Saturday, January 17, 2026

रिश्तों में अच्छा दौर भी आता है और बुरा दौर भी

रिश्तों में अच्छा दौर भी आता है और बुरा दौर भी। 


एक इंसान अच्छे दौर की यादों को हर पल इस कदर सहेज कर रखता है कि जब बुरा दौर आता है तो वह सामने वाले कि अच्छाईयों को याद करके अपनी प्रतिक्रिया नियंत्रित कर लेता है और धैर्य से काम लेते हुए बुरे वक्त के बीतने के इंतज़ार करता है। क्योंकि उसे सामने वाले कि अच्छाईयां याद रहती है इसलिए वह इस सच से बखूबी वाकिफ होता है कि यह बुरा वक्त अस्थायी है। अच्छी यादों को सहेजना उसका अपना निरन्तर अभ्यास था और बुरे वक्त में उसका यही अभ्यास और अच्छी यादें उसे बुरे वक्त से निकालने में उसकी मदद करती है।


वहीं एक दूसरा इंसान हर पल कड़वी यादों को अपने अंदर सहेजता जाता है और जैसे ही बुरा वक्त आता है वो खुद पर नियंत्रण नही रख पाता और उन सब कड़वी यादों को दूसरे पर उड़ेल देता है इसी वजह से रिश्ते बद से बदतर हो जाते हैं। ऐसा लगता है मानो वह बरसों से ऐसे ही किसी वक़्त की तालाश में था और अब उसे वह मौका मिल गया। कड़वी यादों को सहेजना उसका निरन्तर अभ्यास था और बुरे वक्त में उसका यही अभ्यास और कड़वी यादें उसके लिए नुकसानदायक साबित होती है।


इन दोनों उदाहरण में हालात एक जैसे ही थे परन्तु दोनो के अभ्यास ने और उनकी आदतों ने बहुत बड़ा अंतर पैदा कर दिया। हम सभी की मन में हर पल अच्छे और बुरे दोनो तरह के विचार आते है और ऐसा हर किसी के साथ होता है। फर्क इस बात से पड़ता है कि हम ज्यादातर समय किस तरह के विचारों का अभ्यास करते है। हमारा यही अभ्यास बुरे हालतों में हमारी प्रतिक्रिया तय करता है। बुरे वक़्त के समय हमारी प्रतक्रिया आकस्मिक नही होती बल्कि हमारे गुज़रे समय के अभ्यास पर निर्भर करती है..

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