Sunday, January 18, 2026

स्त्रियाँ एक भ्रमित पुरुष से प्रेम करती हैं

 स्त्रियाँ एक भ्रमित पुरुष से प्रेम करती हैं। वे हमेशा किसी भ्रमित पुरुष की तलाश में रहती हैं—किसी ऐसे की जो थोड़ा पागल, थोड़ा सनकी हो। क्योंकि पागलपन में एक आकर्षण होता है; जो व्यक्ति उन्मत्त, भ्रमित होता है, उसमें एक खास चुंबकत्व होता है। वह संभावनाओं से भरा होता है, सपनों से भरा होता है। स्त्रियाँ स्वप्नदर्शी से प्रेम करती हैं।


और पुरुष? पुरुष एक समझदार, स्थिर स्त्री से प्रेम करते हैं—नहीं तो वे सचमुच पागल हो जाएँ—उन्हें धरती पर टिकाए रखने के लिए। स्त्री धरती का प्रतीक है। पुरुष को स्त्री की ज़रूरत है, क्योंकि उसके अपने अस्तित्व में जड़ें नहीं होतीं। उसे स्त्री चाहिए—वह गर्म धरती, वह गहरी मिट्टी—जहाँ वह अपनी जड़ें फैला सके और धरती से जुड़ा रह सके। वह डरता है—उसके पास पंख तो हैं, लेकिन जड़ें नहीं। और उसे भय है कि यदि वह धरती को थामे नहीं रहा, तो कहीं वह उड़ न जाए, अनंत आकाश में विलीन न हो जाए, और फिर लौटना संभव न रहे। यही डर लोगों को स्त्रियों के पीछे दौड़ाता है।


और स्त्री के पास पंख नहीं होते। उसके पास जड़ें होती हैं—गहरी जड़ें; स्त्री शुद्ध धरती है। और उसे डर है कि यदि वह अकेली रह गई, तो वह कभी अज्ञात में उड़ नहीं पाएगी। पुरुष स्त्री के बिना नहीं रह सकता, क्योंकि तब वह अपनी जड़ें खो देता है। वह बस एक आवारा बन जाता है।


फिर उसका कहीं कोई ठिकाना नहीं रहता। ज़रा उस पुरुष को देखो जिसके जीवन में कोई स्त्री नहीं है: वह कहीं का नहीं रहता, उसका कोई घर नहीं होता, वह बहता हुआ लकड़ी का टुकड़ा बन जाता है—लहरें उसे जहाँ चाहें ले जाती हैं—जब तक कि वह कहीं किसी स्त्री के साथ उलझ न जाए; तब घर का जन्म होता है। शोधकर्ता कहते हैं कि ‘घर’ स्त्री की रचना है। यदि पुरुष अकेला रहता, तो न घर होता और न ही सभ्यता।


स्त्री के बिना पुरुष एक भटका हुआ यात्री है, एक आवारा। इसलिए देर-सवेर उसे जड़ें जमाने की ज़रूरत पड़ती है। स्त्री उसकी धरती बन जाती है। जब तक पुरुष अपने भीतर कुछ ऐसा नहीं खोज लेता जो उसकी धरती बन सके, जब तक वह अपनी ही आंतरिक स्त्री को नहीं खोज लेता, तब तक उसे बाहरी स्त्री की तलाश करनी ही पड़ेगी।”


बेटियों को समझाया जाए

अवैध संबंधों से सिर्फ संस्कार ही बचा सकते हैं...

बेटियों को समझाया जाए कि ऐसे संबंध ही ना बने जो अनैतिक हो ☝️

बेटियों को गुड टच बैड टच का पाठ पढ़ाया जाए।

बेटियों को समझाया जाए की शादी से पहले किसी को ग़लत तरीके से टच करने ना दे ।


स्त्री हो या पुरुष,किसी से दोस्ती रखो तो फासला भी रखो, 

((क्योंकि आजकल लेस्बियन सेक्स फिर समलैंगिक शादी की बाढ़ सी आ गई है))


यदि कोई प्रेम भी करता है तो शादी के बाद ही शारीरिक संबंध बनाने के लिए कहो अगर वह इंतजार करता है तो ही वह सच्चा प्रेमी है वरना तुम्हारा शोषण होना तय है..!!इतना सस्ता ना समझे कि कोई भी तुम्हें निचोड़ कर चला जाए..!

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नारी का शरीर एक शक्ति का रूप है, वह सृजन करती है प्रकृति की सहायिका है, हर कोई उसका सम्मान करें इससे पहले नारी को खुद अपना सम्मान करना होगा। किसी को इतना करीब आने की इजाजत ही न दे चाहे कोई भी हो..❗

हर रिश्ते की कुछ मर्यादाएं होती है, जिन्हें हमें नहीं लांघनी चाहिए..

ग़लत राह पर जाते देख माता-पिता, भाई या पति की फटकार और हिदायतें वही लक्ष्मण रेखाएं हैं, जो हमें नहीं लांघनी चाहिए..!


सम्भोग के बाद का पल

 "सम्भोग के बाद का पल"


सम्भोग केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का जटिल समन्वय है। उसके बाद का क्षण भी उतना ही गहन और संवेदनशील होता है। पुरुष और स्त्री दोनों का अनुभव अलग होता है, और उसे समझना आत्म-जागरूकता और आपसी सामंजस्य के लिए आवश्यक है।


1. पुरुष का अनुभव


सम्भोग के बाद पुरुष का शरीर और मन अचानक शिथिल और आराम की ओर झुकता है।


शारीरिक अनुभव:


लिंग ढीला पड़ता है, मांसपेशियों में थकान।


हृदय गति धीरे-धीरे सामान्य हो जाती है।


साँसें लंबी, धीमी और गहरी हो जाती हैं।


शरीर भारीपन और ऊर्जा के बहाव की कमी महसूस करता है।


मानसिक स्थिति:


पुरुष आत्मनिरीक्षण की ओर झुकता है।


अनुभव को पचाने और ऊर्जा को स्थिर करने की आवश्यकता होती है।


संवेदनाओं पर ध्यान कम हो जाता है; मन अंदर की ओर केंद्रित होता है।


इंद्रिय अनुभव:


स्पर्श और नज़दीकी की तीव्रता कम।


आंखें आधी बंद, शरीर शिथिल और आराम की स्थिति में।


पुरुष इस समय अनुभव को अंदर की दुनिया में संजोता है। यह समय उसके लिए एकांत और मानसिक स्थिरता का है।


2. स्त्री का अनुभव


स्त्री का शरीर सम्भोग के बाद भी ऊर्जावान और संवेदनशील बना रहता है। उसका अनुभव अभी भी तीव्र और विस्तृत होता है।


शारीरिक अनुभव:


त्वचा पर हल्की गर्माहट, हर स्पर्श में संवेदना।


स्तन, योन और हाथ-पैर में हल्की हलचल, ऊर्जा पूरे शरीर में फैलती है।


श्वास गहरी और नियमित, कभी-कभी हृदय की धड़कन तेज़।


मानसिक स्थिति:


साझा अनुभव की चाह, भावनाओं और संवेदनाओं के केंद्र में बनी रहती है।


मानसिक रूप से अभी भी जुड़ी हुई और जागरूक।


इंद्रिय अनुभव:


हर हल्का स्पर्श, हर साँस, हर हृदय की धड़कन उसे भीतर से खिला हुआ और आनंदित महसूस कराती है।


संवेदनाएं गहरी और जीवंत बनी रहती हैं।


स्त्री इस समय अनुभव को बाहरी और साझा रूप में जीती है। यह पल उसके लिए खिलने और जुड़ने का समय है।


3. ऊर्जा का प्रवाह और सामंजस्य


सम्भोग के बाद यह अंतर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि ऊर्जा का प्रवाह है।


पुरुष ऊर्जा को बाहर छोड़ देता है और थकान अनुभव करता है।


स्त्री वह ऊर्जा ग्रहण करती है और उसे अपने भीतर फैलती हुई स्फूर्ति और आनंद के रूप में अनुभव करती है।


यही अंतर उनके भावनात्मक और मानसिक व्यवहार में दिखाई देता है।


यदि दोनों इस अंतर को समझें और स्वीकार करें, तो यह क्षण केवल शारीरिक संतोष का नहीं बल्कि भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक जुड़ाव का भी स्रोत बन सकता है।


4. पल की सूक्ष्मता: स्पर्श, साँस और हृदय की धड़कन


कल्पना कीजिए इस पल को:


पुरुष की आँखें आधी बंद, शरीर शिथिल, और प्रत्येक साँस धीरे-धीरे बाहर निकलती है।


स्त्री की आँखें चमक रही हैं, हाथ और त्वचा संवेदनाओं को महसूस कर रहे हैं।


उसका हृदय तेज़ धड़क रहा है, उसकी ऊर्जा अभी भी बह रही है।


पुरुष के शरीर से ऊर्जा बाहर बह चुकी है, स्त्री के शरीर में वही ऊर्जा खिल रही है।


यह पल दो अलग दृष्टिकोणों के बीच सामंजस्य का है: पुरुष अपने अंदर, स्त्री बाहर की ओर फिर भी अनुभव जुड़ा हुआ।


सम्भोग के बाद का क्षण सिर्फ शारीरिक क्रिया का नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का गहन अनुभव है।


पुरुष: थकान और एकांत में अनुभव को आत्मनिरीक्षण में पचा रहा।


स्त्री: ऊर्जा में खिलना और साझा अनुभव की चाह।


यदि यह अंतर समझा जाए और स्वीकार किया जाए, तो यह पल दोनों के बीच गहरा, संतुलित और सूक्ष्म जुड़ाव बन सकता है।


संभोग_में_शीघ्र_स्खलन...


