Tuesday, January 13, 2026

माताओं में असीम सामर्थ्य होती है

 माताओं में असीम सामर्थ्य होती है। वे वह सब कर सकती हैं, जिसकी कल्पना भी कठिन होती है। फिर भी अक्सर पारिवारिक और सामाजिक परिस्थितियों में उनकी बातों को अनसुना कर दिया जाता है। धीरे-धीरे उनके मन में पीड़ा इकट्ठा होने लगती है। मन भारी हो जाता है, पर उसी भारी मन को लेकर वे निरंतर परिवार की सेवा करती रहती हैं।

इस प्रक्रिया में उनका जीवन मानो एक सीमित दायरे में सिमटता चला जाता है जैसे कोई जीव स्वयं को बुनते हुए अंततः उसी में बँध जाता है।


इसलिए आवश्यक है कि वे उस दायरे से बाहर निकलें। केवल दायित्वों तक सीमित न रहें, बल्कि अपने लिए भी समय निकालें। दिनभर के सारे काम निपटाने के बाद यदि वे प्रतिदिन थोड़ा सा समय आत्मचिंतन, मौन, या किसी सकारात्मक उद्देश्य को दें, तो धीरे-धीरे उनके भीतर की बंद खिड़कियाँ खुलने लगती हैं। भीतर प्रकाश प्रवेश करता है, और जीवन में फिर से प्रसन्नता का संचार होने लगता है।


जब एक माँ का मन आनंदित होता है, तो उसका प्रभाव केवल उसी तक सीमित नहीं रहता। उसका प्रभाव पूरे परिवार पर पड़ता है। क्योंकि जब प्रसन्न मन से वह भोजन बनाती है, बोलती है, या कोई भी कार्य करती है, तो वही भाव परिवार के प्रत्येक सदस्य तक पहुँचता है। यह अनुभवजन्य सत्य है कि जो व्यक्ति जिस मानसिक अवस्था में कुछ देता है, वही अवस्था प्राप्त करने वाले तक भी पहुँचती है।


इसलिए आगे बढ़ने से डरना नहीं चाहिए। डर आखिर किस बात का? यह सोचकर रुक जाना कि “मैं ठीक से बोल नहीं पाऊँगी”, “मुझे ज्ञान नहीं है”, या “लोग क्या कहेंगे” ये सब मन की रुकावटें हैं।

जब कोई भी व्यक्ति अपने अनुभव और सच्चे भाव से बोलता है, तो वह किसी तय सीमा में नहीं बँधा रहता। ज्ञान की औपचारिकता से बाहर निकलकर जब बात आती है, तब वह अधिक सजीव और प्रभावशाली होती है।


एक छोटी-सी कहानी है किसी बड़े निर्माण कार्य में अनेक शक्तिशाली लोग लगे होते हैं, पर वहीं एक छोटा जीव भी अपनी सीमित क्षमता से उसमें योगदान देता है। इतिहास में अक्सर बड़े नाम खो जाते हैं, लेकिन उस छोटे जीव की निष्ठा और प्रयास लोगों की स्मृति में जीवित रह जाते हैं। क्योंकि मूल्य आकार में नहीं, भाव में होता है।


जीवन में रोग, शोक और कठिनाइयाँ आना स्वाभाविक है। कई बार हम उन्हीं पर पूरा ध्यान केंद्रित कर देते हैं। लेकिन जब हम स्वयं को किसी सकारात्मक और उद्देश्यपूर्ण कार्य में लगाए रखते हैं, तो अनेक समस्याएँ अपने आप कमजोर पड़ने लगती हैं।

दुख भी ध्यान चाहता है। जब हम लगातार उसी को देखते रहते हैं, तो वह और मजबूत होता है। लेकिन जब हम जीवन के अर्थ, सेवा, या व्यापक दृष्टि की ओर बढ़ते हैं, तो वही दुख स्वयं पीछे हटने लगता है जैसे वह कह रहा हो कि “यहाँ अब मेरा स्थान नहीं रहा।”


