क्या एक पूरी तरह ईमानदार दुनिया संभव है?
हम सब एक ईमानदार दुनिया देखना चाहते हैं।
हम चाहते हैं कि कोई झूठ न बोले, कोई छल न करे, कोई भ्रष्टाचार न हो, कोई किसी का हक़ न मारे।
लेकिन क्या हमने कभी यह समझने की कोशिश की है कि इंसान आखिर बेईमान होता क्यों है?
क्या बेईमानी केवल चरित्र की कमजोरी है?
या फिर इसके पीछे मनुष्य की प्राकृतिक बनावट और जीवन संघर्ष भी कोई भूमिका निभाते हैं?
इंसान की प्राकृतिक बनावट क्या है?
मनुष्य कोई मशीन नहीं है।
वह भूख, भय, मोह, प्रेम, महत्वाकांक्षा, सुरक्षा, सम्मान और अस्तित्व की इच्छाओं से बना हुआ प्राणी है।
उसे भोजन चाहिए।
उसे परिवार की सुरक्षा चाहिए।
उसे समाज में सम्मान चाहिए।
उसे भविष्य की चिंता रहती है।
उसे अपने बच्चों का भविष्य बेहतर चाहिए।
इन आवश्यकताओं के कारण वह लगातार निर्णय लेता रहता है।
यहीं से संघर्ष शुरू होता है।
संघर्ष कहाँ पैदा होता है?
कल्पना कीजिए कि एक गाँव में केवल 100 लोगों के लिए रोजगार है लेकिन वहाँ 200 लोग रहते हैं।
अब सभी को जीवित रहना है।
सभी को अपने परिवार का पालन-पोषण करना है।
ऐसी स्थिति में प्रतिस्पर्धा पैदा होगी।
कोई अधिक मेहनत करेगा।
कोई संबंधों का उपयोग करेगा।
कोई नियमों का लाभ उठाएगा।
और कोई नियम तोड़ने का प्रयास करेगा।
यहीं से ईमानदारी और स्वार्थ के बीच संघर्ष शुरू होता है।
समस्या व्यक्ति नहीं, परिस्थिति भी होती है
मान लीजिए एक पिता के सामने दो विकल्प हैं—
पहला, नियमों का पूरी तरह पालन करे और उसका बच्चा महँगे इलाज के अभाव में कष्ट झेले।
दूसरा, किसी नियम को तोड़कर पैसे का प्रबंध कर ले।
ऐसी परिस्थितियों में कई लोग नियम तोड़ देते हैं।
इसका अर्थ यह नहीं कि वे जन्म से बेईमान थे।
कई बार परिस्थिति उनकी नैतिकता से अधिक शक्तिशाली हो जाती है।
जब करोड़ों लोग संघर्ष करते हैं
अब यही संघर्ष केवल एक व्यक्ति का नहीं है।
दुनिया में अरबों लोग हैं।
सभी की इच्छाएँ हैं।
सभी की आवश्यकताएँ हैं।
सभी की महत्वाकांक्षाएँ हैं।
जब अरबों इच्छाएँ आपस में टकराती हैं तो एक जटिल सामाजिक पारिस्थितिकी बनती है।
किसी को नौकरी चाहिए।
किसी को ग्राहक चाहिए।
किसी को वोट चाहिए।
किसी को लाभ चाहिए।
किसी को सत्ता चाहिए।
यहीं से समझौते, प्रतियोगिता, गठबंधन, चालाकियाँ और कभी-कभी बेईमानी जन्म लेती है।
क्या केवल नियम बनाकर दुनिया ईमानदार हो सकती है?
हाँ, कुछ हद तक।
कानून, दंड और निगरानी लोगों को नियंत्रित कर सकते हैं।
उदाहरण के लिए—
सीसीटीवी लगा दीजिए।
लोग चोरी कम करेंगे।
हर वित्तीय लेन-देन रिकॉर्ड कर दीजिए।
कर चोरी कम होगी।
हर गतिविधि पर निगरानी रखिए।
नियम उल्लंघन कम होगा।
लेकिन यहाँ एक प्रश्न खड़ा होता है।
क्या व्यक्ति वास्तव में ईमानदार हुआ?
