Tuesday, January 13, 2026

आत्मविश्वास

आत्मविश्वास


यदि स्वामी विवेकानंद के सम्पूर्ण विचार-दर्शन को एक शब्द में समेटा जाए,

तो वह शब्द होगा— आत्मविश्वास।

उनके लिए आत्मविश्वास कोई मनोवैज्ञानिक तकनीक नहीं था,

बल्कि मानव अस्तित्व की मूल शर्त था।


विवेकानंद मानते थे कि

मनुष्य की सबसे बड़ी समस्या गरीबी, अशिक्षा या संसाधनों की कमी नहीं है—

सबसे बड़ी समस्या है स्वयं पर अविश्वास।


आत्महीनता : सबसे बड़ा पाप


स्वामी विवेकानंद ने स्पष्ट शब्दों में कहा—

“आत्मा पर अविश्वास ही सबसे बड़ा पाप है।”


यह कथन साधारण नहीं,

बल्कि पूरे भारतीय समाज के लिए एक कठोर निदान था।

विवेकानंद ने देखा कि भारत की पराजय

बाहरी आक्रमणों से पहले

भीतर की हार से शुरू हुई।


जब समाज यह मान लेता है कि—


हम कमजोर हैं


हम पिछड़े हैं


हम कुछ नहीं कर सकते


तब पराजय निश्चित हो जाती है।


आत्मविश्वास बनाम अहंकार


विवेकानंद का आत्मविश्वास

अहंकार से बिल्कुल अलग था।

अहंकार दूसरों को छोटा दिखाकर बड़ा बनता है,

जबकि आत्मविश्वास

अपने भीतर की शक्ति को पहचानने से आता है।


उन्होंने कहा—


> “तुम शक्तिशाली हो, तुम पवित्र हो, तुम दिव्य हो।”


यह वाक्य

किसी संत का उपदेश नहीं,

बल्कि एक क्रांतिकारी घोषणा थी।


विवेकानंद चाहते थे कि

हर युवा अपने भीतर यह विश्वास पैदा करे कि—

मैं परिस्थिति का दास नहीं, निर्माता हूँ।


गुलामी पहले मन में जन्म लेती है


भारत की ऐतिहासिक पराजयों को

विवेकानंद केवल सैन्य या राजनीतिक दृष्टि से नहीं देखते थे।

उनके अनुसार गुलामी

सबसे पहले मानसिक स्तर पर आती है।


जब व्यक्ति यह सोच ले कि—

“मैं कुछ नहीं बदल सकता,”

उसी क्षण वह हार जाता है।


आज भी यह मानसिकता

नए रूप में मौजूद है—

कभी बेरोजगारी के नाम पर,

कभी व्यवस्था के नाम पर,

और कभी भाग्य के नाम पर।


युवा और आत्मविश्वास का संकट


आज का युवा

तकनीकी रूप से पहले से अधिक सक्षम है,

पर मानसिक रूप से पहले से अधिक भ्रमित।


तुलना ने आत्मविश्वास छीना है


असफलता का डर निर्णय क्षमता तोड़ता है


त्वरित सफलता की चाह धैर्य खत्म करती है


विवेकानंद इसके विपरीत

युवाओं को साहसिक असफलता के लिए तैयार करते थे।


वे कहते थे—


> “एक विचार लो।

उसी विचार को अपना जीवन बना लो।”


यह कथन

एकाग्रता और आत्मविश्वास का सूत्र है।


आत्मविश्वास का निर्माण कैसे हो?


विवेकानंद के अनुसार आत्मविश्वास

बाहरी प्रशंसा से नहीं,

बल्कि अनुशासन, कर्म और चरित्र से बनता है।


1. स्व-अनुशासन – जो स्वयं पर शासन कर सकता है, वही दुनिया को बदल सकता है


2. निरंतर कर्म – कर्म से भागने वाला कभी आत्मविश्वासी नहीं हो सकता


3. सेवा भाव – दूसरों के लिए काम करने से भीतर की शक्ति जागती है


4. साहसिक सत्य – सच बोलने का साहस आत्मबल को जन्म देता है


राष्ट्र निर्माण आत्मविश्वास से शुरू होता है


विवेकानंद के लिए

राष्ट्र निर्माण का अर्थ

सिर्फ सड़क, इमारत या संस्थान नहीं था।

वे कहते थे—

पहले मनुष्य बनाओ, फिर समाज अपने आप बनेगा।


जब युवा आत्मविश्वासी होता है—


वह भीड़ नहीं बनता, नेतृत्व करता है


वह शिकायत नहीं करता, समाधान खोजता है


वह अवसर का इंतज़ार नहीं करता, अवसर बनाता है


इस अध्याय का सार


यह अध्याय हमें यह सिखाता है कि—


आत्मविश्वास कोई विलास नहीं, आवश्यकता है


राष्ट्र की शक्ति व्यक्ति के मन से शुरू होती है


और विवेकानंद का संदेश आज भी उतना ही प्रासंगिक है


भारत की जाग्रत आत्मा

उसी दिन पूर्ण रूप से जागेगी

जिस दिन भारत का युवा

अपने भीतर यह कह सके—

“मैं कमजोर नहीं हूँ,

मैं संभावनाओं से भरा हूँ।”



माताओं में असीम सामर्थ्य होती है

 माताओं में असीम सामर्थ्य होती है। वे वह सब कर सकती हैं, जिसकी कल्पना भी कठिन होती है। फिर भी अक्सर पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों में उनकी बातों को अनसुना कर दिया जाता है। धीरे-धीरे उनके मन में पीड़ा इकट्ठा होने लगती है। मन भारी हो जाता है, पर उसी भारी मन को लेकर वे निरंतर परिवार की सेवा करती रहती हैं।

इस प्रक्रिया में उनका जीवन मानो एक सीमित दायरे में सिमटता चला जाता है जैसे कोई जीव स्वयं को बुनते हुए अंततः उसी में बँध जाता है।


इसलिए आवश्यक है कि वे उस दायरे से बाहर निकलें। केवल दायित्वों तक सीमित न रहें, बल्कि अपने लिए भी समय निकालें। दिनभर के सारे काम निपटाने के बाद यदि वे प्रतिदिन थोड़ा सा समय आत्मचिंतन, मौन, या किसी सकारात्मक उद्देश्य को दें, तो धीरे-धीरे उनके भीतर की बंद खिड़कियाँ खुलने लगती हैं। भीतर प्रकाश प्रवेश करता है, और जीवन में फिर से प्रसन्नता का संचार होने लगता है।


जब एक माँ का मन आनंदित होता है, तो उसका प्रभाव केवल उसी तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है। क्योंकि जब प्रसन्न मन से वह भोजन बनाती है, बोलती है, या कोई भी कार्य करती है, तो वही भाव परिवार के प्रत्येक सदस्य तक पहुँचता है। यह अनुभवजन्य सत्य है कि जो व्यक्ति जिस मानसिक अवस्था में कुछ देता है, वही अवस्था प्राप्त करने वाले तक भी पहुँचती है।


इसलिए आगे बढ़ने से डरना नहीं चाहिए। डर आखिर किस बात का? यह सोचकर रुक जाना कि “मैं ठीक से बोल नहीं पाऊँगी”, “मुझे ज्ञान नहीं है”, या “लोग क्या कहेंगे” ये सब मन की रुकावटें हैं।

जब कोई भी व्यक्ति अपने अनुभव और सच्चे भाव से बोलता है, तो वह किसी तय सीमा में नहीं बँधा रहता। ज्ञान की औपचारिकता से बाहर निकलकर जब बात आती है, तब वह अधिक सजीव और प्रभावशाली होती है।


एक छोटी-सी कहानी है किसी बड़े निर्माण कार्य में अनेक शक्तिशाली लोग लगे होते हैं, पर वहीं एक छोटा जीव भी अपनी सीमित क्षमता से उसमें योगदान देता है। इतिहास में अक्सर बड़े नाम खो जाते हैं, लेकिन उस छोटे जीव की निष्ठा और प्रयास लोगों की स्मृति में जीवित रह जाते हैं। क्योंकि मूल्य आकार में नहीं, भाव में होता है।


जीवन में रोग, शोक और कठिनाइयाँ आना स्वाभाविक है। कई बार हम उन्हीं पर पूरा ध्यान केंद्रित कर देते हैं। लेकिन जब हम स्वयं को किसी सकारात्मक और उद्देश्यपूर्ण कार्य में लगाए रखते हैं, तो अनेक समस्याएँ अपने आप कमजोर पड़ने लगती हैं।

