देह की अतृप्ति और मन का कलह: एक अनकहा संकट
अक्सर बंद कमरों की खामोशियां बाहर चीख बनकर निकलती हैं। हम जिसे 'पारिवारिक झगड़ा' या 'स्त्री का स्वभावगत चिड़चिड़ापन' कहकर टाल देते हैं, उसकी जड़ें अक्सर उन अंधेरों में होती हैं जहाँ संवाद खत्म हो जाता है और केवल शोषण बचता है। मास्टर्स और जानसन का वैज्ञानिक अध्ययन हमें एक भयावह आईने के सामने खड़ा करता है: 90 प्रतिशत स्त्रियां कभी चरम सुख (Orgasm) को अनुभव ही नहीं कर पातीं।
❇️यौन साक्षरता का अभाव और पुरुष की जल्दबाज़ी
अध्ययन बताता है कि 75 प्रतिशत पुरुष शीघ्रपतन के शिकार हैं। यह केवल एक शारीरिक समस्या नहीं है, बल्कि एक मनोवैज्ञानिक और सांस्कृतिक विफलता भी है। पुरुष 'उपयोग' करने की मानसिकता से यौन क्रिया में उतरता है, जहाँ उसकी प्राथमिकता केवल अपनी मुक्ति होती है। वह स्खलित होता है और सो जाता है, लेकिन उसके पीछे वह एक ऐसी स्त्री को छोड़ जाता है जो देह और मन के स्तर पर अधूरी रह गई है।
जब संभोग एक 'साझा उत्सव' न रहकर केवल 'एकतरफा उपयोग' बन जाता है, तो स्त्री के भीतर यह बोध गहराने लगता है कि वह केवल एक वस्तु (Object) है। यह बोध ही उसके भीतर के क्रोध और चिड़चिड़ेपन का जन्मदाता है।
❇️अतृप्ति: झगड़ों और क्लेश की अदृश्य जड़
आधुनिक मनोविज्ञान और प्राचीन तंत्र शास्त्र, दोनों इस बात पर सहमत हैं कि यौन तृप्ति मानसिक शांति का आधार है। एक अतृप्त स्त्री, जो काम-समाधि के शिखर से वंचित रह गई है, वह स्वाभाविक रूप से क्षुब्ध रहेगी।
🔹दार्शनिक और धार्मिक असफलता: कोई भी प्रवचन या नीति शास्त्र उस स्त्री को शांत नहीं कर सकता जिसकी जैविक और ऊर्जागत जरूरतें अधूरी हैं।
🔹रिश्वत का संबंध: क्योंकि स्त्रियों को इस प्रक्रिया में आनंद नहीं मिलता, वे इसे एक 'बोझ' या 'कर्तव्य' समझने लगती हैं। यहीं से संबंधों में सौदेबाजी शुरू होती है—वह तभी राजी होती है जब उसे कोई अन्य प्रतिफल मिले। यह प्रेम का अंत और शोषण की शुरुआत है।
❇️क्या पुरुष ही उत्तरदायी है?
लेख स्पष्ट संकेत देता है कि यदि घर में निरंतर कलह है, तो पुरुष को अपने अहंकार से बाहर निकलकर आत्म-निरीक्षण करना चाहिए। जिसे वह अपनी पत्नी की 'बदमिजाजी' समझ रहा है, वह दरअसल उसकी अपनी अक्षमता और संवेदनहीनता का परिणाम हो सकता है।
स्त्रियों का काम-विमुख (Frigid) होना उनकी प्रकृति नहीं, बल्कि उनके अनुभवों की कड़वाहट है। जब शरीर का रोम-रोम आनंद से कंपित होने के बजाय केवल अपमान और उपेक्षा का अनुभव करता है, तो आत्मा देह से विमुख होने लगती है।
❇️शिखर की ओर यात्रा
सौ में से नब्बे स्त्रियों का आर्गाज्म से अपरिचित होना एक मानवीय त्रासदी है। काम-भोग को केवल वंश वृद्धि या पुरुष की वासना पूर्ति का साधन समझना बंद करना होगा। यह एक ऐसी कला है जिसमें धैर्य, समय और संवेदनशीलता की आवश्यकता है।
जब तक पुरुष संभोग को 'कृत्य' (Doing) के बजाय 'होने' (Being) की प्रक्रिया नहीं बनाएगा, तब तक परिवार और समाज में यह अशांति बनी रहेगी। असली 'काम-समाधि' वह है जहाँ दोनों पक्ष समान रूप से विसर्जित हों। अन्यथा, बिस्तर पर बहाए गए स्त्री के आंसू किसी भी सभ्यता के लिए कलंक ही रहेंगे।
यौन अतृप्ति का मनोवैज्ञानिक प्रभाव केवल बिस्तर तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह व्यक्ति के पूरे व्यक्तित्व, व्यवहार और जीवन के प्रति उसके दृष्टिकोण को बदल देता है। जब हम मास्टर्स और जानसन के उन आंकड़ों (90% स्त्रियों की अतृप्ति) को मनोवैज्ञानिक चश्मे से देखते हैं, तो इसके परिणाम अत्यंत गहरे और जटिल नजर आते हैं।