या केवल पकड़े जाने के डर से ईमानदार दिख रहा है?
ईमानदारी और नियंत्रण में अंतर है
यदि किसी कमरे में कैमरा लगा हो और कोई व्यक्ति चोरी न करे, तो यह आवश्यक नहीं कि उसके भीतर चोरी की इच्छा समाप्त हो गई हो।
संभव है कि केवल डर बढ़ गया हो।
यानी व्यवहार बदल गया, लेकिन चेतना नहीं।
एक पूरी तरह नियंत्रित समाज कैसा होगा?
कल्पना कीजिए—
हर व्यक्ति की गतिविधि रिकॉर्ड हो रही है।
हर बातचीत दर्ज हो रही है।
हर खर्च का हिसाब सरकार के पास है।
हर निर्णय एल्गोरिद्म तय कर रहा है।
अपराध लगभग समाप्त हो सकते हैं।
लेकिन क्या ऐसी दुनिया में मनुष्य स्वतंत्र रहेगा?
या फिर वह एक अत्यधिक नियंत्रित मशीन जैसा प्राणी बन जाएगा?
कृत्रिम नियमों की सीमा
सड़क पर लाल बत्ती एक कृत्रिम नियम है।
कर व्यवस्था एक कृत्रिम नियम है।
लाइसेंस, परमिट, पहचान पत्र — ये सब कृत्रिम व्यवस्थाएँ हैं।
इनकी आवश्यकता इसलिए पड़ती है क्योंकि मनुष्य स्वाभाविक रूप से पूर्णतः अनुशासित नहीं है।
लेकिन नियम जितने बढ़ते जाते हैं, स्वतंत्रता उतनी कम होती जाती है।
और स्वतंत्रता जितनी बढ़ती है, अव्यवस्था की संभावना उतनी बढ़ती है।
समाज को हमेशा इन दोनों के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
फिर वास्तविक ईमानदारी क्या है?
वास्तविक ईमानदारी वह नहीं जो पुलिस, अदालत या कैमरे के कारण दिखाई दे।
वास्तविक ईमानदारी वह है जो व्यक्ति तब भी निभाए जब उसे पता हो कि कोई उसे देख नहीं रहा।
लेकिन ऐसी ईमानदारी आदेश देकर पैदा नहीं की जा सकती।
वह समझ, जागरूकता, शिक्षा, आत्मबोध और जीवन के अनुभवों से विकसित होती है।
निष्कर्ष
शायद समस्या यह नहीं है कि मनुष्य बेईमान है।
समस्या यह है कि हम एक ऐसे जीव से पूर्ण ईमानदारी की अपेक्षा करते हैं जो इच्छाओं, भय, असुरक्षाओं और संघर्षों से बना है।
नियम बेईमानी को सीमित कर सकते हैं।
दंड उसे कम कर सकता है।
निगरानी उसे छिपा सकती है।
लेकिन केवल नियमों से मनुष्य को ईमानदार नहीं बनाया जा सकता।
क्योंकि ईमानदारी कोई मशीनी प्रोग्राम नहीं है।
वह चेतना का गुण है।
और जिस दिन हम केवल नियमों के बल पर एक पूर्णतः ईमानदार संसार बना देंगे, उस दिन संभव है कि हमने एक अधिक अनुशासित समाज तो बना लिया हो, पर शायद उतना ही कम मानवीय समाज भी।
ऐसा भी नहीं है कि ऐसा समाज बनाना मुश्किल है ,
लेकिन यहाँ मुश्किल तब आई है कि जिसके पास ये समझ है उसके पास सामर्थ नहीं ,
और जिन लोगों के पास अत्यधिक सामर्थ है वो ये डैब सोंचते नहीं क्यूंकि वो अपनी दुनिया में ताक़त के बल से स्वतंत्र है और अपने अर्थोंके ईमानदार भी , और साथ ही वो ऐसी सोंच को बढ़ावा इसलिए भी नहीं देंगे क्यूंकि ऐसा होने पर उनका आप पर जो कंट्रोल है वो समाप्त हो जाएगा ।
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