दुख भी ध्यान चाहता है। जब हम लगातार उसी को देखते रहते हैं, तो वह और मजबूत होता है। लेकिन जब हम जीवन के अर्थ, सेवा, या व्यापक दृष्टि की ओर बढ़ते हैं, तो वही दुख स्वयं पीछे हटने लगता है जैसे वह कह रहा हो कि “यहाँ अब मेरा स्थान नहीं रहा।”


जीवन को प्रेम से जीने में शर्तें नहीं होनी चाहिए। जब हम यह कहना सीख लेते हैं कि “मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस सब ठीक रहे”, तो उसी क्षण से हमारा अपना ठीक रहना शुरू हो जाता है।

मन में कौन-सा विचार, कौन-सी भावना रहेगी यह हमारा अधिकार है। जैसे कोई व्यक्ति यह तय करता है कि किसी विषैले अनुभव को हाथ में लेकर क्या करना है, वैसे ही हम भी तय करते हैं कि किसे अपने मन में स्थान देना है और किसे नहीं।


कभी-कभी किसी के व्यवहार से मन आहत हो जाता है। उस क्षण यह समझ आ जाए कि यदि हमारा मन भीतर से पूर्ण होता, तो बाहरी व्यवहार हमें इतना विचलित नहीं कर पाता तो वहीं से सुधार की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

जैसे ही हम भीतर की कमी को पहचानकर उसे भरने का प्रयास करते हैं, मन कुछ ही समय में पुनः संतुलित हो जाता है।


अक्सर लोग सोचते हैं कि किसी सामूहिक आयोजन का उद्देश्य केवल भाषण या औपचारिकता है। पर वास्तव में उसका उद्देश्य यह समझना है कि हम अपने जीवन को किस चेतना के साथ जी रहे हैं। प्रेरणास्रोतों की चर्चा आवश्यक है, क्योंकि उनसे हमें दिशा मिलती है।

लेकिन अंततः हर कार्य का केंद्र वही होना चाहिए, जिसके लिए वह किया जा रहा है न कि केवल आयोजन स्वयं।


सामूहिक मिलन, संस्कार और सामाजिक कार्यक्रम लोगों को जोड़ने के लिए होते हैं। लेकिन प्रेम के लिए किसी मंच या विधि की आवश्यकता नहीं होती। प्रेम तो तब है जब हम अपने जीवन के हर छोटे-बड़े कार्य में उस भावना को साथ रखें।

खाते समय, चलते समय, काम करते समय यदि कोई भाव लगातार हमारे साथ बना रहे, तो वही सच्चा जुड़ाव है। ऐसा जुड़ाव कभी टूटता नहीं।


कभी-कभी बड़ी घटनाओं में यह देखने को मिलता है कि लोग असामान्य रूप से सुरक्षित रह जाते हैं। जब उस समय वे किसी भय में नहीं, बल्कि एकाग्रता, प्रार्थना, स्मरण या सकारात्मक चिंतन में लीन होते हैं, तो उनका मन भय से मुक्त रहता है। भय से मुक्त मन कई बार असंभव परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखता है।


लेकिन यह मान लेना कि केवल संकट के समय किसी उच्च शक्ति को याद करने से सब ठीक हो जाएगा यह एक प्रकार की शर्त है। जीवन का वास्तविक सिद्धांत यह है कि निरंतर, सहज और बिना अपेक्षा के उस सकारात्मक चेतना से जुड़े रहा जाए।

यही जीवन जीने की कला है। इसी तरह जीवन में स्थिरता आती है।


जब हम आनंदित मन से, प्रेमपूर्वक जो भी कार्य करते हैं, उसका प्रभाव हमारे आसपास के लोगों पर भी पड़ता है। परिवार, वातावरण और संबंध सब धीरे-धीरे उसी आनंद से भरने लगते हैं।


और अंततः, जो भी हम करें, उसमें हमारे और हमारे जीवन-दर्शन के बीच एक प्रेम-कथा होनी चाहिए।

उस प्रेम को केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने जीवन के माध्यम से प्रकट करना ही उसकी सच्ची अभिव्यक्ति है।



देह की अतृप्ति और मन का कलह

 देह की अतृप्ति और मन का कलह: एक अनकहा संकट


अक्सर बंद कमरों की खामोशियां बाहर चीख बनकर निकलती हैं। हम जिसे 'पारिवारिक झगड़ा' या 'स्त्री का स्वभावगत चिड़चिड़ापन' कहकर टाल देते हैं, उसकी जड़ें अक्सर उन अंधेरों में होती हैं जहाँ संवाद खत्म हो जाता है और केवल शोषण बचता है। मास्टर्स और जानसन का वैज्ञानिक अध्ययन हमें एक भयावह आईने के सामने खड़ा करता है: 90 प्रतिशत स्त्रियां कभी चरम सुख (Orgasm) को अनुभव ही नहीं कर पातीं।


❇️यौन साक्षरता का अभाव और पुरुष की जल्दबाज़ी


अध्ययन बताता है कि 75 प्रतिशत पुरुष शीघ्रपतन के शिकार हैं। यह केवल एक शारीरिक समस्या नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विफलता भी है। पुरुष 'उपयोग' करने की मानसिकता से यौन क्रिया में उतरता है, जहाँ उसकी प्राथमिकता केवल अपनी मुक्ति होती है। वह स्खलित होता है और सो जाता है, लेकिन उसके पीछे वह एक ऐसी स्त्री को छोड़ जाता है जो देह और मन के स्तर पर अधूरी रह गई है।


जब संभोग एक 'साझा उत्सव' न रहकर केवल 'एकतरफा उपयोग' बन जाता है, तो स्त्री के भीतर यह बोध गहराने लगता है कि वह केवल एक वस्तु (Object) है। यह बोध ही उसके भीतर के क्रोध और चिड़चिड़ेपन का जन्मदाता है।


❇️अतृप्ति: झगड़ों और क्लेश की अदृश्य जड़


आधुनिक मनोविज्ञान और प्राचीन तंत्र शास्त्र, दोनों इस बात पर सहमत हैं कि यौन तृप्ति मानसिक शांति का आधार है। एक अतृप्त स्त्री, जो काम-समाधि के शिखर से वंचित रह गई है, वह स्वाभाविक रूप से क्षुब्ध रहेगी।


🔹दार्शनिक और धार्मिक असफलता: कोई भी प्रवचन या नीति शास्त्र उस स्त्री को शांत नहीं कर सकता जिसकी जैविक और ऊर्जागत जरूरतें अधूरी हैं।


🔹रिश्वत का संबंध: क्योंकि स्त्रियों को इस प्रक्रिया में आनंद नहीं मिलता, वे इसे एक 'बोझ' या 'कर्तव्य' समझने लगती हैं। यहीं से संबंधों में सौदेबाजी शुरू होती है—वह तभी राजी होती है जब उसे कोई अन्य प्रतिफल मिले। यह प्रेम का अंत और शोषण की शुरुआत है।


❇️क्या पुरुष ही उत्तरदायी है?


लेख स्पष्ट संकेत देता है कि यदि घर में निरंतर कलह है, तो पुरुष को अपने अहंकार से बाहर निकलकर आत्म-निरीक्षण करना चाहिए। जिसे वह अपनी पत्नी की 'बदमिजाजी' समझ रहा है, वह दरअसल उसकी अपनी अक्षमता और संवेदनहीनता का परिणाम हो सकता है।


स्त्रियों का काम-विमुख (Frigid) होना उनकी प्रकृति नहीं, बल्कि उनके अनुभवों की कड़वाहट है। जब शरीर का रोम-रोम आनंद से कंपित होने के बजाय केवल अपमान और उपेक्षा का अनुभव करता है, तो आत्मा देह से विमुख होने लगती है।


❇️शिखर की ओर यात्रा


सौ में से नब्बे स्त्रियों का आर्गाज्म से अपरिचित होना एक मानवीय त्रासदी है। काम-भोग को केवल वंश वृद्धि या पुरुष की वासना पूर्ति का साधन समझना बंद करना होगा। यह एक ऐसी कला है जिसमें धैर्य, समय और संवेदनशीलता की आवश्यकता है।


जब तक पुरुष संभोग को 'कृत्य' (Doing) के बजाय 'होने' (Being) की प्रक्रिया नहीं बनाएगा, तब तक परिवार और समाज में यह अशांति बनी रहेगी। असली 'काम-समाधि' वह है जहाँ दोनों पक्ष समान रूप से विसर्जित हों। अन्यथा, बिस्तर पर बहाए गए स्त्री के आंसू किसी भी सभ्यता के लिए कलंक ही रहेंगे।


