ओशो के अनुसार यह तस्वीर दो हिस्सों में बँटी है - एक दृश्य और एक वैचारिक संदेश। चलिए दोनों को विस्तार से समझते हैं।
1. तस्वीर का दृश्य भाग
मुद्रा: तस्वीर में एक महिला लाल रंग की पारंपरिक पोशाक - लहंगा चोली - पहने हुए है। वह जंगल जैसे प्राकृतिक परिवेश में ज़मीन पर चक्रासन या उर्ध्व धनुरासन कर रही है। इसमें शरीर पीछे की ओर धनुष की तरह मुड़ा होता है, सिर ज़मीन पर और पेट ऊपर की ओर उठा हुआ।
प्रतीकात्मक अर्थ:
लाल रंग: भारतीय संस्कृति में लाल रंग शक्ति, ऊर्जा, कुंडलिनी जागरण और तंत्र का प्रतीक माना जाता है।
प्रकृति में योग: जंगल, सूखे पत्ते और ज़मीन पर किया गया आसन यह दर्शाता है कि योग और साधना दिखावे से दूर, प्रकृति से जुड़कर होती है।
शरीर की लचक: यह आसन रीढ़ की हड्डी, हृदय चक्र और कुंडलिनी शक्ति से जुड़ा है। योग में इसे ऊर्जा को ऊपर की ओर ले जाने वाला आसन माना जाता है।
2. तस्वीर का पाठ भाग
तस्वीर के नीचे लिखा है:
"osho ने बातें तो हजारों कहीं ,, पर
लोग sex पर ही क्यूँ अटके रहे ??
संभोग तो समझ आया ,, पर
समाधी क्यूँ नहीं ??"
think behind
इसका संदर्भ क्या है?
Osho, जिन्हें आचार्य रजनीश भी कहा जाता है, 20वीं सदी के एक प्रसिद्ध आध्यात्मिक गुरु थे। उनकी शिक्षाओं का एक महत्वपूर्ण हिस्सा "संभोग से समाधि की ओर" नामक पुस्तक है।
इसमें Osho का मुख्य तर्क था:
दमन नहीं, रूपांतरण: समाज ने सेक्स को हमेशा दबाया, उसे पाप कहा। दमन से वह और ताकतवर हो जाता है। Osho ने कहा कि सेक्स को समझो, उसका सम्मान करो।
ऊर्जा का विज्ञान: Osho के अनुसार सेक्स मनुष्य की सबसे बुनियादी ऊर्जा है। अगर इस ऊर्जा को होशपूर्वक अनुभव किया जाए, तो यही ऊर्जा ऊपर उठकर प्रेम, ध्यान और समाधि बन सकती है।
समाज की आलोचना: तस्वीर का टेक्स्ट इसी विडंबना पर चोट करता है। Osho ने ध्यान, प्रेम, स्वतंत्रता, मृत्यु, अहंकार, जैसे सैकड़ों विषयों पर बोला। पर मीडिया और समाज सिर्फ "सेक्स गुरु" का ठप्पा लगाकर उसी एक बिंदु पर अटक गए। लोगों ने "संभोग" वाला हिस्सा तो पकड़ लिया, क्योंकि वह सनसनीखेज था, पर "समाधि" वाला हिस्सा - जो असल मंज़िल थी - उसे छोड़ दिया।
"Think behind" का मतलब: तस्वीर बनाने वाला कह रहा है कि सतह पर जो दिख रहा है उसके पीछे का कारण सोचो। Osho को सिर्फ सेक्स से जोड़ना अधूरा सच है। उनकी पूरी फिलॉसफी चेतना के रूपांतरण की थी।
3. तस्वीर और टेक्स्ट का संबंध
यहाँ योगासन की मुद्रा और Osho के विचार को जोड़कर एक गहरा संदेश दिया गया है। चक्रासन में शरीर की ऊर्जा मूलाधार से उठकर ऊपर के चक्रों की ओर जाती है। यही Osho के "संभोग से समाधि" का मूल सिद्धांत है - **मूल ऊर्जा को नीचे दबाने की बजाय, उसे जागरूकता से ऊपर की ओर मोड़ना**।
लाल वस्त्र वाली स्त्री की यह मुद्रा तंत्र और कुंडलिनी योग का प्रतीक है, जो Osho की शिक्षाओं के बहुत करीब है।
संक्षेप में: यह तस्वीर सिर्फ एक योगासन नहीं दिखा रही। यह Osho के दर्शन पर एक टिप्पणी है कि हम इंसान अक्सर गहरी बातों के बजाय सतही और सनसनीखेज चीज़ों में ही उलझ कर रह जाते हैं। हमने "संभोग" शब्द सुन लिया, पर उसके पीछे छिपी "समाधि" की संभावना को समझने की कोशिश नहीं की।
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