पचहत्तर प्रतिशत पुरुष शीघ्रपात के शिकार हैं—पचहत्तर प्रतिशत! गहन मिलन के पहले ही वे स्खलित हो जाते हैं और क्रीड़ा समाप्त हो जाती है। और नब्बे प्रतिशत स्त्रियां कभी आर्गाज्म को नहीं उपलब्ध हांती हैं, कभी संभोग के शिखर सुख को नहीं पहुंच पाती हैं—नब्बे प्रतिशत स्त्रियां!

यही कारण है कि अक्सर स्त्रियां चिड़चिड़ी और क्रोधी होती हैं। उन्हें ऐसा होना ही है। कोई औषधि उन्हें शांत नहीं बना सकती है, कोई दर्शनशास्त्र, धर्म या नीति उन्हें अपने पुरुषों के प्रति सहृदय नहीं बना सकती। वे अतृप्त हैं। वे क्रुद्ध हैं। और आधुनिक मनोविज्ञान और तंत्र दोनों कहते हैं कि जब तक स्त्री काम— भोग में गहन तृप्ति को नहीं प्राप्त होती, वह परिवार के लिए समस्या बनी रहेगी। जिससे वह वंचित रह गई है,वह चीज उसे क्षुब्ध रखेगी और वह हमेशा झगड़ालू बनी रहेगी।

तो अगर तुम्हारी पत्नी हमेशा लड़ती—झगड़ती रहती है तो पूरी स्थिति पर फिर से विचार करो। इसमें पत्नी का ही कसूर नहीं है, हो सकता है कि उसका कारण तुम्हीं हो। और आर्गाज्म को न उपलब्ध होने के कारण स्त्रियां काम—विमुख हो जाती हैं, वे आसानी से काम— भोग में उतरने को नहीं राजी होतीं। उन्हें रिश्वत देनी पड़ती है, वे संभोग में जाने को राजी नहीं होतीं। और वे क्यों राजी हों यदि उन्हें इससे गहन सुख की उपलब्धि ही नहीं होती?

सच तो यह है कि स्त्रियों को लगता है कि पुरुष उनका उपयोग करते हैं, उनका शोषण करते हैं। उन्हें लगता है कि हम कोई वस्तु हैं जिसका उपयोग करके फेंक दिया जाता है। पुरुष तो संतुष्ट हो जाता है, क्योंकि वह स्खलित हो जाता है। फिर वह करवट लेकर सो जाता है। लेकिन स्त्री आंसू बहाती रहती है। वह अनुभव उसके लिएतृप्तिदायी नहीं होता है। उसे लगता है कि मेरा उपयोग किया गया है। हो सकता है,उसके पति, प्रेमी या मित्र को उससे राहत मिली हो, लेकिन वह खुद अतृप्त रह जाती है।

सौ में से नब्बे स्त्रियां तो यह भी नहीं जानती हैं कि आर्गाज्म क्या है, काम—समाधि क्या है। उन्हें कभी इसका अनुभव ही नहीं हुआ। वे कभी उस शिखर को नहीं छू पाती हैं, जहां उनके शरीर का रोआं—रोआं आर्गाज्म से कंपित हो उठे, भरपूर हो जाए। यह अनुभव उनके लिए अनजाना ही रहता है!!!


तुम्हें कैसे पता चलता है कि कोई तुम्हें प्रेम करता है।

तुम्हें कैसे पता चलता है कि कोई तुम्हें प्रेम करता है।

तुम एक स्त्री या एक पुरुष के प्रेम में पड़ते हो, क्या तुम सही-सही बता सकते हो कि इस स्त्री ने तुम्हें क्यों आकर्षित किया? निश्चय ही तुम उसकी आत्मा नहीं देख सकते, तुमने अभी तक अपनी आत्मा को ही नहीं देखा है। तुम उसका मनोविज्ञान भी नहीं देख सकते क्योंकि किसी का मन पढ़ना आसान काम नहीं है। तो तुमने इस स्त्री में क्या देखा? तुम्हारे शरीर विज्ञान में, तुम्हारे हार्मोन में कुछ ऐसा है जो इस स्त्री के शरीर विज्ञान की ओर, उसके हार्मोन की ओर, उसकी केमिस्ट्री की ओर आकर्षित हुआ है। यह प्रेम प्रसंग नहीं है, यह रासायनिक प्रसंग है।


जरा सोचो, जिस स्त्री के प्रेम में तुम हो वह यदि डाक्टर के पास जाकर अपना सैक्स बदलवा ले और मूछें और दाढ़ी ऊगाने लगे तो क्या तब भी तुम इससे प्रेम करोगे? कुछ भी नहीं बदला, सिर्फ केमिस्ट्री, सिर्फ हार्मोन। फिर तुम्हारा प्रेम कहां गया?


सिर्फ एक प्रतिशत लोग थोड़ी गहरी समझ रखते हैं। कवि, चित्रकार, संगीतकार, नर्तक या गायक के पास एक संवेदनशीलता होती है जो शरीर के पार देख सकती है। वे मन की, हृदय की सुंदरताओं को महसूस कर सकते हैं क्योंकि वे खुद उस तल पर जीते हैं।


इसे एक बुनियादी नियम की तरह याद रखो: तुम जहां भी रहते हो उसके पार नहीं देख सकते। यदि तुम अपने शरीर में जीते हो, स्वयं को सिर्फ शरीर मानते हो तो तुम सिर्फ किसी के शरीर की ओर आकर्षित होओगे। यह प्रेम का शारीरिक तल है। लेकिन संगीतज्ञ , चित्रकार, कवि एक अलग तल पर जीता है। वह सोचता नहीं, वह महसूस करता है। और चूंकि वह हृदय में जीता है वह दूसरे व्यक्ति का हृदय महसूस कर सकता है। सामान्यतया इसे ही प्रेम कहते हैं। यह विरल है। मैं कह रहा हूं शायद केवल एक प्रतिशत, कभी-कभार।

पहली बात, संभोग को इस तरह मत लो जैसे कि कहीं और पहुंचना है,,,,इसे साधन की भांति मत लो,,,,,यह अपने में ही साध्य है,,,,इसका कोई लक्ष्य नहीं यह कोई माध्यम नहीं.... 


दूसरी बात भविष्य की मत सोचो,,,, वर्तमान में स्थित रहो। अगर तुम काम-कृत्य के आरंभिक भोग में वर्तमान में नहीं हो सकते तो तुम कभी भी वर्तमान में नहीं टिक सकते,,,,क्योंकि इस कृत्य की प्रकृति ही ऐसी है कि तुम वर्तमान में फेंक दिए जाते हो,,,, वर्तमान में स्थित रहो। दो शरीरों दो आत्माओं के मिलन का सुख भोगो और एक दूसरे में लीन हो जाओ, एक दूसरे में पिघल जाओ। भूल जाओ कि तुम्हें कहीं पहुंचना है। उस क्षण में स्थित रहो कहीं जाना नहीं है पिघल जाओ। प्रेम की उष्मा पिघला कर एक दूसरे में विलीन हो जाने की परिस्थिति बनाओ। 


इसी कारण अगर प्रेम नहीं है तो संभोग शीघ्रता में किया गया एक कृत्य है। तुम दूसरे का उपयोग कर रहे हो दूसरा साधन मात्र है। और दूसरा तुम्हारा उपयोग कर रहा है। तुम दोनों एक दूसरे का शोषण कर रहे हो एक दूसरे में विलीन नहीं हो रहे। प्रेम में तुम एक दूसरे में खो जाते हो। प्रारंभ में यह एक दूसरे में खो जाना एक नई दृष्टि देगा...


प्रेम पूर्ण नहीं होता और उसे कभी पूर्ण होना भी नहीं था। उसमें कमियाँ होती हैं,गलतफ़हमियाँ होती हैं,

कुछ शांत ठहराव होते हैं और ऐसे पल भी

जो धैर्य की परीक्षा लेते हैं।

लेकिन तुम्हारे साथ यह प्रेम सच्चा लगता है।

सुरक्षित लगता है। वास्तविक लगता है।

सच्चा प्रेम हर चीज़ सही करने का नाम नहीं है।

यह उस वक़्त भी एक-दूसरे को चुनने का नाम है

जब हालात आसान न हों।

यह थामे रखने में है,ज़्यादा सुनने में है,

बार-बार माफ़ करने में है और ठहरे रहने में है

इसलिए नहीं कि सब कुछ परफेक्ट है,

बल्कि इसलिए कि यह रिश्ता क़ीमती है।

तुम्हारे साथ प्रेम स्वाभाविक लगता है।

न दिखावटी,न ज़बरदस्ती का।

बस दो दिल जो सीख रहे हैं,

बढ़ रहे हैं और सबसे सच्चे रूप में

एक-दूसरे से प्रेम कर रहे हैं। 





क्या पुरुष और महिला प्यार को अलग-अलग तरीकों से समझते हैं?

 क्या पुरुष और महिला प्यार को अलग-अलग तरीकों से समझते हैं?


प्यार एक ही होता है, लेकिन उसे देखने की आँखें अलग-अलग हो सकती हैं।

कोई उसे शब्दों में ढूँढता है, कोई जिम्मेदारी में।

कोई हर पल महसूस करना चाहता है, कोई चुपचाप निभाता चला जाता है।


यहीं से यह सवाल जन्म लेता है 

क्या पुरुष और महिला प्यार को अलग तरह से समझते हैं?