यौन अतृप्ति का मनोवैज्ञानिक प्रभाव केवल बिस्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह व्यक्ति के पूरे व्यक्तित्व, व्यवहार और जीवन के प्रति उसके दृष्टिकोण को बदल देता है। जब हम मास्टर्स और जानसन के उन आंकड़ों (90% स्त्रियों की अतृप्ति) को मनोवैज्ञानिक चश्मे से देखते हैं, तो इसके परिणाम अत्यंत गहरे और जटिल नजर आते हैं।


यहाँ इसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण है:


1. संवेगात्मक अस्थिरता और 'क्रोनिक फ्रस्ट्रेशन'

जब शरीर एक तीव्र ऊर्जा (Sexual Energy) को संचित करता है और उसे विसर्जित (Release) करने का अवसर नहीं मिलता, तो वह ऊर्जा शरीर के भीतर 'विषाक्त' होने लगती है।


❇️दबा हुआ क्रोध: अतृप्ति सीधे तौर पर चिड़चिड़ेपन में बदल जाती है। छोटी-छोटी बातों पर चिल्लाना, बर्तन पटकना या बच्चों पर बिना कारण गुस्सा करना, दरअसल उस शारीरिक कुंठा की अभिव्यक्ति है जिसे समाज में बोलना 'वर्जित' है।


❇️भावनात्मक सुन्नता: लंबे समय तक चरम सुख से वंचित रहने पर स्त्रियाँ 'इमोशनल विड्रॉल' का शिकार हो जाती हैं। वे खुद को भावनात्मक रूप से सुरक्षित रखने के लिए अपने साथी से दूरी बना लेती हैं।


2. वस्तुकरण का बोध और आत्म-सम्मान की कमी


जैसा कि आपके द्वारा दी गई जानकारी में उल्लेख है, जब पुरुष स्खलित होकर सो जाता है और स्त्री अधूरी रह जाती है, तो उसके अवचेतन में यह बात बैठ जाती है कि "मैं केवल एक साधन हूँ।"


❇️यह बोध स्त्री के आत्मविश्वास (Self-esteem) को तोड़ देता है। उसे लगता है कि उसके अस्तित्व का मूल्य केवल दूसरे की संतुष्टि तक है।


❇️यही कारण है कि वह धीरे-धीरे 'काम-विमुख' होने लगती है, क्योंकि जिस क्रिया से उसे केवल अपमान का अनुभव हो, उससे जुड़ना उसके आत्म-सम्मान को चोट पहुँचाता है।


3. 'पेसिव-अग्रेसिव' व्यवहार (Passive-Aggressive Behavior)


मनोविज्ञान कहता है कि जब कोई व्यक्ति अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए सीधे तौर पर मांग नहीं कर पाता (विशेषकर भारतीय संदर्भ में जहाँ स्त्रियाँ अपनी यौन इच्छाओं पर बात नहीं कर पातीं), तो वे 'पेसिव-अग्रेसिव' हो जाती हैं।


❇️वे सीधे झगड़ा करने के बजाय काम में देरी करना, महत्वपूर्ण मौकों पर बीमार हो जाना, या परिवार में 'साइलेंट ट्रीटमेंट' (बातचीत बंद करना) देना शुरू कर देती हैं। यह उनके भीतर की अतृप्ति का एक अनकहा प्रतिशोध होता है।


4. संबंधों में 'ट्रांजेक्शनल' (लेन-देन) मानसिकता

जब संभोग में आनंद लुप्त हो जाता है, तो यह एक 'सौदा' बन जाता है। स्त्रियाँ संभोग को एक 'रिश्वत' या 'हथियार' की तरह इस्तेमाल करने लगती हैं।


❇️"अगर तुम मेरी यह मांग पूरी करोगे, तभी मैं राजी होऊंगी"—यह मानसिकता प्रेम के नैसर्गिक प्रवाह को खत्म कर देती है। यह मनोविज्ञान की दृष्टि से संबंधों का पतन है, जहाँ आत्मीयता की जगह चालाकी ले लेती है।


5. मनोदैहिक बीमारियाँ (Psychosomatic Disorders)


लगातार मानसिक तनाव और अतृप्ति शरीर पर बीमारियों के रूप में प्रकट होने लगती है।


❇️अनिद्रा (Insomnia), माइग्रेन, पीठ दर्द और पाचन संबंधी समस्याएं अक्सर उन स्त्रियों में अधिक देखी जाती हैं जो यौन रूप से असंतुष्ट हैं। मन की गांठें शरीर की गांठें बन जाती हैं।


❇️समाधान की दिशा

मनोविज्ञान कहता है कि इस समस्या का समाधान केवल शारीरिक नहीं, बल्कि संवादात्मक है।


❇️संवाद की कमी को दूर करना: पुरुष को अपनी 'परफॉरमेंस' की चिंता छोड़कर स्त्री की भावनाओं और उसकी देह की भाषा को समझना होगा।


❇️कामुकता बनाम संवेदनशीलता: यौन क्रिया को एक 'लक्ष्य' (Target) के बजाय 'प्रवाह' के रूप में देखना।


❇️सत्ता का संतुलन: जब तक पुरुष खुद को 'उपभोक्ता' और स्त्री को 'उपभोग्य वस्तु' समझेगा, यह मनोवैज्ञानिक संकट बना रहेगा।

पुरुष: प्रेम में सेक्स खोजता है या सेक्स में प्रेम

 पुरुष: प्रेम में सेक्स खोजता है या सेक्स में प्रेम?


यह प्रश्न जितना सरल दिखता है, उतना है नहीं।

दरअसल यह सवाल पुरुष की जैविक संरचना, मानसिक बनावट, सामाजिक प्रशिक्षण और भावनात्मक अपूर्णताओं चारों के संगम पर खड़ा है। इसे केवल “हाँ या नहीं” में बाँधना पुरुष के भीतर चल रही जटिल प्रक्रिया के साथ अन्याय होगा।


1. जैविक दृष्टि: शरीर पहले, भाव बाद में


पुरुष की जैविक संरचना उसे दृश्य और शारीरिक उत्तेजना के प्रति अधिक संवेदनशील बनाती है।

टेस्टोस्टेरोन हार्मोन पुरुष की यौन-इच्छा को तीव्र बनाता है। इस स्तर पर....


पुरुष पहले आकर्षण महसूस करता है


फिर संपर्क चाहता है


और उसके बाद भावनात्मक जुड़ाव विकसित करता है


इसलिए कई बार पुरुष सेक्स के माध्यम से प्रेम को पहचानता है, न कि प्रेम के बाद सेक्स को।


यह स्वार्थ नहीं, बल्कि शरीर की भाषा है।


2. मनोवैज्ञानिक दृष्टि: भावनाएँ जिनका प्रशिक्षण नहीं हुआ


अधिकांश समाजों में पुरुषों को बचपन से सिखाया जाता है....


“मत रोओ”

“कमज़ोरी मत दिखाओ”

“भावनाएँ स्त्रियों की चीज़ हैं”


परिणामस्वरूप पुरुष अपनी भावनाओं को पहचानना तो दूर, व्यक्त करना भी नहीं सीख पाता।


तो जब उसे किसी से गहरा जुड़ाव चाहिए होता है, तो वह....


बातों से नहीं

संवेदनाओं से नहीं


बल्कि शारीरिक निकटता से उसे महसूस करने की कोशिश करता है


 यहाँ सेक्स भावनात्मक भाषा बन जाता है।


3. सामाजिक दृष्टि: पुरुष से अपेक्षाएँ और भ्रम


समाज पुरुष से दो विरोधी अपेक्षाएँ रखता है....


1. वह शक्तिशाली हो


2. वह भावनात्मक रूप से संयमी हो


इस विरोधाभास में पुरुष अक्सर प्रेम को कमज़ोरी और

सेक्स को विजय समझने लगता है।


लेकिन सच यह है....


पुरुष भी प्रेम चाहता है


बस उसे माँगने नहीं सिखाया गया


इसलिए वह पहले सेक्स खोजता है, ताकि बाद में कह सके...

“मैं जुड़ा हूँ।”


4. गहरी परत: पुरुष प्रेम को “सुरक्षा” की तरह महसूस करता है


स्त्री अक्सर प्रेम को संवाद और भावनात्मक साझेदारी में खोजती है,

जबकि पुरुष प्रेम को स्वीकृति और अपनापन में।


जब कोई उसे शारीरिक रूप से स्वीकार करती है...