जीवन को प्रेम से जीने में शर्तें नहीं होनी चाहिए। जब हम यह कहना सीख लेते हैं कि “मुझे कुछ नहीं चाहिए, बस सब ठीक रहे”, तो उसी क्षण से हमारा अपना ठीक रहना शुरू हो जाता है।

मन में कौन-सा विचार, कौन-सी भावना रहेगी यह हमारा अधिकार है। जैसे कोई व्यक्ति यह तय करता है कि किसी विषैले अनुभव को हाथ में लेकर क्या करना है, वैसे ही हम भी तय करते हैं कि किसे अपने मन में स्थान देना है और किसे नहीं।


कभी-कभी किसी के व्यवहार से मन आहत हो जाता है। उस क्षण यह समझ आ जाए कि यदि हमारा मन भीतर से पूर्ण होता, तो बाहरी व्यवहार हमें इतना विचलित नहीं कर पाता तो वहीं से सुधार की प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

जैसे ही हम भीतर की कमी को पहचानकर उसे भरने का प्रयास करते हैं, मन कुछ ही समय में पुनः संतुलित हो जाता है।


अक्सर लोग सोचते हैं कि किसी सामूहिक आयोजन का उद्देश्य केवल भाषण या औपचारिकता है। पर वास्तव में उसका उद्देश्य यह समझना है कि हम अपने जीवन को किस चेतना के साथ जी रहे हैं। प्रेरणास्रोतों की चर्चा आवश्यक है, क्योंकि उनसे हमें दिशा मिलती है।

लेकिन अंततः हर कार्य का केंद्र वही होना चाहिए, जिसके लिए वह किया जा रहा है न कि केवल आयोजन स्वयं।


सामूहिक मिलन, संस्कार और सामाजिक कार्यक्रम लोगों को जोड़ने के लिए होते हैं। लेकिन प्रेम के लिए किसी मंच या विधि की आवश्यकता नहीं होती। प्रेम तो तब है जब हम अपने जीवन के हर छोटे-बड़े कार्य में उस भावना को साथ रखें।

खाते समय, चलते समय, काम करते समय यदि कोई भाव लगातार हमारे साथ बना रहे, तो वही सच्चा जुड़ाव है। ऐसा जुड़ाव कभी टूटता नहीं।


कभी-कभी बड़ी घटनाओं में यह देखने को मिलता है कि लोग असामान्य रूप से सुरक्षित रह जाते हैं। जब उस समय वे किसी भय में नहीं, बल्कि एकाग्रता, प्रार्थना, स्मरण या सकारात्मक चिंतन में लीन होते हैं, तो उनका मन भय से मुक्त रहता है। भय से मुक्त मन कई बार असंभव परिस्थितियों में भी संतुलन बनाए रखता है।


लेकिन यह मान लेना कि केवल संकट के समय किसी उच्च शक्ति को याद करने से सब ठीक हो जाएगा यह एक प्रकार की शर्त है। जीवन का वास्तविक सिद्धांत यह है कि निरंतर, सहज और बिना अपेक्षा के उस सकारात्मक चेतना से जुड़े रहा जाए।

यही जीवन जीने की कला है। इसी तरह जीवन में स्थिरता आती है।


जब हम आनंदित मन से, प्रेमपूर्वक जो भी कार्य करते हैं, उसका प्रभाव हमारे आसपास के लोगों पर भी पड़ता है। परिवार, वातावरण और संबंध सब धीरे-धीरे उसी आनंद से भरने लगते हैं।


और अंततः, जो भी हम करें, उसमें हमारे और हमारे जीवन-दर्शन के बीच एक प्रेम-कथा होनी चाहिए।

उस प्रेम को केवल शब्दों से नहीं, बल्कि अपने जीवन के माध्यम से प्रकट करना ही उसकी सच्ची अभिव्यक्ति है।



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