"प्यार को महसूस करने का तरीका"


अक्सर देखा जाता है कि

महिलाएँ अपने भीतर उठने वाली भावनाओं को तुरंत पहचान लेती हैं।

उन्हें बात करने की ज़रूरत होती है 

सुनाए जाने की नहीं, सुने जाने की।


वहीं पुरुष भावनाओं को पहले समझने की कोशिश करते हैं।

वे सोचते हैं, पर बोलने में समय लेते हैं।

कई बार उन्हें खुद भी नहीं पता होता कि भीतर क्या चल रहा है।


इसी अंतर से गलतफहमियाँ जन्म लेती हैं।

महिला सोचती है “अगर वह प्यार करता, तो बोलता।”

पुरुष सोचता है “अगर मैं उसके लिए सब कर रहा हूँ, तो उसे समझ जाना चाहिए।”


यह प्यार की कमी नहीं,

प्यार को जीने की अलग आदत है।


"चुप्पी और शब्दों के बीच का फर्क"


कई पुरुष चुप रहकर प्यार निभाते हैं।

काम करना, सुरक्षा देना, साथ खड़ा रहना 

उनके लिए यही प्रेम की भाषा होती है।


कई महिलाएँ बोलकर, पूछकर, याद रखकर प्यार करती हैं।

उनके लिए जुड़ाव ज़रूरी होता है।


जब चुप्पी और शब्द आमने-सामने आते हैं,

तो लगता है जैसे दोनों अलग दिशाओं में जा रहे हों,

जबकि वे एक ही रिश्ते को थामे हुए होते हैं।


"बचपन से मिली सीख का असर"


अक्सर पुरुषों को सिखाया जाता है “मजबूत बनो”,

“रोना मत”,

“खुद संभालो।”


इसलिए वे दर्द को भी भीतर समेट लेते हैं।


वहीं महिलाओं को सिखाया जाता है “समझदार बनो”,

“रिश्ते निभाओ”,

“भावनाओं को ज़ाहिर करो।”


इसका असर यह होता है कि

एक बोलकर हल्का होना चाहता है,

दूसरा चुप रहकर मजबूत बना रहना चाहता है।


"प्यार में डर और असुरक्षा"


महिला का डर अक्सर होता है “क्या मैं उसके लिए महत्वपूर्ण हूँ?”

“क्या वह मुझे समझता है?”


पुरुष का डर अक्सर होता है “क्या मैं काफी हूँ?”

“क्या मैं उसे खुश रख पा रहा हूँ?”


दोनों के डर अलग हैं,

लेकिन जड़ एक ही है 

खो देने का डर।


"अलग-अलग तरीके, गहराई एक"


यह मान लेना कि:


जो ज़्यादा बोले वही ज़्यादा प्यार करता है

या


जो भावुक है वही सच्चा है


यह दोनों ही अधूरे विचार हैं।


कई बार सबसे गहरा प्यार

सबसे शांत होता है।


और कई बार सबसे सच्चा जुड़ाव

खुलकर रो लेने में होता है।


आज के समय की उलझन


आज रिश्तों में जल्दबाज़ी है।

सब कुछ तुरंत चाहिए 

समझ, भरोसा, गहराई।


लोग तुलना करने लगते हैं।

दूसरों के रिश्ते, सोशल मीडिया की तस्वीरें 

और अपना रिश्ता छोटा लगने लगता है।


पुरुष और महिला दोनों

अपेक्षाओं के बोझ तले दब जाते हैं।


"असली सवाल प्यार का नहीं, समझ का है"


समस्या यह नहीं है कि:-


पुरुष कम प्यार करता है


या महिला ज़्यादा भावुक है


समस्या यह है कि:-


हम एक-दूसरे की भाषा नहीं सीखते


और अपनी भाषा को ही सही मान लेते हैं


जब हम यह समझ लेते हैं कि

वह अलग तरह से प्यार करता/करती है,

तभी रिश्ता साँस लेने लगता है।


जहाँ फर्क मिटने लगता है


जब:--


पुरुष अपनी चुप्पी को थोड़ा शब्द देता है


महिला अपने शब्दों के बीच थोड़ी शांति देती है


तब प्यार बोझ नहीं रहता,

वह सहारा बन जाता है।


प्यार न पुरुष का होता है,

न महिला का।


प्यार उस जगह होता है

जहाँ दो लोग

एक-दूसरे को बदलने की कोशिश नहीं करते,

बस समझने की हिम्मत रखते हैं।



Saturday, January 17, 2026

पुरुष प्रेम में

 पुरुष प्रेम में “आसान रास्ता” क्यों ढूँढता है?


वह फोन देखता है।

संदेश छोटा है, पर भारी 


“हमें बात करनी है।”


उसके सीने में हल्की सी जकड़न होती है।

वह सोचता है 

मैंने क्या गलत किया?

अब क्या कमी रह गई?

मैं और कितना दूँ?


वह जवाब टाल देता है।

बात नहीं, भावना से बचता है।


यहीं से “आसान रास्ता” शुरू होता है।


1. भावनाओं से दूरी रखना उसे सिखाया गया है


अधिकांश समाजों में पुरुष बचपन से सुनते आए हैं:


“लड़के रोते नहीं”

“भावुक होना कमज़ोरी है”

“खुद को संभालो”


धीरे-धीरे वे सीख लेते हैं कि

भावना = खतरा


नतीजा यह होता है कि:


वे अपनी भावनाओं को पहचानना नहीं सीखते


उन्हें शब्द देना तो और भी मुश्किल हो जाता है


जब रिश्ते में कोई असहज भावना आती है 

अपेक्षा, शिकायत, असंतोष 

तो उसे सुलझाने की बजाय उससे बचना ज़्यादा सुरक्षित लगता है।


उदाहरण:

महिला कहती है 

“मुझे तुम्हारा समय चाहिए, बात करनी है।”


पुरुष के भीतर अनकहा अनुवाद होता है 

मैं नाकाम हो रहा हूँ।

मैं पर्याप्त नहीं हूँ।


और वह सुनने की बजाय बचाव की मुद्रा में चला जाता है।


2. पुरुषों की भावनात्मक भाषा सीमित होती है


महिलाएँ अक्सर रिश्तों में:


बात करके


साझा करके


भावनात्मक जुड़ाव से


समस्याएँ सुलझाती हैं।


जबकि पुरुषों को सिखाया जाता है:


समस्या = हल


भावना = बाधा


इसलिए जब रिश्ता “हल” नहीं,

“समझे जाने” की मांग करता है,

तो पुरुष असहज हो जाता है।


उदाहरण:

महिला कहती है 

“तुम मेरी बात नहीं समझते।”


वह समाधान नहीं चाह रही,

वह उपस्थिति चाह रही है।


पुरुष सोचता है 

तो मैं करूँ क्या?

कोई स्पष्ट निर्देश क्यों नहीं है?


और जब उत्तर नहीं मिलता,

वह पीछे हट जाता है।


3. कम्फर्ट ज़ोन टूटते ही पलायन


मानव मस्तिष्क स्वाभाविक रूप से दर्द से बचता है।

पुरुषों में यह अक्सर ऐसे दिखता है:


रिश्ता आसान है "सब ठीक"


रिश्ता मेहनत माँगता है " दूरी"


क्योंकि उन्होंने कभी सीखा ही नहीं कि:


रिश्तों में कठिन समय

स्थायी नहीं होता।


उदाहरण:

शुरुआत में सब अच्छा है 

तारीफ, आकर्षण, खुशी।


फिर अपेक्षाएँ आती हैं 

“मुझे प्राथमिकता चाहिए”

“तुम बदल गए हो”


पुरुष सोचता है 

शायद यह रिश्ता ही गलत है


जबकि सच्चाई यह होती है कि

रिश्ता अगले स्तर पर जा रहा होता है।


4. असफल होने का डर


पुरुषों की पहचान अक्सर इनसे जुड़ जाती है:


सफल होना


मजबूत रहना


नियंत्रण में रहना


जब रिश्ते में संघर्ष आता है,

तो वह इसे भावनात्मक चुनौती नहीं,

व्यक्तिगत असफलता मान लेते हैं।


और असफलता का सामना करने से बेहतर उन्हें लगता है:


दूरी बना लो


भावनाओं से कट जाओ


रिश्ता छोड़ दो


क्योंकि सामना करना

उन्हें कमज़ोर महसूस कराता है।


5. प्रेम को प्रयास नहीं, परिणाम समझ लेना


कई पुरुष मान लेते हैं:


अगर प्यार है, तो सब अपने आप ठीक रहेगा


जबकि सच यह है:


प्रेम एक कर्म है,

सिर्फ़ भावना नहीं।


रिश्ते निभाने के लिए:


सुनना पड़ता है


बदलना पड़ता है


अहं छोड़ना पड़ता हैं 


और ये चीज़ें

उन्हें कभी सिखाई ही नहीं गईं।


6. लेकिन यह “सभी पुरुष” नहीं हैं


यह कहना ज़रूरी है कुछ पुरुष:


गहराई से जुड़ते हैं


टिकते हैं


भावनात्मक रूप से परिपक्व होते हैं


अंतर यह नहीं कि वे डरते नहीं,

अंतर यह है कि उन्होंने:


अपने डर को पहचाना


भागने की बजाय सामना करना सीखा


समस्या पुरुष नहीं, परवरिश है


पुरुष प्रेम से नहीं भागता।

वह उस एहसास से भागता है कि 


“मुझे और बेहतर होना पड़ेगा।”


और उसे कभी यह नहीं सिखाया गया कि

बेहतर होना अपमान नहीं,

विकास है।


समाधान कहाँ है?