वह खुद को वांछित महसूस करता है


सुरक्षित महसूस करता है


और वहीं से प्रेम जन्म लेता है


इसलिए कई पुरुषों के लिए सेक्स अंत नहीं, बल्कि प्रवेश द्वार होता है।


5. परिपक्व पुरुष: जहाँ प्रेम पहले आता है


यह भी सत्य है कि जैसे-जैसे पुरुष भावनात्मक रूप से परिपक्व होता है, वह सीखता है कि...


सेक्स बिना प्रेम खाली है


और प्रेम बिना संवाद अधूरा


ऐसे पुरुष के लिए...


प्रेम पहले आता है


सेक्स उसका उत्सव बनता है


लेकिन यह परिपक्वता समय, चोट और आत्मचिंतन से आती है।


6.प्रश्न का उत्तर नहीं, समझ का विस्तार


तो क्या पुरुष प्रेम में सेक्स खोजता है या सेक्स में प्रेम?


उत्तर है "दोनों"।

पर यह निर्भर करता है...उसकी उम्र पर


उसकी भावनात्मक शिक्षा पर


उसके अनुभवों पर


और सबसे अधिक, उसे कितना सुरक्षित महसूस कराया गया है


पुरुष अक्सर प्रेम को खोजता है,

बस रास्ता अलग होता है।


पुरुष हमेशा सेक्स नहीं चाहता,

कई बार वह उस प्रेम को ढूँढ रहा होता है

जिसे शब्दों में माँगना उसे नहीं सिखाया गया।



"सम्भोग के बाद का पल"


सम्भोग केवल शारीरिक क्रिया नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का जटिल समन्वय है। उसके बाद का क्षण भी उतना ही गहन और संवेदनशील होता है। पुरुष और स्त्री दोनों का अनुभव अलग होता है, और उसे समझना आत्म-जागरूकता और आपसी सामंजस्य के लिए आवश्यक है।


1. पुरुष का अनुभव


सम्भोग के बाद पुरुष का शरीर और मन अचानक शिथिल और आराम की ओर झुकता है।


शारीरिक अनुभव:


लिंग ढीला पड़ता है, मांसपेशियों में थकान।


हृदय गति धीरे-धीरे सामान्य हो जाती है।


साँसें लंबी, धीमी और गहरी हो जाती हैं।


शरीर भारीपन और ऊर्जा के बहाव की कमी महसूस करता है।


मानसिक स्थिति:


पुरुष आत्मनिरीक्षण की ओर झुकता है।


अनुभव को पचाने और ऊर्जा को स्थिर करने की आवश्यकता होती है।


संवेदनाओं पर ध्यान कम हो जाता है; मन अंदर की ओर केंद्रित होता है।


इंद्रिय अनुभव:


स्पर्श और नज़दीकी की तीव्रता कम।


आंखें आधी बंद, शरीर शिथिल और आराम की स्थिति में।


पुरुष इस समय अनुभव को अंदर की दुनिया में संजोता है। यह समय उसके लिए एकांत और मानसिक स्थिरता का है।


2. स्त्री का अनुभव


स्त्री का शरीर सम्भोग के बाद भी ऊर्जावान और संवेदनशील बना रहता है। उसका अनुभव अभी भी तीव्र और विस्तृत होता है।


शारीरिक अनुभव:


त्वचा पर हल्की गर्माहट, हर स्पर्श में संवेदना।


स्तन, योन और हाथ-पैर में हल्की हलचल, ऊर्जा पूरे शरीर में फैलती है।


श्वास गहरी और नियमित, कभी-कभी हृदय की धड़कन तेज़।


मानसिक स्थिति:


साझा अनुभव की चाह, भावनाओं और संवेदनाओं के केंद्र में बनी रहती है।


मानसिक रूप से अभी भी जुड़ी हुई और जागरूक।


इंद्रिय अनुभव:


हर हल्का स्पर्श, हर साँस, हर हृदय की धड़कन उसे भीतर से खिला हुआ और आनंदित महसूस कराती है।


संवेदनाएं गहरी और जीवंत बनी रहती हैं।


स्त्री इस समय अनुभव को बाहरी और साझा रूप में जीती है। यह पल उसके लिए खिलने और जुड़ने का समय है।


3. ऊर्जा का प्रवाह और सामंजस्य


सम्भोग के बाद यह अंतर केवल शारीरिक नहीं, बल्कि ऊर्जा का प्रवाह है।


पुरुष ऊर्जा को बाहर छोड़ देता है और थकान अनुभव करता है।


स्त्री वह ऊर्जा ग्रहण करती है और उसे अपने भीतर फैलती हुई स्फूर्ति और आनंद के रूप में अनुभव करती है।


यही अंतर उनके भावनात्मक और मानसिक व्यवहार में दिखाई देता है।


यदि दोनों इस अंतर को समझें और स्वीकार करें, तो यह क्षण केवल शारीरिक संतोष का नहीं बल्कि भावनात्मक, मानसिक और आध्यात्मिक जुड़ाव का भी स्रोत बन सकता है।


4. पल की सूक्ष्मता: स्पर्श, साँस और हृदय की धड़कन


कल्पना कीजिए इस पल को:


पुरुष की आँखें आधी बंद, शरीर शिथिल, और प्रत्येक साँस धीरे-धीरे बाहर निकलती है।


स्त्री की आँखें चमक रही हैं, हाथ और त्वचा संवेदनाओं को महसूस कर रहे हैं।


उसका हृदय तेज़ धड़क रहा है, उसकी ऊर्जा अभी भी बह रही है।


पुरुष के शरीर से ऊर्जा बाहर बह चुकी है, स्त्री के शरीर में वही ऊर्जा खिल रही है।


यह पल दो अलग दृष्टिकोणों के बीच सामंजस्य का है: पुरुष अपने अंदर, स्त्री बाहर की ओर फिर भी अनुभव जुड़ा हुआ।


सम्भोग के बाद का क्षण सिर्फ शारीरिक क्रिया का नहीं, बल्कि ऊर्जा, मन और इंद्रियों का गहन अनुभव है।


पुरुष: थकान और एकांत में अनुभव को आत्मनिरीक्षण में पचा रहा।


स्त्री: ऊर्जा में खिलना और साझा अनुभव की चाह।


यदि यह अंतर समझा जाए और स्वीकार किया जाए, तो यह पल दोनों के बीच गहरा, संतुलित और सूक्ष्म जुड़ाव बन सकता है।




प्रेम ख़त्म नहीं होता

किसी किसी में इतना प्रेम भरा होता है कि ख़त्म ही नहीं होता। ज़िंदगी ख़त्म हो जाती है, पर प्रेम नहीं।


कोई उनके प्रेम को देखे या न देखे, कोई उन्हें प्रेम करे या न करे, कोई उनके प्रेम को स्वीकारे या न स्वीकारे, कोई उनके प्रेम को याद रखे या न रखे, उन्हें फ़र्क़ ही नहीं पड़ता।


उनका प्रेम ख़त्म ही नहीं होता। शायद प्रेम होता ही ऐसा है, कभी ख़त्म न होने वाला।


इसीलिए जब कोई कहता है कि इनका या उनका प्रेम ख़त्म हो गया, मैं सोचता हूँ, प्रेम ख़त्म कैसे हुआ?


हो ही कैसे सकता है?


जो अमर है, अविनाशी है, अनंत है; जो संभावनाओं और संवेदनाओं को जन्म देता है;


जो कण-कण की चेतना का हिस्सा है; जो कंकर को केसर कर देता है; जो इंसान को ईश्वर और ईश्वर को इंसान बना देता है, वो किसी एक के स्वीकार न किए जाने से कैसे ख़त्म हो सकता है? प्रेम कभी ख़त्म नहीं होता। हाँ, रिश्ते ख़त्म होते हैं, नाम ख़त्म होते हैं, क्योंकि रिश्ते और नाम ज़रूरत और स्वार्थ की नींव पर बने होते हैं, जो आज हैं और कल नहीं।


पर प्रेम, वो स्वतंत्र है। और जो स्वतंत्र है, वो ख़त्म नहीं होता।


वो रहता है, हमेशा, समय के अंत तक, और अंत के बाद भी।


उन लोगों में जो प्रेम में हैं, थे, या रहेंगे।


क्योंकि उन लोगों में प्रेम, ख़त्म नहीं होता...!!!