यहाँ इसके मनोवैज्ञानिक प्रभावों का विस्तृत विश्लेषण है:
1. संवेगात्मक अस्थिरता और 'क्रोनिक फ्रस्ट्रेशन'
जब शरीर एक तीव्र ऊर्जा (Sexual Energy) को संचित करता है और उसे विसर्जित (Release) करने का अवसर नहीं मिलता, तो वह ऊर्जा शरीर के भीतर 'विषाक्त' होने लगती है।
❇️दबा हुआ क्रोध: अतृप्ति सीधे तौर पर चिड़चिड़ेपन में बदल जाती है। छोटी-छोटी बातों पर चिल्लाना, बर्तन पटकना या बच्चों पर बिना कारण गुस्सा करना, दरअसल उस शारीरिक कुंठा की अभिव्यक्ति है जिसे समाज में बोलना 'वर्जित' है।
❇️भावनात्मक सुन्नता: लंबे समय तक चरम सुख से वंचित रहने पर स्त्रियाँ 'इमोशनल विड्रॉल' का शिकार हो जाती हैं। वे खुद को भावनात्मक रूप से सुरक्षित रखने के लिए अपने साथी से दूरी बना लेती हैं।
2. वस्तुकरण का बोध और आत्म-सम्मान की कमी
जैसा कि आपके द्वारा दी गई जानकारी में उल्लेख है, जब पुरुष स्खलित होकर सो जाता है और स्त्री अधूरी रह जाती है, तो उसके अवचेतन में यह बात बैठ जाती है कि "मैं केवल एक साधन हूँ।"
❇️यह बोध स्त्री के आत्मविश्वास (Self-esteem) को तोड़ देता है। उसे लगता है कि उसके अस्तित्व का मूल्य केवल दूसरे की संतुष्टि तक है।
❇️यही कारण है कि वह धीरे-धीरे 'काम-विमुख' होने लगती है, क्योंकि जिस क्रिया से उसे केवल अपमान का अनुभव हो, उससे जुड़ना उसके आत्म-सम्मान को चोट पहुँचाता है।
3. 'पेसिव-अग्रेसिव' व्यवहार (Passive-Aggressive Behavior)
मनोविज्ञान कहता है कि जब कोई व्यक्ति अपनी बुनियादी जरूरतों के लिए सीधे तौर पर मांग नहीं कर पाता (विशेषकर भारतीय संदर्भ में जहाँ स्त्रियाँ अपनी यौन इच्छाओं पर बात नहीं कर पातीं), तो वे 'पेसिव-अग्रेसिव' हो जाती हैं।
❇️वे सीधे झगड़ा करने के बजाय काम में देरी करना, महत्वपूर्ण मौकों पर बीमार हो जाना, या परिवार में 'साइलेंट ट्रीटमेंट' (बातचीत बंद करना) देना शुरू कर देती हैं। यह उनके भीतर की अतृप्ति का एक अनकहा प्रतिशोध होता है।
4. संबंधों में 'ट्रांजेक्शनल' (लेन-देन) मानसिकता
जब संभोग में आनंद लुप्त हो जाता है, तो यह एक 'सौदा' बन जाता है। स्त्रियाँ संभोग को एक 'रिश्वत' या 'हथियार' की तरह इस्तेमाल करने लगती हैं।
❇️"अगर तुम मेरी यह मांग पूरी करोगे, तभी मैं राजी होऊंगी"—यह मानसिकता प्रेम के नैसर्गिक प्रवाह को खत्म कर देती है। यह मनोविज्ञान की दृष्टि से संबंधों का पतन है, जहाँ आत्मीयता की जगह चालाकी ले लेती है।
5. मनोदैहिक बीमारियाँ (Psychosomatic Disorders)
लगातार मानसिक तनाव और अतृप्ति शरीर पर बीमारियों के रूप में प्रकट होने लगती है।
❇️अनिद्रा (Insomnia), माइग्रेन, पीठ दर्द और पाचन संबंधी समस्याएं अक्सर उन स्त्रियों में अधिक देखी जाती हैं जो यौन रूप से असंतुष्ट हैं। मन की गांठें शरीर की गांठें बन जाती हैं।
❇️समाधान की दिशा
मनोविज्ञान कहता है कि इस समस्या का समाधान केवल शारीरिक नहीं, बल्कि संवादात्मक है।
❇️संवाद की कमी को दूर करना: पुरुष को अपनी 'परफॉरमेंस' की चिंता छोड़कर स्त्री की भावनाओं और उसकी देह की भाषा को समझना होगा।
❇️कामुकता बनाम संवेदनशीलता: यौन क्रिया को एक 'लक्ष्य' (Target) के बजाय 'प्रवाह' के रूप में देखना।
❇️सत्ता का संतुलन: जब तक पुरुष खुद को 'उपभोक्ता' और स्त्री को 'उपभोग्य वस्तु' समझेगा, यह मनोवैज्ञानिक संकट बना रहेगा।
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