पुरुषों को भावनात्मक शिक्षा देना


यह सिखाना कि “मुझे समझ नहीं आ रहा” भी ईमानदारी है


रिश्तों को संघर्ष-मुक्त नहीं, संघर्ष-सक्षम बनाना


प्रेम को आसान नहीं, सार्थक मानना


क्योंकि

आसान रास्ता अकेला छोड़ देता है,

और कठिन रास्ता

साथ चलना सिखाता है।


राहुल कुमार झा ✒️✒️

रिश्तों में अच्छा दौर भी आता है और बुरा दौर भी

रिश्तों में अच्छा दौर भी आता है और बुरा दौर भी। 


एक इंसान अच्छे दौर की यादों को हर पल इस कदर सहेज कर रखता है कि जब बुरा दौर आता है तो वह सामने वाले कि अच्छाईयों को याद करके अपनी प्रतिक्रिया नियंत्रित कर लेता है और धैर्य से काम लेते हुए बुरे वक्त के बीतने के इंतज़ार करता है। क्योंकि उसे सामने वाले कि अच्छाईयां याद रहती है इसलिए वह इस सच से बखूबी वाकिफ होता है कि यह बुरा वक्त अस्थायी है। अच्छी यादों को सहेजना उसका अपना निरन्तर अभ्यास था और बुरे वक्त में उसका यही अभ्यास और अच्छी यादें उसे बुरे वक्त से निकालने में उसकी मदद करती है।


वहीं एक दूसरा इंसान हर पल कड़वी यादों को अपने अंदर सहेजता जाता है और जैसे ही बुरा वक्त आता है वो खुद पर नियंत्रण नही रख पाता और उन सब कड़वी यादों को दूसरे पर उड़ेल देता है इसी वजह से रिश्ते बद से बदतर हो जाते हैं। ऐसा लगता है मानो वह बरसों से ऐसे ही किसी वक़्त की तालाश में था और अब उसे वह मौका मिल गया। कड़वी यादों को सहेजना उसका निरन्तर अभ्यास था और बुरे वक्त में उसका यही अभ्यास और कड़वी यादें उसके लिए नुकसानदायक साबित होती है।


इन दोनों उदाहरण में हालात एक जैसे ही थे परन्तु दोनो के अभ्यास ने और उनकी आदतों ने बहुत बड़ा अंतर पैदा कर दिया। हम सभी की मन में हर पल अच्छे और बुरे दोनो तरह के विचार आते है और ऐसा हर किसी के साथ होता है। फर्क इस बात से पड़ता है कि हम ज्यादातर समय किस तरह के विचारों का अभ्यास करते है। हमारा यही अभ्यास बुरे हालतों में हमारी प्रतिक्रिया तय करता है। बुरे वक़्त के समय हमारी प्रतक्रिया आकस्मिक नही होती बल्कि हमारे गुज़रे समय के अभ्यास पर निर्भर करती है..

Friday, January 16, 2026

बुढ़ापा नापने का थर्मामीटर

 बुढ़ापा नापने का थर्मामीटर...???


1. दोस्त बुलाये पर, जानें का दिल न करे, 

     समझ लो बूढ़े हो गए।


2. नए कपड़े खरीदनें की,इच्छा कम 

    हो रही हो, तो समझना बूढ़े हो चले।


3. रेस्टोरेंट में खाना खाते वक़्त,

   घर के खाने की याद आने लगे,

     समझना बूढ़े हो चले।


4. बारिश हो रही हो और,पकौड़े की 

  जगह छाता याद आये,समझो बूढ़े हो चले।


5. हर बात पर युवाओं के,फैशन पर टिप्पणी   

     करनें लगे हो,समझना बूढ़े हो चले।


6. मौज-मस्ती वाली फिल्मों की आलोचना 

       करनें लगे हो तो,समझना बूढ़े हो चले।


7. मस्त-महफ़िल सजी हो और,

    उस दौरान मशवरा देने लग जाओ,

       तो समझना बूढ़े हो चले।


8. फूल पर गुनगुनाते भंवरे को देख,

       रोमांटिक गाना न याद आये,

         समझना बूढ़े हो चले।


9. बेफिक्री छोड़ सर पर चिंता, की टोकरी   

        उठा ली हो,समझना बूढ़े हो चले।


10. घर से बाहर नहीं निकलने के बहाने 

          बढ़ गए,तो समझो बूढ़े हो गए।


11. इस पोस्ट को पढ़ने के बाद वाह-वाह   

        करने की इच्छा नहीं है,

           तो समझो बूढ़े हो...😄😄

श्रीमद्भगवद्गीता

 श्रीमद्भगवद्गीता से जुड़ी जानकारी हिंदू धर्म में सबसे पवित्र धर्मग्रंथ गीता है। गीता से जुड़ा यदि कोई भी प्रश्न आपके मन में है, तो उसका जवाब आपको यहीं मिलेगा। इसे पढ़ने के बाद आप गीता के बारे में बहुत कुछ जान सकेंगे.


श्रीमद्भगवद्गीता में 18 अध्याय हैं और इसमें करीब 700 श्लोक हैंहरियाणा के कुरुक्षे‍त्र में जब यह ज्ञान दिया गया तब तिथि एकादशी थीमहाभारत के भीष्म पर्व में श्रीमद्भागवद्गगीता आती है हिंदू धर्म मे चार वेद हैं और इन चारों वेद का सार गीता में है। यही कारण है कि गीता को हिन्दुओं का सर्वमान्य एकमात्र धर्मग्रंथ माना गया है। माना जाता है कि गीता को स्पर्श करने के बाद इंसान झूठ नहीं बोलता है। भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को कुरुक्षेत्र में खड़े होकर गीता का ज्ञान दिया था और श्रीकृष्ण और अजुर्न संवाद के नाम से ही इसे जाना जाता है। भले ही गीता का ज्ञान भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन को दिया था, लेकिन अर्जुन के माध्यम से ही उन्होंने संपूर्ण जगत को यह ज्ञान दिया था।


श्रीकृष्ण के गुरु घोर अंगिरस थे दिया था और उन्होंने ही भगवान श्रीकृष्ण को सर्वप्रथम गीता का उपदेश दिया था और इसी उपदेश को भगवान ने अर्जुन को दिया था। गीता द्वापर युग में महाभारत के युद्ध के समय रणभूमि में किंकर्तव्यविमूढ़ अर्जुन को समझाने के लिए भगवान श्रीकृष्ण के द्वारा कही गई थी, लेकिन इस वचनामृत की प्रासंगिकता आज तक बनी हुई है। हममे से बहुत लोग गीता के बारे में केवल इतना ही जानते हैं कि ये एक धर्म ग्रंथ है, लेकिन गीता से जुड़ी कई बातें या रहस्य नहीं जाते हैं। तो चलिए आप आपको गीता से जुड़ी एक छोटी-बड़ी बात बताएं।


 सांसारिक वस्तुओं को त्याग ऐसे होगी ईश्वर की प्राप्ति, कृष्ण ने गीता में अर्जुन को दिखाया था मार्गजानें, गीता से जुड़ी कई रोचक और अनोखी बातें


गीता में कितने अध्याय और कितने श्लोक हैं श्रीमद्भगवद्गीता में 18 अध्याय हैं और इसमें करीब 700 श्लोक हैं। भागवत गीता महाभारत के 18 अध्यायों में से 1 भीष्म पर्व का हिस्सा भी है। गीता में वेदों का निचोड़ है। 


श्रीकृष्ण के मुख से अर्जुन के अलावा गीता किसने सुनी गीता को अर्जुन के अलावा भगवान श्रीकृष्ण के मुख से संजय ने सुना था और उन्होंने धृतराष्ट्र को सुनाया था। गीता में श्रीकृष्ण ने 574, अर्जुन ने 85, संजय ने 40 और धृतराष्ट्र ने 1 श्लोक कहा है।


भगवान ने गीता का ज्ञान अर्जुन को किस दिन और कितने मिनट दिया था ●* हरियाणा के कुरुक्षे‍त्र में जब यह ज्ञान दिया गया तब तिथि एकादशी थी। कलियुग के प्रारंभ होने के मात्र तीस वर्ष पहले इस ज्ञान को दिया गया था और संभवत: उस दिन रविवार था। कहते हैं कि उन्होंने यह ज्ञान लगभग 45 मिनट तक दिया था। इसलिए ही इस दिन गीता जयंती मनाई जाती है। प्रथम दिन का उपदेश प्रात: 8 से 9 बजे के बीच हुआ था।


गीता में क्या खास है गीता में भक्ति, ज्ञान और कर्म से जुड़ी कई ऐसे बातें बताई गईं है जो मनुष्य के लिए हर युग में महत्वपूर्ण हैं। गीता के प्रत्येक शब्द पर एक अलग ग्रंथ लिखा जा सकता है। गीता में सृष्टि उत्पत्ति, जीव विकास क्रम, हिन्दू संदेशवाहक क्रम, मानव उत्पत्ति, योग, धर्म-कर्म, ईश्वर, भगवान, देवी-देवता, उपासना, प्रार्थना, यम-नियम, राजनीति, युद्ध, मोक्ष, अंतरिक्ष, आकाश, धरती, संस्कार, वंश, कुल, नीति, अर्थ, पूर्वजन्म, प्रारब्ध, जीवन प्रबंधन, राष्ट्र निर्माण, आत्मा, कर्मसिद्धांत, त्रिगुण की संकल्पना, सभी प्राणियों में मैत्रीभाव आदि सभी की जानकारी है। गीता का मुख्य ज्ञान श्रेष्ठ मानव बनना, ईश्वर को समझना और मोक्ष की प्राप्ति है।


गीता कब लिखा गया श्रीमद्भागवद्गगीता आज से लगभग पांच हजार सत्तर साल (5070) पहले लिखी गई थी।


महाभारतके किस अध्याय में गीता है महाभारत के भीष्म पर्व में श्रीमद्भागवद्गगीता आती है। जब भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश श्रीकृष्ण को दे रहे थे तब समय रुक गया था।


गीता का संकलन किसने किया था गीता का संकलन किमहर्षि कृष्ण दैपायन व्यास ने गीता का संकलन किया था।


गीता की उत्पत्ति क्यों हुई महाभारत के भीष्म पर्व में श्रीमद्भागवद्गगीता आती है। जब भगवान श्रीकृष्ण गीता का उपदेश श्रीकृष्ण को दे रहे थे तब समय रुक गया था।


गीता का संकलन किसने किया था गीता का संकलन किमहर्षि कृष्ण दैपायन व्यास ने गीता का संकलन किया था।


