र में रूपांतरित होते जाएंगे, स्वत: ही शांति की खुशबू फूट पड़ती है। आप पाएंगे कि परमानंद, सच्चिदानंद स्वयं ही आपको मिलने के लिए उत्सुक है। साध्य और साधन में अगर श्वासों के साधन की पात्रता को हृदय से स्वीकार करने का सूत्र सावधानी से थामेंगे तो साध्य को आसानी से अपनी तरफ खींच सकेंगे...

ओशो बार-बार कहते हैं कि सत्य उधार नहीं लिया जा सकता। शास्त्र, धर्मग्रंथ, सिद्धांत और दर्शन केवल संकेत हैं; वे सत्य नहीं हैं। सत्य तो तब प्रकट होता है जब मनुष्य उसे स्वयं अनुभव करता है। यदि किसी प्यासे व्यक्ति को पानी पर हजारों पुस्तकें पढ़ने को दे दी जाएँ, तो उसकी प्यास नहीं बुझेगी। प्यास तभी बुझेगी जब वह स्वयं पानी पिएगा। ठीक इसी प्रकार आत्मज्ञान, प्रेम, ध्यान और परमात्मा के विषय में कितना भी पढ़ लिया जाए, जब तक उनका प्रत्यक्ष अनुभव न हो, तब तक सब ज्ञान अधूरा है।


ओशो कहते हैं कि संसार में अधिकांश लोग उधार के ज्ञान से भरे हुए हैं। उन्होंने शास्त्र याद कर लिए हैं, सिद्धांत कंठस्थ कर लिए हैं, लेकिन उनके जीवन में कोई क्रांति नहीं आई। उनका ज्ञान केवल स्मृति है, चेतना नहीं। ऐसा ज्ञान अहंकार को तो बढ़ा सकता है, लेकिन आत्मा को मुक्त नहीं कर सकता।


ध्यान की पूरी प्रक्रिया इसी अनुभव की ओर ले जाती है। जब व्यक्ति भीतर उतरता है, अपने विचारों, भावनाओं और इच्छाओं का साक्षी बनता है, तब धीरे-धीरे अनुभव का द्वार खुलता है। तब सत्य किसी पुस्तक से नहीं मिलता, बल्कि स्वयं के भीतर प्रकट होता है। उस क्षण शास्त्रों की आवश्यकता समाप्त हो जाती है, क्योंकि जो जानना था वह प्रत्यक्ष हो गया।


ओशो कहते हैं कि बुद्ध, महावीर, कृष्ण और कबीर इसलिए महान नहीं हैं कि उन्होंने सत्य के बारे में बातें कीं, बल्कि इसलिए कि उन्होंने सत्य को जिया। उनके शब्दों में शक्ति इसलिए है क्योंकि वे अनुभव से निकले हैं। अनुभवहीन शब्द मृत होते हैं, अनुभव से निकले शब्द जीवंत होते हैं।


इसलिए ओशो का आग्रह है कि केवल विश्वास मत करो, खोजो। केवल पढ़ो मत, जानो। केवल सुनो मत, अनुभव करो। जीवन का प्रत्येक सत्य प्रयोग मांगता है। जब तुम प्रेम को जीते हो, तभी प्रेम को जानते हो। जब तुम ध्यान में उतरते हो, तभी ध्यान को समझते हो। जब तुम मौन का स्वाद चखते हो, तभी मौन का अर्थ प्रकट होता है।


ओशो कहते हैं: "शास्त्र मार्ग दिखा सकते हैं, लेकिन चलना तुम्हें स्वयं पड़ेगा। सत्य का अनुभव किसी दूसरे के माध्यम से नहीं हो सकता। जब तक तुम्हारा अपना अनुभव नहीं होता, तब तक सारा ज्ञान केवल शब्दों का बोझ है। अनुभव होते ही वही शब्द प्रकाश बन जाते हैं।" 

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