Sunday, January 11, 2026

रिश्ते चलते हैं भरोसे से

जब भरोसे की डोर धीरे-धीरे कटने लगती है


रिश्ते सिर्फ साथ रहने से नहीं चलते,

रिश्ते चलते हैं भरोसे से।


पति-पत्नी के रिश्ते में यह भरोसा सबसे कीमती होता है,

क्योंकि यहाँ इंसान अपना वह चेहरा दिखाता है

जो वह दुनिया से छुपाता है।


पुरुष की दुनिया बाहर से मजबूत दिखती है


लेकिन भीतर से वह भी उतना ही संवेदनशील होता है।


एक पुरुष दिन भर बाहर की दुनिया में लड़ता है

काम का दबाव, जिम्मेदारियों का बोझ,

कभी असफलता का डर,

कभी भविष्य की चिंता।


वह सब किसी को नहीं बताता।

क्योंकि उसे सिखाया गया है

“मर्द रोते नहीं”,

“कमज़ोरी मत दिखाओ।”


लेकिन जब वह घर लौटता है,

तो वह मर्द नहीं रहना चाहता

वह सिर्फ एक इंसान बनना चाहता है।


और उस इंसान को सबसे सुरक्षित जगह लगती है

अपनी पत्नी के पास।


वह सोचता है

“यह वही इंसान है जो मुझे जज नहीं करेगा,

जो मेरी बात को बाहर नहीं ले जाएगा,

जो मेरी कमजोरी को मेरी ताकत समझेगा।”


इसलिए वह अपनी असफलताएँ, डर, गुस्सा,

यहाँ तक कि अपने अधूरे सपने भी

सबसे पहले अपनी पत्नी से साझा करता है।


लेकिन स्त्री की भी अपनी दुनिया होती है


स्त्री अक्सर यह नहीं समझ पाती

कि जो बात उसके लिए साधारण बातचीत है,

वही बात पुरुष के लिए उसकी आत्मा का रहस्य हो सकती है।


वह कभी-कभी सोचती है

“मैंने तो यूँ ही मम्मी से कह दिया।”

“बस सहेली से शेयर किया था।”

“थोड़ा मज़ाक ही तो था।”


उसका इरादा बुरा नहीं होता।

वह दर्द देना नहीं चाहती।


लेकिन समस्या इरादे की नहीं,

असर की होती है।


जब पुरुष को पता चलता है

कि उसकी कही हुई बात

अब किसी और की जुबान पर है

तो उसके भीतर कुछ टूट जाता है।


वह सोचता है

“अगर मेरी सबसे निजी बात भी सुरक्षित नहीं,

तो मैं फिर किस पर भरोसा करूँ?”


यहीं से रिश्ते में चुप्पी जन्म लेती है


वह लड़ता नहीं।

शिकायत भी नहीं करता।


वह बस चुप हो जाता है।


अब वह कहता है

“कुछ खास नहीं।”

“सब ठीक है।”

“थक गया हूँ।”


लेकिन सच यह होता है

उसने अपने दिल का दरवाज़ा

धीरे से बंद कर लिया होता है।


स्त्री को लगता है

“वह बदल गया है।”

“अब पहले जैसा नहीं रहा।”


और पुरुष सोचता है

“अब बोलने का कोई मतलब नहीं।”


यहीं से रिश्ता

प्यार से उतरकर

सिर्फ जिम्मेदारी बन जाता है।


इस कहानी में कोई एक दोषी नहीं होता


यह लेख किसी स्त्री को दोषी ठहराने के लिए नहीं है,

और न ही पुरुष को पीड़ित साबित करने के लिए।


यह सिर्फ याद दिलाने के लिए है कि


भरोसा काँच की तरह होता है

एक बार टूट जाए, तो जुड़ तो जाता है

लेकिन दरार रह ही जाती है।


हर बात साझा करने की नहीं होती

कुछ बातें सिर्फ संभाल कर रखने के लिए होती हैं।


पति हो या पत्नी दोनों पहले इंसान हैं।


एक छोटा सा आत्म-मंथन


स्त्री खुद से पूछे

क्या मेरे पति आज भी मुझसे दिल की बात कहते हैं?

या मैंने अनजाने में उनकी चुप्पी की वजह बन गई?


पुरुष खुद से पूछे

क्या मैं अपनी पीड़ा को शब्दों में कह पा रहा हूँ?

या मैं सिर्फ सहता जा रहा हूँ?


क्योंकि रिश्ता तभी बचता है

जब बोलने वाले को सुरक्षा मिले

और सुनने वाला उसे संभाल सके।

मेरी हथेली पर उनके नाम

 जब पहली बार...मेरी हथेली पर उनके नाम की मेहंदी रची थी, तब माँ ने बड़े चाव से कहा था कि यह रंग जितना गहरा होगा, प्यार उतना ही अटूट होगा। 

आज शीशे में खुद को देखती हूँ तो लगता है कि वह रंग शायद प्यार का नहीं, बल्कि उन समझौतों की स्याही थी जो मुझे ताउम्र खुद को मिटाकर लिखने थे। शादी की उस पहली रात से लेकर आज के इस सन्नाटे तक, सफर लंबा रहा है, पर मेरा अपना कुछ भी नहीं रहा। 

जिस दिन फेरे हुए, उसी दिन मेरी पहचान के आगे एक विराम लगा दिया गया और मुझे सिखाया गया कि अब मेरा हर सच, 

किसी की सुविधा के अनुसार तय होगा।

अजीब तमाशा है इस दुनिया का। जब तक मैं घूँघट की ओट में सिसकती रही, सब चुप थे। जैसे ही मैंने अपनी रीढ़ सीधी की और ज्यादतियों के खिलाफ एक दीवार खड़ी की, पूरा शहर मेरे दरवाजे पर सुलह की पोटली लेकर खड़ा हो गया। 

यह सुलह नहीं है, यह तो मेरे वजूद की नीलामी है। वे लोग, जो बरसों मेरे आंसुओं से बेखबर थे, आज अचानक मेरे घर की शांति के रखवाले बन बैठे हैं। वे पक्ष और विपक्ष की बात नहीं करते, वे बस मेरी गलतियों का हिसाब लेकर आए हैं। 

उनका कहना है कि मेरा स्वाभिमान दरअसल मेरा अहंकार है, और मेरा बोलना उनकी शान में गुस्ताखी।

भीड़ के शोर में खड़े वे सुलहकार क्या जानें कि सुलह के रास्ते असल में टूटे हुए कांच के टुकड़ों पर चलने जैसे हैं। कोई यह क्यों नहीं पूछता कि जिस दहलीज को मैंने मंदिर माना था, वहीं मेरी रूह को हर दिन क्यों कुचला गया? 

जब वह चिल्लाते थे, तब यह समाज बहरा क्यों हो जाता था?

नहीं, तब तुम सब निजी मामला कहकर अपनी खिड़कियाँ बंद कर लेते थे।

लेकिन जब मैंने अपनी आवाज खो दी, तो सबको मेरे मौन से तकलीफ होने लगी। उलाहनों की बौछार कुछ ऐसी है कि कलेजा छलनी हो जाता है— अरे, चार लोग क्या कहेंगे?

बच्चों का मुंह तो देख लिया होता!

औरत का धर्म झुकना है, पत्थर होना नहीं।

इन नसीहतों के शोर में मेरी वह चीख कहीं खो गई है, जो मैंने उस रात मारी थी जब पहली बार मैंने अपनी सिसकियों के बीच उनको समझाने की कोशिश की थी, 

तब तो उन्होंने कहा था—तुम्हारी औकात क्या है मेरे बिना? दो वक्त की रोटी मिल तो रही है ,छत है,आखिर दिक्कत क्या है तुमको? परिवार में रहना है तो थोड़ा बहुत सहना तो पड़ेगा ही।

वे शब्द आज भी मेरे कानों में तेजाब की तरह गिरते हैं। उस दिन उन्होंने मुझे नहीं, बल्कि उस रिश्ते की पवित्रता को मारा था। जब मेरी आंखों में आंखें डालकर कहा था—तुम्हारे जैसी हजार औरतें हैं, जो कितना कुछ सहती है और चुपचाप रहती हैं,एक तुम ही स्पेशल आई हो कहीं की महारानी,अगर इतनी ही तकलीफ़ है तो चली क्यों नही जाती?

तब सुलह करवाने वाला यह समाज कहाँ था? तब ये उलाहने देने वाले लोग किस गहरे सन्नाटे में सोए थे?