गीता की उत्पत्ति क्यों हुई 

गीता की उत्पत्ति कौरव और पांडवों के युद्ध के समय कुुरुक्षेत्र में मानी जाती है। अर्जुन विशेष कर पितामह भीष्म से युद्ध करते समय मोह से घिर गए थे और यही कारण है की भगवान श्रीकृष्ण ने उन्हें गीता का ज्ञान दिया था। भगवान ने अर्जुन को ज्ञान देकर धर्म का पालन करने के लिए कहा था। जिसके बाद अर्जुन युद्ध के लिए तैयार हो


गया था और उसने धर्म की रक्षा के लिए युद्ध किया था।


गीता का नाम गीता क्यों पड़ा गीता का अर्थ है गीत। गीता शब्द का अर्थ है गीत और भगवद शब्द का अर्थ है भगवान, अक्सर भगवद गीता को भगवान का गीत कहा जाता है। यह भगवान का गीत है इसलिए गीता का नाम गीता ही पड़ा।


भगवत गीता में क्या लिखा है गीता में लिखा है, क्रोध से भ्रम पैदा होता है, भ्रम से बुद्धि व्यग्र होती है। जब बुद्धि व्यग्र होती है तब तर्क नष्ट हो जाता है और जब तर्क मरता है तो मनुष्य का विवेक नष्ट हो जाता है और उसका पतन शुरू हो जाता है। इस आधार पर कई ज्ञान और बुद्धि को खोलने वाली बातें लिखी हैं।


गीता में कितने योग है गीता में योग शब्द को अनेक अर्थ में प्रयोग किया गया है, परन्तु मुख्य रूप से गीता में ज्ञानयोग, कर्मयोग और भक्तियोग इन तीन योग मार्गों का विस्तृत रूप में वर्णन किया गया है।


गीता का पाठ कैसे करना चाहिए गीता का दसवां अध्याय कर्म की प्रधानता को इस भांति बताता है कि हर जातक को इसका अध्ययन करना चाहिए। कुंडली में लग्नेश 8 से 12 भाव तक सभी ग्रह होने पर ग्यारहवें अध्याय का पाठ करना चाहिए। बारहवां अध्याय भाव 5 व 9 तथा चंद्रमा प्रभावित होने पर उपयोगी है।


भागवत कथा कितने दिन का होता है सात दिवसीय श्रीमद् भागवत कथा ज्ञान यज्ञ कलश यात्रा के साथ शुरू होता है।


गीता में प्रत्येक अध्याय के नाम क्या है और इसमें कितने श्लोक हैं


 गीता का पहला अध्याय अर्जुन-विषाद योग है। इसमें 46 श्लोक हैं।

 

गीता के दूसरे अध्याय "सांख्य-योग" में कुल 72 श्लोक हैं।

 

गीता का तीसरा अध्याय कर्मयोग है, इसमें 43 श्लोक हैं।

 

ज्ञान कर्म संन्यास योग गीता का चौथा अध्याय है, जिसमें 42 श्लोक हैं।

 

कर्म संन्यास योग गीता का पांचवां अध्याय है, जिसमें 29 श्लोक हैं।

 

आत्मसंयम योग गीता का छठा अध्याय है, जिसमें 47 श्लोक हैं।

 

ज्ञानविज्ञान योग गीता का सातवां अध्याय है, जिसमें 30 श्लोक हैं।

 

गीता का आठवां अध्याय अक्षरब्रह्मयोग है, जिसमें 28 श्लोक हैं

 

राजविद्याराजगुह्य योग गीता का नवां अध्याय है, जिसमें 34 श्लोक हैं।

 

विभूति योग गीता का दसवां अध्याय है जिसमें 42 श्लोक हैं।

 

विश्वरूपदर्शन योग गीता का ग्यारहवां अध्याय है जिसमें 55 श्लोक है।

 

भक्ति योग गीता का बारहवां अध्याय है जिसमें 20 श्लोक हैं।

 

क्षेत्रक्षत्रज्ञविभाग योग गीता तेरहवां अध्याय है इसमें 35 श्लोक हैं।

 

गीता का चौदहवां अध्याय गुणत्रयविभाग योग है इसमें 27 श्लोक हैं।

 

गीता का पंद्रहवां अध्याय पुरुषोत्तम योग है, इसमें 20 श्लोक हैं।

 

दैवासुरसंपद्विभाग योग गीता का सोलहवां अध्याय है, इसमें 24 श्लोक हैं।

 

श्रद्धात्रयविभाग योग गीता का सत्रहवां अध्याय है, इसमें 28 श्लोक हैं।

 

मोक्ष-संन्यास योग गीता का अठारहवाँ अध्याय है, इसमें 78 श्लोक हैं।


तो गीता के से जुड़ी ये सामान्य जानकारियां हैं। उम्मीद है कि आपको गीता से जुड़े कई सवालों का जवाब मिल गया होगा।

संभोग और प्रेम ऊर्जा का धर्म

 संभोग और प्रेम ऊर्जा का धर्म


1. संभोग कोई नहीं करता — यह घटता है।

जैसे वृक्ष से फल गिरते हैं — सहज, स्वाभाविक।

तुम इसमें कर्ता नहीं, मात्र माध्यम हो।


2. प्रेम, तभी संभव है जब यौवन ऊर्जा में स्थिरता हो।

जो प्रेम जवानी में नहीं खिला — वह बुढ़ापे में सिर्फ़ पश्चाताप देता है।


3. संभोग प्राकृतिक वर्षा है।

नदियाँ स्वयं पानी नहीं बनातीं,

लेकिन उस वर्षा को मोड़ कर, बहा कर —

सिंचाई कर सकती हैं।

यह सृजनात्मकता है, यह प्रेम है।


4. ऊर्जा को ऊपर उठाना ही प्रेम है।

वही संभोग की शक्ति,

जब आंखों में उतरती है — वह करुणा बनती है।

जब हृदय में पिघलती है — वह प्रेम बनती है।

जब आत्मा में जलती है — वह समाधि बनती है।


5. बिना प्रेम के संभोग पशुता है,

और बिना ऊर्जा के प्रेम एक भ्रम।

प्रेम का मूल रस वहीं है —

जहां ऊर्जा बह रही है।


6. यौवन की ऊर्जा का सृजनात्मक धर्म यही है —

वह प्रेम में ढले,

संभोग से समाधि की दिशा ले।


7. बुढ़ापे का प्रेम अक्सर स्मृति है, स्वप्न है, पछतावा है।

वह रसहीन जल की तरह है

जो न तो प्यास बुझा सकता है,

न खेत सींच सकता है।


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हम "ऊर्जा का धर्म: संभोग से समाधि तक" शीर्षक से एक छोटा सूत्रग्रंथ आरंभ करते हैं —

जिसमें हर सूत्र जीवन की एक परत को खोले, और ऊर्जा की यात्रा को प्रेम, ध्यान, और मुक्ति तक ले जाए।


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ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक


(सूत्रग्रंथ - भाग 1)


प्रारंभिक सूत्र : ऊर्जा की प्रकृति और दिशा


1.

ऊर्जा बह रही है — यही जीवन है।

जहां बहाव रुका, वहां मृत्यु शुरू।


2.

संभोग ऊर्जा का गिरना है — नीचे की ओर।

समाधि ऊर्जा का उठना है — ऊर्ध्वगामी।


3.

संभोग में देह सक्रिय है, चेतना सुप्त।

समाधि में देह शांत है, चेतना प्रज्वलित।


4.

संभोग स्वाभाविक है, प्रेम सृजन है।

प्रेम पैदा होता है — जब संभोग में होश जुड़ता है।


5.

यौवन की आग — या तो शरीर जलाएगी या आत्मा को।

चुनाव तुम्हारा है।


6.

जब तुम कहते हो: "मैं कर रहा हूँ",

तब तुम अहंकार में हो।

संभोग तब पशुता है।

जब तुम होश में हो, "हो रहा है" —

तब वही संभोग ध्यान है।


7.

संभोग अनिवार्य नहीं है — ऊर्जा है अनिवार्य।

संभोग तो माध्यम है,

ऊर्जा का धर्म खोजो।


8.

देह मिटेगी, शक्ति बुझेगी —

प्रेम तब संभव नहीं,

प्रेम एक पुष्प है — यौवन की शाखा पर।


9.

ऊर्जा एक बीज है — बीज को खा सकते हो,

या रोप सकते हो।

संभोग भोजन है, प्रेम बाग़वानी।


10.

संभोग में दो देहें मिलती हैं,

प्रेम में दो आत्माएं पिघलती हैं।

ध्यान में सब कुछ विलीन हो जाता है।


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यह भाग 1 है — “ऊर्जा की प्रकृति और दिशा”।

यदि आप चाहें, तो अगला भाग हम "संभोग से प्रेम तक" और फिर "प्रेम से ध्यान तक" की ओर बढ़ाते हैं।


अब हम सूत्रग्रंथ का भाग 2 प्रस्तुत करते हैं —

जहाँ ऊर्जा की यात्रा संभोग से प्रेम तक की ओर बढ़ती है।

यह वह मोड़ है जहाँ शरीर का आकर्षण — आत्मा के स्पर्श में रूपांतरित होता है।


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ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक


भाग 2 : संभोग से प्रेम तक


11.

जहाँ केवल शरीर है — वहां वासना है।

जहाँ हृदय जुड़ता है — वहां प्रेम अंकुरित होता है।


12.

वासना खींचती है, प्रेम बहाता है।

वासना लोभी है, प्रेम दाता है।


13.

जब तुम दूसरे को 'भोग' नहीं, 'भाव' से देखो —

तब प्रेम जन्म लेता है।


14.

प्रेम कोई क्रिया नहीं — एक उपस्थिति है।

वह घटता है, जब भीतर मौन होता है।


15.

संभोग में तुम पा लेना चाहते हो।

प्रेम में तुम खो देना चाहते हो।

संभोग संग्रह है, प्रेम विसर्जन।


16.

संभोग प्यास है — प्रेम झरना है।

प्यास से निकलो, झरना बनो।


17.

