Friday, January 16, 2026

तुम्हारी यादें

सुबह आँख खुलती है

तो सबसे पहले बदन थकान माँगता है,

नींद पूरी होती है

पर आराम नहीं उतरता।

छाती भारी रहती है,

जैसे रात भर

किसी ने भीतर

तुम्हारा नाम रख छोड़ा हो।

कंधे झुके रहते हैं,

किसी बोझ से नहीं,

किसी कमी से।

हाथ खाली हैं

पर हथेलियाँ

कुछ पकड़े रहने की

आदत नहीं छोड़तीं।

रीढ़ में एक खिंचाव रहता है,

हर क़दम पर

थोड़ा-सा दर्द खिसकता है,

जैसे चलना नहीं,

अपने आप को

ढो रहा हूँ।

पेट भूख नहीं बताता,

वो बस जलन देता है

ऐसी जलन

जो खाने से नहीं बुझती।

हर कौर

सीधा गले से नहीं उतरता,

कुछ हिस्सा

सीने में अटक जाता है।

साँसें पूरी आती हैं,

पर सही जगह नहीं पहुँचतीं।

फेफड़े काम करते हैं,

मगर दिल को

हवा नहीं मिलती।

रात को लेटता हूँ

तो बदन

आराम की स्थिति में होता है,

पर भीतर

कुछ लगातार जागता रहता है

जाँघों में जकड़न,

पैरों में झनझनाहट,

और आँखों के पीछे

एक जलता हुआ खालीपन।

तुम्हारी याद

अब सोच नहीं रही।

वो नसों में दौड़ती है,

हड्डियों से टकराती है,

और हर सुबह

मुझे पूरे शरीर के साथ

तुम्हारे बिना

उठने पर मजबूर करती है।


             

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