आज जब मैं उससे बैर ठाने बैठी हूँ, तो मैं अकेली नहीं हूँ। मेरे आस-पास नसीहतों का एक पूरा जंगल खड़ा है। हर कोई जज है, हर कोई वकील है, बस कोई इंसान नहीं है। 

उनके लिए मेरा दुख सिर्फ एक घरेलू अनबन है, 

पर मेरे लिए यह अपनी बिखरी हुई किर्चियों को समेटने की आखिरी कोशिश है। वे चाहते हैं कि मैं वापस उसी नरक में मुस्कुराते हुए चली जाऊं ताकि उनकी परंपरा का भ्रम बना रहे। 

वे मेरी गलतियाँ ऐसे गिनाते हैं जैसे किसी अपराधी का कच्चा चिट्ठा हो, पर उनके गुनाह? उन्हें तो मर्दानगी के पर्दों के पीछे सलीके से छुपा दिया गया है। 

उनको थोड़ा सा गुस्सैल है, तू ही सह लिया कर बोल के माफ कर दिया गया और मुझे अड़ियल कहकर कटघरे में खड़ा कर दिया गया।

शादी से आज तक का यह सफर दरअसल मुझे खुद से दूर करने की एक साजिश थी। ये जो सुलह करवाने आए हैं,दरअसल मुझे बचाने नहीं, बल्कि मुझे फिर से बांधने आए हैं। उनकी नजरों में मेरा अपना कोई पक्ष ही नहीं है—मैं या तो सहनशील हूँ या गलत। 

बीच का कोई रास्ता उन्होंने छोड़ा ही नहीं। मेरी आँखें आज नम हैं, पर कमजोर नहीं। यह नमी उन बरसों के लिए है जो मैंने दूसरों की खुशियों की वेदी पर चढ़ा दिए। 

कलम गवाह है कि एक औरत की सबसे बड़ी गलती सिर्फ यह होती है कि वह एक दिन यह तय कर लेती है कि अब उसे और नहीं टूटना है।

लेकिन.....

मिटा दिये मैंने वो हर हर्फ़ जो किसी और ने लिखे थे,

अब मैं अपनी तकदीर का मुकम्मल कोरा कागज़ हूँ।



हाँ मुझे पसन्द है

हाँ मुझे पसन्द है...


उसकी आँखें, उसकी बातें,,

उसे देखना जाते जाते..

हाँ..मुझे पसन्द है।


उसे रुठाना, उसे मनाना,,

सारी बातें, उसे बताना,,

रोज सपनों में उसे गले लगाना..

हाँ..मुझे पसन्द है।


उसकी सादगी, उसकी शरारत,,

उसके पास, आने की वो आहट,,

उसकी पूरी हर एक ईबादत..

हाँ,,मुझे पसन्द है।


उसका यूँ किस्से सुनाना,,

बात बात पर खुशी से झूम जाना,,

अपना छोड़, सबका ख़्याल कर जाना,,

हर ग़म को अपनी मुस्कान के पीछे छिपा जाना,,

औऱ, पूछने पर एक नया बहाना..

हाँ,,मुझे पसन्द है।


उसका यूँ सजना सँवरना,,

आंखों में काजल का रखना,,

रोज़ नए कपड़े बदलना,,

बारी बारी सबसे लड़ना..

हाँ,,मुझे पसन्द है।


उसका मुझसे यूँ दूर जाना,,

पास आने पर सहज सिमट जाना,,

सारा गुस्सा मुझे दिखाना,,

औऱ हर बार मेरा हार जाना..

हाँ,,मुझे पसन्द है।।

जीवनसाथी

सबसे ज़्यादा अधिकार अगर किसी का होता है आपकी भावनाओं पर, तो वह कोई और नहीं आपका जीवनसाथी होता है।


लेकिन अजीब बात है, हम अक्सर सबसे ज़्यादा लापरवाही भी उसी के साथ करते हैं।


कई लोग कहते हैं,

“उम्र के साथ भावनाएँ मर जाती हैं।”

असल में भावनाएँ नहीं मरतीं, हम उन्हें ज़िंदा रखने की कोशिश छोड़ देते हैं।


उम्र बढ़ने के साथ ज़िंदगी भारी हो जाती है।

ज़िम्मेदारियाँ बढ़ती हैं, थकान बढ़ती है,

मन में शिकायतें जमने लगती हैं।

धीरे-धीरे इंसान “महसूस करना” कम कर देता है,

और सिर्फ़ “निभाना” सीख लेता है।


यही वह जगह है जहाँ रिश्ते चुपचाप बदलने लगते हैं।


शुरुआती दिनों में हम बिना कहे समझते थे,

छोटी-छोटी बातों पर खुश हो जाते थे,

एक मुस्कान, एक स्पर्श, एक इंतज़ार काफ़ी होता था।


लेकिन समय के साथ हम यह मान लेते हैं कि

अब सामने वाला हमें समझ ही लेगा,

अब प्यार जताने की ज़रूरत नहीं,

अब साथ रहना ही काफ़ी है।


यहीं सबसे बड़ी भूल होती है।


प्यार कोई स्थायी भावना नहीं है,

प्यार एक लगातार किया जाने वाला अभ्यास है।


जैसे शरीर को हर दिन खाना चाहिए,

वैसे ही रिश्ते को हर दिन

ध्यान, समय और संवेदना चाहिए।


बहुत लोग यह कहते हैं 

“अब वो फीलिंग नहीं आती।”


सच यह है कि

फीलिंग अपने आप नहीं आती,

उसे बुलाना पड़ता है।


कभी जानबूझकर ध्यान देना पड़ता है,

कभी मन न होते हुए भी स्नेह दिखाना पड़ता है,

कभी अहंकार छोड़कर पहला कदम बढ़ाना पड़ता है।


शुरुआत में यह बनावटी लग सकता है।

लेकिन मनोविज्ञान कहता है 

व्यवहार भावना को जन्म देता है,

भावना हमेशा व्यवहार से पहले नहीं आती।


मतलब,

अगर आप प्यार जैसा व्यवहार करते रहेंगे,

तो दिमाग धीरे-धीरे उसी भावना में ढल जाएगा।


रिश्ते टूटते इसलिए नहीं कि प्यार खत्म हो जाता है,

बल्कि इसलिए कि

हम सामने वाले को

“देखना” बंद कर देते हैं।


हम सुनते नहीं,

हम समझने की कोशिश नहीं करते,

हम मान लेते हैं कि

अब सब अपने आप चल जाएगा।


लेकिन कोई भी रिश्ता

अपने आप नहीं चलता।


जो रिश्ते लंबे समय तक खूबसूरत रहते हैं,

उनमें लोग उम्र के साथ

ज़्यादा समझदार होते हैं,

ज़्यादा नरम होते हैं,

ज़्यादा सजग होते हैं।


वे यह नहीं कहते कि

“अब समय नहीं है”,

वे कहते हैं

“यही समय है।”


क्योंकि वे जानते हैं 

आज अगर ध्यान नहीं दिया,

तो कल सिर्फ़ आदत बचेगी,

और आदत में गर्माहट नहीं होती।


ज़िंदगी बहुत लंबी नहीं है।

और रिश्ते तो उससे भी छोटे होते हैं।


जब सब कुछ होते हुए भी

कोई रिश्ता सूना हो जाए,

तो उसका दर्द

सबसे गहरा होता है।


इसलिए,

जब समय है.... महसूस करें।

जब सामने वाला है....देखिए।

जब रिश्ता है....उसे सींचिए।


क्योंकि अंत में

सबसे ज़्यादा अफ़सोस

उसी चीज़ का होता है

जिसे बचाया जा सकता था

लेकिन हमने उसे

“बाद में” के लिए टाल दिया।


कुछ स्त्रियाँ आज भी हैं...