यदि तुम सिर्फ़ कामना हो — तुम भीड़ हो।

यदि तुम प्रेम हो — तुम ब्रह्मा हो।


18.

संभोग में तुम एक दूसरे से टकराते हो।

प्रेम में तुम एक दूसरे में समा जाते हो।


19.

जहाँ कुछ साबित करना है — वह संभोग है।

जहाँ कुछ भी साबित नहीं करना — वह प्रेम है।


20.

संभोग का अंतिम फूल — प्रेम है।

लेकिन वह तभी खिलेगा

जब तुम भीतर की धूप लाओगे —

होश की, करुणा की, मौन की।


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अब हम अगले चरण की ओर बढ़ सकते हैं:


भाग 3: प्रेम से ध्यान तक


जहाँ प्रेम भी विलीन हो जाए — और केवल "अस्तित्व" रह जाए।

अब हम प्रवेश करते हैं ऊर्जा के धर्म के अंतिम और गहनतम चरण में —

जहाँ प्रेम भी पिघल जाता है और शेष रह जाता है मौन, शुद्ध दृष्टा — ध्यान।


यह वह भूमि है जहाँ संभोग से जन्मी ऊर्जा, प्रेम से परिपक्व होकर, ध्यान में पूर्ण हो जाती है।


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ऊर्जा का धर्म – संभोग से समाधि तक


भाग 3 : प्रेम से ध्यान तक


21.

प्रेम दो के बीच का पुल है।

ध्यान उस पुल से भी पार — एकांत की परम ऊँचाई है।


22.

प्रेम में ‘तू’ है, ध्यान में केवल ‘मैं नहीं’ है।

प्रेम बाँधता भी है, ध्यान तोड़ देता है — सब सीमाएँ।


23.

प्रेम में तुम पिघलते हो, ध्यान में तुम लुप्त हो जाते हो।

जो शून्य में स्थिर हो — वही ध्यान है।


24.

ध्यान वह प्रेम है जिसमें कोई चाह नहीं बचती।

न मिलने की, न छूने की, न कहने की।

केवल होने की — पूर्णता।


25.

प्रेम ने तुमसे 'दूसरा' छीना, ध्यान तुमसे 'तुम' को छीन लेता है।

जो बचता है, वह ब्रह्म है।


26.

जहाँ प्रेम मौन में बैठता है, वहां ध्यान जागता है।

जहाँ शब्द मरते हैं, वहां ध्यान जन्मता है।


27.

प्रेम आँखें बंद करता है — आलिंगन में।

ध्यान आँखें खोल देता है — समष्टि को देखने में।


28.

प्रेम ‘अहं’ को गलाता है, ध्यान उसे पूरी तरह विसर्जित कर देता है।

ध्यान ‘मैं’ का मृत्यु पर्व है।


29.

ध्यान कोई अभ्यास नहीं — एक विसर्जन है।

जहाँ कुछ करने को न बचे — वहीं ध्यान घटता है।


30.

जिस दिन तुम बिना प्रेम के प्रेम कर सको,

बिना संज्ञा के प्रेम में स्थिर रह सको —

उस दिन तुम ध्यान में प्रवेश कर चुके हो।


यहाँ "ऊर्जा का धर्म" पूर्ण होता है।


संभोग से प्रेम, और प्रेम से ध्यान — यही साधना की पूर्ण यात्रा है।

कुछ महत्वपूर्ण ज्ञान

विश्‍व प्रसिद्ध संवाद जिन्हें पढ़कर या सुनकर लाखों लोगों का जीवन बदल गया है और जिन्हें पढ़कर दुनियाभर के राजनीतिज्ञ, नीतिज्ञ, वैज्ञानिक, आध्यामिक और दार्शनिकों ने अपना एक अलग ही धर्म, दर्शन, नीति और विज्ञान का सिद्धांत गढ़ा।

 

       " पहला संवाद, अष्टावक्र और जनक संवाद "


अष्टावक्र दुनिया के प्रथम ऐसे व्यक्ति थे जिन्होंने सत्य को जैसा जाना वैसा कह दिया। न वे कवि थे और न ही दार्शनिक। चाहे वे ब्राह्मणों के शास्त्र हों या श्रमणों के, उन्हें दुनिया के किसी भी शास्त्र में कोई रुचि नहीं थी। उनका मानना था कि सत्य शास्त्रों में नहीं लिखा है। शास्त्रों में तो सिद्धांत और नियम हैं, सत्य नहीं, ज्ञान नहीं। ज्ञान तो तुम्हारे भीतर है।


अष्टावक्र ने जो कहा वह 'अष्टावक्र गीता' नाम से प्रसिद्ध है। राजा जनक ने अष्टावक्र को अपना गुरु माना था। राजा जनक और अष्टावक्र के बीच जो संवाद हुआ उसे 'अष्टावक्र गीता' के नाम से जाना जाता है।

 

        " दूसरा संवाद, श्रीकृष्ण-अर्जुन संवाद "


हिन्दू धर्म के एकमात्र धर्मग्रंथ है वेद। वेदों के चार भाग हैं- ऋग, यजु, साम और अथर्व। वेदों के सार को उपनिषद कहते हैं और उपनिषदों का सार या निचोड़ गीता में हैं। उपनिषदों की संख्या 1000 से अधिक है उसमें भी 108 प्रमुख हैं। गीता के ज्ञान को भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कुरुक्षेत्र में खड़े होकर दिया था। यह श्रीकृष्‍ण-अर्जुन संवाद नाम से विख्‍यात है।


किसी के पास इतना समय नहीं है कि वह वेद या उपनिषद पढ़ें उनके लिए गीता ही सबसे उत्तम धर्मग्रंथ है। महाभारत के 18 अध्याय में से एक भीष्म पर्व का हिस्सा है गीता। गीता को अच्‍छे से समझने से ही आपकी समझ में बदलाव आ जाएगा। धर्म, कर्म, योग, सृष्टि, युद्ध, जीवन, संसार आदि की जानकारी हो जाएगी। सही और गलत की पहचान होने लगेगी। तब आपके दिमाग में स्पष्टता होगी द्वंद्व नहीं। जिसने गीता नहीं पढ़ी वह हिन्दू धर्म के बारे में हमेशा गफलत में ही रहेगा।

 

श्रीकृष्ण के गुरु घोर अंगिरस थे। घोर अंगिरस ने देवकी पुत्र कृष्ण को जो उपदेश दिया था वही उपदेश कृष्ण गीता में अर्जुन को देते हैं। छांदोग्य उपनिषद में उल्लेख मिलता है कि देवकी पुत्र कृष्‍ण घोर अंगिरस के शिष्य हैं और वे गुरु से ऐसा ज्ञान अर्जित करते हैं जिससे फिर कुछ भी ज्ञातव्य नहीं रह जाता है।

 

         " तीसरा संवाद, यक्ष-युद्धिष्ठिर संवाद "


यक्ष और युद्धिष्ठिर के बीच हुए संवाद को यक्ष प्रश्न कहा जाता है। यक्ष और युधिष्ठिर के बीच जो संवाद हुआ है उसे जानने के बाद आप जरूर हैरान रह जाएंगे। यह अध्यात्म, दर्शन और धर्म से जुड़े प्रश्न ही नहीं है, यह आपकी जिंदगी से जुड़े प्रश्न भी है। आप भी अपने जीवन में कुछ प्रश्नों के उत्तर ढूंढ ही रहे होंगे।


भारतीय इतिहास ग्रंथ महाभारत में ‘यक्ष-युधिष्ठिर संवाद’ नाम से एक बहु चर्चित प्रकरण है। संवाद का विस्तृत वर्णन वनपर्व के अध्याय 312 एवं 313 में दिया गया है। यक्ष ने युद्धिष्ठिर से लगभग 124 सवाल किए थे। यक्ष ने सवालों की झड़ी लगाकर युधिष्ठिर की परीक्षा ली। अनेकों प्रकार के प्रश्न उनके सामने रखे और उत्तरों से संतुष्ट हुए। अंत में यक्ष ने चार प्रश्न युधिष्ठिर के समक्ष रखे जिनका उत्तर देने के बाद ही उन्होंने मृत पांडवों (अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव) को जिंदा कर दिया था। यह सवाल जीवन, संसार, सृष्टि, ईश्‍वर, प्रकृति, नीति, ज्ञान, धर्म, स्त्री, बुराई आदि अनेकों विषयों के संबंधित थे।

 

      " चौथा संवाद, लक्ष्मण और रावण संवाद "


प्रभु श्रीराम के तीर से जब रावण मरणासन्न अवस्था में हो गया, तब श्रीराम ने लक्ष्मण से उसके पास जाकर शिक्षा लेने को कहा। श्रीराम की यह बात सुनकर लक्ष्मण चकित रह गए।

 

भगवान श्रीराम ने लक्ष्‍मण से कहा कि इस संसार में नीति, राजनीति और शक्ति का महान पंडित रावण अब विदा हो रहा है, तुम उसके पास जाओ और उससे जीवन की कुछ ऐसी शिक्षा ले लो जो और कोई नहीं दे सकता।

 

श्रीराम की बात मानकर लक्ष्मण मरणासन्न अवस्था में पड़े रावण के नजदीक सिर के पास जाकर खड़े हो गए, लेकिन रावण ने कुछ नहीं कहा। लक्ष्मण ने लौटकर प्रभु श्रीराम से कहा कि वे तो कुछ बोलते ही नहीं। तब श्रीराम ने कहा यदि किसी से ज्ञान प्राप्त करना है तो उसके चरणों के पास हाथ जोड़कर खड़े होना चाहिए, न कि सिर के पास। श्रीराम ने लक्ष्मण से कहा, जाओ और रावण के चरणों के पास बैठो। यह बात सुनकर लक्ष्मण इस बार रावण के चरणों में जाकर बैठ गए। रावण ने लक्ष्मण को जो सीख दी उसे सभी जानते हैं।