कुछ स्त्रियाँ आज भी हैं

जो समय के संग चलती हैं,

पर समय में घुलकर

अपनी जड़ों को नहीं भूलतीं।


वे जानती हैं

मोबाइल की चमक,

शहरों की तेज़ रफ्तार,

और आधुनिकता की भाषा,

फिर भी उनके मन में

रीति-रिवाज

अबूझ बोझ नहीं,

सांसों की तरह स्वाभाविक हैं।


आज भी वे

मांग में पूरा सिंदूर भरती हैं,

आधा नहीं, संकोच में नहीं,

पूरी आस्था के साथ,

जैसे ललाट पर

परंपरा स्वयं उतर आई हो।


बड़ी सी बिंदी

उनकी भौंहों के मध्य

केवल श्रृंगार नहीं,

संस्कृति का विराम-चिह्न है,

जो कहता है,

“मैं हूँ,

और अपनी पहचान के साथ हूँ।”


कलाई भर चूड़ियाँ

जब चलती हैं तो

घर के आंगन में

मधुर नाद भर देती हैं,

उनकी खनक में

माँ की सीख,

दादी की कथाएँ

और नानी का आशीष

एक साथ बज उठता है।


वे पूरा श्रृंगार करती हैं,

किसी को दिखाने के लिए नहीं,

बल्कि अपने भीतर

स्त्री होने के उत्सव को

प्रतिदिन मनाने के लिए।


साड़ी उनके लिए

वस्त्र नहीं,

विरासत है—

जिसकी एक-एक सिलवट में

पूर्वजों का अनुशासन,

मर्यादा और

संयम बुना हुआ है।


वे आज भी

उन नियमों में रहती हैं

जो कभी घरों ने गढ़े थे—

जहाँ रिश्ते पहले आते थे,

और स्वार्थ बाद में।

कहने को लोग उन्हें

पुरानी सोच का कह दें,

पर सच यह है—

यही स्त्रियाँ

समय की आँधी में

संस्कृति की दीया-बाती बनकर

जली रहती हैं।

वे पीछे नहीं,


वे जड़ हैं


और जड़ें ही तय करती हैं

कि वृक्ष

कितनी ऊँचाई तक जाएगा।

सभी मर्द एक जैसे होते हैं

सभी मर्द एक जैसे होते हैं...

कौन मर्द ?

जो बाप बनकर ताउम्र तुम्हारी हर छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी ख्वाहिशों को पूरी करता है,जिसे अपने फटे हुए जूते सिलवाने याद रहे ना रहे लेकिन अपनी बिटिया के लिए स्कूल ड्रेस खरीदना कभी नहीं भूलता है जो महज तुम्हारी छोटी सी इलेक्ट्रॉनिक गुड़िया और एक तुम्हारी पहली स्कूटी और साइकिल के लिए रोज 4 घंटे ओवरटाइम के नाम पर घर लेट आया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना?


सभी मर्द एक जैसे होते हैं।

कौन मर्द ?

वही मर्द ना ,जो भाई बनकर ताउम्र अपनी ख्वाहिशों को मार कर अपने सारे खिलौने तुम्हे दे दिया करता है, तुम्हें डांट ना पड़े इसलिए अपने बाप से मार भी खा लिया करता है, लाख लापरवाह रहे हो वो, लेकिन तुम्हारे एक तरफ उठने वाली हर एक नजर को वह फोड़ दिया करता है वही मर्द ना जो जिंदगी भर पागलों की तरह हंसता रहता है लेकिन तुम्हारी विदाई में फूट फूट कर रोया करता है वही मर्द ना जो जिंदगी के भाग दौड़ में सबसे दूर भाग कर तुम्हारे एक फोन कॉल का इंतजार करता है तुम उसे मर्द की बात कर रही हो ना?


सभी मर्द एक जैसे होते हैं।

कौन मर्द ?

वही मर्द ना जो पति बनकर अपने लड़कपन को एक ही झटके में खत्म कर देता है 80 की रफ्तार से चलाने वाला बाइक अचानक से 40 की रफ्तार में अपने जिम्मेदारियों को थाम लेता है मंगलसूत्र का पहचान वह मर मर्द ता उमर तुम्हारी छोटी छोटी ख्वाहिशों के लिए अपने हर बड़े बड़े अरमानों को मार दिया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना जो पति बनकर हर उम्र में एक दोस्त की तरह तुम्हारा साथ दिया करता है बोलो ना तुम उसी की बात कर रही हो ना?


सभी मर्द एक जैसे होते हैं

कौन मर्द ?

वही मर्द ना जो प्रेमी बनकर पूरी दुनिया को भूलाकर बस तुमसे मोहब्बत करता है तुम्हारे हर झूठे तुम्हारे हर कहानी की बातों को सच मानकर तुमसे बेइंतेहा इश्क करता है वह तुम्हारी झूठ में भी खुद के लिए सच खोज लिया करता है तुम्हारी एक मुस्कान के लिए अपना सब कुछ निछावर कर दिया करता है तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना जो प्रेमी बनकर अपनी प्रेमिका के लिए पूरी दुनिया से लड़ जाया करता है अरे बोलो ना, अरे चुप क्यों हो, बताओ ना की बात कर रही हो ना?


सभी मर्द एक जैसे होते हैं । 

कौन मर्द ??

वही मर्द ना जो दोस्ती के रिश्ते में एक दोस्त बनकर तुम्हें परिवार का हिस्सा मान लेता है जो तुम्हें पिज़्ज़ा खिलाने के लिए खुद के लिए बल्ला खरीदने का पैसा निकाल कर तुम्हें पिज्जा खिला देता है, वही मर्द ना जो मात्र दोस्ती का रिश्ता होने के बावजूद भी पूरी दुनिया से तुम्हारे लिए लड़ जाया करता है तुम्हें सब से बचाता है तुमसे हमेशा गाली खाता है लेकिन तुम्हारी आंखों में कभी आंसू नहीं आने देता वही मर्द ना जो तुमसे लड़ता है झगड़ते है तुम्हें रुलाता है और फिर तुम्हें हंसाने के लिए खुद जोकर बन जाया करता है बताओ ना तुम उसी मर्द की बात कर रही हो ना?


सभी मर्द एक जैसे ही होते है 

कौन मर्द ??

वही मर्द जो एक बेटा बन कर हमेशा अपनी मां का ढाल बन कर खड़ा रहता है वही मर्द जिसकी हर तम्माना को पूरी करने के लिए मां रात भर जागती है और मां के बुढ़ापे में वही लड़का एक ढाल बन कर मां की सेवा करता है मां के लिए उसका बेटा ही सबसे बेहतर होता है मां के लिए उसका बेटा ही हीरो है , हां ये बात सही है कि शादी होने के बाद वही कुछ बेटे अपनी मां को घर से निकाल कर वृद्ध आश्रम में भेज देते है लेकिन उनके इस कुकर्म के लिए क्या सिर्फ मर्द ही जिमेद्दार होते है लेकिन इन सब से दूर हिंदुस्तान के आज भी हर घर में श्रवण कुमार जैसे बेटे रहते है जिनके लिए उनकी मां ही उनकी दुनिया है ,

बताओ ना क्या तुम उसी मर्द की बात कर रहीं हो जो अपनी मां के लिए जान भी देते हैं...

Friday, January 9, 2026

Raj sir Words




दोस्तों...प्रशंसा को हमेशा विनम्रता से स्वीकार करें और आलोचना पर गंभीरता से विचार करें...अगर ऊंचाई हासिल करनी है, तो बाज बनो धोखेबाज नहीं...स्वीकारना, सीखना, सुधारना और उभरना यही जीवन है। उजालों में असलियत नज़र नही आती,अंधेरा ही बता सकता है सितारा कौन है...जीवन मे हैसियत का परिचय तब देना चाहिए जब बात आत्म सम्मान की हो अन्यथा सादगी ही सबसे बड़ा परिचय होता है...कहानियों में प्रेम कुछ और है किताबों में कुछ और ये मोह को प्रेम समझने वाला चल रहा है दौर...चेहरों की नुमाइश में रूह को कौन देखता है यहाँ तो बस ज़रूरतों का खेल चल रहा है दोस्तों किताबें भरी पड़ी हैं वफ़ा के किस्सों से और बाहर बस दिल बहलाने का दौर चल रहा है। परिवर्तनो को स्वीकार करना जीवन को सहज बना देता है...जीवन में सबसे शक्तिशाली चीज़ हमारी सोच है,जो किसी भी परिस्थिति को बदलने की क्षमता रखती है। जो मनुष्य जीवन में धेर्य और संतोष को अपना साथी बना लेता है वह कभी दुखी नहीं रहता...धर्म कि दिवारें ऊंची होती जा रही है और इंसानियत उनके नीचे दबती जा रही है...कामयाबी की पहली सीढ़ी है कोशिश,कोशिश से ग़लती,ग़लती से सबक,सबक से तजुर्बा और तजुर्बे से कामयाबी मिलती है...ज़िंदगी कभी भी परफेक्ट नहीं होती...हर किसी के अपने कमियाँ होती हैं, अपनी चुनौतियाँ होती हैं, अपनी परेशानियाँ होती हैं—और अपना जीने का तरीका होता है। इसलिए खुद को दूसरों से तुलना न करें; जैसे हैं वैसे ही अच्छी तरह जीना काफ़ी है...राज Sir