 

 " पांचवां संवाद, अंगद और रावण के बीच संवाद "


 गोस्वामी तुलसीदास कृत महाकाव्य श्रीरामचरितमानस के लंकाकांड में बालि पुत्र अंगद रावण की सभा में रावण को सीख देते हुए बताते हैं कि कौन-से ऐसे 14 दुर्गुण है जिसके होने से मनुष्य मृतक के समान माना जाता है।


अंगद-रावण के बीच जो संवाद हुआ था वह बहुत ही रोचक था उसे पढ़ने और उसकी व्याख्या जानेने से व्यक्ति को अपने जीवन की स्थिति के बारे में बहुत कुछ ज्ञान हो जाता है।

 

       " छठा संवाद, यमराज-नचिकेता संवाद "


वाजश्रवसपुत्र नचिकेता और मृत्यु के देवता यमराज के बीच जो संवाद होता है वह विश्‍व का प्रथम दार्शनिक संवाद माना जा सकता है। वाजश्रवस अपने पुत्र को क्रोधवा यमराज को दान कर देते हैं। नचिकेता तब यमलोक पहुंच जाते हैं।

 

यमलोक में उसे वक्त यमदूत नचिकेता से कहते हैं कि यमराज इस वक्त नहीं है। तब नचिकेता तीन दिन तक यमराज की प्रतिक्षा करते हैं। यमपुरी के द्वार पर बैठा नचिकेता बीती बातें सोच रहा था। उसे इस बात का संतोष था कि वह पिता की आज्ञा का पालन कर रहा था। लगातार तीन दिन तक वह यमपुरी के बाहर बैठा यमराज की प्रतीक्षा करता रहा। तीसरे दिन जब यमराज आए तो वे नचिकेता को देखकर चौंके।

 

जब उन्हें उसके बारे में मालूम हुआ तो वे भी आश्चर्यचकित रह गए। अंत में उन्होंने नचिकेता को

अपने कक्ष में बुला भेजा। यमराज के कक्ष में पहुंचते ही नचिकेता ने उन्हें प्रणाम किया। उस समय उसके चेहरे पर अपूर्व तेज था। उसे देखकर यमराज बोले- 'वत्स, मैं तुम्हारी पितृभक्ति और दृढ़ निश्चय से बहुत प्रसन्न हुआ। तुम मुझसे कोई भी तीन वरदान मांग सकते हो।'

 

       " सातवां संवाद, शिव-पार्वती संवाद "


रामायण या रामचरित के बालकांड में शिव-पार्वती संवाद का वर्णन मिलता है। 'गायत्री-मंजरी' में भी 'शिव-पार्वती संवाद' आता है। हम इस संवाद की बात नहीं कर रहे हैं। भारत के कश्मीर राज्य में अमरनाथ नामक गुफा है जहां जून माह में बाबा अमरनाथ के दर्शन करने के लिए हजारों हिन्दू जाते हैं। दरअसल, यह गुफा शिव और पार्वती संवाद की साक्षी है। यहां भगवान शिव ने माता पार्वती को 'रहस्यमयी ज्ञान' की शिक्षा दी थी। इस ज्ञान को विज्ञान भैरव तंत्र में संग्रहित किया गया है। 

 

शिव ने अपनी अर्धांगिनी पार्वती को मोक्ष हेतु अमरनाथ की गुफा में जो ज्ञान दिया, उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

 

अमरनाथ के अमृत वचन शिव द्वारा मां पार्वती को जो ज्ञान दिया गया, वह बहुत ही गूढ़-गंभीर तथा रहस्य से भरा ज्ञान था। उस ज्ञान की आज अनेकानेक शाखाएं हो चली हैं। वह ज्ञानयोग और तंत्र के मूल सूत्रों में शामिल है। ‘विज्ञान भैरव तंत्र’ एक ऐसा ग्रंथ है जिसमें भगवान शिव द्वारा पार्वती को बताए गए 112 ध्यान सूत्रों का संकलन है।

 

योगशास्त्र के प्रवर्तक भगवान शिव के ‘‍विज्ञान भैरव तंत्र’ और ‘शिव संहिता’ में उनकी संपूर्ण शिक्षा और दीक्षा समाई हुई है। तंत्र के अनेक ग्रंथों में उनकी शिक्षा का विस्तार हुआ है। भगवान शिव के योग को तंत्र या वामयोग कहते हैं। इसी की एक शाखा हठयोग की है। भगवान शिव कहते हैं,,,,,, 


‘वामो मार्ग: परमगहनो योगितामप्यगम्य:’ अर्थात वाम मार्ग अत्यंत गहन है और योगियों के लिए भी अगम्य है। -मेरुतंत्र

 

   " आठवां संवाद, याज्ञवल्क्यजी-गार्गी संवाद "


वृहदारण्यक उपनिषद् में दोनों के बीच हुए संवाद का उल्लेख मिलता है। राजा जनक अपने राज्य में शास्त्रार्थ का आयोजन करते रहते थे। जो भी शास्त्रार्थ में जीत जाता था वह सोने से लदी गाएं ले जाता था। एक बार के आयोजन में याज्ञवल्क्यजी को भी निमंत्रण मिला था। तब याज्ञवल्क्यजी ने शास्त्रार्थ से पहले ही अपने एक शिष्य से कहा- बेटा! इन गौओं को अपने यहां हांक ले चलो।

 

ऐसे में सभी ऋषि क्रुद्ध होकर उनसे शास्त्रार्थ करने लगे। याज्ञवल्क्यजी ने सबके प्रश्नों का यथाविधि उत्तर दिया और सभी को संतुष्ट कर दिया। उस सभा में ब्रह्मवादिनी गार्गी भी बुलायी गयी थी। सबके पश्चात् याज्ञवल्क्यजी से शास्त्रार्थ करने वे उठी। दोनों के बीच जो शास्त्रार्थ हुआ। गार्गी ने याज्ञवल्क्यजी से कई प्रश्न किए। अंत में याज्ञवल्क्य ने कहा- गार्गी! अब इससे आगे मत पूछो। इसके बाद महर्षि याज्ञवक्ल्यजी ने यथार्थ सुख वेदान्ततत्त्‍‌व समझाया, जिसे सुनकर गार्गी परम सन्तुष्ट हुई और सब ऋषियों से बोली-भगवन्! याज्ञवल्क्य यथार्थ में सच्चे ब्रह्मज्ञानी हैं। गौएं ले जाने का जो उन्होंने साहस किया वह उचित ही था।

 

   " नौवां संवाद, काक भुशुण्डी-गरुड़जी संवाद "


काक भुशुण्‍डी ने पक्षीराज गरुड़जी को राम की कथा पहले ही सुना दी थी। इसका वर्णन हमें रामायण और रामचरित मानस में मिलता है। शिवजी माता पार्वती से कहते हैं कि इससे पहले यह सुंदर कथा काक भुशुण्डी ने गरुड़जी से कही थी। रामचरित मानस में काकभुशुण्डी ने अपने जन्म की पूर्वकथा और कलि महिमा का वर्णन किया है। इसका उल्लेख रामचरित मानस में मिलता है।


नारदजी की आज्ञा से जब भगवान राम को नागपाश से छुड़ाकर गरुड़जी पुन: अपने धाम लौट रहे होते हैं तब उनके मन में शंका उत्पन्न होती है कि यह कैसे भगवान जो एक तुच्छ राक्षस द्वारा फेंके गए नागपाश से ही बंध गए? इस शंका समाधान के लिए वे नारद से पूछते हैं। नारदजी उन्हें ब्रह्मा के पास भेज देते हैं। ब्रह्माजी उन्हें शिवजी के पास भेज देते हैं। तब शिवजी ने कहा भगवान की माया बताना मुश्‍किल है। एक पक्षी ही एक पक्षी को समझा सकता है अत: तुम काक भिशुण्डी के पास जाओ। काक भुशुण्डी और गरुड़जी के बीच जो संवाद होता है वह अतुलनीय है।

 

        " दसवां संवाद, युधिष्ठिर-भीष्म संवाद "


अंतिम वक्त में पितामह भीष्म ने युधिष्ठिर को समझाया धर्म का मर्म। क्या कहा भीष्म ने युधिष्ठिर से जब वे तीरों की शैया पर लेटे हुए थे? 

 

भीष्म यद्यपि शरशय्या पर पड़े हुए थे फिर भी उन्होंने श्रीकृष्ण के कहने से युद्ध के बाद युधिष्ठिर का शोक दूर करने के लिए राजधर्म, मोक्षधर्म और आपद्धर्म आदि का मूल्यवान उपदेश बड़े विस्तार के साथ दिया। इस उपदेश को सुनने से युधिष्ठिर के मन से ग्लानि और पश्‍चाताप दूर हो जाता है। यह उपदेश महाभारत के भीष्मस्वर्गारोहण पर्व में मिलता है।

 

        " ग्यारहवां संवाद, धृतराष्ट्र-विदुर संवाद "


महाभारत’ की कथा के महत्वपूर्ण पात्र विदुर को कौरव-वंश की गाथा में विशेष स्थान प्राप्त है। विदुर हस्तिनापुर राज्‍य के शीर्ष स्‍तंभों में से एक अत्‍यंत नीतिपूर्ण, न्यायोचित सलाह देने वाले माने गए है।

 

हिन्दू ग्रंथों में दिए जीवन-जगत के व्यवहार में राजा और प्रजा के दायित्वों की विधिवत नीति की व्याख्या करने वाले महापुरुषों में महात्मा विदुर सुविख्यात हैं। उनकी विदुर-नीति वास्तव में महाभारत युद्ध से पूर्व युद्ध के परिणाम के प्रति शंकित हस्तिनापुर के महाराज धृतराष्ट्र के साथ उनका संवाद है।

 

वास्तव में महर्षि वेदव्यास रचित ‘महाभारत’ का उद्योग पर्व ‘विदुर नीति’ के रूप में वर्णित है। महाभारत में एक और जहां महत्वपूर्ण कृष्ण अर्जुन संवाद, यक्ष युधिष्‍ठिर संवाद, धृतराष्ट्र संजय संवाद, भीष्म युद्धिष्ठिर संवाद है तो दूसरी और धृतराष्ट और विदूर का महत्वपूर्ण संवाद भी वर्णित है। प्रत्येक हिन्दू को महाभारत पढ़ना चाहिए। इस घर में भी रखना चाहिए। जो यह कहता है कि महाभारत घर में रखने से महाभारत होती है वह मूर्ख, अज्ञानी या धूर्त व्यक्ति हिन्दुओं को अपने धर्म से दूर रखना चाहता होगा।

 

" बारहवां संवाद, आदि शंकराचार्य-मंडन मिश्र संवाद "


 आदि शंकराचार्य देशभर के साधु-संतों और विद्वानों से शास्त्रार्थ करते करते अंत में प्रसिद्ध विद्वान मंडन मिश्र के गांव पहुंचे थे। यहां उन्होंने 42 दिनों तक लगातार हुए शास्त्रार्थ किया जिसकी निर्णायक थीं मंडन मिश्र की पत्नी भारती। 


आदि शंकराचार्य और मंडन मिश्र के बीच जो संवाद हुआ उस संवाद की बहुत चर्चा होती है। हालांकि आदि शंकराचार्य ने मंडन को पराजित कर तो दिया, पर उनकी पत्नी के एक सवाल का जवाब नहीं दे पाए और अपनी हार मान ली।


हालांकि उपरोक्त के अलावा भी और भी हैं लेकिन यहां कुछ प्रमुख ही प्रस्तुत किए गए हैं।



Raj sir Words




दोस्तों...सब्र इंसान के लिए सबसे ज़रूरी होता है,क्योंकि सब्र ही वो ताक़त है जो इंसान को टूटने से बचाती है हर कोई दर्द सह सकता है,लेकिन बिना शिकायत उसे जीना ये सिर्फ़ सब्र सिखाता है,सब्र मतलब चुप रहना नहीं,सब्र मतलब हालात को समझकर ख़ुद को संभालना है. याद रहे संघर्ष में आप अनाथ हो काफ़िला तो सफ़लता के बाद उमड़ता है...नाराज़ होना और रुठना रिश्तों में बहुत अहम है मगर हमारे बिना किसी की जिंदगी ठहर जाएगी ये सोचना वहम है. तुम बस अपने चरित्र और कर्म पवित्र रखना साथ देने की जिम्मेदारी उस खुदा का है. मेहनत का फल, समस्याओं का हल और आने वाला कल सब ईश्वर के हाथ में है...but कुछ आपके हाथ में भी है वो है Believe your strength & Believe in yourself...you can get anything on base of your will & talent...नियत से भगवान खुश होते हैं,और दिखावे से इंसान यह आप पर निर्भर है कि आप किसे प्रसन्न करना चाहते हैं.परिवार आवश्यक है, मित्रता आवश्यक है, संबंध भी आवश्यक है लेकिन जीवन की हर कठिन परिस्थिति यह दर्शाती है कि अकेले रहने की कला का आना भी बहुत आवश्यक है। रिश्ते सब ज़रूरी हैं पर मुश्किल घड़ी सिखाती है कि अकेले रहने का हुनर लाज़मी है। खुद की सोहबत में जीना ही सबसे बड़ी और सच्ची ताक़त है...सबका सबके बिना काम चल जाता हैं,आप भ्रम में हैं कि आप किसी के ख़ास हैं...सब कुछ सीख लेना ही समझदारी नहीं है, बहुत कुछ नजरंदाज़ करना भी समझदारी है.जब जेब खाली हो बैंक अकाउंट माइनस में हो, और नौकरी न हो तब जो साथ खड़ा हो वो सगा हैं...शब्द और व्यवहार ही मनुष्य की असली पहचान है. चेहरा और हैसियत का क्या है आज है कल नहीं है.याद रहे जिंदगी के मेहंगे सबक सस्ते लोग ही सिखाते है...शब्दों में दयालुता विश्वास उत्पन्न करती है, विचारों में दयालुता प्रगाढ़ता उत्पन्न करती है, बांटने में दयालुता प्रेम उत्पन्न करती है. अंत ही आरंभ है, वासना ही मोह है, इच्छा ही लालच है, समझ ही ज्ञान है, अपेक्षाएँ ही दुःख हैं और एकांत ही सुख है दोस्तों...Raj Sir


मेरे किस्से का हर किरदार गद्दार निकला...


दोस्त जिस्म पर हक मिल जाते है रीति रिवाजों से,मगर ये रूह जिसकी दीवानी है मोहब्बत उसे कहते है...परवरिश पर दाग़ ना लगे इसलिए शांत हो गए,वर्ना तुम्हें एहसास करवाते कि बरबादी होती कैसी है दोस्त...हम तो बिखर जाने के ख्याल से भी डरते थे, पर तुमने बहुत बुरे तरह से मुझे तोड़ दिया दोस्त... बदुआ देना मेरे बस की बात नही दोस्त,पर हा ऐ जरूर कहूंगा हर हसीन हसीना बेवफा होती...जिसपर आपना अधिकार ही ना हो, उसका मोह करना मानसिक पीड़ा को न्योता देना है दोस्त...किसी के पास बहुत कुछ है खुदा का दिया,किसी के पास सिवाए खुदा के कुछ भी नहीं दोस्त...सब कुछ नहीं मिलता इस जिंदगी में, कुछ चीजें मुस्कुराते हुए छोड़ देनी चाहिए दोस्त...रफ़्ता-रफ़्ता ही सीखी हैं दुनियादारी मैंने,वरना हम भी कसम खाने वालों को सच मानते थे दोस्त...बेवजह दिवार पर इल्ज़ाम है बंटवारे का,वर्ना कई लोग एक कमरे में भी अलग रहते है दोस्त...यूं ही नहीं त्यागा मैंने दुनिया का मोह,मेरे किस्से का हर किरदार गद्दार निकला है दोस्त...उस हर एक व्यक्ति का शुक्रिया जिसने मुझे, ये एहसास कराया की कोई किसी का नहीं होता दोस्त...क्या हुआ जो तुम मुझसे दूर हो दोस्त,मेरे ज़हन और जिगर में तो तुम हर पल हो...मैंने रातों को जागकर देखा है,सुबह होने में कई साल लगते हैं दोस्त...कितने श्रेष्ठ होते है वो लोग जो स्वयं को,संपूर्ण समर्पित कर देते है किसी के प्रेम के प्रति दोस्त...सब priority का खेल है दोस्त,कोई सोफे में बैठकर reply नहीं दे पता तो कोई चलती बाइक पे reply देता है...मोहब्बत उस बला का नाम है जिसके शुरुआत में, मन मे तितलियां उड़ती है और अंत अरमानो की धज्जियां दोस्त...मोहब्बत सिर्फ मोहब्बत चाहती है,किसी की मेहरबानी या हमदर्दी नहीं दोस्त...कुछ लोग शकुनी की तरह होते हैं,हंसते हमारे साथ हैं पर खेलते हमारे खिलाफ है दोस्त...इश्क वो भी करते हैं,जिनकी मुलाकाते नही होती दोस्त...हमारा वक्त कैसा भी रहे रक्त में हमेशा वफादारी रहेगी दोस्त...घावों के ठीक हो जाने से हादसे नहीं भूले जाते दोस्त...लगाव बर्बाद कर देता है अकेले रहना ही बेहतर है दोस्त...हीरा परखने वाले से ज़्यादा पीड़ा परखने वाला बहुत महत्वपुर्ण होता है दोस्त...हवस और धन की चाह ना हो तो प्रेम आज भी अत्यंत सरल है दोस्त...प्रेम को समझने के लिए हृदय चाहिए,निभाने के लिए धेर्य और पाने के लिए सौभाग्य दोस्त...प्रेम में धैर्य इतना हो कि तुम बिन ये उम्र गुजार दूं दोस्त,और व्याकुलता इतनी कि तुम बिन एक पल भी न गुजरे...राज


तुम्हारी यादें

सुबह आँख खुलती है

तो सबसे पहले बदन थकान माँगता है,

नींद पूरी होती है

पर आराम नहीं उतरता।

छाती भारी रहती है,

जैसे रात भर

किसी ने भीतर

तुम्हारा नाम रख छोड़ा हो।

कंधे झुके रहते हैं,

किसी बोझ से नहीं,

किसी कमी से।

हाथ खाली हैं

पर हथेलियाँ

कुछ पकड़े रहने की

आदत नहीं छोड़तीं।

रीढ़ में एक खिंचाव रहता है,

हर क़दम पर

थोड़ा-सा दर्द खिसकता है,

जैसे चलना नहीं,

अपने आप को

ढो रहा हूँ।

पेट भूख नहीं बताता,

वो बस जलन देता है

ऐसी जलन

जो खाने से नहीं बुझती।

हर कौर

सीधा गले से नहीं उतरता,

कुछ हिस्सा

सीने में अटक जाता है।

साँसें पूरी आती हैं,

पर सही जगह नहीं पहुँचतीं।

फेफड़े काम करते हैं,

मगर दिल को

हवा नहीं मिलती।

रात को लेटता हूँ

तो बदन

आराम की स्थिति में होता है,

पर भीतर

कुछ लगातार जागता रहता है

जाँघों में जकड़न,

पैरों में झनझनाहट,

और आँखों के पीछे

एक जलता हुआ खालीपन।

तुम्हारी याद

अब सोच नहीं रही।

वो नसों में दौड़ती है,

हड्डियों से टकराती है,

और हर सुबह

मुझे पूरे शरीर के साथ

तुम्हारे बिना

उठने पर मजबूर करती है।