दोस्त जिस हुस्न का सौदागर राज था, ओ जिस्म किसी और के हाथो बिक गया,हम वहाँ हैं जहाँ से हम को भी,कुछ हमारी ख़बर नहीं आती दोस्त...ये होंठ चूमने वाली प्रेमिकाएं कब समझेंगी परेशानी पुरुषों का, दोस्त प्रेम मे माथा चूमा जाता है होंठ नही...कई फोन बदले जाएंगे कई इमेल को भी बदला जाएगा,मगर पुरुषों के फोन मे प्रेमिकाओं की तस्वीरें हमेशा बरकार रहती है...जिस पर ज़हर तक असर नही करता, उन लोगो अक्सर तन्हाई मार देती है दोस्त..आत्मसम्मान पे लगे ज़ख्म,माफी की इजाजत कभी नहीं देते दोस्त....उसूलों के पक्के मर्द के लिए हुस्न माटी है,और किरदार की पक्की औरत के लिए पैसा राख दोस्त...असली परख हुस्न या दौलत से नहीं बल्कि किरदार से होती है,मजबूत उसूलों वाली शख्सियत हर चमक पर भारी होती है दोस्त...उसके भूतकाल पर विवाद क्या करना दोस्त,जिसके यादो साथ अनंत काल तक रहना हो...मुकम्मल कहां रही किसी की जिंदगी दोस्त,हर शख्स कुछ खोता ही रह गया कुछ पाने के लिए...लोगों की पहचान उनके वचन से नहीं उनके व्यवहार से होती है,अच्छे बोल सबके पास होते हैं,पर अच्छा दिल बहुत कम लोगों के पास होता है दोस्त...मैं भी नहीं अकेला हूँ दोस्त,शाम है‚ दर्द है‚ उदासी है और तेरी खूबसूरत यादें है...शिद्दत की प्यास है इस मुद्दत के प्यासे को,तरे हाथों से जो मिले तो दो बूंद ही काफी है दोस्त...चायपत्ती और पति मे क्या समानता है जानते हो दोस्त,दोनों के ही भाग्य मे जलना और उबलना लिखा है...फ़िर तेरे बाद कुछ खोया नही हमने दोस्त,तू मेरी ज़िंदगी का आखिरी नुकसान है ...हक़ीक़त की धुप में जलना मंजूर है दोस्त हमें पर,झुठ की छांव में बिकना मेरी फितरत नहीं...बदलते लोग, बदलते रिश्ते और बदलता मौसम,चाहे दिखाई ना दे मगर महसूस जरूर होते है दोस्त...जीवन में सबसे कठिन है लोगो को पहचानना, क्योंकि इंसान जैसा दिखता है वैसा होता नहीं दोस्त...अब तजुर्बा कहता है रिश्तो में फांसला रखिए ज़्यादा नजदीकियां अक़्सर दर्द से जाती हैं दोस्त...मैंने शराब और प्यार दोनों का स्वाद चखा है ,मुझ पर विश्वास कर दोस्त तेरे लिए हमेसा बेहतर थे और है...कोई क्या लगाएगा मेरे बर्दाश्त करने का अंदाजा दोस्त,मैंने मर जाने जैसा वक्त भी जी के गुजारा है...सूरत तो वह देखते हैं जिन्हें रात गुजारनी होती है दोस्त,जिंदगी गुजारने वाले सीरत देखा करते हैं...एक समझने वाला,हज़ारों चाहने वालों से बेहतर है दोस्त...कहां से लाए पक्के सबूत की तुम्हें कितना चाहते हैं.. दिल, दिमाग, नजर, सब तो तेरी कैद में है दोस्त... Raj


Have a wonderful night friends...

Thursday, January 8, 2026

दो शरीरों का मिलन

जब किसी पुरुष की ऊर्जा किसी स्त्री की ऊर्जा से गहरे सामंजस्य में मिलती है

तो कुछ ऐसा घटता है जो पारलौकिक है।

यह केवल दो शरीरों का मिलन नहीं होता —

यह दो ब्रह्मांडों का एक लय में विलय होना है।

जब यह पूर्णता से होता है, तब दोनों खो जाते हैं।

तब न पुरुष रहता है, न स्त्री;

केवल एक ऊर्जा रह जाती है — पूर्णता की ऊर्जा।


सामान्य प्रेम में तुम केवल सतह पर मिलते हो —

शरीर को छूते हो, बातें करते हो, भावनाएँ साझा करते हो —

लेकिन भीतर से अलग ही रहते हो।

जब प्रेम ध्यानमय हो जाता है, जब उसमें जागरूकता उपस्थित होती है,

तब यह मिलन दो व्यक्तियों का नहीं, दो ध्रुवों का हो जाता है।


पुरुष सूर्य की ऊर्जा लिए होता है — सक्रिय, पैठनेवाली, बाहर की ओर जानेवाली।

स्त्री चंद्रमा की ऊर्जा लिए होती है — ग्रहणशील, ठंडी, स्वागतपूर्ण।

जब ये दोनों ऊर्जा जागरूकता में मिलती हैं,

तब एक नई दिशा खुलती है — वही ईश्वर का द्वार है।


किसी पुरुष के लिए “पूर्ण स्त्री” वह नहीं जो उसकी इच्छाओं को पूरा करे,

बल्कि वह है जो उसके अस्तित्व का दर्पण बन जाए।

और किसी स्त्री के लिए “पूर्ण पुरुष” वह नहीं जो उस पर अधिकार करे,

बल्कि वह है जिसकी उपस्थिति में वह खिल सके।


पुरुष को कभी-कभी समर्पण करना सीखना होता है —

यही उसका स्त्री के माध्यम से दीक्षा है।

और स्त्री को मौन और साक्षी होना सीखना होता है —

यही उसकी पुरुष के माध्यम से दीक्षा है।


जब यह द्वंद्व नाच बन जाता है —

जब न शक्ति की लड़ाई होती है, न कोई माँग, न कोई भय —

तब उनके बीच जो ऊर्जा बहती है, वह आनंदमय, सृजनशील और प्रार्थनापूर्ण बन जाती है।

तब सेक्स अब सेक्स नहीं रहता — वह समाधि बन जाता है।

प्रेमी किसी विशालता में खो जाते हैं;

वे अस्तित्व के सार को छू लेते हैं।


“पूर्ण ऊर्जा” का मिलना किसी “पूर्ण व्यक्ति” को पाना नहीं है —

यह एक “पूर्ण अनुनाद” को पाना है।

यह किसी के साथ भी घट सकता है,

जब दोनों खुले हों, निडर हों, और उपस्थित हों।

जिस क्षण दोनों की ऊर्जाएँ एक स्वर में गूँजती हैं,

उसी क्षण तुमने दिव्य प्रिय को पा लिया।”



वासना सभी को भिखमंगा बना देती है। न कभी द्वार खुलते, न कभी भिक्षापात्र भरता। वासना सभी की आंखों को आंसुओं से भर देती है। वासना सभी के हृदय में कांटे बो देती है। वासना महादुख है।


मगर इसका यह अर्थ नहीं कि वासना का कोई उपयोग नहीं है। यही उपयोग है कि वासना तुम्हें जगाए, झंझोड़े; दुख, पीड़ा, अंधड़ उठें; और तुम चौकन्ने हो जाओ; तुम सावधान हो जाओ। वासना को देख-देख कर एक बात अगर तुम समझ लो, तो दुख का सारा सार निचोड़ लिया--कि मांगना व्यर्थ है। मांगे कुछ भी नहीं मिलता। दौड़ व्यर्थ है, दौड़कर कोई कहीं नहीं पहुंचता।


इतनी समझ आ जाए दुख में कि दौड़कर कोई कहीं नहीं पहुंचता और तुम रुक जाओ; इतनी समझ आ जाए कि मांगकर कुछ भी नहीं मिलता और तुम्हारी सब मांगें चली जाएं, तुम्हारी सब प्रार्थनाएं चली जाएं, तुम भिक्षापात्र तोड़ दो--उसी क्षण संन्यास का फूल खिल जाता है।


संन्यास का अर्थ क्या होता है? इतना ही अर्थ होता है: इस संसार में न कुछ मिलता है, न मिल सकता है। दौड़ है, आपाधापी है, खूब संघर्ष है, लेकिन संतुष्टि नहीं। जिसने यह देख लिया, जिसके भरम टूटे, जिसके सपन टूटे, जिसके ये सारे भीतर चलते हुए झूठे खयाल दुख से टकरा-टकरा कर खंडित हो गए, बिखर गए, उसको बड़ा लाभ होता है। लाभ होता है कि वह अपने में थिर हो जाता  है...